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शुक्रवार, 21 मई 2010

आधुनिक रचना प्रक्रिया


मैंने अपने आप से कहा
बनने को बन जायेगी
एक दमदार कहानी, फिक्र मत करो.
( आजकल हर तीसरी कहानी
लगभग एक एफ. आई. आर. है !)

बस थोड़ा सा खून

एक मिनट, थीम पर से पकड़ न छूटे !
ज़रा वक्त की नब्ज़ पर तो ऊँगली रखना
अरे ! उसका चेहरा धड़कता है !
गोया...
उफ्‌ ठीक लिखते टेम शब्द भूला जाता है !

काटो हाशिए पर जो लिखा है,
वही बॉटमलाइन है...
ऊँहूँ... सुधार कर दुबारा लिखो.
तुम बच्चे हो भी

बस थोड़ा सा बारूद

एक अधनंगी औरत की सर उड़ी लाश
वीभत्स वीभत्स!!!
पर लिखो, उसे भी लिखो, हकीकत लिखो
कहानी बन रही है ?
अरे बन ही जायेगी खुद-ब-खुद !
तुम किस्सेबाजी की मियाद का ख्याल मत करो
मजमून डालते जाओ

स्वागत है ब्रेक के बाद!

कहानी तैयार है ! लिजिए
ओफ्फो, हाथ क्यों पोंछने लगे ?
जी हाँ,जी हाँ
आप तो यही कहेगें, कच्ची कहानी है..
इसलिए तो खून भी
देखो आपके हाथों और सफेद कमीज़ पर
उतर आया है
जी, कहानी मैंने ही लिखी है
नहीं, मैंने नहीं लिखी है !
हाँ जी, बिल्कुल! मुझसे लिखवाई गई है

सूत्रों के मुताबिक,
फ्लैशिंग न्यूज़ के मानिंद
अभी अभी विस्फोट स्थल से लौटा हूँ
और रास्ते में ये कहानी उतार दी है

क्या साहब, आप नहीं छापेंगे
क्यों ? अच्छा, इसमें कहानीपन नहीं है
रिपोर्ट है !
जी आजकल आदमी कहानी बनता कहाँ है
पहले रिपोर्ट बन रहा है
खैर छोड़िए
मैं दूसरी जगह जाता हूँ
मुझे बहसों के लिए फुर्सत नहीं है...

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