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रविवार, 21 फ़रवरी 2010

नज़्म -१

हमें तो यूँ लगता है...
गर कहीं खुदा बसता होगा
मेरे ज़ख्मों को देख
वो भी मुस्कुराता होगा

फिर ये सोचते हैं,
वाकई जो कोई खुदा होता
मेरे साथ भी कभी इंसाफ हुआ होता

आंसू मुझे इतने जहाँ,
इक कतरा मुस्कान भी दिया होता

जो भी मेरा अपना था
अब तो गुज़रा ज़माना हुआ
जिसे टूटकर अपना समझा - माना
उसको भी तो मैं अपना लगा होता

वो हमें चोट देता है
और मुस्कुराता भी है नादानों सा
ऐसा तो मेरा रकीब ना होता

मैंने किसी बुत को नहीं पूजा,
पत्थर से नहीं था इश्क किया
तुझे ही समझा खुदा और पैगम्बर
तुमने तो ना हमें दगा होता

- १७ फ़रवरी २०१०

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