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शनिवार, 19 जून 2010

कोई किसी के भीतर नहीं जीता

हमारे लिए दूसरे का दुःख
सिर्फ़ एक सूचना होती है...
अपने से परे का यथार्थ हमारा नहीं होता
इसलिए तदनुभूति कोरी गप्प है...
किस भी समय हम दूसरे में नहीं जी सकते
या ऐसा बहुत कम होता है
जब हम इस पर शिद्दत से सोचते हैं और
सफल भी होते हैं...!
हर दर्द-
हर टीस-
हार चुभन-
हर बार सिर्फ़
महसूस की जाती है... सिर्फ़ उसको जो
उसे भोग रहा होता है...
अकेला और मौलिक तौर पर
उसके बाहर सिर्फ़ लफ्फाज...बयानबाजियां...
सिर्फ़ कोरी सूचनायें... !  
इन्हीं कोरी सूचनाओं पर आधारित संवेदनशीलता और भी
तकलीफ़देह होती है
दोनों तरफ के लोगों के लिए...

3 टिप्‍पणियां:

  1. कविता कथ्य के स्तर पर अच्छी लगी…

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  2. सही अभिव्यक्त किया है- उसके बाहर सिर्फ़ लफ्फाज...बयानबाजियां...

    जवाब देंहटाएं
  3. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

    जवाब देंहटाएं

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