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शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

काहिरा के तहरीर चौक को सलाम करते हुए !

शुक्रिया मेरे हमनदीफ,
मेरे यारों, शुक्रिया...
इस बज़ा यकीं को जिंदा रखने के लिए कि
लहू सुर्ख-ओ-खालिस है हमारे रग-ओ-रूह में अभी भी
जो अमन और इन्साफ की जुबान बोलता है.
अपना हक़ मांगता है,
गुलाम-परस्ती से इनकार का माद्दा रखता है.
कि ताकत अब भी मौजूँ है हमारी बाँहों में, फौलाद-ऐ जिगर में
दहशत-दां उन तानाशाहों की चूलें हिला देने के लिए
जो खुद को मुख्तार मान बैठे थे हमारी जिंद-ओ-जान के...
कि जिनको खुशफहमी थी कोई बेशर्म !
कि जिन्हें अंजाम-ऐ-खाक का इल्म नहीं था
उनको बा-इल्म-ऐ-असल कराने के लिए
शुक्रिया...

जीतता है वही, वही जीता है
जिस कौम के सिर पर होती है अहले-जुनूं-ओ-जज्बा-ऐ-आज़ादी
बस इसकी फ़िराक फकत, और इससे कम कुछ नहीं

कायल हूँ तुम्हारी जुस्तजू के जो,
माँगती है बा-अदब अपना हक़-ओ-इंसाफ़, और इस माँगने पर
अपनी वफ़ा निसार करती है !
काली दीवारों में छिपी हुई खुदगर्जी की,
बदनीयती की गज़ालत बेनक़ाब करती है.
फ़क्र है तेरे इन्कलाबी जूनून पर, मेरे यारों !

शुक्रिया दोस्तों,
तुमने खून नहीं माँगा, तुमने हथियार नहीं उठाये, आवाज़ ही फकत उठायी
ताकत का जिन्हें गुमां था, उनसे चोर रास्ते की आबरू बढवाई !
तुम्हारी हिम्मत-ओ-हौसले दाद के हक़दार हैं,
जो टैंकों के सामने तुम बिछ गये
तुम्हारी अमन-परस्ती से वे सर्द-खूँ वाले भी खौफ़ खा गये !
शुक्रिया यह फिर बताने के लिए कि,
जो नाजायज है, खलिश-ऐ-जाँ-ऐ-आदम है,
उसकी मुखाफलत का तरीका यही है, यही है...

जिसकी बुनियाद में आदम का खूँ लगा हो,
उस गलीज़ सत्ता की मीनारें गिराने का    
शुक्रिया...

सलाम तहरीर चौक, सलाम ऐ तहरीर चौक के सिपाहियों !

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