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रविवार, 21 फ़रवरी 2010

नज़्म -१

हमें तो यूँ लगता है...
गर कहीं खुदा बसता होगा
मेरे ज़ख्मों को देख
वो भी मुस्कुराता होगा

फिर ये सोचते हैं,
वाकई जो कोई खुदा होता
मेरे साथ भी कभी इंसाफ हुआ होता

आंसू मुझे इतने जहाँ,
इक कतरा मुस्कान भी दिया होता

जो भी मेरा अपना था
अब तो गुज़रा ज़माना हुआ
जिसे टूटकर अपना समझा - माना
उसको भी तो मैं अपना लगा होता

वो हमें चोट देता है
और मुस्कुराता भी है नादानों सा
ऐसा तो मेरा रकीब ना होता

मैंने किसी बुत को नहीं पूजा,
पत्थर से नहीं था इश्क किया
तुझे ही समझा खुदा और पैगम्बर
तुमने तो ना हमें दगा होता

- १७ फ़रवरी २०१०

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

मिटटी का प्रेमी (कहानी)


उसने अचानक चीख कर कहा, मैं आदमी हूँ और मेरी आदमियत एक सच्चाई है. जिसकी समुचित व्याख्या आदमी के इतिहास के किसी भी ज्ञात-अज्ञात दर्शन में दर्ज नहीं की गयी है !
मंच के सामने के लोग हक्के-बक्के से उसे ताकने लगे...

            और वह एकाएक सपने से बाहर आ गया...पसीने से तरबतर...हांफता हुआ सा... उस एक पल को, जब वह सपने की गिरफ्त से छूटा था, एक अजीब सा भाव उसके प्रौढ़ता की दहलीज पर खड़े चेहरे पर मंडरा रहा था... अजीब और डरावना…

            प्राची ने दोस्ती आगे बढ़ाई थी, उन दिनों जब शिशिर को ना तो देश की राजनीतिक उथल-पुथल से कोई लेना-देना था, ना इराक पर बरसते अमेरिकी मिसाइलों से हलाक हो रहे मासूम इराकियों के खून से, ना ही भारत-उदय के भडकीले नारों से... वह सिर्फ अपनी बी.टेक. पूरी करना चाहता था. ऊंचे ग्रेड के साथ. एक सरकारी उपक्रम की ताम्बे के कारखाने से जबरन वी.आर.एस. दिलवाकर नौकरी से बिठाये गए बाप की जोड़-गाँठ कर जमाई जमापूंजी से बी.आई.टी. मेसरा जैसे नामी संस्थान में, एक साल भटकने के बाद, प्रवेश पाया था उसने. तब उसे खुद को साबित करना था, खुद को टिकाना था... उस समय उसे सिर्फ, अर्जुन की तरह, मछली की आँख दिखाई देने लगी थी.
मैंनेज्मेंट गुरूओं के बेस्ट सेलींग उवाचों का अक्षरशः पालन करने वाला शिशिर तब, भगत सिंह की बड़े चाव से खरीदी गई जीवनी या पाश की कविताओं के संग्रह को भूल चुका था...
            प्राची महक की तरह एकदम से उसके उसके पुरे वजूद पर छाती जा रही थी उन दिनों... लेकिन वह प्यार के समीकरण में एलजेबरा सी कठिन कब बन जाएगी, ये वह उन दिनों सोच या समझ नहीं पाया था.
प्राची ने इसके चार महीनों बाद सपाट लहजे में आखिरी फैसला किया था, आई डोंट लव यू, आई लव समवन एल्स...

...तुम मेरा बहुत ख्याल रखते हो शिशिर, इतना ज्यादा कि मेरा दम घुटने लगता है... मैं सांस भी नहीं ले पा रही. मुझे तुम्हारा प्यार एक तंग सुरंग लगता है. लगता है मैंने पत्थर पर ही सर मार लिया है...  
            एक ऐसा धमाका जो सिर्फ उसके भीतर हुआ, जिसकी गूंज बाहर कहीं सुनाई नहीं पड़ी थी. उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि इतना पुख्ता विश्वास भी तोड़ा जा सकता है ?  बकौल उसकी सहेली, उसे अब कोई और पसंद आ गया था, उसकी खुशी अब कोई और था. आत्मा तो, गीता के अनुसार, अपना चोला बदल लेती है.
क्या प्रेम भी, और वो भी इतनी जल्दी !
प्राची ने अगली सुबह स्वीकार किया था कि ‘आज जिस तरह तुम्हारा दिल तोड़ रही हूँ, कल कोई मेरा तोड़ दे तो मैं इस दर्द को जान सकूँगी...’ ईमानदार स्वीकारोक्ति थी...
शिशिर ने इसके बाद कहा कि वह तो मिटटी का आदमी है, मिटटी का आदमी टूट जाता है...
इसके बाद शिशिर वह नहीं रहा, जो वह रहा आया था. गुंजाइश भी नहीं थी. टूटने के बाद जुडना मुश्किल, बेहद मुश्किल... नामुमकिन सा होता है.
            वह अख़बारों में संपादक के नाम पत्र लिखने लगा...संसद की बहसों, सेंसेक्स की ऊँचाइयों के ओट में छिपी झुग्गियों की गुमनामियों पर, मोहल्ले की बजबजाती गन्दी नालियों के ऊपर से काफिले सहित गुजर जाने वाले गेंदे की माला के महक में दुबके विधायक जी की बेतकल्लुफ़ी पर, नुक्कड़ पर जाने कितने सालों से लोगों पर पत्थर फेंकने वाली उस अधेड़ पगली पर जिसका बलात्कार कर, जननांग में पत्थर ठूंस दिए गए थे...वह समाचार चैनलों को एस.एम्.एस करने लगा...बहसों में जुड़ने लगा... वह अपने पंगु हो चुके इमोशंस से असली संवेदनाओं के दायरे में आ रहा था. सपनों से मोहभंग होते ही वह कसमसाकर आदमियत की एक और धारा या कहें मुख्यधारा में आ रहा था... बेलाग सच्चाइयों को छानने वह घने-घुप्प अंधेरों में गोते मारने लगा...
            कभी-कभी एक राय बनाता कि पवित्र रिश्तों में धोखे नहीं होते, या फिर...
            रिश्ते बहुत कम ही पवित्र हो पाते हैं...
बहरहाल इसके बाद एक सकारात्मक बात यही हुई कि प्राची प्रेमिका से अच्छी दोस्त में रूपांतरित हो गयी थी... आम तौर पर इसका विपर्य ही देखने को मिलता है. दोनों ने घावों को कुरेदना छोड़ दिया था, कम से कम शिशिर ने तो.
            प्राची ने अपने नए ‘फंटे’, जैसा कि उसी ने बताया था, इंजीनियरिंग महाविद्यालयों की मौलिक शब्दावली में दो हँसों का जोड़ा फंटा-फंटी कहलाता है, को इन गुजरे सालों के किसी शांत, गुमशुदा सी विस्मृत कर दी गई रात के किसी पहर अपना कौमार्य सौंप रही थी. जर्रा-जर्रा... आहिस्ता-अहिस्ता...
वो बेदर्दी से सर काटे आमिर/ और मैं कहूँ उनसे... / हुज़ूर आहिस्ता, आहिस्ता जनाब... आहिस्ता-अहिस्ता...
प्राची से भी कुछ तो छूट रहा था...हर दोपहर एफ. एम. या अपनी टोली के भैयाओं के कंप्यूटर पर...जगजीत सिंह की रूमानी गज़लें... प्यार मुझसे जो किया तो क्या पाओगे / मेरे हालत की आंधी में बिखर जाओगे...
...छूट रहा था, गुनाहों का देवता जैसी रचनाओं का पढ़ा जाना... मुख़्तसर डूब कर...
...छूट रहीं थी, बच्चन और निराला-नागार्जुन की कवितायेँ...जो उसने १२वीं के दौरान स्कूल के पुस्तकालय से लेकर पढ़ी थी.
वह भी तो उस रात के बाद सिर्फ एक टुकड़ा शरीर भर रह गयी थी... बस एक मादा शरीर... अपनी तमाम संभावनाओं से भरपूर, फिर भी सिर्फ एक मादा शरीर !
फिर एक दिन किसी अंतरंग क्षण जैसी सहूलियत मिलने पर उसने शिशिर से ये सब बताया था. और पता नहीं, वह वाकई निरपेक्ष रहा या उसे बुरा लगा... प्राची तय नहीं कर सकी. उसे लगा कि वो खुद भी तय नहीं कर सका.

            उसने सामने दीवार पर लगभग झूल सी रही पैतृक युग की घड़ी को कुछ उनींदी आँखों से देखा, सुबह के साढ़े आठ हो चुके थे...
            एन.डी.टी.वी. केमुकाबला’ कार्यक्रम में पिछली शाम साढ़े आठ बजे क्रमशः दो प्रमुख राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के नुमाइंदों, एक सामाजिक कार्यकर्त्ता, एक प्रसिद्द प्रोफ़ेसर सह उत्तर-आधुनिक साहित्यकार आदि के श्रीमुख से उसने ‘क्रांति’ नामक शब्द की विविध व्याख्या सुनी थी... ‘आज देश की पिछहत्तर फीसदी आबादी २५ साल से कम वय की है और, ये नयी पीढ़ी बदलाव ला सकती है, ला रही है... सूत्रधार ने एक हडबड़ाऊ सा निष्कर्ष दे कर कार्यक्रम समाप्त घोषित किया था, गोया विज्ञापन ना मारे जाएँ... और एक चाय का विज्ञापन चलने लगा, जिसमें सोते देशवाशियों से जागने की अपील की गई है.
...क्रांति...?
प्राची ने दोपहर उसे एसएमएस कर उससे कहा था, पता है आज शाम मैं वोदका पीने जा रही हूँ. साला गम बहुत हो गया है जिंदगी में, देखूँ कम कर पाती हूँ क्या...
शिशिर को हँसने का मन हुआ.  ज़िंदगी में गम का नशा ही इतना गहरा होता है, इतना पुरजोर, इतना दमनात्मक कि कोई और नशा चढ़ता ही नहीं... मगर प्राची से कहना फ़िजूल ही था. उसे लगा प्राची कन्फ्यूज्ड है... वह रिश्तों में यकीन करती है मगर परम्परागत रिश्तों के दायरे से बाहर, उनकी जब्त से परे, वह तो अनाम रिश्तों में जूझती रही है... मगर उसे अब तक ना तो तसल्ली मिली है, ना ठहराव. वह उसी से ही पूछती सी रही है कि आखिर उसे चाहिए क्या ?
यू मस्ट् नॉट मैरी एवर... तुम ऐसे ही रहो, शादी मत करना कभी... तुम ऐसे ही खुली ठीक हो...बांध कर नहीं रह पाओगी...या जो तुम हो वह रह सकोगी..., शिशिर सोच कर कह रहा था,और जैसी तुम हो वैसी तुम्हें पति नाम का कोई जीव स्वीकार कर पाएगा... ऐसा कह चुकने के बाद उसने खुद को अंदर से खंगाला, ये उसके भीतर का मर्द सोच रहा है या वह सिर्फ एक खोखली सोच गढ़ रहा है.
प्राची ने कलम का कैप निकल कर दांतों तले दबाया और चूसने लगी, शिशिर, यहाँ खुली, स्वच्छंद लड़की रह ही कहाँ सकती है, इवेन इन टुडेज सोसाईटी...? और तुम क्या मुझे खुला ही देखना चाहते हो, अव्यवस्थित... क्या मैं ‘नगरवधू’ हूँ शिशिर ?
वह हल्की खांसी से गला साफ़ करके बोला, तुम्हें तो खुद पता नहीं कि तुम्हें चाहिए क्या...तुम ही खुद को कैसे देखना चाहती हो ?...
प्राची किरचों की तरह एक बार बिखरी, फिर खुद को समेट रही है, आज तक... शायद ‘वोदका’ उसे पूरा जोड़ ना भी दे, जुड़ जाने का भ्रम जरूर दे सकता है, एक रात के लिए... बस खुमार की उम्र तक... ताकि लगे कोई गम, कोई पछतावा, कोई ‘गिल्ट’ उसके दरारों से बाहर नहीं झांक रहा...  
वातावरण में कुछ अटपटापन हर रहा था. दो विपरीत-लिंगी अपने अंदर एक घुटन सी महसूस करने लगे... कॉल डिस्कनेक्ट हो चुका था.
वह धीरे से चलकर छत की मुंडेर पर आ खड़ा हुआ था.  उसने दूर तक क्षितिज में गहराती जा रही शाम को देखा और विचारों का गुना-भाग करने लगा
प्रेम और क्रांति... पवित्र विश्वास और विश्वासघात...
उसने 'अपराधबोध' के भार से दबती जा रही प्राची से कहा था, शायद सतही तौर ही, तुम गिल्टी मत महसूस करो, जो भी तुमने किया वो उस क्षण का फ़ैसला था. उस क्षण जो तुम्हें अच्छा लगा, वही किया तुमने . यदि उस क्षण वो सही था तो फिर अब क्यों पछताना या उसके गलत होने का एहसास करना...
प्राची की आवाज़ तीखी मगर कांपती सी लगी, मैं तुम्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानती हूँ...शिशिर,  मैंने कह दिया और तुम चले गए...   मुड़कर भी नहीं देखा...
'मुड़कर तो कई बार देखा, कई बार जताया भी, पर तुम तो सारे दरवाजे बंद कर चुकी थी... मेरे लौटने के. सिर्फ इसलिए कि कोई और तुम्हें अब पसंद था, चाहे तुम उसके साथ खुश होने का भ्रम ही पालते रहो , फिर भी अब तुम उसके साथ ईमानदार थी... शिशिर ने मन में कहा, प्रत्यक्ष्य नहीं.

क्या तुम अपनी वर्जिनिटी खो चुकी हो ?शिशिर ने बहुत सहम कर, जैसे चोर मन से पूछा था, जब प्राची को उसने फिर से कुछ व्यक्तिगत हो जाने दिया था. प्राची थोड़ी देर हँसती रही, मानों तत्काल उठे भावों को जबरन हंसी की ईंटों तले दबा देना चाहती हो, हाँ !  उसने फिर स्पष्ट कहा, दीपेश ने आग्रह किया था...
और तुमने मान लिया ?
हाँ, मैं बस एक्सप्लोर करना चाहती थी...ये आखिर चीज क्या है? यू नो, जस्ट फॉर शीयर एक्सपेरिएंस...
पर मैं बहुत ठंडी हूँ शिशिर, बेहद ठंडी...बुत की तरह पड़ी रही...बस वही करता गया जो कुछ उसे करना था...फिर मैं बहुत रोई थी. बहुत देर तक. किसी गिल्ट से नहीं, बल्कि मुझे सचमुच बहुत बुरा लगा ये सब...एकदम बुरा...इसमें क्या मज़ा था... खुद से जैसे घिन सी होने लगी, यकीन करोगे ?

उसने चादर अपने बदन से उठाकर परे हटा दिया और पैर नीचे टिकाया...एक आधी सी अंगड़ाई ली, सूरज काफी चढ़ चूका था. जिस ईमारत में वह बतौर पेइंग गेस्ट ठहरा हुआ था, उसकी चौथी मंजिल के खिड़की तक... उसने कैलेंडर पर तारीख के अंकों और वार को गौर से देखा. आज २१ अक्तूबर है, मंगलवार... आज दिवाली है, अँधेरे पर प्रकाश की जीत का दिन...अमावस्या को चनौती देने के लिए लाखों दीयों की पंगत बैठेगी आज...
वह बुदबुदाया ‘रौशनी’... फिर इस शब्द को चबाता हुआ सा वह गुसलघर में घुसा.
उस रात उसे जगमगाते दीयों की पाक रौशनी के धुंधले हो जाने के बाद और पटाखों का शोर थम जाने के बाद लगा, अभी रात के सन्नाटे को दो फाड़ कर मानों कोई एक रूमानी कोरस गा रहा हो जैसे, जैसे इंसानी जज्बतों के हर्फें सारे के सारे ट्युन्ड ऑन कर दिए गए हों...और बयार की रवानगी में बहे जा रहे हों...

प्राची से आखिरी मुलाकात कब हुई थी याद नहीं, याद है धुंधली होती हुई वो मुलाकात...
इंजीनियरिंग के प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ संस्थान में अंतिम सेमेस्टर की तैयारी में जुटी प्राची... अपनी सेकिंड हैण्ड स्कूटी पर कॉलेज से लौटती प्राची...कैम्पस चयनों में अब तक कोई बजी हाथ ना आने से परेशान प्राची...२१ वीं सदी के पहली आर्थिक मंदी के दौर में भविष्य को लेकर आशंकित प्राची...
तुम पूना या बंगलौर क्यों नहीं ट्राई करती ?
करुँगी.
शिशिर उसके कानों के टॉप्स देखता है, कानों के पास की लट उड़ जाने से टॉप्स उसका ध्यान खींच रहे हैं, बार-बार. प्राची एकाएक उसे घूरती हुई बोलती है, शिशिर यार आई वांट टू किस यू...वेरी डीपली, मेरा हक बनता है.
...शिशिर सहम सा गया.

आज रात ठंडी बढ़ती सी लगने लगी है. उसने चादर बक्से से निकाल कर ओढ़ ली थी, कमर तक ही...
कुछ भी स्थाई नहीं है, कुछ भी अंतिम नहीं है, ना तो पहला प्रेम ही... तोल्स्तोय ने ऐसा क्यों कहा था...?

प्राची खुले आकाश में उड़ रही है...निर्विघ्न...निर्बाध...क्या ये मुक्ति है...? २१ साल की लड़की...भावी कंप्यूटर इंजिनियर...उन्मुक्त...डैने फैलाये...’सोसाइटी’ की गर्द और गुब्बार से परे...किंचित ऊंचाई पर, नियमों-वर्जनाओं से अछूत...
तो फिर... सेक्स और वोदका...!
प्रतीक हैं, या मुक्ति की किलकारी...?
उसे लगा प्राची उसे चिढ़ा रही है...ठेंगा दिखा रही है...दानिशमंदों को समाज के टूटने, संस्कारों के बिखेरने की चिंता खाए जाती हो, तो हो उसकी बला से. ‘प्राची आई विश आई कुड लिव लाइक यू...’
शिशिर का भी अंतिम सेमेस्टर है, पर लग रहा जैसे कहीं कुछ अपूर्ण है...कुछ खाली-खोखला सा है...शायद कुछ छूट सा रहा है, शायद वह विश्वास जो संस्थान में प्रवेश लेते समय था... पर वह पा ही लेगा खुद के लिए, अपने परिवार के लिए वांछित...पैसा...जिंदगी का आधार...पर संतोष उसे फिर भी नहीं है...

मुंडेर पर खड़े आधे घंटे बाद उसने देखा सूर्य एक-एक इंच धंसता हुआ पहाड़ों की ओट में छिप चुका है और उस जगह पर अब सिर्फ कमजोर होती लालिमा बची रह गयी है. 
सूर्य की तरह इस पूरी जैविक सत्ता की भी नियति यही है. अस्त हो जाने की. पर सूर्य फ़िलहाल अगले दिन फिर परवान चढेगा, नई तारीख के साथ...
प्राची अब एक बार भावनाओं की रौ में आकर कह गई है, शिशिर , मैं तुम्हारी वही गुड़िया हूँ...
लेकिन इसका अब कोई अर्थ नहीं है. खंडहर फिर नहीं जुड़ते...

शिशिर का बी. टेक.  अंतिम सेमेस्टर में है... पर उसने  अपनी तसल्ली के लिए फिर से चित्र बनाना शुरू किया है.  कूची कैनवास को फिर से चूमने लगी है...


(दोस्तों, मेरी इस नई कहानी पर अवश्य टिप्पणी करें, खुलकर प्रतिक्रियाएँ दें, ताकि इसे और बेहतर बना सकूं. - शेखर मल्लिक) सर्वाधिकार सुरक्षित - इस रचना की प्रतिलिपियाँ बनाना निषेद्य है. लेखकीय स्वीकृति अत्यावश्यक.

प्रेम की परिभाषाएँ...

सच्चा प्रेम कभी प्रतिदन नहीं चाहता - कबीरदास


प्रेम आँखों से नहीं ह्रदय से देखता है, इसलिए प्रेम को अंधा कहा गया है - शेक्सपीयर


प्रेम कभी दावा नहीं करता,वह हमेशा देता है. प्रेम हमेशा कष्ट सहता है, कभी झुंझलाता नहीं है - गांधी


प्यार आत्मा की खुराक है - कन्फ्यूशियस


प्यार समर्पण और जिम्मेदारी का दूसरा नाम है - बेक

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

वसंत में तुम

इतनी गहरी छाई है उदासी दुपहरी की पीली-पीली धूप सी और नीम के पेड़ तले नीम-नीम तन्द्रा में तुम्हारी स्मृतियों से हूँ गलबहियाँ डाले साथी मेरे सांसों की देखो तो क्या वसंत का कहीं बौर टपका है ? या अमिया की डाली पर अटका है... मदमस्त-अल्हड़ नवयौवना सी चपल और श्वाशों की भरी ऊष्मा सी नर्म और प्रखरता में भी कोमल चलती है हवा मंद और डोलता है कहीं तेरा आँचल जैसे उच्चपथ के किनारे किसी गाँव के एकमात्र तालाब का लहराता है जल हर दिशा अलसाई सी मगर नशे में भीगकर कसमसाई सी आओ मेरे प्राणों की साथी, कोयल की तप्त पुकार पर बन्ध कर चली आओ फुहार बनकर... छंट जाए सब उदासी तन-मन में जागे हंसी जाता नहीं सहा कब तक गाऊं गीत विरहा तन्हा सदा तो ये मेरा एकांकी जीवन रहा दीन और श्री हीन हुआ मैं तो जैसे समिधा बन विलीन हुआ आओ साथी खिलखिलाकर, मुझे चूम लज्जाकर प्रेम की मीठी आंच में तपाकर समाओ तुम मेरे अंकों में साँसों की तान पर तनकर... कर दो इस बार मेरा वसंत सार्थक करते रहें भर उमरिया स्नेह परस्पर अथक-अथक-अथक... काल के पार तक
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