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शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2010

पा सके जो राह-ए-इश्क में अपना अजीज मुकाम

पा सके जो राह-ए-इश्क में अपना अजीज मुकाम
करता हूँ यारों बार-बार बा-अदब उनका एहतराम

तबाह-ओ-क़त्ल भी हुए सरे-राह उनके वास्ते
और खुद ही पे आया अपनी बर्बादियों का इल्ज़ाम

अब तक तो ना हुई मयस्सर हमको वह
यकीं था कि मिलेंगे वफ़ा-ओ-उल्फत के जो पैगाम

जिन रास्तों पर खामोश वीरानियों का नूर था
चलते रहते थे खुशी-खुशी लेकर हम तेरा नाम

आगोश में लेकर तुम्हें ज़श्न-ए-वस्ल मनाते
क्या डराती जिंदगी, क्या करते कोई फ़िक्र-ए-अंजाम

गया वक्त वो सारे लम्हें गए दूर हमारी जानिब से
सोचते हैं अब क्या खामियाँ हमीं में थीं तमाम

रकीबों के शहर में घूमता हूँ तन्हा "शेखर"
जब से बदलते देखे हैं रिवाज़-ए-दोस्ती के आयाम
२८-१०-२०१०

सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

पहले दिनों जैसा प्यार...

प्यार के शुरूआती दिनों को भरपूर जीओ दोस्त...
क्योंकि सिर्फ़ तब ही होता है,
रहता है पूरी तरह से,
ईमानदार प्यार...
सौ पैसा खांटी खुमार देता प्यार...
किसी बच्ची सा भोला और निश्छल प्यार...

जिसमें कौंधती है, प्यार करने वाले की आत्मा
और उसकी सच्चाई...
तुम्हारी फ़िक्र और परवाह वाकई सचमुच की होती है
तब, सचमुच जरा सी भी दूरी डरा देती है मन को
और बाँहों के घेरे का कसाव असली तड़प लिए होता है...
वह गर्मी भी खालिस होती है जो तपे हुए चेहरे,
सांसों और होठों से नुमांया होती है...
सारी प्रार्थनाएं सीधे कलेजे से निकलती हैं और
सबकुछ लुटाकर भी मजे में रहने वाली आस्था सच्ची होती है...

खेद है कि, फिर ऐसा रह नहीं जाता...
फिर तो सावन भी बरसता है, मगर उसकी आग महसूसती नहीं
साथ चलते हुए भी परछाइयाँ परस्पर लिपटती नहीं...
तुम्हें तड़प कर पुकारने वाली उस आवाज़ की आस में जिंदा रहते हो और
वही एक पुकार फिर आती नहीं...

फिर प्यार ना गाढ़ा, ना जुनूनी, ना विशुद्ध, ना गहरा,
ना किसी आवेग का रह जाता है !
मात्र एक खोखली उम्मीद की मानिंद...
जो एक-दूसरे से बमुश्किल निभ पाता है...!

प्यार को गुना-भाग, जोड़-घटाव...
किसी समीकरण में तौले जाने और
दुनियादार हो जाने से
पहले पूरी तरह से जी लो...
क्योंकि, फिर पलट कर नहीं आता है...
पहले दिनों जैसा प्यार...
फिर अपना-अपना कहते-कहते भी
अपना होने का भ्रम मात्र बनकर रह जाते हैं लोग...

फिर पूरी शिद्दत से
तुम उसी प्यार की कशिश को पाने के लिए
जुझने तो लगोगे...
मगर दोस्त... वह प्यार नहीं मिलेगा
ना फूलों और चाँद पर, ना भरी-पूरी रातों में, ना घर में, ना बगीचों में...
तलाशोगे अगर साथी की आँख में, चेहरे पर, उसकी बातों में...
और शारीरिक भाषा में... हताश होओगे यह पाकर कि
कोई गीली चीज दरम्यान से गायब है...
सिर्फ़ एक पथरीली सी हँसी है, जिसे तुम नहीं पहचानते और
बहुत सारा पानी सूख चुका है !

प्यार अक्सर दिन ढलते जाने पर
उपेक्षात्मक होता जाता है...
सैद्धांतिक रूप से तो...ठीक इसके उलट होना
और आदर्शवादी तौर पर...
ऐसा कतई नहीं होना... चाहिए...
मगर...
होता यही है...  

इस पर अफ़सोस करने की हालत में पहुँचने से पहले
खुलकर, डटकर... पूरी मौज के साथ
इस प्यार को जीयो मेरे दोस्त...!

रविवार, 24 अक्तूबर 2010

लड़ाई

बहुत साफ़ नहीं कहा था उसने
कि लड़ाई में (अब) तुम भी हो...
यह जो चल रहा है, बकायदा एक जंग है...
और इसमें तुम भी
शामिल हो दिन रात की तरह
जिस जगह अभी मैं हूँ, बहुत जल्द तुम भी वहीँ होगे...
अब तक बेखबर थे... चोट खाते थे...
चोट करने वाले हाथों को पहचानते थे, तो...
अभी अपने औजार - हथियार सब
इकठ्ठे करो... अभी, बिल्कुल इसी समय...

ढोर भी अपने बचाव के लिए सींग मारता है...

लड़ाकू बन जाओ
तुम्हारे सामने विकल्पों की कोई तालिका
नहीं है
और इतनी मोहलत भी नहीं कि
तुम इस युद्ध से
परे कुछ और संभावनाओं को तलाशो...
युद्ध तुम पर सीधे-सीधे थोपा गया है...
और तुमको अपनी आत्मरक्षा का पूरा हक़ है !
क्योंकि डार्विन का सिद्धांत
इसी फलसफे पर था...कि,
वही बचेगा जो
लड़ाई लड़ने, लड़कर जीतने की
सामर्थ्य रखता होगा...

तुम उस तरह के हो जिनके पास
भूख सुलगते हुए अंगार की तरह है
सपने राख की सफेदी हैं
उम्मीदें बर्फ के गट्टे हैं
हरियाली तुम्हारे पैरों के नीचे से खींची जा रही है
और उजाले तुम्हारे आकाश से पोंछ डाले जा रहे हैं...
तुम जितनी दूर देख सकते हो-
समर की जमीन ही देख रहे हो...

तुम्हें हक़ के लिए
प्रेम के लिए और आदमी की तरह जी सकने के लिए,
दुःख जैसा कड़वा काढ़ा
हलक से उतारने के लिए
अपनी भावी पीढ़ियों के वास्ते
बेहतर धरती के लिए... लड़ना ही होगा...
लड़ने के लिए सारी ताकत और सारे इरादे
पुख्ता कर लो...
लड़ो... लड़ो बेदम होने तक
या फिर जीतने तक...

इतना साफ़ नहीं कहा था उसने
यह सब !
सिर्फ़ उसे उस बंद कमरे की तरफ
घसीटे जाते हुए देखकर हमारी चेतना में
एकाएक बिगड़ी हुई मशीन के शोर की तरह
घटने लगा... .खतरे की घंटी सा बजने लगा... यह सब...

कमरा, जो ठीक हमारे सामने था,
की मोटी दीवारों और
मज़बूत लोहे के दरवाजे के पीछे
आध - एक घंटे पहले लाया गया
वह इक्कीस-बाईस साल का लड़का
बुरी तरह पीटा जा रहा था
हम महसूस कर सकते थे कि
उसकी कमर और तलुवों पर
बहुत जोरों से डंडे मारे जा रहे होंगे
इस वक्त उसकी नाक से खून निकल रहा होगा
और बार-बार उसका सिर बालों से पकड़ कर
सीली दीवारों पर मारा जा रहा होगा...

शायद उसकी सब कराहें
अंतिम रूप से पूरी तरह से बंद हो जाने तक
वह इसी तरह बर्बरतापूर्ण ढंग से
पीटा जाने वाला था...

और कड़वी बात यह थी
कि, हममें से हरेक जानता था
कि उसने ऐसा कोई दोष नहीं किया है
कि उसे मार डालने तक
उसके हाथ पीछे बांधकर
नंगा करके, तेल चुपड़ी मोटी लाठियों,
सरकारियो कमरबंदों और घूंसों...
से उसे इतना मारा जाय... उसके नाखून उखाड़े जायं...
यौनांगों को क्षत-विक्षत किया जाय या...
गुदा में पेट्रोल डाला जाय...!

उसने सिर्फ़ इतना कहा था
कि वह उन आदमीनुमा लोगों का
सरमाया है, जिन्हें आदमी मानने
का कोई अधिनियम जारी नहीं हुआ है
जिनकी ज़मीन और जंगल
बहुराष्ट्रीय कंपनियों की अघोषित मिल्कियतें
बना देने की साजिशें रफ़्तार में हैं
जिनकी मिट्टी और पानी छीन गया है...
वह उनके लिए लड़ता है...

और इससे पहले कि वह
अपने कहे हुए की और अधिक व्याख्या करता,
तमाम तथ्यों और आंकड़ों से उसे साबित भी करता...
वह पकड़ा गया था...!

उसने यह सबकुछ बहुत चीख कर भी नहीं कहा था
हम फिर भी सुन पाए थे
हम वहाँ भीड़ की घेरेबंदी की शक्ल में मौजूद थे...

फिर इसके बाद उसकी आवाज हमको लगातार
सुनाई देती रही...
उसकी कराहों और मार की दहला देने वाली
तमाम आवाजों के बरक्स उसकी आवाज
आती रही...  
"लड़ाई में अब तुम भी हो..."  

वह नौसिखिया सा दिखता लड़का,
जिसकी अभी मूंछें तक कड़ी नहीं हुईं थी
मगर रीढ़ बेशक हो गयी होगी...
हम सिर्फ़ इतना जानते थे कि
वह मर जाने से खौफ नहीं खा रहा था...

और साथियों, अब हम...
(जो अपने को आदमी मानते और समझते हैं...)
उसकी कराहों के पूरी तरह बंद होने से पहले
अपने कन्धों पर एक बोझ सा महसूस कर
तिलमिला उठे हैं...
लड़ाई पता नहीं अब शुरू होगी
या, बहुत पहले से जारी है
जिसमें हमें अब शामिल हो जाना है...

२२-२३-२४/१०/२०१०

शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

सपने हाथी दांत नहीं होते

सपने हाथी दांत नहीं होते,
जिनको बेशकीमती तो कहा जाय...
मगर उन पर
इल्जाम लगे कि महज दिखाने के लिए हैं...
यथार्थ का छद्म सौंदर्य !
जिनके लिए खून बहे तो
कीमतों में तौला जाय...
और बेशर्म खरीद-फरोख्त हो !

सपने
गाढ़े लहू से सींचे गए होते हैं... मेरी दोस्त
सपनों के लिए सजावटी कुर्बानियाँ नहीं दी जातीं
कि जिसे आने वाला वक्त
जज्बातों की प्रदर्शनियों में रखे और
नीलामी के वास्ते बोलियाँ
ऊँचें सुरों में
ज़माने भर की बेहयाइयों के साथ लगायी जायं

हर कदम पर
जितनी दुखी है
मेरी रूह,
जितना टूटा है मेरा बदन
जिस वक्त...
मेरी ईमानदारियों की रौशनी ने तुझे
रास्ता दिखाने की
पुरजोर कोशिश की है...
तकलीफ का पूरा अंधड़
मेरे भीतर से गुजरा है...
और आह मेरी तुम भी सुन नहीं पाई हो...!
हाँ, मेरे सपनों की महक
का नीम अहसास तुम्हें हुआ तो जरूर है !

प्रेम करना और सपने देखना
बहुत आसान है मेरी दोस्त...
सपनों में पकते हुए रिश्ते के लिए ईमानदार होना
उतना ही बड़ा इम्तिहान...
जिससे मैं भी गुजरा हूँ, तुम भी गुजरी हो...

मेरे सपने जिसमें तुम भी शामिल रही हो,
तुम्हारी तरफ वालों के
कायदों और नफा-नुकसान की तमीज से बेखबर
खालिस थे,
और महज़ जिंदा होने की बात किया करते थे...
सौदेबाज़ भी नहीं हुए...
तुमसे दगाबाज़ भी नहीं हुए...

आज उन सपनों को रिश्तों की मानिंद निभाता हूँ
बहुत है कि, सिर्फ़ इसी तरह तुमसे भी जुड़ता हूँ...

मंगलवार, 12 अक्तूबर 2010

हाथी पहाड से जा रहे हैं

अभी कल के अखबार की खबर थी...
"हाथी पहाड से जा रहे हैं."
हाथी जा रहे हैं, अपने सदियों पुराने परम्परागत अरण्य
"दलमा" को छोड़कर...
विराट पहाड़ वाला अपना घर छोड़कर
जहाँ झूमते थे... सकुटुम्ब... मदमस्त, सदियों से...

कैसा लगता होगा हाथियों को अपना विस्थापन !
उजड़ जाना, उखड जाना...
जो कूच कर रहे हैं "दलमा" से
क्या फिर कभी लौटेंगे...
या लौट ही पाएंगे ?
कहते हैं हाथियों की याददाश्त बहुत मजबूत होती है...
उनको क्या याद रहेगा...इस तरह से अपना जाना...
कि जिसकी भूमिका कई सालों पूर्व से ही बनाने लगी थी...
कंक्रीट का जंगल, उनके प्राकृतिक अरण्य को
रौंद कर बढ़ता रहा... बढ़ता रहा... लील गया...
उनका शांतिपूर्ण प्राकृतिक आवास...
 
क्या याद करेंगे वे कि जब भी वो दोपायों की इस ज्यादातियों
से घबराकर गाँव-शहर की ओर भागे... वहाँ से भी
'आवारा हाथी' की गाली देकर उन्हें खदेड़ा गया...
'जंगली हाथी' के उत्पात के किस्से
बढ़-चढ़कर सुनाये गए और हमेशा उन्हीं को दोषी
बताया गया...
क्या याद रखते हुए, नहीं कल्पेंगे वे
"दलमा" मे अपना वह मुक्त विचरण
अब गूंजेगी शायद ही "दलमा पहाड़" में हाथियों की मुक्त चिंघाड...!

पत्रकार जब पूछता है,
"क्या हाथी लौटेंगे...?"
रादु मुंडा लाचारी से अपने गमछे से
मुँह का पसीना पोंछता हुआ अकबका कर
पहले उसका मुँह देखता है, फिर धीरे से कहता है
"बाबू, हाथी जा रहे हैं..."

सचमुच हाथी जा रहे हैं...
पहाड़ से हाथी जा रहे हैं.
"दलमा" से हाथी जा रहे हैं...


(झारखण्ड के पूर्वी सिंहभूम का प्रसिद्ध दलमा पहाड़ हाथियों का सदियों पुराना अभयारण्य रहा है. हाथियों के प्राकृतिक आवास के नाते ही यह प्रसिद्द है. अब हाथी यहाँ से बंगाल की ओर कूच कर रहे हैं... शहर अपनी पेंगे बढ़ाता हुआ, उनके इस निवास को हड़पता गया और आज वे जा रहे हैं, छोड़ कर दलमा को. किसे फर्क पड़ता है? हाथियों को या फिर रादु मुंडा जैसों को, मगर इनको फर्क पड़ने से भी किसी को क्या फर्क पड़ने वाला है!)

- शेखर मल्लिक
११-१०-२०१०

गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

अभी मेरा हमसफ़र

अभी मेरा हमसफ़र
मेरे पहलू में मुँह छुपाये सो गया है...

(उसका यह भोला सा भरोसा मुझ पर
किस कदर आश्वस्त करता है -
कि जिंदगी नि:संदेह लाजवाब है !...
एक बार यकीन करके देखो !!!)

केशों के जाले से बिखरे उसके चेहरे पर
रौशनी पर परछाइयों के आड़े-तिरक्षे धारे बनाते हुए...
निर्मल सांसों की हरारत से रह-रह कांपते नथुने...
अधखुले रेशमी होंठ, छू लूँ तो दाग पड़ जायें !
...यह रात का वक्फ़ा... उफ़
लगता है, एक जमाने के लिए ठहर गया है !
उसकी मुंदी पलकों के नीचे
उजली-उजली दो वही आँखें हैं, जो हरदम मुझे
सुख के उजाले देती रहती हैं...बिन कहे...बिन माँगे...
(दुःख कहीं हुआ तो उन आँखों की ताब सह नहीं पाता...)

मेरा तमाम वजूद लंगर डाले उसके घाट पर
ऐसे टिक गया है...
जैसे बहुत भटकते हुए अचानक अपेक्षित पड़ाव
मिल गया हो...

अब इस सर्द रात की ख़ामोश ठण्डी
धुंध के दरम्यान
उसके पूरे जिस्म की खुशनुमाँ गर्माहट से
सिंकता हुआ मैं...
इस सफर-ए-हयात में
इस अजनबी चौराहे पर
एक पुराने लोहे के खम्भे पर
सर को टिकाये,
उसे अपनी बाजुओं में भरे हुए
अपने जिंदा होने का भरपूर उत्सव मना रहा हूँ...
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