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रविवार, 19 जुलाई 2020

स्वास्थ्य का मुद्दा अस्पतालों और डॉक्टरों का ही नहीं, राजनीति का मुद्दा है


कोविड 19 के सन्दर्भ में स्वास्थ्य सेवाओं के राष्ट्रीयकरण पर हुई वेबिनार 

           - राहुल भाईजी 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की मध्यप्रदेश इकाई द्वारा "भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के राष्ट्रीयकरण" विषय पर एक वेबिनार का आयोजन किया गया। वेबिनार का संयोजन जोशी अधिकारी इंस्टीट्यूट आफ सोशल स्टडीज द्वारा किया गया। वेबिनार में डॉ अभय शुक्ला (पुणे) राष्ट्रीय सहसंयोजक, जन स्वास्थ्य अभियान, ने अपनी बात रखते हुए कहा कि वर्ष 1986-87 में भारत की सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं निजी क्षेत्र की तुलना में ज्यादा थी, और 1000 मरीज में 400 मरीज ही  निजी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेते थे। तब से 2020 तक स्थितियां बिल्कुल विपरीत हो गई हैं।  अब बमुश्किल 40 फ़ीसदी  लोग सार्वजानिक स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाते हैं और शेष 60 फ़ीसदी को निजी क्षेत्र के अस्पतालों की शरण लेना पड़ती है। डॉ. अभय शुक्ल ने कहा कि  स्वास्थ्य पर खर्च के मामले में भारत दुनिया के कई मुल्कों के मुक़ाबले में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। भारत में प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर शासन द्वारा खर्च 19 अमेरिकी डॉलर  प्रति वर्ष किया जाता है जो फिलीपींस,  इंडोनेशिया और अफ्रीका जैसे देशों की तुलना में 3 से 4 गुना कम है, वहीं दूसरी ओर समाजवादी देश क्यूबा प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष  883 अमेरिकी डॉलर का खर्च अपने नागरिकों के स्वास्थ्य पर करके सबसे ऊंचे स्तर पर है। वर्ष 2019-20 में भारत में रूपये 1765 प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर औसतन खर्च किया जा रहा था, यानि मात्र रूपये 3.50 प्रति व्यक्ति प्रतिदिन का खर्च। उन्होंने कहा कि सरकार ने जैसे-जैसे सरकारी स्वास्थ्य खर्चों में कटौती करने के साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण को नीतिगत बढ़ावा दिया। देश के कुछ राज्य तो  सिर्फ निजी स्वास्थ्य सेवाओं के हवाले कर दिए गए हैं। जिसके चलते सामान्य स्वास्थ्य सेवाएं खुले बाजार की व्यवस्था में लूट का माध्यम बन गई हैं। स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ गए लोगों के निजी खर्च का नतीजा ये हुआ है कि देश में प्रतिवर्ष लगभग 5.5 करोड़ लोग गरीबी की खाई में गिरते जा रहे हैं।  वर्ष 2005 से 2015 के बीच निजी स्वास्थ्य सेवाओं का व्यापार औसतन तीन गुना बड़ गया। देश के शीर्ष 78 डॉक्टर्स ने एक सर्वे में बताया कि मुनाफाखोरी की चाहत ने निजी संस्थाओं को गैर तार्किक और अनुचित तरीके अपनाने की छूट भी ली जिससे निजी क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाएं बेहद मॅहगी हुई हैं। बहुराष्ट्रीय पूंजी भी इस क्षेत्र में अपनी भागीदारी बड़ाकर देश की जनता को लूटने तेजी से पांव पसार रही हैं। इस तरह सामान्य स्वास्थ्य सेवाएं सरकार द्वारा कारपोरेट घरानों को सौंप दी गईं और चुनी हुई लोकतान्त्रिक सरकारों ने ही देश की जनता को लुटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। निजी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को दवा, उपकरण और स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से देशवासियों को दोनों हाथों से लूटने की आजादी दे दी गई। हाल ही के कोविड महामारी के रोगियों से बड़ी निजी अस्पतालों द्वारा प्रतिदिन का  रुपये 1 लाख  से 4-5  लाख तक का खर्च वसूला जा रहा है। देश के लगभग सभी प्रदेशों में जिला और विकासखंड स्तर पर मौजूद अस्पताल संसाधन विहीन हैं, पर्याप्त स्टाफ, डॉक्टर्स नहीं हैं, जिससे कोरोना से मरने वालों की संख्या बढ़ रही है। सरकार को निजी क्षेत्रों के अस्पतालों में इलाज की कीमतों पर नियंत्रण के लिए सही तरीका इस्तेमाल करना चाहिए ताकि सभी को जीने के अधिकार से वंचित न किया जा सके। साथ ही सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को सुविधा  युक्त बनाने प्रति व्यक्ति का खर्च बढ़ाने चाहिए तो कोरोना महामारी से लड़ा जाना संभव होगा। ताकि उनकी रोजमर्रा की आम स्वास्थ्य से जुड़ी जरूरत पूरी हो सके। इसे मैं राष्ट्रीयकारन नहीं बल्कि सामाजिकीकरण कहना चाहूँगा। 

इंडियन डॉक्टर फॉर पीस एंड डेमोक्रेसी (आइडीपीडी) के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉक्टर अरुण मित्रा (लुधियाना) ने कहा कि स्वास्थ्य और शिक्षा हमारा संवैधानिक अधिकार है जिसे देश प्रत्येक देशवासी को सहजता से उपलब्ध होना चाहिए। देश की सरकार ने आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएं, जन स्वास्थ्य विभाग बनाने के बजाय मुनाफा कमाने वाली कंपनियों को खुली छूट दे रही हैं। सरकार को देश में विकेन्द्रित स्वास्थ्य सेवाएँ सहज रूप से उपलब्ध कराना चाहिए एवं साथ ही निजी क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं का राष्ट्रीयकरण बेहद आवश्यक हो गया है। जैसा कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था जो आज भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए जीवनदायिनी बनकर उभरे हैं, उतना ही महत्वपूर्ण देश के नागरिकों का स्वास्थ्य है। समय की आवश्यकता है कि सभी निजी स्वास्थ्य सेवाओं का राष्ट्रीयकरण हो। उन्होंने बताया कि किस तरह उनके संगठन द्वारा राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं का मुआयना करते हुए पाया गया कि सरकारी नीतियों की खामी के चलते निजी अस्पतालों में एक बहुत बड़े तबके के इलाज ना कर पाने से  उन्हें मौत का सामना करना पड़ता है। देश के राजनीतिक दलों द्वारा स्वास्थ्य एवं शिक्षा  पर कोई ध्यान ना देने से देश की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गई है। वेबीनार को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा आयोजित किये जाने पर उन्होंने खुशी जाहिर की और कहा कि यह बहुत अच्छी बात है कि किसी राजनीतिक दल ने स्वाथ्य सेवाओं को राजनीतिक मुद्दे की तरह देखा है।  स्वास्थ्य सेवाएँ कैसी हों, यह एक राजनीतिक सवाल है और जैसी राजनीती देश पर शासन करेगी, वैसा ही हाल स्वास्थ्य सेवाओं का होगा। उन्होंने यह भी कहा कि स्वास्थ्य का सवाल केवल अस्पतालों और डॉक्टरों से जुड़ा हुआ नहीं है. इसमें बड़ी भूमिका दवा कंपनियों की भी है।  आपको हैरत होगी कि उदारीकरण के दौर में सरकारी क्षेत्र की दवा निर्माण करने वाली कम्पनियाँ बंद कर दी गईं। स्वास्थ्य का सवाल बुनियादी रूप से साफ़ पानी मुहैया करने, उचित सीवेरज व्यवस्था उपलब्ध कराने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने से जुड़ा है।  हमें समाज ऐसा बनाना चाहिए जहाँ लोग ावाल तो बीमार पड़ें ही नहीं और अगर किसी वजह से कोई बीमार पड़े तो उसे ये फ़िक्र न हो कि पैसे कहाँ से आएंगे या डॉक्टर सही इलाज कर रहा है या लूट रहा है। इसके लिए हम सरकार से आइडीपीडी की ओर से राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग बनाने की मांग करते आ रहे हैं। 

डॉक्टर माया वालेचा गुजरात  के भरूच में एक सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता हैं और समाज के गिरते मानवीय मूल्यों और सामाजिक संबंधों को बेहतर बनाने के लिए काम कर रही है। वेबिनार में अपना वक्तव्य रखते हुए उन्होंने कहा कि आज देश की जो स्थिति है उसके पीछे एक वजह राजनीतिक दलों की राजनीतिक इच्छाशक्ति का बेहद कमजोर होना भी है। कोविड महामारी में देश की गरीब जनता, मेहनत करने वाले श्रमिक केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा उपेक्षित हुए हैं। प्रवासी मजदूरों को हजारों किलोमीटर पैदल चलना पड़ा, परंतु रास्ते में स्वास्थ्य केंद्रों के अभाव के चलते कईयों को अपनी जान गवाना पड़ी, जिनमें महिलाओं की दुर्गति किसी से छिपी नहीं है। नीति निर्माताओं ने ऐसे हालात में निजी स्वास्थ्य सेवाओं की कोई जवाबदारी तय नहीं की। देश की बहुमत आबादी को सरकार द्वारा प्रदत्त स्वास्थ्य सेवाओं का कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। कोरोना से बचाव कराने वाले स्वास्थ्य कर्मी, स्वयं की सुरक्षा सामग्री के अभाव में काम करने को मजबूर किए गए। सफाईकर्मियों को जान जोखिम में डालकर काम करने को मजबूर किया गया, स्वास्थ्य कर्मियों को समय पर उनकी तनख्वाह नहीं मिल पाई जिसके चलते कोरोना मरीज उपेक्षा का शिकार होते रहे, परंतु सरकार उनकी समस्याओं की अनदेखी करती रही है। वे कहती हैं कि देश में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भयावह है। जिसे एक चेतनशील राजनीति समाधान से बेहतर किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोविड-19 को अपने व्यापारिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने में बिल गेट्स और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन, जो दुनिया में वैक्सीन के क्षेत्र में काम करने वाला सबसे बड़ा कॉर्पोरेट है, कोविड की वैक्सीन बनाकर मुनाफे की होड़ में हैं। स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का राष्ट्रीयकरण किये बिना, या जिसे सामाजिकीकरण भी कहा जा सकता है, इन सेवाओं को उन्नत नहीं किया जा सकता लेकिन साथ ही राजनीतिक हल की भी बेहद आवश्यकता है। 

कार्यक्रम के संयोजक विनीत तिवारी ने कहा कि बेशक स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सवाल राजनीतिक सवाल हैं इसीलिए हम देख सकते हैं कि जहाँ भी सरकारें जनता के लिए फिक्रमंद हैं, वहाँ कोविड 19 का कहर कम टूटा है।  क्यूबा और वेनेज़ुएला जैसे देशों की स्वास्थ्य सुविधाएँ दुनिया में श्रेष्ठ मानी जाती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बिल गेट्स और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन जब अपने बनाये वैक्सीन का प्रयोग करेगी तब भी गरीब एशियाई और अफ़्रीकी देशों की जनता को ही उनके कहर का शिकार होना पड़ेगा। उन्होंने यह कहा कि  भारत और अमेरिका में एक स्वास्थ्य सम्बन्धी आपदा का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक स्थित्ति को मजबूत करने और आपदा का डर दिखाकर लोगों से विरोध और प्रतिरोध के सभी तरीकों को छीन ेने में किया जा रहा है।  वरवर राव के सन्दर्भ से उन्होंने कोविड 19 की आड़ में सर्कार द्वारा किये जा रहे राजनीतिक दमन को रेखांकित किया और कहा कि राजनीतिक दलों को अनेक मोरचीन पर लड़ना होगा।  सभी वक्ताओं का आभार मानते हुए कहा कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी शिक्षा एवं स्वास्थ्य के सवालों पर सही मायनों में एक ऐसा राजनीतिक दल है जो शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के खिलाफ शुरू से ही रहा है और अपना विरोध दर्ज कराया है। यही वजह है कि आज इस वेबिनार का आयोजन किया गया। मप्र इकाई के पार्टी राज्य सचिव कामरेड अरविंद श्रीवास्तव ने स्वास्थ्य सेवाओं का संज्ञान लेते हुए वक्ताओं के प्रभावशाली  वक्तव्य और प्रस्तुति के लिए धन्यवाद दिया और कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं के राष्ट्रीयकरण के मसले पर  प्रदेश के अन्य संगठनों से बात करने के बाद आंदोलनात्मक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे और स्वास्थ्यकर्मियों को संगठित करके प्रदेश ही नही बल्कि देश की जनता के सामने इस लड़ाई को मजबूत करने का आव्हान किया जाएगा।
वेबिनार हिंदी में था अतः मध्य प्रदेश के साथ ही दिल्ली, गुजरात, बंगाल, पंजाब एवं अन्य हिंदीभाषी राज्यों के उत्सुक और रुचिवान लोग शरीक हुए और सवाल जवाब का दौर भी हुआ। 
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रविवार, 27 अक्टूबर 2019

चीन: ग़रीबी मुक्त भविष्य का स्वप्न



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                 - हरनाम सिंह

24 अक्टूबर, 2019, इंदौर (मध्य प्रदेश)। 

प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई द्वारा "चीन गरीबी मुक्त भविष्य का स्वप्न" विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया। आयोजन के प्रमुख वक्ता थे प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी जो विगत दिनों चीन में 7 देशों के राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए आयोजित दस दिवसीय कार्यशाला में शिरकत करके लौटे थे । उन्होंने श्रोताओं के सम्मुख अपने अनुभव साझा किए । विनीत ने बताया कि भारत से सीपीआई, सीपीआई (एम) और फॉरवर्ड ब्लॉक के 8 सदस्यों का प्रतिनिधि मंडल इस 10 दिवसीय कार्यशाला में शामिल हुआ था। भारत सहित पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, म्यानमार, पूर्वी तिमोर और मलेशिया के कुल 38 राजनीतिक प्रतिनिधि इस 10 दिवसीय कार्यशाला में सम्मिलित हुए थे।
विनीत ने कहा कि चीन ने योजनाबद्ध तरीके से अपने देश में गरीबी कम करने में सफलता प्राप्त की है । वर्ष 2012 में चीन में क़रीब 10 करोड़ नागरिक गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करते थे ।अपनी योजनाओं के माध्यम से वर्ष 2018 तक चीन ने गरीबी पर नियंत्रण पाने में सफलता प्राप्त की है। अब वहां गरीबों की संख्या घटकर 1 करोड़ 70 लाख ही रह गई है, इसे संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी स्वीकार किया है।
विनीत ने बताया कि वर्ष 2010 से चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रही है । वहां की कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस में वर्ष 2020 तक गरीबी कम करने के लक्ष्य को लेकर योजनाएं बनाई गई जिसके अंतर्गत ग्रामीण अंचलों और शहरों के मध्य सामंजस्य बिठाया गया । प्रत्येक गांव की आवश्यकता के अनुसार  वहा अधिकारी और विशेषज्ञ भेजे गए। पर्यवेक्षण के लिए कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता गांव में जाकर वर्षों तक रहे । उन्होंने पार्टी और प्रशासन के मध्य एक तंत्र विकसित किया, दोनों एक दूसरे की कमियों को पहचान कर विकास योजनाओं को क्रियान्वित करते है।

चीन ने 2012 में अपने देश में 1लाख 28 हजार ऐसे गांव चिन्हित किए जो सरकार के मापदंड अनुसार गरीब थे। इन गांव में 5 लाख 40 हजार अधिकारियों, कर्मचारियों तथा 1लाख 88 हजार पार्टी कार्यकर्ताओं को भेजा गया । यह सभी लोग 3 से 4 वर्ष तक गांव में ही रहे । वर्ष 2018 तक अब मात्र 26 हजार गांव ही ऐसे बचे थे जिन्हें विकसित किया जाना है। भारत की तरह चीन में भी गांव की योजनाओं के लिए वहां की ग्राम सभाओं में ही पूछा जाता है। उन ग्राम सभाओं में 50% महिलाओं की उपस्थिति सुनिश्चित करने की कोशिश की जाती है।

चीन " वन बेल्ट वन रोड "नीति के अंतर्गत कई अफ्रीकी एशियाई देशों में अधोसंरचना निर्माण के लिए निवेश कर अपने व्यवसाय को विस्तारित कर रहा है ।जो काम अमेरिका अपनी दादागिरी से करता है वही काम  चीन गरीब देशों में आर्थिक इंफ्रास्ट्रेक्चर को विकसित करके उन देशों में रोजगार बढ़ाकर उन्हें अपने खेमे में लाकर कर रहा है। भारत अपनी सामरिक एवं सीमा संबंधी समस्याओं के कारण चीन की इस योजना में शामिल नहीं है । 

अर्थशास्त्री जया मेहता ने चीन के समाजवादी मॉडल के आकलन की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि चीन जो उपाय अपना रहा है वह पूंजीवाद व्यवस्था के भीतर कल्याणकारी राज्य के उपाय हैं। माओ की विचारधारा से चीन अलग हो चुका है। गरीबी कम करने से बड़ा सवाल ये है कि समाजवादी व्यवस्था में गरीबी रहनी ही क्यों चाहिए। निजी सम्पत्ति को अभी तक कायम रखा गया है लेकिन पार्टी का सख्त अनुशासन वहाँ जारी है।

हरनाम सिंह ने विकासशील और गरीब देशों में  तत्कालीन सोवियत संघ एवं वर्तमान चीन द्वारा दी जा रही मदद के स्वरूप पर सवाल उठाए । सत्यनारायण वर्मा ने चीन के भीतर धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति के बारे में सवाल किए, चुन्नीलाल वाधवानी ने चीन के वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट पर सवाल किए। राहुल बनर्जी ने चीन में हो रहे अत्यधिक उत्पादन और वहाँ के लेबर और वर्किंग कंडीशन के बारे में सवाल किए। संजय वर्मा, शैला शिंत्रे ने भी परिचर्चा में भागीदारी की। 

सवालों के जवाब देते हुए विनीत ने कहा कि पूँजीवादी व्यवस्था में आए विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के दौर ने चीन को अपने विपुल मानव संसाधन की वजह से यह अवसर दिया है कि वह आज दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इस अवसर से हो रहे मुनाफे का इस्तेमाल चीन किस तरह करता है इससे ही भविष्य में तय होगा कि चीन के विकास का रास्ता पूंजीवाद की तरफ जाता है या समाजवाद की तरफ। आज रूस एक पूंजीवादी देश है लेकिन वैश्विक स्तर पर अमरीका उसे आँख नहीं दिखा सकता। वैसे ही चीन अमरीका के सामने एक बड़ी ताकत बनकर मौजूद है। बेशक चीन का समाजवाद शास्त्रीय अर्थों में समाजवाद नहीं कहा जा सकता लेकिन एक बहुध्रुवीय विश्व का होना एकध्रुवीय विश्व के होने से बेहतर है। दस दिन में एक गाइडेड टूर के तौर पर निष्कर्ष निकालना गलत होगा। ये जरूर कहा जा सकता है कि अपने देश के गरीबी खत्म करने के उसके गम्भीर प्रयासों को अगर कामयाबी मिली है तो उसके पीछे एक करोड़ की समर्पित कैडरों की कम्युनिस्ट पार्टी की बहुत बड़ी भूमिका है।

कार्यक्रम का संचालन समन्वयक केसरी सिंह चिराड ने किया। आभार माना प्रगतिशील लेखक संघ इकाई के अध्यक्ष एस के दुबे ने। परिचर्चा में अभय नेमा, अजय लागू, सुलभा लागू, सारिका श्रीवास्तव, सुरेश उपाध्याय, सोहनलाल शिंदे, प्रणय, सूरज एवं अन्य साथियों ने शिरकत की। 
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गुरुवार, 4 अगस्त 2016

क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कहोगे

प्रेमचंद जयंती पर प्रलेस इंदौर ने किया नाटक और परिचर्चा का आयोजन
- अभय नेेमा
इंदौर। प्रेमचंद की कहानियों का रचनाकाल कोई 70 साल पहले का है और उनकी कहानियां आज भी समीचीन हैं। प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में सांप्रदायिक सद्भाव और दलित उत्पीड़न के जिस मसले को उठाया था वह आज भी समाज में मौजूद हैं। प्रेमचंद ने अपने समय में दलितों की सामाजिक और आर्थिक बदहाली का जिक्र किया था वह आजादी के बाद भी न केवल बनी हुई है अब उसे और पुख्ता करने का प्रयास किया जा रहा है। यह बात प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य और स्वतंत्र पत्रकार जावेद आलम ने महान उपन्यासकार और कहानीकार तथा प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक प्रेमचंद की जयंती पर 31 जुलाई को आयोजित कार्यक्रम में कही। प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई ने वर्चुअल वोयेज कालेज के सहयोग से प्रेमचंद की कहानियों के नाट्य रूपांतरण और प्रेमचंद के कृतित्व पर परिचर्चा आयोजित की थी।
वर्चुअल वोयेज कालेज में आयोजित इस कार्यक्रम में जावेद आलम ने कहा कि पंचपरमेश्वर में सांप्रदायिक सदभाव की मिसाल मिलती है तो कफन और ठाकुर का कुआं जैसी कहानियों में तत्कालीन समय में दलित समुदाय की दुर्दशा का वर्णन मिलता है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि समाज की विसंगतियों के देखने के लिए उन्हें गांव जाना चाहिए और हमारे देश की बुनियादी समस्याओं को समझने के लिए उन्हें प्रेमचंद के साहित्य का पठन जरूर करना चाहिए जो कि इंटरनेट पर उपलब्ध है।IMG-20160804-WA0061.jpg दिखाया जा रहा है
कहानीकार रवींद्र व्यास ने कहा कि प्रेमचंद की कहानियां व्यक्ति विशेष का दर्शन नहीं है, बल्कि उस वक्त की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था पर तीखी टिप्पणी है। प्रेमचंद अपने कथा संसार में बड़े रचनात्मक ढंग से प्रगतिशील विचार का प्रतिफलन करते हैं। कफन में वे जमींदारी और सामंतवादी व्यवस्था में एक दलित व्यक्ति का अमानवीयकरण देखते हैं। इसी तरह से पंच परमेश्वर में वे न्याय प्रक्रिया को जाति और धर्म के बरक्स देखते हैं। पंच की कुर्सी पर बैठने वाला किस तरह से किसी जाति और धर्म का न होकर सिर्फ न्यायाधीश रह जाता है आज के संदर्भ में प्रेमचंद द्वारा यह सत्ता द्वारा न्यायिक व्यवस्था का इस्तेमाल करने पर तीखी टिप्पणी है। इसी तरह से ईदगाह नामक कहानी में एक बच्चे का बाजार के प्रति प्रतिरोध दिखाई देता है। उसे बाजार के सारे प्रलोभन खिलौने, मिठाइयां, कपड़ों, झूलों के बजाए अपनी दादी के हाथ जलने का ख्याल आता है और वह उनके लिए चिमटा खरीदता है। प्रगतिशील मूल्य प्रेमचंद की रचनाओं में नारे की तरह नहीं बल्कि नेरेशन में आते हैं। उनकी कहानियों उपन्यासों में नियंत्रित, संयमित करुणा व्यक्त हुई है।

इस अवसर पर वर्चुएल वोयेज के पर्फार्मिंग आर्ट विभाग के विद्यार्थियों ने प्रेमचंद की कहानी कफन और पंच परमेश्वर पर नाटक प्रस्तुत किया।
 विद्यार्थियों ने कफन और पंच परमेश्वर कहानी के मर्म को आत्मसात करते हुए अपने शानदार अभिनय, संवाद से लोगों का दिल जीत लिया। नाटकों का निर्देशन परफार्मिंग आर्ट विभाग के प्रमुख गुलरेज खान ने किया। नाटक का पार्श्व संगीत व कास्ट्यूम दर्शकों का ध्यान खींचने में सफल रहा।
 कार्यक्रम में प्रगतिशील लेखक संघ इंदौर के सचिव अभय नेमा, रामआसरे पांडे, उपाध्यक्ष चुन्नीलाल वाधवानी, हुकमतराय, सुरेश उपाध्याय, तौफीक, पीयूष भट्ट, भारत सक्सेना उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन इप्टा की इंदौर से जुड़ी सारिका श्रीवास्तव ने किया। आभार मानते हुए रामआसरे पांडे ने वर्चुअल वोयेज कालेज के प्रबंधन और विद्यार्थियों को सहयोग के लिए धन्यवाद दिया। 
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9977446791

उत्सव भी मनाएँ और चुनौतियाँ भी पहचानें

प्रगतिशील लेखन के अस्सी वर्ष
.भगवान सिंह निरंजन

प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के अस्सी वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर प्रगतिशील लेखक संघ ग्वालियर इकाई द्वारा प्रगतिशील लेखन के अस्सी वर्ष पर केन्द्रित आयोजन किया गया। यह 17 जुलाई 2016 को स्वास्थ्य प्रबंधन एवं संचार संस्थान सिटी सेंटर ग्वालियर में हुआ। आयोजन के आरम्भ में उज्जैन से आए युवा कहानीकार शशिभूषण ने अपने विचार अस्सी वर्ष की हिंदी कहानी पर केन्द्रित करते हुए कहा, हिंदी कहानी खडी बोली की हिंदी कहानी है और आज की तारीख में एक सौ सोलह वर्ष की हैे। एक सौ सोलह वर्ष की कहानी में हमें यह देखना जरूरी हैे कि किन कहानियों में प्रगतिशील तत्व हैं, किन कहानियों ने आन्दोलन पैदा किए, किन आन्दोलनों ने कहानियां पैदा कीं, किन कहानियों ने विमर्श पैदा किए। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता के लिए सज्जाद जहीर साहब ने जब प्रेमचंद से कहा तो उन्होंने तुरंत स्वीकार कर लिया, जिसके पीछे यह सोच था कि वह कहानियों के माध्यम से, साहित्य के माध्यम से बदलाव लाएंगे। निश्चित ही कहानी बदलाव के लिए सबसे अचूक, सबसे मारक और लगभग अंतिम बात होती है। आप गीत गा सकते हैं, गुनगुना सकते हैं, लेकिन अंत में हर चीज की कहानी होती है। प्रेमचंद की ‘नमक का दरोगा’ कहानी आज ईमानदारी और बेइमानी की कहानी नहीं रह गयी हैे, यह वैयक्तिक ईमानदारी के काॅरपोरेट के सामने पराजित होने की कहानी बन जाती है। इसी प्रकार काशीनाथ सिंह की ‘सदी का सबसे बड़ा आदमी’, विद्यासागर नौटियाल की ‘माटीवाली’ और अन्य कहानीकारों में मुद्राराक्षस, संजीव, शिवमूर्ति, और चंदन पाण्डेय की कहानियां समाज को आगे ले जाने के लिए, प्रगतिशील मूल्यों के प्रति कोई कोताही नही बरततीं। आज झूठ को सच बताने का पूरा अभियान चल रहा है। झूठ ही सच है। सच्ची कहानियां कहने वाले को कभी पुरस्कृत नहीं किया जाता,बल्कि दंडित किया जाता है।
दूसरे वक्ता के रूप में ग्वालियर के कथाकार राजेन्द्र लहरिया ने विचार व्यक्त करते हुए कहा, बहुत महत्त्वपूर्ण और बडा विषय हैे प्रगतिशील लेखन के अस्सी वर्ष। अस्सी वर्ष का दायरा इसलिए कि प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना को ही अस्सी वर्ष हुए हैं लेकिन हमें इन अस्सी वर्ष पर बात करने के लिए थोड़े पीछे की ओर जाना होगा। प्रेमचंद को शामिल किए बिना प्रगतिशील लेखन की बात करना अधूरी बात करना होगा। प्रेमचंद की बात कर यह समझ में आता हैे कि जो लेखन छद्म क्रांतिकारिता को लेकर लिखा जाता है वह ज्यादा समय तक जीवित नहीं रहता। प्रगतिशील लेखन की यह विशेषता हैे कि वह उस यथार्थ से पाठक को परिचित कराता हैे जो हमें साधारण आंखों से दिखाई नहीं देता। और शोषण और अन्याय के स्रोत कहां हैं इसका ज्ञान कराता है। वह बीमारी का पता बताता हैे जिससे आप उसके खिलाफ खडे़ हो सकें। ऐसी रचनाओं में भीष्म साहनी का ‘तमस’, प्रेमचंद की कहानी ‘कफन’, मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ हैं। यह रचनाएं प्रगतिशील एप्रोच की रचनाएं हैं। ये रचनाएं चेतना विकसित करती हैं। बेचेनी पैदा करती हैं। मनुष्य के भीतर का मनुष्य जब जिस रचना में प्रकट होता हैे तो वह रचना प्रगतिशील रचना होती है।
अलीगढ़ से आए प्रो. वेदप्रकाश ने इस अवसर पर बोलते हुए कहा कि प्रेमचंद और निराला ने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना से पहले हिंदी में प्रगतिशील लेखन को आधार प्रदान किया। प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के बाद नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल ,त्रिलोचन और मुक्तिबोध ने हिंदी में प्रगतिशील कविताएं लिखी हैं। ये कविताएं सौन्दर्य की नई परिभाषाएं गढ़ती हैं। लोगों का सौन्दर्य के प्रति नजरिया बदलती हैं। अमरकांत की ‘हत्यारे’ कहानी के हत्यारे चैरासी के दंगों में नजर आए, गुजरात के दंगों में नजर आए और आज भी नजर आते हैं। प्रगतिशील कविता ने शिल्प को भी बदला है। लोक में जितने ढंग से बात कही जा सकती थी वह सब प्रगतिशील लेखन में है। आज राजनीतिक पाखंड, साम्प्रदायिकता और जातिवाद का विरोध जरूरी है। प्रगतिशीलता लेखक के आचरण में भी होना चाहिए।
अंत में मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव विनीत तिवारी ने इस अवसर पर बोलते हुए कहा कि प्रगतिशील लेखन केवल मानवतावादी लेखन नहीं होता वह पक्षधर लेखन होता है। इसलिए वह समाज के प्रभु वर्ग की मान्यताओं को ठेस पहुंचाता है। बनी बनाई मान्यताओं को जहां वह गलत समझेगा, चोट पहुंचायगा। इसलिए वह सबके सुभीते का लेखन नहीं होता। प्रगतिशील लेखन उदार लेखन होता है। वह खुले दिल से किसी भी आरोप या स्थापना को अपने ऊपर झेलेगा, उसे तौलेगा, वैज्ञानिक कसौटी पर परखेगा, ऐतिहासिक कसौटी पर परखेगा और उसके बाद कहेगा यह हमारी समझ है। आज का प्रगतिशील लेखन चार्वाक से लेकर जातक कथाओं तक, दुनिया के किसी भी कोने में छिपे प्रगतिशील लेखक को प्रतिष्ठा देने का काम करता हेंै जिनको हमारे समाज की बुराइयों ने कूड़े में डाल दिया था। स्त्रियों ने लेखन किया, दलितों ने लेखन किया, उन्हें उस दौर की बुराइयों ने उभरने नहीं दिया। प्रगतिशील लेखन उन्हें ढंूढ़कर प्रतिष्ठा देने का काम करता है।
प्रगतिशील लेखन के अस्सी वर्ष के मायने हैं कि प्रेमचंद के अस्सी वर्ष पहले कहे वाक्य ‘हमें हुस्न का मेयार बदलना है’ वाक्य को विस्तार देना। सौन्दर्य के प्रतिमान बदलने का काम प्रेमचंद ने सौंपा था। और हम प्रगतिशील लेखक अस्सी वर्ष से लड़ते-लड़ते, हमले झेलते, अपने साथियों का क़त्ल देखते हुए भी और ख़ुद तमाम किस्म के ख़तरे झेलते हुए भी हुस्न का मेयार यानी सौंदर्य के प्रतिमान बदलने की ज़िम्मेदारी निभाने के लिए मुस्तैदी से तैनात रहे हैं। यह वाक्य ही हमारे लिए मशाल हैे। यह उस वाक्य के अस्सी वर्ष पूरे होने का उत्सव मनाने का अवसर है और अपने औजारों पर फिर धार देने का अवसर है। प्रगतिशील लेखन की पहली शर्त हैे कि हम चुनौतियों की पहचान करें और फिर उनका सामना करें। साहित्य में इस संकट को हमें पहचानना होगा। हमारे प्रगतिशील मूल्य जो हमने स्थापित किए थे उन्हें बचाए रखना है।एक पुनरूत्थानवाद इस देश में फिर से हावी हो रहा है। लोगों के सामने गलत इतिहास परोसा जा रहा है। राष्ट्रवाद और राष्ट्रप्रेम को एक बताया जा रहा है। राष्ट्र का दायरा संकीर्ण से संकीर्ण किया जा रहा है। कश्मीर, आरक्षण, गैर आरक्षण यानि आपस में लडाने के जितने भी तरीके हो सकते हैं, वह सब इस समय इस्तेमाल किये जा रहे हैं। दक्षिणपंथ उफान पर है। ऐसा लगता हैे कि झूठ गढ़ने की सारी रचनात्मकता और कल्पनाशीलता दक्षिण पंथ के पास पहुंच गयी हो। नकली कहानियां गढी जा रही हैं जिससे लोग सच से दूर ही भटकते रहें। झूठ की प्राण प्रतिष्ठा की जा रही है। प्रगतिशील लेखक को समाज के उन लोगों से जमीनी स्तर पर जुड़ना होगा जो शोषण व दमन के शिकार हैं। पहले के लेखक की यह विशेषता होती थी कि वह पहले बहुत पढ़ता था, जगह जगह घूमता था, फिर लिखता था। आज उन अनुभवों को बहुतेरे लेखक सिर्फ़ मोबाइल और इंटरनेट से जानने की कोषिष करके रचना कर रहे हैं। तकनीक की अपनी उपयोगिता है लेकिन अनुभव का कोई विकल्प नहीं हो सकता। अस्सी वर्ष इन लेखकों को याद करने और उनको सम्मान देने का भी वर्ष है।
अस्सी वर्ष पहले जिनसे हमारा साहित्यकार लड रहा था वह था साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, अंग्रेजी सत्ता और देश के भीतर समानान्तर चल रही बुराइयां। आजादी के बाद राज्य बदला हैे। कितना बदला है, इसमें मतभेद हैं। आज़ादी के बाद जो राज्य बना, उसे अनेक साहित्यकारों ने जनपक्षीय माना और आज़ाद देश  के नये राज्य के साथ सहयोग की भावना के साथ उन्होंने रचनाकर्म किया। आज जो राज्य हमारे सामने है, उसे भी क्या हम जनपक्षीय राज्य मान सकते हैं? बेशक ये राज्य उदारीकरण के पिछले पच्चीस वर्षों की देन और नतीजा है लेकिन हाल के उदाहरण तो बहुत ही खराब हैं। इस नये राज्य का चरित्र क्या हैे? ये किस दिशा में ले जा रहा हैे? क्या वो भूमि सुधार कर रहा हैे? या वो किसानों को आत्महत्या करने के लिए छोड़ रहा है? क्या वह जनता के हक़ में काॅर्पोरेट की नाक में नकेल डाल रहा है? क्या उससे भी हमें वैसे ही लड़ना हैे जैसे हम अंग्रेजों से लडे थे, या हमें राष्ट्र निर्माण में इसी राज्य के साथ कंधे से कंधा मिलाना है। अब आदिवासियों को आदिवासियों से लडाया जा रहा है। पत्रकारों को जेलों में डाला जा रहा है। मीडिया को कंट्रोल किया जा रहा हैे। जनांदोलनों को कुचला जा रहा है। ये राज्य क्या वही राज्य हैे जो हमने 1947 में खड़ा किया था। क्या ये राज्य आज फासीवादी राज्य के रूप में तब्दील हो चुका हैें? आज प्रगतिशील लेखन के सामने ये चुनौती है कि वो इस राज्य के साथ अपना क्या रिश्ता बनाता है, उसे तय करना होगा। अगर ये राज्य जनविरोधी है तो लेखकों और संस्कृतिकर्मियों को प्रतिपक्ष बनना ही होगा। पिछले वर्षों में ये ज़िम्मेदारी हमने निभाई भी है और आगे भी निभाएँगे। ये सवाल इक्का-दुक्का लेखकों के या किसी एक लेखक संगठन मात्र के व्यक्तिगत सवाल नहीं हैं बल्कि इनका हल सांगठनिक, सामूहिक और एकताबद्ध प्रयासों से ही निकलेगा और उस प्रक्रिया में हमारे पुरखे लेखक हमें सही रास्ता दिखाएँगे।
इस अवसर पर भिंड के कथाकार ए. असफल के उपन्यास ‘कठघरे’ का विमोचन भी किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ गीतकार व कवि काॅमरेड डाॅ. जगदीश सलिल ने की। संचालन इकाई के अध्यक्ष भगवान सिंह निरंजन ने किया। इस अवसर पर दतिया इकाई के साथी श्री के. बी. एल. पाण्डेय, नीरज जैन ,मुरैना से सामाजिक कार्यकता नीला हार्डीकर, वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ. प्रकाश  दीक्षित, महेश कटारे, पवन करण, एवं शहर के प्रबुद्धजन बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
                                                प्रेषक
भगवान सिंह निरंजन 9826262125, अध्यक्ष प्रलेस ग्वालियर
दि. 3 अगस्त 2016

सोमवार, 4 जुलाई 2016

प्रगतिशील प्रतिरोध से ही कट्टरपंथी सोच का मुकाबला संभव

इंदौर में प्रगतिशील लेखक संघ ने दुनिया भर में फैल रही कट्टरता पर आयोजित की परिचर्चा


इंदौर। प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई ने पाकिस्तान में सूफी कव्वाल अमजद साबरी की हत्या और बांग्लादेश में पिछले दिनों में ब्लाॅगरों, लेखक व पत्रकारों की हत्या की निंदा करते हुए एक परिचर्चा का आयोजन अनंत थिएटर सुखशांति नगर इंदौर में किया। इसमें भारतीय उपमहाद्वीप में कट्टरपंथी ताकतों के उभार पर वक्ताओं ने अपनी बात रखी। इस मौके पर इंदौर के नाट्य समूह सबरंग ने नाटक 'अजातघर' पेश किया। यह नाटक दंगे और सांप्रदायिकता की पृष्ठभूमि में आम आदमी की विचार प्रक्रिया और उसके द्वारा उठाए गए सवालों के बारे में था।  परिचर्चा में वक्ताओं ने कहा कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में सूफी कव्वाल और ब्लागरों की हत्या के बाद भी इंसानियत का पैगाम देना रुकेगा नहीं। कट्टरपंथी विचारधारा के खिलाफ प्रतिरोध जारी रहेगा।

प्रगतिशील लेखक संघ के उपाध्यक्ष कामरेड चुन्नीलाल वाधवानी ने पाकिस्तान में अपने संपर्कों के हवाले से कहा कि अमजद साबरी पाकिस्तान में सूफियाना परंपरा के कव्वाल थे। वे नात गाते थे। जिसमें पैगंबर की प्रशंसा होती है। वे भगत कंवर राम की परंपरा के थे। भगत कंवर राम सिंध के थे। 1935 में उनकी भी हत्या कर दी गई थी। कंवर राम के भजन इतने मधुर होते थे कि उन्हें सुनने आसपास के गांवों के लोग तक आते थे। वे भजन के बाद अपनी झोली फैलाते थे। इसमें जो कुछ भी इकट्ठा होता था उसे वे वहां भजन सुनने आए गरीबों और जरूरतमंदों में बांट दिया करते थे। इसमें से भी ज्यादातर मुस्लिम गरीब किसान होते थे। कंवर राम की हत्या इसलिए कर दी गई थी क्योंकि वे समाज में भाईचारा बढ़ा रहे थे। अमजद साबरी भी पाकिस्तान में कम से कम 250 परिवारों का पालन-पोषण करते थे उनके संरक्षक थे। उनके वालिद गुलाम फरीद भी सूफी कव्वाल थे। अमजद साबरी के परिवार वालों का कहना है कि उनकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी। फिर साबरी को किसने मारा यह सवाल लोगों की जुबान पर है। पाकिस्तान में सुन्नी बहुल मस्लिम हैं। अमजद भी सुन्नी थे। लेकिन सुन्नियों में वे बरेलवी थे। बरेलवी सुन्नी दरगाह, मजार पर जाते हैं,  संगीत के जरिए आराधना में विश्वास रखते हैं, वहीं कट्टरपंथी दरगाह, संगीत आदि में यकीन नहीं रखते हैं। वे कहते हैं कि सिर्फ एक ही अल्लाह है उसी के आगे सिर झुकाना चाहिए। अमजद साबरी के श्रोताओं में हिंदू-मुसलमान और सिख भी हैं। ये सभी दरगाहों और मजारों पर भी जाते थे। कट्टरपंथी एसा मानते हैं कि बरेलवियों से इस्लाम खतरे में पड़ता है। इसलिए पाकिस्तान में बाबा फरीद की मजार, अब्दाल शाह गाजी की मजार पर बम फेंकने की घटनाएं भी हो चुकी हैं। कट्टरपंथियों के अनुयायी पाकिस्तान के फाटा यानी कि फेडरल एडमिनिस्टर्ड ट्राइबल एरियास के मदरसों में पनप रहे हैं। फाटा में वजीरिस्तान, मालकंड, चित्राल, स्वात, डीर शहर आते हैं। ये जनजातीय कबीलों के स्वायत्त इलाके हैं। 1948 में पाकिस्तान की एक संधि के तहत फाटा के इलाकों को विशेष दर्जा मिला है। यहां पर शिक्षा व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है। मदरसों में बच्चों को पढ़ाया जाता है। उन्हें सिर्फ मजहबी शिक्षा दी जाती है। पाकिस्तान में परिवार नियोजन नहीं हैं। वहां के मुसलमान और हिंदुओं के घर में पांच-पांच बच्चे पैदा होना आम बात है। बड़े परिवारों में बच्चों की सही परवरिश न होने और अशिक्षा के चलते सभी बच्चे मदरसों का रुख करते हैं और यहां उन्हें कट्टर बनाया जाता है। इन्हें यही बताया जाता है कि उनके धर्म का शासन ही दुनिया में कायम रखना है। 

प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई के सचिव अभय नेमा ने बांग्लादेश पर अपनी बात केन्द्रित की। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में 2013 से अब तक 30 ब्लागरों, लेखकों, संपादकों की हत्या की जा चुकी है। इनमें अनीश्वरवादी, धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों के साथ ही वे धर्मनिरेपक्ष मुसलमान भी शामिल हैं जो बांग्लादेश मे कट्टरपंथियों का समर्थन नहीं करते।  इनसे कट्टरपंथी इसलिए नाराज हैं कि ये लोग `मुक्त मन' नामक वेबसाइट पर लिखते हैं। इस साइट पर लेखकों ने धार्मिक आस्था समेत सभी तरह की आस्थाओं पर, धर्म की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। बांग्लादेश में अवामी लीग की नेता शेख हसीना की सरकार है। वहीं विपक्ष में बेगम खालिदा जिया की बांगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी है। आवामी लीग 1971 में स्वाधीनता मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तान की ओर से बांग्लादेश की मुक्ति के खिलाफ लड़ने वालों पर एक-एक कर युद्ध अपराध के मुकदमों में सजा सुना रही है। बांग्लादेश की बहुसंख्यक आबादी सजा के समर्थन में है। अब तक आधा दर्जन से ज्यादा को मौत की सजा या उम्रकैद हो चुकी है। जिन्हें सजा मिली है वे कट्टरपंथी हैं और कई जमात-ए-इस्लामी के नेता हैं। उन्हें बीएनपी का समर्थन है। बीएनपी को जमात-ए-इस्लामी का भी समर्थन है। बीएनपी शेख हसीना को सत्ता से बाहर करने के लिए कट्टरपंथियों का समर्थऩ कर रही है। इन राजनीतिक हालात के कारण इस वक्त बांग्लादेश की हालत विकट है। इसके अलावा भारत में भी कलबुर्गी, पानसरे और दाभोलकर की हत्या में कट्टरपंथियों का हाथ होने की बात जांच में सामने आ रही है। कट्टरपंथी नहीं चाहते कि कोई प्रगतिशील विचारधारा पनपे और फैले। इस तरह भारतीय उपमहाद्वीप में कट्टरपंथी रुझान हावी होने की कोशिश की जा रही है। यह भारतीय उपमहाद्वीप तक ही यह सीमित नहीं है। योरप में भी दक्षिणपंथी रुझान नजर आ रहा है। आस्ट्रिया, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड, इटली में दक्षिणपंथी रुझान हावी होते नजर आ रहे हैं। ब्रेक्सिट में योरपीय संघ से ब्रिटेन का अलग होना भी इसी रुझान को इंगित करता है। योरप के लोग नहीं चाहते कि वे समाज के प्रतिफल को सीरिया के शरणार्थियों के साथ बांटे। अपने कर की राशि से शिक्षा-चिकित्सा, रोजगार और कल्याणकारी राज्य की तमाम सुविधाएं वे शरणार्थियों के साथ बांटना नहीं चाहते हैं। अमेरिका में भी राष्ट्रपति पद की दावेदारी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप मुस्लिम विरोधी बयान इसी दक्षिणपंथी मानसिकता के तहत दे रहे हैँ।

प्रगतिशील लेख संघ के अध्यक्ष एस के दुबे ने कहा कि भारत में जातियों के बीच संघर्ष हो रहे हैं। गुजरात में पाटीदार और हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन इसका उदाहरण है। इसके पीछे आर्थिक सवाल हैं। नौकरियां नहीं है। असल मुद्दों को न छूते हुए गैर जरूरी मुद्दे लेकर देश में आंतरिक हिंसा हो रही है। हमारे सामाजिक ताने-बाने को खत्म किया जार रहा है। इसके पीछे यहां की कट्टरपंथी ताकतें हैं।

इस अवसर पर नाट्य संस्था सबरंग द्वारा दंगों और साम्प्रदायिकता के विषय पर केंद्रित रामेश्वर प्रेम लिखित नाटिका 'अजात घर' का मंचन भी हुआ। इस नाटक को रामेश्वर प्रेम ने लिखा है।  प्रांजल श्रोत्रिय द्वारा निर्देशित नाटक में सर्वश्री शाकिर हुसैन और श्रवण गढ़वाल ने भावप्रवण अभिनय किया। नाटक में दो आम आदमियों की मनः स्थिति का चित्रण हैं जो दंगों में जान बचाने के लिए एक घर में छिपे हैं। इस दौरान उनके बीच जातिगत और सांप्रदायिक मसलों को लेकर रोचक संवाद होता है। कहानी इस बात पर खत्म होती है कि दंगों में सब डर छिप रहे हैं तो फिर मार कौन रहा है। निर्देश श्रोत्रिय ने सुविचारित ढंग से दंगे की मानसिकता को उघाड़ा।  गोष्ठी में सबरंग से जुड़े रंगकर्मियों सहित सर्वश्री अनन्त श्रोत्रिय,एस के दुबे, संजय वर्मा,सारिका श्रीवास्तव,ब्रजेश कानूनगो,सुरेश पटेल,केसरीसिंह चिडार आदि भी उपस्थित थे।

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

सिर्फ़ हँसना या मज़ाक करना व्यंग्य नहीं

प्रगतिशील लेखक संघ, इंदौर ईकाई
प्रलेस ने याद किया हरिशंकर परसाई को
- केसरी सिंह चिडार

इंदौर, 22 अगस्त। प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर ईकाई और आईबीएसएस विद्या निकेतन की ओर से शुक्रवार को हिंदी के महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के जन्म दिवस पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरूआत में छात्राओं कुमारी मीनल वर्मा, कशिश हार्डिया और प्राची मौर्या ने परसाई के सृजन एवं साहित्य पर अपने-अपने विचार रखे। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव विनीत तिवारी ने कहा कि परसाई के व्यंग्य महज हंसाते नहीं थे, बल्कि वे सोचने और हालात को बदलने के लिए प्रेरित भी करते थे। उन्होंने कहा कि असल में व्यंग्य का मुख्य काम भी बदलाव के लिए लोगों को प्रेरित करना है। आईबीएसएस के संचालक मंडल की ओर से श्री एस. के. दुबे ने हरिशंकर परसाई के लेखन के महत्व पर चर्चा की और बताया कि किस तरह उनके लेखन से समाज और शासन अपनी गलतियों पर शर्मिंदा होता था। आईबीएसएस की प्राचार्या सुश्री गीता सोनवणे ने प्रगतिशील  लेखक संघ के अतिथियों का स्वागत करते हुए स्कूल की गतिविधियों की जानकारी दी।

इस अवसर पर प्रलेसं के सचिव अभय नेमा ने परसाई की व्यंग्य रचनाओं ‘रोटी’ और ‘खेती’ का पाठ किया। विनीत तिवारी ने परसाई की रचना ‘एकलव्य ने गुरु को अंगूठा दिखाया’ का पाठ किया। इस व्यंग्य में परसाईजी ने इतिहास के माध्यम से वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में मौजूद खामियों और भ्रष्टाचार पर रोचक अंदाज़ में प्रहार किया है।  बच्चों को परसाई के व्यंग्य बहुत पसंद आये। विनीत तिवारी ने बताया कि किस तरह परसाईजी ने प्रेमचंद की समाजोन्मुख साहित्य की परंपरा को आगे बढ़ाया। प्रलेस की इंदौर ईकाई के केसरी सिंह चिडार ने स्वरचित बच्चों की कविताएं ‘चूहा राम का फोन’ एवं ‘कद्दू काका का ब्याह’ सुनाई। विद्या निकेतन की शिक्षिका सुचित्रा कापसे ने परसाई जी की व्यंग्य रचना ‘अच्छा बेवकूफ’ का पाठ किया। कार्यक्रम का संचालन विशी वर्मा एवं कुणाल ने किया। धन्यवाद प्राचार्या सुश्री गीता सोनवणे ने दिया।

इस मौके पर प्रलेसं इंदौर के अध्यक्ष श्री एस. के. दुबे और वरिष्ठ साहित्यकार राम आसरे पांडे के अलावा आईबीएसएस विद्यालय के सभी शिक्षकगण मौजूद थे।

शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

प्रेमचंद का साहित्य समता, न्याय और सामाजिक परिवर्तन का घोषणापत्र है

प्रेमचंद जयंती पर प्रलेस इंदौर ने किया कहानी पाठ और चर्चा का कार्यक्रम
इंदौर। प्रेमचंद जयंती के मौके पर केंद्रीय अहिल्या ग्रंथालय के अध्ययन कक्ष में  3 जुलाई को प्रेमचंद की कहानी घासवाली के पाठ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुकेश पाटीदार ने आधार वक्तव्य रखा। सौरव दास ने प्रेमचंद के कृतित्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में शामिल साथियों ने घासवाली कहानी के विभिन्न पहलुओं पर अपना नजरिया जाहिर किया।

मुकेश पाटीदार ने आधार वक्तव्य में कहा कि प्रेमचंद ने तत्कालीन समाज में व्याप्त, छुआछूत, सांप्रदायिकता, हिंदू-मुस्लिम एकता, दलितों के प्रति सामाजिक समरसता जैसे मुद्दों पर अपनी कलम से समाज को दिशा देने का महत्वपूर्ण कार्य किया। प्रेमचंद का पूरा साहित्य ही दलित, स्त्री, किसान और मजदूरों की लडा़ई का साहित्य है। इसमें समता, न्याय और सामाजिक परिवर्तन की घोषणा है। उनकी रचनाओं के पात्र आज भी हमे आसपास दिखाई देते हैं। प्रेमचंद ने उपन्यास निर्मला में दहेज प्रथा व बेमेल विवाह की समस्या पर प्रकाश डालकर समाज में महिलाओं की स्थिति का उल्लेख किया। वे सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, जमींदारी, कर्जखोरी के खिलाफ और गरीबी तथा नारी समस्याओं पर आजन्म लिखते रहे।

युवा साथी सौरव दास ने कहा कि प्रेमचंद ने अय्यारी, कल्पना लोक, राजा-रानी से इतर यथार्थवादी कहानियों की परंपरा विकसित की। उन्होंने किसानों, मजदूरों के जीवन और उनकी त्रासदियों का मेलोड्रामा रचा। उनके उपन्यासों पर हिन्दी में ही नहीं, उड़िया, कन्नड़ व् बांग्ला में भी फ़िल्में बनीं।

प्रलेस मध्यप्रदेश के महासचिव विनीत तिवारी ने प्रेमचंद की कहानी घासवाली का पाठ किया। यह कहानी प्रो. शोभना जोशी ने उपलब्ध कराई थी।

इस कहानी पर चर्चा का आरंभ करते हुए श्री कृष्णकांत श्रीवास्तव ने कहा कि कहानी में भाषा की सहजता, सरलता है। समाज में प्रतिरोध व सुधार को चिन्हित करने और उभारने की प्रेमचंद की कला अदभुत है। इंदौर इकाई के अध्यक्ष श्री एसके दुबे ने कहा कि कहानी में प्रेमचंद का पात्र चैनसिंह एकाएक कैसे परिवर्तित हो जाता है, परिवर्तन की प्रक्रिया बहुत तेज हुई है। श्री गणेश रायबोले ने कहा कि इस कहानी में जमींदारी प्रथा के अंतर्गत दलित वर्ग की पीड़ित शोषित महिला की मुक्ति की चाह मिलती है। बात को आगे बढ़ाते हुए श्री रामआसरे पांडे ने कहा कि कहानी गांधीवादी आदर्शवाद से प्रेरित है। कहानी के पात्र चैनसिंह का ह्रदयपरिवर्तन एक अपवाद है और अपवादों का सामान्यीकरण नहीं हो सकता। ह्रदयपरिवर्तन से समाज की समस्याओं का हल नहीं होता।



श्री सुरेश उपाध्याय ने कहा कि प्रेमचंद की पहली कहानी मेरे अनमोल रत्न थी और उनका आखिरी लेख महाजनी सभ्यता माना जाता है। इस आखिरी लेख में प्रेमचंद की अतंरराष्ट्रीय दृष्टि परिलक्षित होती है। प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के अध्यक्षीय उद्बबोधन में कहा था कि साहित्य राजनीति और समाज के आगे चलने वाली मशाल है। प्रेमचंद का साहित्य गति संघर्ष और बेचैनी देता है हमें सुलाता नहीं, चैतन्य करता है। इसमें संघर्ष और स्वाभिमान का सार है। घासवाली कहानी में भी यही बात दिखाई पड़ती है।इंदौर इकाई के सचिव श्री अभय नेमा ने कहा कि कहानी में कई तत्व हैं। यह तकनीक में बदलाव और इक्के वालों की आजीविका पर इसके असर के बारे में बताती है। मजदूर और दलित वर्ग की घास लाने वाली स्त्री के प्रतिरोध को बताती है। एक ठाकुर के ह्दय परिवर्तन के जरिए यह कहानी नए समाज के निर्माण की प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण बिंदु पर भी प्रकाश डालती है। इसके साथ ही जातिवाद का विद्रूप भी इस कहानी में जाहिर होता है। यह कहानी एक नए मनुष्य के निर्माण में मदद करती है। एनएफडब्ल्यूआई की सुश्री सचिव सारिका श्रीवास्तव ने कहा कि एक नारी के प्रति ठाकुर का व्यक्तित्व अचानक बदलना आसान नहीं है। कहानी में एक नारी का चरित्र अपनी पूर्णता के साथ आता है। श्री देवीलाल गुर्जर ने कहा कि प्रेमचंद की कहानियां आम आदमी की कहानियां है।


विनीत तिवारी ने कहा कि कहानी का कालखंड ज्ञात नहीं है फिर भी यह प्रेमचंद की आरंभिक कहानी लगती है। बेशक कहानी में शोषण करने वाले ज़मींदार का हृदय परिवर्तन गया है वैसा असल ज़िंदगी में नहीं होता। प्रेमचंद इस कहानी को लिखते समय तक मनुष्य के व्यक्तिगत और अंतःकरण की पवित्रता पर विश्वास करते होंगे  उन्होंने ऐसा लिखा। असल ज़िंदगी में दलितों और शोषितों को अपनी मुक्ति के लिए लड़ना पड़ता है। फिर भी यह कहानी भाषा के प्रवाह, अपने सुगठन और परिवेश के निर्माण की वजह से यादगार कहानी बन जाती है। उनकी महिला पात्र इतनी आत्मविश्वासी और मजबूत इरादों वाली होती थीं कि सहज ही औरतों के प्रति सम्मान जागृत हो जाता है। बीसवीं सदी के प्रारंभ में जातिवाद और नारी के बारे में प्रेमचंद की प्रगतिशील सोच उन्हें अपने समय से आगे देखने वाला कथाकार बनाती है। कहानी एक अमूर्तन में समाप्त होती है जो अनेक संभावनाएं सवाल छोड़ जाती है।


कार्यक्रम में ग्रंथालय के प्रमुख डॉ. जी. डी. अग्रवाल एवं प्रलेस के साथियों ने प्रेमचंद के पोस्टर का विमोचन किया। इस पोस्टर को इंदौर इकाई ने तैयार किया और इसे स्कूल, कालेजों में वितरित किया। प्रेमचंद जयंती के दिन 31 जुलाई को माहेश्वरी विद्यालय में असेंबली के दौरान सौरभ दास ने प्रेमचंद के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। इस कार्यक्रम में स्कूल के प्राचार्य, मैडम देशपांडे, श्रीमती पाठक, समेत कई अध्यापक मौजूद थे। श्रीमती पाठक ने प्रेमचंद के आवदान पर सारगर्भित वक्तव्य पेश किया। इस पोस्टर को बनाने में साथी अशोक दुबे का योगदान रहा। आभार प्रकट किया संयुक्त सचिव केसरीसिंह चिड़ार ने।

बुधवार, 28 सितंबर 2011

जनप्रतिबद्ध भावनाओं की विचारशील कविताएँ इंदौर। प्रगतिशील लेखक संघ व जनवादी लेखक संघ की इंदौर इकायों ने 25 सितंबर 2011 रविवार को देवी अहिल्या केन्द्रीय लायब्ररी के अध्ययन कक्ष में कवि श्री अनंत श्रोत्रिय के रचना पाठ का आयोजन किया। श्री अनंत श्रोत्रिय ट्रेड युनियन व कर्मचारी संगठनों से जुड़े रहे हैं। वे प्रगतिशील विचाराधारा के प्रतिबद्ध कवि हैं और फिलहाल प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई के अध्यक्ष हैं। हाल ही में साहित्यक पत्रिका राग भोपाली ने अनंत श्रोत्रिय के रचनाकर्म पर एकाग्र एक अंक निकाला है। श्री श्रोत्रिय ने "पूरब का सूरज" कविता सुनाकर कार्यक्रम की शुरुआत की। उठेंगे कदम, जूझेंगे हम साथ जूझता होगा जनजन हाथ उठा मुट्ठी तानी ताल मिली गरजा जनजन उन्नीस सौ बयालीस, आर.एन.आय. का रिवोल्ट उद्वेलित करते, गरजा जनजन हुंकार भरता नभ, बना प्रेरणा बढाओ कदम पूरब में सूरज बिखेरे लाली उड़ावे गुलाल यही तो सपना दिन विहँसा किरणें विकीर्ण जनजन में जागी खुशियां. उनके बाद प्रदीप मिश्र, विनीत तिवारी और प्रांजल श्रोत्रिय ने श्री अनंत श्रोत्रिय की चुनी हुई कविताओं का पाठ किया। पोस्टर, यह रास्ते, सर्वोदय, प्रामाणिक ज्ञान आदि कविताओं को काफी सराहना मिली। वरिष्ठ कथाकार श्री सनत कुमार ने श्री श्रोत्रिय के मालवी लेखन और गद्य लेखन पर अपना वक्तव्य केन्द्रित करते हुए कहा कि १९५० के दशक के शुरुआती वर्षों में श्री अनंत श्रोत्रिय का एक आलेख महाकवि निराला पर आया था और उसने मालवा के पाठकों को निराला से परिचित करवाया था. वह बहुत अच्छा आलेख था जिसमें साहित्य के वैज्ञानिक आधारों पर निराला की कविता का विवेचन किया गया था. उन्होंने ये भी कहा कि श्री श्रोत्रिय की कविता अवधारणात्मक वृत्ति की प्रकृतिमूलक कविता है. द्वंद्वात्मक भौतिकवाद जैसी जटिल अवधारणा को भी उनहोंने कविता में पिरोया है। हमारा अस्तित्व भी एक प्रश्न चिन्ह फिर क्यों कर यह सब वाद-विवाद, जब सब कुछ है असत्य, अस्तित्वहीन तो यह माथापच्ची क्यों कर? उन्होंने मालवी जीवन के सुख-दु:ख, आशा-निराशा को बिना लाउड हुए अभिव्यक्त किया है। उन्होंने मालवा के जनकवियों के मूल्यांकन का महत्त्वपूर्ण काम किया है। उनके साथ मालवा के प्रगतिशील कवियों की एक पूरी परंपरा है जिनमें मान सिंह राही, रंजन, प्राण गुप्त और मजनू इंदौरी के नाम प्रमुख हैं. उनकी विरासत का सही मूल्यांकन होना अभी बाकी है। यह यात्रा मालवा में 60 वर्ष से विकसित हो रही है। श्रोत्रियजी की कविताओं में प्रकृति के रम्य चित्र हैं। पानड़ा झर-झर झरी रिया आंगवात लाग्या मोर बागों फूल में की उठाया हिरदा में उठे हिलोर लीली लीली चादर तणी खेत में इतराती अरे (अलसी) अई-वई डोले उन्होंने कहा कि श्रोत्रियजी की कुछ कविताएं तो केदारनाथ अग्रवाल की याद दिलाती हैं। इस अवसर पर कवि ब्रजेश कानूनगो ने कहा कि श्रोत्रियजी की कविताओं में कला, शिल्प, और बौद्धिकता का इतना आग्रह नहीं है, जितना कि अभिव्यक्ति और सम्प्रेशनीयता का। वे अपनी कविताओं के जरिए एक प्रतिबद्ध कवि नज़र आते हैं। उनकी कविताएं रातनैतिक कविताएं हैं। कवि में वामपंथी एक्टिविस्ट साफ़ साफ़ दिखाई देता है। मनुष्यता व मनुष्य के पक्ष में अनंत जी की आकांक्षाएं अनंत हैं। वे 82 की उम्र में भी वामपंथी मूल्यों के प्रति सतत संघर्षरत हैं। उनका सकारात्मक कवि इस सफर को जारी रखना चाहता है। वे कहते हैं - सफर लंबा है मंजिल समीप नहीं इंसान ने फिर भी कितना तय कर लिया रास्ता लेखक, कवि एवं एक्टिविस्ट विनीत तिवारी ने कहा कि श्रोत्रिय जी की कवितायें उस दौर कि कवितायें हैं जब साधारण से साधारण कविता भी एक वैश्विक चेतना तक पहुँचने लगी थी. उस दौर में कपड़ा मिलों में काम करने वाले कवि भी सिर्फ अपनी तकलीफों या संघर्षों या घर परिवार के बारे में ही नहीं लिख रहे थे बल्कि वे एशिया के संघर्षरत अन्य देशों के बारे में या अंगोला या रूस, चीन की जनता के के बारे में भी लिख रहे थे और एक तरह का अंतरराष्ट्रीयतावाद उनमें विकसित हो रहा था. आज प्रतिष्ठित हो चुके कवियों के भीतर भी यह चेतना या तो नदारद है या बहुत कम मौजूद है. यह ज़रूर देखना चाहिए कि श्रोत्रियजी की कविताओं में शिल्प के प्रति असजगता है क्योंकि उन्होंने कवि कर्म को भी एक एक्टिविस्ट की ही तरह किया है. बहुत सारे दोहराव भी इन कविताओं में हैं लेकिन अपने समाज, राजनीति की जनपक्षधर समझ और वामपंथी सोच को इसमें साफ़ पारदर्शी तरह से देखा जा सकता है. उनकी कविता "पोस्टर" आम जन के भीतर विकसित होने वाली राजनीतिक समझ की प्रक्रिया की बानगी है- दीवार पर चिपका पोस्टर लाल नीले रंगों में छपा इसके अक्षर समेटे हैं बीज क्रांति के, संघर्ष के कार्यक्रम में कवि राजकुमार कुंभज ने श्रोत्रियजी की कविताओं और उनके जीवन को जनान्दोलनों का अभिन्न हिस्सा बताया और कहा कि श्रोत्रियजी की कविताओं में मुक्तिबोध के बिंब व प्रतीक याद आते हैं जो मनुष्य जीवन की जटिलताओं को व्यक्त करते हैं। उनके कवि कर्म में सारी चीजें जनसंघर्ष से निकल कर आई हैं। वे जुलूस को देखते हुए दर्शक नहीं बल्कि जूझते हुए संघर्षरत योद्धा की तरह नज़र आते हैं। इस घनीभूत पीड़ा में भाषा उनकी कविता के पीछे पीछे आ रही है। उनके तमाम प्रतीक कलावाद के निषेध में आते हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता इंदौर इप्टा के अध्यक्ष विजय दलाल ने की। इस अवसर पर चुन्नीलाल वाधवानी, विक्रम कुमार, अजय लागू , सुलभा लागू , विश्वनाथ कदम, केसरी सिंह चिढार , सारिका श्रीवास्तव आदि मौजूद थे। संचालन किया प्रलेस इंदौर के श्री एस. के. दुबे ने। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ इकाई-इंदौर

बुधवार, 25 मई 2011

साहित्य का गैर राजनीतिक होना हमारे लिए चुनौती है: लक्ष्मीनारायण

इंदौर. ११ मई २०११
प्रगतिशील लेखक संघ की आन्ध्राप्रदेश इकाई के अध्यक्ष कामरेड लक्ष्मीनारायण ने प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई के साथियों को संबोधित करते हुए कहा कि साहित्य का गैर राजनीतिक होना हमारे लिए चुनौती है. उन्होंने कहा कि ऐसे दौर में जब लोग जनवाद और प्रगतिशीलता को पुरानी और ख़त्म हो चुकी चीज़ मानने लगे हैं और इसका प्रचार किया जा रहा है तो अपनी तरह से सोचने वाले साथियों के बीच आकर खुशी महसूस होती है. इंडियन कॉफ़ी हाउस में साथियों के साथ अनोपचारिक बातचीत करते हुए उन्होंने तेलगु साहित्य की प्रगतिशील धारा के बारे में जानकारी दी. १९१० में प्रगतिशील तेलगु साहित्य ने आकार लेना शुरू किया और १९३६ में जब लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ का पहला सम्मलेन हुआ तो उसमें तेलगु साहित्य के तीन प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. इस तरह प्रगतिशील तेलूगु ने आकार लेना शुरू किया. १९३० का दशक तेलगु साहित्य के लिए काफी महत्वपूर्ण था. इसी दौरान आज़ादी की लड़ाई के साथ ही कम्युनिस्ट आन्दोलन की भी शुरआत हुई थी.
श्री लक्ष्मीनारायण ने कहां कि वह समय राजनीतिक लेखन का था. प्रगतिशील लेखक संघ का सदस्य होना उस दौर में फेशन होता था. आप तब तक लेखक नहीं माने जाते थे जब तक आप प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य नहीं होते. उसी दौरान तेलुगु साहित्य में मजदूर व शोषित के हक़ में आवाज बुलंद की गयी. उससे पहले तक तेलुगु साहित्य की भाषा भी संस्कृत की तरह थी जो बाद में आम लोगों की भाषा बनी.
उन्होंने ऐसे तेलुगु साहित्यकारों के बारे में भी बताया जो अधिक प्रसिद्ध नहीं हैं लेकिन तेलुगु साहित्य में जिन्होंने अपनी उपस्थिति दर्शायी. इनमें प्रमुख हैं शारदा व् श्री श्री.
आज़ादी के बाद हुक्मरानों को इस प्रभावशाली मुहिम से खतरा महसूस होने लगा. उनहोंने दमनकारी नीति अपनानी शुरू कर दी. तेलंगाना मुहिम को कुचलने के साथ-साथ प्रगतिशील लेखक संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया. कई लेखक चेन्नई भाग गए. इसके बावजूद प्रगतिशील लेखक संघ का प्रभाव कम नहीं हुआ. प्रगतिशील लेखक संघ की तेलुगु इकाई ने विश्व साहित्य और हिन्दी व बांग्ला के उत्कृष्ट साहित्य का भी अनुवाद तेलुगु में किया. इसमें विशाल आंध्रा पब्लिकेशन का काफी सहयोग रहा है.
गुंटूर जिले के निवासी कामरेड लक्ष्मीनारायण खुद भी अच्छे लेखक हैं व जिला बार एसोसिशन के अध्यक्ष भी रह चुके हैं.
कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि कृष्णकांत निलोसे, इप्टा इंदौर इकाई के सचिव अशोक दुबे, वरिष्ट लेखक श्री एस के दुबे, सारिका श्रीवास्तव, युवा कवि रोशन नायर, अभय नेमा, विनोद बन्डावाला, मनीष पाण्डेय, सत्येन्द्र रघुवंशी आदि उपस्थित थे. प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य महासचिव विनीत तिवारी ने श्री लक्ष्मीनारायण का परिचय दिया और बताया कि श्री लक्ष्मीनारायण भोपाल में राष्ट्रीय महासचिव श्री कमलाप्रसाद के निधन के उपरान्त उनके परिजनों से भेंट कर अपनी और आँध्रप्रदेश के अन्य साथियो की और से शोक संवेदनाएं देने भी गए थे और लौटते हुए इंदौर में उनहोंने साथियों से मिलने की इच्छा प्रकट की तो तत्काल ही हम लोग इकट्ठे हो गए. श्री लक्ष्मीनारायण ने तेलुगु साहित्य की प्रगतिशील धारा के बारे में विस्तार से परिचय कराया और श्री श्री व शारदा जैसे महान कवियों की कवितायें भी सुनाईं.

विनोद बन्डावाला
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