[गुंजेश उर्जावान युवा कथाकार हैं. फिलहाल महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्विद्यालय, वर्धा में जनसंचार की पढ़ाई कर रहे हैं. पिछले ३०-३१ मार्च २०११ को
जमशेदपुर में करीम सिटी कॉलेज में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रायोजित सेमीनार- "महिला लेखिकोण के उपन्यासों में पुरुष" विषय पर उनके द्वारा पढ़ा गया परचा हम यहाँ साभार दे रहे हैं.]
‘कृष्णा सोबती के उपन्यासों में पुरुष पात्रों का चित्रण’, यही वह विषय है जो मैंने चुना है। मैं समझता हूँ कि कृष्णा सोबती और उनके उपन्यासों में पुरुष पात्रों पर बात शुरू करने से पहले एक बार हमें उन परिस्थितियों और परिदृश्यों को देख-समझ लेना चाहिए। जिसमें यह बहस चल रही है। इस समय पूरे विश्व में और खास तौर से एशियाई देशों में ‘स्त्रीवाद’ को जिस नज़रिये से देखा जा रहा है। ‘स्त्रीवाद’ के जिस पक्ष को पापुलर मीडिया के जरिये बार-बार दिखाया जा रहा है। यह बिलकुल ठीक समय है जब, उन सब के बारे में पड़ताल कर ली जानी चाहिए। अपने मूल रूप में ‘स्त्रीवाद’ एक मुक्तिगामी समाज कि परिकल्पना है जहां लैंगिक आधार पर किसी तरह का शोषण नहीं होगा। ‘स्त्रीवाद’ पहले एक दर्शन है फिर राजनीति, यह हमें समझना होगा। इसका उदेश्य पितृसत्ता को सिर के बल खड़ा करना है न की पुरुषों को। हाल के वर्षों में स्त्रियों का जो लेखन चर्चित रहा है और जिन लेखिकाओं पर खूब बहस हुई है उसमें जिस तरह के समाज का चित्रण है वह एक विक्षिप्त समाज लगता है। जिसमें ‘पुरुष’ का सारा ध्यान स्त्री की ‘योनिकता’ पर केन्द्रित है। एडवर्ड सईद ने हमें संशयवाद का अच्छा हथियार दिया है। मैं समझता हूँ हमें इस पूरे परिदृश्य पर संशय करना चाहिए, शक करना चाहिए, सवाल करने चाहिए। और सवालों के जबाब तो हमें ढूँढने ही होंगे जो जबाब हमें मिल रहे हैं उनपर भी हमें सवाल करने होंगे। लोकप्रियता की भी अपनी रजीनीति होती है। ‘स्त्रीवाद’ का लोकप्रिय पक्ष क्या है? मुक्त सेक्स! पितृसत्तात्मक समाज ‘स्त्रीवाद’ की आलोचना और व्याख्या दोनों ही इसी आधार पर करता है और ‘स्त्रीवाद’ के इसी पक्ष को प्रचारित भी करता है। शायद इसलिए जब हम हाल के वर्षों के चर्चित महिला लेखिकाओं के उपन्यासों पर नज़र डालें तो हम देखेंगे कि इनके अंतर्वस्तु उन्हीं व्याख्याओं को पुष्ट करते हैं जो पितृसत्तात्मक समाज ‘स्त्रीवाद’ के परिपेक्ष में करता है। मेरे कहने का उद्देश्य यह है कि आज ‘स्त्रीवाद’ के सामने दोहरे संकट हैं जहां उसे ‘पितृसत्ता’ के खिलाफ समानता कि लड़ाई लड़नी है वहीं तात्कालिक संदर्भों में उसे पितृसत्ता के नए-नए अवतारों और मुखौटों को पहचानने की ज़रूरत है। आज ‘स्त्रीवाद’ को जहां यह साबित करना है कि वह इस भूमंडलीकृत दौर में उस तथाकथित आधुनिकता का औज़ार नहीं है जहां स्त्रीमुक्ति का अर्थ ‘फ्री सेक्स’ है। साथ ही उसे अलग अलग जगहों पर तालिबानियों, खाप पंचायतों और बहुतेरे जड़तावादी संस्थानों से लोहा लेना है। वहीं उसे आधुनिकता की परिभाषा भी गढ़नी है जहां स्त्री समानता का अर्थ बहुआयामी है। दरअसल दोष महिला लेखिकाओं का उतना नहीं है जितना आलोचना दृष्टि का है। आचार्य शुक्ल ने हिन्दी के प्रारंभिक आलोचना के संदर्भ मे कहा भी है कि “उसका स्वरूप प्रायः रूढ़िगत (कन्वेंशनल) रहा”1 आज भी हिन्दी आलोचना उससे बहुत बाहर नहीं आ पाई है। हिन्दी के पुरुषवादी आलोचकों ने ज़्यादातर महिला लेखन को ‘महज़ देह’ विमर्श तक समेट कर रख दिया है और जहां भी यह लेखन गहरे विमर्शों में गया है उसे ‘पश्चमी फेमिनिज़्म’ का ‘बौद्धिक विलाप’ कह कर उसका माखौल उड़ाया है।
इसलिए हमें लोकप्रियता के पैमानों को परखना होगा और ‘स्त्री’ लेखन को देखने समझने की नई दृष्टि अपनानी होगी। ‘नारीवादी’ लेखन को हमें नारीवादी आलोचना दृष्टि से देखना होगा। तभी हम समझ पाएंगे कि वहाँ ‘देह’ सिर्फ ‘देह’ नहीं है, वह एक प्रतीक है। और देह कि आज़ादी पितृसत्ता से आज़ादी है। हमें महिला लेखन को किसी तरह के आरक्षण देने कि ज़रूरत नहीं है पर यह तो हमें समझना ही होगा कि “पुरुष प्रधान समाजों में सदियों से महिलाओं का दमन और शोषण होता रहा है।....इसलिए तमाम महिला रचनाकारों ने इसी ‘एंग्जाइटी आफ आथरशिप’ के मानसिक फ्रेम में रचना कर्म को अंजाम दिया है”।2 हमें यह समझना होगा कि “स्त्री लेखिकाएं समाज में स्त्री के लिए स्वीकृत भूमिकाओं पर लिखकर अपने लिए ‘स्पेस’ निर्मित करने कि कोशिश करती है पर पुरुष जब उन्हीं विषयों पर लिखता है तो उससे स्त्री के लिए ‘स्पेस’ निर्मित नहीं होता बल्कि ‘स्पेस’ छिनता है”।3 हमें महिला लेखन को किसी सहनुभूति के नज़रिये से देखने कि ज़रूरत नहीं है, बल्कि इन्हें भी सहज जीवन की उस अभिव्यक्ति के रूप में पढ़ा जाना चाहिए जिसमें हम बाँकी लेखकों को पढ़ते हैं। कृष्णा सोबती का पूरा लेखन इसी का आग्रह करता है।
कृष्णा सोबती ‘स्पेस’ बनाने वालों में अग्रणी हैं। सोबती इसका दावा नहीं करतीं हैं उनका मानना है कि दावा करने का अधिकार सिर्फ दार्शनिकों के पास होता है।4 वह ‘नारीवाद’ को समग्रता में समझती हैं और उसे मानवतावाद के निकट लेजाकर अपने उपन्यासों में दर्ज़ करती हैं। सोबती ने उपन्यासों में पुरुष पात्रों का चित्रण उपन्यास के देश-काल के हिसाब से किया है। और वे पुरुष पात्र कहीं भी बहुत ‘लाउड’ नहीं हैं। वे पुरुष पात्र वर्षों से चली आ रही स्थापित पितृसत्ता के वारिस हैं। ‘डार से बिछुड़ी’5 कृष्णा सोबती की पहली रचना मानी जाती है। उपन्यास की कहानी वैसे तो नायिका पाशो के इर्दगिर्द ही बुनी-बसी है लेकिन कहानी की पूरी डोर पुरुष पात्र ही थामे हैं। पाशो एक ऐसी नायिका है जो सिर्फ ‘करने को’ मजबूर है, यह मजबूरी उपन्यास के पुरुष पात्र पैदा करते हैं। महिला लेखन में पुरुषों के चरित्र चित्रण को समझने के लिए हमें उपन्यास में महिला पात्रों के संवादों को समझना होगा। ‘डार से बिछुड़ी’ उपन्यास की कहानी फ्लैश बैक में आत्मकथात्मक शैली में चलती है।
“जिएँ ! जागें ! सब जिये जागें !
अच्छे, बुरे, अपने, पराये- जो भी मेरे कुछ लगते थे सब जीएँ !
घड़ी भर पहले चाहती थी कि कहूँ सब मर-खप जाएँ। न कोई जिए न जागे। मैं मरूँ तो सबको तो सबको ले मरूँ ! इस अभागी के ही जीने के लेख बिसर गए तो कोई और क्यों जिए? क्यों जागे? पर कौन होती थी मैं अपने दुर्भाग्य से हरी-भरी बेलों को जला देने वाली !”5
यह पाशो, जो उपन्यास कि नायिका है, के संवाद हैं। यह कृष्णा सोबती का ही नज़रिया है जो ‘मर-खप’ जाने को अंतिम विकल्प नहीं मानती है। पाशो एक युवती है। जिसकी विधवा माँ “शेखों के घर जा चढ़ी” है। जिसकी वजह से अपने ननिहाल में पाशो भी संदेहास्पद हो गई है। यह संदेह उस पितृसत्ता का है जिसके प्रतिनिधि के रूप में पहले पाशो के मामा हैं। फिर आगे चल कर शेख, पाशो के पति लखपत दिवान, बरकत दिवान, लाला और उनके तीनों बेटे, और फिर पाशो का नया भाई (वीर)। यदि इन सभी पात्रों का विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि ये सभी पात्र अलग-अलग समयों में पितृसत्ता के प्रतिनिधि के रूप में उभरे हैं। पाशो एक से बचती है तो दूसरे में फँसती है। जब वह ननिहाल छोड़ शेखों के यहाँ जाती है तो वहाँ पुरुषों का असल चरित्र सामने आता है। शेख पाशो को अपनी बेटी के रूप में स्वीकार तो करते हैं उसे खूब मान भी देते हैं लेकिन उनके पास यह साहस नहीं है कि वह खुल कर इसका इकरार कर सकें, पाशो तो फिर भी लड़की थी, शेखों कि ऐसी क्या मजबूरी रही होगी? यह वही मजबूरी है जिसे कृष्णा सोबती अपने उपन्यासों में बार-बार उठाती हैं। यह पितृसत्तात्मक समाज में रहने की मजबूरी है। जिसकी शिकार महिलाएं तो हैं ही लेकिन पुरुष भी जाने-अनजाने इसके शिकार हैं। इसलिए इस उपन्यास के पुरुष पात्र इकहरे नहीं हैं। उपन्यास में एक तरफ शेख, शेख का बेटा, दिवान लखपत हैं तो दूसरी तरफ पाशो के मामा, दिवान बरकत, लाला और उनके तीनों बेटे हैं। लाला जो पाशो की कीमत चुका कर उसे अपने घर लाते हैं वो खुद अपने घर में उपेक्षित हैं। कृष्णा सोबती अतिरेक में जाने से बचतीं हैं कम से कम कहानी कहने के सिलसिले में तो ज़रूर। इसलिए उनकी लिखी कहानी किसी और दुनिया की कहानी नहीं लगती।
कृष्णा सोबती के सबसे ज़्यादा चर्चित उपन्यासों में ‘मित्रो मरजानी’6 है। इस उपन्यास में चार प्रमुख पुरुष पात्र हैं। मित्रो (समित्रावन्ती) के ससुर गुरदास, मित्रो का पति सरदारी लाल, सरदारी लाल का बड़ा भाई बनवारी लाल और सरदारी का छोटा भाई गुलजारी लाल। इस उपन्यास को ज़्यादा तर आलोचकों ने मित्रो के ‘बोल्ड संवाद’ के लिए सराहा है। ज़रा याद कीजिये प्रेमचंद के ‘गबन’ को। “गबन की केन्द्रीय समस्या है स्त्री की पितृसत्ता और पूंजीवादी मूल्यों के खिलाफ संघर्ष। प्रेमचंद ने जालपा और अन्य स्त्री पात्रों के जरिये इसी ओर ध्यान खींचा है”।7 प्रेमचंद ने गहनों के माध्यम से गबन में स्त्री मानसिकता में आए परिवर्तन को दिखाया है। मध्यमवर्गीय स्त्रियों को गहनों से बड़ा लगाव होता है। ‘मित्रो मरजानी’ में भी कृष्णा सोबती ने गहनों और पैसों के माध्यम पितृसत्ता के दो रूप दिखाएँ हैं। एक तरफ जहां गुलजारी लाल अपने भाइयों के नाम पर कर्ज़ लेकर अपनी पत्नी के लिए गहने बनवाता है वहीं अपने पति कि नपुंसकता पर सवाल करने वाली (और अगर इसे प्रतिकार्थों में लें तो यह सवाल पूरी परिवार व्यवस्था पर है जहां पुरुषों की मांग पूर्ति ही सर्वोपरी है) मित्रो अपनी जमा पूंजी परिवार के मान को बचाने के लिए अपने पति सरदारी लाल को सौंप देती है। सवाल हो सकता है कि इसमें पुरुषों का चरित्र कहाँ दिखता है? मैंने पहले भी कहाँ है और उसे फिर दुहराना ज़रूरी समझता हूँ कि महिला लेखिकाओं के पुरुष पात्रों को समझने के लिए हमें महिला पात्रों के संवादों और पुरुष पात्रों के प्रति उनके रुख का विश्लेषण करना होगा। सिमोन द बोआ ने लिखा है- ‘वन इज़ नाट बार्न आ वुमेन, वन बिकम्स वन’, नारी जन्म से नारी नहीं होती वह बनाई जाती है। कृष्णा सोबती ने मित्रो के पति सरदारी लाल को नपुंसक पात्र के रूप में रख कर इस प्राकृतिक जैविक अंतर को कम कर, पितृसत्ता की उस ताकत को खत्म किया है। सरदारी लाल के पास वह ताकत नहीं है जिससे वह मित्रो की योनिकता पर कब्जा कर सके। मित्रो के ससुर गुरुदास के इस सवाल का हमे विश्लेषण करना चाहिए जो उन्होंने अपने बेटों से किया है – ‘आप ही उघाड़ोगे और आप ही कहोगे नंगे हो?’6 बेटों ने मित्रो की चरित्र पर शक किया है, घर में बड़े-जेठों के सामने अदालत लगी है और ‘गुरुदास ने मँझली बहू (मित्रो) की ओर ताका तो वह उन्हें छोटे से घूँघट वाली कोई छोटी गुड़िया दिखी!’ गुरुदास अपने बेटों को समझाते हैं –“ बरखुरदार, जवानी के जोश में बात का बतंगड़ ना बनाओ’।6 इस पूरे प्रसंग में कृष्णा सोबती ने पितृसत्ता के पूरे चरित्र को पितृसत्ता के अंतर्गत पुरुषों की वास्तविक स्थिति को स्पष्ट किया है और बेहतरीन तरीके से किया है। यह कोई एकांगी दृष्टि नहीं है। सोबती चीजों को समग्रता में देख रही हैं और उसे दर्ज़ कर रही हैं।
“ बात बिगड़ते देख, बनवारी लाल उठ बापू के पास आ झुका- दिल दिमाग कायम रखो बाबू, यह समय हेर-फेर करने का नहीं करने का नहीं। जिसे समझाना हो समझाओ, जिसे ताड़ना हो ताड़ो”।6
गुरुदास समझदार हैं वो स्पष्ट नज़रों से चीजों को देख रहे हैं। इसलिए यहाँ उनकी भी वही स्थिति हो गई जो मित्रो की है। मित्रो से सवाल है कि उसके पति ने जो उस पर शक किया है, वह सच है या झूठ? मित्रो टका सा जबाब देती है ‘सच भी है और झूठ भी’ आगे मित्रो कहती है-
‘सोने सी अपनी अपनी देह झूर-झुरकर जला लूँ या गुलजारी देवर कि घरवाली की न्याई सुई-सिलाई के पीछे जान खपा लूँ? सच तो यूं, जेठ जी कि दिन-दुनिया बिसरा मैं मनुक्ख कि जात से हँस- खेल लेती हूँ। झूठ यूं कि खसम का दिया राजपाट छोड़ मैं कोठे पर तो नहीं जा बैठी?’
मित्रो के जबाब को सुन –
‘गुरुदास लेटे-लेटे उठ बैठे। बहू कि जगह लड़कों को डांटकर कहा- बोधे जवान कहीं के! तिल का ताड़ करके तरीमत के मुंह लगते हो? कभी दम खम आजमाना हो तो गली गलियारे में जूत-पैजार कर लिया करो!’
तो ऐसे हैं मित्रो मरजानी के पुरुष पात्र सामाजिक यथार्थ के रंगों में रंगे रचे। सोबती समझती है एक आज़ादी का मतलब सिर्फ एक जगह भर से या विशेष स्थितियों से निकल जाना भर नहीं है इसलिए मित्रो अपनी माँ के उस प्रस्ताव को ठुकरा देती है जिसमें वह उसे अपने मायके में ही रहने को कहती है।
सोबती कम लिखने को ही अपना परिचय मानती हैं और कहती हैं कि एक जालिम सी तटस्थता दिल दिमाग पर कब्जा किए रहती है। कृष्णा सोबती के उपन्यासों में यह दिखता है वह किसी पूर्वाग्रह से नहीं लिखती इस लिए ‘दिलो-दानिश’7 के वकील कृपानारायाण को पढ़ते हुए वह हमें बहुत ‘चतुर बेचारा’ सा लगता है।
‘महरी है, महाराज है, बर्तन-भांडे को लड़का है। कपड़ों के लिए धोबन है घर चलाने में अब कौन सा कम बाँकी है जो हमें आपकी मदद के लिए करना चाहिए’।7 इन पंक्तियों को सुन कर क्या महसूस होता है फिक्र और फक्र दोनों ही न! ‘दिलो-दानिश’ में कृष्णा सोबती ने दिल्ली के समग्र ज़िंदगी के बीच से इंसानी रिश्तों के एक ऐसे पहलू को उठाया है जिसका गहरा ताल्लुक मध्ययुग की सामंती जीवन-पद्धति से है”।8 लेकिन इसमें वकील साहब का कोई दोष नहीं दिखता। यह जीवन पद्धति तो उन्हें विरासत में अपने पुरखों से मिली है, जिनके नक्शे कदम पर चलना वकील साहब की ज़िम्मेदारी है।
“ख़ुद अपना फैसला भी इश्क़ में काफी नहीं होता/ उसे भी कैसे कर गुज़रें/ जो दिल में ठान लेते हैं”9 फिराक साहब के इस शेर के साथ वकील साहब की यह स्वीकारोक्ति सुनिए ‘बानो, खुदा जनता है, हमारा बस चलता तो हम इस घर को हवेली में बदल देते पर बिरदरी की अपनी मर्यादा है’।7 वैसे वकील साहब को यह घमंड भी है कि ‘आखिर को हम मर्द हैं’ 7 साथ ही महकबानो के लिए, जिसे वकील साहब ने रख रखा है, यह अफसोस भी कि ‘इस औरत का कसूर सिर्फ इतना भर है कि यह हमारी बीवी ना थी’।7 पितृसत्तात्मक समाजों के अगर मुख्य गुण तलाशे जाएँ तो एक गुण यह निकलेगा कि ये समाज बहुत गणितीय प्रेम करते हैं। अगर कोई इस ढांचे को तोड़ने का प्रयास करता है तो खाप और तालिबान जैसी सस्थाएं जो करती है हम सब उसके गवाह हैं। ‘दिलो-दानिश’ में भी पितृसत्ता के इन्हीं गुणों को वकील कृपनरायाण के जरिये, कृष्णा सोबती खोलती हैं। ‘यह बात दीगर है कि मर्द ‘वही जीती’ कहकर अपनी हर स्वीकार भले ही कर ले, पर वह उसे अपनी तौहीन समझता है। जिसे न वह भूल पाता है न झेल पता है। यह उसकी नज़र में ऐसा गुनाह है जिसे माफ भी नहीं किया जा सकता’।8 आख़िर में महकबानों और चुन्ना का खुद को कृपानारायण की जायदाद से अलग करना ही कृष्णा सोबती के लेखन की खास पहचान है। जहां कोई गुस्सा नहीं, कोई श्राप नहीं है एक मौन प्रतिरोध है और प्रतिरोध का लहराता हुआ परचम है।
अंशु मालवीय की एक कविता का शीर्षक है ‘आश्वस्ति’10। उसकी कुछ पंक्तियाँ हैं
“कि दोस्त के बिना नास्तिक नहीं हुआ जा सकता
समाज में असुरक्षा है बहुत,
आदमी के डर ने बनाया है ईश्वर
और उसके साहस ने बनाई है दोस्ती”9
पितृसत्तात्मक समाज और परिवार रूपी संस्था लगातार ही ‘धर्म’ और ‘ईश्वर’ कि दुहाई देता नज़र आता है। यही वो शब्द हैं जिनसे वह अपने दमनात्मक कार्यों को वेलेडिटी दिलाता है। एक डरी हुई स्त्री तो इन धार्मिक भावनाओं के सहारे समाज के शोषणों को झेल जाती है पर वह स्त्री क्या करे जो मुक्ति कि चेतना से जीती है वह किसे अपना दोस्त बनाये? क्या दोस्त बनाने की इच्छा ही मुक्ति की ओर पहला कदम नहीं है? ऐसी इच्छा रखने वाली स्त्रियों के साथ पुरुष वर्ग (ध्यान दें पितृसत्ता का नहीं )का क्या रुख रहता है? इन्हीं बिन्दुओं पर केन्द्रित कृष्ण सोबती के दो और उपन्यास हैं- ‘समय सरगम’11 और ‘सूरजमुखी अंधेरे के’12। सोबती के हर उनयस में जीवन छलकता है और ‘समय सरगम’ में तो कई धुनों में बजता भी है। आरण्या और ईशान इस उपन्यास के दो मुख्य पात्र हैं और दोनों ही सम पर हैं। अलग-अलग कारणों से ही सही पर दोनों का परिवार आरण्या और ईशान से अलग हो चुका है। दोनों जीवन के सेवा निवृत हिस्से को जी रहे हैं। इस उपन्यास की खास बात यह है कि पहली बार सोबती के उपन्यासों में द्वंद, ‘डिबेट’ के रूप में सामने आया है। ईशान, किन्हीं ‘शून्यता’ के बहाने से यह स्वीकार करते हैं कि ‘... सम्पूर्ण पुरुष नहीं हो सकते अगर स्त्री की तरह प्यार करना न सीखो’। बदले में आरण्या का भी मौन उत्तर है ‘स्त्रियाँ तो चाहती ही हैं वह पुरुषों की तरह प्यार करना सीखें। उतना ही जितना करना ज़रूरी हो। अपने को उसकी आसक्ति में विलीन न कर दे’। गौर करने वाली बात यह है कि आरण्या के इस खामोश जबाब को ‘डिकोड’ ईशान कर रहे हैं। आगे का विवरण भी देखें ‘दोनों लंबे क्षण तक एक-दूसरे को तकते चले कि आरण्या हँसी। सृष्टि के दो मन, स्त्री पुरुष अलग-अलग दिशाओं से एक ही बिन्दु को देख रहे हैं। देख रहे हैं कि मानवीय होने के एक-से अधिकारों को पा सकें। जी सकें’। 1989 के ज़माने में, बारबारा एहनरिक न्यूयार्क टाइम्स जैसे अखबारों में लंबे लेख लिख रही थीं जिसके मसायल यही थे कि क्या पुरुष ‘स्त्रियायेन’ हो रहे है? ‘पुरुषों के स्त्रियायेन’ होने से एहनरिक का तात्पर्य पुरुषों में आए स्वभावगत बदलाव से था/है। कृष्णा सोबती स्वयं ‘समय सरगम’ के बारे में कहतीं हैं ‘1999 कि अंतिम और 2000 कि प्रथम कृति’। समय के साथ भारतीय मध्यम वर्ग में जो बदलाव आये हैं और सोबती ने जिन्हें रेखांकित किया है वह है पुरुषों में भी पितृसत्ता के खिलाफ एक अकुलाहट। इस अकुलाहट ने, रचनाकाल और रचना की पृष्ठभूमि के अनुसार, सोबती के हर उपन्यास में जगह पाई है। ‘समय सरगम’ में भी यह दिखता है बल्कि अकुलाहट से कहीं ज़्यादा बदला हुआ समाज दिखता है। ईशान का खाना बनाने में दिलचस्पी लेना और आरण्या का ‘अपने को उससे कुछ दूर ही’ रखना। फिर ईशान का कहना –‘मैं अपना सब काम हाथ से करना पसंद करता हूँ और संतोष पाता हूँ!’11 आरण्या जबाब देती है और यह एक व्यंग भी है पुराने पुरुषों पर ‘सचमुच में आधुनिक हैं। नहीं तो प्राचीन भारतीय गृहस्थों कि तरह- सब कुछ दूसरे करें। आपके एक काम में दस जुटे हों तो आपका रुतबा सुरक्षित है’।11
‘समय सरगम’ पर बात शुरू करने से पहले मैंने एक सवाल आप लोगों के सामने रखा था कि मुक्तिगामी चेतना में जीने वाली ‘स्त्री’ किसे अपना दोस्त माने’? प्रसंगवस उपन्यास में जबाब की ओर एक इशारा ज़रूर मिलता है जब ‘आरण्या मैत्री भाव से बोली- मैं अपने आप को उम्र में उतना बड़ा महसूस नहीं करती जितना आप मान रहे हैं। मेरे आसपास मेरा परिवार नहीं फैला हुआ कि मैं अपने में माँ, नानी, दादी, कि बूढ़ी छवि ही देखने लगूँ। ईशान, मुझे मेरा अपनापन निरंतरता का अहसास देता है’।
यहाँ जो ‘संवाद’ स्त्री-पुरुष के बीच ‘परिवार’ को लेकर है। यह संवाद ही कृष्णा सोबती की असल कला है। कृष्णा सोबती समझ रहीं हैं कि समाज बादल रहा है और कई मायनों में पुरुषों ने पितृसत्ता के वर्चस्व से खुद को स्वतंत्र किया है और जहां नहीं किया है वहाँ वह ‘मैं नहीं कहता सब कहते हैं’12, ‘मैं नहीं कहता दुनिया कहती है’12 ‘शास्त्रों में भी यही लिखा है’7 की डिफ़ेंडिंग स्थिति में है। और यथार्थ भी यही है। हम यानि पुरुष बदले हैं। यह सही है कि यह बदलाव मानसिक स्तर पर कम और भौतिक स्तर पर ज़्यादा हुआ है, पर बदलाव हुआ है और स्त्री मुक्ति के आंदोलन में यह एक बड़ी सफलता है। और कृष्णा सोबती इसी सफलता की इतिहासकार हैं।
---------------------------------------------------------------------------------
संदर्भ ग्रंथ
1. जैन निर्मला, हिन्दी आलोचना की बीसवीं सदी, 1992 राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली।
2. जैन निर्मला, कथा प्रसंग यथा प्रसंग, (वर्ष 2000) वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
3. सिंह सुधा, ज्ञान का स्त्रीवादी पाठ, वर्ष 2008 ग्रंथ शिल्पी, नई दिल्ली।
4. सोबती कृष्णा, सोबती एक सोहबत, प्रथम संस्करण वर्ष 1989, राजकमल प्रकाशन,नई दिल्ली।
5. सोबती कृष्णा, डार से बिछुड़ी, प्रथम संस्करण 1958, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली।
6. सोबती कृष्णा, मित्रो मरजानी, प्रथम संस्करण1967, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली।
7. सोबती कृष्णा, दिलो-दानिश, प्रथम संस्करण 1993, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली।
8. जैन निर्मला, कथा प्रसंग यथा प्रसंग, (वर्ष 2000) वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
9. गोरखपुरी फिराक, बज़्में ज़िंदगी: रंगे शायरी, वर्ष 2004 भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली।
10. मालवीय अंशु, दक्खिन टोला, प्रथम संस्करण 2002, इतिहास बोध प्रकाशन, इलाहाबाद।
11. सोबती कृष्णा, समय सरगम, प्रथम संस्करण 2000, राजकमल प्रकाशन।
12. सोबती कृष्णा ,सूरजमुखी अंधेरे के, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली।की
कुछ बातें जो रह जाती हैं कभी मन में, अनकही- अनसुनी... शब्दों के माध्यम से रखी जा सकती हैं,बरक्स... मेरे-तेरे मन की कई बातें... कई सारे अनुभव, कई सारे स्पंदन, कई सारे घाव और मरहम... व्यक्त होते हैं शब्दों के माध्यम से... मेरा मुझी से है साक्षात्कार, शब्दों के माध्यम से... तू भी मेरे मनमीत, है साकार... शब्दों के माध्यम से...
गठरी...
25 मई
(1)
३१ जुलाई
(1)
अण्णाभाऊ साठे जन्मशती वर्ष
(1)
अभिव्यक्ति की आज़ादी
(3)
अरुंधती रॉय
(1)
अरुण कुमार असफल
(1)
आदिवासी
(2)
आदिवासी महिला केंद्रित
(1)
आदिवासी संघर्ष
(1)
आधुनिक कविता
(3)
आलोचना
(1)
इंदौर
(1)
इंदौर प्रलेसं
(9)
इप्टा
(4)
इप्टा - इंदौर
(1)
इप्टा स्थापना दिवस
(1)
उपन्यास साहित्य
(1)
उर्दू में तरक्कीपसंद लेखन
(1)
उर्दू शायरी
(1)
ए. बी. बर्धन
(1)
एटक शताब्दी वर्ष
(1)
एम् एस सथ्यू
(1)
कम्युनिज़्म
(1)
कविता
(40)
कश्मीर
(1)
कहानी
(7)
कामरेड पानसरे
(1)
कार्ल मार्क्स
(1)
कार्ल मार्क्स की 200वीं जयंती
(1)
कालचिती
(1)
किताब
(2)
किसान
(1)
कॉम. विनीत तिवारी
(6)
कोरोना वायरस
(1)
क्यूबा
(1)
क्रांति
(3)
खगेन्द्र ठाकुर
(1)
गज़ल
(5)
गरम हवा
(1)
गुंजेश
(1)
गुंजेश कुमार मिश्रा
(1)
गौहर रज़ा
(1)
घाटशिला
(3)
घाटशिला इप्टा
(2)
चीन
(1)
जमशेदपुर
(1)
जल-जंगल-जमीन की लड़ाई
(1)
जान संस्कृति दिवस
(1)
जाहिद खान
(2)
जोश मलीहाबादी
(1)
जोशी-अधिकारी इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज
(1)
ज्योति मल्लिक
(1)
डॉ. कमला प्रसाद
(3)
डॉ. रसीद जहाँ
(1)
तरक्कीपसंद शायर
(1)
तहरीर चौक
(1)
ताजी कहानी
(4)
दलित
(2)
धूमिल
(1)
नज़्म
(8)
नागार्जुन
(1)
नागार्जुन शताब्दी वर्ष
(1)
नारी
(3)
निर्मला पुतुल
(1)
नूर जहीर
(1)
परिकथा
(1)
पहल
(1)
पहला कविता समय सम्मान
(1)
पाश
(1)
पूंजीवाद
(1)
पेरिस कम्यून
(1)
प्रकृति
(3)
प्रगतिशील मूल्य
(2)
प्रगतिशील लेखक संघ
(4)
प्रगतिशील साहित्य
(3)
प्रगतिशील सिनेमा
(1)
प्रलेस
(2)
प्रलेस घाटशिला इकाई
(5)
प्रलेस झारखंड राज्य सम्मेलन
(1)
प्रलेसं
(12)
प्रलेसं-घाटशिला
(3)
प्रेम
(17)
प्रेमचंद
(1)
प्रेमचन्द जयंती
(1)
प्रो. चमन लाल
(1)
प्रोफ. चमनलाल
(1)
फिदेल कास्त्रो
(1)
फेसबुक
(1)
फैज़ अहमद फैज़
(2)
बंगला
(1)
बंगाली साहित्यकार
(1)
बेटी
(1)
बोल्शेविक क्रांति
(1)
भगत सिंह
(1)
भारत
(1)
भारतीय नारी संघर्ष
(1)
भाषा
(3)
भीष्म साहनी
(3)
मई दिवस
(1)
महादेव खेतान
(1)
महिला दिवस
(1)
महेश कटारे
(1)
मानवता
(1)
मार्क्सवाद
(1)
मिथिलेश प्रियदर्शी
(1)
मिस्र
(1)
मुक्तिबोध
(1)
मुक्तिबोध जन्मशती
(1)
युवा
(17)
युवा और राजनीति
(1)
रचना
(6)
रूसी क्रांति
(1)
रोहित वेमुला
(1)
लघु कथा
(1)
लेख
(3)
लैटिन अमेरिका
(1)
वर्षा
(1)
वसंत
(1)
वामपंथी आंदोलन
(1)
वामपंथी विचारधारा
(1)
विद्रोह
(16)
विनीत तिवारी
(2)
विभाजन पर फ़िल्में
(1)
विभूति भूषण बंदोपाध्याय
(1)
व्यंग्य
(1)
शमशेर बहादुर सिंह
(3)
शेखर
(11)
शेखर मल्लिक
(3)
समकालीन तीसरी दुनिया
(1)
समयांतर पत्रिका
(1)
समसामयिक
(8)
समाजवाद
(2)
सांप्रदायिकता
(1)
साम्प्रदायिकता
(1)
सावन
(1)
साहित्य
(6)
साहित्यिक वृतचित्र
(1)
सीपीआई
(1)
सोशल मीडिया
(1)
स्त्री
(18)
स्त्री विमर्श
(1)
स्मृति सभा
(1)
स्वास्थ्य सेवाओं का राष्ट्रीयकरण
(1)
हरिशंकर परसाई
(2)
हिंदी
(42)
हिंदी कविता
(41)
हिंदी साहित्य
(78)
हिंदी साहित्य में स्त्री-पुरुष
(3)
ह्यूगो
(1)
स्त्री लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
स्त्री लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
शनिवार, 23 अप्रैल 2011
मंगलवार, 8 मार्च 2011
अपनी जमीन तलाशती बेचैन स्त्री - निर्मला पुतुल
यह कैसी विडम्बना है
कि हम सहज अभ्यस्त हैं
एक मानक पुरुष दृष्टि से देखने को
स्वयं की दुनिया
मैं स्वयं को स्वंय की दृष्टि से देखते
मुक्त होना चाहती हूँ अपणी जाति से
क्या है मात्र एक स्वप्न के
स्त्री के लिए --- घर, संतान और प्रेम ?
क्या है ?
एक स्त्री यथार्थ में
जितना अधिक घिरती जाती है इससे
उतना भी अमूर्त होता चला जाता है
सपने में वह सब कुछ
अपनी कल्पना में हर रोज
एक ही समय में स्वंय को
हर बेचैन स्त्री तलाशती है
घर, प्रेम और जाति से अलग
अपनी ऐसी जमीन
जो सिर्फ़ उसकी अपनी हो.
एक उन्मुक्त आकाश
जो शब्द से परे हो
एक हाथ
जो हाथ नहीं
उसके होने का आभास हो !
महिला दिवस ८ मार्च, २०११ पर दैनिक जागरण में प्रकाशित
लेबल:
निर्मला पुतुल,
स्त्री,
हिंदी,
हिंदी कविता,
हिंदी साहित्य
बुधवार, 2 मार्च 2011
सवाल
हमेशा ऐसा ही होता है, कि
मासूम किलकारियों को पर लगने से पहले,
फुर्र से उड़ जाने से पहले
धारदार हथियारों से उनके पँख
चाक कर दिये जाते हैं,
कई बार, सिर्फ़ हत्याएँ करना उनका शिगूफा हो जाता है
वे हमारे इतिहास, हमारी स्मृतियों, अनुभव, चेतना और
अनुभूति और फैसले करने की जैविक क्षमता
की हत्या करने को पागल हो जाते हैं...
ऐसा होता है कि
अक्सर जब नज़र सामने की तरफ होती है
पीछे से वार होता है...
वे वही होते हैं, वही, जिन्हें हमने भाई कहा था
एक ही आसमान के नीचे !
अरसे तक एक थाली में बाँटकर
भात खाया था जिनके साथ...
जिनकी बहती हुई नाक पोंछी थी,
जिन्हें गिनतियाँ और पहाड़े सिखाए थे...
जिनको बोलना सिखाया था...वे अचानक...
जीभ काटने वाले हाथों में तब्दील हो जाते हैं
ताकि हम आज़ादी का स्वाद ना चख सकें !
सवाल यह नहीं कि ऐसा क्यों होता है...
सवाल तो यह है कि
क्या हम ऐसा होने को
खारिज नहीं कर सकते ?
लेबल:
विद्रोह,
स्त्री,
हिंदी,
हिंदी कविता,
हिंदी साहित्य
मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011
वसंत की इस दोपहर
ओ मितवा...
लो फिर देने लगा है समय
चिहुंक कर हांक...
आने लगा है वसंत हौले क़दमों से
सूखे पत्तों की खडखडाहट से
खुसफुसाते फूलों पर भौरों की लड़खड़ाहट से...
एक नीम उदासी सी तारी
होती हुई इस गर्माती अलसाती दोपहर में
जब मितवा तेरे छूए हुए
उस वसंत की याद आ रही है !
बीता था सारा वह मधुमास
तुम्हारे ही गोद में सिर लुकाये
और हँसती रहती थी तुम, उन सांसों की
हल्की भाप मेरे गालों पर, ललाट पर
भौंहों पर लगाती रहती थी अंजन...
ओ मितवा, बोलो ना क्यों हुआ
वह वसंत जो गया, बस गया...
उस वसंत के बाद सारे मौसम खो गये !
अब लो यह वसंत तो बौराया हुआ
फिर आ धमका है...
तेरे नुपूर बंधे पैरों की
धमक कहाँ रह गई ?
उस बादामी रंग की चमक कहाँ रह गई ?
रेत उडती है आँगन पर, पूछती है पलट कर
तेरे पैरों के छाप कब फिर आयेंगे उकर ?
मितवा, मुझे भूले तो नहीं होगे ना तुम ?
जब भी आओगे, एक वसंत साथ लिए
आना कि सोचूँगा, मैंने पा लिये
हमारे सारे वसंत...
जो रह गये हैं अनछुए
तेरे-मेरे मीठी-मीठी बतकहियों से
मन के मधुर नाच से
डूबकर जिए जीवन के पलों की पाँत से
मितवा, राह देख रहा हूँ तेरी कि
एक दस्तक हो सन्नाटे में अचानक
बाहर निकलूँ और
तुम खड़े मिलो नम चेहरा लिए,
मुस्काते और आँसू ढुलाते, एक साथ...!
(वसंत पंचमी - २०११)
लेबल:
प्रेम,
वसंत,
स्त्री,
हिंदी,
हिंदी कविता,
हिंदी साहित्य
शनिवार, 15 जनवरी 2011
वह अठारह-उन्नीस की युवती माँ ! - (डायरी जैसी कविता)
बहुधा ऐसा होता रहा था कि
एकदम वही या उस जैसा ही कोई दृश्य
अक्सर कई अलग अलग तरह से, अलग अलग कोणों से...
अलग-अलग जगहों पर, अपने जेहन के कैनवास पर उतरता
और फिर आदतन या लापरवाही से कुछ ही मिनटों या
उसके एकाध दिन बाद
खुद-ब-खुद पोंछ डाला जाता था...
ऐसा होना इसलिए था, कि हम सबकी मशरूफियत
दुसरे किसी से ज्यादा, सिर्फ़ अपने लिए थी...
हम सभ्य होकर भी नकारे और बेहया थे...!
तो वही दृश्य एक बार फिर उस दोपहर
सामने था... वह अठारह-उन्नीस की युवती माँ !
गरीबी रेखा से नीचे बसर करती होगी वह...
और होगी अंदर से बेहद ताकतवर, पर चुप थी...
कुछ बोलती भी, तो क्यों और किसे !
छाती से चिपकाये हुए थी अपने नवजात से कुछ बड़े, शायद...
दो-तीन माह के शिशु को... जो लगा, शायद बच्ची रही होगी...
ट्रेन के चल पड़ने तक गेट के पास किसी तरह सहारा लिए खड़ा मैं
उसे ही देख रहा था, कि उसने एक नज़र में ही मेरा ध्यान खींच लिया था
और मैं अपने बुद्धिजीवी होने की गैरत के साथ, उसके बारे में
यह सब सोचना शुरू कर चुका था, जो अभी आपके सामने है !...
ठीक उसके पास खड़ा मैं... और वह गेट के पास निश्चिन्त बैठी हुई !
गोद का बच्चा जोर से रोया, तब वह बिल्कुल अकुंठ भाव से,
एकदम निर्द्वंद... बेपरवाह उस भीड़ और शोरगुल के बीच,
जिसके दायरे में वह बैठी थी... अपना स्तन
उस अबोध के मुँह में
ठूँस दी !
(बिना इस बात कि परवाह किये कि उसका अर्ध-विकसित
या कुपोषित स्तन सर्व-समक्ष हो रहा है!)
उसका वह बच्चा जितनी बार रोता,
वह अमूमन यही दोहराती !
बीच-बीच में उसे पुचकारती, चूमती...
और फिर, इधर-उधर की रेलमपेल देखने लगती...
वह मानों खुद उस दृश्य का हिस्सा नहीं थी...!
जब किसी स्टेशन पर ट्रेन रूकती
लोग उसे लगभग कुचलते हुए ही चढ़े आते ! कोई बोलता,
गेट के पास बैठी हो तो बर्दाश्त करना पड़ेगा...!
हाशिए के बाहर हो गए आदमी को भी
"बर्दाश्त" करना पड़ता है !... उसकी जगह कहीं नहीं होती...!
फिर मैं सोचता हूँ, वह क्या कुछ नहीं बर्दाश्त कर चुकी...
और करती होगी !
मेरा यह सब सोचना बहरहाल, सोचना ही है, इसके अलावा कुछ नहीं !
मामूली फटी और पुरानी सी साड़ी में सकुचाया-सिकुड़ा शरीर उसका,
एक बोसीदा सी गंध छोड़ता...
और रूखे-धूसरित बाल,
नाक के पास दाहिनी तरफ, थोड़ा माध्यम आकर का कला मस्सा,
निर्दोष लगती आँखें...
कुल जमा यही हुलिया बनता था उसका... इसमें नया या अलग कुछ नहीं था...
(हमारी आँखें क्या इसके लिए अभ्यस्त नहीं हो चुकी हैं !
और चूक गई है हमारी संवेदनाएं... क्योंकि हमारी हदें हमारी चौहद्दी हैं !
जिसके बाहर हम झांकते नहीं, और झाँक गए तो कुढते रहते हैं...)
और उसका शिशु एकाएक चुप होकर, भौंचक्का... इस दुनिया को ताकता...
किसी ने बिस्कुट के दो टुकड़े उसकी ओर बढ़ाये, वह मुस्कुराकर ले ली...
मैंने सोचा, होगा उसका ही संबंधी, मगर ऐसा नहीं था ! तो, क्या
उस आदमी की यह सहानुभूति सिर्फ़ बेदाग सहानुभूति थी, या...?
(होगी भी यदि स्वच्छ भावना, हमारे मध्यवर्गीय मानस पर तो उसके पीछे भी
प्रश्नवाचक ही लगाती है !)
ठीक इसी समय, जब कोई स्टेशन आने वाला था...
अठारह-उन्नीस साल की, उसी की लगभग हमउम्र...
दो-तीन लड़कियाँ गेट के पास आ खड़ी हुईं, उन्हें उतरना था
वह भी उठी, उतरना उसे भी यहीं था...
वह लड़कियाँ बतियातीं, मुस्कुरातीं,
कॉलेज जाने वाली या सम्भवत: किसी प्रशिक्षण केंद्र से लौटतीं
आधुनिक... और सभ्य समाज में संभ्रांत कही जाने वालीं
उस की तरफ बिल्कुल ध्यान नहीं दे रहीं थीं, जो बिल्कुल उन्हीं की तरह है !
समलिंगी, उतनी ही कद-काठी, वही उम्र...
और वह प्राय: उन लड़कियों के
ठीक पास खड़ी, मानो उन्हीं में से एक हो,
उनका चेहरा तकती और गोद में सिमटे शिशु को. जिसे...
एक कपडे से कसकर अच्छी तरह अपनी छाती से बांध लिया था,
पुचकार कर चूम रही थी... क्या वह कुछ जता रही थी उन्हें ?
पता नहीं, ये कैसे तय होता होगा, कि दृश्यों का शाब्दिक अर्थ कौन
लगा सकता होगा, ठीक-ठीक !
एक ही उम्र के दो चेहरे...दो नियतियाँ...दो अलग जिंदगियाँ...
और बीच में मौन ! और ट्रेन की धडधडाहट...
कौन किधर जाने वाला था... यह मैं कुछ देर सोचता रहा, फिर भूल गया...
जबकि वे सब और वह उसी स्टेशन पर उतर गयीं...
एकदम वही या उस जैसा ही कोई दृश्य
अक्सर कई अलग अलग तरह से, अलग अलग कोणों से...
अलग-अलग जगहों पर, अपने जेहन के कैनवास पर उतरता
और फिर आदतन या लापरवाही से कुछ ही मिनटों या
उसके एकाध दिन बाद
खुद-ब-खुद पोंछ डाला जाता था...
ऐसा होना इसलिए था, कि हम सबकी मशरूफियत
दुसरे किसी से ज्यादा, सिर्फ़ अपने लिए थी...
हम सभ्य होकर भी नकारे और बेहया थे...!
तो वही दृश्य एक बार फिर उस दोपहर
सामने था... वह अठारह-उन्नीस की युवती माँ !
गरीबी रेखा से नीचे बसर करती होगी वह...
और होगी अंदर से बेहद ताकतवर, पर चुप थी...
कुछ बोलती भी, तो क्यों और किसे !
छाती से चिपकाये हुए थी अपने नवजात से कुछ बड़े, शायद...
दो-तीन माह के शिशु को... जो लगा, शायद बच्ची रही होगी...
ट्रेन के चल पड़ने तक गेट के पास किसी तरह सहारा लिए खड़ा मैं
उसे ही देख रहा था, कि उसने एक नज़र में ही मेरा ध्यान खींच लिया था
और मैं अपने बुद्धिजीवी होने की गैरत के साथ, उसके बारे में
यह सब सोचना शुरू कर चुका था, जो अभी आपके सामने है !...
ठीक उसके पास खड़ा मैं... और वह गेट के पास निश्चिन्त बैठी हुई !
गोद का बच्चा जोर से रोया, तब वह बिल्कुल अकुंठ भाव से,
एकदम निर्द्वंद... बेपरवाह उस भीड़ और शोरगुल के बीच,
जिसके दायरे में वह बैठी थी... अपना स्तन
उस अबोध के मुँह में
ठूँस दी !
(बिना इस बात कि परवाह किये कि उसका अर्ध-विकसित
या कुपोषित स्तन सर्व-समक्ष हो रहा है!)
उसका वह बच्चा जितनी बार रोता,
वह अमूमन यही दोहराती !
बीच-बीच में उसे पुचकारती, चूमती...
और फिर, इधर-उधर की रेलमपेल देखने लगती...
वह मानों खुद उस दृश्य का हिस्सा नहीं थी...!
जब किसी स्टेशन पर ट्रेन रूकती
लोग उसे लगभग कुचलते हुए ही चढ़े आते ! कोई बोलता,
गेट के पास बैठी हो तो बर्दाश्त करना पड़ेगा...!
हाशिए के बाहर हो गए आदमी को भी
"बर्दाश्त" करना पड़ता है !... उसकी जगह कहीं नहीं होती...!
फिर मैं सोचता हूँ, वह क्या कुछ नहीं बर्दाश्त कर चुकी...
और करती होगी !
मेरा यह सब सोचना बहरहाल, सोचना ही है, इसके अलावा कुछ नहीं !
मामूली फटी और पुरानी सी साड़ी में सकुचाया-सिकुड़ा शरीर उसका,
एक बोसीदा सी गंध छोड़ता...
और रूखे-धूसरित बाल,
नाक के पास दाहिनी तरफ, थोड़ा माध्यम आकर का कला मस्सा,
निर्दोष लगती आँखें...
कुल जमा यही हुलिया बनता था उसका... इसमें नया या अलग कुछ नहीं था...
(हमारी आँखें क्या इसके लिए अभ्यस्त नहीं हो चुकी हैं !
और चूक गई है हमारी संवेदनाएं... क्योंकि हमारी हदें हमारी चौहद्दी हैं !
जिसके बाहर हम झांकते नहीं, और झाँक गए तो कुढते रहते हैं...)
और उसका शिशु एकाएक चुप होकर, भौंचक्का... इस दुनिया को ताकता...
किसी ने बिस्कुट के दो टुकड़े उसकी ओर बढ़ाये, वह मुस्कुराकर ले ली...
मैंने सोचा, होगा उसका ही संबंधी, मगर ऐसा नहीं था ! तो, क्या
उस आदमी की यह सहानुभूति सिर्फ़ बेदाग सहानुभूति थी, या...?
(होगी भी यदि स्वच्छ भावना, हमारे मध्यवर्गीय मानस पर तो उसके पीछे भी
प्रश्नवाचक ही लगाती है !)
ठीक इसी समय, जब कोई स्टेशन आने वाला था...
अठारह-उन्नीस साल की, उसी की लगभग हमउम्र...
दो-तीन लड़कियाँ गेट के पास आ खड़ी हुईं, उन्हें उतरना था
वह भी उठी, उतरना उसे भी यहीं था...
वह लड़कियाँ बतियातीं, मुस्कुरातीं,
कॉलेज जाने वाली या सम्भवत: किसी प्रशिक्षण केंद्र से लौटतीं
आधुनिक... और सभ्य समाज में संभ्रांत कही जाने वालीं
उस की तरफ बिल्कुल ध्यान नहीं दे रहीं थीं, जो बिल्कुल उन्हीं की तरह है !
समलिंगी, उतनी ही कद-काठी, वही उम्र...
और वह प्राय: उन लड़कियों के
ठीक पास खड़ी, मानो उन्हीं में से एक हो,
उनका चेहरा तकती और गोद में सिमटे शिशु को. जिसे...
एक कपडे से कसकर अच्छी तरह अपनी छाती से बांध लिया था,
पुचकार कर चूम रही थी... क्या वह कुछ जता रही थी उन्हें ?
पता नहीं, ये कैसे तय होता होगा, कि दृश्यों का शाब्दिक अर्थ कौन
लगा सकता होगा, ठीक-ठीक !
एक ही उम्र के दो चेहरे...दो नियतियाँ...दो अलग जिंदगियाँ...
और बीच में मौन ! और ट्रेन की धडधडाहट...
कौन किधर जाने वाला था... यह मैं कुछ देर सोचता रहा, फिर भूल गया...
जबकि वे सब और वह उसी स्टेशन पर उतर गयीं...
लेबल:
स्त्री,
हिंदी,
हिंदी कविता,
हिंदी साहित्य
गुरुवार, 13 जनवरी 2011
शमशेर बहादुर सिंह की रचनाएँ - ३ (चुका भी हूँ मैं नहीं !)
चुका भी हूँ मैं नहीं !
कहाँ किया मैंने प्रेम
अभी !
जब करूँगा प्रेम
पिघल उठेंगे
युगों के भूधर
उफान उठेंगे
सात सागर !
किन्तु मैं हूँ मौन आज
कहाँ सजे मैंने साज
अभी !
सरल से भी गूढ़-गूढ़तर
तत्व निकलेंगे
अमित विषमय
जब मथेगा प्रेम सागर
ह्रदय !
निकटतम सबकी
अपर शोर्यों की
तुमतब बनोगी एक
गहन मायामय
प्राप्त सुख
तुम बनोगी जब
प्राप्य जय !
(रचनाकाल - 1941)
लेबल:
प्रेम,
शमशेर बहादुर सिंह,
स्त्री,
हिंदी,
हिंदी कविता,
हिंदी साहित्य
सोमवार, 25 अक्टूबर 2010
पहले दिनों जैसा प्यार...
प्यार के शुरूआती दिनों को भरपूर जीओ दोस्त...
क्योंकि सिर्फ़ तब ही होता है,
रहता है पूरी तरह से,
ईमानदार प्यार...
सौ पैसा खांटी खुमार देता प्यार...
किसी बच्ची सा भोला और निश्छल प्यार...
जिसमें कौंधती है, प्यार करने वाले की आत्मा
और उसकी सच्चाई...
तुम्हारी फ़िक्र और परवाह वाकई सचमुच की होती है
तब, सचमुच जरा सी भी दूरी डरा देती है मन को
और बाँहों के घेरे का कसाव असली तड़प लिए होता है...
वह गर्मी भी खालिस होती है जो तपे हुए चेहरे,
सांसों और होठों से नुमांया होती है...
सारी प्रार्थनाएं सीधे कलेजे से निकलती हैं और
सबकुछ लुटाकर भी मजे में रहने वाली आस्था सच्ची होती है...
खेद है कि, फिर ऐसा रह नहीं जाता...
फिर तो सावन भी बरसता है, मगर उसकी आग महसूसती नहीं
साथ चलते हुए भी परछाइयाँ परस्पर लिपटती नहीं...
तुम्हें तड़प कर पुकारने वाली उस आवाज़ की आस में जिंदा रहते हो और
वही एक पुकार फिर आती नहीं...
फिर प्यार ना गाढ़ा, ना जुनूनी, ना विशुद्ध, ना गहरा,
ना किसी आवेग का रह जाता है !
मात्र एक खोखली उम्मीद की मानिंद...
जो एक-दूसरे से बमुश्किल निभ पाता है...!
प्यार को गुना-भाग, जोड़-घटाव...
किसी समीकरण में तौले जाने और
दुनियादार हो जाने से
पहले पूरी तरह से जी लो...
क्योंकि, फिर पलट कर नहीं आता है...
पहले दिनों जैसा प्यार...
फिर अपना-अपना कहते-कहते भी
अपना होने का भ्रम मात्र बनकर रह जाते हैं लोग...
फिर पूरी शिद्दत से
तुम उसी प्यार की कशिश को पाने के लिए
जुझने तो लगोगे...
मगर दोस्त... वह प्यार नहीं मिलेगा
ना फूलों और चाँद पर, ना भरी-पूरी रातों में, ना घर में, ना बगीचों में...
तलाशोगे अगर साथी की आँख में, चेहरे पर, उसकी बातों में...
और शारीरिक भाषा में... हताश होओगे यह पाकर कि
कोई गीली चीज दरम्यान से गायब है...
सिर्फ़ एक पथरीली सी हँसी है, जिसे तुम नहीं पहचानते और
बहुत सारा पानी सूख चुका है !
प्यार अक्सर दिन ढलते जाने पर
उपेक्षात्मक होता जाता है...
सैद्धांतिक रूप से तो...ठीक इसके उलट होना
और आदर्शवादी तौर पर...
ऐसा कतई नहीं होना... चाहिए...
मगर...
होता यही है...
इस पर अफ़सोस करने की हालत में पहुँचने से पहले
खुलकर, डटकर... पूरी मौज के साथ
इस प्यार को जीयो मेरे दोस्त...!
क्योंकि सिर्फ़ तब ही होता है,
रहता है पूरी तरह से,
ईमानदार प्यार...
सौ पैसा खांटी खुमार देता प्यार...
किसी बच्ची सा भोला और निश्छल प्यार...
जिसमें कौंधती है, प्यार करने वाले की आत्मा
और उसकी सच्चाई...
तुम्हारी फ़िक्र और परवाह वाकई सचमुच की होती है
तब, सचमुच जरा सी भी दूरी डरा देती है मन को
और बाँहों के घेरे का कसाव असली तड़प लिए होता है...
वह गर्मी भी खालिस होती है जो तपे हुए चेहरे,
सांसों और होठों से नुमांया होती है...
सारी प्रार्थनाएं सीधे कलेजे से निकलती हैं और
सबकुछ लुटाकर भी मजे में रहने वाली आस्था सच्ची होती है...
खेद है कि, फिर ऐसा रह नहीं जाता...
फिर तो सावन भी बरसता है, मगर उसकी आग महसूसती नहीं
साथ चलते हुए भी परछाइयाँ परस्पर लिपटती नहीं...
तुम्हें तड़प कर पुकारने वाली उस आवाज़ की आस में जिंदा रहते हो और
वही एक पुकार फिर आती नहीं...
फिर प्यार ना गाढ़ा, ना जुनूनी, ना विशुद्ध, ना गहरा,
ना किसी आवेग का रह जाता है !
मात्र एक खोखली उम्मीद की मानिंद...
जो एक-दूसरे से बमुश्किल निभ पाता है...!
प्यार को गुना-भाग, जोड़-घटाव...
किसी समीकरण में तौले जाने और
दुनियादार हो जाने से
पहले पूरी तरह से जी लो...
क्योंकि, फिर पलट कर नहीं आता है...
पहले दिनों जैसा प्यार...
फिर अपना-अपना कहते-कहते भी
अपना होने का भ्रम मात्र बनकर रह जाते हैं लोग...
फिर पूरी शिद्दत से
तुम उसी प्यार की कशिश को पाने के लिए
जुझने तो लगोगे...
मगर दोस्त... वह प्यार नहीं मिलेगा
ना फूलों और चाँद पर, ना भरी-पूरी रातों में, ना घर में, ना बगीचों में...
तलाशोगे अगर साथी की आँख में, चेहरे पर, उसकी बातों में...
और शारीरिक भाषा में... हताश होओगे यह पाकर कि
कोई गीली चीज दरम्यान से गायब है...
सिर्फ़ एक पथरीली सी हँसी है, जिसे तुम नहीं पहचानते और
बहुत सारा पानी सूख चुका है !
प्यार अक्सर दिन ढलते जाने पर
उपेक्षात्मक होता जाता है...
सैद्धांतिक रूप से तो...ठीक इसके उलट होना
और आदर्शवादी तौर पर...
ऐसा कतई नहीं होना... चाहिए...
मगर...
होता यही है...
इस पर अफ़सोस करने की हालत में पहुँचने से पहले
खुलकर, डटकर... पूरी मौज के साथ
इस प्यार को जीयो मेरे दोस्त...!
लेबल:
कविता,
प्रेम,
युवा,
स्त्री,
हिंदी,
हिंदी कविता,
हिंदी साहित्य
गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010
अभी मेरा हमसफ़र
अभी मेरा हमसफ़र
मेरे पहलू में मुँह छुपाये सो गया है...
(उसका यह भोला सा भरोसा मुझ पर
किस कदर आश्वस्त करता है -
कि जिंदगी नि:संदेह लाजवाब है !...
एक बार यकीन करके देखो !!!)
केशों के जाले से बिखरे उसके चेहरे पर
रौशनी पर परछाइयों के आड़े-तिरक्षे धारे बनाते हुए...
निर्मल सांसों की हरारत से रह-रह कांपते नथुने...
अधखुले रेशमी होंठ, छू लूँ तो दाग पड़ जायें !
...यह रात का वक्फ़ा... उफ़
लगता है, एक जमाने के लिए ठहर गया है !
उसकी मुंदी पलकों के नीचे
उजली-उजली दो वही आँखें हैं, जो हरदम मुझे
सुख के उजाले देती रहती हैं...बिन कहे...बिन माँगे...
(दुःख कहीं हुआ तो उन आँखों की ताब सह नहीं पाता...)
मेरा तमाम वजूद लंगर डाले उसके घाट पर
ऐसे टिक गया है...
जैसे बहुत भटकते हुए अचानक अपेक्षित पड़ाव
मिल गया हो...
अब इस सर्द रात की ख़ामोश ठण्डी
धुंध के दरम्यान
उसके पूरे जिस्म की खुशनुमाँ गर्माहट से
सिंकता हुआ मैं...
इस सफर-ए-हयात में
इस अजनबी चौराहे पर
एक पुराने लोहे के खम्भे पर
सर को टिकाये,
उसे अपनी बाजुओं में भरे हुए
अपने जिंदा होने का भरपूर उत्सव मना रहा हूँ...
मेरे पहलू में मुँह छुपाये सो गया है...
(उसका यह भोला सा भरोसा मुझ पर
किस कदर आश्वस्त करता है -कि जिंदगी नि:संदेह लाजवाब है !...
एक बार यकीन करके देखो !!!)
केशों के जाले से बिखरे उसके चेहरे पर
रौशनी पर परछाइयों के आड़े-तिरक्षे धारे बनाते हुए...
निर्मल सांसों की हरारत से रह-रह कांपते नथुने...
अधखुले रेशमी होंठ, छू लूँ तो दाग पड़ जायें !
...यह रात का वक्फ़ा... उफ़
लगता है, एक जमाने के लिए ठहर गया है !
उसकी मुंदी पलकों के नीचे
उजली-उजली दो वही आँखें हैं, जो हरदम मुझे
सुख के उजाले देती रहती हैं...बिन कहे...बिन माँगे...
(दुःख कहीं हुआ तो उन आँखों की ताब सह नहीं पाता...)
मेरा तमाम वजूद लंगर डाले उसके घाट पर
ऐसे टिक गया है...
जैसे बहुत भटकते हुए अचानक अपेक्षित पड़ाव
मिल गया हो...
अब इस सर्द रात की ख़ामोश ठण्डी
धुंध के दरम्यान
उसके पूरे जिस्म की खुशनुमाँ गर्माहट से
सिंकता हुआ मैं...
इस सफर-ए-हयात में
इस अजनबी चौराहे पर
एक पुराने लोहे के खम्भे पर
सर को टिकाये,
उसे अपनी बाजुओं में भरे हुए
अपने जिंदा होने का भरपूर उत्सव मना रहा हूँ...
लेबल:
कविता,
प्रेम,
युवा,
शेखर,
स्त्री,
हिंदी कविता,
हिंदी साहित्य
गुरुवार, 19 अगस्त 2010
साथी तुममें सावन है...
ओह मेरे साथी,
देखो पहाड़ों पर सावन है...
स्फूर्त हरियाली में सावन है
भीगी हुई चिर सद्यःस्नाता सी ये रातें
इन रातों में सावन है
तप कर जो कुन्दन हुईं,
तेरे इन्तजार में,
उन सांसों में सावन है
मन की क्षितिज के ओर छोर में
पाता हूँ
पावस के समृद्ध पयोधर सा
तुम्हें साथी
जानता हूँ कि
तुम में सावन है...
ये किस्सा...
गुनगुनाते हुए भीगते-भीगते दूर सड़क
पर वक्त काटने जैसा है...
छींटों को जीभ से चखने जैसा है
और आल्हाद का एक दरिया
भीतर उफनता है...
मैं खुश हूँ, मेरे भीतर एक सावन है !
हर एक सपना सावन है... साथी...
सपने का एक छोर तुम थाम लो
एक मेरे पलकों पर बाँध दो...
चलो, गीला हो जाएँ दोनों...
अगर इस बार नहीं, अगली बार कभी...
है जो बाकि इन्तजार अभी ...
कि,
फिर एक सावन तो ऐसा भी आयेगा
भीगेंगे दोनों खूब मन भर कर
तन जोड़ कर...
खिलखिलायेंगी... झुकती हुईं डालें नीम की
नाचेंगी बूंदें सीवान पर के नद्य पर
महकेंगी आँगन की दूब घनीं...
सावन के असर सारे
यहाँ से जब लुप्त हो जायेंगे
फिर माँगने को सावन भरपूर
हम सावन के गीतों में गाए जायेंगे...!
३०-०७/१९-८-२०१०
देखो पहाड़ों पर सावन है...
स्फूर्त हरियाली में सावन है
भीगी हुई चिर सद्यःस्नाता सी ये रातें
इन रातों में सावन है
तप कर जो कुन्दन हुईं,
तेरे इन्तजार में,
उन सांसों में सावन है
मन की क्षितिज के ओर छोर में
पाता हूँ
पावस के समृद्ध पयोधर सा
तुम्हें साथी
जानता हूँ कि
तुम में सावन है...
ये किस्सा...
गुनगुनाते हुए भीगते-भीगते दूर सड़क
पर वक्त काटने जैसा है...
छींटों को जीभ से चखने जैसा है
और आल्हाद का एक दरिया
भीतर उफनता है...
मैं खुश हूँ, मेरे भीतर एक सावन है !
हर एक सपना सावन है... साथी...
सपने का एक छोर तुम थाम लो
एक मेरे पलकों पर बाँध दो...
चलो, गीला हो जाएँ दोनों...
अगर इस बार नहीं, अगली बार कभी...
है जो बाकि इन्तजार अभी ...
कि,
फिर एक सावन तो ऐसा भी आयेगा
भीगेंगे दोनों खूब मन भर कर
तन जोड़ कर...
खिलखिलायेंगी... झुकती हुईं डालें नीम की
नाचेंगी बूंदें सीवान पर के नद्य पर
महकेंगी आँगन की दूब घनीं...
सावन के असर सारे
यहाँ से जब लुप्त हो जायेंगे
फिर माँगने को सावन भरपूर
हम सावन के गीतों में गाए जायेंगे...!
३०-०७/१९-८-२०१०
लेबल:
कविता,
प्रेम,
वर्षा,
सावन,
स्त्री,
हिंदी,
हिंदी कविता,
हिंदी साहित्य
शनिवार, 14 अगस्त 2010
कहानियों के नोट्स - "गदल" (रान्घेय राघव)
कई बार कुछ कहानियां अंतर्मन को छूती हैं और बरबस कुछ कहने का मन हो आता है. पिछले दिनों रांघेय राघव की कहानी "गदल" भी कुछ ऐसी ही बेहतरीन कहानियों में से एक है. कथ्य एवं शिल्प के मामले में अनूठी और बेजोड़. राघव जी की "गदल". नारी के उद्दाम उत्कंठा, प्रेम और सबसे पहले उसके आत्मसम्मान-स्वाभिमान को किस खूबसूरती से पिरोया है.
फणीश्वर नाथ रेणु की रचनाएँ,खासकर 'मैला आँचल', पढ़ लो तो शब्दों का टोन दिल-ओ-दिमाग पर घंटियों सा देर तक बजता रहता है. रेणु की कहानियाँ बताती हैं कि, शब्दों की मार क्या होती है, कैसे बिना ज्यादा कहे, सिर्फ कुछेक शब्द द्वारा पूरी स्थिति, पुरी तस्वीर भरपूर व्यंग और कटाक्ष के साथ खड़ी कर दी जाती है! उनकी अविस्मरणीय कहानियाँ... "ठेस", "संवदिया" और "पंचलेट"...
"गदल" में नारी का खाका शिवमूर्ति जी के "त्रिया चरित्र" की तरह कुछ खास है. नारी का प्रेम और सुप्त कामना जिसे वह वाणी से नहीं कहती पर वह अपने समझने वाले को इशारे खूब करती रहती है, उसे मानों धिक्कारती, ललकारती रहती.. खूबसूरती तो इसी इशारे को बयां करने में है.
डोडी के प्रेम में गदल तो उसी समय पड़ गई थी जब १४ वर्ष की आयु में उसका भाई डंडे की जोर पर उसे ले आया था. " जग हंसाई से मैं नहीं डरती देवर !...... तू उसके साथ तेल पिया लठ्ठ लेकर मुझे लेने आया था न, तब?मैं आई थी कि नहीं?" वही प्रेम था, विश्वास था कि वह डोडी से भी निभाती रही उसकी भाभी बनकर...डोडी भी तो उसी को चाहता रहा, परोक्ष रूप से. इसीलिए वह बर्दास्त नहीं कर पाया कि गदल उसके रहते किसी और मर्द के घर बैठ जाये. लेकिन गदल ने ऐसा क्यों किया... कारण था ये... "चूल्हा मैं तब फूकूँ, जब मेरा कोई अपना हो." गदल को बेटे बहू की मजूरी मुफ्त करनी मंज़ूर नहीं. "ऐसी बाँदी नहीं हूँ कि मेरी कुहनी बजे, औरों के बिछिए छनके." कहानी यहीं पर साधारण से असाधारण हो उठती है. अघोषित रूप से के आत्मसम्मान का प्रश्न उठती है. उसके यौनिक अधिकारों का मसला उठती है.
"गदल" में नारी का खाका शिवमूर्ति जी के "त्रिया चरित्र" से कहीं विपरीत खींचता है. नारी का प्रेम और सुप्त कामना जिसे वह वाणी से नहीं कहती पर वह अपने समझने वाले को इशारे खूब करती रहती है, उसे मानों धिक्कारती, ललकारती रहती है... खूबसूरती तो इसी इशारे को बयां करने में है.
रचना ह्रदय के पार जाये तभी तो वह काल से पार जाती है... कालातीत, कालजयी हो सकती है. कहानी का अंतिम दृश्य और संवाद, गदल का अंतिम वाक्य... उफ़ किस तरह तीर सा ह्रदय को भेद जाता है...! प्रेम की ज्वाला भी कितनी शालीनता से अपने तेज के साथ प्रकट होती है.
नारी विमर्श की रचनाएँ इधर खूब नयी धारा की आयी हैं. पर 'गदल' कुछ और ही नायाब लगती है. एक स्त्री की बहादुरी, प्रेम, आत्मसम्मान, जुझारूपन... हर पहलू मुखर हुआ है... बगैर किसी दावे या घोषणा के.
"गदल" को पढ़ना स्त्री-मनुष्य की चेतना को पढ़ना है.
"गदल" को पढ़ना स्त्री-मनुष्य की चेतना को पढ़ना है.
बुधवार, 21 जुलाई 2010
मेरा कोई हिस्सा
मैं साथ सोये हुए
अपने पुरुष से कुछ कहना चाहती हूँ
कुछ देर बतियाना चाहतीं हूँ
(कुछ माँगना तो कब का छोड़ चुकी हूँ)
पूछना चाहती हूँ, हालाँकि पूछूंगी नहीं... कि,
तृप्ति की जो नींद तुम पा रहे हो,
उसमें मेरा कोई हिस्सा क्यों नहीं ?
मुझे जिस जगह छोड़ आये हो
मेरी उस संतृप्ति के अधूरे मोड पर
जहाँ से तुम मुड़े
मैं अभी तक वहीँ अतृप्त भटक रही हूँ, क्या तुम्हें
पता है, मेरे पुरुष ?
तुम सुबह उठोगे
चल दोगे
मेरी अतृप्तियों और मेरे सवालों के साथ मुझे
झूठे बर्तनों सा सरका कर...
अपनी दिनचर्या में गुम हो जाओगे
फिर शाम को लौटोगे
उधर की आपाधापी से क्षत-विक्षत होकर
मुझे रौंदकर
फिर से तृप्त होगे,
लस्त-पस्त फिर गहरी नींद
में डूब जाओगे...
और मैं तुम्हारी संतृप्ति के लिए बनी हुई
सिर्फ़ कोई लुभावनी उत्पाद-सी होकर
पता नहीं क्यों तुम से ही
सवाल पूछने की इच्छा होते हुए भी
चुपचाप करवट लेकर
देर तक जगती रहूँगी...
यह पूछने से कतराती हुई
(क्योंकि जवाब तुम ढंग का नहीं दे सकते) कि,
तृप्ति की जो नींद तुम पा रहे हो,
उसमें मेरा कोई हिस्सा क्यों नहीं ?
०८-०९-१०/०७/२०१०
अपने पुरुष से कुछ कहना चाहती हूँ
कुछ देर बतियाना चाहतीं हूँ
(कुछ माँगना तो कब का छोड़ चुकी हूँ)
पूछना चाहती हूँ, हालाँकि पूछूंगी नहीं... कि,
तृप्ति की जो नींद तुम पा रहे हो,
उसमें मेरा कोई हिस्सा क्यों नहीं ?
मुझे जिस जगह छोड़ आये हो
मेरी उस संतृप्ति के अधूरे मोड पर
जहाँ से तुम मुड़े
मैं अभी तक वहीँ अतृप्त भटक रही हूँ, क्या तुम्हें
पता है, मेरे पुरुष ?
तुम सुबह उठोगे
चल दोगे
मेरी अतृप्तियों और मेरे सवालों के साथ मुझे
झूठे बर्तनों सा सरका कर...
अपनी दिनचर्या में गुम हो जाओगे
फिर शाम को लौटोगे
उधर की आपाधापी से क्षत-विक्षत होकर
मुझे रौंदकर
फिर से तृप्त होगे,
लस्त-पस्त फिर गहरी नींद
में डूब जाओगे...
और मैं तुम्हारी संतृप्ति के लिए बनी हुई
सिर्फ़ कोई लुभावनी उत्पाद-सी होकर
पता नहीं क्यों तुम से ही
सवाल पूछने की इच्छा होते हुए भी
चुपचाप करवट लेकर
देर तक जगती रहूँगी...
यह पूछने से कतराती हुई
(क्योंकि जवाब तुम ढंग का नहीं दे सकते) कि,
तृप्ति की जो नींद तुम पा रहे हो,
उसमें मेरा कोई हिस्सा क्यों नहीं ?
०८-०९-१०/०७/२०१०
लेबल:
कविता,
स्त्री,
हिंदी,
हिंदी कविता,
हिंदी साहित्य
मंगलवार, 20 जुलाई 2010
बाग में बैठी हुई लड़की..
बाग में बैठी हुई लड़की
के इर्द-गिर्द
की पूरी दुनिया गुम है उसके लिए
बस लड़की है
और वो बैठी है...
लड़की चुप है या कुछ बोल रही है
कोई नहीं सुन रहा है...
वो किसी और के सुनने के लिए नहीं,
खुद के लिए बोलती है
वो धीरे-धीरे गुनगुना भी रही है...
वह संगीत भी सिर्फ़ पेड़ों की शाखों को झुलाने के लिए है...
वो फूलदार झाड़ियों, साफ़ नीले आकाश,
हरी घास से होते हुए सपनों में झांक रही है
अपने-आप में गहरे उतरी हुई है,
इसलिए अभी बाहर वालों से महफूज़ है...
लोहे की एक बैंच पर बैठी
जाने क्या सोचकर-गुनकर
रह-रह कर
जोर से
सिर्फ़ अपने लिए खिलखिलाती हुई
लड़की
और कोने में फूलों के झाड़ पर बैठी
पर फडफडाती
सुनहरी तितली में
एक बारीक़ साझेदारी तो है,
खुल कर पंख फ़ैलाने की आजादी में...
एक शर्त लगी है, कि
कौन ज्यादा मचल कर
उड़ सकता है !
बाग में बैठी लड़की
उड़ रही है...
और इसे या तो वह जानती है या
शायद वह तितली !
०८-०९-१०-१३-२०.०७.२०१०
के इर्द-गिर्द
की पूरी दुनिया गुम है उसके लिए
बस लड़की है
और वो बैठी है...
लड़की चुप है या कुछ बोल रही है
कोई नहीं सुन रहा है...
वो किसी और के सुनने के लिए नहीं,
खुद के लिए बोलती है
वो धीरे-धीरे गुनगुना भी रही है...
वह संगीत भी सिर्फ़ पेड़ों की शाखों को झुलाने के लिए है...
वो फूलदार झाड़ियों, साफ़ नीले आकाश,
हरी घास से होते हुए सपनों में झांक रही है
अपने-आप में गहरे उतरी हुई है,
इसलिए अभी बाहर वालों से महफूज़ है...
लोहे की एक बैंच पर बैठी
जाने क्या सोचकर-गुनकर
रह-रह कर
जोर से
सिर्फ़ अपने लिए खिलखिलाती हुई
लड़की
और कोने में फूलों के झाड़ पर बैठी
पर फडफडाती
सुनहरी तितली में
एक बारीक़ साझेदारी तो है,
खुल कर पंख फ़ैलाने की आजादी में...
एक शर्त लगी है, कि
कौन ज्यादा मचल कर
उड़ सकता है !
बाग में बैठी लड़की
उड़ रही है...
और इसे या तो वह जानती है या
शायद वह तितली !
०८-०९-१०-१३-२०.०७.२०१०
लेबल:
कविता,
युवा,
रचना,
स्त्री,
हिंदी साहित्य
हम नहीं थकतीं...!
थोड़ी देर की चहलकदमी के बाद
पुरुष ने पूछा, थक गयीं तुम ?
स्त्री ने हँस कर कहा,
हम नहीं थकतीं...
इतनी छोटी सी बात का अर्थ
या सही मायनों में लक्षणार्थ
लगाना वाकई
प्रत्येक पुरुष के पुरुषार्थ
से परे होता है...
यह पुरुष नहीं जानता
यह भी स्त्री ही जानती है...!
पुरुष ने पूछा, थक गयीं तुम ?
स्त्री ने हँस कर कहा,
हम नहीं थकतीं...
इतनी छोटी सी बात का अर्थ
या सही मायनों में लक्षणार्थ
लगाना वाकई
प्रत्येक पुरुष के पुरुषार्थ
से परे होता है...
यह पुरुष नहीं जानता
यह भी स्त्री ही जानती है...!
लघुतर लिंग वाली जिन्दगियाँ...
उन दिनों जब
उनके लिए
बाकी और दिनों की तरह ही
नींद के बाहर गुलाब थे
सपनों के भीतर नश्तर !
सलीके से कुछ भी नहीं था
सिवाए लड़ने की मनोदशा के...
लेकिन ऐसा कुछ सोचते ही विरोध की हवा
बदबू मारने लगती थी
बाहर वाले दरवाजों पर सांकलें चढ़ा दी जाती थीं
और किन्हीं पुरानी किताबों से निकले हुए नियम
संस्कारों के चाबुक पर लागू किये
जाते थे...
फिर भी ऐसा होना था कि
लघुतर लिंग बताई गयीं जिन्दगियाँ
जहाँ एक तरफ
स्वेटर बुन कर दोपहर बिताया करती थीं, या
बच्चों की सुडकती नाक पोंछ रही थीं, या
चहबच्चे मे पानी भर रहीं थीं... या ऐसे ही कई
सनातन घरेलू काम-काजों में उलझाकर
रखने की साजिश की शिकार थीं
लेकिन दूसरी तरफ...
वायुयान उड़ा रही थीं,
पहाड़ों पर चढ रही थीं,
पदक जीत रही थीं...
सड़कों पर नुक्कड़ नाटक खेल रहीं थीं
किताबें लिख रहीं थीं...
और-और-और... और भी बहुत जगह
बिल्कुल उसी एक ही समय के समांतर
वह, लघुतर लिंग बताई गयीं जिन्दगियाँ,
व्यवस्था के पायों में बंधी हुई भी थीं
और घोषित ताकतवर विपरीत लिंग वालों से
दो कदम आगे भी थीं...!
लड़ाकू बनाना और
उपलब्धियां गिनाना
एक जरूरत की मानिंद, वक्त और
तारीखों का काम होता है, वक्त जरूरत पैदा
करता रहेगा...
तारीखें गवाही देती रहती हैं, देती रहेंगी...
लघुतर लिंग बताई गयीं जिन्दगियाँ...
हरदम अब, दो कदम आगे रहने
के लिए कदम बढ़ाती रहेंगी...
क्योंकि, उनके लिए
नींद के बाहर हमेशा गुलाब रहेंगे
और सपनों में कांटे-खलिश-नश्तर...
१९-२०/०७/२०१०.
उनके लिए
बाकी और दिनों की तरह ही
नींद के बाहर गुलाब थे
सपनों के भीतर नश्तर !
सलीके से कुछ भी नहीं था
सिवाए लड़ने की मनोदशा के...
लेकिन ऐसा कुछ सोचते ही विरोध की हवा
बदबू मारने लगती थी
बाहर वाले दरवाजों पर सांकलें चढ़ा दी जाती थीं
और किन्हीं पुरानी किताबों से निकले हुए नियम
संस्कारों के चाबुक पर लागू किये
जाते थे...
फिर भी ऐसा होना था कि
लघुतर लिंग बताई गयीं जिन्दगियाँ
जहाँ एक तरफ
स्वेटर बुन कर दोपहर बिताया करती थीं, या
बच्चों की सुडकती नाक पोंछ रही थीं, या
चहबच्चे मे पानी भर रहीं थीं... या ऐसे ही कई
सनातन घरेलू काम-काजों में उलझाकर
रखने की साजिश की शिकार थीं
लेकिन दूसरी तरफ...
वायुयान उड़ा रही थीं,
पहाड़ों पर चढ रही थीं,
पदक जीत रही थीं...
सड़कों पर नुक्कड़ नाटक खेल रहीं थीं
किताबें लिख रहीं थीं...
और-और-और... और भी बहुत जगह
बिल्कुल उसी एक ही समय के समांतर
वह, लघुतर लिंग बताई गयीं जिन्दगियाँ,
व्यवस्था के पायों में बंधी हुई भी थीं
और घोषित ताकतवर विपरीत लिंग वालों से
दो कदम आगे भी थीं...!
लड़ाकू बनाना और
उपलब्धियां गिनाना
एक जरूरत की मानिंद, वक्त और
तारीखों का काम होता है, वक्त जरूरत पैदा
करता रहेगा...
तारीखें गवाही देती रहती हैं, देती रहेंगी...
लघुतर लिंग बताई गयीं जिन्दगियाँ...
हरदम अब, दो कदम आगे रहने
के लिए कदम बढ़ाती रहेंगी...
क्योंकि, उनके लिए
नींद के बाहर हमेशा गुलाब रहेंगे
और सपनों में कांटे-खलिश-नश्तर...
१९-२०/०७/२०१०.
लेबल:
युवा,
स्त्री,
हिंदी कविता,
हिंदी साहित्य
सोमवार, 21 जून 2010
बहुत ज्यादा हँसने वाली लड़कियाँ
बहुत ज्यादा हँसने वाली लड़कियाँ
दरअसल खुश रहने का भ्रम देने वाली लड़कियाँ होती हैं...
हम नंगी आँखों से नहीं देख पाते
परत के नीचे छिपाने की उनकी जोरदार कोशिश
के कारण
हँसी की मोटी गर्द के नीचे इकठ्ठा उनका कोई दुःख
नहीं समझते या समझना चाहते कि
हंसने, बेतरतीब हंसने, लगातार-बेहिसाब हंसने...
के भीतर किस खूब तरीके से
अपना दुःख छुपा ले जाती लड़कियाँ...
...यक़ीनन बहुत बड़ी कलाकार होती हैं.
या तो हमें उनकी हँसी से रश्क होता है,
या गुस्सा आता है, या
यही कि हम नहीं सोचना चाहते
लफंगी लगने की हद तक...
हँसती हुई लड़कियों के बारे में नैतिक होकर
हमें तो सिर्फ़ उनकी हँसी से मतलब होता है
इसलिए सिर्फ़ भली लगती हैं,
बहुत ज्यादा हँसती हुई लड़कियाँ.
बहुत ज्यादा हँसती हुई लड़कियाँ
ताली बजा-बजा कर हँसती हुई लड़कियाँ,
कभी दुपट्टे की ओट से हँसती हुईं,
कभी सरे-राह मार ठहाका हँसती हुईं...
साझा नहीं करतीं
अपनी धडकनों में बजते दुःखों को
वह हंसतीं हैं...
कि हँसने की मजबूरी से लाचार
निबटाते हुए दैनिक क्रियाकलाप... हँसते-हँसते
दिन गुजारा करती हैं
अगर कभी हँसी रुक जाती है
आसपास के कई लोग कई तरह से, और के
सवाल करते हैं...
क्या राज है उनके गुमसुम होने का
कोंच-कोंच कर पूछते हैं...
खुलेआम और अचानक उदास होना लड़कियों के लिए कुफ़्र है,
दुर्घटना है... इल्जाम है...
उदास लड़कियाँ भी बदनाम हो जाती हैं...
जवाबदेह हो जाती हैं...!
इसलिए रोने से बचने की कोशिश में ही
हँसती हैं लड़कियाँ
बहुत ज्यादा हँसती हैं लड़कियाँ...
शनिवार, 5 जून 2010
मित्रो मरजानी - कृष्णा सोबती
समित्रावंती (मित्रो), आधुनिक स्त्री के उस दमित रूप की मुखर अभिव्यक्ति, जिसे पहले सिर्फ छिपाया गया. जब भी मित्रो जैसी औरत से इस समाज का बावस्ता हुआ होगा, खुद को या उसे ही छुपाता रहा होगा...
मित्रो पुरुषवादी अंह और संस्कारों के जड़ और कुंद मर्यादाओं के पाक दरवाजे पर बार-बार ठोकर मारती रहती है, ताकि ताजी बयार, मुक्ति की हवा भीतर आ सके... खुद के भीतर... और तब मित्रो भरपूर सांस भरेगी...
मित्रो की "मुक्ति" व्याभिचार की श्रेणी में रख दी जायेगी, लेकिन सवाल ये है कि मित्रों की अतृप्त कामनाओं की तुष्टि कौन करता है... उसे उसकी कामना की आग में झुलसने को किसने छोड़ दिया है? उसी मर्द ने ही ना...
और फिर गलत क्या है, सही क्या है? कौन करेगा इसका निर्धारण? जो करेगा, क्या वो अपनी अंतरात्मा के साथ इंसाफ करते हुए कह सकता है कि उसने वो सब नहीं किया, करने को चाहा तक नहीं, जिसे वह "गलत" परिभाषित कर रहा है?
मित्रों की कामुकता नैसर्गिक है, वह जितना उसके साथ है, उतना ही मेरे और आपके साथ भी सत्य है... सिर्फ कोरी मर्यादा
के भारी-भरकम आदर्श के नीचे हम, खासकर औरतें, उसे जीवन भर छुपाने-दबाने को मजबूर हैं...
मित्रो नैतिकता, रूढ़ी की जर्द दीवारों को लांघने की कोशिश करती है, उसकी बोली-लहजा, कामनाएँ... अपना अधिकार पा लिया अंततः, लेकिन वह किसी अंतर्द्वंद से घिरी नहीं रहती कभी. वह स्पष्टवादी है... भाषा में, व्यव्हार में, अभिव्यक्ति में...
मित्रो एक सच्चाई है, जीती-जागती, हाड़-मांस की बनी हुई सच्चाई... मर्यादा-पुरुषोत्तमों के वास्ते एक कड़वी सच्चाई भी...
मित्रो सदियों से घुटकर अपनी ही यौनिकता को जब्त करती, संयम के घूँघट और बुर्कों में दम तोड़ती मुक्तिकामी स्त्री-वर्ग की उद्दाम लालसा की प्रतीक है... ये लालसा अनर्गल हो ही नहीं सकती...
केवल एक ही बैठक में पूरी पढ़ लिए जाने लायक कृति है - "मित्रो मरजानी"... और फिर ढेर सारे सवाल प्रतिध्वनित होते रहते हैं आपके भीतर देर तक, लेकिन उनके उत्तर भी पीछे-पीछे आते हैं...
मित्रो पुरुषवादी अंह और संस्कारों के जड़ और कुंद मर्यादाओं के पाक दरवाजे पर बार-बार ठोकर मारती रहती है, ताकि ताजी बयार, मुक्ति की हवा भीतर आ सके... खुद के भीतर... और तब मित्रो भरपूर सांस भरेगी...
मित्रो की "मुक्ति" व्याभिचार की श्रेणी में रख दी जायेगी, लेकिन सवाल ये है कि मित्रों की अतृप्त कामनाओं की तुष्टि कौन करता है... उसे उसकी कामना की आग में झुलसने को किसने छोड़ दिया है? उसी मर्द ने ही ना...
और फिर गलत क्या है, सही क्या है? कौन करेगा इसका निर्धारण? जो करेगा, क्या वो अपनी अंतरात्मा के साथ इंसाफ करते हुए कह सकता है कि उसने वो सब नहीं किया, करने को चाहा तक नहीं, जिसे वह "गलत" परिभाषित कर रहा है?
मित्रों की कामुकता नैसर्गिक है, वह जितना उसके साथ है, उतना ही मेरे और आपके साथ भी सत्य है... सिर्फ कोरी मर्यादा
के भारी-भरकम आदर्श के नीचे हम, खासकर औरतें, उसे जीवन भर छुपाने-दबाने को मजबूर हैं...
मित्रो नैतिकता, रूढ़ी की जर्द दीवारों को लांघने की कोशिश करती है, उसकी बोली-लहजा, कामनाएँ... अपना अधिकार पा लिया अंततः, लेकिन वह किसी अंतर्द्वंद से घिरी नहीं रहती कभी. वह स्पष्टवादी है... भाषा में, व्यव्हार में, अभिव्यक्ति में...
मित्रो एक सच्चाई है, जीती-जागती, हाड़-मांस की बनी हुई सच्चाई... मर्यादा-पुरुषोत्तमों के वास्ते एक कड़वी सच्चाई भी...
मित्रो सदियों से घुटकर अपनी ही यौनिकता को जब्त करती, संयम के घूँघट और बुर्कों में दम तोड़ती मुक्तिकामी स्त्री-वर्ग की उद्दाम लालसा की प्रतीक है... ये लालसा अनर्गल हो ही नहीं सकती...
केवल एक ही बैठक में पूरी पढ़ लिए जाने लायक कृति है - "मित्रो मरजानी"... और फिर ढेर सारे सवाल प्रतिध्वनित होते रहते हैं आपके भीतर देर तक, लेकिन उनके उत्तर भी पीछे-पीछे आते हैं...
रविवार, 23 मई 2010
मैंने ठान लिया है
सारी वेदनाओं को समेट कर
देती हुई बालों को एक झटका...
पोंछ कर लहू बाजूओं पर का
मैं फिर खड़ी होती हूँ,
सड़क पर दोबारा
कुछ ग्रंथों पर इतराए हुए इस कबीलाई
सनातन समाज के
गाल पर चांटे सा पड़ती हूँ...
मुर्दा इतिहास की खाक में
मुँह डाले उर्ध्वाकार जो गड़ा है
यह सिर धुनता जो लोक है
सुने मेरी हुंकार...
धम्म-धम्म...
मेरे जीवित रहने का श्रम
मेरे रक्त के ताप से प्रेरित हुआ मेरा निर्णय
मैंने लीक पर थूक दिया
मुक्त हो सकूंगी अब
पोथियों, बिस्तरों, जच्चाघरों, दड़बों, कसाईबाडों से
मैं धुरी से बंधी तो बंधूंगी स्वेच्छा से
कोई हाँक के तो देखे अब
मेरे सींगों की धार देखे अब
मैं खड़ी हूँ लो बीच चौराहे
बचा सको तो बचा लो अपनी लाज, धर्म, कुलमर्यादा
मैंने पल्लू से झाड़ा सनातनी धर्म का बुरादा....
देती हुई बालों को एक झटका...
पोंछ कर लहू बाजूओं पर का
मैं फिर खड़ी होती हूँ,
सड़क पर दोबारा
कुछ ग्रंथों पर इतराए हुए इस कबीलाई
सनातन समाज के
गाल पर चांटे सा पड़ती हूँ...
मुर्दा इतिहास की खाक में
मुँह डाले उर्ध्वाकार जो गड़ा है
यह सिर धुनता जो लोक है
सुने मेरी हुंकार...
धम्म-धम्म...
मेरे जीवित रहने का श्रम
फिर पोंछ स्वेद आँचल से भाल का
लाँघती हूँ सदियों के इस कंटीले बाड़ को
मेरे रक्त के ताप से प्रेरित हुआ मेरा निर्णय
मैंने लीक पर थूक दिया
मुक्त हो सकूंगी अब
पोथियों, बिस्तरों, जच्चाघरों, दड़बों, कसाईबाडों से
मैं धुरी से बंधी तो बंधूंगी स्वेच्छा से
कोई हाँक के तो देखे अब
मेरे सींगों की धार देखे अब
मैं खड़ी हूँ लो बीच चौराहे
बचा सको तो बचा लो अपनी लाज, धर्म, कुलमर्यादा
मैंने पल्लू से झाड़ा सनातनी धर्म का बुरादा....
बुधवार, 14 अप्रैल 2010
मैं सुनैना दास : एक जिन्दा शै
मैं सुनैना दास, आपको अपनी आपबीती, न-न कहानी जैसा कुछ सुना रही हूँ. मैं किस्सागोई में कोई एक्सपर्ट नहीं हूँ, सो जो कुछ कहना है, सपाट बक दूँगी, इसके लिए माफ़ करियेगा.
मैं जानती हूँ कि मैं कोई नयी बात नहीं कहने जा रही. आप ऐसी कहानियां या वक्तव्य बहुत सी पढ़ चुके होंगे, आए दिन पढ़ ही लेते होंगे दो-चार... न सिर्फ पत्रिकाओं में, बल्कि अख़बारों में ही...बतर्ज़ रिपोर्ट...! महिला विमर्श में भी गाहे-बगाहे आप सभी में से बहुतों ने एकाध बार हिस्सेदारी भी की ही होगी या करने की इच्छा पाले होंगे.
मैं सुनैना दास, उम्र १९ वर्ष, स्नातक फर्स्ट ईयर, जो कहने या सुनाने जा रही हूँ, उसके लिए मुझे ये दावा करने की जरूरत नहीं महसूस हो रही कि मैं कोई बहुत बड़ा साहस का काम कर रही हूँ. मैं यहाँ जिन शब्दों, अर्थों और रिश्तों का, यहाँ तक कि एहसासों का इस्तेमाल या जिक्र कर रहीं हूँ, वो प्रायः आम हैं. रोजमर्रा की भाषा में, व्यवहार में... धोखे में...
मैं जिन्दा हूँ, इसलिए बोल रही हूँ. हर जिन्दा शै बोलती है...
और मेरे लिए, सचमुच आज यह सब आपसे “शेयर” करना अच्छा लग रहा है, मुझे यकीन है कि ये सब कह चुकने के बाद मैं काफ़ी हल्का महसूस करूंगी...
एक हमारे पड़ोसी हैं, सिंग साहब, यानि एन. डी. सिंह. पूरा नाम नारायण देव सिंह. इस आदमी को बचपन से चाचा कहती थी या फिर जैसा उसने मुझे सिखाया था, ‘बड़े पापा’ कहा करो’, तो ज्यादातर मैं उसे ‘बड़े पापा’ ही कह कर बुलाती थी. तब तक, जब तक कि... वो सब नहीं हो गया जिसको लेकर मैं अब आपको ये कथा सुना रही हूँ... इसलिए इस कहानी में तो क्या, अपनी जिंदगी में भी, मैं आगे कभी ‘बड़े पापा’ मुँह पर नहीं लाऊंगी. इस शब्द से मुझे बेहद कोफ़्त और नफ़रत हो रही है...
वो हमारे फ्लैट के ‘सामने दरवाजे’ पर रहता है, अंग्रेजी में तो आजकल यही कहा जाता है ना, ‘द मैन नेक्स्ट डोर !’ पुलिस की नौकरी करता है, सो बड़ी सी तोंद और घनीं मूछों से दोनों तरफ़ के गाल आधे ढांपे रहना शायद उसकी पुलिसिया नौकरी की डिमांड है!
मैं उससे पहले बहुत डरा करती थी. मगर धीरे-धीरे ये डर कम होने लगा था, जब वो मुझे बाबा के साथ कहीं आते जाते देखता, पुचकार कर बुलाने लगता. गोद में उठा लेता, या फिर सर और पीठ पर दुलार से हाथ फेरने लगता. मैं उस समय छः-सात साल की रही होऊँगी. फिर तो डर इतना कम हो गया कि मैं अब बाबा के बगैर भी उसके सामने जाने से कतराने नहीं लगी...
कभी-कभी वो मुझे बेधड़क अपनी गोद में उठा लेता और अपनी छाती से कसकर दाबता...मेरे गाल पर चूमने लगता. उसकी मूछें चुभतीं, मानों खुरच ही डालेगी मेरे कोमल गालों को. पर मैं सिर्फ कुनमुना कर रह जाती, और कर भी क्या सकती थी उसकी जकड़न में. मेरी कसमसाहट को बाबा और माँ भी एक भोली बाल-सहज प्रतिक्रिया ही समझते और उस आदमी के साथ हँसते रहते. वो बाबा से कहता, “बड़ी प्यारी बच्चिया है सदानंद तेरी, इसे मेरे घर भेज दो. इसे हम रख लेंगे...” और ठहाका लगाता, उसकी तोंद थूलथूलाने लगती, जिसपे मैं काँप रही होती. मैं ये सुनते ही उसकी गोद से उतरने को जी-जान लगा देती और बाबा की तरफ़ छूट भागती. बाबा हँसते रहते, मानों गर्व से पुलकित होकर... जिसे समझना मेरे लिए आज तक मुमकिन ना हो सका.
मैं धीरे-धीरे विकसित हो रही थी. जैसे कि इस धरती पर हर जीव ‘ग्रोथ’ करता है. जल्द ही मैं उन दिनों के दौर में आ पहुंची, जब ‘माहवारी’ की शक्ल में खुद के विशिष्ट होने, यानि मादा होने का एहसास मुझे हुआ. मुख़्तसर एहसास...
पहली बार खून देखकर तो मेरी हालत खराब हो गई थी! माँ से पूछा तो टका सा जवाब मिला, “ऐसा होता है सभी लड़की के.” और किससे पूछती? कोई दीदी तो है नहीं, सहेलियों से पूछते शर्म लगा...
वो अपनी पुलिसिया ड्यूटी से कभी एक तयशुदा समय पर घर तो आता नहीं था. दिन में कभी भी, और रात में किसी भी वक्त... उसकी बीबी, यानी मेरी चाची, जिनके उस वक्त तक चार-चार बच्चे, एक-डेढ़ साल के अंतराल पर हो चुके थे, वह उन्हीं में सुध-बुध खोए व्यस्त रहती या मेरे सर पर पटक जाती. मैं बुरा नहीं मानती थी, बल्कि मुझे तो उसकी वो औलादें बड़ी प्यारी थीं, मेरे मन बहलाव का सर्वोत्तम साधन... मैं चाची को जो बन पड़ता, मदद करती. कभी छोटू को नहला देती, तो कभी गुडिया का स्कूल बैग संभाल देती, कभी पास बिठाके पढ़ाती, यानि उनको सँभालने की मेरी भी ड्यूटी लगी रहती ताकि चाची घर के काम निपटा सकें...
इन्हीं दिनों जब मेरे उभार सलीके से पुष्ट हो रहे थे, उसने अचानक एक दोपहर, लगभग आतुर होकर, मुझे छाती से कसकर दबोच लिया, मैं हतप्रभ-विस्मित सी अपने को उस पकड़ से छुड़ाने को कसमसाई, मगर वो अजगर की फांस सी मजबूत थी. मुँह से शराब की तीखी बास... मुझे मितली आने लगी, दम घुटता सा लगा...
तभी चाची किसी चीज को ढूंढती उस कमरे में आ निकली... मैं उस जकड़ से छुटी और सीधे अपने घर के बाथरूम में भागती हुई घुसी थी... मेरा दम फूल रहा था, मैं थर-थर कांप रही थी...
बौछार के नीचे बेदम हांफती हुई सी काफ़ी देर तक खड़ी रही...
स्वभाव से चंचल होने के बावजूद मैं बहुत लज्जालु प्रकृति की हूँ, या कहूँ थी... पर मेरी हिचक मेरे उस एकमात्र युवा दोस्त के सामने काफूर हो जाती, वो ही एकमात्र मेरा अंतरंग बनता जा रहा था. उम्र के इस दौर में, जो माँ को होना चाहिए था, उस भूमिका को मेरा दोस्त ईमानदारी से निभाने लगा था. वो मुझे अक्सर सलाह देता था, “सुनो, पुरुष हमेशा कामुक-अवसरवादी होता है. उससे बचना. मैं क्या और क्यों कह रहा हूँ मुझे मालूम है, क्योंकि मैं खुद एक मर्द हूँ.”
उस दिन मुझे उसकी बात का अर्थ साफ़ हो गया.
मुझे निहायत बुरा लगा था, उस आदमी का ऐसा बर्ताव. जिस पर मेरा कोई भरोसा और यकीन ना होते हुए भी एक इंसानी आश्वस्ति सी थी... मेरे बदन पर देर तक उस लिजलिजे जकड़न का एहसास बना रहा, वैसे ही जैसे रस्सी खुल जाने पर भी उस हिस्से पर उसका एहसास बना रहता है. माँ से बताने को दिन भर मौका ढूंढती रही... और रात में जब कहा तो माँ बोली, “तो क्या हुआ, बचपन में भी तो तुझे गले लगाकर, प्यार किया करते थे...!”
आश्चर्य! क्या माँ को समझ नहीं आ रहा था कि अब मेरा बचपन नहीं था, मैं बच्ची नहीं रही थी, बचपन से जवानी की चौखट पर कबकी पैर धर चुकी थी. कि अब मेरे शरीर का भूगोल और रसायन बदल रहा था... आश्चर्य कि ये मेरी सगी माँ है!
मेरे पाठकों, मैं एक बात इस वाकये के मद्देनज़र पूछ रही हूँ... मैं मानती हूँ और यह सच भी है कि कोई स्त्री अछूती नहीं रहती, क्योंकि उसे मर्द हर क्षण अपने फितरत की तमाम कामुकता के साथ छूता है. फिर कौमार्य-शुचिता, पवित्रता और पतिव्रता के ढकोसले भी तैयार करता है! मेरे पुरुष सहजीवियों... जब आप ये दोगलापन कब छोड़ोगे ?
मैं सुनैना दास, अब अनछुई, पवित्र और हाँ, ‘वर्जिन’ नहीं हूँ, शायद इसीलिए आज अपनी बात कहने में आज मुझे किसी हिम्मत की जरुरत नहीं महसूस हो रही.
वह आदमी शराब पानी की तरह पीता, मुफ़्त की ही होती तो कोई लिमिट क्यों कर रहता. इसमें मेरे बाबा भी शामिल होते हैं, शराब का लालच ही खींचता है उनको उधर... सजातीय होने के आलावा...! ड्यूटी से वह कभी भी आ टपकता है, और जब मैं उसके सामने पड़ जाती तो मुझे किसी तरह बिना छुए, हाथ लगाये नहीं रह पाता. आमतौर पर इसे उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता, मगर इसी बात का फायदा तो उठाया जाता है... मुझे भीतर से खूब बुरा लगता, पर मैं लिहाज करती थी कि मुझसे बड़े हैं, मन में कोई पाप लेकर तो ऐसा नहीं करते होंगे. मैं समझती थी सारी दुनिया सफ़ेद परदे की तरह उजली है! हाँ, कितनी मूर्ख थी मैं...या जानबूझकर खुद को बना रही थी. ये भी उसी दिन समझ आया...
चाची जब भी कुछ अच्छा अपने तीनों बच्चों, चूँकि सबसे छोटी वाली तो दुधमुंही थी, के लिए पकाती मुझे भी बुलाकर खिलाती या मेरे घर भिजवा देती. उनके पति के प्रति अब थोड़ी सतर्क और कटी रहने के बावजूद मैं उस घर में घुसी रहती तो उसका एक कारण थी चाची और उनका प्यार. बाद में पता चला कि वो मुझपे इतना अपनापा इसलिए जताती थीं कि मैं उनके बच्चों की आया बनी रहूँ ! इसके अलावा माँ अक्सर मुझे किसी ना किसी काम से वहाँ भेजती. उन दिनों में साढ़े अठारह साल पुरे कर चुकी थी और थोड़ी सयंत होने लगी थी. माँ ने कभी परवाह नहीं की कि मेरी उम्र मेरे मादा होने के कारण शिकारगाह में छोड़े गए खरगोश की नियति के समान खतरनाक हो चुकी है! माँ मुझे आधी रात को भी पड़ोस में भेज सकती थी, किसी भी परिचित, चाहे दो दिन का ही हो, पुरुष के साथ घर या कहीं भी अकेला छोड़ सकती थी! सड़क पर आवारा लौंडे मुझ पर फब्तियां कसते तो भी माँ निस्संग रह जाती थी...
आखिर माँ पहली पाठशाला होती है! पर मेरे मामले में ऐसा नहीं था, ना आज भी है... वो और सब बातों में किसी हद तक थी भी, पर यौन विषय पर नहीं. एक बंद दरवाजे की तरह... २१वीं सदी में मैं थी, मेरी माँ थी, मगर मैं अपने पाठ और अनुभव स्वयं पहली बार जीकर इकठ्ठे कर रही थी.
बाबा अपनी फिक्रमंदी जरूर दिखाते, पर वो नसीहतों से ज्यादा कुछ ठोस नहीं दे सके...
मेरे अजीज पाठकों, आपको अब तक भान तो हो ही गया होगा कि एन. डी. सिंह नाम के उस आदमी ने ही मेरी ‘वर्जिनिटी’ को खत्म किया है... इससे भी कहीं ज्यादा वो आदमी मेरे विश्वास और सम्मान का खूनी है.
जो मैं कहना चाहती हूँ उस मुद्दे को आप नोट करें, कि औरत क्या सिर्फ छली जाने के लिए होती है? क्या मैंने एक आदमी, और स्पष्ट कहूँ तो, एक मर्द पर भरोसा करके गलती की? उस आदमी ने मुझे बचपन, गोया लड़की तो बारह साल में ही युवा हो जाया करती है. खर-पतवार सी बढ़ती है. ‘बेटा धान की बाली होता हैं, और लड़की खर-पतवार... बेमोल, छांटे जाने योग्य, अपभ्रंश...’ किसी सहेली की माँ से सुना था, जब वो अपने गाँव की बात कर रही थी. तो उस आदमी ने मुझे बचपन से यकीन दिलाया कि मैं उन्हें अपने से उम्र में बड़ा, वत्सल और अपना शुभचिंतक मानूँ, उनकी इज्जत करूँ... ये ही हमारे यहाँ के संस्कार भी हैं. मैंने कहाँ भूल कि जो उससे मनुष्य का रिश्ता रखा? उसे एक पुरुष के बजाय ‘आदमी’ समझा... हाँ, शायद यहीं पर भूल कर दी मैंने. मर्द हर रूप में मर्द ही होता है, कायर, स्वार्थी, मौकापरस्त कामुक... मेरा दोस्त सही कहता है.
सिंग साहब नाम का वो आदमी दाना डाल रहा था, कबूतरी कभी ना कभी तो फंसती ही... फँस गयी तो ठीक, नहीं तो दबोच कर कभी एकांत, कभी अँधेरे में, उसके पर-पर नोंच-खंरोंच कर उसे तितर-बितर कर देंगे. वही मरदाना ताकत का दंभ, अंह, भ्रम...!
...मैं तो उस रात माँ के ही कहने पर उसकी रसोई में उसका गैस स्टोव जलाने में मदद करने गयी थी... मैंने तो सिर्फ उसको ‘अंकल’ कहा था... पर उस रात चाची वहाँ नहीं थी, गाँव से बच्चों को लेकर लौटी नहीं थी... ग्यारह अगस्त की उस रात को उस सिंह साहब ने नशे की चरम सीमा पर मुझे निरीह मेमने सा अपने फंदे में फँसने आते देखा और हलाल करने का सोचने लगा... लुंगी गाँठ कर कब उसने बाहर दरवाजे की सिटकिनी चढ़ाई, मुझे पता नहीं चला; कब उसने मुझे घेरने को अपना जिस्म आगे बढ़ाया, मैंने नहीं देखा...
और एकाएक मैं पंख फडफडाती कबूतरी सी फँस चुकी थी... और सिर्फ तीन-चार मिनट के अंतराल में मेरा कोमार्य खून के धब्बे बनकर उसकी फ़र्श पर बिखरा पड़ा था...
माँ घर में निश्चिन्त थी, उसे पता नहीं चला कि उनकी अठारह साल की बेटी के साथ अभी-अभी बलात्कार हो चुका है...माँ तो कभी इसके बारे में सोचना ही नहीं चाहती थी. तभी तो मेरे इतनी बार ईशारा करने, आनाकानी करने पर भी उसने मुझे बचाने की कोई कोशिश नहीं की कभी... इसलिए मेरे पाठकों, मैंने आज तक उन्हें बताया नहीं कि मेरा “रेप” हो चुका है...! मुझे पता नहीं क्यों, यकीन है कि वो जानकार भी कुछ खास उत्तेजित तक नहीं होगी...!
उस आदमी ने इसके बाद मुझसे कभी नजर नहीं मिलाई... आज तक नहीं... हाँ, उसने बतौर मेहरबानी, “आई-पिल” का पैकेट अखबार में लपेटकर गुड़िया के हाथों मुझे भेजा था, बहत्तर घंटों से पहले... मैंने वितृष्णा और गुस्से से उसे उसी समय डस्टबीन में फेंक दिया था. मेरे भरोसे की हत्या हो गयी थी, मैंने आदमियत कि लाश देख ली थी. मैं आपे से बाहर हो रही थी. अब कोई डर मेरे ऊपर असर नहीं कर रहा था...
...तो मेरे पाठकों मुझे जितना बकना था, बक चुकी. आपको जरुर लग रहा होगा कि मैं पक्का पागल हूँ. कोई टीन-एजर लड़की बलात्कार ‘शिकार’ होने के बाद भी इतना तटस्थ होकर कैसे ये सब बयान कर सकती है...इतना कैसे बक सकती है? हाँ, शायद मैं पागल हो गयी हूँ. उस ‘घटना’ ने मेरा दिमाग खराब कर दिया है. पर मुझे पता है कि मैंने जो कुछ भी अभी आपसे कहा है, पुरे होशोहवास में कहा है. मैं जानती हूँ कि जो माँ से नहीं कह सकी या सकती, वह आपसे कह दिया. है ना ये हैरत वाली बात ! क्योंकि कुंवारी लड़की कि सबसे पहली राजदार उसकी माँ ही होती है... खैर.
जो मेरे साथ हुआ, जो कर दिया गया, जो दर्द और अपमान उस चार-पांच मिनट में मैंने झेला, वो कैसे ‘शेयर’ करूँ? नहीं कर सकती ना, कोई नहीं कर सकता.
गलत ! मैंने किया अपने उसी दोस्त से. और देर तक उसका हाथ मेरी पीठ सहलाता रहा... मैं उसके सीने में छुपी रही. काश हमेशा छुपी रहती तो ये घाव नहीं खाती. उसने कहा, “ तुम बोलो क्योंकि, चुप रहने से कोई हल नहीं निकलता. कुछ लोगों को उनकी मौत से पहले शर्म की मौत मारना जरूरी होता है. लड़ना अनिवार्य है. तुम लड़ो, और बोलो क्योंकि तुम जिन्दा हो... हर जिन्दा शै बोलती है.”
अब फैसला आप पर छोडती हूँ... चाहे तो मेरे इस किस्से को पूरी तरह ख़ारिज कर दीजिए, चाहे तो स्त्री-विमर्श के किसी खाने में डाल दीजिए. मेरा मकसद बोलना था, वो मैं कर चुकी...
- शेखर मल्लिक
सदस्यता लें
संदेश (Atom)

.jpg)