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शनिवार, 19 जून 2010

कोई किसी के भीतर नहीं जीता

हमारे लिए दूसरे का दुःख
सिर्फ़ एक सूचना होती है...
अपने से परे का यथार्थ हमारा नहीं होता
इसलिए तदनुभूति कोरी गप्प है...
किस भी समय हम दूसरे में नहीं जी सकते
या ऐसा बहुत कम होता है
जब हम इस पर शिद्दत से सोचते हैं और
सफल भी होते हैं...!
हर दर्द-
हर टीस-
हार चुभन-
हर बार सिर्फ़
महसूस की जाती है... सिर्फ़ उसको जो
उसे भोग रहा होता है...
अकेला और मौलिक तौर पर
उसके बाहर सिर्फ़ लफ्फाज...बयानबाजियां...
सिर्फ़ कोरी सूचनायें... !  
इन्हीं कोरी सूचनाओं पर आधारित संवेदनशीलता और भी
तकलीफ़देह होती है
दोनों तरफ के लोगों के लिए...

5 टिप्‍पणियां:

  1. कविता कथ्य के स्तर पर अच्छी लगी…

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  2. " बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित ज्ञान कभी क्रांति का जनक नहीं हो सकता "

    हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति.कॉम "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . अपने राजनैतिक , सामाजिक , आर्थिक , सांस्कृतिक और मीडिया से जुडे आलेख , कविता , कहानियां , व्यंग आदि जनोक्ति पर पोस्ट करने के लिए नीचे दिए गये लिंक पर जाकर रजिस्टर करें . http://www.janokti.com/wp-login.php?action=register,
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  4. सही अभिव्यक्त किया है- उसके बाहर सिर्फ़ लफ्फाज...बयानबाजियां...

    उत्तर देंहटाएं
  5. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

    उत्तर देंहटाएं

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