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मंगलवार, 20 जनवरी 2015

“ऐन एंदेर हूं मां नंजक़न” को पढ़ते हुए...



गुंजेश 

कई बार, कई कहानियों को पढ़ते हुए इस (कु) पाठक के मन में यह प्रश्न उठता रहा है कि जिस तरह से हर कथा में कई उपकथाएँ होतीं हैं क्या उसी तरह से कई उपकथाओं को जोड़ देने से कोई (सार्थक; अगर लेखक का उसपर यकीन हो तो) कहानी बन सकती है? यह प्रश्न एक बार फिर मेरे सामने आया जब मैं मिथिलेश प्रियदर्शी की कहानी “ऐन एंदेर हूं मां नंजक़न” का पाठ कर रहा था। मिथिलेश मेरे/हमारे समय के उन चुनिन्दा अफसाना निगारों में हैं जिनकी कहानियों में खुद को नोटिस कराने की अद्भुत क्षमता है। “ऐन एंदेर हूं मां नंजक़न” शीर्षक कुडुख बोली से लिया गया शब्द है जिसका मतलब है ; मैंने कुछ नहीं किया। इस कहानी की सबसे अहम पंक्ति शीर्षक और लेखक के नाम के बाद लिखी गई पंक्ति है जो इस कहानी के मेरे पाठ को प्रभावित करती है। वह पंक्ति है ; “उन तमाम संस्कृतिकर्मियों और लोगों को याद करते हुए जो फर्जी आरोपों में जेलों में क़ैद हैं”। मेरा यकीन है कि हिन्दी (समाज) में सामान्य तौर पर कहानी के टेक्स्ट के अलावा भी कहानी के साथ जुड़ी अन्य जानकारियाँ लेखक का नाम- पता भी कहानी के पाठ को प्रभावित करती है। और फिर इस कहानी के लेखक का यह दावा तो कहानी को एक खास राजनीतिक आयाम देता है। बतौर पाठक मैं पूरी कहानी में उस राजनीतिक आयाम को ढूँढने की कोशिश करता हूँ। क्या ही अच्छा होता अगर लेखक के बिना लिखे ही (गो की उसके लिखने और ना लिखने पर उसकी अपनी स्वतंत्रता है) हमें उन तमाम संस्कृतिकर्मियों और लोगों की याद आ जाती जो फर्जी आरोपों में जेल में कैद है। जब मैं यह लिख रहा हूँ तो यह उस सामान्य समझदारी से आने वाली याद नहीं है जो हम अखबारों में खबरों को पढ़ कर समझ लेते हैं। साहित्य रचना समाज की पीड़ाओं को उच्यतर आवेगों में दर्ज करना है। क्या मिथलेश की कहानी इस बार ऐसा करने में सफल हो पाई है? अव्वल तो हाँ या नहीं में इसका जवाब देते नहीं बनता, बल्कि बाज दफ़े इसका जवाब नहीं के करीब ही है। क्यों, कैसे इसके जवाब से पहले आइए देखते हैं कहानी की ज़मीन क्या है।

जैसा की लेखक ने खुद शीर्षक चुना है कुड़ुख बोली से। जो कहानी के अंत में कहानी का मुख्य पात्र बोलता है। कुड़ुख, झारखंड-बिहार और ओड़ीशा और बंगाल सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों की बोली है। कहानी का मुख्य पात्र एक ठेठ (अपनी एतिहासिक परंपरा से जुड़ा हुआ भी) आदिवासी लड़का है, एमैन्यूल। संक्षेप में कहानी यह है कि एमैन्यूल, गाँव में अपने पिता, भाई, मौसी यानि पूरे परिवार के साथ रहता है। वहीं लिसा नाम की एक लड़की भी थी, दोनों प्रेम में थे। एक फादर हैं जिन्होने एमैन्यूल और लिसा को पढ़ाया है। लिसा चर्च के किसी ब्रदर के साथ शहर चली गई है और अब एमैन्यूल उसे बेतरह याद करता है। फादर के कहने पर आगे कि पढ़ाई करने वह शहर जाता है। जहां वह अपने गाँव को शहर में रहने वाली लिसा को बड़ी शिद्दत (यह लेखक कि सफलता है कि “बड़ी शिद्दत” वाली बात पढ़ने से ही महसूस हो जाती है) से याद करता है। लेकिन फिर एक दिन किन्हीं संयोग से वह एक ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रम का दर्शक बन जाता है जिसमें सरकार और व्यवस्था विरोधी गीत गाए जा रहे थे। पुलिस वहाँ पहुँचती है और एमैन्यूल को पकड़ कर ले जाती है। एमैन्यूल “ऐन एंदेर हूं मां नंजक़न” चिल्लाता रहता है पर उसकी आवाज़ नहीं सुनी जाती। जाहीर है कभी सुनी भी नहीं गई है। कहानी यहीं खत्म हो जाती है।

कहानी का सबसे मजबूत पक्ष है इसकी भाषाई तरलता, हालांकि यह इतना निर्दोष भी नहीं है लेकिन फिर भी..., इसपर आगे चर्चा करेंगे। कहानी पढ़ कर जो दो सवाल मेरे मन में आए वो यह कि क्या यह 1.राजनीतिक और 2. भौगोलिक रूप से एक करेक्ट कहानी है। दूसरे सवाल को पहले देखते हैं ;

इस अरबों की आबादी वाली दुनिया में एक बड़ी संख्या उनकी है, जो थोड़ी खुशियों के बीच जन्म लेते हैं, चंद उम्मीदों के सहारे पाले जाते हैं, कुछ आशाओं के साथ बड़े होते हैं, और अंत में तयशुदा गुमनामी में एक जरूरी मौत मर जाते हैं। कल पैदा हुए, आज बड़े और कल मर गए। दुनिया की पैदाइशी फितरत कि वह केवल शक्तिशालियों की बात करती है और दुनियावी मुहावरे में इनका कुछ भी उल्लेखनीय नहीं होता, न जन्म, न जीवन, न मृत्यु, जीवन के खतरनाक मोड़ों से ये इतने सताये हुए होते हैं कि इनकी पूरी उम्र बच-बच के जीने में निकल जाती है।

एमैन्यूल इसी भीड़ का एक सदस्य था, जिसे उसके परिवार प्रेमी पिता फैलिक्स भेंगरा ने सिखाया था, जीवन सावधानी से जीने की चीज है, जैसे हम गोभी के पौधों को संभालते हैं, जैसे अपनी मुर्गियों को बड़ा करते हैं। जीवन कच्ची शराब की तरह पी जाने के लिए नहीं है। इसे सेम के लतरों की तरह अच्छे से ऊपर की ओर चढ़ाना पड़ता है। संवारना पड़ता है।

क्या आदिवासी इलाकों में इस तरह का डर, इस तरह की सावधानी पाई जाती है। या फिर यह एक कस्बाई डर है। आदिवासी प्रकृति की एक स्वतंत्र इकाई हैं जो समूह में ज़रूर रहते हैं लेकिन किसी भीड़ का हिस्सा नहीं है। समय के साथ उसके भूगोल में चर्च और मंदिरों ने प्रवेश ज़रूर कर लिया है लेकिन अभी उसका ईश्वर उसके आस-पास के पेड़ पौधों में ही रहता है। शहर को लेकर एक संकोच ज़रूर है, लेकिन जिस डर की क्राफ्टिंग मिथिलेश की कहानी में है वह आदिवासियों के मुक़ाबले हम जैसे छोटे-छोटे कस्बों से बड़े शहरों में आए उसी को नियति बना लेनेवाले लोगों में ज़्यादा है। जहां भी आदिवासियों को यह डर लगा है शहरी मगरमछ उसे लीलने को आ रहा है तब-तब आदिवासियों ने आंदोलन खड़े किए हैं। इतनी सहजता से हथियार डाल देना कस्बाई निम्न मध्यम और मध्यम वर्ग की पहचान तो हो सकती है आदिवासियों की कतई नहीं ; 

“फादर उसे बताते कि अब दूध लेकर अब्राहम उनके पास आता है और दिन भर स्कूल में बच्चों के साथ खेलता है। अब वह जंगल कम जाता है। पुलिस ने बकरी चराने गए गांव के तीन लड़कों को मार दिया है, यह कहकर कि वे उन पर हमला करने वाले थे। पर उसके पिता फैलिक्स ने जंगल जाना नहीं छोड़ा है। उन्हें जंगल में एक नया बीज मिला है, जिसके पौधों के आसमानी फूलों का चूरा बनाकर खाने से भूख खत्म होने का एहसास होता है। उनकी मौसी सिसिलिया ने एक मीठे पानी का झरना ढूंढ़ा है, पर वन विभाग के सिपाही उसे वहां तक नहीं जाने देते कि कहीं झरने का शीशे जैसा पानी गंदला न हो जाए, वे दुनिया के लोगों को घुमाने के लिए यहां लाना चाहते हैं”।

आइए अब कहानी की राजनीति पर बात करते हैं। मैं (देरीदा के) इस बात का मुरीद हूँ कि “हर लेखन में एक गुप्त राजनीति होती है”। साथ ही इसका भी कि “भाषा में स्थित अंतर्विरोधों को कोई लेखक अपने इरादों से पाट नहीं सकता है”। क्या बतौर समाज हम आदिवासियों को जिस तरह से देखते हैं या आदिवासी हमारी तरफ जिस तरह से देखते हैं, मुझे कहना चाहिए जितनी दूरी से देखते हैं हमारी भाषा उस दूरी को पाटने में हमारी मदद कर सकती है? यह बात सिर्फ मिथिलेश की ही कहानी पर नहीं बल्कि हाल के दिनों में आए एक ओवररेटेड उपन्यास ‘गायब होता देश’ (लेखक: रणेन्द्र) पर भी लागू होती है। एक ओर जहां एक लेखक अपने लेखन में ‘देश’ और ‘देस’ के फर्क  को नहीं समझ पता है। (जिसपर कभी विस्तार से लिखुंगा) तो दूसरी ओर मिथिलेश हैं जो प्रेम के टूटने के मध्यम वर्गीय कारणों को आदिवासी कमिटमेंट पर हवी होने देते हैं। इस पैरा की शुरुआत में जब मैं “भाषा में स्थित अंतर्विरोधों को कोई लेखक अपने इरादों से पाट नहीं सकता है” के समर्थन में खड़ा हूँ तो दरअसल मैं लेखकों से इस सावधानी की उम्मीद करता हूँ कि वह अपने टेक्स्ट में भाषा के अंतर्विरोधों को पाटने की ईमानदार कोशिश करता दिखे। यहाँ लेखक उसे पाटने की कोशिश तो दूर, कमोबेश उसे ग्लैमराइज़ करता नज़र आ रहा है।

यह सच है कि कोई पाठक या आलोचक यह हैसियत नहीं रखता कि वह कहानीकार को यह डिक्टेट करे उसे कहानी को कैसे बरतना चाहिए था। लेकिन पाठक का यह अधिकार बनता है और लेखक कि यह ज़िम्मेदारी बनती है कि, वह कहानी को इस तरह से गढ़े कि कहानी की केन्द्रीय समस्या, जिस ओर लेखक लक्ष्य कर रहा है, स्पष्ट रहे। खास तौर से ऐसे विषयों में जिसमें बांकी माध्यमों में स्पष्ट रूप से कुछ भी कह पाना नामुमकिन के करीब है। यहाँ एमैन्यूल जो कहानी का केंद्रीय आदिवासी पात्र है, लिसा से प्रेम करता है, लिसा उससे संबंध तोड़ कर किन्हीं ब्रदर के साथ नर्स बनने शहर चली जाती है, एमैन्यूल के दिमाग में आत्महत्या का ख्याल आता है लेकिन वह अपनी समाजिकता की वजह से अपने उस ख्याल को रहने देता है। क्या लिसा सिर्फ नर्स बनने की उम्मीद पर ब्रदर के साथ चली गई? एमैन्यूल के प्रेम की जगह इस उम्मीद को प्रतिस्थापित करने की प्रक्रिया यानि पलाश की जगह गुलदावदी बोने की प्रक्रिया क्या रही? इसकी तलाश न तो लेखक और न ही कहानी का केंद्रीय पात्र एमैन्यूल करता है। यहीं, एक फादर हैं जो गाँव में स्कूल चलाते हैं और एमैन्यूल को पढ़ना चाहते हैं। वह ऐसा क्यों करना चाहते हैं (आदिवासी क्षेत्रों में चर्च और मिशनरियों को ध्यान में रखते हुए ) इसके पीछे उनका क्या मोह है? कहानी में इसका भी जिक्र नहीं है। ध्यान से पढ़ा जाय तो कहानी का केंद्रीय पात्र एक डर है, लेकिन वह कौन सा डर है उसके फैक्ट्स क्या हैं। इसे अगर इस तरह से कहूँ कि कहानी रूपी ब्रेड पर डर का मख्खन ज़रूर पूता हुआ है और हर पंक्ति में उस डर का स्वाद मौजूद है लेकिन इतना भर हो जाने के बावजूद डाइट पूरा नहीं हो जाता। वह डर क्या है, इसे डिकोड न तो नरेटर कर पा रहा है और न ही एमैन्यूल। किसी जगह पर इस्मत चुगतई ने खुद के अफसाना लिखने के बारे में लिखा है जिसका आशय कुछ इस तरह का है कि वह कहानियाँ इसलिए लिखती हैं कि इस विधा में कड़वी से कड़वी बात भी आसानी से कही जा सकती है। जो लेखों या अन्य माध्यमों में कहना मुश्किल है। फिर ऐसी कौन सी बात है जिसकी तरफ लेखक सिर्फ इशारा कर के निकाल जाना चाहता है। इस किस्से में पुराने किस्सों का ‘भावनात्मक लिरिसिज़्म’ तो है, लेकिन नई परिस्थितियों में इस कहानी की जमीन पर उपजे द्वंद और उस द्वंद के कारणों की राजनीतिक, आर्थिक कारणों की पड़ताल नहीं की गई है। जो घट रहा है वह तो दर्ज़ किया गया है लेकिन वह क्यों घट रहा है, जिसके बारे में सिर्फ एक कलाकार, रचनाकार ही बता सकता है, उसके पीछे भागने जहमत लेखक ने नहीं उठाई है।  

------
गुंजेश अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा  से जनसंचार में उपाधि प्राप्त हैं.  युवा पत्रकार हैं, आधुनिक रचनाओं को खूब पढ़ते हैं, कविता कहानी लिखते हैं. समीक्षाएं भी अच्छी लिखते हैं और इधर उन्होंने समकालीन कहानियों और कहानीकारों पर बहुत गंभीरता से लिखना शुरू किया है. सम्प्रति, वर्तमान में दैनिक भाष्कर, राँची में कार्यरत हैं.

"पहल-९८" पत्रिका में छपी कहानी का लिंक : http://pahalpatrika.com/frontcover/getdatabyid/144?front=24&categoryid=14

सोमवार, 21 मार्च 2011

क्षणिकाएँ


१)
अब...
ढेर सारा खालीपन है
मेरे अंदर...

इस खोखलेपन
का भराव
वह ढाई अक्षर हो
सकते थे...

जिन्हें पूरी श्रद्धा के साथ
तुम्हें संकेतित करते
एक सर्वनाम सहित संबंधकारक
लगाकर
मैंने उच्चरित किया था --

"तुम्हारा प्यार !"

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२)
तुम
मैं
प्रेम
सुख
सपने
यथार्थ
लड़ाई
उम्मीद
हौसले

विरह
संताप
अवसाद
प्रश्न
आकुलता
शेष
प्रतीक्षा

बस यही किस्से हैं
सदियों पूर्व से
अब,
अगली सदियों तक...!

रविवार, 20 मार्च 2011

तुम मेरे पास रहो - फैज़


तुम मेरे पास रहो
मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो
 
जिस घड़ी रात चले
आसमानों का लहू पी के सियह रात चले
मर्हमे-मुश्क लिये नश्तरे-अल्मास लिये
बैन करती हुई, हँसती हुई, गाती निकले

दर्द की कासनी पाज़ेब बजाती निकले
जिस घड़ी सीनों में डूबते हुए दिल
आस्तीनों में निहाँ हाथों की रह तकने लगें
आस लिये
और बच्चों के बिलखने की तरह क़ुलक़ुले-मय
बहर-ए-नासूदगी मचले तो मनाये न मने
जब कोई बात बनाये न बने

जब न कोई बात चले
जिस घड़ी रात चले
जिस घड़ी मातमी, सुनसान, सियह रात चले
पास रहो
मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

याद आया...


फिर किसी किताब में...
या कि अतीत के फांकों में
ढूँढूँगा अपना मिज़ाज-ऐ-आराम
फिर सांझ की पहली लालटेन
पश्चिमांत की खूँटी से
उतर कर ओसारे के एक खंभे
पर टिक गई है
कुछ देर जब हर पत्ता सोने लगेगा
फूल अपनी बोझिल गर्दन झुका लेंगे
मैं सोचूंगा
तुम इस वक्त भी मेरे साथ
क्यों नहीं हो ?
जब शामें ढला करती हैं
तब, तेरे नुपूर की झंझन
क्यों नहीं सुनाई देती...
जब झींगुर बोलते हैं और
रात क्वाँरी दुल्हन बन जाती है
अंतर्मन में एक हूक उठती है कि
दौड़ जाऊं पास तुम्हारे
दिलाऊँ याद कि जब हम साथ हँसते थे
मिलते थे और जीते थे...
तुम्हारे बहके हुए आँचर का कोना थाम लूँ
और मेरा पूरा दिन रजनीगन्धा सा
रात बेला सी
महकती रहे !
ऐसे ही तो, हम साथ थे कभी
अभी एक पुरानी डायरी में
तुम्हारे पंजों की सिन्दूरी छाप देखी
तो याद आया...

वसंत की इस दोपहर


ओ मितवा...
लो फिर देने लगा है समय
चिहुंक कर हांक...
आने लगा है वसंत हौले क़दमों से
सूखे पत्तों की खडखडाहट से
खुसफुसाते फूलों पर भौरों की लड़खड़ाहट से...

एक नीम उदासी सी तारी
होती हुई इस गर्माती अलसाती दोपहर में
जब मितवा तेरे छूए हुए
उस वसंत की याद आ रही है !
बीता था सारा वह मधुमास
तुम्हारे ही गोद में सिर लुकाये
और हँसती रहती थी तुम, उन सांसों की
हल्की भाप मेरे गालों पर, ललाट पर
भौंहों पर लगाती रहती थी अंजन...
ओ मितवा, बोलो ना क्यों हुआ
वह वसंत जो गया, बस गया...
उस वसंत के बाद सारे मौसम खो गये !

अब लो यह वसंत तो बौराया हुआ
फिर आ धमका है...
तेरे नुपूर बंधे पैरों की
धमक कहाँ रह गई ?
उस बादामी रंग की चमक कहाँ रह गई ?
रेत उडती है आँगन पर, पूछती है पलट कर
तेरे पैरों के छाप कब फिर आयेंगे उकर ?

मितवा, मुझे भूले तो नहीं होगे ना तुम ?
जब भी आओगे, एक वसंत साथ लिए
आना कि सोचूँगा, मैंने पा लिये
हमारे सारे वसंत...
जो रह गये हैं अनछुए
तेरे-मेरे मीठी-मीठी बतकहियों से
मन के मधुर नाच से
डूबकर जिए जीवन के पलों की पाँत से

मितवा, राह देख रहा हूँ तेरी कि
एक दस्तक हो सन्नाटे में अचानक
बाहर निकलूँ और
तुम खड़े मिलो नम चेहरा लिए,
मुस्काते और आँसू ढुलाते, एक साथ...!  

(वसंत पंचमी - २०११)

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

दिल दुखता है बहुत...


ना दिलाओ याद...
ना कोई जिरह करो
बाबस्ता फिर उसी अफसाना-ऐ-उल्फत की
कि दिल दुखता है बहुत...
चाक हुआ जाता है !

बेरहम हुए वो जो
रहनुमा होंगे, जाना था कभी
अश्क अपने ही बहे,
खुद ही खाई जब शिकश्त...

कोई अपना बनते-बनते रह गया, या
ये बस अपनी आँखों का भरमाना था !
सारी हसरतों का सिला
एक मलाल रह गया यही...
हासिल होता जो चाहा था,
बस एक फैसले का
सूत भर फासला रह गया कहीं !

आज हम वही, रहगुजरों के
साये वही... ना कोई सदा, ना उम्मीद
ना इस दिल-ऐ-बेनूर के वफ़ा
का कोई मुरीद !
इस जाँ को तन्हा होना था, हो गया...

कौन होता है अपने जानिब
कौन जीता है, तेरी रूह में !
हम खुद ही जिए,
खुद ही मरे...
खुद ही डुबोई किश्ती
खुद ही तिरे...
खुद से खुद ही रहे हम
कौन क्या दिया, क्या ले गया !
किसने क्या बनाया हमको,
कौन हमें बिगाड़ गया !

फिर भी एक इल्तिजा है
ना कभी मेरी माज़ी की पूछना
यह जो वस्ल और हिज़्र की
रवायतें है, इनमें एक किताब
है ये शिकश्ताज़दा जिंदगी...
हर पन्ने पर कतरा-ऐ-खूँ है,
हर हर्फ़ पर ज़ख्म-ओ-नासूर मौजूँ है !
किसी सिरे को पकड़ कोई सवाल ना करना...
कि फिर दिल दुखेगा
फिर चाक हो जायेगा...!

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

शमशेर बहादुर सिंह की रचनाएँ - ३ (चुका भी हूँ मैं नहीं !)



चुका भी हूँ मैं नहीं !
कहाँ किया मैंने प्रेम
अभी !
जब करूँगा प्रेम
पिघल उठेंगे
युगों के भूधर
उफान उठेंगे
सात सागर !
किन्तु मैं हूँ मौन आज
कहाँ सजे मैंने साज
अभी !
सरल से भी गूढ़-गूढ़तर
तत्व निकलेंगे
अमित विषमय
जब मथेगा प्रेम सागर
ह्रदय !
निकटतम सबकी
अपर शोर्यों की
तुमतब बनोगी एक
गहन मायामय
प्राप्त सुख
तुम बनोगी जब
प्राप्य जय !
(रचनाकाल - 1941)

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

पा सके जो राह-ए-इश्क में अपना अजीज मुकाम

पा सके जो राह-ए-इश्क में अपना अजीज मुकाम
करता हूँ यारों बार-बार बा-अदब उनका एहतराम

तबाह-ओ-क़त्ल भी हुए सरे-राह उनके वास्ते
और खुद ही पे आया अपनी बर्बादियों का इल्ज़ाम

अब तक तो ना हुई मयस्सर हमको वह
यकीं था कि मिलेंगे वफ़ा-ओ-उल्फत के जो पैगाम

जिन रास्तों पर खामोश वीरानियों का नूर था
चलते रहते थे खुशी-खुशी लेकर हम तेरा नाम

आगोश में लेकर तुम्हें ज़श्न-ए-वस्ल मनाते
क्या डराती जिंदगी, क्या करते कोई फ़िक्र-ए-अंजाम

गया वक्त वो सारे लम्हें गए दूर हमारी जानिब से
सोचते हैं अब क्या खामियाँ हमीं में थीं तमाम

रकीबों के शहर में घूमता हूँ तन्हा "शेखर"
जब से बदलते देखे हैं रिवाज़-ए-दोस्ती के आयाम
२८-१०-२०१०

सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

पहले दिनों जैसा प्यार...

प्यार के शुरूआती दिनों को भरपूर जीओ दोस्त...
क्योंकि सिर्फ़ तब ही होता है,
रहता है पूरी तरह से,
ईमानदार प्यार...
सौ पैसा खांटी खुमार देता प्यार...
किसी बच्ची सा भोला और निश्छल प्यार...

जिसमें कौंधती है, प्यार करने वाले की आत्मा
और उसकी सच्चाई...
तुम्हारी फ़िक्र और परवाह वाकई सचमुच की होती है
तब, सचमुच जरा सी भी दूरी डरा देती है मन को
और बाँहों के घेरे का कसाव असली तड़प लिए होता है...
वह गर्मी भी खालिस होती है जो तपे हुए चेहरे,
सांसों और होठों से नुमांया होती है...
सारी प्रार्थनाएं सीधे कलेजे से निकलती हैं और
सबकुछ लुटाकर भी मजे में रहने वाली आस्था सच्ची होती है...

खेद है कि, फिर ऐसा रह नहीं जाता...
फिर तो सावन भी बरसता है, मगर उसकी आग महसूसती नहीं
साथ चलते हुए भी परछाइयाँ परस्पर लिपटती नहीं...
तुम्हें तड़प कर पुकारने वाली उस आवाज़ की आस में जिंदा रहते हो और
वही एक पुकार फिर आती नहीं...

फिर प्यार ना गाढ़ा, ना जुनूनी, ना विशुद्ध, ना गहरा,
ना किसी आवेग का रह जाता है !
मात्र एक खोखली उम्मीद की मानिंद...
जो एक-दूसरे से बमुश्किल निभ पाता है...!

प्यार को गुना-भाग, जोड़-घटाव...
किसी समीकरण में तौले जाने और
दुनियादार हो जाने से
पहले पूरी तरह से जी लो...
क्योंकि, फिर पलट कर नहीं आता है...
पहले दिनों जैसा प्यार...
फिर अपना-अपना कहते-कहते भी
अपना होने का भ्रम मात्र बनकर रह जाते हैं लोग...

फिर पूरी शिद्दत से
तुम उसी प्यार की कशिश को पाने के लिए
जुझने तो लगोगे...
मगर दोस्त... वह प्यार नहीं मिलेगा
ना फूलों और चाँद पर, ना भरी-पूरी रातों में, ना घर में, ना बगीचों में...
तलाशोगे अगर साथी की आँख में, चेहरे पर, उसकी बातों में...
और शारीरिक भाषा में... हताश होओगे यह पाकर कि
कोई गीली चीज दरम्यान से गायब है...
सिर्फ़ एक पथरीली सी हँसी है, जिसे तुम नहीं पहचानते और
बहुत सारा पानी सूख चुका है !

प्यार अक्सर दिन ढलते जाने पर
उपेक्षात्मक होता जाता है...
सैद्धांतिक रूप से तो...ठीक इसके उलट होना
और आदर्शवादी तौर पर...
ऐसा कतई नहीं होना... चाहिए...
मगर...
होता यही है...  

इस पर अफ़सोस करने की हालत में पहुँचने से पहले
खुलकर, डटकर... पूरी मौज के साथ
इस प्यार को जीयो मेरे दोस्त...!

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

सपने हाथी दांत नहीं होते

सपने हाथी दांत नहीं होते,
जिनको बेशकीमती तो कहा जाय...
मगर उन पर
इल्जाम लगे कि महज दिखाने के लिए हैं...
यथार्थ का छद्म सौंदर्य !
जिनके लिए खून बहे तो
कीमतों में तौला जाय...
और बेशर्म खरीद-फरोख्त हो !

सपने
गाढ़े लहू से सींचे गए होते हैं... मेरी दोस्त
सपनों के लिए सजावटी कुर्बानियाँ नहीं दी जातीं
कि जिसे आने वाला वक्त
जज्बातों की प्रदर्शनियों में रखे और
नीलामी के वास्ते बोलियाँ
ऊँचें सुरों में
ज़माने भर की बेहयाइयों के साथ लगायी जायं

हर कदम पर
जितनी दुखी है
मेरी रूह,
जितना टूटा है मेरा बदन
जिस वक्त...
मेरी ईमानदारियों की रौशनी ने तुझे
रास्ता दिखाने की
पुरजोर कोशिश की है...
तकलीफ का पूरा अंधड़
मेरे भीतर से गुजरा है...
और आह मेरी तुम भी सुन नहीं पाई हो...!
हाँ, मेरे सपनों की महक
का नीम अहसास तुम्हें हुआ तो जरूर है !

प्रेम करना और सपने देखना
बहुत आसान है मेरी दोस्त...
सपनों में पकते हुए रिश्ते के लिए ईमानदार होना
उतना ही बड़ा इम्तिहान...
जिससे मैं भी गुजरा हूँ, तुम भी गुजरी हो...

मेरे सपने जिसमें तुम भी शामिल रही हो,
तुम्हारी तरफ वालों के
कायदों और नफा-नुकसान की तमीज से बेखबर
खालिस थे,
और महज़ जिंदा होने की बात किया करते थे...
सौदेबाज़ भी नहीं हुए...
तुमसे दगाबाज़ भी नहीं हुए...

आज उन सपनों को रिश्तों की मानिंद निभाता हूँ
बहुत है कि, सिर्फ़ इसी तरह तुमसे भी जुड़ता हूँ...

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

अभी मेरा हमसफ़र

अभी मेरा हमसफ़र
मेरे पहलू में मुँह छुपाये सो गया है...

(उसका यह भोला सा भरोसा मुझ पर
किस कदर आश्वस्त करता है -
कि जिंदगी नि:संदेह लाजवाब है !...
एक बार यकीन करके देखो !!!)

केशों के जाले से बिखरे उसके चेहरे पर
रौशनी पर परछाइयों के आड़े-तिरक्षे धारे बनाते हुए...
निर्मल सांसों की हरारत से रह-रह कांपते नथुने...
अधखुले रेशमी होंठ, छू लूँ तो दाग पड़ जायें !
...यह रात का वक्फ़ा... उफ़
लगता है, एक जमाने के लिए ठहर गया है !
उसकी मुंदी पलकों के नीचे
उजली-उजली दो वही आँखें हैं, जो हरदम मुझे
सुख के उजाले देती रहती हैं...बिन कहे...बिन माँगे...
(दुःख कहीं हुआ तो उन आँखों की ताब सह नहीं पाता...)

मेरा तमाम वजूद लंगर डाले उसके घाट पर
ऐसे टिक गया है...
जैसे बहुत भटकते हुए अचानक अपेक्षित पड़ाव
मिल गया हो...

अब इस सर्द रात की ख़ामोश ठण्डी
धुंध के दरम्यान
उसके पूरे जिस्म की खुशनुमाँ गर्माहट से
सिंकता हुआ मैं...
इस सफर-ए-हयात में
इस अजनबी चौराहे पर
एक पुराने लोहे के खम्भे पर
सर को टिकाये,
उसे अपनी बाजुओं में भरे हुए
अपने जिंदा होने का भरपूर उत्सव मना रहा हूँ...

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

साथी तुममें सावन है...

ओह मेरे साथी,
देखो पहाड़ों पर सावन है...
स्फूर्त हरियाली में सावन है
भीगी हुई चिर सद्यःस्नाता सी ये रातें
इन रातों में सावन है
तप कर जो कुन्दन हुईं,
तेरे इन्तजार में,
उन सांसों में सावन है

मन की क्षितिज के ओर छोर में
पाता हूँ
पावस के समृद्ध पयोधर सा
तुम्हें साथी
जानता हूँ कि
तुम में सावन है...

ये किस्सा...
गुनगुनाते हुए भीगते-भीगते दूर सड़क
पर वक्त काटने जैसा है...
छींटों को जीभ से चखने जैसा है
और आल्हाद का एक दरिया
भीतर उफनता है...
मैं खुश हूँ, मेरे भीतर एक सावन है !

हर एक सपना सावन है... साथी...
सपने का एक छोर तुम थाम लो
एक मेरे पलकों पर बाँध दो...
चलो, गीला हो जाएँ दोनों...
अगर इस बार नहीं, अगली बार कभी...
है जो बाकि इन्तजार अभी ...
कि,
फिर एक सावन तो ऐसा भी आयेगा
भीगेंगे दोनों खूब मन भर कर
तन जोड़ कर...
खिलखिलायेंगी... झुकती हुईं डालें नीम की
नाचेंगी बूंदें सीवान पर के नद्य पर
महकेंगी आँगन की दूब घनीं...

सावन के  असर सारे
यहाँ से जब लुप्त हो जायेंगे
फिर माँगने को सावन भरपूर
हम सावन के गीतों में गाए जायेंगे...!

३०-०७/१९-८-२०१०

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

काश यह कोई दूसरी दास्तां होती !

उसे बहुत कुछ देना चाहता था, अपना दामन फाड़ के सब दे देना चाहता था, और जिंदगी भर की तसल्ली हासिल कर लेना. ये उन दिनों के हालातों के तकाज़े की बात है, वरना मेरी अंजुलियों में इतना था कि वो तृप्त हो जाती, मैं सब पा जाता... वह फिर कभी भी आसमान पर चाँद देखकर निराश नहीं होती... ना उनींदी रातों में उसके माथे पर सलवटें आतीं... कुछ ऐसा था मेरे पास जो हर जिंदा रूह के पास होता ही है; कम-बेसी, मगर होता तो ज़रूर 
है. अगर आपको याद हो तो, वही चीज जो 'लहनासिंह' 'सूबेदारिन' को देना चाहता था, जो 'काली' 'ज्ञानों' को  और 'परीकुट्‌टी' और 'करूत्तम्मा' एक-दूसरे को देना चाहते थे. सब समाज की चौखट के पार दूसरी दुनिया में जाते हुए दे पाये थे ! खैर,

सपना यहाँ से शुरू होता है...

बहुत बड़ी-बड़ी और गहरी नदियों के पार, घने और दुर्गम्य जंगलों के नीम अंधेरों में, किन्हीं बुजुर्ग पहाड़ों की सबसे ऊँची चोटी पर जहाँ सूर्य हर शाम उस कस्बे के वाशिंदों की भोली निगाहों और मेहनतकश बाजूओं से पनाह लेता है. आसमान पर हर शाम का रंग नया होता है... उसके पीछे मैं एक सदी, एक उम्र भागा... उस मादक-गंध के पीछे-पीछे भागा... उस अनजानी महक फेंकते अदृष्ट सोते के पीछे भागा... और मेरे पैरों में कड़ियों की मानिंद सारे फलसफ़े, सभ्यता के नियम और नैतिकताएँ-व्यावहारिकताएँ, सारी कविताएं, सब किस्सेकोताह बंधे थे; मेरी कमर से लिपटा पूरा इतिहास घिसट रहा था...असफलताओं का सुनहरा इतिहास...!
दूर किसी ऐसे आबशार की तलाश में, जो मेरे सपने के भीतर सपनों में था, मैं प्यास से हलकान हो उसकी आस में बेतहाशा भाग रहा था, लेकिन मैं जितना उसके पास आता गया, वह उतना ही दूर लगता रहा. बचपन में माँ की कही एक बात याद आई, "पहाड़ करीब दीखते हैं, मगर जितना उनके पास बढ़ते जाओ, वे उतने ही दूर होते जाते हैं."
"ताउम्र ढूँढता रहा मंज़िल मैं इश्क़ की / अंज़ाम ये के गर्द-ए-सफ़र लेके आ गया..." जगजीत सिंह की आवाज़ गुनगुनाने लगी... हलक की क़ैद से एक रूहानी हँसी छूट कर हवा में गूँजने लगी.

सपने में मरोड़ और ये बिखर गया...

साथ वाली प्लेटफॉर्म पर लगी ट्रेन की तेज़ सीटी और एक धक्के से होश आया. मैं सफर में था. मेरी रैटिना पर पहला अक्स उभरा, सामने वाली सीट पर बैठा वह नवविवाहित जोड़ा जो एक-दूजे से रेशा-रेशा चिपका था. वे हँस-हँस कर बातें कर रहे थे और इतना पास होने के बावजूद मुझे उनके शब्द सुनाई नहीं दे रहे थे.

मैं विभम्र की स्थिति में था...

रेल पटरियों पर जुगलबंदी करती हुई सरपट भाग रही थी. पहाड़, खेत, नाले, जंगल, गाँव-जवार, झोंपड़ियाँ, नदी, खाईयाँ... हरेक शै उल्टी दिशा में दौड़ रही थी. क्या वक्त इसी तरह से पीछे फिर सकता, उल्टे...उल्टे...!!! हवा में कोई हँसा ! मगर घोर दृष्टिदोष ! भाग तो मैं रहा था, वे तो वहीं थे...स्थाई रूप से... भूत और सच्चाई की तरह मजबूत... अटल ! 
मैं गेट पर आ कर खड़ा हो गया था और दरवाजे की हैंडिल पकड़ कर खड़ा रहा. हवा के झोंके पूरे बदन से टकराने लगे, गाड़ी की रफ्तार से शरीर हिचकोले लेता था. जानता था इस हालत में वहाँ वैसे खड़े रहना खतरनाक है, मगर मैं दिल की ज़िद से मज़बुर था! "कामेश्वर, जब बुद्घि कोई उपाय नहीं सुझाती तो दिल की जिद सुन लेने में कोई हर्ज नहीं...?" अपने भीतर कोई दार्शनिक की तरह कह रहा था, "और, साफ कर दूँ, दिल की सुन लेना जुनूनियत है! हर किसी के बस की बात नहीं...बस जज्ज्बा होना चाहिए"
अपने माज़ी से मुख़्तसर आवाज़ें गूँजने लगीं... "सुखसिंग, वह मर जायेगा देखना, उसकी बीबी, दो सुंदर-सुंदर बेटियाँ हैं... वह उनके सामने रोज ज़लील होना आखिर कितने दिन बर्दास्त करेगा ? मरेगा..." ये केवल सूचना थी या जुगुप्सा या बेचैनी या सहानुभूति...? ना तब तय कर सका था, ना अब. मगर सुखसिंग की आवाज़ में निश्चय ही कठोरता, भर्त्सना, उपेक्षा थी, "मरे, मरेगा ही, उसकी बीबी बेहद सुंदर है, देखा नहीं तुमने... बहुत सुंदर...! उस जैसी बेशक्ल वाले को ऐसी सुन्दर बीबी...! दस दुआर मुँह मारेगी, बीस जगह जूठी होगी... ये मरेगा नहीं...?" 
"छी:..."

और सचमुच एक रोज़ उस बेशक्ल वाले आदमी ने आत्महत्या कर ली, एक सुबह अपने ईष्टदेव के मंदिर के प्रांगण की सीढ़ियों पर बैठे-बैठे आप पर मिट्‌टी का तेल डाल कर लपटें उठा दी थीं. लपटों में अपनी ज़िंदगी के सब शको-शिकायतें, मलाल भसम कर गया. वह अफवाहों के कारण मरा था; उसके मरने पर तमाम अफवाहें फैलीं... 
मगर वह भला आदमी था, 
मगर शायद वह बेहद कमजोर आदमी था ? एक उदास... बेशक्ल वाला आदमी...
...और एक दिन मंदिर की सीढ़ियों पर आत्महत्या करना जिसकी नियति थी... बिल्कुल उसी तरह, जैसे एक निहायत खूबसूरत पत्नी पाना... 

मैं झटके खा रहा था. सामने नंग-धड़ंग बच्चे खेतों में जमे पानी में नाचते-कूदते धम्मा-चौकड़ी मचा रहे थे. एक-दूसरे पर कच्ची मिट्‌टी के ढेले फेंकते... धीरे-धीरे वह दृश्य भी पीछे गुजर गया... 

उस आदमी की दो बेटियाँ थीं, प्यारी-सी बेटियाँ... जवान होती हुई बेटियाँ... इंद्र की एक अप्सरा का नाम मिला था बड़ी को  और वह अपने पाए हुए नाम को साबित भी करती थी; कि इस पर सिर्फ उसी का हक़ हो सकता था. साँवली सुरबाला ! 
'कामेश्वर, फासले तब तक होते हैं जब तक तुम कदम उठाने से हिचकिचाते हो...'
'मगर कुछ फासले फिर भी बाकी रह जाते हैं"'
'अपने दर्शन को ले कर एक दिन नेस्तनाबूद हो जाओगे, देखना तुम... हुँह्‌...!'

जेहन में ख्यालों की आमद एकाएक सुस्ताई तो मैं अपनी सीट पर दोबारा आ बैठा. मैं मृत्यु से बच कर आ गया था, जो मेरे कदमों तले गेट के पायदान के नीचे सरपट भाग रही थी. लेकिन मैं मर चुका था! बहुत पहले, बहुत-बहुत पहले... 

'कामेश्वर, तुम पागल हो, बेवकूफ़ हो, तुम्हारी इस जैसी बोसीदा-कल्लर कहानियाँ पहले भी बहुत दफे बताई जा चुकी हैं. बेकार की मशक्कत कर रहे हो. सिर्फ खुद को तसल्ली देने के लिए, सिर्फ खुद को खुद के सामने अफ़सानानिगार साबित करने के लिए...' 

ट्रेन के बाहर बारिश पड़ने लगी थी. प्रदेश में पिछले कुछ दिनों से मानसून के दिनों के आने के संकेत मिलने लगे थे. चट से जोरदार बरसात...! खिड़की के शीशों से टकराती ज़िंदा बूँदें भीतर चू कर, मेरे बदन से मिल कर कुछ अपनापा जताने को बेताब हुई जा रही थीं. मैं मन मार कर नव विवाहित धनाढय बंगाली जोड़े को चोर नज़र से बार-बार ताक लेता था. उन्हें भी बारिश पसंद आ रही थी. लड़की के चेहरे की पुलक उस खुशी की शिनाख्त कराने को उभर आई थी. लड़कियों को बारिश में भीगना भाता है, यह उनका मौलिक-निजी मनोविज्ञान है. 
तालाबों में, हरे खेतों के बीच जिनका ठिकाना बना था, नए-नए ताजे उजले गुलाबी चमकदार कंवल खिले थे, चौड़े-चकत्ते पत्तों के ऊपर तैरते... पहाड़ पर बादल थे. लंबी पहाड़ी श्रृखंला का  आसनबोनी और राखामाइंस स्टेशन के बीच हिस्सा... कह सकता हूँ, हरे-भरे समृद्घ पहाड़ों पर मैंने भी "बाबा"  की तरह 'बादल को घिरते देखा है', तिरते देखा है.

वो पहाड़ों के आँचल में पसरी हरियाली बस्ती में रहती थी. कहा करती थी, "तुम आओगे तो हम घूमने चलेंगे. तुम आना. आओगे ना ?" 
"घूमने, कहाँ ?"
"पहाड़ पर." 
"पहाड़ पर ?"
"हाँ, कितना अच्छा लगता है ना पहाड़ पर... ऊपर... और ऊपर चढ़ते जाने का मन करता है. और वहाँ से पूरी दुनिया कितना सुंदर, कितनी सूक्ष्म लगती है. खुद के वृहत्तर हो जाने का अंह होता है, पहाड़ के साथ पहाड़ जैसा वृहद्‌... और सबसे बड़ी बात, वहाँ ज़मीन और आसमान के बीच सिर्फ तुम और मैं होंउंगी बुद्धू... सिर्फ तुम औ..." तब नहीं जनता था कामेश्वर कि, पहाड़ों के साथ रहने वाली, पहाड जैसी ही कठोर भी हो जायेगी... कामेश्वर ने पूरे आवेश से उसके दहकते कपोलों को अपनी अंजुली में भर लिया, माथे पर एक गाढ़ा चुम्बन दिया...  
"तुम इतने अच्छे क्यों हो ?" इंद्र की अप्सरा जानना चाह रही थी. 
सफेद धारियों वाले नीले फ्रॉक में रोशनी का एक पुंज साथ चल रहा था... कामेश्वर उसके तिलिस्म के दायरे में कैद होता जाता. कदम-दर-कदम, साँस-दर-साँस, तारीख-दर-तारीख... सम्मोहन के पार दूसरी दुनिया में जहाँ दो साँवरी-साँवरी बाँहें होतीं. मधुसिक्त रक्तिम होंठ होते और उन पर इसरार होता, "आज सजीव बना लो/अपने अधरों का प्याला/भर लो, भर लो, भर लो इसमें/यौवनमधुरस की हाला..."

एक अभिशप्त अप्सरा...

कामेश्वर नवविवाहित जोड़े को देखता है, वे मुँह जोड़े बैठे हैं. क्या इस हद तक एक-दूसरे में गुम हुआ जाता है, जा सकता है ? शायद हाँ, तो इसमें ताज्जुब क्या ? क्या उसने और "उसने" भी ऐसे ही गुम कर देने वाले पलों की चाह नहीं की थी...? चाहना और चाह को नेमत की तरह पाना हमेशा कहाँ हो पता है...

बारिश पीछे छूट गई है... बरसने वाले बादलों की टुकड़ी पीछे कहीं ज़मीन के किसी टुकड़े पर बंधी रह गई...  
अब अस्ताचलगामी सूरज की सुनहली आखिरी किरणें काले बादलों के एक धब्बे की आड़ से झाँक कर अपनी अंतिम आभा बिखेर रही थीं. ताकि बूझने से पहले निशाँ छोड़ जाऐं, उष्मा छोड़ जाऐं... 
'तुम तो अपने उन दिनों को इस मुकाम तक ना पहुँचा सके, तुम्हारा दिन आधे जल कर ही बुझ गया!' 
कामेश्वर की तरफ नवविवाहिता एक बार कनखियों से देखती है, फिर हिना रचे हाथों से अपने बालों को चेहरे से हटाती हुई अपनी दुनिया में लौट जाती है. कामेश्वर उसकी मुस्कान की एक बेहद नाजुक कौंध में अपने लिए अजनबियत, तुच्छता और उपेक्षा का स्वाद पाता है. 

"बाबा के साथ मेरा सब चला गया कामे..." 
कामेश्वर चुप है. उसका बोलना बेकार है. वह धीरे से उसका सिर अपने सीने से दबा लेता है. कहना चाहता है कि मैं तो साथ हूँ हमेशा, पर खामोशी के ज़रिए इस बात को उसके अंदर डाल देना भी चाहता है, इसलिए बोलता नहीं, बल्कि उसे थोड़ा और कस लेता है. 
"सपनों से बाहर निकलो कामे", वह सिर उठा कर सीधे उसकी आँखों में देखती है, "बहुत मुश्किल हो गया है अब सब कुछ. वह दिन नहीं रहे... वह वक्त नहीं रहा. वैसा कुछ नहीं होने वाला जैसा हमने सोचा था." 
"क्या तुम भी वही ना रही", कामेश्वर घुटी-घुटी आवाज़ में कहता है. 
"हाँ, नहीं रही. कैसे रहूँ बोलो...?" कैसी पीड़ा उस आवाज़ में उस दम... कामेश्वर को कुछ समझ नहीं आ रहा. वह उसे और भी कस लेता है, बिल्कुल एक डरे हुए बच्चे सा, जो अपनी माँ से और भी चिमट जाता है, अगर वह एकाएक उसका हाथ छुडाकर जाने लगे... 
वह उसे अचानक आसमान का तारा लगने लगी है... दूर की आशा...! वह भारीपन उठाऐ गुरू स्वर में कहे जा रही थी, "सारी जिम्मेदारी चाचाजी ने संभालने की बात कही है. माँ और मुझ पर भी लोग जहान ने कालिख के छींटे उड़ाए हैं. माँ की तो ज़बान चली गई... बाबा के साथ मेरा सब चला गया... सब तुम्हारी आँखों के सामने है," एक सिसकारी शब्दों की गूँज के पीछे से फूटती है धीमे से, "तुम मेरे लिए बस एक नामुमकिन हकीकत बन कर रह गए कामे...". 
एक अप्सरा अभिशप्त हो गई थी, एक मामूली कमजोर इंसान बन गई थी... अपनी सादगी में, मज़बूरियों में, और फूटफूट कर रो रही थी...
 "मुझे अपना भरोसा दे सकती हो ना...तेरे चाचाजी से मैं मिलूँ..."
"खबरदार कामे...", आहत के चरमोत्कर्ष पर वो चिल्लाई थी, "भूल कर भी ऐसी गल्ती ना करना...वरना अबकी माँ और मेरी राख उड़ेगी... तुम यही साबित कर दोगे ना कि हम वाकई में रंडियाँ हैं... कि चाचाजी भी औरों की तरह यही मानने लगें कि माँ के कारण बाबा..., मोहब्बत नाम के रिश्ते को कोई नहीं जानता कामे कि उसका वास्ता दिया जा सकेगा... तुम हमारे बीच के इसी रिश्ते को गाली बना दोगे...छोड़ो रहने दो. यह खुबसूरत है कामे, इसे छोड़ दो ऐसे ही... मुझे जीते जी मरना तो है... पर माँ के लिए इतना तो करूँगी ही..."
कामेश्वर कहना चाहता है, कि मुझे भी मौत दे रही हो... पर निरूत्तर था, वह आगे भी कह रही थी, "अगर माँ ने ही प्यार भी किया तो क्या बुरा किया...किसी को दगा नहीं दिया... माँ परिवार को सब कुछ तो दे रही थी, क्या अपने को कुछ देने को चाहना उनका कसूर हो गया, कामे क्या तुम बात को, मुझको समझोगे ? मेरी माँ को समझोगे ?"
कामे सदमें की गिरफ्त में था, उसके जाने के बहुत देर बाद तक निशब्द...  आँख पोंछने और दिल को समझाने की फाल्तू कोशिश करता सा... उसके कानों में पत्थरों और टूटे हुए क़दीम पुलिया से टकराती स्वर्णरेखा का चीत्कार भर रहा था.

मैंने खिड़की के बाहर सुना, एक शोर अब भी था; दौड़ती ट्रेन की हाँफ पटरियों पर से शोर बन कर उठ रही थी... 
इक्कीस दिसंबर की एक सर्द भोर में, उसके सभी सपने ज़रीदार भारी लाल जोड़ा पहने, गहनों से लदे-फदे, सिर के नहर में कमला सिंदूर डाले सात फेरों के चक्कर में मेंहदी वाले हाथ उलझाए एक अजनबी के साथ गुम हो गए. 
'तुम सोचते रहो कामेश्वर, काश यह नहीं हुआ होता... काश, तो... यह कोई दूसरी दास्तां होती...! जिसे तुम मुस्कराहट और नशे में चूर होकर बांच रहे होते, जैसे वह बंगाली जोड़ा इस समय उसे जी रहा है...'

सामने बैठा जोड़ा अभी अचानक किसी उत्तेजना से खिलखिला उठा था, ठीक इसी पल गाड़ी पुल पर से गुज़रने लगी... और धड़धड़ाहट में उनकी हँसी धँस गई... मैं आँखें बंद करके एकबारग़ी चमक कर आँखें खोल बैठा था. अपने भीतर भी एक धड़धड़ाहट महसूस की. अपने आप को बहलाने के लिए कुमार शानू का कोई गीत गाने लगा, इतने धीमे कि सामने वाला जोड़ा सुन न सके. 
वैसे ही जैसे, वह बतियाते हैं और मुझे सुनाई नहीं देता !...

बुधवार, 4 अगस्त 2010

इश्क में नमाजी बन गया

इश्क में नमाजी बन गया अब तो
वो आवारा काफिराई जाती रही मेरी...
दर-ऐ-यार दरगाह बन गया मेरे वास्ते
सर नवाता हूँ मौला, वजू करता हूँ
शब-ओ-सहर सिर्फ़ नाम-ऐ-यार को...
वफ़ा की बंदिशें कहाँ किसको
होती नसीब ऐसे, ऐ साहेब मेरे
बंदगी का लुत्फ़ पाया बाद मुद्दतों...
वो मुस्काती ऐसे कि सारी नेमतें
डाल रही हो मेरी झोली में
ऐसा हो खुदा मेरा, क्यों पूजूँ बुतों को...
कितनी राहत है उस वक्त-ऐ-वस्ल में
तस्कीन देता हुआ उल्फत उसका
रब्बा इस हसीन माज़रे में उम्र तमाम हो...
०३/०८/२०१०

मंगलवार, 29 जून 2010

आज उसके रुखसार को जी भर देखा


आज उसके रुखसार को जी भर देखा
मुस्कुराई वह या वस्ल की वो राहत थी...

जर्द चेहरे पर भी एक नूर सा आ गया
उस नज़र में भी क्या बरकत थी...

गुल भी खिले थे, खार भी दरम्यां थे कई
उल्फत जो इक जिद थी, मुक्कमल हसरत थी

हमने पत्थरों पर लिखी एक दास्ताँ प्यारी
मोहब्बत हमारी एक मासूम सी इबारत थी

पत्थर तो आए बहुत हमारे सर को
इश्क में भी वो फौलाद-ए-नजाकत थी

अब तो बाकि उम्र का जाने हासिल क्या हो
गले लगकर गुज़रे लम्हात ही सारी नेमत थी

पेशानी पर उसके पसीना, रुख पे अश्क ढुलके
थोड़ी देर को ही रूबरू थे,फिर तो क़यामत थी

- २९/०६/२०१० की सुबह

रविवार, 23 मई 2010

प्रेम की कविता

सुनो,
प्रेम पर कवितायेँ लिखने का
मौसम फिर नहीं आएगा...
धुँए और गर्द की दीवार के आरपार
धूमिल होती हुई लौ को
सँभालने का
दौर फिर नहीं आएगा...
किसी फरेब में उलझे मत रहना,
तुम्हारी पक्षधरता का इम्तिहान
फिर नहीं आएगा...

अभी शहरी और गैर-शहरी
जंगलों में हुए
मासूम हत्याओं को
क़त्ल साबित करने में
वक्त लगने वाला है बहुत,
मगर अन्तोगत्वा जब अपराध सिद्ध हो जायेगा,
तब रोटी खुरचने पर कातिलों की
शक्ल उभर आएगी...

जान लो कि,
क्यों आसमान के चेहरे पर
लाल इन्द्रधनुष खिला रहता है आजकल...
क्योंकि जिनकी कमर पर चर्बी है,
कानून की भाषा और अस्मत
उनकी कांख में दबी है,
एडियों पर गिरवी है...
पहचान लो और
दर्ज करो इस समय को...
जहाँ सत्ता सिर्फ़ एक बेहया
कामोत्तेजना जैसी है...

गिद्ध भी सफाईकर्मी हैं,
किरदारों को तवज्जो देने में
समय लगता है...
लेकिन आखिरकार,
सफेदपोश दीमकों, तिलचट्टों और कौओं
का जोर कम पड़ जायेगा...
राइफलों के कारतूस ठस्स हो जायेंगे...
धान की बालियाँ बेखौफ़ हो जाएँगी...
पसीने वालों को उनका लंबित महत्त्व
अदा किया जायेगा...

तो उस और इस समय के बीच
खून के कतरों से नम,
और उत्साह में पगी हुईं,
प्रेम पर कवितायेँ लिखो...
ये जरूर लिखी जानी चाहियें...
क्योंकि प्रेम करते हुए भी प्रतिशोध
लिया जा सकता है
इस बर्बर समय से...

-शेखर मल्लिक
२१-२२-२३/०५/२०१०

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

प्रेम की परिभाषाएँ...

सच्चा प्रेम कभी प्रतिदन नहीं चाहता - कबीरदास


प्रेम आँखों से नहीं ह्रदय से देखता है, इसलिए प्रेम को अंधा कहा गया है - शेक्सपीयर


प्रेम कभी दावा नहीं करता,वह हमेशा देता है. प्रेम हमेशा कष्ट सहता है, कभी झुंझलाता नहीं है - गांधी


प्यार आत्मा की खुराक है - कन्फ्यूशियस


प्यार समर्पण और जिम्मेदारी का दूसरा नाम है - बेक
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