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मंगलवार, 22 मार्च 2016

अगली नस्लें रौशन शोला होती हैं

गौहर रज़ा साहब से एक बार इल्तजा की कि वो नज़्म चाहिए, कि दोस्तों के दरम्यां बाँट सकूं. उन्होंने तुरंत दे दी... एक फनकार, एक शायर ऐसे ही अपने लफ़्ज़ों और कद में बड़ा होता है. कितना सही और मौजूं है रज़ा साहब का यह कहन, 'यह मत भूलो अगली नस्लें रौशन शोला होती हैं / आग कुरेदोगे, चिंगारी दामन तक तो आएगी '... उनकी यह नज़्म साभार उन्हीं से... - शेखर मल्लिक (मॉडरेटर)


धर्म में लिपटी वतन परस्ती क्या क्या स्वांग रचाएगी
मसली कलियाँ, झुलसा गुलशन, ज़र्द ख़िज़ाँ दिखलाएगी

यूरोप जिस वहशत से अब भी सहमा सहमा रहता है
खतरा है वह वहशत मेरे मुल्क में आग लगायेगी

जर्मन गैसकदों से अबतक खून की बदबू आती है
अंधी वतन परस्ती हम को उस रस्ते ले जायेगी

अंधे  कुएं में झूट की नाव तेज़ चली थी मान लिया
लेकिन बाहर रौशन दुनियां तुम से सच बुलवायेगी

नफ़रत में जो पले बढे हैं, नफ़रत में जो खेले हैं
नफ़रत देखो आगे आगे उनसे क्या करवायेगी

फनकारो से पूछ रहे हो क्यों लौटाए हैं सम्मान
पूछो, कितने चुप बैठे हैं, शर्म उन्हें कब आयेगी

यह मत खाओ, वह मत पहनो, इश्क़ तो बिलकुल करना मत
देश द्रोह की छाप तुम्हारे ऊपर भी लग जायेगी

यह मत भूलो अगली नस्लें रौशन शोला होती हैं
आग कुरेदोगे, चिंगारी दामन तक तो आएगी


गौहर रज़ा
दिल्ली
4.03.2016
अगली नस्लें रौशन शोला होती हैं

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