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मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

औरत की भाषा


औरत के पास यों तो कई भाषाएँ होती हैं...
उसकी पहली और पुख्ता भाषा - प्रेम - है...
मगर जो अपने आप में लगभग
बेज़ुबान होती है...!
इतनी खामोश कि जिसे सिर्फ सुना नहीं जा सकता...!
औरत कहती नहीं कि
उसकी भाषा के बाहर
कहीं भी
कोई भी
उससे अलग रह सकता है ! मगर यह सच है...

वह आदमी जिसे वह अपना समझती है
अपनी भाषा से उसे पहले पहल बांधती है,
जो नहीं बंधता, वह उसका नहीं होता...
इसमें कुछ भी अनर्गल नहीं होता क्योंकि,
आदमी की आँखें जहाँ काम करती हैं, छिछला सा...
उसी जगह औरत, भाषा गढती है, उसे करीने से रखती और
आँखों की मानने के बजाय सबसे पहले एक अंदरूनी भाषा ईजाद करती है...
जिससे वह थाह सके सामने वाले को, बेध सके या
बाँध सके उसे, जिसके सम्मोहन से वह खुद बंधना चाहती है...
औरत यह जादू जानती है...
इस जादू को जीवन भर मांजती है...
इस तरह वह पुरुष से अलग हो जाती है...

प्रेम को परखने का गुर उसके पास होता है,
जो उसके सामने भाषा की परखनली से छन कर आता है...

औरत अपनी भाषा का इस्तेमाल
बहुत सध कर करती है !
जबकि वह भी कभी-कभी सिर्फ औरत होती है, खालिस औरत तो,
अपनी भाषा के पैंतरों से खुद को सुरक्षित भी करती है...
और गैर-औरतों का भ्रम भी तोडती है...
भाषा उसकी ताकत है, जिसमें वह शत्रु का ध्वंस,
और अपने प्रिय को दुलार, एक ही प्रतिबद्धता से कर सकती है !.

'प्रेम' जैसी भाषा की सारी शब्दावली
और व्याकरण --
पूछना औरत से,
और हो सके तो सीखना
कि कैसे हो जाती है,
भाषा उसके पास
एक कला, एक कवच और एक कटार !

सोमवार, 3 अक्टूबर 2011

भरोसा और हंसी, जिंदगी



भरोसा और हंसी, जिंदगी

मुझे लगता है
(और ऐसा उन बहुतों को लग सकता है, लगता होगा) कि,
आदमी को तोड़ देने के लिए
सिर्फ उसका भरोसा तोडना काफी है...
भरोसा, जो उसकी हड्डियों में फास्फोरस की तरह शामिल होता है...
और इसी के दम पर उसकी रीढ़ लम्बवत खड़ी रहती है...
और उसके सांसों का चाप बना रहता है...!

वहीँ, एकदम वहीँ...
वे चोट करते हैं, और इसका समय कोई नियत नहीं होता !
कि बारहाबार एक ही जगह चोट करते रहना
वे कितनी शातिरता से सीख हुए लोग होते हैं और
आदमी की हर उम्मीद
को खारिज करने का लंबा षड्यंत्र
कामयाबी से चला कर
उसकी हंसी को नेस्तनाबूद कर डालते हैं...
यह उनके स्वार्थ का नया नाजीवाद है.

असल में, आदमी की असली मृत्यु उसी समय हो जाती है !

मैंने देखा है, कई दफे कि
आदमी तो हंसना और जीना चाहता है,
यह बस नैसर्गिक है,
मगर वह बस एक ही जगह खत्म हो जाता है,
जब एकाएक उसे पता चलता है कि
इसके बाद उसके लिए कुछ बचा नहीं...
न उसकी कोशिशे, न उन कोशिशों की कीमत
न उसके हँसने की वज़हें, न ही हँसने के मौके !
(और अब शौक से हँसने वाले मध्यवर्ग में पाए भी नहीं जाते !
मजबूरी में हंसें सो अलग बात ...)

सीधी सी बात है, जब आदमी हँसता नहीं, वह मृत्यु के कुछ और पास हो जाता है...

जीने के लिए संतोष वह मसाला है, जो बेहतर कल और कामयाबी
की उम्मीद के भरोसे की आंच पर पकता है... और,
जो जिंदगी के मकान की दीवारों में दाखिल गारे में शामिल होता है

संतुष्ट आदमी ही हंस सकता है, क्या इससे आप इंकार कर देंगे ?

तो...
जीने के लिए हमें उन हाथों और इरादों को तोडना होगा जो
हमारा भरोसा तोड़ने के लिए बढ़े हुए हैं, प्रशिक्षित हैं,
और इसके लिए वेतनभोगी भी हैं !
उनके तिलिस्म और चोट को अपने नकार के दायरे में लाकर
अपने भरोसे की ज़मीं पर अपनी हंसी बजाफ्ता उगानी होगी...

बुधवार, 28 सितंबर 2011

जनप्रतिबद्ध भावनाओं की विचारशील कविताएँ इंदौर। प्रगतिशील लेखक संघ व जनवादी लेखक संघ की इंदौर इकायों ने 25 सितंबर 2011 रविवार को देवी अहिल्या केन्द्रीय लायब्ररी के अध्ययन कक्ष में कवि श्री अनंत श्रोत्रिय के रचना पाठ का आयोजन किया। श्री अनंत श्रोत्रिय ट्रेड युनियन व कर्मचारी संगठनों से जुड़े रहे हैं। वे प्रगतिशील विचाराधारा के प्रतिबद्ध कवि हैं और फिलहाल प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई के अध्यक्ष हैं। हाल ही में साहित्यक पत्रिका राग भोपाली ने अनंत श्रोत्रिय के रचनाकर्म पर एकाग्र एक अंक निकाला है। श्री श्रोत्रिय ने "पूरब का सूरज" कविता सुनाकर कार्यक्रम की शुरुआत की। उठेंगे कदम, जूझेंगे हम साथ जूझता होगा जनजन हाथ उठा मुट्ठी तानी ताल मिली गरजा जनजन उन्नीस सौ बयालीस, आर.एन.आय. का रिवोल्ट उद्वेलित करते, गरजा जनजन हुंकार भरता नभ, बना प्रेरणा बढाओ कदम पूरब में सूरज बिखेरे लाली उड़ावे गुलाल यही तो सपना दिन विहँसा किरणें विकीर्ण जनजन में जागी खुशियां. उनके बाद प्रदीप मिश्र, विनीत तिवारी और प्रांजल श्रोत्रिय ने श्री अनंत श्रोत्रिय की चुनी हुई कविताओं का पाठ किया। पोस्टर, यह रास्ते, सर्वोदय, प्रामाणिक ज्ञान आदि कविताओं को काफी सराहना मिली। वरिष्ठ कथाकार श्री सनत कुमार ने श्री श्रोत्रिय के मालवी लेखन और गद्य लेखन पर अपना वक्तव्य केन्द्रित करते हुए कहा कि १९५० के दशक के शुरुआती वर्षों में श्री अनंत श्रोत्रिय का एक आलेख महाकवि निराला पर आया था और उसने मालवा के पाठकों को निराला से परिचित करवाया था. वह बहुत अच्छा आलेख था जिसमें साहित्य के वैज्ञानिक आधारों पर निराला की कविता का विवेचन किया गया था. उन्होंने ये भी कहा कि श्री श्रोत्रिय की कविता अवधारणात्मक वृत्ति की प्रकृतिमूलक कविता है. द्वंद्वात्मक भौतिकवाद जैसी जटिल अवधारणा को भी उनहोंने कविता में पिरोया है। हमारा अस्तित्व भी एक प्रश्न चिन्ह फिर क्यों कर यह सब वाद-विवाद, जब सब कुछ है असत्य, अस्तित्वहीन तो यह माथापच्ची क्यों कर? उन्होंने मालवी जीवन के सुख-दु:ख, आशा-निराशा को बिना लाउड हुए अभिव्यक्त किया है। उन्होंने मालवा के जनकवियों के मूल्यांकन का महत्त्वपूर्ण काम किया है। उनके साथ मालवा के प्रगतिशील कवियों की एक पूरी परंपरा है जिनमें मान सिंह राही, रंजन, प्राण गुप्त और मजनू इंदौरी के नाम प्रमुख हैं. उनकी विरासत का सही मूल्यांकन होना अभी बाकी है। यह यात्रा मालवा में 60 वर्ष से विकसित हो रही है। श्रोत्रियजी की कविताओं में प्रकृति के रम्य चित्र हैं। पानड़ा झर-झर झरी रिया आंगवात लाग्या मोर बागों फूल में की उठाया हिरदा में उठे हिलोर लीली लीली चादर तणी खेत में इतराती अरे (अलसी) अई-वई डोले उन्होंने कहा कि श्रोत्रियजी की कुछ कविताएं तो केदारनाथ अग्रवाल की याद दिलाती हैं। इस अवसर पर कवि ब्रजेश कानूनगो ने कहा कि श्रोत्रियजी की कविताओं में कला, शिल्प, और बौद्धिकता का इतना आग्रह नहीं है, जितना कि अभिव्यक्ति और सम्प्रेशनीयता का। वे अपनी कविताओं के जरिए एक प्रतिबद्ध कवि नज़र आते हैं। उनकी कविताएं रातनैतिक कविताएं हैं। कवि में वामपंथी एक्टिविस्ट साफ़ साफ़ दिखाई देता है। मनुष्यता व मनुष्य के पक्ष में अनंत जी की आकांक्षाएं अनंत हैं। वे 82 की उम्र में भी वामपंथी मूल्यों के प्रति सतत संघर्षरत हैं। उनका सकारात्मक कवि इस सफर को जारी रखना चाहता है। वे कहते हैं - सफर लंबा है मंजिल समीप नहीं इंसान ने फिर भी कितना तय कर लिया रास्ता लेखक, कवि एवं एक्टिविस्ट विनीत तिवारी ने कहा कि श्रोत्रिय जी की कवितायें उस दौर कि कवितायें हैं जब साधारण से साधारण कविता भी एक वैश्विक चेतना तक पहुँचने लगी थी. उस दौर में कपड़ा मिलों में काम करने वाले कवि भी सिर्फ अपनी तकलीफों या संघर्षों या घर परिवार के बारे में ही नहीं लिख रहे थे बल्कि वे एशिया के संघर्षरत अन्य देशों के बारे में या अंगोला या रूस, चीन की जनता के के बारे में भी लिख रहे थे और एक तरह का अंतरराष्ट्रीयतावाद उनमें विकसित हो रहा था. आज प्रतिष्ठित हो चुके कवियों के भीतर भी यह चेतना या तो नदारद है या बहुत कम मौजूद है. यह ज़रूर देखना चाहिए कि श्रोत्रियजी की कविताओं में शिल्प के प्रति असजगता है क्योंकि उन्होंने कवि कर्म को भी एक एक्टिविस्ट की ही तरह किया है. बहुत सारे दोहराव भी इन कविताओं में हैं लेकिन अपने समाज, राजनीति की जनपक्षधर समझ और वामपंथी सोच को इसमें साफ़ पारदर्शी तरह से देखा जा सकता है. उनकी कविता "पोस्टर" आम जन के भीतर विकसित होने वाली राजनीतिक समझ की प्रक्रिया की बानगी है- दीवार पर चिपका पोस्टर लाल नीले रंगों में छपा इसके अक्षर समेटे हैं बीज क्रांति के, संघर्ष के कार्यक्रम में कवि राजकुमार कुंभज ने श्रोत्रियजी की कविताओं और उनके जीवन को जनान्दोलनों का अभिन्न हिस्सा बताया और कहा कि श्रोत्रियजी की कविताओं में मुक्तिबोध के बिंब व प्रतीक याद आते हैं जो मनुष्य जीवन की जटिलताओं को व्यक्त करते हैं। उनके कवि कर्म में सारी चीजें जनसंघर्ष से निकल कर आई हैं। वे जुलूस को देखते हुए दर्शक नहीं बल्कि जूझते हुए संघर्षरत योद्धा की तरह नज़र आते हैं। इस घनीभूत पीड़ा में भाषा उनकी कविता के पीछे पीछे आ रही है। उनके तमाम प्रतीक कलावाद के निषेध में आते हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता इंदौर इप्टा के अध्यक्ष विजय दलाल ने की। इस अवसर पर चुन्नीलाल वाधवानी, विक्रम कुमार, अजय लागू , सुलभा लागू , विश्वनाथ कदम, केसरी सिंह चिढार , सारिका श्रीवास्तव आदि मौजूद थे। संचालन किया प्रलेस इंदौर के श्री एस. के. दुबे ने। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ इकाई-इंदौर

सोमवार, 21 मार्च 2011

मेरे सरोकार


सरोकार जो मेरे हैं,
तुम्हारे आदर्शों के खोखलेपन
और हिंसा के सभी तरीकों
के सीधे-सीधे खिलाफ़ हैं !

सारे झूठ और
गढ़ी हुई मर्यादाएं तुम्हारी पैदाईश हैं
लेकिन मेरी आस्था
सिर्फ धूप की पहली किरण
बारिश की पहली बौछार
और ठण्ड की पहली सिहरन में है
इसलिए खालिस हैं... प्रकृत हैं...

तुम मुझे
कमजोर, प्रकृतिवादी,
गल्पवादी, सिरफिरा, नपुंसक घोषित कर
हाशिए से बाहर फेंक सकते हो,
संतुष्ट हो सकते हो
अपनी जीत के भ्रम का
उत्सव मना सकते हो
या इस तरह एक
गोलबंदी में अपने किये पर वाह-वाही
लूट सकते हो...

लेकिन,
मैं जब कहता हूँ --
रौंदे जाने से पहले
घास में जीवन था
मैं मानता हूँ की
तुम समूचा रौंद कर भी
घास को
उगने से
रोक नहीं सकते--
तुम तिलमिला उठते हो...
तुम्हारे संस्कार में सच
को बर्दाश्त करना
कोई चीज ही नहीं है !
या उसे नकारना ही अपनी
बुजदिली को ढांपकर
बहादुर बन जाने की
एक युक्ति है !

तुम समझो कि
मुझे तकलीफ में डालना
तुम्हारे शातिर दिमाग की
सबसे बड़ी जीत हैं, मगर
तुम समझ नहीं सकते कि
तकलीफ में होना ही
असल में
चीजों को बदलने की
ज़मीन तैयार करता है !

मेरे सरोकार
तुमसे मिले चोटों
का हिसाब दर्ज करते हुए
उसके पाई-पाई
चुकता करने के हैं
यह तुम
जानते नहीं हो अभी
यही तुम्हारी ताकत की
सबसे बचकानी भूल है !

मंगलवार, 8 मार्च 2011

अपनी जमीन तलाशती बेचैन स्त्री - निर्मला पुतुल


यह कैसी विडम्बना है
कि हम सहज अभ्यस्त हैं
एक मानक पुरुष दृष्टि से देखने को
स्वयं की दुनिया
मैं स्वयं को स्वंय की दृष्टि से देखते
मुक्त होना चाहती हूँ अपणी जाति से
क्या है मात्र एक स्वप्न के
स्त्री के लिए --- घर, संतान और प्रेम ?
क्या है ?
एक स्त्री यथार्थ में
जितना अधिक घिरती जाती है इससे
उतना भी अमूर्त होता चला जाता है
सपने में वह सब कुछ
अपनी कल्पना में हर रोज
एक ही समय में स्वंय को
हर बेचैन स्त्री तलाशती है
घर, प्रेम और जाति से अलग
अपनी ऐसी जमीन
जो सिर्फ़ उसकी अपनी हो.
एक उन्मुक्त आकाश
जो शब्द से परे हो
एक हाथ
जो हाथ नहीं
उसके होने का आभास हो !

महिला दिवस ८ मार्च, २०११  पर दैनिक जागरण में प्रकाशित

सोमवार, 7 मार्च 2011

घिन तो नहीं आती है ? - नागार्जुन


पूरी स्पीड में है ट्राम
खाती है दचके पै दचके
सटता है बदन से बदन
पसीने से लथपथ ।
छूती है निगाहों को
कत्थई दांतों की मोटी मुस्कान
बेतरतीब मूँछों की थिरकन
सच सच बतलाओ
घिन तो नहीं आती है ?
जी तो नहीं कढता है ?

कुली मज़दूर हैं
बोझा ढोते हैं , खींचते हैं ठेला
धूल धुआँ भाप से पड़ता है साबका
थके मांदे जहाँ तहाँ हो जाते हैं ढेर
सपने में भी सुनते हैं धरती की धड़कन
आकर ट्राम के अन्दर पिछले डब्बे मैं
बैठ गए हैं इधर उधर तुमसे सट कर
आपस मैं उनकी बतकही
सच सच बतलाओ
जी तो नहीं कढ़ता है ?
घिन तो नहीं आती है ?

दूध-सा धुला सादा लिबास है तुम्हारा
निकले हो शायद चौरंगी की हवा खाने
बैठना है पंखे के नीचे , अगले डिब्बे मैं
ये तो बस इसी तरह
लगाएंगे ठहाके, सुरती फाँकेंगे
भरे मुँह बातें करेंगे अपने देस कोस की
सच सच बतलाओ
अखरती तो नहीं इनकी सोहबत ?
जी तो नहीं कुढता है ?
घिन तो नहीं आती है ?

बुधवार, 2 मार्च 2011

सवाल


हमेशा ऐसा ही होता है, कि
मासूम किलकारियों को पर लगने से पहले,
फुर्र से उड़ जाने से पहले
धारदार हथियारों से उनके पँख
चाक कर दिये जाते हैं,
कई बार, सिर्फ़ हत्याएँ करना उनका शिगूफा हो जाता है
वे हमारे इतिहास, हमारी स्मृतियों, अनुभव, चेतना और
अनुभूति और फैसले करने की जैविक क्षमता
की हत्या करने को पागल हो जाते हैं...
ऐसा होता है कि
अक्सर जब नज़र सामने की तरफ होती है
पीछे से वार होता है...
वे वही होते हैं, वही, जिन्हें हमने भाई कहा था
एक ही आसमान के नीचे !
अरसे तक एक थाली में बाँटकर
भात खाया था जिनके साथ...
जिनकी बहती हुई नाक पोंछी थी,
जिन्हें गिनतियाँ और पहाड़े सिखाए थे...
जिनको बोलना सिखाया था...वे अचानक...
जीभ काटने वाले हाथों में तब्दील हो जाते हैं
ताकि हम आज़ादी का स्वाद ना चख सकें !
सवाल यह नहीं कि ऐसा क्यों होता है...
सवाल तो यह है कि
क्या हम ऐसा होने को
खारिज नहीं कर सकते ?

जंग खत्म नहीं होता है साथी !


हमेशा होना तो यही होता है
ऐसा ही होता है
कि सभ्यता के दूसरे छोर पर जहाँ
एक सुदीर्घ सन्नाटे
की गवाही में तेरे-मेरे कांपते-लरजते
होंठों की धीमी सरगोशियों का ख़्वाब-गुलाब
खिलने को होता है कि
बारहा दीवारों से फोड कर निकल आती हैं
उनकी दुनियावी कड़ी हथेलियाँ
जिससे मसलकर उन गुलाबों को
घोंट दिया जाता है...

नृशंस परछाइयों का एक सर्वकालिक समूह
हमें बागी घोषित करता है और खुद को
अपनी लकीर का सबसे बड़ा सरंक्षक !
घेरेबंदी के बीच
मुस्कुराकर, सर उठाकर, सीना ताने
वध होती हुई हमारी आत्माएँ
पुकार सकती हैं सिर्फ़
एक आखरी बार
एक-दूसरे का नाम...
फिर हमारी सांसों को थामें रखने वाली तख्ती
पैरों के तले से खिसका दी जाती हैं...
एक कुएँ में झूलते हुए हम दम तोड़ते हैं, आहिस्ता-अहिस्ता...

और तस्वीर के दूसरे पहलू में,
हमारे सपने, हमारी ताकत, हमारा विरोध
बचा रहता है, सूरज की रौशनी में, चाँदनी में,
हवा में, पानी में... पत्थर में, दूब में...!
  
उफ़, कि यही एक तथ्य है जो
है वहीँ जहाँ, तब भी था, जब से
एक आदमी और एक औरत
एक दूसरे का हाथ ईमानदारी से पकड़ कर आगे आये !
उनके साझे क़दमों की हुलस से जमीन पर
फूल खिल आये...
वे शामिल हुए एक-दूसरे की देह-ओ-रूह में,
और पूरी दुनिया का एक बड़ा हिस्सा उनके दायरे से
बाहर हो गया !
तब उनके हथियारों की नोंक और तेज की जाने लगी
मुट्ठियों में पत्थर आ गये...

मगर विश्वास करो साथी
यह यूँ ही तुम्हें दर्द में बहलाने के लिए
नहीं कह रहा... कि
यह सब जो होता है, उसके बरक्स यह भी होता है कि,
हर बार उनकी साजिशें नाकाम की हैं हमने
हर बार घूरे पर गुलाब खिलाया है
यह यूँ ही नहीं हुआ कि लाल रंग-
उस गुलाब का-
ऐसा गहरा हुआ है !
जिसके मायने कई है !
हर बार मृत्यु को हताश किया है हमने
हर बार हम पलटे हैं,
आखिरी बार चूक जाने से ऐन पहले !
हर बार उन्होंने हद बनाये हैं, और हमने हद तोड़े हैं !

यह सच है कि जिंदगी की बुनियाद
जंग और मुहब्बत के गारे में सान कर रखी जाती है
यह तो होता है कि जंग में हम झोंक दिए जाते हैं
पर यह भी उस कदर सच है कि
जब तक खून का ईमान बाकि है
जंग खत्म नहीं होता है साथी !

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

याद आया...


फिर किसी किताब में...
या कि अतीत के फांकों में
ढूँढूँगा अपना मिज़ाज-ऐ-आराम
फिर सांझ की पहली लालटेन
पश्चिमांत की खूँटी से
उतर कर ओसारे के एक खंभे
पर टिक गई है
कुछ देर जब हर पत्ता सोने लगेगा
फूल अपनी बोझिल गर्दन झुका लेंगे
मैं सोचूंगा
तुम इस वक्त भी मेरे साथ
क्यों नहीं हो ?
जब शामें ढला करती हैं
तब, तेरे नुपूर की झंझन
क्यों नहीं सुनाई देती...
जब झींगुर बोलते हैं और
रात क्वाँरी दुल्हन बन जाती है
अंतर्मन में एक हूक उठती है कि
दौड़ जाऊं पास तुम्हारे
दिलाऊँ याद कि जब हम साथ हँसते थे
मिलते थे और जीते थे...
तुम्हारे बहके हुए आँचर का कोना थाम लूँ
और मेरा पूरा दिन रजनीगन्धा सा
रात बेला सी
महकती रहे !
ऐसे ही तो, हम साथ थे कभी
अभी एक पुरानी डायरी में
तुम्हारे पंजों की सिन्दूरी छाप देखी
तो याद आया...

वसंत की इस दोपहर


ओ मितवा...
लो फिर देने लगा है समय
चिहुंक कर हांक...
आने लगा है वसंत हौले क़दमों से
सूखे पत्तों की खडखडाहट से
खुसफुसाते फूलों पर भौरों की लड़खड़ाहट से...

एक नीम उदासी सी तारी
होती हुई इस गर्माती अलसाती दोपहर में
जब मितवा तेरे छूए हुए
उस वसंत की याद आ रही है !
बीता था सारा वह मधुमास
तुम्हारे ही गोद में सिर लुकाये
और हँसती रहती थी तुम, उन सांसों की
हल्की भाप मेरे गालों पर, ललाट पर
भौंहों पर लगाती रहती थी अंजन...
ओ मितवा, बोलो ना क्यों हुआ
वह वसंत जो गया, बस गया...
उस वसंत के बाद सारे मौसम खो गये !

अब लो यह वसंत तो बौराया हुआ
फिर आ धमका है...
तेरे नुपूर बंधे पैरों की
धमक कहाँ रह गई ?
उस बादामी रंग की चमक कहाँ रह गई ?
रेत उडती है आँगन पर, पूछती है पलट कर
तेरे पैरों के छाप कब फिर आयेंगे उकर ?

मितवा, मुझे भूले तो नहीं होगे ना तुम ?
जब भी आओगे, एक वसंत साथ लिए
आना कि सोचूँगा, मैंने पा लिये
हमारे सारे वसंत...
जो रह गये हैं अनछुए
तेरे-मेरे मीठी-मीठी बतकहियों से
मन के मधुर नाच से
डूबकर जिए जीवन के पलों की पाँत से

मितवा, राह देख रहा हूँ तेरी कि
एक दस्तक हो सन्नाटे में अचानक
बाहर निकलूँ और
तुम खड़े मिलो नम चेहरा लिए,
मुस्काते और आँसू ढुलाते, एक साथ...!  

(वसंत पंचमी - २०११)

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

शब्दों के जाले


इस रात... 
बड़े श्रम से
आहत मन की सारी प्रतिबद्धताओं
के दम पर
शब्दों के जाले बुनने फिर बैठा हूँ...

या कि इनका कोई अर्थ
कलेजे में चीरा लगाकर...
सीने के ऐन बीचों-बीच...
कुछ फोड कर बाहर निकल आया है,
जिसे शब्दों की शक्ल में 
अपने ही माँस और रक्त से छाँट कर
पेश कर रहा हूँ...!

इन शब्दों की धार से खेलते हुए
कई बार मेरी उँगलियों की जगह 
गर्दन कटी है...
और इनके तात्पर्य ढूंढते हुए
सारे आदिम जंगल छान मारे हैं !
तब एक जगह पाया...
अपनी असलियत ढेले की तरह पड़ी थी, 
...उठाई है !

फिर भी मैं कोई पागल हूँ कि 
सुकरात का ज़हर खुद भी चखना चाहता हूँ...
सफदर की तरह आखरी दम पे  
अपनी ईमान पर निसार होना चाहता हूँ...
पाश की तरह "घास" बन जाना चाहता हूँ और,
बागियों में भगत या बिरसा होना चाहता हूँ... 

शब्दों की आंच पर तमाम कच्चे अर्थों के 
उपले-कंडे सेंकते हुए...
मैं देख रहा हूँ कि 
बाज़ार मेरी नाक तोड़ रहा है
सत्ता मुझे झाड़-जंगलों में शिकारी कुत्ते की तरह
खोज-खोज कर,
गोली मार रही है...
मेरी जमीन का पानी वे लोग 
अपनी शीतल-पेय पैदा करने वाली फैक्ट्री में खपा रहे हैं
मेरी मिट्टी पर...
मेरे घर की औरतों के बदन पर की तरह 
उनके पंजों और खुरों के बजाफ्ता निशान हैं...!
मेरे नाम पर बनी सारी योजनाओं को
मेरे बहुत सारे अवैध विधाता चर रहे हैं...

उफ्फ़, बहुत हो चुका ! कहते हुए,
उठकर बाहर भागा हूँ 
एकाएक,
कमरे में असंख्य 
चीत्कार-चीखें
एक मातमी धुन की तरह फ़ैल गई थीं...

इस समय जो मृत्युबोध
सन्नाटे का फायदा उठाकर
मेरे-तुम्हारे जीवन में
चोरी से पैवस्त हो गया है,
उसे दबोच लेना है, 
कि वह एक गलत बात है...

तो इस समय...
इतना मौन क्यों है मेरा संसार ?
पूछने का यह समय, 
बिल्कुल ठीक समय है !

एक सहज किलकारी की तरह 
पूर्व में सूर्योदय कल होगा ही,
यही सोचकर बैठने से अच्छा है, हम पूरब की दिशा में 
इस रात से ही चलना शुरू कर दें...

शब्दों के जाले,
इस वक्त के चेहरे पर लिपटे
फ़रेब के जाले काट देंगे... 
हाँ, शब्दों को सान पर चढ़ा रहा हूँ,
कमान पर चढ़ा रहा हूँ...

शनिवार, 15 जनवरी 2011

वह अठारह-उन्नीस की युवती माँ ! - (डायरी जैसी कविता)

बहुधा ऐसा होता रहा था कि
एकदम वही या उस जैसा ही कोई दृश्य
अक्सर कई अलग अलग तरह से, अलग अलग कोणों से...
अलग-अलग जगहों पर, अपने जेहन के कैनवास पर उतरता
और फिर आदतन या लापरवाही से कुछ ही मिनटों या
उसके एकाध दिन बाद
खुद-ब-खुद पोंछ डाला जाता था...
ऐसा होना इसलिए था, कि हम सबकी मशरूफियत
दुसरे किसी से ज्यादा, सिर्फ़ अपने लिए थी...
हम सभ्य होकर भी नकारे और बेहया थे...!

तो वही दृश्य एक बार फिर उस दोपहर
सामने था... वह अठारह-उन्नीस की युवती माँ !
गरीबी रेखा से नीचे बसर करती होगी वह...
और होगी अंदर से बेहद ताकतवर, पर चुप थी...
कुछ बोलती भी, तो क्यों और किसे !

छाती से चिपकाये हुए थी अपने नवजात से कुछ बड़े, शायद...
दो-तीन माह के शिशु को... जो लगा, शायद बच्ची रही होगी...

ट्रेन के चल पड़ने तक गेट के पास किसी तरह सहारा लिए खड़ा मैं
उसे ही देख रहा था, कि उसने एक नज़र में ही मेरा ध्यान खींच लिया था
और मैं अपने बुद्धिजीवी होने की गैरत के साथ, उसके बारे में
यह सब सोचना शुरू कर चुका था, जो अभी आपके सामने है !...

ठीक उसके पास खड़ा मैं... और वह गेट के पास निश्चिन्त बैठी हुई !

गोद का बच्चा जोर से रोया, तब वह बिल्कुल अकुंठ भाव से,
एकदम निर्द्वंद... बेपरवाह उस भीड़ और शोरगुल के बीच,
जिसके दायरे में वह बैठी थी... अपना स्तन
उस अबोध के मुँह में
ठूँस दी !
(बिना इस बात कि परवाह किये कि उसका अर्ध-विकसित
या कुपोषित स्तन सर्व-समक्ष हो रहा है!)

उसका वह बच्चा जितनी बार रोता,
वह अमूमन यही दोहराती !
बीच-बीच में उसे पुचकारती, चूमती...
और फिर, इधर-उधर की रेलमपेल देखने लगती...
वह मानों खुद उस दृश्य का हिस्सा नहीं थी...!

जब किसी स्टेशन पर ट्रेन रूकती
लोग उसे लगभग कुचलते हुए ही चढ़े आते ! कोई बोलता,
गेट के पास बैठी हो तो बर्दाश्त करना पड़ेगा...!
हाशिए के बाहर हो गए आदमी को भी
"बर्दाश्त" करना पड़ता है !... उसकी जगह कहीं नहीं होती...!

फिर मैं सोचता हूँ, वह क्या कुछ नहीं बर्दाश्त कर चुकी...
और करती होगी !
मेरा यह सब सोचना बहरहाल, सोचना ही है, इसके अलावा कुछ नहीं !

मामूली फटी और पुरानी सी साड़ी में सकुचाया-सिकुड़ा शरीर उसका,
एक बोसीदा सी गंध छोड़ता...
और रूखे-धूसरित बाल,
नाक के पास दाहिनी तरफ, थोड़ा माध्यम आकर का कला मस्सा,
निर्दोष लगती आँखें...
कुल जमा यही हुलिया बनता था उसका... इसमें नया या अलग कुछ नहीं था...

(हमारी आँखें क्या इसके लिए अभ्यस्त नहीं हो चुकी हैं !
और चूक गई है हमारी संवेदनाएं... क्योंकि हमारी हदें हमारी चौहद्दी हैं !
जिसके बाहर हम झांकते नहीं, और झाँक गए तो कुढते रहते हैं...)

और उसका शिशु एकाएक चुप होकर, भौंचक्का... इस दुनिया को ताकता...

किसी ने बिस्कुट के दो टुकड़े उसकी ओर बढ़ाये, वह मुस्कुराकर ले ली...
मैंने सोचा, होगा उसका ही संबंधी, मगर ऐसा नहीं था ! तो, क्या
उस आदमी की यह सहानुभूति सिर्फ़ बेदाग सहानुभूति थी, या...?
(होगी भी यदि स्वच्छ भावना, हमारे मध्यवर्गीय मानस पर तो उसके पीछे भी
प्रश्नवाचक ही लगाती है !)

ठीक इसी समय, जब कोई स्टेशन आने वाला था...
अठारह-उन्नीस साल की, उसी की लगभग हमउम्र...
दो-तीन लड़कियाँ गेट के पास आ खड़ी हुईं, उन्हें उतरना था

वह भी उठी, उतरना उसे भी यहीं था...

वह लड़कियाँ बतियातीं, मुस्कुरातीं,
कॉलेज जाने वाली या सम्भवत: किसी प्रशिक्षण केंद्र से लौटतीं
आधुनिक... और सभ्य समाज में संभ्रांत कही जाने वालीं
उस की तरफ बिल्कुल ध्यान नहीं दे रहीं थीं, जो बिल्कुल उन्हीं की तरह है !
समलिंगी, उतनी ही कद-काठी, वही उम्र...

और वह प्राय: उन लड़कियों के
ठीक पास खड़ी, मानो उन्हीं में से एक हो,
उनका चेहरा तकती और गोद में सिमटे शिशु को. जिसे...
एक कपडे से कसकर अच्छी तरह अपनी छाती से बांध लिया था,
पुचकार कर चूम रही थी... क्या वह कुछ जता रही थी उन्हें ?
पता नहीं, ये कैसे तय होता होगा, कि दृश्यों का शाब्दिक अर्थ कौन
लगा सकता होगा, ठीक-ठीक !

एक ही उम्र के दो चेहरे...दो नियतियाँ...दो अलग जिंदगियाँ...
और बीच में मौन ! और ट्रेन की धडधडाहट...

कौन किधर जाने वाला था... यह मैं कुछ देर सोचता रहा, फिर भूल गया...
जबकि वे सब और वह उसी स्टेशन पर उतर गयीं...

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

शमशेर बहादुर सिंह की रचनाएँ - ३ (चुका भी हूँ मैं नहीं !)



चुका भी हूँ मैं नहीं !
कहाँ किया मैंने प्रेम
अभी !
जब करूँगा प्रेम
पिघल उठेंगे
युगों के भूधर
उफान उठेंगे
सात सागर !
किन्तु मैं हूँ मौन आज
कहाँ सजे मैंने साज
अभी !
सरल से भी गूढ़-गूढ़तर
तत्व निकलेंगे
अमित विषमय
जब मथेगा प्रेम सागर
ह्रदय !
निकटतम सबकी
अपर शोर्यों की
तुमतब बनोगी एक
गहन मायामय
प्राप्त सुख
तुम बनोगी जब
प्राप्य जय !
(रचनाकाल - 1941)

बुधवार, 12 जनवरी 2011

शमशेर की रचनाएँ... - २

दिल, मेरी कायनात अकेली है - और मैं !
बस अब खुदा की जात अकेली है, और मैं !

तुम झूठ और सपने का रंगीन फर्क थे :
तुम क्या, ये एक बात अकेली है, और मैं !

सब पार उतर गए हैं, अकेला किनारा है :
लहरें अकेली रात अकेली है, और मैं !

तुम हो भी, और नहीं भी हो -- इतने हसीं ह:
यह कितनी प्यारी रात अकेली है, और मैं !

मेरी तमाम रात का सर्माया एक शमअ
खामोश, बेसबात, अकेली है, और मैं !

'शमशेर' किस को ढूँढ रहे हो हयात में
बेजान-सी इयात अकेली है, और मैं !

("आजकल" पत्रिका के जनवरी २०११ अंक के तीसरे आवरण पर)

शमशेर की रचनाएँ... - १

मेरे मन के राग नए नए,
तुझे गीत में जो बुला गए,
वो न जाने किसके गले लगे
वो न जाने किसको सुहा गए !

मुझे कितना कितना दुख गई,
मेरे दिल को छलनी बना गई -
वही टीस सी, वही आह सी
जिसे हम जरा सा दबा गए !

हमें 'शम्स' पर बड़ा नाज़ था,
उन्हें हम समझते थे पारसा,
मगर आखिर-आखिरे-इम्तहां
वही अपना रंग दिखा गए !

बुधवार, 5 जनवरी 2011

कवि १९७०

इस वक्त जबकि कान नहीं सुनते हैं कवितायें
कविता पेट से सुनी जा रही है आदमी
गज़ल नहीं गा रहा है गज़ल
आदमी को गा रही है

इस वक्त जबकि कविता माँगती है
समूचा आदमी अपनी खुराक के लिए
उसके मुँह से खून की बू
आ रही है

.........................

कविता में जाने से पहले
मैं आपसे ही पूछता हूँ
जब इससे न चोली बन सकती है
न चगा;
तब आपै कहो ---
इस ससुरी कविता को
जंगल से जनता तक
ढोने से क्या होगा ?

.........................

सुविधा की तहजीब से बाहर
जहाँ चौधरी अपना चमरौधा
उतार गये हैं
कविता में
वहीँ कहीं नफरत का
एक डरा हुआ बिन्दु है
आप उसे छुओ;
वह कुनमुनायेगा
आप उसे कोंचो
वह उठ खड़ा होगा

...............................

पत्नी का उदास और पीला चेहरा
मुझे आदत-सा आंकता है

उसकी फटी हुई साड़ी से झाँकती हुई पीठ पर
खिड़की से बाहर खड़े पेड़ की
वहशत चमक रही है

मैं झेंपता हूँ
और धूमिल होने से बचने लगता हूँ
--------------
आप मुस्कुराते हो ?

'बढ़िया उपमा है'
'अच्छा प्रतीक है'
'हें हें हें ! हें हें हें !!'
'लीक है - लीक है'

और मैं समझता हूँ कि आपके मुँह में
जितनी तारीफ है
उससे अधिक पीक है

फिर भी मैं अंत तक
आपको सहूँगा
------------------
लेकिन जब हारूँगा
आपके खिलाफ़ खुद अपने को तोडूंगा
भाषा को हीकते हुए अपने भीतर
थूकते हुए सारी घृणा के साथ

अंत में कहूँगा ---
सिर्फ़, इतना कहूँगा ---
'हाँ, हाँ, मैं कवि हूँ;
कवि -- याने भाषा में
भदेस हूँ;

इस कदर कायर हूँ
कि उत्तरप्रदेश हूँ !'

"संसद से सड़क तक " कविता संग्रह से

रविवार, 19 दिसंबर 2010

और वह प्रकट में कहीं नहीं होती !

पूरा ब्यौरा इस तरह है...

समूचे आकाश पर
चमकीले सफ़ेद बादल
फैले थे... क्षितिज के ओर-छोर
साँसें तेज-तेज चल रही थीं और
दिन रोजाना की तरह पल-दर-पल
बीतता जा रहा था...
बहुत सारे घटितों को इतिहास में दर्ज़ करता हुआ

कोई संवाद
लगातार अपने ही अंतस की सुंरगों में
गूंजता जा रहा था... जिसका अर्थबोध
इसलिए नहीं हो पा रहा था
कि अभी इसकी भाषा नए सिरे से चिन्हित की जानी बाकि थी...
क्योंकि सारे शब्दकोशों से आम आदमी की
शब्दावलियाँ सेंसर कर दी गयीं थी,
इसे 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' से संभावित आसन्न खतरे
के मद्देनज़र किया गया था !

आदमी ना प्रेम को कह सकता था, ना पीड़ा को...!
तो विरोध किस प्रकार करता ?
मूक विरोध तो भोंथरे औजार के समान हुआ !
और इसलिए चोटिल आदमी को हाशिए पर डालने की प्रथा
कई दिनों से चालू थी...
व्यवस्था और सत्ता
के वास्ते
आदमी का मुखर होना बड़ा खतरनाक जो था !

वह एक परछाई सी थी, जिसमें मैं सिमटता जा रहा था...
मेरे होने को एक साथ स्वीकारता
और नकारता भी, यह समय...
तेजी से अतीत में ढलता जा रहा था
एक रौ में...
दहकते हुए सीने और
यहाँ से हजारों मील दूर समुद्र की लहरों में
एक ही लय थी !

मैंने बाग़ की झाड़ी में से
उसे ढूँढ निकला था
जो कल की मुलाकात के बाद
फूल बनकर झड गया था...
और अक्सर ऐसा ही होता था...
और मैं अक्सर उस क्षण के बाद सोचता था इस पर...
मेरे पाने और पाकर खोने का पूरा 'प्रमेय' यही है !

इन सब ब्यौरों में
कहीं उसका जिक्र साफ़-साफ़ नहीं है
ठीक इसी तरह कि,
मेरे होने के ठीक बीचों-बीच उसका होना भी
स्पष्ट नहीं है ! पर वास्तव में वो तो है ही...
मेरे ही भूगोल में छिपा हुआ...!

कई सारी सच्चाईयों के बीच
कोई बात नए तरीके से कहने के लिए
चेहरे पर तनाव का निशान बनना अपरिहार्य होता है !
बिल्कुल वैसे ही जैसे
मेरे और उसके संबंधों का
ब्यौरा लिखने के लिए
एक अव्यक्त वेदना की
मरणान्तक टीस सहनी होती है... बार-बार
और वह प्रकट में कहीं नहीं होती !

यहाँ "वह" का तात्पर्य -- प्रेम या पीड़ा या दोनों--
आप स्वयं लगा लें, इसकी छूट है !
और यह भी जानने की, समझने की, कोशिश करें
कि जो भी था, ऐसा क्यों था ?

मैंने बस अपना ब्यौरा समेट लिया है !

बुधवार, 24 नवंबर 2010

मेरी कविता में वह सब क्यों नहीं था

क्या ऐसा नहीं होगा कि, कल को आप लोग पूछेंगे -
तुम्हारी कविता में फूल क्यों नहीं थे... ?
बादल और हरियाली...
आईने और सुंदरता...
उन तमाम मादक गंधों की बातें और मुलायम देह...
मांसल आसक्ति और चुम्बन-आलिंगन...
आदि-आदि...
गायब क्यों थे ?

लड़कियाँ थीं, मगर...
बारिश थी, मगर...
खेत और नदी थे मगर...
चिड़ियाँ थीं, मगर...
बदन की जुम्बिशें थीं, मगर...
प्यार भी 'वैसा' नहीं था... !
कुछ भी तुमने 'वैसा' नहीं रखा था...
जो हमारी सोच, स्वाद और आदतों में शुमार रहा आया था...

ऐसा क्यों था...
शायद इसको समझाने के लिए
मेरी वही कविता नाकाफी
होते हुए भी
बहुत मजबूत 'स्टेटमेंट' होगी
कि मेरी कविता के समय में
यह सब अप्रत्याशित रूप् से नहीं
बल्कि एक तय साजिश के तहत
कारतूस, बारूद, खंजर, त्रिशूल, चाकू-गुप्ती,
भाला और भाषा, रस्सी-फंदा, ज़हर-गैस, पूँजी-नीति, विकास का मॉडल...
सांठ-गाँठ, दलाली, बेहयाई और भ्रम इत्यादि के पैदा किये हुए
दलदल की तलछट में चेप दिए गए थे...

मैं इन्हें (उपरोक्त प्रथम सूची के तत्वों, जिनके नहीं होने के लिए आप भविष्य में शिकायत करेंगे)
कविता में, जितनी तड़प, खुशी और शिद्दत से देखना चाहता था,
हर बार उपरोक्त दूसरी सूची के तत्वों की अधिक तीव्रतर उपस्थिति के कारण
बेबस, विकल्पहीन और मायूस हो जाता था...

इसलिए क्षमा करें... कि ,
मैं अपनी कविता में कोई भी सुन्दर चित्र टांक नहीं पाया !
अक्सर सत्य के आवेग से मेरी उंगलियाँ थरथराती थीं और
कल्पनाशीलता अनुर्वर हो गयी थी...
जो सच था, मेरी जमीर के सामने,
बिना लाग-लपेट के बयान हो गया...

बदहवास भागता आदमी हर बार...
ठीक मेरी नाक की सीध में आ जाता था... बिलबिलाकर मर जाता था...
अपने हक़ को भीख की शैली में माँगता हुआ और
मैं फूल-पत्ती-मादा
के सारे प्रचलित मुहावरों और सन्दर्भों से कट जाता था !

यकीन मानिये, यह केवल मेरा नहीं, उस समय...
मेरे सभी समकालीनों का समान साहित्यिक प्रारब्ध था...

रविवार, 21 नवंबर 2010

घाव

एक घाव है...
मारे डर के,
जिसका दर्द मैं दिमाग के हाशिए पर डालना चाहता हूँ
और गौर-तलब है कि, ऐसा करने की कोई राह भी नहीं सूझती...
वह घाव बदन के उस हिस्से में खुदा हुआ है
जिसके ठीक नीचे का अवयव
रक्त को पूरे शरीर में दौडाते रहने की क्रिया में संलग्न है
और बिना पूछे धडकता रहता है...ढीठ सा...
जब मैं नींद में शिथिल होऊँ... तब भी !
दिमाग के साथ यही तो खटता रहता है...
और सबसे ज्यादा मार इसी को लगती है... अंदरूनी तौर पर...

यह जिस घाव की मैं बात
(बगैर यह फ़िक्र किये कि यह किस्सा आपको उबाऊ भी लग सकता है)
कर रहा हूँ...
यूँ ही अचानक किसी चोट से पैदा नहीं हुआ !
यह घाव चेतना के रंदे से अपने आप को तराशे जाते समय घटित हुआ...
और बना हुआ है तब से, या कहूँ और गहरा, और फैला है तब से
पूरे मेरे वजूद में फैल गया है...रिसता - टीसता हुआ,
जिसका केन्द्र कहाँ है, यह ऊपर ही उल्लेख कर चुका हूँ !

सारे बौद्धिक वैद्य लक्षण सुन लें...
इस घाव की टीस तब उभर जाती है...
जब अख़बारों में हत्या होती है, और बलात्कार के किस्से
'चाय-बिस्कुट' के साथ निगले जाते हैं...
फिर जब सारे संसाधन पूँजी की थैली के मालिकों-वारिसों-दलालों
के पेट में जमा कर लिए जाते हैं और बाकि अधिकांश लोग
भूख जैसी संगीन बीमारी से सड़क पर "ऑफ द रिकॉर्ड" मर जाते हैं
पेट को हाथ से भींचे हुए...मरते हुए... उस दर्द को घटा पाने के इरादे से, मगर नाकाम !
और खबरनवीसों को इसकी "खबर" नहीं होती ! चूँकि यह मसला 'बाजारू' नहीं होता है !
तब जब स्कूल जाती या कॉलेज में चंद दिनों पहले दाखिल हुईं लड़कियाँ
अचानक मंडपों में
किसी औजार, करेंसी नोट के पुलिंदे या गंवार बैल के साथ
मुंडी झुकाए गिन-गिन कर सात चक्कर लगाती हुई पाई जाती हैं
और तब जब मरता हुआ आदमी आज का सबसे बड़ा कमाऊ विज्ञापन
बन कर खबरिया चैनलों पर 'चौबीस गुना सात' की पूरी अवधी में चिपका रहता है
और तमाम शर्म हमारी पेंदी से टपक चुके होते हैं...

और तब...और तब...और तब... गिनाने को कई सारे मौके हैं...
यानि इस घाव की टीस का स्थायीकरण हो गया है !

कुछ और लोग इस या इसी तरह के घावों को चाटते, सहलाते या
'तमगे' की तरह फक्र से टांगे हुए
या भिखारी की हथेली की तरह दयनीयता का रूपक बनाते पाए जा सकते हैं...
वह हर तरह की जिम्मेदारी की हद से बाहर के होते हैं...
और महज एक सफल या महत्वाकांक्षी उद्यमी की तरह इसका विज्ञापन करते रहते हैं...
वह और बात है कि मैं उनकी जात-बिरादरी से बाहर हूँ... और गनीमत है !

घाव में इकठ्ठा हुआ मवाद कभी-कभी उछल कर मुँह में भी भर जाता है
और मैं उसे थूक कर उससे कुछ देर के लिए मुक्त हुआ मान लेता हूँ...
मगर फिर वह कसैला-कडुवा स्वाद मेरे स्नायुओं में बहते रक्त में मिल जाता है
और 'नमक' में बदल जाता है...जो बे-ईमान हो नहीं सकने से मजबूर है !

ऐसे समय में मैं कुछ ज्यादा ही चौकन्ना हो जाता हूँ... चुपचाप बकता रहता हूँ...
और उँगलियों पर घड़ी की तरह समय काटने लगता हूँ...

मैं भी तो इस समय इस घाव की व्याख्या करते हुए
शाब्दिक कलाबाजी करते हुए आखिर एक खेल ही तो खेल रहा हूँ...
जबकि भरसक इससे बचने की कोशिशें की हैं...
उफ़, कितना हिंस्र हो गया हूँ मैं...
कितना बर्बर हो गया हूँ... जिसे
सभ्यता की परिभाषा गढ़ने वाले
मस्तिष्कों के भ्रम की आड़ में विकसित किया गया है... यह भी एक किस्म की
शराफत के रैपर में लिपटी चालाकी है...
और इसलिए विपणन का इरादा नहीं होने पर भी... कहीं बिक भी जा सकता हूँ... इन शब्दों सहित मैं !

लो, इतना कुछ बताते-सुनाते-कुरेदते...
इस दौरान कब फिर से वह घाव टीसने लगा है...
और मुझे मालूम हैं, फिर किसी गडबड से उपजा है यह दर्द,
जिसे दिमाग के हाशिए पर डालना है मुझे...
यह दर्द, जो कतई किसी किस्म की मक्कारी नहीं है !

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

घर

बहुत बार सोचा है,
या ज्यादे साफ़ कहा जाय, तो पूछा है अपने आप से...
और जिस जगह रात बिताता रहा हूँ अक्सर
दुनिया-जहान के सारे खौफ़ से होकर बेलौस,
उस जगह से भी
पूछा है,
घर क्या होता है, कैसा होता है ?...

तो...
प्राय: नेपथ्य से जवाब आता है...
घर वही जिसकी दीवारें मुहब्ब्त के ताप से लीपी हुईं
और जिसकी छत पर रोज सुबह मुहब्बत की धूप फैली हुईं होती हो !
हवा में नमीं और चाशनी सी खुशबू महसूस करो और
जहाँ सुकून के भाप भरे चश्मे की सतह सा फर्श हो...
 
अगर ऐसा ना हो, और
अगर दरवाजे पर हर शाम
अनकही सी फ़िक्र आँखों में समेटे एक इंतजार ना हो...
गले लग जाने की बेसुध तड़प को थामे कई लम्हों से
देर से आने की शिकायत करते हुए झिडकी दे और तुम
देर तक हँसते रहो उसे मनाने का उपक्रम करते हुए

फिर कहीं से भी,
कभी भी तुम लौटो...
"घर" नहीं लौटते... बस एक ठिकाने पर लौटते हो...!

वह होता है घर जहाँ, रोटियाँ तवे पर नहीं
हथेलियों की गर्माहट से पकती हैं...
दुधिया आँचल चेहरा ढांप लेता है और
नींद की शुरुआत हो जाती है थकी पलकों के नीचे
जहाँ की रसोई भी उतनी ही मादक और कमनीय होती है
जितनी बिस्तर की आदम, पवित्र गंध !
जिसमें कमल का एक फूल खिल जाता है हर दफा
सुबह गुसलघर की बौछार के नीचे से धुल कर
नया-नया और ताजा-ताजा...
जहाँ रात की खामोशी में
बिस्तरों के कोनों में उलझी-झूलती
जैसे घंटियों की कर्णप्रिय आवाजें
नशे की हद तक आलिंगन का जायका मीठा बना देती हैं...
घर वही जहाँ कसाव होता है...अपनेपन का हर सुबह...
और जहाँ के पानी, आग और धुएँ का स्वाद
हरदम पीछे चलता है

घर जो तुम्हारी हर हार को अपने आगोश में छिपा कर
फिर भी तुम्हें दुलारता रहता है, हौसला देता रहता है...
दुनिया से बार-बार लड़ने के लिए जज्बा और इत्मीनान देता है
तुम कहीं से भी चोट खाकर आओ...
पुचकार कर तुम्हारे जख्मों पर कोमल फूँक मारता है...
घर !

जिसकी दीवारों और खिड़की-दरवाजों से भी
एक साँस भरता रिश्ता होता है...

घर तो यारों वह है
जो मुझ जैसे को बंजारा बनने नहीं देता !
मगर अब उसी खोये हुए "घर" को ढूँढता हूँ
घर में ही, जो अब मकाननुमा रह गया है...

सवाल करने को जैसे अभिशप्त हूँ, "मेरा घर कहाँ है ?"...    
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