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बुधवार, 13 नवंबर 2013

वो दस दिन जब दुनिया हिल उठी

बोल्शेविक क्रांति की याद में समाजवाद पर एक दिवसीय कार्यशाला और फ़िल्म प्रदर्शन

-    विभोर मिश्रा



 इंदौर, 7 नवम्बर 2013 .

“वो मौसम रूस के लिये सदी का सबसे सर्द मौसम था। जर्मनी से हर मोर्चे पर लगातार मिल रही हार, बिना बिजली, खाने और बग़ैर छत के लोग सिर्फ मरने के लिये जी रहे थे, और अंत में मर रहे थे। लाखों गरीब किसानों की मौत के साथ वो साल बीता।”

1916 इतिहास के पन्नों में कुछ इसी तरह दर्ज़ है. यही हालात ज़मीन बने 1917 के रूसी इंक़लाब की। मौका था अक्टूबर क्रांति की 96वीं वर्षगांठ का और जगह थी इंदौर में एमपीबीओए का दफ्तर।

7 नवम्बर को मनाये जाने वाले रूसी क्रांति दिवस को अक्टूबर क्रांति दिवस कहने पर अनेक लोगों को अचरज लगता है।  दरअसल 1917 में रूस में जूलियन कैलेंडर प्रचलित था जिसके मुताबिक रूसी क्रांति 25 अक्टूबर को हुई थी। सारी दुनिया में प्रचलित मौजूदा ग्रेगोरियन कैलेंडर, जिसे हम लोग भी इस्तेमाल करते हैं, के मुताबिक उस दिन 7 नवम्बर की तारीख़ थी। इस दिन को दुनिया भर में सर्वहारा की ऐतिहासिक जीत के रूप में मनाया जाता है।

पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में पूँजीवाद के बढ़ते प्रभाव के कारण नयी पीढ़ी के लोगों को सर्वहारा की इस महान क्रांति के इतिहास से वंचित रखा जा रहा है। यह कोई हज़ारों साल पहले की नहीं बल्कि सिर्फ़ 96 वर्ष पहले की ही घटना है जब आम लोगों ने पहले रूस को और फिर सारी दुनिया को हिलाकर रख दिया था। सन 1917 में हुई वह बोल्शेविक क्रांति दुनिया के अनेक देशों के इंकलाबियों के लिए प्रेरणा बनी। सन्दर्भ केन्द्र ने इंदौर में इस बार 7 नवम्बर 2013 को रूसी क्रांति की सालगिरह पर उस क्रांति के गौरवशाली इतिहास को सही परिप्रेक्ष्य में जानने-समझने को उत्सुक युवाओं के साथ पूरे दिन की एक कार्यशाला की, और रूस में  हुई क्रांति के बारे में, क्रांति के बाद बने सोवियत संघ के बारे में, वहाँ हुए परिवर्तनों के बारे में विस्तार से जानने - समझने की कोशिश की। कार्यशाला में क्रांति को एक विज्ञान के रूप में समझने की कोशिश के साथ ही उन महान मज़दूरों, किसानों और इंकलाबियों को याद किया गया जिन्होंने दुनियाभर  में इस यक़ीन को हमेशा के लिए पुख्ता किया कि यह दुनिया आम लोगों द्वारा बदली जा सकती है और पूंजीवाद कितना भी ताकतवर हो, वह भीतर से न केवल खुद खोखला होता है बल्कि मुनाफ़े की हवस में दुनिया को भी खोखला करता जाता है।

समाजवाद और पूँजीवाद क्या हैं? इस बुनियादी प्रश्न पर कॉमरेड जया मेहता के परिचयात्मक संक्षिप्त वक्तव्य के बाद रूसी क्रांति के पूर्व की परिस्थितियों का विवेचन किया गया जो 1917 की क्रांति का आधार बनीं। उन्होंने बाकुनिन के अराजकतावाद से लेकर पोपुलिस्ट नरोदनिकों के बारे में बताया जो ज़ार के शासन को राजनीतिक हत्याओं द्वारा ख़त्म करना चाहते थे लेकिन उसके बाद के समाज को लेकर स्पष्ट नहीं थे।

सन 1861 में रूस में ग़ुलाम किसानों को कथित आज़ादी देने वाले कानून से लेकर 1870 में पेरिस कम्यून से होते हुए लेनिन के भाई की नरोदनिक गुट के साथ ज़ार को बम से उड़ाने की साज़िश, गिरफ्तारी और हत्या के वाकये से होते हुए उन्नीसवीं सदी के अंत में नए मार्क्सवादी समूह के उभार के बारे में जानकारी दी। उन्होंने  बताया कि 1900  के पहले तक लेनिन भी विभिन्न राजनीतिक विचारों वाले गुटों के हिस्सा थे। सन 1902 में उनके पर्चे "हमें क्या करना चाहिए" से खड़ी हुई बहस ने उनकी पार्टी के भीतर विभाजन कर दिया। लेनिन की पार्टी को ज़यादा वोट मिलने के कारण वह कहलायी बोल्शेविक और जिनके मत कम थे, वे कहलाये मेन्शेविक। सन 1903 से 1905 की असफल क्रांति से होते हुए पहले विश्वयुद्ध और फिर फरवरी 1917 की क्रांति और अक्टूबर में हुई समाजवादी क्रांति तक के इतिहास, उस समय के रूसी समाज और आर्थिक परिवर्तनों के बारे में विस्तार से बात हुई। चर्चा को संचालित करते हुए कॉमरेड विनीत तिवारी ने भागीदारों को उस वक़्त के मतभेदों और ट्राटस्की, प्लेखानोव, वेरा जासुलिश आदि क्रांतिकारियों और उनकी बहसों के मुद्दों को भी बताया।

पृष्ठभूमि स्पष्ट करने के बाद रूसी क्रांति के आंखोंदेखे गवाह रहे अमेरिकी पत्रकार जॉन रीड की किताब पर बनी फ़िल्म "वो दस दिन जब दुनिया हिल उठी" का प्रदर्शन किया गया। यह फ़िल्म विश्व के महान फ़िल्मकार आईजेन्स्टाइन के सहयोगी रहे ग्रिगोरी अलेक्सांद्रोव ने बनायी थी और इसमें  पहले विश्व युद्ध और 1917 के दौर के कुछ ऑरिजिनल फुटेज का इस्तेमाल किया गया है।  हिंदी में यह फ़िल्म सन्दर्भ केन्द्र द्वारा डब की गई है और अब तक इसके देश-विदेश में सैकड़ों प्रदर्शन हो चुके हैं। फ़िल्म में बताया गया कि सन 1861 में रूस से मज़दूर प्रथा खत्म होने के बाद लाखों किसान खेत छोडकर शहरों की ओर पलायन करने लगे, बद से बदतरी की ओर। चौड़ी सडकों और आलीशान इमारतों के चकाचौध भरे शहर के पीछे बसी बस्तियों में मज़दूरों की ज़िन्दगी किसी लिहाज़ से ग़ुलाम किसानों से बेहतर नहीं थी। ज़ार के खिलाफ आवाज़ उठना शुरु हो रही थी। और साथ ही क्रूर सशस्त्र दमन भी। इसी दौरान सन 1887 में एक युवा छात्र नेता को ज़ार के खिलाफ़ षड्यंत्र के आरोप में फांसी दे दी गयी. उसका नाम था अलेक्ज़ेंडर उल्यानोव. वह तब सत्रह के हुए व्लादिमिर उल्यानोविच ‘लेनिन’ का बड़ा भाई था।  लेनिन ने बाद में मार्क्स को पढना शुरु किया और जाना कि ज़र को मरने से ज़यादा ज़रूरी इस व्यवस्था को बदलना है जो ज़र को असीमित शक्तियों का मालिक बनती है। ज़ारशाही के खिलाफ संघर्षरत लेनिन को पहली बार 1895 में गिरफ्तार किया गया. 1904 में जापान से मिली हार और सैंट पीटर्सबर्ग की भयानक सर्दियों के अगले साल पहली बडी हडताल हुई जिसमें 30 लाख से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया. जिसे ज़ार द्वारा कुछ रियायत देने के वादे के साथ दबा दिया गया. बिगडते माहौल के बीच दूसरी हडताल साईबेरिया की सोना खदानों के मज़दूरों ने 1912 में और 1917 तक आते-आते ज़ारशाही के अंत के साथ ही क्रांति की कवायद तेज़ हो गयी. अक्टूबर 1917 में बोल्शेविक पार्टी ने लगभग बिना खून-खराबे के सत्ता हासिल की.

फ़िल्म के उपरांत हुई चर्चा में भागीदारों के सवालों का जवाब देते हुए कॉमरेड जया मेहता, कॉमरेड विनीत तिवारी और कॉमरेड अभय नेमा ने रूसी क्रांति के बाद बनी रूस के भीतर की गृहयुद्ध की परिस्थियों, एक पिछड़े और सामंती देश में समाजवादी क्रांति करने की मुश्किलों, लेनिन द्वारा अपनाई गयी नयी आर्थिक नीति (नेप), कृषि से सरप्लस का उद्योगों के भीतर स्थानांतरण, संपत्ति के सामाजिकीकरण, एक नए मनुष्य के निर्माण की कोशिश, वैश्विक आर्थिक मंदी, फ़ासीवाद के उभार और दूसरे विश्वयुद्ध की परिस्थितियों  से लेकर सोवियत संघ के विघटन के कारणों व् मौजूदा हालात पर भी बात की। सवाल-जवाब के दौरान हिंसा से समाजवाद का सम्बन्ध जोड़ने वाले पूंजीवादी मीडिया की साज़िशों और सर्वहारा की तानाशाही का अर्थ भी स्पष्ट किया गया और रूसी क्रांति का दुनिया के बाकी देशों के लिए महत्त्व भी रेखांकित किया गया।

कॉमरेड जया मेहता ने पूर्व समाजवादी देशों की योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था और उससे सामाजिक सम्बन्धों में होने वाले बदलावों के बारे में विस्तार से बताया।  समाजवादी जर्मनी और बर्लिन की दीवार टूटने के बाद एकीकरण से पूंजीवादी चंगुल में आये जर्मनी - दोनों के फर्क को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि समाजवाद में उपभोक्ता वस्तुएं ज़यादा नहीं थीं लेकिन ज़रूरी चीज़ें सभी के लिए थीं। नब्बे फीसदी से ज़यादा औरतें रोज़गार में थीं। उन्हें सम्मान, सुरक्षा और रोज़गार देना ही नहीं , बल्कि उनके बच्चों को पौष्टिक खाना, अच्छी शिक्षा, खेल के अवसर देना, बुज़ुर्गों की देखभाल करना भी राज्य की ज़िम्मेदारी थी। यह स्थिति पूंजीवाद कभी नहीं कर सकता क्योंकि उसका निज़ाम ही शोषण के आधार पर चलता है। लेकिन जो समर्थ हैं, उन्हें लगता है कि हम पूंजीवादी व्यवस्था में ज़यादा कमाएंगे और ज़यादा सुख से रहेंगे क्योंकि हमारे पास अधिक योग्यता है, तो वे पूंजीवाद के प्रति आकृष्ट होते हैं। इस आकर्षण को ज़बरदस्ती नहीं रोका जा सकता।  इसीलिये लेनिन ने अंतरराष्ट्रीयतावाद की बात की थी ताकि पूरी दुनिया के लोगों में समाजवादी मानसिकता का निर्माण हो सके।

कॉमरेड अभय नेमा ने अपनी पुस्तक लेनिन का अंश सुनाते हुए सोवियत संघ की उपलब्धियों की चर्चा की और बताया कि वहाँ शोषितों के पक्ष में 1917 की क्रांति के तुरंत बाद इतनी चीज़ें हुई थीं जिनके लिए हम आज भी लड़ रहे हैं और किसी पूंजीवादी देश में ऐसे प्रगतिशील कार्यक्रमों को लागू करने का माद्दा नहीं है।

अंत में क्यूबा, वेनेज़ुएला, निकारागुआ, बोलीविया, इक्वेडोर, नेपाल आदि देशों से होते हुए बात हिंदुस्तान तक आयी। सवाल उठा कि क्या हिंदुस्तान जैसे देश में रूस जैसी क्रांति हो सकती है? वक्ताओं ने जवाब में कहा कि हिंदुस्तान में हिंदुस्तान के किस्म की ही क्रांति होगी, न रूस जैसी और न चीन या क्यूबा जैसी। लेकिन क्रांति ज़रूर हो सकती है। जब रूस कि जनता ने रूस के भीतर क्रांति की तो कौन सोचता था कि रूस जैसे पिछड़े, अनपढ़ और गरीब लोगों के देश में क्रांति हो सकती है।  हो सकती है तो कितने दिन टिक सकती है। लेकिन क्रांति रूस के लोगों ने मुमकिन की और उसे आगे भी बढ़ाया। रूस की क्रांति यही सिखाती है कि जब तक दुनिया के किसी भी हिस्से में पूँजीवाद, शोषण और गैर बराबरी है तब तक वहाँ क्रांति ज़रूर हो सकती है, और उसे मुमकिन करना क्रांतिकारी शक्तियों की ज़िम्मेदारी है।

इस कार्यशाला में भागीदारी की पंखुडी मिश्रा, सारिका श्रीवास्तव, जया मेहता, आस्था तिवारी, समीक्षा दुबे, रुचिता श्रीवास्तव, अभय नेमा, विभोर मिश्रा, हेमंत चौहान, केसरी सिह, तौफीक़ होमी, राज लोगरे, सुरेश डूडवे, सुरेश सोनी और विनीत तिवारी ने। रूसी क्रांति की याद से उपजी ऊर्जा और वैचारिक ऊष्मा से भरे प्रतिभागियों ने चाहा कि वे दुनिया के बाकी देशों में हुई  क्रांतियों के बारे में भी जानने-समझने और सोचने के लिए जल्द फिर मिलेंगे।



सम्पर्क- 09755555293

मंगलवार, 5 नवंबर 2013

कुछ पुरानी कहानियाँ

(मित्रों, कुछ कहानियाँ पुरानी फाइलों से ब्लॉग पर लगा रहा हूँ. प्रस्तुत है पहली किस्त में कहानी "पुतुल" जो "उदघोष" जनवरी - जून २००५ अंक में छपी थी.)

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½þ¨É +CºÉ®ú BEò ½þÒ nÖù+É®ú(+ÉÄMÉxÉ) ¨Éå JÉä±ÉÉ Eò®úiÉä VɽþÉÄ {É®ú {ÉÖ+É±É EòÉ ¤Éc÷É ºÉÉ fäø®ú ±ÉMÉÉ ®ú½þiÉÉ lÉÉ +Éè®ú ´É½þÉÄ ÊUô{ÉEò®ú ½þ¨É +{ÉxÉä-+{ÉxÉä PÉ®ú´ÉɱÉÉå EòÉä KÉÚ¤É ºÉiÉɪÉÉ Eò®úiÉä lÉä * ¤Éc÷Ò ¤ÉÉiÉ iÉÉä ªÉ½þ lÉÒ ÊEò EòÉä<Ç iɦÉÒ ªÉ½þ xɽþÓ VÉÉxÉ {ÉɪÉÉ ÊEò ½þ¨É nùÉäxÉÉå ºÉÉlÉ ÊUô{ÉiÉä lÉä ,´É®úxÉÉ |É±ÉªÉ +ÉxÉä ºÉä EòÉä<Ç ®úÉäEò xÉ ºÉEòiÉÉ lÉÉ *...EÖòUô ¤É®úºÉ EòÉ ºÉ¨ÉªÉ ¤ÉÒiÉxÉä {É®ú xÉ VÉÉxÉä CªÉÉå ªÉÉ EèòºÉä BäºÉÉ ½þÉäiÉÉ lÉÉ ÊEò ½þ¨É MÉ{{Éå ¨ÉÉ®úiÉä-¨ÉÉ®úiÉä BEò-nÚùºÉ®äú EòÒ +ÉÄJÉÉå ¨Éå ZÉÉÄEòxÉä ±ÉMÉiÉä ...Ê¡ò®ú Ênù±ÉÉäÊnù¨ÉÉNÉ {É®ú xÉ ¨ÉɱÉÚ¨É EèòºÉÉ PÉä®úÉ ºÉä ¤ÉxÉxÉä ±ÉMÉiÉÉ lÉÉ...¶ÉɪÉnù BEò +Wɤɠ ºÉä ºÉ¨¨ÉÉä½þxÉ ¨Éå ¤ÉÄvÉä ½þÉäiÉä lÉä ½þ¨É,VÉèºÉä ÊEòºÉÒ WÉÉnÚù Eäò EòɪɱÉ...WÉMɽþ ´É½þÒ ½þÉäiÉÒ lÉÒ,´É½þÒ '{ÉÖ+ɱÉ-MÉÉnùÉ'...¨ÉNÉ®ú ÊUô{ÉxÉä EòÉ ºÉ¨ÉªÉ ¤Énù±É MɪÉÉ lÉÉ *...
½þ¨ÉÉ®äú PÉ®úÉå EòÒ Ênù´ÉÉ®åú +É{ÉºÉ ¨Éå VÉÖc÷Ò ½Öþ<Ç lÉÓ...±ÉäÊEòxÉ PÉ®ú´ÉɱÉä =iÉxÉä xɽþÓ * ºÉÒvÉÉ ºÉÉ EòÉ®úhÉ ªÉ½þ lÉÉ ÊEò ½þ¨ÉÉ®úÒ ½èþʺɪÉiÉ =xÉEäò ¨ÉÖFòɤɱÉä '¤ÉÒºÉ'lÉÒ * ½þ¨ÉÉ®äú +{ÉxÉä JÉäiÉ lÉä , ´Éä ¦ÉÚʨɽþ®ú JÉäiÉ-¨ÉWÉnÚù®ú ; ½þ¨ÉÉ®äú MÉÉävÉxÉ lÉä , +Éè®ú ´Éä JÉÖnù VÉÉxÉ´É®úÉå VÉèºÉÉ JÉ]õEäò ¦ÉÒ   ¨Éä®äú ¤ÉɤÉÉ MÉÉÄ´É Eäò ºÉ®ú{ÉÆSÉ lÉä * ½þ¨ÉÉ®úÒ +ÉÌlÉEò κlÉÊiÉ MÉÉÄ´É ¨Éå |ÉvÉÉxÉ (ºÉ¤ÉºÉä ¤Écä÷ ¦ÉÚº´ÉɨÉÒ) Eäò ¤ÉÉnù nÚùºÉ®äú xÉƤɮú {É®ú lÉÒ *...ÊVÉºÉ ´ÉHò ¨Éé MÉÉÄ´É Eäò |ÉÉlÉʨÉEò Ê´ÉtÉ±ÉªÉ ¨Éå 'VÉÒ´ÉxÉ ºÉÆPɹÉÇ +Éè®ú +Éi¨ÉÊ´É·ÉɺÉ'{É®ú iÉMÉc÷É ºÉÉ ÊxɤÉÆvÉ Ê±ÉJÉEò®ú ¨Éɺ]õ®ú VÉÒ EòÒ ±ÉÉ±É Eò±É¨É EòÒ nùºiÉKÉiÉ ¤É]õÉä®ú ®ú½þÉ ½þÉäiÉÉ lÉÉ ,=ºÉÒ ´ÉHò {ÉÖiÉÖ±É ºÉ{ÉÊ®ú´ÉÉ®ú |ÉvÉÉxÉ ªÉÉ ½þ¨ÉÉ®äú JÉäiÉÉå ¨Éå ºÉÆPɹÉÇ +Éè®ú +Éi¨ÉÊ´É·ÉÉºÉ EòÉ ËWÉnùÉ xɨÉÚxÉÉ FòÉªÉ¨É Eò®ú ®ú½þÒ ½þÉäiÉÒ lÉÒ * ½þ¨ÉÉ®äú PÉ®ú ¨Éå ÊVÉºÉ ºÉ¨ÉªÉ ºÉ¤É ±ÉÉäMÉ iÉÒxÉ-iÉÒxÉ iÉ®úEòÉÊ®úªÉÉå +Éè®ú nùɱÉ,SÉ]õxÉÒ  ºÉä ºÉVÉÒ ¦ÉÉiÉ EòÒ lÉɱÉÒ ºÉäEò®ú ¤Éè`öiÉä lÉä,=ºÉÒ ºÉ¨ÉªÉ ´Éä ±ÉÉäMÉ ¨ÉÉÄb÷ ( {ÉEäò SÉÉ´É±É EòÉ {ÉÉxÉÒ ) {ÉÒEò®ú ªÉÉ ÊEòºÉÉ ºÉä ¤ÉɺÉÒ ½ÄþÊb÷ªÉÉ ¨ÉÉÄMÉEò®ú {Éä]õ EòÉä WÉ´ÉÉ¤É näù ®ú½äþ ½þÉäiÉä lÉä * Eò¦ÉÒ-Eò¦ÉÒ {ÉÖiÉÖ±É Eäò ¨ÉÉÄ-¤ÉÉ{É ÊEòºÉÒ Eäò JÉäiÉ ºÉä +ɱÉÚ SÉÖ®úÉ ±ÉÉiÉä ªÉÉ EÖòUô +Éè®*ú...+¤É KÉÖ¶ÉÒ ºÉä Eò®úÉä SÉɽäþ ¨ÉWɤÉÚ®úÒ ºÉä,SÉÉä®úÒ iÉÉä SÉÉä®úÒ `ö½þ®úÒ...+CºÉ®ú JÉäiÉ-CªÉÉ®úÒ ºÉä EÖòUô SÉÖ®úÉiÉä ½ÖþB {ÉEòc÷ÉiÉä +Éè®ú =ºÉEòÉ ¨ÉÉʱÉEò ¨ÉÉ®úiÉÉ-{ÉÒ]õiÉÉ =x½åþ ªÉ½þÉÄ ±ÉäEò®ú +ÉiÉÉ * ¤ÉɤÉÉ EòÉä ¡èòºÉ±ÉÉ näùxÉÉ {Éc÷iÉÉ *..Eò<Ç ¤ÉÉ®ú ±ÉÉäMÉÉå EòÒ +ÄJɨÉÖÄnùÒ ¨ÉÉ®ú ºÉä =x½åþ ¦ÉÒiÉ®úÒ SÉÉä]õ ¦ÉÒ {Éc÷Ò +Éè®ú ºÉ¨ÉªÉ Eäò ºÉÉlÉ ¤ÉþnùxÉ ¨Éå PÉ®ú Eò®ú ®ú½þ MÉ<È * ±ÉäÊEòxÉ ´É½þ +Éi¨ÉPÉÉiÉÒ +ÉnùiÉ xÉ UÚô]õÒ CªÉÉåÊEò NÉ®úÒ¤ÉÒ xɽþÓ UÚô]õÒ...
<ºÉʱÉB {ÉÖiÉÖ±É Eäò ʱÉB EÖòUô Eò®úxÉÉ , =ºÉä ÊEòºÉÒ ¦ÉÒ iÉ®ú½þ =nùÉºÉ xÉ ½þÉäxÉä näùxÉÉ =ºÉ ºÉ¨ÉªÉ ¨Éä®úÒ ºÉ¤ÉºÉä ¤Éc÷Ò |ÉÊiɤÉvnùiÉÉ lÉÒ *...KÉè®ú +¤É {ÉÖiÉÖ±É ¤Énù±É MÉ<Ç ½èþ , +¤É iÉÉä ´É½þ Eò¦ÉÒ =nùɺÉ,½þiÉÉ¶É xɽþÓ ÊnùJÉiÉÒ...

¨Éé +ÉMÉä {ÉgøxÉä Eäò ʱÉB xÉWÉnÒùEòÒ ¶É½þ®ú WɨɶÉänù{ÉÖ®ú SɱÉÉ MɪÉÉ +Éè®ú UôÉjÉÉ´ÉÉºÉ ¨Éå ®ú½þxÉä ±ÉMÉÉ * ¨Éé ½þÉ<ǺEÚò±É- +É<Ç.B-¤ÉÒ.B Eò®úiÉä ½ÖþB VÉ´ÉÉxÉ ½þÉäiÉÉ ®ú½þÉ*{ÉÖiÉÖ±É ºÉÉä¨ÉɪÉb÷Ò½þ ¨Éå nÚùºÉ®äú Eäò JÉäiÉÉå ¨Éå vÉÉxÉ ®úÉä{ÉiÉÒ ¤ÉÖ´ÉÉ<ÇÇ-Eò]õÉ<Ç Eò®úiÉÒ , ¨ÉɱÉ-MÉ]Âõ`ö®ú føÉäiÉÒ ½Öþ<Ç VÉ´ÉÉxÉ ½þÉäiÉÒ ®ú½þÒ* UÖôôÎ]Âõ]õªÉÉå ¨Éå VÉ¤É MÉÉÄ´É +ÉiÉÉ iÉÉä ´É½þ ½þ¨Éä¶ÉÉ {ɽþ±Éä ºÉä EÖòUô ¤Éc÷Ò +Éè®ú VÉ´ÉÉxÉ ±ÉMÉiÉÒ * ±ÉÉJÉ EòÉäÊ¶É¶É Eò®úiÉÉ ÊEò {ɽþ±Éä EòÒ iÉ®ú½þ VÉÒ ¦É®ú Eò®ú ¤ÉÉiÉå Eò°Äü =ºÉºÉä,Ê¡ò®ú ´ÉèºÉä ½þÒ näù®ú iÉEò ºÉÉlÉ ¤Éè`åö ½þ¨É...¨ÉMÉ®ú xÉ iÉÉä =ºÉä ÊnùxÉ-®úÉiÉ EòÒ JÉ]õÉ<Ç ºÉä ¡ÖòºÉÇiÉ Ê¨É±ÉiÉÒ,xÉ ¨Éä®úÒ UÖôÎ]Âõ]õªÉÉå EòÒ +ÉJÉ®úÒ iÉÉ®úÒJÉå ]õ±É ºÉEòiÉÒ lÉÓ* ºÉÉ±É {É®ú ºÉÉ±É +ÉiÉä ®ú½äþ,VÉÉiÉä ®ú½äþ...

¨ÉéxÉä ¤ÉÒ.B EòÒ {É®úÒIÉÉ näù nùÒ,=ºÉÒ ®úÉäWÉ ªÉ½þ Kɤɮú ʨɱÉÒ lÉÒ ÊúEò {ÉÖiÉÖ±É EòÒ ¶ÉÉnùÒ ¤ÉMÉ±É MÉÉÄ´É ¨Éå ½þÉä MÉ<Ç ½èþ*ºÉÖxÉEò®ú BEòÉBEò +SUôÉ ±ÉMÉÉ ªÉÉ ¤ÉÖ®úÉ,Eò½þ xɽþÓ ºÉEòiÉÉ...

¨ÉÖZÉä MÉÉÄ´É ±ÉÉè]õxÉÉ lÉÉ ,±ÉÉè]õ +ɪÉÉ lÉÉ +Éè®ú 'º]õÉ®ú {ÉÉxÉ MÉÖ¨É]õÒ' Eäò ºÉÉ´ÉÇVÉÊxÉEò ºÉÚSÉxÉÉ Eäòxpù {É®ú {ɽþ±ÉÒ ºÉÚSÉxÉÉ ªÉ½þ ±ÉMÉÒ ÊEò Eò±É ®úÉiÉ {ÉÖiÉÖ±É ¦ÉÉMÉ +É<Ç ½èþ !...=ºÉEòÒ ÊWÉnù ½èþ ÊEò ´É½þ nÖù¤ÉÉ®úÉ xɽþÓ VÉɪÉäMÉÒ* EÖò±É VɨÉÉ føÉ<Ç ÊnùxÉ ½þÒ iÉÉä ½ÖþB lÉä =ºÉä ¤ªÉɽþäò...
±ÉäÊEòxÉ ¤ªÉɽþÒ ±Éc÷EòÒ EòÉ BäºÉä ±ÉÉè]õxÉÉ CªÉÉ
...iÉҺɮäú ÊnùxÉ,¤ÉαEò ®úÉiÉ ¨Éå MÉÉÄ´É ¨Éå <È]õ-¦É]Âõ`öÉ SɱÉÉxÉä ´ÉɱÉÉ =ºÉä +{ÉxÉä ºÉÉlÉ  ±Éä MɪÉÉ * SÉÚÄÊEò ÊnùxÉ Eäò '{ÉÊ´ÉjÉ'=VÉɱÉä Eäò ¤ÉVÉÉªÉ ®úÉiÉ Eäò 'Eò±ÉÖʹÉiÉ'+ÄvÉä®äú ¨Éå BäºÉÉ ½Öþ+É lÉÉ ºÉÉä,{ÉÖiÉÖ±É iÉ¤É ºÉä '½þ®úɨÉWÉÉnùÒ','®Æúb÷Ò' +Éè®ú '¦ÉiÉÉ®ú´ÉɱÉÒ' ½þÉä MÉ<Ç *...


¶É½þ®ú ºÉä ±ÉÉè]õxÉä Eäò ¤ÉÉnù +Éè®ú  

CªÉÉ {ÉÖiÉÖ±É ¤ÉºÉ BEò ¨ÉÉnùÉ,BEò MÉɱÉÒ ½èþ...+Éè®ú EÖòUô xɽþÓ...

+ÉVÉ ºÉ֤ɽþ ºÉä ½þÒ  ¤É½ÖþiÉ iÉäWÉ ´É¹ÉÉÇ ¶ÉÖ°ü ½þÉä MÉ<Ç ½èþ * ¦ÉÉnùÉä ±ÉMÉ SÉÖEòÉ ½èþ * +ÉEòÉ¶É ºÉä ZÉc÷Ò ±ÉMÉÒ ½Öþ<Ç ½èþ * {ɽþÉc÷Éå {É®ú EòɱÉä - ºÉ¡äònù ¤ÉÉnù±ÉÉå EòÒ °ü<ǪÉÉÄ ¡èò±ÉÒ  ½éþ* ¤É®úɨÉnäù Eäò BWɤÉäº]õºÉ EòÒ ¨ÉÖÄbä÷®ú {É®ú ´É¹ÉÉÇ EòÒ ]õ{ÉÉ]õ{É ±ÉªÉ¤Évnù ºÉÆMÉÒiÉ {ÉènùÉ Eò®ú ®ú½þÒ ½èþ * ½þ´ÉÉ ¨Éå xɨÉÒ =iÉ®ú +É<Ç ½èþ +Éè® ¦ÉÒMÉä ½ÖþB nù®úKiÉÉå ºÉä VÉÉxÉÒ-{ɽþSÉÉxÉÒ ºÉä MÉÆvÉ =`ö ®ú½þÒ ½èþ*...ºÉSɨÉÖSÉ
JÉäiÉÉå ¨Éå `ö½þ®äú {ÉÉxÉÒ {É®ú ¤ÉֱɤÉÖ±ÉÉå EòÉä ¤ÉxÉiÉä-¡Úò]õiÉä näùJÉ ®ú½þÉ ½ÚÄþ ... VÉÉxÉä CªÉÉå +xÉɪÉÉºÉ ½þÒ {ÉÖiÉÖ±É Eäò ¤ÉÉ®äú ¨Éå ºÉÉäSÉxÉä ±ÉMÉiÉÉ ½ÚÄþ* =ºÉEòÒ Eò½þÒ ¤ÉÉiÉå º¨ÉÞÊiÉ Eäò iÉÉ®ú {É®ú iÉ®ÆúMÉÉå ºÉÒ ¤É½þxÉä ±ÉMÉiÉÒ ½éþ*...{É®úºÉÉ±É ´É¹ÉÉÇ EòÒ {ɽþ±ÉÒ ¡Öò½þÉ®ú VÉ¤É {Éc÷Ò lÉÒ,iÉ¤É ºÉƪÉÉäMÉ ½þÒ ®ú½þÉ ½þÉäMÉÉ ÊEò ´É½þ ¨Éä®äú ºÉÉlÉ ½þÒ lÉÒ...¨É°ü¨É Eäò ±ÉÉ±É EòSSÉä ®úɺiÉä {É®ú,±ÉÉ±É EòÒSÉc÷ ºÉä +{ÉxÉÒ MÉÉä®úÒ Ë{Éb÷ʱɪÉÉÄ ¤ÉSÉÉiÉÒ ½Öþ<Ç* ¨Éä®äú {ÉÉºÉ UôiÉ®úÒ lÉÒ <ºÉʱÉB =ºÉä ¤ÉÖ±ÉÉ Ê±ÉªÉÉ lÉÉ ¨ÉéxÉä * UôÉiÉÉ UôÉä]õÉ lÉÉ ºÉÉä ´É½þ ¨ÉÖZɺÉä ºÉ]õEò®ú SÉ±É ®ú½þÒ lÉÒ ...¦ÉÒMÉxÉä ºÉä =ºÉEäò Eò{Écä÷ =ºÉEòÒ näù½þ ºÉä VÉÖc÷ MɪÉä lÉä ,{ÉÉ®únù¶ÉÔ ºÉä ½þÉä MÉB lÉä ÊVɺɨÉå ºÉä =ºÉEòÒ MÉÉè®ú´ÉhÉÔ näù½þ +{ÉxÉÒ ºÉÉ®úÒ ¨ÉÉnùEòiÉÉ Eäò ºÉÉlÉ ÊZɱÉʨɱÉÉxÉä ±ÉMÉÒ lÉÒ * EòÉxÉÉå Eäò {ÉÉºÉ Eäò ¤ÉÉ±É +ÉvÉä SÉä½þ®äú EòÉä føÉÄ{Éä ½ÖþB... vÉÖ±ÉÉ ½Öþ+É ¨ÉÖJÉ...ºÉÖÆnù®ú...
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"SÉÖ{É ½þÉä MɪÉÉ ? ¨Éé BäºÉÉ 'UÚô]õ' ¤ÉÉä±ÉiÉÒ ½ÚÄþ ,iÉÚ ¶É¨ÉÉÇiÉÉ ½èþ CªÉÉ ®äú ?" ´É½þ ½ÆþºÉxÉä ±ÉMÉÒ lÉÒ * ¨Éä®äú ½þÉå`öÉä {É®ú ¦ÉÒ ¨ÉÖºEòÉxÉ +É MÉ<Ç * ¨ÉéxÉä 'xÉÉ' ¨Éå ʺɮú ʽþ±ÉÉ ÊnùªÉÉ lÉÉ *
´É¹ÉÉÇ vÉÒ¨ÉÒ ½þÉäxÉä ±ÉMÉÒ iÉÉä ´É½þ UôÉiÉä ºÉä ÊxÉEò±ÉEò®ú ºÉɨÉxÉä {ÉÖʱɪÉÉ {É®ú VÉÉEò®ú ¤Éè`ö MÉ<Ç *
"iÉÚ näùJÉiÉÉ ½èþ xÉÉ...¨ÉÖZÉä ®úhb÷Ò ¤ÉÉä±ÉiÉä ½éþ *...b÷®úiÉÉ ½þÉäMÉÉ...
¨Éé =ºÉEäò {ÉÉºÉ +ÉEò®ú ¤Éè`ö MɪÉÉ iÉÉä =ºÉxÉä MÉnÇùxÉ PÉÖ¨ÉÉEò®ú ¨Éä®úÒ +Éä®ú näùJÉÉ +Éè®ú +ÉÄJÉå ʨɱÉiÉä ½þÒ nÚùºÉ®úÒ iÉ®ú¢ò näùJÉxÉä ±ÉMÉÒ...
"¦É]Âõ`öÒ ´ÉɱÉÉ +SUôÉ ¨ÉÉxÉÖ¹É ½èþ...=ºÉEòÉ ¤É½Öþ ½èþ,¤ÉSSÉÉ ½èþ* ¨Éä®äú ʱÉB EÖòUô ÊEòªÉÉ iÉÉä EòÉä<Ç MÉÆnùÉ ±ÉÉä¦É ºÉä xɽþÓ...* nùÉä-iÉÒxÉ ÊnùxÉ {ɶÉÖ VÉèºÉÉ {Éc÷Ò lÉÒ nÖù+É®ú ¨Éå ,EòÉä<Ç UÖôxÉä ´ÉɱÉÉ xɽþÓ..."=ºÉxÉä BEò Mɽþ®úÒ ºÉÉÄºÉ JÉÓSÉÒ,"BEò ¦É±ÉÉ +Énù¨ÉÒ ¨Énùnù Eò®ú ÊnùªÉÉ iÉÉä ºÉ¤ÉEäò MÉÉÄc÷ ¨Éå ʨÉÊ®úSÉ ±ÉMÉ MɪÉÉ *...
"´É½þ +Énù¨ÉÒ EòÉ¨É ÊnùªÉÉ,bä÷®úÉ ¦ÉÒ Ênù±É´ÉÉ ÊnùªÉÉ ...* SÉÉ®ú ÊnùxÉ =ºÉEäò ¦É]Âõ`äö ¨Éå ºÉÉä<Ç lÉÒ iÉÉä ,iÉÚ ¦ÉÒ ºÉÖxÉÉ ½èþ xÉÉ.EèòºÉä EòÒSÉc÷ lÉÚEòiÉä lÉä ªÉä...=ºÉEòÉä ¤ÉnùÉǶiÉ xɽþÓ ½Öþ+É,¤ÉÉä±ÉÉ iÉÖ¨½þÉ®úÉ Ê±ÉB UôiÉ EòÉ ¤ÉÆnùÉä¤ÉºiÉ Eò®úiÉä ½éþ ..."
¨ÉéxÉä =ºÉä ÊJɱÉÊJɱÉÉiÉä  näùJÉÉ lÉÉ, SɨÉEòiÉä näùJÉÉ lÉÉ ZÉÉåEäò EòÒ iÉ®ú½þ ¤É½þiÉä  näùJÉÉ lÉÉ +Éè®ú +¤É ,`ö½þ®äú ½ÖþB {ÉÉxÉÒ EòÒ iÉ®ú½þ ¶ÉÉÆiÉ-MÉƦÉÒ®ú näùJÉ ®ú½þÉ lÉÉ * ´É½þ ¤ÉÉä±É ®ú½þÒ lÉÒ , ¨Éä®äú ʤÉxÉÉ SÉɽäþ,ʤÉxÉÉ {ÉÖUäô... ÊEòiÉxÉä Ê´É·ÉÉºÉ ºÉä
"iÉÚ CªÉÉ {ÉÖiɱÉä Eäò ¨ÉÉÊ¢òEò Eò½þÉxÉÒ ºÉÖxÉ ®ú½þÉ ½èþ ®äú EòÉånùÉ ,EÖòUô ¤ÉÉä±ÉäMÉÉ xɽþÓ..."=ºÉEòÒ iÉäWÉ +É´ÉÉWÉ ºÉä SÉÉéEòÉ lÉÉ *
"¨Éé ºÉ¤É...¨ÉÖZÉä ºÉ¤É {ÉiÉÉ ½èþ..."ªÉ½þÒ ¨ÉÖĽþ ºÉä ÊxÉEò±ÉÉ lÉÉ ¨Éä®äú *...

ʤÉVɱÉÒ EòÒ iÉäWÉ MÉc÷MÉc÷ɽþ]õ ½Öþ<Ç +Éè®ú ¨Éé º¨ÉÞÊiɪÉÉåå Eäò iÉÉ®úÉå {É®ú ±Éc÷JÉc÷É MɪÉÉ,Ê¡ò®ú ºÉSÉäiÉ ½Öþ+É lÉÉ *...´É¹ÉÉÇ ¤ÉnùºiÉÖ®ú WÉÉ®úÒ ½èþ* UôÓ]äõ  {ÉÖ®äú ´ÉäMÉ ºÉä {Éäc÷ Eäò {ÉkÉÉå .UôiÉÉå +Éè®ú WɨÉÒxÉ ºÉä ]õEò®úÉ ®ú½þÒ ½éþ *...{ÉÉxÉÒ Eäò UôÉä]äõ-¤Écä÷ xÉɱÉä +xÉäEòÉxÉäEò ºjÉÉäiÉÉå ºÉä ¡Úò]õ {Écä÷ ½éþ...

{ÉÖiÉÖ±É VÉÖ]õÒ ®ú½þiÉÒ ½èþ ¦ÉÉä®ú ºÉä ºÉÉÆZÉ iÉEò ...+xÉ´É®úiÉÂ,+lÉEò...
®úÉäVÉ nùJÉiÉÉ ½ÚÆþ ¨Éé =ºÉä {ÉMÉbÆ÷Êb÷ªÉÉå ºÉä SɱÉEò®ú nÚù®ú +ÉZÉ±É ½þÉäiÉä ½ÖþB * Ê¡ò®ú ±ÉÉè]õiÉä ½ÖþB * =ºÉEäò SÉä½þ®äú EòÒ +ÉÄSÉ ¤ÉɺÉÒ xɽþÓ {Éc÷iÉÒ...
¦É]Âõ`äö EòÉ EòÉ¨É iÉÉä +¦ÉÒ ¤ÉÆnù {Éc÷É ½èþ* =ºÉEòÉ ¨ÉÉʱÉEò BäºÉä '+Éì¢ò ºÉÒWÉxÉ' ¨Éå xÉWÉnùÒEò Eäò ¶É½þ®úÉå,Eòº¤ÉÉå ¨Éå +{ÉxÉä ¨ÉWÉnÚù®ú ºÉ{±ÉÉ<Ç Eò®úiÉÉ  ½èþ * ¦É]Âõ`äö Eäò ¨ÉWÉnÚù®ú-¨ÉWÉnÚù®úÊxɪÉÉå EòÉ  nùÉxÉÉ-{ÉÉxÉÒ SɱÉiÉä ®ú½þiÉÉ ½èþ* ¨ÉÉʱÉEò EòÒ ±ÉÉì®úÒ {É®ú ±ÉnùEò®ú EòɨÉMÉÉ®úÉå EòÉ VÉilÉÉ ½þ®ú ºÉ֤ɽþ ÊxÉEò±É {Éc÷iÉÉ ½èþ* {ÉÖiÉÖ±É
´É½þ ®úÉäWÉ EòÒ iÉ®ú½þ ,+ÉVÉ ¶ÉÉ¨É EòÉä ±ÉÉè]õÒ ±ÉÉì®úÒ ¨Éå ÊnùJÉÉ<Ç xɽþÓ nùÒ*
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(समाप्त)

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

परसाईजी की स्मृति में प्रलेसं का दो दिवसीय कार्यक्रम

हरिशंकर परसाई



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laidZ & 09406538817

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