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मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

औरत की भाषा


औरत के पास यों तो कई भाषाएँ होती हैं...
उसकी पहली और पुख्ता भाषा - प्रेम - है...
मगर जो अपने आप में लगभग
बेज़ुबान होती है...!
इतनी खामोश कि जिसे सिर्फ सुना नहीं जा सकता...!
औरत कहती नहीं कि
उसकी भाषा के बाहर
कहीं भी
कोई भी
उससे अलग रह सकता है ! मगर यह सच है...

वह आदमी जिसे वह अपना समझती है
अपनी भाषा से उसे पहले पहल बांधती है,
जो नहीं बंधता, वह उसका नहीं होता...
इसमें कुछ भी अनर्गल नहीं होता क्योंकि,
आदमी की आँखें जहाँ काम करती हैं, छिछला सा...
उसी जगह औरत, भाषा गढती है, उसे करीने से रखती और
आँखों की मानने के बजाय सबसे पहले एक अंदरूनी भाषा ईजाद करती है...
जिससे वह थाह सके सामने वाले को, बेध सके या
बाँध सके उसे, जिसके सम्मोहन से वह खुद बंधना चाहती है...
औरत यह जादू जानती है...
इस जादू को जीवन भर मांजती है...
इस तरह वह पुरुष से अलग हो जाती है...

प्रेम को परखने का गुर उसके पास होता है,
जो उसके सामने भाषा की परखनली से छन कर आता है...

औरत अपनी भाषा का इस्तेमाल
बहुत सध कर करती है !
जबकि वह भी कभी-कभी सिर्फ औरत होती है, खालिस औरत तो,
अपनी भाषा के पैंतरों से खुद को सुरक्षित भी करती है...
और गैर-औरतों का भ्रम भी तोडती है...
भाषा उसकी ताकत है, जिसमें वह शत्रु का ध्वंस,
और अपने प्रिय को दुलार, एक ही प्रतिबद्धता से कर सकती है !.

'प्रेम' जैसी भाषा की सारी शब्दावली
और व्याकरण --
पूछना औरत से,
और हो सके तो सीखना
कि कैसे हो जाती है,
भाषा उसके पास
एक कला, एक कवच और एक कटार !

सोमवार, 3 अक्टूबर 2011

चीखो

एक ऐसे सपाट दुनिया के,
जिसे भूगोल की किताबों में अंडाकार बताया गया है...
तुम और मैं जैसे लोग हाशिए के भी बाहर कहीं गैर परिभाषित जगह पर हैं...
हममें अभी खिलाफत में चीखने की कूवत बाकि है...
सारे फैसले बेशर्मी की आला मिसाल हैं और
पानी के अनुपात की तर्ज पर जहाँ का एक तिहाई हिस्सा
नृशंशता की हद तक गैर-बराबरी का है,
यह उतना ही क्रूर और ठंडा है, जितना कसाई के छुरे का वार...
इसको समझना मुश्किल नहीं है...

चूँकि बताया जा रहा है कि प्रतिदिन ३२ रूपये खर्चने वाला
एक आर्थिक हैसियत या पैमाना बताने वाली उस अदृश्य रेखा के ऊपर है ! और...
इसलिए यह एक बेशर्म मजाक है ! इस पर हँसना कुछ इस तरह का आत्मपीडक काम है जैसे,
पुराने घाव के भीतर सलाखें भोंकना...
लगातार...
कुछ अनचीन्हे मुखौटों के पीछे छुपी हुई आवाजें
हौलनाक लतीफें सुनाती हैं कि
अमुक तारीख को
तुम्हारा वजूद बदल कर रख दिया जायेगा...
और तुम उस तारिख के तुरंत बाद खुद को पहचानने से इंकार कर दोगे...! 
पूछोगे किससे, क्या यह सच है ?

इस दुनिया के हाशिए से बाहर होने के बावजूद...
वे हमें डराने के लिए मजबूर हैं, कि उन्हें भी हमसे उतना ही डर है !
इसलिये यहाँ हत्यारों के चेहरे की मासूमियत तुम्हें दंग कर सकती है !
और यही बात उनके फायदे की है...!

 "इंसानियत", "इन्साफ" "ईमानदारी", "इंकार: और "इन्किलाब" जैसे
शब्दों में जरूर कोई बहनापा है,
इसलिए ये इनके शब्दकोष से सिरे से अपने अभिधेयार्थ सहित गायब हैं !!!

चीखो-चीखो-चीखो...!
क्योंकि २३ मार्च को फाँसी पर चढ़ने वाले उस तेईस साल के जाट नौजवान ने
कहा था, "ऊँचा सुनने वालों को धमाकों की जरूरत होती है !"

सोमवार, 21 मार्च 2011

महिला दिवस बुनियादी तौर पर श्रम की गरिमा का प्रतीक है



भारतीय महिला फेडरेशन
जिला इकाई  इन्दौर


प्रेस विज्ञप्ति


महिला दिवस बुनियादी तौर पर श्रम की गरिमा का प्रतीक है


इन्दौर] 12 मार्च 2011-

बाजार की कोशिश है कि हर चीज अपना असल अर्थ खोकर ऐसे अर्थ पा ले जिससे वो बाजार के मुनाफे की हो जाए। आजकल महिला दिवस पर सौंदर्य प्रसाधन और तरह&तरह के वस्त्राभूषण बनाने वाली कंपनियाँ फैशन शो आयोजित करती हैं। मीडिया भी ऐसी चीजों की नुमाइश करता है। लेकिन ये सम-हजयना जरूरी है कि महिला दिवस सिर्फ औरतों के पहनने-ंउचयओ-सजय़ने या सिर्फ पिकनिक&पार्टी का ही दिन नहीं है। ये दिन उन कामकाजी महिलाओं की याद में मनाया जाता है जो अपने हक और श्रम के सम्मान की खातिर शहीद हुईं।
महिला दिवस के कार्यक्रमों की श्रृंखला में भारतीय महिला फेडरेशन और घरेलू कामकाजी महिला संगठन ने मिलकर 11 मार्च 2011 को कामकाजी महिलाओं के संघर्ष और उनकी ताकत विषय पर व्याख्यान] एक नाटक और महिलाओं की रैली का आयोजन किया गया। अर्थशास्त्री डॉ- जया मेहता ने अपरोक्त बातों के साथ ही बताया कि सरकार के वित्तमंत्री ने हाल का बजट पेश करते हुए कहा कि हमारे देश में अनाज का उत्पादन तो ठीक हुआ है लेकिन वो एक जगह से दूसरी जगह तक कुशलता से पहुँचाया नहीं जा सका इसलिए अनाज का परिवहन ठीक करने के लिए उसे रिलायंस जैसी कंपनियों को दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि एक तरफ सरकार खाद्य सुरक्षा कानून को लगातार टालती जा रही है और दूसरी तरफ अनाज को विशाल कंपनियों के चंगुल में फँसाना चाहती है जिनका मुख्य मकसद गरीब जनता का पेट भरना नहींे बल्कि मुनाफा कमाना है। अन्य पोषण सामग्री तो छोड़िए देश के लोगों की आधी आबादी को अनाज तक नसीब नहीं होता। इन सब लोगों में भी औरतों की हालत बद से बदतर है। देश की 45 प्रतिशत महिलाएँ रक्ताल्पता यानी एनीमिया से पीड़ित हैं। कमजोर माँएँ कमजोर बच्चों को जन्म देती हैं। नतीजा ये है कि हमारे देश में कुपोषित बच्चों की तादाद दुनिया में सबसे ज्यादा है। इन कमजोर बच्चों का मस्तिष्क भी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता। जिन्हे भरपेट खाना तक नहीं मिल पाता, वे भला खाते&पीते अमीर और मध्यम वर्ग के बच्चों के साथ किस तरह तरक्की की दौड़ में बराबरी से दौड़ सकते हैं।
उन्होंने ये भी कहा कि आज चाहे मजदूरों के संघर्ष हों या दलितों] आदिवासियों] किसानों के] हर संघर्ष की अगली कतार में बहुत बड़ी तादाद में महिलाएँ आयी हैं। उनके भीतर संघर्ष के लिए जरूरी ताजगी भरी उर्जा मौजूद है। संसद के सामने 23 फरवरी का प्रदर्शन हो या 24 फरवरी की आँगनवाड़ी व आशा कार्यकर्ताओं की रैली, दोनों में ही महिलाओं ने दिल्ली की सड़कों को जाम कर दिया। इस लड़ाई को और प्रभावी तौर पर लड़ा जाना जरूरी है वर्ना बाजार गरीब-ंउचयमेहनतकश महिलाओं व पुरुषों को जीने ही नहीं देगा।
शहीद भवन पर आयोजित इस सभा को संबोधित करते हुए घरेलू कामकाजी महिला संगठन की ओर से सिस्टर रोसेली ने कहा कि महिलाओं को भी ये सम-हजयना चाहिए कि उनकी समस्याओं का हल धार्मिक जुलूसों में शामिल होने से नहीं निकलेगा। उन्हें संगठित होकर अपनी लड़ाई लड़नी होगी। हमें उन्हें जोड़ने के और मजबूत उपाय करने चाहिए। आँगनवाड़ी यूनियन की अनीताजी ने कहा कि 21 बरस से लड़ते&लड़ते उन्होंने रु- 275 मासिक से 1500 और अब 3000 का वेतन हासिल हुआ है। ये लड़ाई जारी रखनी होगी नहीं तो सरकार कुछ नहीं देने वाली। सभा को निर्मला देवरे और मनीषा वोहल ने भी संबोधित करते हुए कहा कि हम मजदूर औरतों को एक&दूसरे की मदद के लिए साथ आना चाहिए तभी बाकी महिला मजदूर भी हमसे जुड़ेंगी और सुरक्षा की भी गारंटी होगी।
भारतीय महिला फेडरेशन की सचिव सारिका श्रीवास्तव ने गतिविधियों का ब्यौरा देते हुए पिछले वर्ष के दौरान दिवंगत हुए कॉमरेड अनंत लागू और कॉमरेड राजेन्द्र केशरी को सभा की ओर से श्रृद्धांजलि दी। सभा का  संचालन किया पंखुड़ी मिश्रा ने।  सभा के अंत में महिला मजदूरों के संघर्षों पर आधारित एक नाटक की प्रस्तुति हुई जिसमें गारमेंट फैक्टरी में काम करने वालीं, बीड़ी बनाने वालीं] भवन निर्माण मजदूरी करने वालीं और जमीन से बेदखली की परेशानियों से लड़ने वाली आम मेहनतकश महिलाओं के जीवट और जोश की कहानियाँ थीं। नाटक का शीर्षक था जब हम चिड़िया की बात करते हैं। नाटक में पंखुड़ी] रुचिता] सारिका] नेहा] शबाना] रवि और आशीष ने अभिनय किया।
सभा व नाटक के उपरांत महिलाओं ने शहीद भवन से मालवा मिल चौराहे तक नारे लगाते हुए जुलूस निकाला।
इससे पहले 8 मार्च को कल्पना मेहता ने स्वास्थ्य की राजनीति का शिकार बनतीं महिलाएँ विषय पर व्याख्यान दिया था और बताया था कि किस तरह अमेरिका व अन्य  विकसित देश तरह&तरह के गर्भ&निरोधक भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों की महिलाओं पर आजमाते हैं और अशिक्षित व जागरूकताहीन जनता की जिंदगी के साथ नेता] अफसर और कंपनियाँ गिरोह बनाकर खिलवाड़ करती हैं।

प्रति
सम्पादक महोदय]
प्रकाशनार्थ / प्रसारार्थ

संपर्कः

सारिका श्रीवास्तव
सचिव] भारतीय महिला फेडरेशन] इन्दौर इकाई- शहीद भवन] 65] राजकुमार मिल ओवरब्रिज के नीचे] न्यू देवास रोड] इन्दौर- मोबाइलः 9425096544

रविवार, 21 नवंबर 2010

घाव

एक घाव है...
मारे डर के,
जिसका दर्द मैं दिमाग के हाशिए पर डालना चाहता हूँ
और गौर-तलब है कि, ऐसा करने की कोई राह भी नहीं सूझती...
वह घाव बदन के उस हिस्से में खुदा हुआ है
जिसके ठीक नीचे का अवयव
रक्त को पूरे शरीर में दौडाते रहने की क्रिया में संलग्न है
और बिना पूछे धडकता रहता है...ढीठ सा...
जब मैं नींद में शिथिल होऊँ... तब भी !
दिमाग के साथ यही तो खटता रहता है...
और सबसे ज्यादा मार इसी को लगती है... अंदरूनी तौर पर...

यह जिस घाव की मैं बात
(बगैर यह फ़िक्र किये कि यह किस्सा आपको उबाऊ भी लग सकता है)
कर रहा हूँ...
यूँ ही अचानक किसी चोट से पैदा नहीं हुआ !
यह घाव चेतना के रंदे से अपने आप को तराशे जाते समय घटित हुआ...
और बना हुआ है तब से, या कहूँ और गहरा, और फैला है तब से
पूरे मेरे वजूद में फैल गया है...रिसता - टीसता हुआ,
जिसका केन्द्र कहाँ है, यह ऊपर ही उल्लेख कर चुका हूँ !

सारे बौद्धिक वैद्य लक्षण सुन लें...
इस घाव की टीस तब उभर जाती है...
जब अख़बारों में हत्या होती है, और बलात्कार के किस्से
'चाय-बिस्कुट' के साथ निगले जाते हैं...
फिर जब सारे संसाधन पूँजी की थैली के मालिकों-वारिसों-दलालों
के पेट में जमा कर लिए जाते हैं और बाकि अधिकांश लोग
भूख जैसी संगीन बीमारी से सड़क पर "ऑफ द रिकॉर्ड" मर जाते हैं
पेट को हाथ से भींचे हुए...मरते हुए... उस दर्द को घटा पाने के इरादे से, मगर नाकाम !
और खबरनवीसों को इसकी "खबर" नहीं होती ! चूँकि यह मसला 'बाजारू' नहीं होता है !
तब जब स्कूल जाती या कॉलेज में चंद दिनों पहले दाखिल हुईं लड़कियाँ
अचानक मंडपों में
किसी औजार, करेंसी नोट के पुलिंदे या गंवार बैल के साथ
मुंडी झुकाए गिन-गिन कर सात चक्कर लगाती हुई पाई जाती हैं
और तब जब मरता हुआ आदमी आज का सबसे बड़ा कमाऊ विज्ञापन
बन कर खबरिया चैनलों पर 'चौबीस गुना सात' की पूरी अवधी में चिपका रहता है
और तमाम शर्म हमारी पेंदी से टपक चुके होते हैं...

और तब...और तब...और तब... गिनाने को कई सारे मौके हैं...
यानि इस घाव की टीस का स्थायीकरण हो गया है !

कुछ और लोग इस या इसी तरह के घावों को चाटते, सहलाते या
'तमगे' की तरह फक्र से टांगे हुए
या भिखारी की हथेली की तरह दयनीयता का रूपक बनाते पाए जा सकते हैं...
वह हर तरह की जिम्मेदारी की हद से बाहर के होते हैं...
और महज एक सफल या महत्वाकांक्षी उद्यमी की तरह इसका विज्ञापन करते रहते हैं...
वह और बात है कि मैं उनकी जात-बिरादरी से बाहर हूँ... और गनीमत है !

घाव में इकठ्ठा हुआ मवाद कभी-कभी उछल कर मुँह में भी भर जाता है
और मैं उसे थूक कर उससे कुछ देर के लिए मुक्त हुआ मान लेता हूँ...
मगर फिर वह कसैला-कडुवा स्वाद मेरे स्नायुओं में बहते रक्त में मिल जाता है
और 'नमक' में बदल जाता है...जो बे-ईमान हो नहीं सकने से मजबूर है !

ऐसे समय में मैं कुछ ज्यादा ही चौकन्ना हो जाता हूँ... चुपचाप बकता रहता हूँ...
और उँगलियों पर घड़ी की तरह समय काटने लगता हूँ...

मैं भी तो इस समय इस घाव की व्याख्या करते हुए
शाब्दिक कलाबाजी करते हुए आखिर एक खेल ही तो खेल रहा हूँ...
जबकि भरसक इससे बचने की कोशिशें की हैं...
उफ़, कितना हिंस्र हो गया हूँ मैं...
कितना बर्बर हो गया हूँ... जिसे
सभ्यता की परिभाषा गढ़ने वाले
मस्तिष्कों के भ्रम की आड़ में विकसित किया गया है... यह भी एक किस्म की
शराफत के रैपर में लिपटी चालाकी है...
और इसलिए विपणन का इरादा नहीं होने पर भी... कहीं बिक भी जा सकता हूँ... इन शब्दों सहित मैं !

लो, इतना कुछ बताते-सुनाते-कुरेदते...
इस दौरान कब फिर से वह घाव टीसने लगा है...
और मुझे मालूम हैं, फिर किसी गडबड से उपजा है यह दर्द,
जिसे दिमाग के हाशिए पर डालना है मुझे...
यह दर्द, जो कतई किसी किस्म की मक्कारी नहीं है !

बुधवार, 10 नवंबर 2010

"तरबूज का बीज" के बहाने नयी दासता का आख्यान

"परिकथा", सितम्बर-अक्टूबर, २०१० में अरुण कुमार 'असफल' की लंबी कहानी - "तरबूज का बीज" कल और आज की सिटिंग में पढकर पूरी की... यह कहानी समकालीन कहानियों में अदभुत है... एक मिथकीय अहसास अथवा रूपक के द्वारा लेखक समकालीन परिस्थितियों का अत्यंततीखा और संश्लिस्ट चित्र उपस्थित करता है. यहाँ किसानों की आत्महत्या प्रसंग... उसकी उर्जा और क्षमता का बहुराष्ट्रीय निगमों द्वारा नृसंश दोहन... नए बनते परिवेश में हताश किसान का अलग ढंग से मजदूर बनते जाना, जिसका खेत और श्रम पेशगी देकर खरीद लिया जा रहा है... अपने रक्त से सींची धरती से उपजे फसल के प्रति किसान की सहज आत्मीयता और पागलपन की हद तक ममता... उसका सशरीर गलते चले जाना, इस भ्रम में कि इस लाभ से कुछ सार्थकता उसके हिस्से भी आएगी, जिससे वह कर्ज से मुक्त हो सकेगा, वह पूंजीपतियों के ही हाथों की कठपुतली भर बन जाता है... जिसका अपने ही खेत के सामने मजूर की हालत में हाथ जोड़कर 'बीज वाले' ताकतवर वर्ग के सामने निरीह खड़ा हो जाना, मानों खेत के असल मालिक वे हों... वह आधुनिक दौर का 'बंधुआ मजूर' ! और फिर भी अंतत: एक दारूण अंत... !!!
'असफल' जी ने 'बीज' के रूपक के माध्यम से आदमी को उत्तर आधुनिक इस काल-खंड में नए पैदा हुए बुजुर्वा वर्ग के लिए 'मनुष्य' से मुनाफा का फसल देने वाले "बीज" में रूपांतरित होते दिखाया है, जो वाकई रोंगटे खड़े कर देता है... इस कहानी से गुजरना बहुत से अलग-अलग कोणों से एक भयावह वस्तुस्थिति को देखना है... मुझे लग रहा है, यह कहानी लंबे समय तक याद की जायेगी... भाषा, शिल्प और अंतर्वस्तु... तीनों क्षेत्रों में गजब की निर्मिति और प्रस्तुति... यह अनयास ही नहीं है कि 'गणेशी के बाबा' द्वारा उगाए गए तरबूज का रस "खून" के जैसा है... तकनिकी युग में आदमी महज एक मुनाफा देने वाली मशीनी या श्रमिकीय इकाई में तब्दील है, जिसमें जाहिर है उसका रक्त मिला हुआ है... जिसे वह स्वयं सह नहीं पाता...
 'असफल' जी बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने आज के दौर में निश्चय ही पाठक को झकझोर देने में सक्षम यह कहानी लिखी...  

१०-११-२०१०, मऊभण्डार, घाटशिला.

रविवार, 15 अगस्त 2010

बचा हुआ है कुछ (कविता)

हालाँकि,

तिलमिलाए हुए
(जंतुओं जैसे)
मनुष्यों के पास
यदि बचा हुआ है कुछ,
तो कौड़ी भर वफ़ादारी,
हर सुबह असलियत की गर्मी में भाप
होने से पहले
उम्मीद की ओस
और
बेतरतीब टूटे हुए नाखून...

झड़ते हुए बालों से
उम्र गिनते हुए
बचे हैं धुंधले होते हुए
अभी, बाबूजी जैसे लोग...
और चौराहे पर रोज 'नगर-बस'
की प्रतीक्षा करती प्रेमिकाओं
के पास बची हुई है
सड़क के परले तरफ
खड़े प्रेमियों पर
एक नज़र उछाल देने की फुर्सत...
तमाम चीजें, दूसरी चीजों में
कुछ-कुछ बच जाने की उम्मीद में
बची हुई हैं...
और आदमी भी...इसी तरह...

लगातार एक ही जगह
खा-खाकर चोट
जो लोग तिलमिला रहे हैं...
उनके खुले जख्मों को
नमकीन हवा सहला रही है
और भूख, महंगाई, घोषणाएँ, वायदे,
तानें, उनींदी रातें... उन नासूरों में ऊँगली
घुसेड़ रही हैं
तो उनके पास बची हुई है,
बीस डेसिबल से कम हर्ट्ज की मातमी रुदालियाँ...

बदहवास आदमी का
बदरंग चित्र हवा में टंगा है
और बराबर पीछा करता है
राजपथ की चौड़ी सड़क के किनारे...
गुहार लगता हुआ, कि उसे बचा लिया जाय

शोर अब भी बचा हुआ है
सिर्फ़ संसद ही नहीं, साप्ताहिक हाटों में भी
अमूमन देश के सभी शहरों में...
बुद्धिजीवियों की कनफोडू-कलात्मक बहसें
प्रेक्षागृहों की दीवारें जज्ब कर रही हैं
इधर बचे हुए लोग
नारों और लाठियों के बीच खप रहे हैं...

पायी हुई आज़ादी की  असलियत, रूख और सच्चाई पर
आज़ादी की दूसरी रात से ही बहस जारी है
बहस करने के लिए बची हुई है
आज़ादी... और,
अगस्त महीने का पन्द्रहवाँ दिन बचा हुआ है,
इसको पूरी श्रद्धा से याद दिलाने के लिए ! हर साल...

तथापि,

नए लड़के नयी फसलों की तरह
नया स्वाद लाने के लिए कटिबद्ध
हैं और
उनसे अपेक्षित है इसके लिए होना प्रतिबद्ध
नसों में बहता खून बचा हुआ है...
देह और आँखों का नमकीन पानी
बचा हुआ है...

सीमा पर,
लोकतंत्र की मरजाद पर
लड़ने-मरने
के लिए बचे हुए हैं सर
और अपने दानों को बाइज्जत चुगने का
हक़ पाने तक
पूरी लड़ाई बची हुई है
अभी...

बन्दूक के बरक्स
कलम उठाने के लिये उंगलियाँ
और कलम में असर तय करने के वास्ते
सधे हुए ईमानदार विचार... बचे हैं,
थोड़ी ही सही, कहीं ना कहीं
साफ़ नीयत भी बची हुई है...
उम्मीद बची है... इसलिए,
खुशनुमा तबियत बची है.

पुराने चाकू अगर हैं
तो नई कोंपलों का आना भी बचा हुआ है.

सचमुच बचा हुआ है बहुत कुछ...

रविवार, 8 अगस्त 2010

एक असंबद्ध कविता का ड्राफ्ट

रक्त की बूंदों से भी
ज्यादा शुद्ध संभावनाओं की
अवैध हत्या की जाती है...
हरदम ठीक उसी क्षण से ऐन पहले
जब उनके पनपने की तेज गुंजाइश हो
या तब, जब उनकी धार तेज हो जाने का खतरा
कनपट्टियों को सुर्ख करने लगे

फिर मातमपुर्सी के लिए
गाहे-बगाहे कुछ सभायें आयोजित कर ली जाती हैं
और संतोष की सारी प्रायोजित खबरें
आसपास बिखेर दी जाती हैं...

जब 'मैं', 'तुम' और 'हम'
जैसे पुरुषवाचक सर्वनाम
एक खराब मशीन के
कलपुर्जे बनकर रह गए हों
फिर भी नपुंसकता का पता ही नहीं चलता
क्योंकि ये
अवसरवाद के नए व्याकरण और परिभाषाओं में
संकरित हो गयी है.

ऐसे अवसरवादी कालखंड में
जब हर कोई अपने अवसर भुना रहा है
हथेलियों और तलवों की खुजली मिटा रहा है
कोई गा रहा है,
कोई रो रहा है
कोई धो रहा है,
तो कोई ढो रहा है!
मकसद सिर्फ़ लेने या पाने से है...
और पीढ़ी के ज्यादातर लोग
सिर्फ़ इसी फ़िराक में डटे हुए हैं...

शवों पर रोने के लिए कुछ बेचारगियाँ हैं
जिनकी शिनाख्त कोई बड़ा मुद्दा नहीं है...
लोकहित की घोषणाएँ सिर्फ़ खुशनुमां मुहावरे हैं...
जिनको दातून की तरह चबा कर थूका जाता है
ना कि गन्ने की मानिंद चूसा जा सकता है !

सीना तान कर चलने वाली आवारगियाँ
कम हुई हैं...
सारे हौसले बाजार खा गया है
शर्म आईने की तरह टंगा है दीवार पर
दाँत मांजने के बाद अपने चेहरे का धुला हुआ अक्स
देखने के लिए...
पश्चाताप मुँह पर से पानी पोंछने के बराबर है
शराफत असल में
गुसलखाने या पैखाने
के चारखानों तक ही सिमट गयी है...
क्योंकि पूरे बाहर,
सिर्फ़ जो नंगई है, उसकी तासीर गज़ब की है !
इसको पकड़ने वाली आँखों पर
संभाव्य अवसर की संभावना की टाट झूलती है...
अत: वह नजरंदाज कर दी जाती है.

सारी विभत्सता के बाद
गुलाब बाग़ का सरकारी संपोषित, संरक्षित
गुलाब खिलता महकता रहता है
निरपेक्ष सौंदर्य का नमूना पेश करता है...
वही, जिसका बाजार अनुमोदन करता है,
जिसका सत्ता अभिवादन करती है...

लाल रंग हमेशा पीछा करता है...! सलाम करता है...
खून में दिखता है...
जहाँ बहता है, अपना वक्तव्य भी देता है...
उसको पढ़ने वाली नजर पर भी
दरबारी "ब्राण्ड" की मलाई चढ़ी होती है !
यह अफसोसजनक होने से ज्यादा
घृणास्पद है...

धर्म, विचार और पवित्र जुनून
जैसी संकल्पनाएँ व्यावहारिक रूप से
बेवकूफ बनाने का
सबसे कारगर विज्ञापन हैं...
यह कहना क्षोभ पैदा करने के समान है कि
संकट का छायाभास
खड़ा करना बहुत जरूरी चीज हो गयी है.
ऐसा इसलिए कि
संकट के कई रूपों और व्यक्तिवाचक संज्ञाओं पर
माल बिकने की संभाव्यता बढ़ जाती है.

सवाल करना भी
विरोध करना है
और विरोधी हो जाना यथास्थिति की ढूह को ठोकर
मारना है
सारे अवसादों के बीच भी
यह उत्साह कई गुना बढ़ा देता है...
यथास्थिति को तोडना
दरअसल आदमी हो जाना है...

सवाल करना और संभावनाएं पैदा करना
बेहद जरूरी और जायज हैं...बेहद...

सोमवार, 26 जुलाई 2010

इस वक्त (लंबी कविता)

आने वाले समय के लिए
इस वक्त दो ही चीजें
हाथ में हैं...
धोखा खा जाने के बाद की मन:स्थिति...
और लगातार चोट खाती हुई आस्थायें
जिनको बचाए जाने की कवायद जरूरी है...
और जारी है !

जहाँ धोखा शब्द का दूसरा अभिधेयार्थ,
चूँकि, आज कल दो अभिधेयार्थों का दौर है !...
फलित निराशा है
और आस्था का,
आशा...!

बराबर चक्की के पाटों के
बीच घिसते-पिसते
अनाज की तरह...दिन
गुजर रहे हैं
जिनका गर्म स्वाद
और गंध बस
शुरू-शुरू में ही अच्छा लगता है.
कल्पना के हाशिए में जाने से पहले तक
और सारे उपक्रम यदि धराशायी ना हों तो ! ये दिन...
फिर बोसीदा भूतकालिक तारीखों में
बदल जाने के लिए...ही तो आते हैं

सत्ता और बाजार के समीकरण में
जो असंगत है,
वही... जिसे सारी ग़ुरबत और बेचारगी ढोने के बावजूद
गरीब नहीं चिन्हित किया गया,
आदमी...
धकिया कर मुख्यधारा से बाहर किया जा रहा है
उसके तमाम वैधानिक अधिकार, उसका वजूद, सपने
गर्त में औंधे मुँह पड़े हैं
वो चीख रहा है..., हक़ के लिए चिल्लाना
पोस्टर बनने जैसा है...
और नगरों-कस्बों में बहुत सारी स्त्रियाँ
मुक्ति के गीत गाते हुए
वापस कठपुतली बन जाने को नियत हैं...
इसे कौन तय करता है,
इस पर गौर किये जाने की जरूरत है.

तथ्य है कि, रचनात्मक पक्षधरता सवाल करती है
सवाल पैदा हो रहे हैं...पूछे जा रहे हैं...
इधर, कवियों की मेज पर
अर्थों के हाशिए से बाहर
खदेड़े गए शब्द लिथड़े हुए पड़े हैं...
और उन्हीं मेजों की दराज में
सूखी हुई दवातों की बोतलें और पन्ने
आदम-जात का पूरा
इतिहास, वर्तमान और भविष्य
सोखे हुए पड़े हैं...
वे सारे लेखक-कवि-फ़िल्मकार स्थितियों के
जाले साफ़ करने की परियोजना का हिस्सा हैं
सवाल तो किये जा रहे हैं... संदूकों और बंदूकों से...

इस समय भविष्य को
देखने वाली दूरबीन का 'फोकल'
कड़वे सच के कुछ बिंदुओं
पर चिपक गया है...
जिन्हें स्वीकार कर थूक निगलते ही
हिचकी आने लगती है...
सत्ता कांखने लगती है और
सांसद हिनहिनाने लगते हैं...
सारी बौद्धिकता परनाले में बहने लगती है
इसी मनोदशा में साबुन की टिकिया का
आखरी अंश ज्यादा झाग छोड़ने लगता है...
और घ्राणशक्ति इतनी प्रबल हो जाती है कि,
पत्तों पर गौरैया का गू भी बास मारने लगता है !

आस्था किसी टापू पर
बची हुई, प्रलय के बाद,
शताब्दियों की अवशेष, कोई अंतिम प्रजाति है...
वहीं के गिने-चुने लोग सत्ता और बाज़ार
के चुम्बकीय असर से
छूटे हुए हैं
और विकास जैसी चमकीली रौशनी के दायरे से
भी गायब हैं ! उनके सवालों
पर विज्ञापन नहीं कमाया जा सकता,
इसलिए उनके सवाल बाजार से गायब हैं
बाजार सिर्फ़ उन्हीं मुद्दों की लीद करता है,
जो उसकी ज़मीन की खाद बनने के लायक हैं...
इसी बाजारू शोर-सूत्र-समीकरण के बीच
ईमानदार और आदमी जैसे लोग, साबुत...
किसी टापू पर चले गए हैं और
उनकी सक्रियता हवा में बुदबुदाने भर हो कर रह गयी है !

यह भी हो रहा कि
तमाम फैसलों की सारी प्रक्रिया में से
बाहर जो आदमी खड़े किये जाते हैं,
उनकी जिंदगियों का चूल्हा
उन्हीं फैसलों के ईंधन पर निर्भर है...
फैसलों के समय इरादतन तवज्जो नहीं दिया जाता कि
इनकी रोटी-दाल का नमक
इन्हीं के पसीनों से ही तैयार होता है
और ज्यादातर उन्हीं की जीभ पर नहीं लगता, क्योंकि
कुछ इरादे साफ़ हैं...
बहुत सारे बेहद नापाक हैं !
दुनिया के सबसे पुराने एक देश में
प्रदेशों के बीच... आग और अंगारों की 'फेंसिंग'
करने की कवायद राजनीति का एक
जानदार हथकंडा हो चुका है...

समय के साथ
अडोस-पड़ोस की दीवारें, गलियाँ
चौराहे और मोहल्ले... बदले हुए
दिखाई पड़ते हैं...
दोस्त - सफलता का मंत्र बताते हैं,
वैद्य और बाबा - नपुंसकता का अचूक इलाज बांटते हैं...
सिनेमा में सच
ठेठ बलात्कार,
भूख और गरीबी
बेचने के इल्जाम के पार्श्व में बुना जा रहा है...
कला समीक्षकों को इसकी खबर कम है,
और आदमी मनोरंजन का ग्राहक है! बेवकूफी की हद तक...

आदमी...
धुँआ, नमक, आटा, वोट और ईमानदारी आदि
कारकों के बीच
"महँगाई-अम्ल" की प्रयोगशालाई प्रतिक्रया से
पूरा क्षरित हो चुका है
और केवल
मतदाता सूची में उसका दर्ज
नाम, लिंग और उम्र
बचा हुआ है...
उसका एक मात्र राष्ट्रिय दायित्व
चुनाव में
एक जैसे सूरत और सीरत वालों में से
किसी को भी चुन लेना भर है...
इसके बाद तमाम दुर्घटनाओं की खबरें पढते रहना है
 
लगातार गोलियों की आवाजों के बीच
नवजात की रुलाई जैसी कोई पैनी चीज कानों में
अक्सर भोंक दिया करता है कोई...
तुरंत, रिश्तेदार समझाते हैं कि आग में मत कूदना,
तुम्हारे पीछे बीबी है, बच्चे हैं,
मन में पिघला लावा परिवार की चौहद्दी में ही
खट्टा दही
हो जाता है !

लेकिन इसी वक्त
बराबर...
पगलाये हुए से नहीं दिखने वाले लोग
पागलपन की हद तक जाकर
पानी, आँसू, पसीना, बादल और... शर्म
जैसी तमाम गीलीं चीजों को बचाने में लगे हैं
यद्यपि उनकी मेहनत पारदर्शी हो गयी है...!
उनको सलाम करने का हौसला, जज्बा और सहूलियत
उनके काम से एक मुश्किल काम है ! इसलिए,

बाकि लोग समर्थक या निंदक की भूमिका में हो गए हैं...
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