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मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

उसके रिश्ते की आखिरी औरत

(उस क्रांतिकारी के लिए, जो हर खतरनाक दौर में वक्त की कोख से पैदा होता है और कारतूस के सामने कलम को रख देता है.)

         शहीद कामरेड महेंद्र सिंह की विरासत को पूरी  अपेक्षा व विश्वास के साथ समर्पित


एक बेतरतीब शुरूआत कहानी की

"उनका" एक दूसरे के लिए होना एक ज़िंदा सच था...साँसें लेता हुआ सच, कलेजे सा धड़कता सच... बहरहाल, जिसे एक दिन लहूलुहान होना था. और दोनों एक दूसरे के  अस्तीत्व के लिए ज़रूरी थे... ठीक वैसे ही जैसे सच के लिए दलील और वजूद के लिए पहचान का होना ज़रूरी है...

लड़का कई बार उस कस्बे के सीवान पर घेरा देने वाली नदी पर जागता था, कई बार कविताओं में जीता था और कई बार हथौड़ी छैनी लेकर अपने आप को तराशने निकल पड़ता था और  अपनी ही चोटों से लहूलुहान होकर घर लौटता था. तब वह  अक्सर उसके वास्ते चौखट बन कर इंतज़ार करती हुई पाई जाती... उसकी हथेलियाँ कौर बन जातीं, उसे दुनिया का सबसे लज़ीज़ खाना खिलाने के लिए और उस रात उसकी जाँघ लड़के के लिए बिस्तर बन जाती, उसे एक पुरसुकून नींद देने के लिए...

लड़का कई दफे उससे कह चुका था और अक्सर कहा करता था, 'मेरे पीछे जान मत दो. मेरा रास्ता बिरसा मुंडा या भगत सिंह के पीछे हो गया है... मैं सच, इंसाफ और हक़ की तलाश में सिद्घार्थ की भटकन लिए कभी भी दूर निकल सकता हूँ...'

वह तब तपाक्‌ से अंगीठी बन जाती, जिसे लोहे के काले वजनी तवे का बोझ कंधे पर लेना है और गर्म रोटियाँ सिंकवा कर खिलवानी है...
लड़का सारे प्रतीक नए चाहता था, सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन की तरह, शायद यही उसकी गल्ती थी... और वह उसके पीछे मोमबत्ती की तरह गलती रहती थी...

पूर्वकथा यानि कथा जहाँ से कही जाती है आमतौर पर...

चौदह बरस पहले उस शाम एक बवंडर आया था. न बिजली कड़की, न तेज पछुआ हवायें चली, न ओले पड़े...मगर एक मकान की बोसीदा दीवारें छत से मरहूम हो गईं थी. वह खामोश चीखों का अजीब तूफान था, जिसमें एक नाजुक सी क्यारी जड़ समेत उखड़ गई थी और उस वक्त के बदलते हुए इतिहास का मामूली सा हिस्सा हो गई थी. लड़के का कामरेड पिता सरेचौराह नाम पूछ कर पिस्तौल से दाग दिया गया था. उस दिन भरी दोपहर, एक भीड़ को संबोधित करने के बाद...

लड़के ने पिछले दिनों अपने इक्कीसवें वर्षगाँठ पर उस तूफान को याद करते हुए उससे कहा था, 'मैं मर सकता हूँ, मगर मेरी भाषा कभी नहीं मरेगी...' और जो उसने नहीं कहा, मगर समझा जाना चाहिए था वक्त के तकाज़े में लाज़मी मुद्दे की मानिंद, कि 'मेरी भाषा मेरी सबसे बड़ी ताकत है. मेरी भाषा मेरा वजूद है, जो मेरी धरोहर है, वही भाषा जिसका मैं वारिस हूँ... भाषा के बगैर कोई क्रांति संभव नहीं...मैं मिट्‌टी का आदमी हूँ, मेरा बदन मिट्‌टी में मिल जाएगा... मगर इसीलिए मिट्‌टी के करीब हूँ. मैं उसी तरह हमेशा ज़िंदा रहूँगा, जैसे यह ज़मीन  नश्वर है.  अनेक रूपों में, जो कहीं न कहीं जो इस कायनात में सदा बची रहेगी...यही मेरी ज़मीन है, मेरा ज़मीर है..." और समझा गया भी...
ये उसने नहीं कहा, मगर समझा गया...दुनिया की एक सबसे दुखी मगर बहादुर रूह द्वारा...

और एक मध्यरात्रि उस रूह ने  अपनी आँखें पोंछते हुए मादा गालियों के बीच हथकड़ियों का लॉक जुड़ते सुना...

इसके बाद कैलेण्डर के कई पन्ने बेकार हो गए...
कई दिन बीते, वह कभी रोती और कभी संकल्प करती रही...
कई दिन बीते, एक भी मौसम नहीं गुज़रा...
और कई दिन बीते, बे आवाज़ चाबुकों की मार तेज होती गई...


आखिरकार एक दिन सूरज बिल्कुल उसकी सीढ़ियों पर उगा, और समाज के वास्ते गैरज़रूरी हो चुके उसके चेहरे पर एक सदी की रात ढली थी.

वह लड़के को बदहवास चूमते हुए बोलती रही, 'मेरे राजा, मेरे सोना, मेरे जीवनधन...तुम आ गए... आह्‌ तुम आ गए, मेरी जान चली गई थी, मैं मर गई थी...'

दो नदियों की चार धाराऐं कधों पर मिलती रहीं, किंहीं मुख़्तसर लम्हों के लिए...


दोस्तों, यहाँ तक की लफ्फाज़ी से साफ हो गया है कि...


लड़का  अपनी फितरत और ज़मीर से मज़बूर था... और वह उसके भीतर फल गए आदर्शों के उन बीजों से, जो उसका बाप  अपने लड़के की ज़ीन में रोप गया था अनायास...

लड़के ने आदतन फिर कागज़ों के दामन पर उजली कालिख पोतना शुरू कर दिया. आरोप पत्र गढ़े जाते रहे उसके खिलाफ...और वह क्लिपबोर्ड पर कागज दबाए लिखता रहा... स्थापनाओं की चूलें हिलती रहीं...
लिखता रहा कि लोग लोहे, बारूद, धातु, चमड़े और एक मुल्की कागज़ पर छपे खास टुकड़े के पीछे हैं...कि आज का सूरज खून देख देख कर थक गया है... कि लोग सुदामा पाण्डेय 'धूमिल' को ठीक ठीक समझ लेते तो सड़क की क्रांतियाँ संसद में फैसलों में बदल जातीं... कि पाश, सफ़दर जैसों को रोकने के लिए हत्या ही इकलौता रास्ता उनके पास बच जाता था...कि इलाके का विधायक अधिनायक नहीं, जनता का मुलाजिम होना चाहिए... कि कभी कभी तारीख में विद्रोह करने की ज़रूरत एक मुकद्दस, पुराने या हालिए इतिहास को बदलने के लिए एक सिलसिलेवार धीमी सरग़ोशी या फिर बिना किसी आहट के पैदा हो जाती है, उसे आइडेंटिफाई करना ज़रूरी है...

वह लेखकीय भावुकता के झोंक में यह भी दर्ज़ करता गया, कि मैंने माँस से कभी प्रेम नहीं किया, सच्चा प्रेम वहाँ किया भी नहीं जा सकता... कि मेरा प्रेम किसी को दिखाई भी नहीं देता, समझ में नहीं आता... कि मैं सुनहरे गालों से नहीं, एक खुबसूरत कलेजे से प्रेम करने का सपना देखता हूँ... कि मेरे प्रेम को आदमखोरों के एक 'ग्रूप' ने ग्रास लिया है...

कि ( अब) हर कोई मुक्तिबोध नहीं हो सकता...

वह लिखता रहा, जहाँ तक लिखा जाना संभव हो सका...फिर दीवार पर टँगी एक पुरानी बत्ती बेनूर हुई थी, एक पुराना पर्दा खिड़की पर फड़फड़ाया था, एक पुरानी घड़ी ऊँघने लगी थी.


इन्हीं दिनों किसी दिन लड़के ने उससे कहा था, 'तुम हो तो ताकत मिलती है...मैं सृजन कर सकता हूँ, विरोध कर सकता हूँ, कुछ घाव भर सकता हूँ...'

वह मुस्करा भर देती तो लड़के की आँखों में वही दूधिया मौसम खिल उठते थे...

उत्तरकथा का पूर्वांश...

गोलियों की हैवानी धाँय धाँय के बीच वह धराशायी हुआ था.

और शांत, गाढ़ा, ताजा लहू तारकोल की तजुर्बेकार सड़क की गर्द सोखने लगी... सिर पर बने सुराख से खून था कि लगातार रिसता जा रहा था, खून का भी अपना 'स्टेटमेंट' होता है... किसी हरामखोर तिजोरी में उसे समझने के लिए शब्दकोश नहीं है...

इससे थोड़ी देर पहले रामलीला मैदान में मंच और लाउडस्पीकर का इस्तेमाल इस देश के इतिहास में घटे एक गलत मक़सद को महान साबित करने के लिए कुछ मुखौटों ने किया था... जो  अपनी नस्ल में खाँटी देशी खून ढोने की ग़लतफहमी में थे...जिनके लिए उनकी बीमार सोच में राष्ट्र का अर्थ एक ख़ास धर्म था...

देश का ताजा मगर आम व अभिजात्यीय क्षमताओं से रहित खून रोटी, छत, अस्तीव और आबरू के लिए जल रहा था जिस समय...जिस वक्त विश्व का सबसे बड़ा, शातिर, बेशरम मगर  घोषित आतंकवादी शांतिमुहिम नामक पेटीकोट की ओट ले कर दुनिया को बाजार के दलदल या युद्घभूमि के बंजर में बदल देने के लिए रोज मदारियों की चालें चल रहा था...जिस वक्त सत्ता से बाहर के लोग 'विदेशी बहू' को रोकने के लिए किसी भी हद तक जाने की खबरिया घोषणाएं कर रहे थे...और ऐसे वक्त जब सेसेंक्स रिकार्ड तोड़  उछाल मार रहा था, मगर देश का तीसरा दर्जा  अपने हाल पर छोड़ दिया जा रहा था...उस वक्त, जब रैलियों या महारैलाओं का सीजन चल रहा था...नक्सली पहाड़ी रास्तों पर विस्फोट कर अपना शक्ति प्रदर्शन कर रहे थे... और बरगद की जड़ों में सिक्के रोपने वालों के खुफिया इरादों से बहुत से हाथ पेट बेख़बर थे...

उन्हीं दिनों यह हादसा शहर के बीचोंबीच उसी रामलीला मैदान के पास हुआ था...
लालनीली बत्तियाँ, सायरन, बूटों की धमक और वर्दियों की रेलमपेल में...लड़का औंधा पड़ा था सबके बीच...लोकतंत्र में चारों खाने चित्त...एक मुहरबंद रायफल की अज़नबी गोली के भटके हुए वार का शिकार हो कर... और उस पर कई स्वचालित किस्म के कैमरे तने थे. वह भी  अपने बाप की तरह इस शाम की बुलेटिनों के लिए महत्वपूर्ण बाईट बन गया था, एक फुटेज...ब्रेकिंग न्यूज़ में उसका नाम फ्लैश हो रहा था, लक्ज़री कार के स्क्रॉलिंग विज्ञापन क्लिप के साथ...

वहाँ से कुछ ही कदम पर उसकी गली से हो कर हवा, उसके रिहायशी क्वॉर्टर के ज़ीने से चहलकदमी करती हुई, दरवाजे पर हल्की सी थपकी दे कर बालकिनी में पड़े मेज़ पर चुपचाप जा बैठती थी और फिर एक उदास कलम क्लिपबोर्ड में उलझे कागजों पर हिलती थी, आले पर रखी किताबों में से कोने वाली का ज़िल्द थरथराता था...

अचानक आकाश में उजले बादलों का अकाल पड़ गया, कहीं से भी कोयलें कूक नहीं रही थीं, हवा अब थिराने लगी थी... मानो अभी क्षितिज में तोपों की सलामी की सम्मानसूचक आवाज़ गूँजेगी. चाहरदिवारियों में दरारें पड़ने लगीं,  अविश्वासी  अपेक्षाओं आस्थाओं के जर्जर किले भरभरा कर ज़मींदोज़ होने लगे...

वह जो उसके रिश्ते की आखिरी औरत थी, और संयोग से पहली भी,  अब  अकेली हो चुकी थी. जिसका एक  नियमित और अपनी उम्र पूरी करते वेतन, एक चादर, एक मोढ़े, एक हमदर्द टोटी, एक खोहनुमा क्वॉर्टर...और इकलौते लड़के के सिवा कोई विशेष दावेदारी नहीं थी, ज़िंदगी में...जिसके कामरेड पति का ज़िस्म सरेआम चौक पर  अज्ञात (!) मोटर साईकिल सवारों द्वारा चौदह बरस पहले गोलियों से छेद दिया गया था...

वह  अपने जवान बेटे की लाश देखने का हौसला समेट रही थी...

मगर अफ़सोस! इस तरह यह कहानी यहाँ खत्म नहीं होती...

गुरुवार, 24 मई 2012

बूढ़े


बूढों को जाते देखता हूँ... अक्सर...
सड़क पर, धूप से मुठभेड़ करते चले जाते हुए...
झुकी या झुकने को हो आई कमर वाले वे
थके, हैरान और पस्त... सेवानिवृत बूढ़े...
जा रहे, या जाकर लौट रहे होते हैं
किसी पेंशन दफ्तर से
या बैंक में पेंशन-भुगतान वाली खिडकी से...

वे सब बूढ़े... जो जिंदा हैं...
कुदरत के तमाम करिश्मों में से एक की तरह
यह साबित करने को...
कि वे जिंदा हैं... बूढ़े जाते रहते हैं वहाँ,
एक तय अंतराल पर...
उन्हीं जाली मढ़ी हुई खिड़कियों पर,
उन्हीं थकाऊ, उपेक्षित, निर्मम कतारों में,
अपनी बारी की प्रतीक्षा में वक्त के साथ बीतने के लिये
उन्हीं पेशेवर लिपिकों की चिढ़ बढ़ाने के वास्ते...

क्योंकि बूढों की शारीरिक उपस्थिति एक अनिवार्य शर्त होती है
इसलिए बूढ़े जाते हैं...

एडियाँ पटकते
पसीना अपनी झुर्रियों में सोखते
सड़क की ट्रैफिक से जुझते
ऑटो वाले से झगड़ते
घर पर छुट गई कलह के वृतांतों को खुंदते हुए

जब वे अचानक सर उठाकर
ऊपर आसमान की ओर देखते हैं, उस समय
शायद...
जिंदगी के अवांछित विस्तार से ऊबकर मृत्यु की याचना करते हुए...
बूढ़े जा रहे होते हैं...

सोमवार, 3 अक्टूबर 2011

चीखो

एक ऐसे सपाट दुनिया के,
जिसे भूगोल की किताबों में अंडाकार बताया गया है...
तुम और मैं जैसे लोग हाशिए के भी बाहर कहीं गैर परिभाषित जगह पर हैं...
हममें अभी खिलाफत में चीखने की कूवत बाकि है...
सारे फैसले बेशर्मी की आला मिसाल हैं और
पानी के अनुपात की तर्ज पर जहाँ का एक तिहाई हिस्सा
नृशंशता की हद तक गैर-बराबरी का है,
यह उतना ही क्रूर और ठंडा है, जितना कसाई के छुरे का वार...
इसको समझना मुश्किल नहीं है...

चूँकि बताया जा रहा है कि प्रतिदिन ३२ रूपये खर्चने वाला
एक आर्थिक हैसियत या पैमाना बताने वाली उस अदृश्य रेखा के ऊपर है ! और...
इसलिए यह एक बेशर्म मजाक है ! इस पर हँसना कुछ इस तरह का आत्मपीडक काम है जैसे,
पुराने घाव के भीतर सलाखें भोंकना...
लगातार...
कुछ अनचीन्हे मुखौटों के पीछे छुपी हुई आवाजें
हौलनाक लतीफें सुनाती हैं कि
अमुक तारीख को
तुम्हारा वजूद बदल कर रख दिया जायेगा...
और तुम उस तारिख के तुरंत बाद खुद को पहचानने से इंकार कर दोगे...! 
पूछोगे किससे, क्या यह सच है ?

इस दुनिया के हाशिए से बाहर होने के बावजूद...
वे हमें डराने के लिए मजबूर हैं, कि उन्हें भी हमसे उतना ही डर है !
इसलिये यहाँ हत्यारों के चेहरे की मासूमियत तुम्हें दंग कर सकती है !
और यही बात उनके फायदे की है...!

 "इंसानियत", "इन्साफ" "ईमानदारी", "इंकार: और "इन्किलाब" जैसे
शब्दों में जरूर कोई बहनापा है,
इसलिए ये इनके शब्दकोष से सिरे से अपने अभिधेयार्थ सहित गायब हैं !!!

चीखो-चीखो-चीखो...!
क्योंकि २३ मार्च को फाँसी पर चढ़ने वाले उस तेईस साल के जाट नौजवान ने
कहा था, "ऊँचा सुनने वालों को धमाकों की जरूरत होती है !"

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

याद आया...


फिर किसी किताब में...
या कि अतीत के फांकों में
ढूँढूँगा अपना मिज़ाज-ऐ-आराम
फिर सांझ की पहली लालटेन
पश्चिमांत की खूँटी से
उतर कर ओसारे के एक खंभे
पर टिक गई है
कुछ देर जब हर पत्ता सोने लगेगा
फूल अपनी बोझिल गर्दन झुका लेंगे
मैं सोचूंगा
तुम इस वक्त भी मेरे साथ
क्यों नहीं हो ?
जब शामें ढला करती हैं
तब, तेरे नुपूर की झंझन
क्यों नहीं सुनाई देती...
जब झींगुर बोलते हैं और
रात क्वाँरी दुल्हन बन जाती है
अंतर्मन में एक हूक उठती है कि
दौड़ जाऊं पास तुम्हारे
दिलाऊँ याद कि जब हम साथ हँसते थे
मिलते थे और जीते थे...
तुम्हारे बहके हुए आँचर का कोना थाम लूँ
और मेरा पूरा दिन रजनीगन्धा सा
रात बेला सी
महकती रहे !
ऐसे ही तो, हम साथ थे कभी
अभी एक पुरानी डायरी में
तुम्हारे पंजों की सिन्दूरी छाप देखी
तो याद आया...

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

वह वेदना प्रकट में कहीं नहीं होती !

पूरा ब्यौरा इस तरह है...

समूचे आकाश पर
चमकीले सफ़ेद बादल
फैले थे... क्षितिज के ओर-छोर
साँसें तेज-तेज चल रही थीं और
दिन रोजाना की तरह पल-दर-पल
बीतता जा रहा था...
बहुत सारे घटितों को इतिहास में दर्ज़ करता हुआ

कोई संवाद
लगातार अपने ही अंतस की सुंरगों में
गूंजता जा रहा था... जिसका अर्थबोध
इसलिए नहीं हो पा रहा था
कि अभी इसकी भाषा नए सिरे से चिन्हित की जानी बाकि थी...
क्योंकि सारे शब्दकोशों से आम आदमी की
शब्दावलियाँ सेंसर कर दी गयीं थी,
इसे 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' से आसन्न खतरे
के मद्देनज़र किया गया था !

आदमी ना प्रेम को कह सकता था, ना पीड़ा को...!
तो विरोध किस प्रकार करता ?
मूक विरोध तो भोंथरे औजार के समान हुआ !
और इसलिए चोटिल आदमी को हाशिए पर डालने की प्रथा
कई दिनों से चालू थी...
व्यवस्था और सत्ता
के वास्ते
आदमी का मुखर होना बड़ा खतरनाक जो था !

वह एक परछाई सी थी, जिसमें मैं सिमटता जा रहा था...
मेरे होने को एक साथ स्वीकारता
और नकारता भी, यह समय...
तेजी से अतीत में ढलता जा रहा था
एक रौ में...
दहकते हुए सीने और
यहाँ से हजारों मील दूर समुद्र की लहरों में
एक ही लय थी !

मैंने पिछवाड़े, बाग़ की झाड़ी में से
उसे ढूँढ निकला था
जो कल की मुलाकात के बाद
फूल बनकर झड गया था...
और अक्सर ऐसा ही होता था...
और मैं अक्सर उस क्षण के बाद सोचता था इस पर... कि,
मेरे पाने और पाकर खोने का पूरा 'प्रमेय' यही है !

इन सब ब्यौरों में
कहीं उसका जिक्र साफ़-साफ़ नहीं है
ठीक इसी तरह कि,
मेरे होने के ठीक बीचों-बीच उसका होना भी
स्पष्ट नहीं है ! पर वास्तव में वो तो है ही...
मेरे ही भूगोल में छिपा हुआ...!

कई सारी सच्चाईयों के बीच
कोई बात नए तरीके से कहने के लिए
चेहरे पर तनाव का निशान बनना अपरिहार्य होता है !
बिल्कुल वैसे ही जैसे
मेरे और उसके संबंधों का
ब्यौरा लिखने के लिए
एक अव्यक्त वेदना की
मरणान्तक टीस सहनी होती है... बार-बार
और वह प्रकट में कहीं नहीं होती !

यहाँ "वह" का तात्पर्य -- प्रेम या पीड़ा या दोनों--
आप स्वयं लगा लें, इसकी छूट है !
और यह भी जानने की, समझने की, कोशिश करें
कि जो भी था, ऐसा क्यों था ?

मैंने बस अपना ब्यौरा समेट लिया है !

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

पा सके जो राह-ए-इश्क में अपना अजीज मुकाम

पा सके जो राह-ए-इश्क में अपना अजीज मुकाम
करता हूँ यारों बार-बार बा-अदब उनका एहतराम

तबाह-ओ-क़त्ल भी हुए सरे-राह उनके वास्ते
और खुद ही पे आया अपनी बर्बादियों का इल्ज़ाम

अब तक तो ना हुई मयस्सर हमको वह
यकीं था कि मिलेंगे वफ़ा-ओ-उल्फत के जो पैगाम

जिन रास्तों पर खामोश वीरानियों का नूर था
चलते रहते थे खुशी-खुशी लेकर हम तेरा नाम

आगोश में लेकर तुम्हें ज़श्न-ए-वस्ल मनाते
क्या डराती जिंदगी, क्या करते कोई फ़िक्र-ए-अंजाम

गया वक्त वो सारे लम्हें गए दूर हमारी जानिब से
सोचते हैं अब क्या खामियाँ हमीं में थीं तमाम

रकीबों के शहर में घूमता हूँ तन्हा "शेखर"
जब से बदलते देखे हैं रिवाज़-ए-दोस्ती के आयाम
२८-१०-२०१०

सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

पहले दिनों जैसा प्यार...

प्यार के शुरूआती दिनों को भरपूर जीओ दोस्त...
क्योंकि सिर्फ़ तब ही होता है,
रहता है पूरी तरह से,
ईमानदार प्यार...
सौ पैसा खांटी खुमार देता प्यार...
किसी बच्ची सा भोला और निश्छल प्यार...

जिसमें कौंधती है, प्यार करने वाले की आत्मा
और उसकी सच्चाई...
तुम्हारी फ़िक्र और परवाह वाकई सचमुच की होती है
तब, सचमुच जरा सी भी दूरी डरा देती है मन को
और बाँहों के घेरे का कसाव असली तड़प लिए होता है...
वह गर्मी भी खालिस होती है जो तपे हुए चेहरे,
सांसों और होठों से नुमांया होती है...
सारी प्रार्थनाएं सीधे कलेजे से निकलती हैं और
सबकुछ लुटाकर भी मजे में रहने वाली आस्था सच्ची होती है...

खेद है कि, फिर ऐसा रह नहीं जाता...
फिर तो सावन भी बरसता है, मगर उसकी आग महसूसती नहीं
साथ चलते हुए भी परछाइयाँ परस्पर लिपटती नहीं...
तुम्हें तड़प कर पुकारने वाली उस आवाज़ की आस में जिंदा रहते हो और
वही एक पुकार फिर आती नहीं...

फिर प्यार ना गाढ़ा, ना जुनूनी, ना विशुद्ध, ना गहरा,
ना किसी आवेग का रह जाता है !
मात्र एक खोखली उम्मीद की मानिंद...
जो एक-दूसरे से बमुश्किल निभ पाता है...!

प्यार को गुना-भाग, जोड़-घटाव...
किसी समीकरण में तौले जाने और
दुनियादार हो जाने से
पहले पूरी तरह से जी लो...
क्योंकि, फिर पलट कर नहीं आता है...
पहले दिनों जैसा प्यार...
फिर अपना-अपना कहते-कहते भी
अपना होने का भ्रम मात्र बनकर रह जाते हैं लोग...

फिर पूरी शिद्दत से
तुम उसी प्यार की कशिश को पाने के लिए
जुझने तो लगोगे...
मगर दोस्त... वह प्यार नहीं मिलेगा
ना फूलों और चाँद पर, ना भरी-पूरी रातों में, ना घर में, ना बगीचों में...
तलाशोगे अगर साथी की आँख में, चेहरे पर, उसकी बातों में...
और शारीरिक भाषा में... हताश होओगे यह पाकर कि
कोई गीली चीज दरम्यान से गायब है...
सिर्फ़ एक पथरीली सी हँसी है, जिसे तुम नहीं पहचानते और
बहुत सारा पानी सूख चुका है !

प्यार अक्सर दिन ढलते जाने पर
उपेक्षात्मक होता जाता है...
सैद्धांतिक रूप से तो...ठीक इसके उलट होना
और आदर्शवादी तौर पर...
ऐसा कतई नहीं होना... चाहिए...
मगर...
होता यही है...  

इस पर अफ़सोस करने की हालत में पहुँचने से पहले
खुलकर, डटकर... पूरी मौज के साथ
इस प्यार को जीयो मेरे दोस्त...!

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

लड़ाई

बहुत साफ़ नहीं कहा था उसने
कि लड़ाई में (अब) तुम भी हो...
यह जो चल रहा है, बकायदा एक जंग है...
और इसमें तुम भी
शामिल हो दिन रात की तरह
जिस जगह अभी मैं हूँ, बहुत जल्द तुम भी वहीँ होगे...
अब तक बेखबर थे... चोट खाते थे...
चोट करने वाले हाथों को पहचानते थे, तो...
अभी अपने औजार - हथियार सब
इकठ्ठे करो... अभी, बिल्कुल इसी समय...

ढोर भी अपने बचाव के लिए सींग मारता है...

लड़ाकू बन जाओ
तुम्हारे सामने विकल्पों की कोई तालिका
नहीं है
और इतनी मोहलत भी नहीं कि
तुम इस युद्ध से
परे कुछ और संभावनाओं को तलाशो...
युद्ध तुम पर सीधे-सीधे थोपा गया है...
और तुमको अपनी आत्मरक्षा का पूरा हक़ है !
क्योंकि डार्विन का सिद्धांत
इसी फलसफे पर था...कि,
वही बचेगा जो
लड़ाई लड़ने, लड़कर जीतने की
सामर्थ्य रखता होगा...

तुम उस तरह के हो जिनके पास
भूख सुलगते हुए अंगार की तरह है
सपने राख की सफेदी हैं
उम्मीदें बर्फ के गट्टे हैं
हरियाली तुम्हारे पैरों के नीचे से खींची जा रही है
और उजाले तुम्हारे आकाश से पोंछ डाले जा रहे हैं...
तुम जितनी दूर देख सकते हो-
समर की जमीन ही देख रहे हो...

तुम्हें हक़ के लिए
प्रेम के लिए और आदमी की तरह जी सकने के लिए,
दुःख जैसा कड़वा काढ़ा
हलक से उतारने के लिए
अपनी भावी पीढ़ियों के वास्ते
बेहतर धरती के लिए... लड़ना ही होगा...
लड़ने के लिए सारी ताकत और सारे इरादे
पुख्ता कर लो...
लड़ो... लड़ो बेदम होने तक
या फिर जीतने तक...

इतना साफ़ नहीं कहा था उसने
यह सब !
सिर्फ़ उसे उस बंद कमरे की तरफ
घसीटे जाते हुए देखकर हमारी चेतना में
एकाएक बिगड़ी हुई मशीन के शोर की तरह
घटने लगा... .खतरे की घंटी सा बजने लगा... यह सब...

कमरा, जो ठीक हमारे सामने था,
की मोटी दीवारों और
मज़बूत लोहे के दरवाजे के पीछे
आध - एक घंटे पहले लाया गया
वह इक्कीस-बाईस साल का लड़का
बुरी तरह पीटा जा रहा था
हम महसूस कर सकते थे कि
उसकी कमर और तलुवों पर
बहुत जोरों से डंडे मारे जा रहे होंगे
इस वक्त उसकी नाक से खून निकल रहा होगा
और बार-बार उसका सिर बालों से पकड़ कर
सीली दीवारों पर मारा जा रहा होगा...

शायद उसकी सब कराहें
अंतिम रूप से पूरी तरह से बंद हो जाने तक
वह इसी तरह बर्बरतापूर्ण ढंग से
पीटा जाने वाला था...

और कड़वी बात यह थी
कि, हममें से हरेक जानता था
कि उसने ऐसा कोई दोष नहीं किया है
कि उसे मार डालने तक
उसके हाथ पीछे बांधकर
नंगा करके, तेल चुपड़ी मोटी लाठियों,
सरकारियो कमरबंदों और घूंसों...
से उसे इतना मारा जाय... उसके नाखून उखाड़े जायं...
यौनांगों को क्षत-विक्षत किया जाय या...
गुदा में पेट्रोल डाला जाय...!

उसने सिर्फ़ इतना कहा था
कि वह उन आदमीनुमा लोगों का
सरमाया है, जिन्हें आदमी मानने
का कोई अधिनियम जारी नहीं हुआ है
जिनकी ज़मीन और जंगल
बहुराष्ट्रीय कंपनियों की अघोषित मिल्कियतें
बना देने की साजिशें रफ़्तार में हैं
जिनकी मिट्टी और पानी छीन गया है...
वह उनके लिए लड़ता है...

और इससे पहले कि वह
अपने कहे हुए की और अधिक व्याख्या करता,
तमाम तथ्यों और आंकड़ों से उसे साबित भी करता...
वह पकड़ा गया था...!

उसने यह सबकुछ बहुत चीख कर भी नहीं कहा था
हम फिर भी सुन पाए थे
हम वहाँ भीड़ की घेरेबंदी की शक्ल में मौजूद थे...

फिर इसके बाद उसकी आवाज हमको लगातार
सुनाई देती रही...
उसकी कराहों और मार की दहला देने वाली
तमाम आवाजों के बरक्स उसकी आवाज
आती रही...  
"लड़ाई में अब तुम भी हो..."  

वह नौसिखिया सा दिखता लड़का,
जिसकी अभी मूंछें तक कड़ी नहीं हुईं थी
मगर रीढ़ बेशक हो गयी होगी...
हम सिर्फ़ इतना जानते थे कि
वह मर जाने से खौफ नहीं खा रहा था...

और साथियों, अब हम...
(जो अपने को आदमी मानते और समझते हैं...)
उसकी कराहों के पूरी तरह बंद होने से पहले
अपने कन्धों पर एक बोझ सा महसूस कर
तिलमिला उठे हैं...
लड़ाई पता नहीं अब शुरू होगी
या, बहुत पहले से जारी है
जिसमें हमें अब शामिल हो जाना है...

२२-२३-२४/१०/२०१०

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

हाथी पहाड से जा रहे हैं

अभी कल के अखबार की खबर थी...
"हाथी पहाड से जा रहे हैं."
हाथी जा रहे हैं, अपने सदियों पुराने परम्परागत अरण्य
"दलमा" को छोड़कर...
विराट पहाड़ वाला अपना घर छोड़कर
जहाँ झूमते थे... सकुटुम्ब... मदमस्त, सदियों से...

कैसा लगता होगा हाथियों को अपना विस्थापन !
उजड़ जाना, उखड जाना...
जो कूच कर रहे हैं "दलमा" से
क्या फिर कभी लौटेंगे...
या लौट ही पाएंगे ?
कहते हैं हाथियों की याददाश्त बहुत मजबूत होती है...
उनको क्या याद रहेगा...इस तरह से अपना जाना...
कि जिसकी भूमिका कई सालों पूर्व से ही बनाने लगी थी...
कंक्रीट का जंगल, उनके प्राकृतिक अरण्य को
रौंद कर बढ़ता रहा... बढ़ता रहा... लील गया...
उनका शांतिपूर्ण प्राकृतिक आवास...
 
क्या याद करेंगे वे कि जब भी वो दोपायों की इस ज्यादातियों
से घबराकर गाँव-शहर की ओर भागे... वहाँ से भी
'आवारा हाथी' की गाली देकर उन्हें खदेड़ा गया...
'जंगली हाथी' के उत्पात के किस्से
बढ़-चढ़कर सुनाये गए और हमेशा उन्हीं को दोषी
बताया गया...
क्या याद रखते हुए, नहीं कल्पेंगे वे
"दलमा" मे अपना वह मुक्त विचरण
अब गूंजेगी शायद ही "दलमा पहाड़" में हाथियों की मुक्त चिंघाड...!

पत्रकार जब पूछता है,
"क्या हाथी लौटेंगे...?"
रादु मुंडा लाचारी से अपने गमछे से
मुँह का पसीना पोंछता हुआ अकबका कर
पहले उसका मुँह देखता है, फिर धीरे से कहता है
"बाबू, हाथी जा रहे हैं..."

सचमुच हाथी जा रहे हैं...
पहाड़ से हाथी जा रहे हैं.
"दलमा" से हाथी जा रहे हैं...


(झारखण्ड के पूर्वी सिंहभूम का प्रसिद्ध दलमा पहाड़ हाथियों का सदियों पुराना अभयारण्य रहा है. हाथियों के प्राकृतिक आवास के नाते ही यह प्रसिद्द है. अब हाथी यहाँ से बंगाल की ओर कूच कर रहे हैं... शहर अपनी पेंगे बढ़ाता हुआ, उनके इस निवास को हड़पता गया और आज वे जा रहे हैं, छोड़ कर दलमा को. किसे फर्क पड़ता है? हाथियों को या फिर रादु मुंडा जैसों को, मगर इनको फर्क पड़ने से भी किसी को क्या फर्क पड़ने वाला है!)

- शेखर मल्लिक
११-१०-२०१०

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

अभी मेरा हमसफ़र

अभी मेरा हमसफ़र
मेरे पहलू में मुँह छुपाये सो गया है...

(उसका यह भोला सा भरोसा मुझ पर
किस कदर आश्वस्त करता है -
कि जिंदगी नि:संदेह लाजवाब है !...
एक बार यकीन करके देखो !!!)

केशों के जाले से बिखरे उसके चेहरे पर
रौशनी पर परछाइयों के आड़े-तिरक्षे धारे बनाते हुए...
निर्मल सांसों की हरारत से रह-रह कांपते नथुने...
अधखुले रेशमी होंठ, छू लूँ तो दाग पड़ जायें !
...यह रात का वक्फ़ा... उफ़
लगता है, एक जमाने के लिए ठहर गया है !
उसकी मुंदी पलकों के नीचे
उजली-उजली दो वही आँखें हैं, जो हरदम मुझे
सुख के उजाले देती रहती हैं...बिन कहे...बिन माँगे...
(दुःख कहीं हुआ तो उन आँखों की ताब सह नहीं पाता...)

मेरा तमाम वजूद लंगर डाले उसके घाट पर
ऐसे टिक गया है...
जैसे बहुत भटकते हुए अचानक अपेक्षित पड़ाव
मिल गया हो...

अब इस सर्द रात की ख़ामोश ठण्डी
धुंध के दरम्यान
उसके पूरे जिस्म की खुशनुमाँ गर्माहट से
सिंकता हुआ मैं...
इस सफर-ए-हयात में
इस अजनबी चौराहे पर
एक पुराने लोहे के खम्भे पर
सर को टिकाये,
उसे अपनी बाजुओं में भरे हुए
अपने जिंदा होने का भरपूर उत्सव मना रहा हूँ...

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

काश यह कोई दूसरी दास्तां होती !

उसे बहुत कुछ देना चाहता था, अपना दामन फाड़ के सब दे देना चाहता था, और जिंदगी भर की तसल्ली हासिल कर लेना. ये उन दिनों के हालातों के तकाज़े की बात है, वरना मेरी अंजुलियों में इतना था कि वो तृप्त हो जाती, मैं सब पा जाता... वह फिर कभी भी आसमान पर चाँद देखकर निराश नहीं होती... ना उनींदी रातों में उसके माथे पर सलवटें आतीं... कुछ ऐसा था मेरे पास जो हर जिंदा रूह के पास होता ही है; कम-बेसी, मगर होता तो ज़रूर 
है. अगर आपको याद हो तो, वही चीज जो 'लहनासिंह' 'सूबेदारिन' को देना चाहता था, जो 'काली' 'ज्ञानों' को  और 'परीकुट्‌टी' और 'करूत्तम्मा' एक-दूसरे को देना चाहते थे. सब समाज की चौखट के पार दूसरी दुनिया में जाते हुए दे पाये थे ! खैर,

सपना यहाँ से शुरू होता है...

बहुत बड़ी-बड़ी और गहरी नदियों के पार, घने और दुर्गम्य जंगलों के नीम अंधेरों में, किन्हीं बुजुर्ग पहाड़ों की सबसे ऊँची चोटी पर जहाँ सूर्य हर शाम उस कस्बे के वाशिंदों की भोली निगाहों और मेहनतकश बाजूओं से पनाह लेता है. आसमान पर हर शाम का रंग नया होता है... उसके पीछे मैं एक सदी, एक उम्र भागा... उस मादक-गंध के पीछे-पीछे भागा... उस अनजानी महक फेंकते अदृष्ट सोते के पीछे भागा... और मेरे पैरों में कड़ियों की मानिंद सारे फलसफ़े, सभ्यता के नियम और नैतिकताएँ-व्यावहारिकताएँ, सारी कविताएं, सब किस्सेकोताह बंधे थे; मेरी कमर से लिपटा पूरा इतिहास घिसट रहा था...असफलताओं का सुनहरा इतिहास...!
दूर किसी ऐसे आबशार की तलाश में, जो मेरे सपने के भीतर सपनों में था, मैं प्यास से हलकान हो उसकी आस में बेतहाशा भाग रहा था, लेकिन मैं जितना उसके पास आता गया, वह उतना ही दूर लगता रहा. बचपन में माँ की कही एक बात याद आई, "पहाड़ करीब दीखते हैं, मगर जितना उनके पास बढ़ते जाओ, वे उतने ही दूर होते जाते हैं."
"ताउम्र ढूँढता रहा मंज़िल मैं इश्क़ की / अंज़ाम ये के गर्द-ए-सफ़र लेके आ गया..." जगजीत सिंह की आवाज़ गुनगुनाने लगी... हलक की क़ैद से एक रूहानी हँसी छूट कर हवा में गूँजने लगी.

सपने में मरोड़ और ये बिखर गया...

साथ वाली प्लेटफॉर्म पर लगी ट्रेन की तेज़ सीटी और एक धक्के से होश आया. मैं सफर में था. मेरी रैटिना पर पहला अक्स उभरा, सामने वाली सीट पर बैठा वह नवविवाहित जोड़ा जो एक-दूजे से रेशा-रेशा चिपका था. वे हँस-हँस कर बातें कर रहे थे और इतना पास होने के बावजूद मुझे उनके शब्द सुनाई नहीं दे रहे थे.

मैं विभम्र की स्थिति में था...

रेल पटरियों पर जुगलबंदी करती हुई सरपट भाग रही थी. पहाड़, खेत, नाले, जंगल, गाँव-जवार, झोंपड़ियाँ, नदी, खाईयाँ... हरेक शै उल्टी दिशा में दौड़ रही थी. क्या वक्त इसी तरह से पीछे फिर सकता, उल्टे...उल्टे...!!! हवा में कोई हँसा ! मगर घोर दृष्टिदोष ! भाग तो मैं रहा था, वे तो वहीं थे...स्थाई रूप से... भूत और सच्चाई की तरह मजबूत... अटल ! 
मैं गेट पर आ कर खड़ा हो गया था और दरवाजे की हैंडिल पकड़ कर खड़ा रहा. हवा के झोंके पूरे बदन से टकराने लगे, गाड़ी की रफ्तार से शरीर हिचकोले लेता था. जानता था इस हालत में वहाँ वैसे खड़े रहना खतरनाक है, मगर मैं दिल की ज़िद से मज़बुर था! "कामेश्वर, जब बुद्घि कोई उपाय नहीं सुझाती तो दिल की जिद सुन लेने में कोई हर्ज नहीं...?" अपने भीतर कोई दार्शनिक की तरह कह रहा था, "और, साफ कर दूँ, दिल की सुन लेना जुनूनियत है! हर किसी के बस की बात नहीं...बस जज्ज्बा होना चाहिए"
अपने माज़ी से मुख़्तसर आवाज़ें गूँजने लगीं... "सुखसिंग, वह मर जायेगा देखना, उसकी बीबी, दो सुंदर-सुंदर बेटियाँ हैं... वह उनके सामने रोज ज़लील होना आखिर कितने दिन बर्दास्त करेगा ? मरेगा..." ये केवल सूचना थी या जुगुप्सा या बेचैनी या सहानुभूति...? ना तब तय कर सका था, ना अब. मगर सुखसिंग की आवाज़ में निश्चय ही कठोरता, भर्त्सना, उपेक्षा थी, "मरे, मरेगा ही, उसकी बीबी बेहद सुंदर है, देखा नहीं तुमने... बहुत सुंदर...! उस जैसी बेशक्ल वाले को ऐसी सुन्दर बीबी...! दस दुआर मुँह मारेगी, बीस जगह जूठी होगी... ये मरेगा नहीं...?" 
"छी:..."

और सचमुच एक रोज़ उस बेशक्ल वाले आदमी ने आत्महत्या कर ली, एक सुबह अपने ईष्टदेव के मंदिर के प्रांगण की सीढ़ियों पर बैठे-बैठे आप पर मिट्‌टी का तेल डाल कर लपटें उठा दी थीं. लपटों में अपनी ज़िंदगी के सब शको-शिकायतें, मलाल भसम कर गया. वह अफवाहों के कारण मरा था; उसके मरने पर तमाम अफवाहें फैलीं... 
मगर वह भला आदमी था, 
मगर शायद वह बेहद कमजोर आदमी था ? एक उदास... बेशक्ल वाला आदमी...
...और एक दिन मंदिर की सीढ़ियों पर आत्महत्या करना जिसकी नियति थी... बिल्कुल उसी तरह, जैसे एक निहायत खूबसूरत पत्नी पाना... 

मैं झटके खा रहा था. सामने नंग-धड़ंग बच्चे खेतों में जमे पानी में नाचते-कूदते धम्मा-चौकड़ी मचा रहे थे. एक-दूसरे पर कच्ची मिट्‌टी के ढेले फेंकते... धीरे-धीरे वह दृश्य भी पीछे गुजर गया... 

उस आदमी की दो बेटियाँ थीं, प्यारी-सी बेटियाँ... जवान होती हुई बेटियाँ... इंद्र की एक अप्सरा का नाम मिला था बड़ी को  और वह अपने पाए हुए नाम को साबित भी करती थी; कि इस पर सिर्फ उसी का हक़ हो सकता था. साँवली सुरबाला ! 
'कामेश्वर, फासले तब तक होते हैं जब तक तुम कदम उठाने से हिचकिचाते हो...'
'मगर कुछ फासले फिर भी बाकी रह जाते हैं"'
'अपने दर्शन को ले कर एक दिन नेस्तनाबूद हो जाओगे, देखना तुम... हुँह्‌...!'

जेहन में ख्यालों की आमद एकाएक सुस्ताई तो मैं अपनी सीट पर दोबारा आ बैठा. मैं मृत्यु से बच कर आ गया था, जो मेरे कदमों तले गेट के पायदान के नीचे सरपट भाग रही थी. लेकिन मैं मर चुका था! बहुत पहले, बहुत-बहुत पहले... 

'कामेश्वर, तुम पागल हो, बेवकूफ़ हो, तुम्हारी इस जैसी बोसीदा-कल्लर कहानियाँ पहले भी बहुत दफे बताई जा चुकी हैं. बेकार की मशक्कत कर रहे हो. सिर्फ खुद को तसल्ली देने के लिए, सिर्फ खुद को खुद के सामने अफ़सानानिगार साबित करने के लिए...' 

ट्रेन के बाहर बारिश पड़ने लगी थी. प्रदेश में पिछले कुछ दिनों से मानसून के दिनों के आने के संकेत मिलने लगे थे. चट से जोरदार बरसात...! खिड़की के शीशों से टकराती ज़िंदा बूँदें भीतर चू कर, मेरे बदन से मिल कर कुछ अपनापा जताने को बेताब हुई जा रही थीं. मैं मन मार कर नव विवाहित धनाढय बंगाली जोड़े को चोर नज़र से बार-बार ताक लेता था. उन्हें भी बारिश पसंद आ रही थी. लड़की के चेहरे की पुलक उस खुशी की शिनाख्त कराने को उभर आई थी. लड़कियों को बारिश में भीगना भाता है, यह उनका मौलिक-निजी मनोविज्ञान है. 
तालाबों में, हरे खेतों के बीच जिनका ठिकाना बना था, नए-नए ताजे उजले गुलाबी चमकदार कंवल खिले थे, चौड़े-चकत्ते पत्तों के ऊपर तैरते... पहाड़ पर बादल थे. लंबी पहाड़ी श्रृखंला का  आसनबोनी और राखामाइंस स्टेशन के बीच हिस्सा... कह सकता हूँ, हरे-भरे समृद्घ पहाड़ों पर मैंने भी "बाबा"  की तरह 'बादल को घिरते देखा है', तिरते देखा है.

वो पहाड़ों के आँचल में पसरी हरियाली बस्ती में रहती थी. कहा करती थी, "तुम आओगे तो हम घूमने चलेंगे. तुम आना. आओगे ना ?" 
"घूमने, कहाँ ?"
"पहाड़ पर." 
"पहाड़ पर ?"
"हाँ, कितना अच्छा लगता है ना पहाड़ पर... ऊपर... और ऊपर चढ़ते जाने का मन करता है. और वहाँ से पूरी दुनिया कितना सुंदर, कितनी सूक्ष्म लगती है. खुद के वृहत्तर हो जाने का अंह होता है, पहाड़ के साथ पहाड़ जैसा वृहद्‌... और सबसे बड़ी बात, वहाँ ज़मीन और आसमान के बीच सिर्फ तुम और मैं होंउंगी बुद्धू... सिर्फ तुम औ..." तब नहीं जनता था कामेश्वर कि, पहाड़ों के साथ रहने वाली, पहाड जैसी ही कठोर भी हो जायेगी... कामेश्वर ने पूरे आवेश से उसके दहकते कपोलों को अपनी अंजुली में भर लिया, माथे पर एक गाढ़ा चुम्बन दिया...  
"तुम इतने अच्छे क्यों हो ?" इंद्र की अप्सरा जानना चाह रही थी. 
सफेद धारियों वाले नीले फ्रॉक में रोशनी का एक पुंज साथ चल रहा था... कामेश्वर उसके तिलिस्म के दायरे में कैद होता जाता. कदम-दर-कदम, साँस-दर-साँस, तारीख-दर-तारीख... सम्मोहन के पार दूसरी दुनिया में जहाँ दो साँवरी-साँवरी बाँहें होतीं. मधुसिक्त रक्तिम होंठ होते और उन पर इसरार होता, "आज सजीव बना लो/अपने अधरों का प्याला/भर लो, भर लो, भर लो इसमें/यौवनमधुरस की हाला..."

एक अभिशप्त अप्सरा...

कामेश्वर नवविवाहित जोड़े को देखता है, वे मुँह जोड़े बैठे हैं. क्या इस हद तक एक-दूसरे में गुम हुआ जाता है, जा सकता है ? शायद हाँ, तो इसमें ताज्जुब क्या ? क्या उसने और "उसने" भी ऐसे ही गुम कर देने वाले पलों की चाह नहीं की थी...? चाहना और चाह को नेमत की तरह पाना हमेशा कहाँ हो पता है...

बारिश पीछे छूट गई है... बरसने वाले बादलों की टुकड़ी पीछे कहीं ज़मीन के किसी टुकड़े पर बंधी रह गई...  
अब अस्ताचलगामी सूरज की सुनहली आखिरी किरणें काले बादलों के एक धब्बे की आड़ से झाँक कर अपनी अंतिम आभा बिखेर रही थीं. ताकि बूझने से पहले निशाँ छोड़ जाऐं, उष्मा छोड़ जाऐं... 
'तुम तो अपने उन दिनों को इस मुकाम तक ना पहुँचा सके, तुम्हारा दिन आधे जल कर ही बुझ गया!' 
कामेश्वर की तरफ नवविवाहिता एक बार कनखियों से देखती है, फिर हिना रचे हाथों से अपने बालों को चेहरे से हटाती हुई अपनी दुनिया में लौट जाती है. कामेश्वर उसकी मुस्कान की एक बेहद नाजुक कौंध में अपने लिए अजनबियत, तुच्छता और उपेक्षा का स्वाद पाता है. 

"बाबा के साथ मेरा सब चला गया कामे..." 
कामेश्वर चुप है. उसका बोलना बेकार है. वह धीरे से उसका सिर अपने सीने से दबा लेता है. कहना चाहता है कि मैं तो साथ हूँ हमेशा, पर खामोशी के ज़रिए इस बात को उसके अंदर डाल देना भी चाहता है, इसलिए बोलता नहीं, बल्कि उसे थोड़ा और कस लेता है. 
"सपनों से बाहर निकलो कामे", वह सिर उठा कर सीधे उसकी आँखों में देखती है, "बहुत मुश्किल हो गया है अब सब कुछ. वह दिन नहीं रहे... वह वक्त नहीं रहा. वैसा कुछ नहीं होने वाला जैसा हमने सोचा था." 
"क्या तुम भी वही ना रही", कामेश्वर घुटी-घुटी आवाज़ में कहता है. 
"हाँ, नहीं रही. कैसे रहूँ बोलो...?" कैसी पीड़ा उस आवाज़ में उस दम... कामेश्वर को कुछ समझ नहीं आ रहा. वह उसे और भी कस लेता है, बिल्कुल एक डरे हुए बच्चे सा, जो अपनी माँ से और भी चिमट जाता है, अगर वह एकाएक उसका हाथ छुडाकर जाने लगे... 
वह उसे अचानक आसमान का तारा लगने लगी है... दूर की आशा...! वह भारीपन उठाऐ गुरू स्वर में कहे जा रही थी, "सारी जिम्मेदारी चाचाजी ने संभालने की बात कही है. माँ और मुझ पर भी लोग जहान ने कालिख के छींटे उड़ाए हैं. माँ की तो ज़बान चली गई... बाबा के साथ मेरा सब चला गया... सब तुम्हारी आँखों के सामने है," एक सिसकारी शब्दों की गूँज के पीछे से फूटती है धीमे से, "तुम मेरे लिए बस एक नामुमकिन हकीकत बन कर रह गए कामे...". 
एक अप्सरा अभिशप्त हो गई थी, एक मामूली कमजोर इंसान बन गई थी... अपनी सादगी में, मज़बूरियों में, और फूटफूट कर रो रही थी...
 "मुझे अपना भरोसा दे सकती हो ना...तेरे चाचाजी से मैं मिलूँ..."
"खबरदार कामे...", आहत के चरमोत्कर्ष पर वो चिल्लाई थी, "भूल कर भी ऐसी गल्ती ना करना...वरना अबकी माँ और मेरी राख उड़ेगी... तुम यही साबित कर दोगे ना कि हम वाकई में रंडियाँ हैं... कि चाचाजी भी औरों की तरह यही मानने लगें कि माँ के कारण बाबा..., मोहब्बत नाम के रिश्ते को कोई नहीं जानता कामे कि उसका वास्ता दिया जा सकेगा... तुम हमारे बीच के इसी रिश्ते को गाली बना दोगे...छोड़ो रहने दो. यह खुबसूरत है कामे, इसे छोड़ दो ऐसे ही... मुझे जीते जी मरना तो है... पर माँ के लिए इतना तो करूँगी ही..."
कामेश्वर कहना चाहता है, कि मुझे भी मौत दे रही हो... पर निरूत्तर था, वह आगे भी कह रही थी, "अगर माँ ने ही प्यार भी किया तो क्या बुरा किया...किसी को दगा नहीं दिया... माँ परिवार को सब कुछ तो दे रही थी, क्या अपने को कुछ देने को चाहना उनका कसूर हो गया, कामे क्या तुम बात को, मुझको समझोगे ? मेरी माँ को समझोगे ?"
कामे सदमें की गिरफ्त में था, उसके जाने के बहुत देर बाद तक निशब्द...  आँख पोंछने और दिल को समझाने की फाल्तू कोशिश करता सा... उसके कानों में पत्थरों और टूटे हुए क़दीम पुलिया से टकराती स्वर्णरेखा का चीत्कार भर रहा था.

मैंने खिड़की के बाहर सुना, एक शोर अब भी था; दौड़ती ट्रेन की हाँफ पटरियों पर से शोर बन कर उठ रही थी... 
इक्कीस दिसंबर की एक सर्द भोर में, उसके सभी सपने ज़रीदार भारी लाल जोड़ा पहने, गहनों से लदे-फदे, सिर के नहर में कमला सिंदूर डाले सात फेरों के चक्कर में मेंहदी वाले हाथ उलझाए एक अजनबी के साथ गुम हो गए. 
'तुम सोचते रहो कामेश्वर, काश यह नहीं हुआ होता... काश, तो... यह कोई दूसरी दास्तां होती...! जिसे तुम मुस्कराहट और नशे में चूर होकर बांच रहे होते, जैसे वह बंगाली जोड़ा इस समय उसे जी रहा है...'

सामने बैठा जोड़ा अभी अचानक किसी उत्तेजना से खिलखिला उठा था, ठीक इसी पल गाड़ी पुल पर से गुज़रने लगी... और धड़धड़ाहट में उनकी हँसी धँस गई... मैं आँखें बंद करके एकबारग़ी चमक कर आँखें खोल बैठा था. अपने भीतर भी एक धड़धड़ाहट महसूस की. अपने आप को बहलाने के लिए कुमार शानू का कोई गीत गाने लगा, इतने धीमे कि सामने वाला जोड़ा सुन न सके. 
वैसे ही जैसे, वह बतियाते हैं और मुझे सुनाई नहीं देता !...

बुधवार, 4 अगस्त 2010

इश्क में नमाजी बन गया

इश्क में नमाजी बन गया अब तो
वो आवारा काफिराई जाती रही मेरी...
दर-ऐ-यार दरगाह बन गया मेरे वास्ते
सर नवाता हूँ मौला, वजू करता हूँ
शब-ओ-सहर सिर्फ़ नाम-ऐ-यार को...
वफ़ा की बंदिशें कहाँ किसको
होती नसीब ऐसे, ऐ साहेब मेरे
बंदगी का लुत्फ़ पाया बाद मुद्दतों...
वो मुस्काती ऐसे कि सारी नेमतें
डाल रही हो मेरी झोली में
ऐसा हो खुदा मेरा, क्यों पूजूँ बुतों को...
कितनी राहत है उस वक्त-ऐ-वस्ल में
तस्कीन देता हुआ उल्फत उसका
रब्बा इस हसीन माज़रे में उम्र तमाम हो...
०३/०८/२०१०

शनिवार, 31 जुलाई 2010

जख्मी सिपाही जैसे सपने

एक सर्वकालिक समसामयिक किस्सा है...
जिसमें, धुंध, धुंए और गर्द के बीच
जख्मी सिपाही की तरह बदहवास,
लहू से लिथड़े...जवान सपने
पड़े थे...
घायल होना जिनकी मौलिक नियति थी
ये कुछ ऐसा ही था जैसे,
पहली बार साईकिल चलाने की
कोशिश में गिरना और घुटनों का छिलना...
और लोग कहते थे कि
ऐसा होना ही था...
जो टकराता है... छीलता भी वही है, और दीवार
भी वही तोड़ता है...

सपने जब चोटिल होते थे,
चारों तरफ राहत के उजाले का
नामोनिशान नहीं था
जोर-जोर से कराहना भी मात्र संकेत था
और सारी भाषाएँ मूक हो गयीं थीं...

आसमान पर नज़र जाते ही, धूप के बरक्स
जली हुई हरियाली की पपड़ी
दिखाई पड़ती थी
और आस-पास की ज़मीन पर
बादलों के टुकड़े
नरम फाहों से बदलकर कठोर
पत्थर में तब्दील हो चुके थे...

हवा बार-बार...
नाम पुकारती हुई किसी तवन्गी प्रेमिका की
तड़प की तरह...
दूर से पास आती महसूस होती थी
पत्तों की खड़क, उसकी पायल की खनक
सी लगती थी...
मन बौखला कर किसी कोमल, गर्म
सीने में मुँह छुपा लेना चाहता था
आश्वस्त होने का बहाना भर ढूँढता रहता था...

कंटीली झड़ियों के सिरों पर...
सफ़ेद, गुलाबी, जामुनी, पीले, नीले फूल
खिले होते थे...
गंधहीन, वैविध्यमयी...
फिर भी मौसम की सही पहचान करना
मुश्किल था

कानों में "साइरन" गूंजती थी... भयावह...
कोई भी सूचना तसल्ली देने के लिए नहीं आती थी

लगातार... उन दिनों,
सूरज का उगना, रोज-रोज,
सारी नयी अपेक्षाओं
के वावजूद कितना बासी लगा करता था !

कामयाबी मुश्किल चीज तो नहीं...
पर मुँह चिढ़ाकर दूर भाग जाया करती थी...
मछली की तरह फिसल जाती थी...
नौसिखिए हाथों से

और जाल बुनना, या तो आता नहीं था,
या मरजाद बेचकर नंगा हो जाना था,
या बेहद महंगा सौदा था !

खिड़की के बाहर
दूर सड़कों पर खालिस कच्ची उम्र की लड़कियाँ,
दुपट्टा उड़ाए जाया करती थीं...
कुछ सपने वहाँ भी पैदा होते थे
और आवारा करार देकर सड़कों पर ही मार डाले जाते थे...

बाजारों में त्यौहार थे...
पड़ोस में गीत गूंजा करते थे...
बहुत से करीबी दोस्त
अचानक बड़े शहरों में गुम हो जाया करते थे

इन सब बेतरतीब प्रसंगों के घटित होने के बीच...

सपनों के भीतर
सपने कई बार टूटते थे, पसीना बहता था और
दीवार की घड़ी अपनी रफ़्तार से बाज़ नहीं आती थी.

फिर भी सपने तो जादूगर थे...
फुसला कर प्रतिबद्ध कर देते थे...!

काफी दिनों से सीने पर
एक खूंटा गड़ा था
जिस पर टंगी तख्ती पर -
"लड़ाई" - शब्द तीन बार तिहराया गया था...

ये एक ऐसी आत्मकथा के टुकड़े हैं,
जो अमूमन सबकी नौजवान एडियों में
कभी गड़े थे
और रह गए हैं...
स्मृति-चिन्ह की हैसियत से...

इस पूरे किस्से का तर्क यह है कि,
सीने पर लड़ाई की घोषणा वाली तख्ती
टांग लेना ही बड़ी बात होती है... और
जख्मी सिपाही बनना,
दूसरी बड़ी बात... !

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

बाग में बैठी हुई लड़की..

बाग में बैठी हुई लड़की
के इर्द-गिर्द
की पूरी दुनिया गुम है उसके लिए
बस लड़की है
और वो बैठी है...

लड़की चुप है या कुछ बोल रही है
कोई नहीं सुन रहा है...
वो किसी और के सुनने के लिए नहीं,
खुद के लिए बोलती है
वो धीरे-धीरे गुनगुना भी रही है...
वह संगीत भी सिर्फ़ पेड़ों की शाखों को झुलाने के लिए है...
वो फूलदार झाड़ियों, साफ़ नीले आकाश,
हरी घास से होते हुए सपनों में झांक रही है
अपने-आप में गहरे उतरी हुई है,
इसलिए अभी बाहर वालों से महफूज़ है...

लोहे की एक बैंच पर बैठी
जाने क्या सोचकर-गुनकर
रह-रह कर
जोर से
सिर्फ़ अपने लिए खिलखिलाती हुई
लड़की
और कोने में फूलों के झाड़ पर बैठी
पर फडफडाती
सुनहरी तितली में
एक बारीक़ साझेदारी तो है,
खुल कर पंख फ़ैलाने की आजादी में...
एक शर्त लगी है, कि
कौन ज्यादा मचल कर
उड़ सकता है !

बाग में बैठी लड़की
उड़ रही है...

और इसे या तो वह जानती है या
शायद वह तितली !

०८-०९-१०-१३-२०.०७.२०१०

लघुतर लिंग वाली जिन्दगियाँ...

उन दिनों जब
उनके लिए
बाकी और दिनों की तरह ही
नींद के बाहर गुलाब थे
सपनों के भीतर नश्तर !
सलीके से कुछ भी नहीं था
सिवाए लड़ने की मनोदशा के...
लेकिन ऐसा कुछ सोचते ही विरोध की हवा
बदबू मारने लगती थी
बाहर वाले दरवाजों पर सांकलें चढ़ा दी जाती थीं
और किन्हीं पुरानी किताबों से निकले हुए नियम
संस्कारों के चाबुक पर लागू किये
जाते थे...
फिर भी ऐसा होना था कि
लघुतर लिंग बताई गयीं जिन्दगियाँ

जहाँ एक तरफ
स्वेटर बुन कर दोपहर बिताया करती थीं, या
बच्चों की सुडकती नाक पोंछ रही थीं, या
चहबच्चे मे पानी भर रहीं थीं... या ऐसे ही कई
सनातन घरेलू काम-काजों में उलझाकर
रखने की साजिश की शिकार थीं

लेकिन दूसरी तरफ...
वायुयान उड़ा रही थीं,
पहाड़ों पर चढ रही थीं,
पदक जीत रही थीं...
सड़कों पर नुक्कड़ नाटक खेल रहीं थीं
किताबें लिख रहीं थीं...
और-और-और... और भी बहुत जगह
बिल्कुल उसी एक ही समय के समांतर
वह, लघुतर लिंग बताई गयीं जिन्दगियाँ,
व्यवस्था के पायों में बंधी हुई भी थीं
और घोषित ताकतवर विपरीत लिंग वालों से
दो कदम आगे भी थीं...!

लड़ाकू बनाना और
उपलब्धियां गिनाना
एक जरूरत की मानिंद, वक्त और
तारीखों का काम होता है, वक्त जरूरत पैदा
करता रहेगा...
तारीखें गवाही देती रहती हैं, देती रहेंगी...
लघुतर लिंग बताई गयीं जिन्दगियाँ...
हरदम अब, दो कदम आगे रहने
के लिए कदम बढ़ाती रहेंगी...

क्योंकि, उनके लिए
नींद के बाहर हमेशा गुलाब रहेंगे
और सपनों में कांटे-खलिश-नश्तर...

१९-२०/०७/२०१०.

रविवार, 11 जुलाई 2010

युवा वर्ग के कलमनवीशों से एक आग्रह...

रचनाकर्म एक गंभीर और शालीन कर्तव्य है, इसे आप सब भी जानते-मानते होंगे. ख़ामोशी से रचते जाना भी एक कला है... दोस्तों, साहित्य अकादमी से पुरस्कृत नीलाक्षी सिंह का उदाहरण सामने रखूंगा. लगातार, कम मगर, बेहतरीन लिखने के बाबजूद वह कभी किसी भी मंच पर मुखर होती नहीं दिखाई देतीं. वे भी युवा हैं, गजब की प्रतिभाशाली. अब तो आज के युवाओं से थोड़ी सीनियर ही कहूँगा.
अपने बैंक की नौकरी के सिलसिले में जब वह जमशेदपुर में थीं, तब भी किसी कार्यक्रम में नहीं आती थीं. ना तो हमारी प्रलेसं की कथा गोष्ठियों में, ना तो संगमन -१२ में ही आयीं. लगभग गुम... (उन्हें अंतर्मुखी या भीरु तो कतई नहीं कह सकते. पुरुषवादी व्यवस्था के विरुद्ध उनकी कहानियाँ इसका प्रमाण हैं) फिर कथादेश के नवलेखन अंक में (शायद) स्त्री-पुरुष सम्बन्ध पर एक अविस्मरणीय कहानी लेकर उपस्थित हुईं.
उनकी बड़ी बहन शीताक्षी सिंह भी बहुत काबिल लेखिका रहीं, मगर अब पता नहीं क्यों नहीं लिखतीं. मुझे सचमुछ खेद है कि, मैं नहीं जानता इनके बारे में.
तो कहने का मतलब ये हुआ की, बडबोलापन और हर जगह, चीखना-चिल्लाना, बहस या विवाद में बने रहना, लेखक और लेखन के लिए कतई गैर-जरूरी चीज है. युवा मित्रों, इसी संदर्भ में महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर से भी सीखिए...
आपकी कला बोलेगी, उसी को समर्थ करने के लिए श्रम करिये.

रविवार, 23 मई 2010

प्रेम की कविता

सुनो,
प्रेम पर कवितायेँ लिखने का
मौसम फिर नहीं आएगा...
धुँए और गर्द की दीवार के आरपार
धूमिल होती हुई लौ को
सँभालने का
दौर फिर नहीं आएगा...
किसी फरेब में उलझे मत रहना,
तुम्हारी पक्षधरता का इम्तिहान
फिर नहीं आएगा...

अभी शहरी और गैर-शहरी
जंगलों में हुए
मासूम हत्याओं को
क़त्ल साबित करने में
वक्त लगने वाला है बहुत,
मगर अन्तोगत्वा जब अपराध सिद्ध हो जायेगा,
तब रोटी खुरचने पर कातिलों की
शक्ल उभर आएगी...

जान लो कि,
क्यों आसमान के चेहरे पर
लाल इन्द्रधनुष खिला रहता है आजकल...
क्योंकि जिनकी कमर पर चर्बी है,
कानून की भाषा और अस्मत
उनकी कांख में दबी है,
एडियों पर गिरवी है...
पहचान लो और
दर्ज करो इस समय को...
जहाँ सत्ता सिर्फ़ एक बेहया
कामोत्तेजना जैसी है...

गिद्ध भी सफाईकर्मी हैं,
किरदारों को तवज्जो देने में
समय लगता है...
लेकिन आखिरकार,
सफेदपोश दीमकों, तिलचट्टों और कौओं
का जोर कम पड़ जायेगा...
राइफलों के कारतूस ठस्स हो जायेंगे...
धान की बालियाँ बेखौफ़ हो जाएँगी...
पसीने वालों को उनका लंबित महत्त्व
अदा किया जायेगा...

तो उस और इस समय के बीच
खून के कतरों से नम,
और उत्साह में पगी हुईं,
प्रेम पर कवितायेँ लिखो...
ये जरूर लिखी जानी चाहियें...
क्योंकि प्रेम करते हुए भी प्रतिशोध
लिया जा सकता है
इस बर्बर समय से...

-शेखर मल्लिक
२१-२२-२३/०५/२०१०
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