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बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

फैज़ अहमद फैज़ के कुछ अमर कलाम


चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़


चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
और कुछ देर सितम सह लें, तड़प लें, रो लें
अपने अजदाद की मीरास है माज़ूर हैं हम
जिस्म पर क़ैद है जज़्बात पे ज़ंजीरें है
फ़िक्र महबूस है गुफ़्तार पे ताज़ीरें हैं
अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जिये जाते हैं
ज़िन्दगी क्या किसी मुफ़्लिस की क़बा है जिसमें
हर घड़ी दर्द के पैबंद लगे जाते हैं
लेकिन अब ज़ुल्म की मीयाद के दिन थोड़े हैं
इक ज़रा सब्र कि फ़रियाद के दिन थोड़े हैं
अर्सा-ए-दहर की झुलसी हुई वीरानी में
हमको रहना है पर यूँ ही तो नहीं रहना है
अजनबी हाथों के बेनाम गराँबार सितम
आज सहना है हमेशा तो नहीं सहना है
ये तेरे हुस्न से लिपटी हुई आलाम की गर्द
अपनी दो रोज़ा जवानी की शिकस्तों का शुमार
चाँदनी रातों का बेकार दहकता हुआ दर्द
दिल की बेसूद तड़प जिस्म की मायूस पुकार
चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
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नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही 

नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही

न तन में ख़ून फ़राहम न अश्क आँखों में
नमाज़े-शौक़ तो वाजिब है बे-वज़ू ही सही
किसी तरह तो जमे बज़्म मैकदे वालो
नहीं जो बादा-ओ-साग़र तो हा-ओ-हू ही सही
गर इन्तज़ार कठिन है तो जब तलक ऐ दिल
किसी के वादा-ए-फ़र्दा की गुफ़्तगू ही सही
दयारे-ग़ैर में महरम अगर नहीं कोई
तो 'फ़ैज़' ज़िक्रे-वतन अपने रू-ब-रू ही सही
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शीशों का मसीहा1 कोई नहीं

मोती हो कि शीशा, जाम कि दुर2
जो टूट गया, सो टूट गया
कब अश्कों से जुड़ सकता है
जो टूट गया, सो छूट गया

तुम नाहक़ टुकड़े चुन चुन कर
दामन में छुपाए बैठे हो
शीशों का मसीहा कोई नहीं
क्या आस लगाए बैठे हो

शायद कि इन्हीं टुकड़ों में कहीं
वह साग़रे दिल है जिसमें कभी
सद नाज़ से उतरा करती थी
सहबाए-ग़मे-जानां3 की परी

फिर दुनिया वालों ने तुमसे
यह साग़र लेकर फोड़ दिया
जो मय 4 थी बहा दी मिट्टी में
मेहमान का शहपर5 तोड़ दिया

यह रंगीं रेज़े हैं शायद
उन शोख़ बिलोरी सपनों के
तुम मस्त जवानी में जिन से
ख़िलवत6 को सजाया करते थे

नादारी1, दफ़्तर भूख़ और ग़म
इन सपनों से टकराते रहे
बेरहम था चौमुख पथराओ
यह काँच के ढाँचे क्या करते

या शायद इन ज़र्रों में कहीं
मोती है तुम्हारी इज़्ज़त का
वह जिससे तुम्हारे इज़्ज़ पे भी
शमशाद क़दों2 ने रश्क3 किया

इस माल की धुन में फिरते थे
ताजिर4 भी बहुत, रहज़न5 भी कई
है चोर नगर, या मुफ़लिस की
गर जान बची तो आन गई

यह साग़र, शीशे, लाल-ओ-गुहर
सालिम6 हों तो क़ीमत पाते हैं
और टुकड़े टुकड़े हों तो फ़क़्त
चुभते हैं, लहू रूलवाते हैं

तुम नाहक़ शीशे चुन चुन कर
दामन में छुपाए बैठे हो
शीशों का मसीहा कोई नहीं
क्या आस लगाए बैठे हो

यादों के गिरेबानों के रफ़ू
पर दिल की गुज़र कब होती है
इक बख़िया उधेड़ा, एक सिया
यूँ उम्र बसर कब होती है

इस कारगहे हस्ती में जहाँ
यह साग़र, शीशे ढलते हैं
हर शय 1 का बदल मिल सकता है
सब दामन पुर हो सकते हैं

जो हाथ बूढ़े, यावर2 है यहाँ
जो आँख उठे, वह बख़्तावर3
यां धन दौलत का अन्त नहीं
हों घात में डाकू लाख मगर

कब लूट झपट से हस्ती की
दूकानें ख़ाली होती हैं
याँ परबत परबत हीरे हैं
याँ सागर सागर मोती हैं

कुछ लोग हैं जो इस दौलत पर
परदे लटकाए फिरते हैं
हर परबत को, हर सागर को
नीलाम चढ़ाए फिरते हैं
कुछ वह भी है जो लड़ भिड़ कर
यह पर्दे नोच गिराते हैं
हस्ती के उठाईगीरों की
चालें उलझाए जाते हैं

इन दोनों में रन1 पड़ता है
नित बस्ती बस्ती, नगर नगर
हर बस्ते घर के सीने में
हर चलती राह के माथे पर

यह कालिक भरते फिरते हैं
वह जोत जगाते रहते हैं
यह आग लगाते फिरते हैं
वह आग बुझाते फिरते हैं

सब साग़र,शीशे, लाल-ओ-गुहर2
इस बाज़ी में बह जाते हैं
उट्ठो, सब ख़ाली हाथों को
उस रन से बुलावे आते हैं

शब्दार्थ :-
1. इलाज करनेवाला, चिकित्सक। 2. मोती। 3. महबूब के ग़म की शराब। 4. शराब। 5. उड़ान के पर। 6. एकान्त। 1. मुफ़लिसी, ग़रीबी। 2. ऊँचेक़द वाले। 3. ईर्ष्या। 4. व्यापारी। 5. लुटेरा। 6. पूरा। 1. वस्तु। 2. मददगार। 3. क़िस्मतवाला। 1. युळ। 2. लाल और मोती

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

दिल दुखता है बहुत...


ना दिलाओ याद...
ना कोई जिरह करो
बाबस्ता फिर उसी अफसाना-ऐ-उल्फत की
कि दिल दुखता है बहुत...
चाक हुआ जाता है !

बेरहम हुए वो जो
रहनुमा होंगे, जाना था कभी
अश्क अपने ही बहे,
खुद ही खाई जब शिकश्त...

कोई अपना बनते-बनते रह गया, या
ये बस अपनी आँखों का भरमाना था !
सारी हसरतों का सिला
एक मलाल रह गया यही...
हासिल होता जो चाहा था,
बस एक फैसले का
सूत भर फासला रह गया कहीं !

आज हम वही, रहगुजरों के
साये वही... ना कोई सदा, ना उम्मीद
ना इस दिल-ऐ-बेनूर के वफ़ा
का कोई मुरीद !
इस जाँ को तन्हा होना था, हो गया...

कौन होता है अपने जानिब
कौन जीता है, तेरी रूह में !
हम खुद ही जिए,
खुद ही मरे...
खुद ही डुबोई किश्ती
खुद ही तिरे...
खुद से खुद ही रहे हम
कौन क्या दिया, क्या ले गया !
किसने क्या बनाया हमको,
कौन हमें बिगाड़ गया !

फिर भी एक इल्तिजा है
ना कभी मेरी माज़ी की पूछना
यह जो वस्ल और हिज़्र की
रवायतें है, इनमें एक किताब
है ये शिकश्ताज़दा जिंदगी...
हर पन्ने पर कतरा-ऐ-खूँ है,
हर हर्फ़ पर ज़ख्म-ओ-नासूर मौजूँ है !
किसी सिरे को पकड़ कोई सवाल ना करना...
कि फिर दिल दुखेगा
फिर चाक हो जायेगा...!

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

पा सके जो राह-ए-इश्क में अपना अजीज मुकाम

पा सके जो राह-ए-इश्क में अपना अजीज मुकाम
करता हूँ यारों बार-बार बा-अदब उनका एहतराम

तबाह-ओ-क़त्ल भी हुए सरे-राह उनके वास्ते
और खुद ही पे आया अपनी बर्बादियों का इल्ज़ाम

अब तक तो ना हुई मयस्सर हमको वह
यकीं था कि मिलेंगे वफ़ा-ओ-उल्फत के जो पैगाम

जिन रास्तों पर खामोश वीरानियों का नूर था
चलते रहते थे खुशी-खुशी लेकर हम तेरा नाम

आगोश में लेकर तुम्हें ज़श्न-ए-वस्ल मनाते
क्या डराती जिंदगी, क्या करते कोई फ़िक्र-ए-अंजाम

गया वक्त वो सारे लम्हें गए दूर हमारी जानिब से
सोचते हैं अब क्या खामियाँ हमीं में थीं तमाम

रकीबों के शहर में घूमता हूँ तन्हा "शेखर"
जब से बदलते देखे हैं रिवाज़-ए-दोस्ती के आयाम
२८-१०-२०१०

बुधवार, 4 अगस्त 2010

इश्क में नमाजी बन गया

इश्क में नमाजी बन गया अब तो
वो आवारा काफिराई जाती रही मेरी...
दर-ऐ-यार दरगाह बन गया मेरे वास्ते
सर नवाता हूँ मौला, वजू करता हूँ
शब-ओ-सहर सिर्फ़ नाम-ऐ-यार को...
वफ़ा की बंदिशें कहाँ किसको
होती नसीब ऐसे, ऐ साहेब मेरे
बंदगी का लुत्फ़ पाया बाद मुद्दतों...
वो मुस्काती ऐसे कि सारी नेमतें
डाल रही हो मेरी झोली में
ऐसा हो खुदा मेरा, क्यों पूजूँ बुतों को...
कितनी राहत है उस वक्त-ऐ-वस्ल में
तस्कीन देता हुआ उल्फत उसका
रब्बा इस हसीन माज़रे में उम्र तमाम हो...
०३/०८/२०१०

बुधवार, 21 जुलाई 2010

मुद्दतों से मुस्काना मैं भी चाहता हूँ मेरे दोस्त

मुद्दतों से मुस्काना मैं भी चाहता हूँ मेरे दोस्त
असलियत ये कि असलियत छुपाना चाहता हूँ दोस्त

गैरत का मारा हूँ, अपनी शराफत से हारा हूँ
चोट खा कर भी सिर्फ़ गुमनाम रहना चाहता हूँ दोस्त

जिस गली से भी गुजरा, पराई निगाहों से गुज़रा
बहुत दिनों से किसी का बन जाना चाहता हूँ दोस्त

तेरी निगाह-ए-आशियाँ में बस जाऊं, नेमत वो पाई नहीं
बंजारे की कूचा-ए-खानाबदोश, ठहरना चाहता हूँ दोस्त

ना आफ़ताब, ना माहताब, ना चराग-ए-उम्मीद कहीं
आलम यूँ कि, अंधेरों में तबियत ही जलाना चाहता हूँ दोस्त

तुम भी तो तिश्नगी की अनबुझी तलब बनके रह गयी
तेरे ख्यालों से ही हो तरबतर, जी बहलाना चाहता हूँ दोस्त

सोचता हूँ मेरे बगैर भी कैसे जी लेते हो तुम ऐसे
हँसूं खुद पर फिर, मैं खुद को क्या मानना चाहता हूँ दोस्त

शनिवार, 3 जुलाई 2010

अश्क औरों से छुपाता रहा

जिंदगी भर रोता रहा, और अश्क औरों से छुपाता रहा
कुछ तो हया-ए-ज़मीर थी, कुछ रुसवा होने से बचता रहा

लोग तंज ही करते पीछे, और क्या हो सकता था
पीठ की आँखों पर होती वो चुभन, डरता रहा

मेरे मुस्कुराने में ही दफ्न था, मेरी कराहों का राज
रूबरू सबके मैं दिल खोल कर जो हँसता रहा

ताउम्र इकठ्ठे किये दर्दों के तजुर्बात
बेहतरीन जख्मों को बालुत्फ़ गुनगुनाता रहा

तफ़सील से सुनाता 'उसको' अपनी बिताई
ऐसी नफ़ीस राहत की बस राह मैं ताकता रहा

०२-०३/०७/२०१०

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

नज़्म -२

आज बादल हैं, बारिश है... तन्हाई है,
ये भीगी हुई रात का सितम
पहलु में सिर्फ़ एक ख्वाब है...
जिसकी ताबीर मुमकिन नहीं...
जिंदगी फकत एक दिलनशीं फ़रेब...
आँसूओं की तसीर भी तो मुमकिन नहीं...
इश्क-ए-ईमान किस पर लाऊं अब दोस्तों...
मेरा हबीब भी मुझसा गमगीन नहीं

27.06.2010.

मंगलवार, 29 जून 2010

आज उसके रुखसार को जी भर देखा


आज उसके रुखसार को जी भर देखा
मुस्कुराई वह या वस्ल की वो राहत थी...

जर्द चेहरे पर भी एक नूर सा आ गया
उस नज़र में भी क्या बरकत थी...

गुल भी खिले थे, खार भी दरम्यां थे कई
उल्फत जो इक जिद थी, मुक्कमल हसरत थी

हमने पत्थरों पर लिखी एक दास्ताँ प्यारी
मोहब्बत हमारी एक मासूम सी इबारत थी

पत्थर तो आए बहुत हमारे सर को
इश्क में भी वो फौलाद-ए-नजाकत थी

अब तो बाकि उम्र का जाने हासिल क्या हो
गले लगकर गुज़रे लम्हात ही सारी नेमत थी

पेशानी पर उसके पसीना, रुख पे अश्क ढुलके
थोड़ी देर को ही रूबरू थे,फिर तो क़यामत थी

- २९/०६/२०१० की सुबह
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