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शनिवार, 21 अगस्त 2010

एक नदी मुझमें रहती है...

एक नदी मुझमें रहती है...
बहती रहती है मेरे रगों में निरंतर...
छप्...छप्... कल...कल... गुडुप...गुडुप...गुडुप...!
वही नदी मेरे कस्बे की सरहद पर
घुँघरू बजाती हुई छोटी बच्ची की तरह
श्वेत फेनिल झागों को सरकाती हुई नन्हें पैरों से
निरंतर दौड़ती-भागती रहती है...धारावार...
बदली में, धूप में,
कई-कई रूप में !
हाय, वह अल्हड बच्ची...

नदी बतियाती है मुझसे... हौले से कान में...
मकर सक्रांति और छठ के मेले
कब-कब लगेंगे...?
मेरे भीतर हमेशा
एक कंपती हुई नमी बहती है...
स्नेहिल थपकियाँ दे कर ज्यों सुलाती हुई...

नदी, जो एक हमराज भी है...
जिसमें पाँव डाले
हर शाम देर तक बैठता हूँ देर तक...
ढेर सारी बातें किया करता हूँ...
दोनों थोड़े उदास और पास-पास
जब से थोड़ी उम्रदार हो गयी है मेरी ही
उम्र के साथ-साथ... यह नदी,
मुक्त हो कर
सभी वर्जनाओं से जब चाहे जी,
नदी को कसकर गले
लगाता हूँ...
सूरज परली तरफ खड़े पहाड़ों के
पीछे ओट ले लेता है,
भलमनसाहत है उसकी !...
नदी कानों में फुसफुसाकर कहती है...
घर जाओ, देर हो जायेगी
मैं भी उसी किस्म की फुसफुसाहट
से उत्तर देता हूँ, मेरा घर तुम हो...
नदी शरारत के मारे इठला जाती है...

रोज मेरे भीतर हल्की थपेड़ों की आवाजें,
आज़ाद लहरों की किलकारियाँ,
और पनीले जलकुम्भियों की अठखेलियाँ...
मुझमें नदी का विस्तार लिए शामिल हो जाती हैं.

ये नदी मुझसे इतिहास के दिन दोहराए जाती है
वसंत... सावन... शरद... मौसमों को कैसे जिया मैंने,
हुलस-हुलस कर पूछती जाती है,
तब यूँ भोली बनती है
जैसे कुछ जानती ना हो... और,
कभी गुमसुम, कभी खिलखिलाने लगती है.
मैं उदास होता हूँ,
नदी खामोश बह जाती है...
जब रोता हूँ...
नदी छलछला जाती है...
हँसता हूँ...
कहती है, तुम्हारी खुशी को नज़र ना कहीं
लग जाये मेरी !

नदी प्रौढ़ हो जाती है एकाएक...

मेरे साथ ही गूंजती, खिलखिलाती, हँसती है...
समव्यस्का की भांति
मैं कहता हूँ, भावातिरेक में
उत्तेजित हो कर
सुनो, तुम्हारी कोई तस्वीर बनाना चाहता हूँ
वह कहती है, जिस दिन पानी पर रेखाएं रच लेने का
गुर सीख लोगे, बना लेना...!

यह नदी "स्वर्णरेखा"
जिसकी तटों की सुबह और शामें...
लोकप्रिय हैं, सुदूर शहर से आने वाले सैलानियों में
या सरकारी पर्यटन के मानचित्र पर...
जिसकी रेत में से सोने के कण मिलने के मिथक
आज भी सच साबित होते हैं...
क्योंकि एक आदिम जाति के लोग
तलाश लेते हैं, काफ़ी मशक्कत से पोस्ता जैसे कण,
जिसके किनारे ताम्बे का पुराना कारखाना
चूँकि, जिस पर अर्थव्यवस्था
की प्रगति का दारोमदार है...
इसमें अवशिष्ट घोलकर भी निष्कलंक रहता है...,
और जिस पर बने नए चौड़े पुल के बगल में
प्रांतीय मंत्री की स्तुति करता शिलापट्ट लगा है...
लेकिन नदी का तो ये परिचय खांटी अखबारी है !
जबकि मैं कहता हूँ...
असल में, यह नदी मेरी बहुत सगी है...
जैसे, मेरे दुखों में दुख
सुखों में सुख महसूसती हुई...
मेरी अबसे अच्छी सहेली सी ये नदी...
यूं ही नहीं कहता कि,
बस... ये मुझमें रहती है...!
मैं इसमें,
और यह मेरे भीतर
बूढ़ी होती हुई...

१९-२०-२१,अगस्त २०१०

2 टिप्‍पणियां:

  1. नदी को साथ लेकर व्यक्ति और उसके परिवेश का जो संबंध और मोह है उसे आपने अच्छे से दिखाया है...

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  2. आपकी कविता एक नदी-सी गहरे उतर गयी....... कविता अच्छी लगी....

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