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सोमवार, 18 जनवरी 2010

शब्दकर्म

शब्द, जिन्हें हम मन से, बड़े जतन से बुनते- गुनते हैं, किसी के मर्म तक प्रेषित करने के लिए... अपने  आशय को प्रकट करने के लिए शब्दों को अर्थ की लय में पिरो कर भावों की प्रवण माला गूंथते हैं, उन्हीं मर्मभेदी शब्दों को जीवन की पाठशाला से उठाकर कुछ सिखा है, और शब्दों को ही हथियार सा बनाकर इस जिन्दगी की निरंकुशता से, आपाधापी से जूझते आम आदमी की तरह जूझना चाहता हूँ. आदमी ही बने रहना चाहता हूँ. मैं जिन्दा हूँ, इसकी तसल्ली करता हूँ...

"गम नहीं होगा गर मेरी आँखों में रौशनी न हो,
 रंज इसका करूँगा जो उनमें सपने न हों."

साहित्य की कार्यशाला में अपना कर्म और धर्म कर्मठता से साध सकूँ... चाह सिर्फ इतनी है !

रामधारी  सिंह दिनकर की ये कविता क्या हर शब्द्कर्मी की आत्मा नहीं बयां करती ? 


"परिचय"



सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं
स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं
बँधा हूँ, स्वपन हूँ, लघु वृत हूँ मैं
नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं
समाना चाहता है, जो बीन उर में
विकल उस शुन्य की झनंकार हूँ मैं
भटकता खोजता हूँ, ज्योति तम में
सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं
जिसे निशि खोजती तारे जलाकर
उसीका कर रहा अभिसार हूँ मैं
जनम कर मर चुका सौ बार लेकिन
अगम का पा सका क्या पार हूँ मैं
कली की पंखडीं पर ओस-कण में
रंगीले स्वपन का संसार हूँ मैं
मुझे क्या आज ही या कल झरुँ मैं
सुमन हूँ, एक लघु उपहार हूँ मैं
मधुर जीवन हुआ कुछ प्राण! जब से
लगा ढोने व्यथा का भार हूँ मैं
रुंदन अनमोल धन कवि का, इसी से
पिरोता आँसुओं का हार हूँ मैं
मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का
चिता का धूलिकण हूँ, क्षार हूँ मैं
पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी
समा जिस्में चुका सौ बार हूँ मैं
न देंखे विश्व, पर मुझको घृणा से
मनुज हूँ, सृष्टि का श्रृंगार हूँ मैं
पुजारिन, धुलि से मुझको उठा ले
तुम्हारे देवता का हार हूँ मैं
सुनुँ क्या सिंधु, मैं गर्जन तुम्हारा
स्वयं युग-धर्म की हुँकार हूँ मैं
कठिन निर्घोष हूँ भीषण अशनि का
प्रलय-गांडीव की टंकार हूँ मैं
दबी सी आग हूँ भीषण क्षुधा का
दलित का मौन हाहाकार हूँ मैं
सजग संसार, तू निज को सम्हाले
प्रलय का क्षुब्ध पारावार हूँ मैं
बंधा तुफान हूँ, चलना मना है
बँधी उद्याम निर्झर-धार हूँ मैं
कहूँ क्या कौन हूँ, क्या आग मेरी
बँधी है लेखनी, लाचार हूँ मैं ।
                                     (हिंदी समय डोट कम से साभार)




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