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गुरुवार, 19 अगस्त 2010

साथी तुममें सावन है...

ओह मेरे साथी,
देखो पहाड़ों पर सावन है...
स्फूर्त हरियाली में सावन है
भीगी हुई चिर सद्यःस्नाता सी ये रातें
इन रातों में सावन है
तप कर जो कुन्दन हुईं,
तेरे इन्तजार में,
उन सांसों में सावन है

मन की क्षितिज के ओर छोर में
पाता हूँ
पावस के समृद्ध पयोधर सा
तुम्हें साथी
जानता हूँ कि
तुम में सावन है...

ये किस्सा...
गुनगुनाते हुए भीगते-भीगते दूर सड़क
पर वक्त काटने जैसा है...
छींटों को जीभ से चखने जैसा है
और आल्हाद का एक दरिया
भीतर उफनता है...
मैं खुश हूँ, मेरे भीतर एक सावन है !

हर एक सपना सावन है... साथी...
सपने का एक छोर तुम थाम लो
एक मेरे पलकों पर बाँध दो...
चलो, गीला हो जाएँ दोनों...
अगर इस बार नहीं, अगली बार कभी...
है जो बाकि इन्तजार अभी ...
कि,
फिर एक सावन तो ऐसा भी आयेगा
भीगेंगे दोनों खूब मन भर कर
तन जोड़ कर...
खिलखिलायेंगी... झुकती हुईं डालें नीम की
नाचेंगी बूंदें सीवान पर के नद्य पर
महकेंगी आँगन की दूब घनीं...

सावन के  असर सारे
यहाँ से जब लुप्त हो जायेंगे
फिर माँगने को सावन भरपूर
हम सावन के गीतों में गाए जायेंगे...!

३०-०७/१९-८-२०१०

2 टिप्‍पणियां:

  1. sawan aur bhawawon ka anokha misrad......bahut khub sir......kuch usi tarah jaese ......sawan mein baris ki bunde tapak rahi ho aur andar dil baras raha ho behtrin sir behtrin..

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  2. 'जानता हूँ की तुममे सावन है ....' बहुत सुंदर लिखा आपने ... बधाई ।

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