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रविवार, 23 मई 2010

प्रेम की कविता

सुनो,
प्रेम पर कवितायेँ लिखने का
मौसम फिर नहीं आएगा...
धुँए और गर्द की दीवार के आरपार
धूमिल होती हुई लौ को
सँभालने का
दौर फिर नहीं आएगा...
किसी फरेब में उलझे मत रहना,
तुम्हारी पक्षधरता का इम्तिहान
फिर नहीं आएगा...

अभी शहरी और गैर-शहरी
जंगलों में हुए
मासूम हत्याओं को
क़त्ल साबित करने में
वक्त लगने वाला है बहुत,
मगर अन्तोगत्वा जब अपराध सिद्ध हो जायेगा,
तब रोटी खुरचने पर कातिलों की
शक्ल उभर आएगी...

जान लो कि,
क्यों आसमान के चेहरे पर
लाल इन्द्रधनुष खिला रहता है आजकल...
क्योंकि जिनकी कमर पर चर्बी है,
कानून की भाषा और अस्मत
उनकी कांख में दबी है,
एडियों पर गिरवी है...
पहचान लो और
दर्ज करो इस समय को...
जहाँ सत्ता सिर्फ़ एक बेहया
कामोत्तेजना जैसी है...

गिद्ध भी सफाईकर्मी हैं,
किरदारों को तवज्जो देने में
समय लगता है...
लेकिन आखिरकार,
सफेदपोश दीमकों, तिलचट्टों और कौओं
का जोर कम पड़ जायेगा...
राइफलों के कारतूस ठस्स हो जायेंगे...
धान की बालियाँ बेखौफ़ हो जाएँगी...
पसीने वालों को उनका लंबित महत्त्व
अदा किया जायेगा...

तो उस और इस समय के बीच
खून के कतरों से नम,
और उत्साह में पगी हुईं,
प्रेम पर कवितायेँ लिखो...
ये जरूर लिखी जानी चाहियें...
क्योंकि प्रेम करते हुए भी प्रतिशोध
लिया जा सकता है
इस बर्बर समय से...

-शेखर मल्लिक
२१-२२-२३/०५/२०१०

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