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मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

उसके रिश्ते की आखिरी औरत

(उस क्रांतिकारी के लिए, जो हर खतरनाक दौर में वक्त की कोख से पैदा होता है और कारतूस के सामने कलम को रख देता है.)

         शहीद कामरेड महेंद्र सिंह की विरासत को पूरी  अपेक्षा व विश्वास के साथ समर्पित


एक बेतरतीब शुरूआत कहानी की

"उनका" एक दूसरे के लिए होना एक ज़िंदा सच था...साँसें लेता हुआ सच, कलेजे सा धड़कता सच... बहरहाल, जिसे एक दिन लहूलुहान होना था. और दोनों एक दूसरे के  अस्तीत्व के लिए ज़रूरी थे... ठीक वैसे ही जैसे सच के लिए दलील और वजूद के लिए पहचान का होना ज़रूरी है...

लड़का कई बार उस कस्बे के सीवान पर घेरा देने वाली नदी पर जागता था, कई बार कविताओं में जीता था और कई बार हथौड़ी छैनी लेकर अपने आप को तराशने निकल पड़ता था और  अपनी ही चोटों से लहूलुहान होकर घर लौटता था. तब वह  अक्सर उसके वास्ते चौखट बन कर इंतज़ार करती हुई पाई जाती... उसकी हथेलियाँ कौर बन जातीं, उसे दुनिया का सबसे लज़ीज़ खाना खिलाने के लिए और उस रात उसकी जाँघ लड़के के लिए बिस्तर बन जाती, उसे एक पुरसुकून नींद देने के लिए...

लड़का कई दफे उससे कह चुका था और अक्सर कहा करता था, 'मेरे पीछे जान मत दो. मेरा रास्ता बिरसा मुंडा या भगत सिंह के पीछे हो गया है... मैं सच, इंसाफ और हक़ की तलाश में सिद्घार्थ की भटकन लिए कभी भी दूर निकल सकता हूँ...'

वह तब तपाक्‌ से अंगीठी बन जाती, जिसे लोहे के काले वजनी तवे का बोझ कंधे पर लेना है और गर्म रोटियाँ सिंकवा कर खिलवानी है...
लड़का सारे प्रतीक नए चाहता था, सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन की तरह, शायद यही उसकी गल्ती थी... और वह उसके पीछे मोमबत्ती की तरह गलती रहती थी...

पूर्वकथा यानि कथा जहाँ से कही जाती है आमतौर पर...

चौदह बरस पहले उस शाम एक बवंडर आया था. न बिजली कड़की, न तेज पछुआ हवायें चली, न ओले पड़े...मगर एक मकान की बोसीदा दीवारें छत से मरहूम हो गईं थी. वह खामोश चीखों का अजीब तूफान था, जिसमें एक नाजुक सी क्यारी जड़ समेत उखड़ गई थी और उस वक्त के बदलते हुए इतिहास का मामूली सा हिस्सा हो गई थी. लड़के का कामरेड पिता सरेचौराह नाम पूछ कर पिस्तौल से दाग दिया गया था. उस दिन भरी दोपहर, एक भीड़ को संबोधित करने के बाद...

लड़के ने पिछले दिनों अपने इक्कीसवें वर्षगाँठ पर उस तूफान को याद करते हुए उससे कहा था, 'मैं मर सकता हूँ, मगर मेरी भाषा कभी नहीं मरेगी...' और जो उसने नहीं कहा, मगर समझा जाना चाहिए था वक्त के तकाज़े में लाज़मी मुद्दे की मानिंद, कि 'मेरी भाषा मेरी सबसे बड़ी ताकत है. मेरी भाषा मेरा वजूद है, जो मेरी धरोहर है, वही भाषा जिसका मैं वारिस हूँ... भाषा के बगैर कोई क्रांति संभव नहीं...मैं मिट्‌टी का आदमी हूँ, मेरा बदन मिट्‌टी में मिल जाएगा... मगर इसीलिए मिट्‌टी के करीब हूँ. मैं उसी तरह हमेशा ज़िंदा रहूँगा, जैसे यह ज़मीन  नश्वर है.  अनेक रूपों में, जो कहीं न कहीं जो इस कायनात में सदा बची रहेगी...यही मेरी ज़मीन है, मेरा ज़मीर है..." और समझा गया भी...
ये उसने नहीं कहा, मगर समझा गया...दुनिया की एक सबसे दुखी मगर बहादुर रूह द्वारा...

और एक मध्यरात्रि उस रूह ने  अपनी आँखें पोंछते हुए मादा गालियों के बीच हथकड़ियों का लॉक जुड़ते सुना...

इसके बाद कैलेण्डर के कई पन्ने बेकार हो गए...
कई दिन बीते, वह कभी रोती और कभी संकल्प करती रही...
कई दिन बीते, एक भी मौसम नहीं गुज़रा...
और कई दिन बीते, बे आवाज़ चाबुकों की मार तेज होती गई...


आखिरकार एक दिन सूरज बिल्कुल उसकी सीढ़ियों पर उगा, और समाज के वास्ते गैरज़रूरी हो चुके उसके चेहरे पर एक सदी की रात ढली थी.

वह लड़के को बदहवास चूमते हुए बोलती रही, 'मेरे राजा, मेरे सोना, मेरे जीवनधन...तुम आ गए... आह्‌ तुम आ गए, मेरी जान चली गई थी, मैं मर गई थी...'

दो नदियों की चार धाराऐं कधों पर मिलती रहीं, किंहीं मुख़्तसर लम्हों के लिए...


दोस्तों, यहाँ तक की लफ्फाज़ी से साफ हो गया है कि...


लड़का  अपनी फितरत और ज़मीर से मज़बूर था... और वह उसके भीतर फल गए आदर्शों के उन बीजों से, जो उसका बाप  अपने लड़के की ज़ीन में रोप गया था अनायास...

लड़के ने आदतन फिर कागज़ों के दामन पर उजली कालिख पोतना शुरू कर दिया. आरोप पत्र गढ़े जाते रहे उसके खिलाफ...और वह क्लिपबोर्ड पर कागज दबाए लिखता रहा... स्थापनाओं की चूलें हिलती रहीं...
लिखता रहा कि लोग लोहे, बारूद, धातु, चमड़े और एक मुल्की कागज़ पर छपे खास टुकड़े के पीछे हैं...कि आज का सूरज खून देख देख कर थक गया है... कि लोग सुदामा पाण्डेय 'धूमिल' को ठीक ठीक समझ लेते तो सड़क की क्रांतियाँ संसद में फैसलों में बदल जातीं... कि पाश, सफ़दर जैसों को रोकने के लिए हत्या ही इकलौता रास्ता उनके पास बच जाता था...कि इलाके का विधायक अधिनायक नहीं, जनता का मुलाजिम होना चाहिए... कि कभी कभी तारीख में विद्रोह करने की ज़रूरत एक मुकद्दस, पुराने या हालिए इतिहास को बदलने के लिए एक सिलसिलेवार धीमी सरग़ोशी या फिर बिना किसी आहट के पैदा हो जाती है, उसे आइडेंटिफाई करना ज़रूरी है...

वह लेखकीय भावुकता के झोंक में यह भी दर्ज़ करता गया, कि मैंने माँस से कभी प्रेम नहीं किया, सच्चा प्रेम वहाँ किया भी नहीं जा सकता... कि मेरा प्रेम किसी को दिखाई भी नहीं देता, समझ में नहीं आता... कि मैं सुनहरे गालों से नहीं, एक खुबसूरत कलेजे से प्रेम करने का सपना देखता हूँ... कि मेरे प्रेम को आदमखोरों के एक 'ग्रूप' ने ग्रास लिया है...

कि ( अब) हर कोई मुक्तिबोध नहीं हो सकता...

वह लिखता रहा, जहाँ तक लिखा जाना संभव हो सका...फिर दीवार पर टँगी एक पुरानी बत्ती बेनूर हुई थी, एक पुराना पर्दा खिड़की पर फड़फड़ाया था, एक पुरानी घड़ी ऊँघने लगी थी.


इन्हीं दिनों किसी दिन लड़के ने उससे कहा था, 'तुम हो तो ताकत मिलती है...मैं सृजन कर सकता हूँ, विरोध कर सकता हूँ, कुछ घाव भर सकता हूँ...'

वह मुस्करा भर देती तो लड़के की आँखों में वही दूधिया मौसम खिल उठते थे...

उत्तरकथा का पूर्वांश...

गोलियों की हैवानी धाँय धाँय के बीच वह धराशायी हुआ था.

और शांत, गाढ़ा, ताजा लहू तारकोल की तजुर्बेकार सड़क की गर्द सोखने लगी... सिर पर बने सुराख से खून था कि लगातार रिसता जा रहा था, खून का भी अपना 'स्टेटमेंट' होता है... किसी हरामखोर तिजोरी में उसे समझने के लिए शब्दकोश नहीं है...

इससे थोड़ी देर पहले रामलीला मैदान में मंच और लाउडस्पीकर का इस्तेमाल इस देश के इतिहास में घटे एक गलत मक़सद को महान साबित करने के लिए कुछ मुखौटों ने किया था... जो  अपनी नस्ल में खाँटी देशी खून ढोने की ग़लतफहमी में थे...जिनके लिए उनकी बीमार सोच में राष्ट्र का अर्थ एक ख़ास धर्म था...

देश का ताजा मगर आम व अभिजात्यीय क्षमताओं से रहित खून रोटी, छत, अस्तीव और आबरू के लिए जल रहा था जिस समय...जिस वक्त विश्व का सबसे बड़ा, शातिर, बेशरम मगर  घोषित आतंकवादी शांतिमुहिम नामक पेटीकोट की ओट ले कर दुनिया को बाजार के दलदल या युद्घभूमि के बंजर में बदल देने के लिए रोज मदारियों की चालें चल रहा था...जिस वक्त सत्ता से बाहर के लोग 'विदेशी बहू' को रोकने के लिए किसी भी हद तक जाने की खबरिया घोषणाएं कर रहे थे...और ऐसे वक्त जब सेसेंक्स रिकार्ड तोड़  उछाल मार रहा था, मगर देश का तीसरा दर्जा  अपने हाल पर छोड़ दिया जा रहा था...उस वक्त, जब रैलियों या महारैलाओं का सीजन चल रहा था...नक्सली पहाड़ी रास्तों पर विस्फोट कर अपना शक्ति प्रदर्शन कर रहे थे... और बरगद की जड़ों में सिक्के रोपने वालों के खुफिया इरादों से बहुत से हाथ पेट बेख़बर थे...

उन्हीं दिनों यह हादसा शहर के बीचोंबीच उसी रामलीला मैदान के पास हुआ था...
लालनीली बत्तियाँ, सायरन, बूटों की धमक और वर्दियों की रेलमपेल में...लड़का औंधा पड़ा था सबके बीच...लोकतंत्र में चारों खाने चित्त...एक मुहरबंद रायफल की अज़नबी गोली के भटके हुए वार का शिकार हो कर... और उस पर कई स्वचालित किस्म के कैमरे तने थे. वह भी  अपने बाप की तरह इस शाम की बुलेटिनों के लिए महत्वपूर्ण बाईट बन गया था, एक फुटेज...ब्रेकिंग न्यूज़ में उसका नाम फ्लैश हो रहा था, लक्ज़री कार के स्क्रॉलिंग विज्ञापन क्लिप के साथ...

वहाँ से कुछ ही कदम पर उसकी गली से हो कर हवा, उसके रिहायशी क्वॉर्टर के ज़ीने से चहलकदमी करती हुई, दरवाजे पर हल्की सी थपकी दे कर बालकिनी में पड़े मेज़ पर चुपचाप जा बैठती थी और फिर एक उदास कलम क्लिपबोर्ड में उलझे कागजों पर हिलती थी, आले पर रखी किताबों में से कोने वाली का ज़िल्द थरथराता था...

अचानक आकाश में उजले बादलों का अकाल पड़ गया, कहीं से भी कोयलें कूक नहीं रही थीं, हवा अब थिराने लगी थी... मानो अभी क्षितिज में तोपों की सलामी की सम्मानसूचक आवाज़ गूँजेगी. चाहरदिवारियों में दरारें पड़ने लगीं,  अविश्वासी  अपेक्षाओं आस्थाओं के जर्जर किले भरभरा कर ज़मींदोज़ होने लगे...

वह जो उसके रिश्ते की आखिरी औरत थी, और संयोग से पहली भी,  अब  अकेली हो चुकी थी. जिसका एक  नियमित और अपनी उम्र पूरी करते वेतन, एक चादर, एक मोढ़े, एक हमदर्द टोटी, एक खोहनुमा क्वॉर्टर...और इकलौते लड़के के सिवा कोई विशेष दावेदारी नहीं थी, ज़िंदगी में...जिसके कामरेड पति का ज़िस्म सरेआम चौक पर  अज्ञात (!) मोटर साईकिल सवारों द्वारा चौदह बरस पहले गोलियों से छेद दिया गया था...

वह  अपने जवान बेटे की लाश देखने का हौसला समेट रही थी...

मगर अफ़सोस! इस तरह यह कहानी यहाँ खत्म नहीं होती...

सोमवार, 3 अक्टूबर 2011

भरोसा और हंसी, जिंदगी



भरोसा और हंसी, जिंदगी

मुझे लगता है
(और ऐसा उन बहुतों को लग सकता है, लगता होगा) कि,
आदमी को तोड़ देने के लिए
सिर्फ उसका भरोसा तोडना काफी है...
भरोसा, जो उसकी हड्डियों में फास्फोरस की तरह शामिल होता है...
और इसी के दम पर उसकी रीढ़ लम्बवत खड़ी रहती है...
और उसके सांसों का चाप बना रहता है...!

वहीँ, एकदम वहीँ...
वे चोट करते हैं, और इसका समय कोई नियत नहीं होता !
कि बारहाबार एक ही जगह चोट करते रहना
वे कितनी शातिरता से सीख हुए लोग होते हैं और
आदमी की हर उम्मीद
को खारिज करने का लंबा षड्यंत्र
कामयाबी से चला कर
उसकी हंसी को नेस्तनाबूद कर डालते हैं...
यह उनके स्वार्थ का नया नाजीवाद है.

असल में, आदमी की असली मृत्यु उसी समय हो जाती है !

मैंने देखा है, कई दफे कि
आदमी तो हंसना और जीना चाहता है,
यह बस नैसर्गिक है,
मगर वह बस एक ही जगह खत्म हो जाता है,
जब एकाएक उसे पता चलता है कि
इसके बाद उसके लिए कुछ बचा नहीं...
न उसकी कोशिशे, न उन कोशिशों की कीमत
न उसके हँसने की वज़हें, न ही हँसने के मौके !
(और अब शौक से हँसने वाले मध्यवर्ग में पाए भी नहीं जाते !
मजबूरी में हंसें सो अलग बात ...)

सीधी सी बात है, जब आदमी हँसता नहीं, वह मृत्यु के कुछ और पास हो जाता है...

जीने के लिए संतोष वह मसाला है, जो बेहतर कल और कामयाबी
की उम्मीद के भरोसे की आंच पर पकता है... और,
जो जिंदगी के मकान की दीवारों में दाखिल गारे में शामिल होता है

संतुष्ट आदमी ही हंस सकता है, क्या इससे आप इंकार कर देंगे ?

तो...
जीने के लिए हमें उन हाथों और इरादों को तोडना होगा जो
हमारा भरोसा तोड़ने के लिए बढ़े हुए हैं, प्रशिक्षित हैं,
और इसके लिए वेतनभोगी भी हैं !
उनके तिलिस्म और चोट को अपने नकार के दायरे में लाकर
अपने भरोसे की ज़मीं पर अपनी हंसी बजाफ्ता उगानी होगी...

चीखो

एक ऐसे सपाट दुनिया के,
जिसे भूगोल की किताबों में अंडाकार बताया गया है...
तुम और मैं जैसे लोग हाशिए के भी बाहर कहीं गैर परिभाषित जगह पर हैं...
हममें अभी खिलाफत में चीखने की कूवत बाकि है...
सारे फैसले बेशर्मी की आला मिसाल हैं और
पानी के अनुपात की तर्ज पर जहाँ का एक तिहाई हिस्सा
नृशंशता की हद तक गैर-बराबरी का है,
यह उतना ही क्रूर और ठंडा है, जितना कसाई के छुरे का वार...
इसको समझना मुश्किल नहीं है...

चूँकि बताया जा रहा है कि प्रतिदिन ३२ रूपये खर्चने वाला
एक आर्थिक हैसियत या पैमाना बताने वाली उस अदृश्य रेखा के ऊपर है ! और...
इसलिए यह एक बेशर्म मजाक है ! इस पर हँसना कुछ इस तरह का आत्मपीडक काम है जैसे,
पुराने घाव के भीतर सलाखें भोंकना...
लगातार...
कुछ अनचीन्हे मुखौटों के पीछे छुपी हुई आवाजें
हौलनाक लतीफें सुनाती हैं कि
अमुक तारीख को
तुम्हारा वजूद बदल कर रख दिया जायेगा...
और तुम उस तारिख के तुरंत बाद खुद को पहचानने से इंकार कर दोगे...! 
पूछोगे किससे, क्या यह सच है ?

इस दुनिया के हाशिए से बाहर होने के बावजूद...
वे हमें डराने के लिए मजबूर हैं, कि उन्हें भी हमसे उतना ही डर है !
इसलिये यहाँ हत्यारों के चेहरे की मासूमियत तुम्हें दंग कर सकती है !
और यही बात उनके फायदे की है...!

 "इंसानियत", "इन्साफ" "ईमानदारी", "इंकार: और "इन्किलाब" जैसे
शब्दों में जरूर कोई बहनापा है,
इसलिए ये इनके शब्दकोष से सिरे से अपने अभिधेयार्थ सहित गायब हैं !!!

चीखो-चीखो-चीखो...!
क्योंकि २३ मार्च को फाँसी पर चढ़ने वाले उस तेईस साल के जाट नौजवान ने
कहा था, "ऊँचा सुनने वालों को धमाकों की जरूरत होती है !"

सोमवार, 21 मार्च 2011

मेरे सरोकार


सरोकार जो मेरे हैं,
तुम्हारे आदर्शों के खोखलेपन
और हिंसा के सभी तरीकों
के सीधे-सीधे खिलाफ़ हैं !

सारे झूठ और
गढ़ी हुई मर्यादाएं तुम्हारी पैदाईश हैं
लेकिन मेरी आस्था
सिर्फ धूप की पहली किरण
बारिश की पहली बौछार
और ठण्ड की पहली सिहरन में है
इसलिए खालिस हैं... प्रकृत हैं...

तुम मुझे
कमजोर, प्रकृतिवादी,
गल्पवादी, सिरफिरा, नपुंसक घोषित कर
हाशिए से बाहर फेंक सकते हो,
संतुष्ट हो सकते हो
अपनी जीत के भ्रम का
उत्सव मना सकते हो
या इस तरह एक
गोलबंदी में अपने किये पर वाह-वाही
लूट सकते हो...

लेकिन,
मैं जब कहता हूँ --
रौंदे जाने से पहले
घास में जीवन था
मैं मानता हूँ की
तुम समूचा रौंद कर भी
घास को
उगने से
रोक नहीं सकते--
तुम तिलमिला उठते हो...
तुम्हारे संस्कार में सच
को बर्दाश्त करना
कोई चीज ही नहीं है !
या उसे नकारना ही अपनी
बुजदिली को ढांपकर
बहादुर बन जाने की
एक युक्ति है !

तुम समझो कि
मुझे तकलीफ में डालना
तुम्हारे शातिर दिमाग की
सबसे बड़ी जीत हैं, मगर
तुम समझ नहीं सकते कि
तकलीफ में होना ही
असल में
चीजों को बदलने की
ज़मीन तैयार करता है !

मेरे सरोकार
तुमसे मिले चोटों
का हिसाब दर्ज करते हुए
उसके पाई-पाई
चुकता करने के हैं
यह तुम
जानते नहीं हो अभी
यही तुम्हारी ताकत की
सबसे बचकानी भूल है !

बुधवार, 2 मार्च 2011

सवाल


हमेशा ऐसा ही होता है, कि
मासूम किलकारियों को पर लगने से पहले,
फुर्र से उड़ जाने से पहले
धारदार हथियारों से उनके पँख
चाक कर दिये जाते हैं,
कई बार, सिर्फ़ हत्याएँ करना उनका शिगूफा हो जाता है
वे हमारे इतिहास, हमारी स्मृतियों, अनुभव, चेतना और
अनुभूति और फैसले करने की जैविक क्षमता
की हत्या करने को पागल हो जाते हैं...
ऐसा होता है कि
अक्सर जब नज़र सामने की तरफ होती है
पीछे से वार होता है...
वे वही होते हैं, वही, जिन्हें हमने भाई कहा था
एक ही आसमान के नीचे !
अरसे तक एक थाली में बाँटकर
भात खाया था जिनके साथ...
जिनकी बहती हुई नाक पोंछी थी,
जिन्हें गिनतियाँ और पहाड़े सिखाए थे...
जिनको बोलना सिखाया था...वे अचानक...
जीभ काटने वाले हाथों में तब्दील हो जाते हैं
ताकि हम आज़ादी का स्वाद ना चख सकें !
सवाल यह नहीं कि ऐसा क्यों होता है...
सवाल तो यह है कि
क्या हम ऐसा होने को
खारिज नहीं कर सकते ?

जंग खत्म नहीं होता है साथी !


हमेशा होना तो यही होता है
ऐसा ही होता है
कि सभ्यता के दूसरे छोर पर जहाँ
एक सुदीर्घ सन्नाटे
की गवाही में तेरे-मेरे कांपते-लरजते
होंठों की धीमी सरगोशियों का ख़्वाब-गुलाब
खिलने को होता है कि
बारहा दीवारों से फोड कर निकल आती हैं
उनकी दुनियावी कड़ी हथेलियाँ
जिससे मसलकर उन गुलाबों को
घोंट दिया जाता है...

नृशंस परछाइयों का एक सर्वकालिक समूह
हमें बागी घोषित करता है और खुद को
अपनी लकीर का सबसे बड़ा सरंक्षक !
घेरेबंदी के बीच
मुस्कुराकर, सर उठाकर, सीना ताने
वध होती हुई हमारी आत्माएँ
पुकार सकती हैं सिर्फ़
एक आखरी बार
एक-दूसरे का नाम...
फिर हमारी सांसों को थामें रखने वाली तख्ती
पैरों के तले से खिसका दी जाती हैं...
एक कुएँ में झूलते हुए हम दम तोड़ते हैं, आहिस्ता-अहिस्ता...

और तस्वीर के दूसरे पहलू में,
हमारे सपने, हमारी ताकत, हमारा विरोध
बचा रहता है, सूरज की रौशनी में, चाँदनी में,
हवा में, पानी में... पत्थर में, दूब में...!
  
उफ़, कि यही एक तथ्य है जो
है वहीँ जहाँ, तब भी था, जब से
एक आदमी और एक औरत
एक दूसरे का हाथ ईमानदारी से पकड़ कर आगे आये !
उनके साझे क़दमों की हुलस से जमीन पर
फूल खिल आये...
वे शामिल हुए एक-दूसरे की देह-ओ-रूह में,
और पूरी दुनिया का एक बड़ा हिस्सा उनके दायरे से
बाहर हो गया !
तब उनके हथियारों की नोंक और तेज की जाने लगी
मुट्ठियों में पत्थर आ गये...

मगर विश्वास करो साथी
यह यूँ ही तुम्हें दर्द में बहलाने के लिए
नहीं कह रहा... कि
यह सब जो होता है, उसके बरक्स यह भी होता है कि,
हर बार उनकी साजिशें नाकाम की हैं हमने
हर बार घूरे पर गुलाब खिलाया है
यह यूँ ही नहीं हुआ कि लाल रंग-
उस गुलाब का-
ऐसा गहरा हुआ है !
जिसके मायने कई है !
हर बार मृत्यु को हताश किया है हमने
हर बार हम पलटे हैं,
आखिरी बार चूक जाने से ऐन पहले !
हर बार उन्होंने हद बनाये हैं, और हमने हद तोड़े हैं !

यह सच है कि जिंदगी की बुनियाद
जंग और मुहब्बत के गारे में सान कर रखी जाती है
यह तो होता है कि जंग में हम झोंक दिए जाते हैं
पर यह भी उस कदर सच है कि
जब तक खून का ईमान बाकि है
जंग खत्म नहीं होता है साथी !

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

काहिरा के तहरीर चौक को सलाम करते हुए !

शुक्रिया मेरे हमनदीफ,
मेरे यारों, शुक्रिया...
इस बज़ा यकीं को जिंदा रखने के लिए कि
लहू सुर्ख-ओ-खालिस है हमारे रग-ओ-रूह में अभी भी
जो अमन और इन्साफ की जुबान बोलता है.
अपना हक़ मांगता है,
गुलाम-परस्ती से इनकार का माद्दा रखता है.
कि ताकत अब भी मौजूँ है हमारी बाँहों में, फौलाद-ऐ जिगर में
दहशत-दां उन तानाशाहों की चूलें हिला देने के लिए
जो खुद को मुख्तार मान बैठे थे हमारी जिंद-ओ-जान के...
कि जिनको खुशफहमी थी कोई बेशर्म !
कि जिन्हें अंजाम-ऐ-खाक का इल्म नहीं था
उनको बा-इल्म-ऐ-असल कराने के लिए
शुक्रिया...

जीतता है वही, वही जीता है
जिस कौम के सिर पर होती है अहले-जुनूं-ओ-जज्बा-ऐ-आज़ादी
बस इसकी फ़िराक फकत, और इससे कम कुछ नहीं

कायल हूँ तुम्हारी जुस्तजू के जो,
माँगती है बा-अदब अपना हक़-ओ-इंसाफ़, और इस माँगने पर
अपनी वफ़ा निसार करती है !
काली दीवारों में छिपी हुई खुदगर्जी की,
बदनीयती की गज़ालत बेनक़ाब करती है.
फ़क्र है तेरे इन्कलाबी जूनून पर, मेरे यारों !

शुक्रिया दोस्तों,
तुमने खून नहीं माँगा, तुमने हथियार नहीं उठाये, आवाज़ ही फकत उठायी
ताकत का जिन्हें गुमां था, उनसे चोर रास्ते की आबरू बढवाई !
तुम्हारी हिम्मत-ओ-हौसले दाद के हक़दार हैं,
जो टैंकों के सामने तुम बिछ गये
तुम्हारी अमन-परस्ती से वे सर्द-खूँ वाले भी खौफ़ खा गये !
शुक्रिया यह फिर बताने के लिए कि,
जो नाजायज है, खलिश-ऐ-जाँ-ऐ-आदम है,
उसकी मुखाफलत का तरीका यही है, यही है...

जिसकी बुनियाद में आदम का खूँ लगा हो,
उस गलीज़ सत्ता की मीनारें गिराने का    
शुक्रिया...

सलाम तहरीर चौक, सलाम ऐ तहरीर चौक के सिपाहियों !

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

शब्दों के जाले


इस रात... 
बड़े श्रम से
आहत मन की सारी प्रतिबद्धताओं
के दम पर
शब्दों के जाले बुनने फिर बैठा हूँ...

या कि इनका कोई अर्थ
कलेजे में चीरा लगाकर...
सीने के ऐन बीचों-बीच...
कुछ फोड कर बाहर निकल आया है,
जिसे शब्दों की शक्ल में 
अपने ही माँस और रक्त से छाँट कर
पेश कर रहा हूँ...!

इन शब्दों की धार से खेलते हुए
कई बार मेरी उँगलियों की जगह 
गर्दन कटी है...
और इनके तात्पर्य ढूंढते हुए
सारे आदिम जंगल छान मारे हैं !
तब एक जगह पाया...
अपनी असलियत ढेले की तरह पड़ी थी, 
...उठाई है !

फिर भी मैं कोई पागल हूँ कि 
सुकरात का ज़हर खुद भी चखना चाहता हूँ...
सफदर की तरह आखरी दम पे  
अपनी ईमान पर निसार होना चाहता हूँ...
पाश की तरह "घास" बन जाना चाहता हूँ और,
बागियों में भगत या बिरसा होना चाहता हूँ... 

शब्दों की आंच पर तमाम कच्चे अर्थों के 
उपले-कंडे सेंकते हुए...
मैं देख रहा हूँ कि 
बाज़ार मेरी नाक तोड़ रहा है
सत्ता मुझे झाड़-जंगलों में शिकारी कुत्ते की तरह
खोज-खोज कर,
गोली मार रही है...
मेरी जमीन का पानी वे लोग 
अपनी शीतल-पेय पैदा करने वाली फैक्ट्री में खपा रहे हैं
मेरी मिट्टी पर...
मेरे घर की औरतों के बदन पर की तरह 
उनके पंजों और खुरों के बजाफ्ता निशान हैं...!
मेरे नाम पर बनी सारी योजनाओं को
मेरे बहुत सारे अवैध विधाता चर रहे हैं...

उफ्फ़, बहुत हो चुका ! कहते हुए,
उठकर बाहर भागा हूँ 
एकाएक,
कमरे में असंख्य 
चीत्कार-चीखें
एक मातमी धुन की तरह फ़ैल गई थीं...

इस समय जो मृत्युबोध
सन्नाटे का फायदा उठाकर
मेरे-तुम्हारे जीवन में
चोरी से पैवस्त हो गया है,
उसे दबोच लेना है, 
कि वह एक गलत बात है...

तो इस समय...
इतना मौन क्यों है मेरा संसार ?
पूछने का यह समय, 
बिल्कुल ठीक समय है !

एक सहज किलकारी की तरह 
पूर्व में सूर्योदय कल होगा ही,
यही सोचकर बैठने से अच्छा है, हम पूरब की दिशा में 
इस रात से ही चलना शुरू कर दें...

शब्दों के जाले,
इस वक्त के चेहरे पर लिपटे
फ़रेब के जाले काट देंगे... 
हाँ, शब्दों को सान पर चढ़ा रहा हूँ,
कमान पर चढ़ा रहा हूँ...

रविवार, 9 जनवरी 2011

असल में ऐसा था...

खिड़की से बाहर...
सायरन की तरह बजती घंटियों की तरह
टन-टन-टन... एक बार फिर,
किसी आपातकाल की घोषणा करते, बौखलाए हुए
अंधड़ की तरह कुछ घटित हो रहा था...

भूख, बीमारी, विश्वासघात से बिलबिलाया और
अपने जमीन-जंगल-पानी से खदेड़ा गया
आदमी
विरोध के नारे लिखी तख्तियाँ
हाथों में उठाये... जबरदस्त उछाह और
उसके पीछे उसी नस काटती तकलीफ को दबाए...
नारों को लहराते हुए अचानक...
मेरी ओर देखता बोलने लगा...

"सुनो दादा, आप भी लड़ाई में हो, साथ दो..."
(वरना कल तुम भी मारे जाओगे, यह वह नहीं कहता था
मगर उसकी आवाज़ की प्रतिध्वनि में मुझे यही सुनाई दे रहा था...)

और मैं पसीने से भीगा
अपनी मेज़ पर कागज-कलम लेकर बैठ जाता...समाधिस्थ !
विरोध करने का मेरा
यह अपना तरीका था,
ख़ामोशी से चिल्लाने का अचूक नुस्खा था !

मुझमें रक्तपात, धूप, लाठीचार्ज सहने
और आमना-सामना करते हुए बन्दीगृह जाने की कूबत नहीं थी !
मैं विरोध में सिर्फ़ 'चिन्तन' और 'शब्द-वमन' किया करता था...

मगर अपनी ज़मीन से उखड़ा...
बेइज्जत और भूखा... दिन-दहाड़े लोकतंत्र में, संविधान के आलोक में
लूटा गया आम आदमी, हार नहीं मान सकता था...
किसी भी मोर्चे पर,
वरना हार मान लेने पर वह शर्तिया समाप्त हो जाता
तमाम लाल-फीते से दम घोंटी गई फाइलों की तरह...

उसे मेरी विद्वता पर... मेरे पौरुष (!) पर
जबरदस्त भरोसा था...
कि मैं,
अब-अब-अब... उठूँगा, चीखूँगा...
मुट्ठियाँ बाँध कर भुजाएँ लहराऊँगा...
मानवता के साथ कामुक सत्ता जो बलात्कार कर रही है,
उसे रोकने के लिए 'टॉर्च' की रौशनी
अँधेरे में फेंकूँगा !...

मगर मैं संकोच और सुविधाओं से क्रमश:
पस्त था,
मस्त था...
और इसी तरह एक दिन
अस्त होने वाला था !

लोग सड़कों, चौराहों, गलियों में...
राजपथ पर... राजभवन के सामने...
जुलूस निकाल रहे थे
धरना दे रहे थे...
आँसू गैस-लाठी-गोली झेल रहे थे...मर रहे थे...
मैं उस समय समाचार पढ़ या देख रहा था...
कोई परिचित और 'पढ़ने-लिखने' वाला मिल जाये
तो उससे इन सब मसलों पर 'चर्चा' कर रहा था
और वापस घर आकर अपने दंतमंजन, अपनी थाली, अपनी रजाई...
आदि का बजाफ्ता इस्तेमाल कर रहा था !

और मैं पढ़ता ही जा रहा था,
गोर्की - "मदर", प्रेमचंद-'जुलूस'...
मार्क्सवाद... कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो...
मैं पढ़ता ही जा रहा था,
लेनिन...भगत सिंह...गाँधी...बुद्ध...
माओत्से-तुंग, दलाई लामा...
नक्सलबाड़ी...
पढ़ रहा था, "द्रुत झरो हे जगत के जीर्ण पत्र !"
...'बदल राग'...
और, "जली ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक
बाल न बाँका कर सकी शासन की बंदूक "
और, "शान्ति नहीं तब तक, जब तक
सुख-भाग न नर का सम हो"...

पढते-पढते मैं 'आग' से भर जाता और
अपने अध्ययन-कक्ष नुमा छ: बाई आठ के कमरे में
एक ज्वलनशील क्रांतिकारी में मेरा 'मेटामोर्फोसिस' हो जाता !

मगर मैं, खिड़की के बाहर, जून की दोपहर की
कडियल में धूप में,
प्यास से मरते उस पागल बूढ़े को
पुचकार कर पानी पिलाने नहीं जा रहा था...,
नहीं जा रहा था, पुलिस की लाठी से
पिटते हुए आदिवासियों की पीठ सहलाने...
मैं नहीं समझा रहा था लोगों को "चुनाव" का
समसामयिक मतलब और मकसद !
मैं घर से नहीं निकल रहा था, उन जमीनी मुद्दों पर
न्याय के हक़ में झंडा बुलंद करने... जिन मुद्दों पर,
शाम को अपने पड़ोसी से रात के खाने के पहले
या चौक पर किसी परिचित से चाय-पान निपटाते हुए
जोरदार बहस किया करता था...

मैं पढ़ रहा था, और अपनी कलम माँज रहा था,
कुछ ऐसे कि तलवार "भांज" रहा था...
मैं कुछ नहीं कर रहा था, कि
(जबकि 'सूचना का अधिकार' कानून लागू हो चुका था !)
नरेगा, मनरेगा, इंदिरा आवास योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सडक योजना... आदि-आदि के
ठेकेदारों और बिचौलियों की कमर उनके दर्जी के अनुसार
ढाई से तीन इंच फैल गई थी...
एक पूर्व मुख्यमंत्री जनता के करोड़ों-अरबों रूपये पेल कर
पाँच-सितारा नर्सिंग-होम में "अभियुक्त-जीवन" का मज़ा ले रहा था !
राष्ट्रीय-घोटालों के जनपदीय प्रतिनिधि शान से राजपथ पर
लंबे-लंबे डेग भरते संसद की ओर जा रहे होते थे...
और विरोध की तमाम सरगोशियों को
गले में ही चाँप दिया जा रहा था...यह एक खामोश प्रक्रिया थी...

मैं जान रहा था, पर निष्क्रिय था...
मैं सम्पादकीय-पृष्ठ पर लेख भेज कर तुष्ट था...
मुझे मालूम था कि मैं क्रांतिकारी था, बहादुर था...मैं घोर अध्ययनशील था...!
और इसी विद्वता से पैदा हुई
ठण्डी-निस्तेज-कागज़ी विप्लव के खेल में
अपने मुँह-मियां-शेर था !

आम आदमी सड़क पर
दफ्तर में...बाज़ार में... सभाओं में...
मेरे घर के सामने... जब भी मुझे पाता,
कई बार मेरी ओर से हतोत्साहित हो चुका रहने के बावजूद
बड़ी उम्मीद से
मुझे टोहता-टेरता रहता था,
मैं कुछ करूँगा...
कि में चीजें बदल दूँगा...
'एक पत्थर तबियत से उछालूँगा और आसमान में
सुराख़ कर दूँगा !"
एक झंडा, एक बैनर, एक पोस्टर लिए निकल
पडूँगा... "बेहतर के लिए बदलाव" जैसे स्लोगन के शीर्षक वाले
पैम्फलेट, हैण्डबिल, पर्चे गली-गली घूमकर, चौकों पर लोगों
में बाँटूँगा...!

आम आदमी को मुझसे कई सारी अपेक्षाएं थीं...
उसे मुझ पर आस्था यह थी कि
मैं ताकतवर हूँ...
क्योंकि मेरे पास किताबे थीं...
मेरी ऊपरी जेब में कलम खुँसी रहती थी...
और नाक पर एक अदद ऐनक !

लेकिन मैं अपने "खोल" में सुरक्षित होने का भ्रम लिए
उसको ठेंगा दिखा रहा था...

वह आम आदमी मुझे - "दादा"...कहता था,
और मैं बेशर्मी से उम्मीद किया करता था
कि वह मुझे 'कॉमरेड" कहे !

रविवार, 19 दिसंबर 2010

और वह प्रकट में कहीं नहीं होती !

पूरा ब्यौरा इस तरह है...

समूचे आकाश पर
चमकीले सफ़ेद बादल
फैले थे... क्षितिज के ओर-छोर
साँसें तेज-तेज चल रही थीं और
दिन रोजाना की तरह पल-दर-पल
बीतता जा रहा था...
बहुत सारे घटितों को इतिहास में दर्ज़ करता हुआ

कोई संवाद
लगातार अपने ही अंतस की सुंरगों में
गूंजता जा रहा था... जिसका अर्थबोध
इसलिए नहीं हो पा रहा था
कि अभी इसकी भाषा नए सिरे से चिन्हित की जानी बाकि थी...
क्योंकि सारे शब्दकोशों से आम आदमी की
शब्दावलियाँ सेंसर कर दी गयीं थी,
इसे 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' से संभावित आसन्न खतरे
के मद्देनज़र किया गया था !

आदमी ना प्रेम को कह सकता था, ना पीड़ा को...!
तो विरोध किस प्रकार करता ?
मूक विरोध तो भोंथरे औजार के समान हुआ !
और इसलिए चोटिल आदमी को हाशिए पर डालने की प्रथा
कई दिनों से चालू थी...
व्यवस्था और सत्ता
के वास्ते
आदमी का मुखर होना बड़ा खतरनाक जो था !

वह एक परछाई सी थी, जिसमें मैं सिमटता जा रहा था...
मेरे होने को एक साथ स्वीकारता
और नकारता भी, यह समय...
तेजी से अतीत में ढलता जा रहा था
एक रौ में...
दहकते हुए सीने और
यहाँ से हजारों मील दूर समुद्र की लहरों में
एक ही लय थी !

मैंने बाग़ की झाड़ी में से
उसे ढूँढ निकला था
जो कल की मुलाकात के बाद
फूल बनकर झड गया था...
और अक्सर ऐसा ही होता था...
और मैं अक्सर उस क्षण के बाद सोचता था इस पर...
मेरे पाने और पाकर खोने का पूरा 'प्रमेय' यही है !

इन सब ब्यौरों में
कहीं उसका जिक्र साफ़-साफ़ नहीं है
ठीक इसी तरह कि,
मेरे होने के ठीक बीचों-बीच उसका होना भी
स्पष्ट नहीं है ! पर वास्तव में वो तो है ही...
मेरे ही भूगोल में छिपा हुआ...!

कई सारी सच्चाईयों के बीच
कोई बात नए तरीके से कहने के लिए
चेहरे पर तनाव का निशान बनना अपरिहार्य होता है !
बिल्कुल वैसे ही जैसे
मेरे और उसके संबंधों का
ब्यौरा लिखने के लिए
एक अव्यक्त वेदना की
मरणान्तक टीस सहनी होती है... बार-बार
और वह प्रकट में कहीं नहीं होती !

यहाँ "वह" का तात्पर्य -- प्रेम या पीड़ा या दोनों--
आप स्वयं लगा लें, इसकी छूट है !
और यह भी जानने की, समझने की, कोशिश करें
कि जो भी था, ऐसा क्यों था ?

मैंने बस अपना ब्यौरा समेट लिया है !

बुधवार, 24 नवंबर 2010

मेरी कविता में वह सब क्यों नहीं था

क्या ऐसा नहीं होगा कि, कल को आप लोग पूछेंगे -
तुम्हारी कविता में फूल क्यों नहीं थे... ?
बादल और हरियाली...
आईने और सुंदरता...
उन तमाम मादक गंधों की बातें और मुलायम देह...
मांसल आसक्ति और चुम्बन-आलिंगन...
आदि-आदि...
गायब क्यों थे ?

लड़कियाँ थीं, मगर...
बारिश थी, मगर...
खेत और नदी थे मगर...
चिड़ियाँ थीं, मगर...
बदन की जुम्बिशें थीं, मगर...
प्यार भी 'वैसा' नहीं था... !
कुछ भी तुमने 'वैसा' नहीं रखा था...
जो हमारी सोच, स्वाद और आदतों में शुमार रहा आया था...

ऐसा क्यों था...
शायद इसको समझाने के लिए
मेरी वही कविता नाकाफी
होते हुए भी
बहुत मजबूत 'स्टेटमेंट' होगी
कि मेरी कविता के समय में
यह सब अप्रत्याशित रूप् से नहीं
बल्कि एक तय साजिश के तहत
कारतूस, बारूद, खंजर, त्रिशूल, चाकू-गुप्ती,
भाला और भाषा, रस्सी-फंदा, ज़हर-गैस, पूँजी-नीति, विकास का मॉडल...
सांठ-गाँठ, दलाली, बेहयाई और भ्रम इत्यादि के पैदा किये हुए
दलदल की तलछट में चेप दिए गए थे...

मैं इन्हें (उपरोक्त प्रथम सूची के तत्वों, जिनके नहीं होने के लिए आप भविष्य में शिकायत करेंगे)
कविता में, जितनी तड़प, खुशी और शिद्दत से देखना चाहता था,
हर बार उपरोक्त दूसरी सूची के तत्वों की अधिक तीव्रतर उपस्थिति के कारण
बेबस, विकल्पहीन और मायूस हो जाता था...

इसलिए क्षमा करें... कि ,
मैं अपनी कविता में कोई भी सुन्दर चित्र टांक नहीं पाया !
अक्सर सत्य के आवेग से मेरी उंगलियाँ थरथराती थीं और
कल्पनाशीलता अनुर्वर हो गयी थी...
जो सच था, मेरी जमीर के सामने,
बिना लाग-लपेट के बयान हो गया...

बदहवास भागता आदमी हर बार...
ठीक मेरी नाक की सीध में आ जाता था... बिलबिलाकर मर जाता था...
अपने हक़ को भीख की शैली में माँगता हुआ और
मैं फूल-पत्ती-मादा
के सारे प्रचलित मुहावरों और सन्दर्भों से कट जाता था !

यकीन मानिये, यह केवल मेरा नहीं, उस समय...
मेरे सभी समकालीनों का समान साहित्यिक प्रारब्ध था...

रविवार, 21 नवंबर 2010

घाव

एक घाव है...
मारे डर के,
जिसका दर्द मैं दिमाग के हाशिए पर डालना चाहता हूँ
और गौर-तलब है कि, ऐसा करने की कोई राह भी नहीं सूझती...
वह घाव बदन के उस हिस्से में खुदा हुआ है
जिसके ठीक नीचे का अवयव
रक्त को पूरे शरीर में दौडाते रहने की क्रिया में संलग्न है
और बिना पूछे धडकता रहता है...ढीठ सा...
जब मैं नींद में शिथिल होऊँ... तब भी !
दिमाग के साथ यही तो खटता रहता है...
और सबसे ज्यादा मार इसी को लगती है... अंदरूनी तौर पर...

यह जिस घाव की मैं बात
(बगैर यह फ़िक्र किये कि यह किस्सा आपको उबाऊ भी लग सकता है)
कर रहा हूँ...
यूँ ही अचानक किसी चोट से पैदा नहीं हुआ !
यह घाव चेतना के रंदे से अपने आप को तराशे जाते समय घटित हुआ...
और बना हुआ है तब से, या कहूँ और गहरा, और फैला है तब से
पूरे मेरे वजूद में फैल गया है...रिसता - टीसता हुआ,
जिसका केन्द्र कहाँ है, यह ऊपर ही उल्लेख कर चुका हूँ !

सारे बौद्धिक वैद्य लक्षण सुन लें...
इस घाव की टीस तब उभर जाती है...
जब अख़बारों में हत्या होती है, और बलात्कार के किस्से
'चाय-बिस्कुट' के साथ निगले जाते हैं...
फिर जब सारे संसाधन पूँजी की थैली के मालिकों-वारिसों-दलालों
के पेट में जमा कर लिए जाते हैं और बाकि अधिकांश लोग
भूख जैसी संगीन बीमारी से सड़क पर "ऑफ द रिकॉर्ड" मर जाते हैं
पेट को हाथ से भींचे हुए...मरते हुए... उस दर्द को घटा पाने के इरादे से, मगर नाकाम !
और खबरनवीसों को इसकी "खबर" नहीं होती ! चूँकि यह मसला 'बाजारू' नहीं होता है !
तब जब स्कूल जाती या कॉलेज में चंद दिनों पहले दाखिल हुईं लड़कियाँ
अचानक मंडपों में
किसी औजार, करेंसी नोट के पुलिंदे या गंवार बैल के साथ
मुंडी झुकाए गिन-गिन कर सात चक्कर लगाती हुई पाई जाती हैं
और तब जब मरता हुआ आदमी आज का सबसे बड़ा कमाऊ विज्ञापन
बन कर खबरिया चैनलों पर 'चौबीस गुना सात' की पूरी अवधी में चिपका रहता है
और तमाम शर्म हमारी पेंदी से टपक चुके होते हैं...

और तब...और तब...और तब... गिनाने को कई सारे मौके हैं...
यानि इस घाव की टीस का स्थायीकरण हो गया है !

कुछ और लोग इस या इसी तरह के घावों को चाटते, सहलाते या
'तमगे' की तरह फक्र से टांगे हुए
या भिखारी की हथेली की तरह दयनीयता का रूपक बनाते पाए जा सकते हैं...
वह हर तरह की जिम्मेदारी की हद से बाहर के होते हैं...
और महज एक सफल या महत्वाकांक्षी उद्यमी की तरह इसका विज्ञापन करते रहते हैं...
वह और बात है कि मैं उनकी जात-बिरादरी से बाहर हूँ... और गनीमत है !

घाव में इकठ्ठा हुआ मवाद कभी-कभी उछल कर मुँह में भी भर जाता है
और मैं उसे थूक कर उससे कुछ देर के लिए मुक्त हुआ मान लेता हूँ...
मगर फिर वह कसैला-कडुवा स्वाद मेरे स्नायुओं में बहते रक्त में मिल जाता है
और 'नमक' में बदल जाता है...जो बे-ईमान हो नहीं सकने से मजबूर है !

ऐसे समय में मैं कुछ ज्यादा ही चौकन्ना हो जाता हूँ... चुपचाप बकता रहता हूँ...
और उँगलियों पर घड़ी की तरह समय काटने लगता हूँ...

मैं भी तो इस समय इस घाव की व्याख्या करते हुए
शाब्दिक कलाबाजी करते हुए आखिर एक खेल ही तो खेल रहा हूँ...
जबकि भरसक इससे बचने की कोशिशें की हैं...
उफ़, कितना हिंस्र हो गया हूँ मैं...
कितना बर्बर हो गया हूँ... जिसे
सभ्यता की परिभाषा गढ़ने वाले
मस्तिष्कों के भ्रम की आड़ में विकसित किया गया है... यह भी एक किस्म की
शराफत के रैपर में लिपटी चालाकी है...
और इसलिए विपणन का इरादा नहीं होने पर भी... कहीं बिक भी जा सकता हूँ... इन शब्दों सहित मैं !

लो, इतना कुछ बताते-सुनाते-कुरेदते...
इस दौरान कब फिर से वह घाव टीसने लगा है...
और मुझे मालूम हैं, फिर किसी गडबड से उपजा है यह दर्द,
जिसे दिमाग के हाशिए पर डालना है मुझे...
यह दर्द, जो कतई किसी किस्म की मक्कारी नहीं है !

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

लड़ाई

बहुत साफ़ नहीं कहा था उसने
कि लड़ाई में (अब) तुम भी हो...
यह जो चल रहा है, बकायदा एक जंग है...
और इसमें तुम भी
शामिल हो दिन रात की तरह
जिस जगह अभी मैं हूँ, बहुत जल्द तुम भी वहीँ होगे...
अब तक बेखबर थे... चोट खाते थे...
चोट करने वाले हाथों को पहचानते थे, तो...
अभी अपने औजार - हथियार सब
इकठ्ठे करो... अभी, बिल्कुल इसी समय...

ढोर भी अपने बचाव के लिए सींग मारता है...

लड़ाकू बन जाओ
तुम्हारे सामने विकल्पों की कोई तालिका
नहीं है
और इतनी मोहलत भी नहीं कि
तुम इस युद्ध से
परे कुछ और संभावनाओं को तलाशो...
युद्ध तुम पर सीधे-सीधे थोपा गया है...
और तुमको अपनी आत्मरक्षा का पूरा हक़ है !
क्योंकि डार्विन का सिद्धांत
इसी फलसफे पर था...कि,
वही बचेगा जो
लड़ाई लड़ने, लड़कर जीतने की
सामर्थ्य रखता होगा...

तुम उस तरह के हो जिनके पास
भूख सुलगते हुए अंगार की तरह है
सपने राख की सफेदी हैं
उम्मीदें बर्फ के गट्टे हैं
हरियाली तुम्हारे पैरों के नीचे से खींची जा रही है
और उजाले तुम्हारे आकाश से पोंछ डाले जा रहे हैं...
तुम जितनी दूर देख सकते हो-
समर की जमीन ही देख रहे हो...

तुम्हें हक़ के लिए
प्रेम के लिए और आदमी की तरह जी सकने के लिए,
दुःख जैसा कड़वा काढ़ा
हलक से उतारने के लिए
अपनी भावी पीढ़ियों के वास्ते
बेहतर धरती के लिए... लड़ना ही होगा...
लड़ने के लिए सारी ताकत और सारे इरादे
पुख्ता कर लो...
लड़ो... लड़ो बेदम होने तक
या फिर जीतने तक...

इतना साफ़ नहीं कहा था उसने
यह सब !
सिर्फ़ उसे उस बंद कमरे की तरफ
घसीटे जाते हुए देखकर हमारी चेतना में
एकाएक बिगड़ी हुई मशीन के शोर की तरह
घटने लगा... .खतरे की घंटी सा बजने लगा... यह सब...

कमरा, जो ठीक हमारे सामने था,
की मोटी दीवारों और
मज़बूत लोहे के दरवाजे के पीछे
आध - एक घंटे पहले लाया गया
वह इक्कीस-बाईस साल का लड़का
बुरी तरह पीटा जा रहा था
हम महसूस कर सकते थे कि
उसकी कमर और तलुवों पर
बहुत जोरों से डंडे मारे जा रहे होंगे
इस वक्त उसकी नाक से खून निकल रहा होगा
और बार-बार उसका सिर बालों से पकड़ कर
सीली दीवारों पर मारा जा रहा होगा...

शायद उसकी सब कराहें
अंतिम रूप से पूरी तरह से बंद हो जाने तक
वह इसी तरह बर्बरतापूर्ण ढंग से
पीटा जाने वाला था...

और कड़वी बात यह थी
कि, हममें से हरेक जानता था
कि उसने ऐसा कोई दोष नहीं किया है
कि उसे मार डालने तक
उसके हाथ पीछे बांधकर
नंगा करके, तेल चुपड़ी मोटी लाठियों,
सरकारियो कमरबंदों और घूंसों...
से उसे इतना मारा जाय... उसके नाखून उखाड़े जायं...
यौनांगों को क्षत-विक्षत किया जाय या...
गुदा में पेट्रोल डाला जाय...!

उसने सिर्फ़ इतना कहा था
कि वह उन आदमीनुमा लोगों का
सरमाया है, जिन्हें आदमी मानने
का कोई अधिनियम जारी नहीं हुआ है
जिनकी ज़मीन और जंगल
बहुराष्ट्रीय कंपनियों की अघोषित मिल्कियतें
बना देने की साजिशें रफ़्तार में हैं
जिनकी मिट्टी और पानी छीन गया है...
वह उनके लिए लड़ता है...

और इससे पहले कि वह
अपने कहे हुए की और अधिक व्याख्या करता,
तमाम तथ्यों और आंकड़ों से उसे साबित भी करता...
वह पकड़ा गया था...!

उसने यह सबकुछ बहुत चीख कर भी नहीं कहा था
हम फिर भी सुन पाए थे
हम वहाँ भीड़ की घेरेबंदी की शक्ल में मौजूद थे...

फिर इसके बाद उसकी आवाज हमको लगातार
सुनाई देती रही...
उसकी कराहों और मार की दहला देने वाली
तमाम आवाजों के बरक्स उसकी आवाज
आती रही...  
"लड़ाई में अब तुम भी हो..."  

वह नौसिखिया सा दिखता लड़का,
जिसकी अभी मूंछें तक कड़ी नहीं हुईं थी
मगर रीढ़ बेशक हो गयी होगी...
हम सिर्फ़ इतना जानते थे कि
वह मर जाने से खौफ नहीं खा रहा था...

और साथियों, अब हम...
(जो अपने को आदमी मानते और समझते हैं...)
उसकी कराहों के पूरी तरह बंद होने से पहले
अपने कन्धों पर एक बोझ सा महसूस कर
तिलमिला उठे हैं...
लड़ाई पता नहीं अब शुरू होगी
या, बहुत पहले से जारी है
जिसमें हमें अब शामिल हो जाना है...

२२-२३-२४/१०/२०१०

रविवार, 15 अगस्त 2010

बचा हुआ है कुछ (कविता)

हालाँकि,

तिलमिलाए हुए
(जंतुओं जैसे)
मनुष्यों के पास
यदि बचा हुआ है कुछ,
तो कौड़ी भर वफ़ादारी,
हर सुबह असलियत की गर्मी में भाप
होने से पहले
उम्मीद की ओस
और
बेतरतीब टूटे हुए नाखून...

झड़ते हुए बालों से
उम्र गिनते हुए
बचे हैं धुंधले होते हुए
अभी, बाबूजी जैसे लोग...
और चौराहे पर रोज 'नगर-बस'
की प्रतीक्षा करती प्रेमिकाओं
के पास बची हुई है
सड़क के परले तरफ
खड़े प्रेमियों पर
एक नज़र उछाल देने की फुर्सत...
तमाम चीजें, दूसरी चीजों में
कुछ-कुछ बच जाने की उम्मीद में
बची हुई हैं...
और आदमी भी...इसी तरह...

लगातार एक ही जगह
खा-खाकर चोट
जो लोग तिलमिला रहे हैं...
उनके खुले जख्मों को
नमकीन हवा सहला रही है
और भूख, महंगाई, घोषणाएँ, वायदे,
तानें, उनींदी रातें... उन नासूरों में ऊँगली
घुसेड़ रही हैं
तो उनके पास बची हुई है,
बीस डेसिबल से कम हर्ट्ज की मातमी रुदालियाँ...

बदहवास आदमी का
बदरंग चित्र हवा में टंगा है
और बराबर पीछा करता है
राजपथ की चौड़ी सड़क के किनारे...
गुहार लगता हुआ, कि उसे बचा लिया जाय

शोर अब भी बचा हुआ है
सिर्फ़ संसद ही नहीं, साप्ताहिक हाटों में भी
अमूमन देश के सभी शहरों में...
बुद्धिजीवियों की कनफोडू-कलात्मक बहसें
प्रेक्षागृहों की दीवारें जज्ब कर रही हैं
इधर बचे हुए लोग
नारों और लाठियों के बीच खप रहे हैं...

पायी हुई आज़ादी की  असलियत, रूख और सच्चाई पर
आज़ादी की दूसरी रात से ही बहस जारी है
बहस करने के लिए बची हुई है
आज़ादी... और,
अगस्त महीने का पन्द्रहवाँ दिन बचा हुआ है,
इसको पूरी श्रद्धा से याद दिलाने के लिए ! हर साल...

तथापि,

नए लड़के नयी फसलों की तरह
नया स्वाद लाने के लिए कटिबद्ध
हैं और
उनसे अपेक्षित है इसके लिए होना प्रतिबद्ध
नसों में बहता खून बचा हुआ है...
देह और आँखों का नमकीन पानी
बचा हुआ है...

सीमा पर,
लोकतंत्र की मरजाद पर
लड़ने-मरने
के लिए बचे हुए हैं सर
और अपने दानों को बाइज्जत चुगने का
हक़ पाने तक
पूरी लड़ाई बची हुई है
अभी...

बन्दूक के बरक्स
कलम उठाने के लिये उंगलियाँ
और कलम में असर तय करने के वास्ते
सधे हुए ईमानदार विचार... बचे हैं,
थोड़ी ही सही, कहीं ना कहीं
साफ़ नीयत भी बची हुई है...
उम्मीद बची है... इसलिए,
खुशनुमा तबियत बची है.

पुराने चाकू अगर हैं
तो नई कोंपलों का आना भी बचा हुआ है.

सचमुच बचा हुआ है बहुत कुछ...

रविवार, 8 अगस्त 2010

एक असंबद्ध कविता का ड्राफ्ट

रक्त की बूंदों से भी
ज्यादा शुद्ध संभावनाओं की
अवैध हत्या की जाती है...
हरदम ठीक उसी क्षण से ऐन पहले
जब उनके पनपने की तेज गुंजाइश हो
या तब, जब उनकी धार तेज हो जाने का खतरा
कनपट्टियों को सुर्ख करने लगे

फिर मातमपुर्सी के लिए
गाहे-बगाहे कुछ सभायें आयोजित कर ली जाती हैं
और संतोष की सारी प्रायोजित खबरें
आसपास बिखेर दी जाती हैं...

जब 'मैं', 'तुम' और 'हम'
जैसे पुरुषवाचक सर्वनाम
एक खराब मशीन के
कलपुर्जे बनकर रह गए हों
फिर भी नपुंसकता का पता ही नहीं चलता
क्योंकि ये
अवसरवाद के नए व्याकरण और परिभाषाओं में
संकरित हो गयी है.

ऐसे अवसरवादी कालखंड में
जब हर कोई अपने अवसर भुना रहा है
हथेलियों और तलवों की खुजली मिटा रहा है
कोई गा रहा है,
कोई रो रहा है
कोई धो रहा है,
तो कोई ढो रहा है!
मकसद सिर्फ़ लेने या पाने से है...
और पीढ़ी के ज्यादातर लोग
सिर्फ़ इसी फ़िराक में डटे हुए हैं...

शवों पर रोने के लिए कुछ बेचारगियाँ हैं
जिनकी शिनाख्त कोई बड़ा मुद्दा नहीं है...
लोकहित की घोषणाएँ सिर्फ़ खुशनुमां मुहावरे हैं...
जिनको दातून की तरह चबा कर थूका जाता है
ना कि गन्ने की मानिंद चूसा जा सकता है !

सीना तान कर चलने वाली आवारगियाँ
कम हुई हैं...
सारे हौसले बाजार खा गया है
शर्म आईने की तरह टंगा है दीवार पर
दाँत मांजने के बाद अपने चेहरे का धुला हुआ अक्स
देखने के लिए...
पश्चाताप मुँह पर से पानी पोंछने के बराबर है
शराफत असल में
गुसलखाने या पैखाने
के चारखानों तक ही सिमट गयी है...
क्योंकि पूरे बाहर,
सिर्फ़ जो नंगई है, उसकी तासीर गज़ब की है !
इसको पकड़ने वाली आँखों पर
संभाव्य अवसर की संभावना की टाट झूलती है...
अत: वह नजरंदाज कर दी जाती है.

सारी विभत्सता के बाद
गुलाब बाग़ का सरकारी संपोषित, संरक्षित
गुलाब खिलता महकता रहता है
निरपेक्ष सौंदर्य का नमूना पेश करता है...
वही, जिसका बाजार अनुमोदन करता है,
जिसका सत्ता अभिवादन करती है...

लाल रंग हमेशा पीछा करता है...! सलाम करता है...
खून में दिखता है...
जहाँ बहता है, अपना वक्तव्य भी देता है...
उसको पढ़ने वाली नजर पर भी
दरबारी "ब्राण्ड" की मलाई चढ़ी होती है !
यह अफसोसजनक होने से ज्यादा
घृणास्पद है...

धर्म, विचार और पवित्र जुनून
जैसी संकल्पनाएँ व्यावहारिक रूप से
बेवकूफ बनाने का
सबसे कारगर विज्ञापन हैं...
यह कहना क्षोभ पैदा करने के समान है कि
संकट का छायाभास
खड़ा करना बहुत जरूरी चीज हो गयी है.
ऐसा इसलिए कि
संकट के कई रूपों और व्यक्तिवाचक संज्ञाओं पर
माल बिकने की संभाव्यता बढ़ जाती है.

सवाल करना भी
विरोध करना है
और विरोधी हो जाना यथास्थिति की ढूह को ठोकर
मारना है
सारे अवसादों के बीच भी
यह उत्साह कई गुना बढ़ा देता है...
यथास्थिति को तोडना
दरअसल आदमी हो जाना है...

सवाल करना और संभावनाएं पैदा करना
बेहद जरूरी और जायज हैं...बेहद...

सोमवार, 26 जुलाई 2010

इस वक्त (लंबी कविता)

आने वाले समय के लिए
इस वक्त दो ही चीजें
हाथ में हैं...
धोखा खा जाने के बाद की मन:स्थिति...
और लगातार चोट खाती हुई आस्थायें
जिनको बचाए जाने की कवायद जरूरी है...
और जारी है !

जहाँ धोखा शब्द का दूसरा अभिधेयार्थ,
चूँकि, आज कल दो अभिधेयार्थों का दौर है !...
फलित निराशा है
और आस्था का,
आशा...!

बराबर चक्की के पाटों के
बीच घिसते-पिसते
अनाज की तरह...दिन
गुजर रहे हैं
जिनका गर्म स्वाद
और गंध बस
शुरू-शुरू में ही अच्छा लगता है.
कल्पना के हाशिए में जाने से पहले तक
और सारे उपक्रम यदि धराशायी ना हों तो ! ये दिन...
फिर बोसीदा भूतकालिक तारीखों में
बदल जाने के लिए...ही तो आते हैं

सत्ता और बाजार के समीकरण में
जो असंगत है,
वही... जिसे सारी ग़ुरबत और बेचारगी ढोने के बावजूद
गरीब नहीं चिन्हित किया गया,
आदमी...
धकिया कर मुख्यधारा से बाहर किया जा रहा है
उसके तमाम वैधानिक अधिकार, उसका वजूद, सपने
गर्त में औंधे मुँह पड़े हैं
वो चीख रहा है..., हक़ के लिए चिल्लाना
पोस्टर बनने जैसा है...
और नगरों-कस्बों में बहुत सारी स्त्रियाँ
मुक्ति के गीत गाते हुए
वापस कठपुतली बन जाने को नियत हैं...
इसे कौन तय करता है,
इस पर गौर किये जाने की जरूरत है.

तथ्य है कि, रचनात्मक पक्षधरता सवाल करती है
सवाल पैदा हो रहे हैं...पूछे जा रहे हैं...
इधर, कवियों की मेज पर
अर्थों के हाशिए से बाहर
खदेड़े गए शब्द लिथड़े हुए पड़े हैं...
और उन्हीं मेजों की दराज में
सूखी हुई दवातों की बोतलें और पन्ने
आदम-जात का पूरा
इतिहास, वर्तमान और भविष्य
सोखे हुए पड़े हैं...
वे सारे लेखक-कवि-फ़िल्मकार स्थितियों के
जाले साफ़ करने की परियोजना का हिस्सा हैं
सवाल तो किये जा रहे हैं... संदूकों और बंदूकों से...

इस समय भविष्य को
देखने वाली दूरबीन का 'फोकल'
कड़वे सच के कुछ बिंदुओं
पर चिपक गया है...
जिन्हें स्वीकार कर थूक निगलते ही
हिचकी आने लगती है...
सत्ता कांखने लगती है और
सांसद हिनहिनाने लगते हैं...
सारी बौद्धिकता परनाले में बहने लगती है
इसी मनोदशा में साबुन की टिकिया का
आखरी अंश ज्यादा झाग छोड़ने लगता है...
और घ्राणशक्ति इतनी प्रबल हो जाती है कि,
पत्तों पर गौरैया का गू भी बास मारने लगता है !

आस्था किसी टापू पर
बची हुई, प्रलय के बाद,
शताब्दियों की अवशेष, कोई अंतिम प्रजाति है...
वहीं के गिने-चुने लोग सत्ता और बाज़ार
के चुम्बकीय असर से
छूटे हुए हैं
और विकास जैसी चमकीली रौशनी के दायरे से
भी गायब हैं ! उनके सवालों
पर विज्ञापन नहीं कमाया जा सकता,
इसलिए उनके सवाल बाजार से गायब हैं
बाजार सिर्फ़ उन्हीं मुद्दों की लीद करता है,
जो उसकी ज़मीन की खाद बनने के लायक हैं...
इसी बाजारू शोर-सूत्र-समीकरण के बीच
ईमानदार और आदमी जैसे लोग, साबुत...
किसी टापू पर चले गए हैं और
उनकी सक्रियता हवा में बुदबुदाने भर हो कर रह गयी है !

यह भी हो रहा कि
तमाम फैसलों की सारी प्रक्रिया में से
बाहर जो आदमी खड़े किये जाते हैं,
उनकी जिंदगियों का चूल्हा
उन्हीं फैसलों के ईंधन पर निर्भर है...
फैसलों के समय इरादतन तवज्जो नहीं दिया जाता कि
इनकी रोटी-दाल का नमक
इन्हीं के पसीनों से ही तैयार होता है
और ज्यादातर उन्हीं की जीभ पर नहीं लगता, क्योंकि
कुछ इरादे साफ़ हैं...
बहुत सारे बेहद नापाक हैं !
दुनिया के सबसे पुराने एक देश में
प्रदेशों के बीच... आग और अंगारों की 'फेंसिंग'
करने की कवायद राजनीति का एक
जानदार हथकंडा हो चुका है...

समय के साथ
अडोस-पड़ोस की दीवारें, गलियाँ
चौराहे और मोहल्ले... बदले हुए
दिखाई पड़ते हैं...
दोस्त - सफलता का मंत्र बताते हैं,
वैद्य और बाबा - नपुंसकता का अचूक इलाज बांटते हैं...
सिनेमा में सच
ठेठ बलात्कार,
भूख और गरीबी
बेचने के इल्जाम के पार्श्व में बुना जा रहा है...
कला समीक्षकों को इसकी खबर कम है,
और आदमी मनोरंजन का ग्राहक है! बेवकूफी की हद तक...

आदमी...
धुँआ, नमक, आटा, वोट और ईमानदारी आदि
कारकों के बीच
"महँगाई-अम्ल" की प्रयोगशालाई प्रतिक्रया से
पूरा क्षरित हो चुका है
और केवल
मतदाता सूची में उसका दर्ज
नाम, लिंग और उम्र
बचा हुआ है...
उसका एक मात्र राष्ट्रिय दायित्व
चुनाव में
एक जैसे सूरत और सीरत वालों में से
किसी को भी चुन लेना भर है...
इसके बाद तमाम दुर्घटनाओं की खबरें पढते रहना है
 
लगातार गोलियों की आवाजों के बीच
नवजात की रुलाई जैसी कोई पैनी चीज कानों में
अक्सर भोंक दिया करता है कोई...
तुरंत, रिश्तेदार समझाते हैं कि आग में मत कूदना,
तुम्हारे पीछे बीबी है, बच्चे हैं,
मन में पिघला लावा परिवार की चौहद्दी में ही
खट्टा दही
हो जाता है !

लेकिन इसी वक्त
बराबर...
पगलाये हुए से नहीं दिखने वाले लोग
पागलपन की हद तक जाकर
पानी, आँसू, पसीना, बादल और... शर्म
जैसी तमाम गीलीं चीजों को बचाने में लगे हैं
यद्यपि उनकी मेहनत पारदर्शी हो गयी है...!
उनको सलाम करने का हौसला, जज्बा और सहूलियत
उनके काम से एक मुश्किल काम है ! इसलिए,

बाकि लोग समर्थक या निंदक की भूमिका में हो गए हैं...
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