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शुक्रवार, 25 मार्च 2011

कामरेड कमला प्रसाद जी को हार्दिक श्रद्धांजलि !

प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. कमलाप्रसाद का निधन
मध्य प्रदेष प्रगतिशील लेखक संघ का शोक प्रस्ताव
इन्दौर, 25 मार्च 2011।

कमलाप्रसादजी ने पूरे देश के प्रगतिशील और जनपक्षधरता वाले रचनाकारों को उस वक्त देश में इकट्ठा करने का बीड़ा उठाया जब प्रतिक्रियावादी, अवसरवादी और दक्षिणपंथी ताकतें सत्ता, यश और पुरस्कारों का चारा डालकर लेखकों को बरगलाने का काम कर रहीं हैं। उनके इस काम को देश की विभिन्न भाषाओं और विभिन्न संगठनों के तरक्कीपसंद रचनाकारों का मुक्त सहयोग मिला और एक संगठन के तौर पर प्रगतिशील लेखक संघ देश में लेखकों का सबसे बड़ा संगठन बना। इसके पीछे दोस्तों, साथियो और वरिष्ठों द्वारा भी कमांडर कहे जाने वाले कमलाप्रसादजी के सांगठनिक प्रयास प्रमुख रहे। उन्होंने जम्मू-कश्मीर से लेकर, पंजाब, असम, मेघालय, प. बंगाल और केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में संगठन की इकाइयों का पुनर्गठन किया, नये लेखकों को उत्प्रेरित किया और पुराने लेखकों को पुनः सक्रिय किया। उनकी कोशिशें अनथक थीं और उनकी चिंताएँ भी यही कि सांस्कृतिक रूप से किस तरह साम्राज्यवाद, साम्प्रदायिकता और संकीर्णतावाद को चुनौती और शिकस्त दी जा सकती है और किस तरह एक समाजवादी समाज का स्वप्न साकार किया जा सकता है। ‘वसुधा’ के संपादन के जरिये उन्होंने रचनाकारों के बीच पुल बनाया और उसे लोकतांत्रिक सम्पादन की भी एक मिसाल बनाया।
कमलाप्रसादजी रीवा विश्वविद्यालय में हिन्दी के विभागाध्यक्षरहे, मध्य प्रदेश कला परिषद के सचिव रहे, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के अध्यक्ष रहे और तमाम अकादमिक-सांस्कृतिक समितियों के अनेक महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे, अनेक किताबें लिखीं, हिन्दी के प्रमुख आलोचकों में उनका स्थान है, लेकिन हर जगह उनकी सबसे पहली प्राथमिकता प्रगतिशील चेतना के निर्माण की रही। उनके न रहने से न केवल प्रगतिशील लेखक संघ को, बल्कि वंचितों के पक्ष में खड़े होने और सत्ता को चुनौती देने वाले लेखकों के पूरे आंदोलन को आघात पहुँचा है। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संगठन तो खासतौर पर उन जैसे शुरुआती कुछ साथियों की मेहनत का नतीजा है। उनके निधन से पूरे देश के लेखक, रचनाकार, पाठक, साहित्य व कलाओं का वृहद समुदाय स्तब्ध और शोक में है।
कमलाप्रसादजी ने जिन मूल्यों को जिया, जिन वामपंथी प्रतिबद्धताओं को निभाया और जो सांगठनिक ढाँचा देश में खड़ा किया, वो उनके दिखाये रास्ते पर आगे बढ़ने वाले लोग सामने लाएगा। और प्रेमचंद, सज्जाद जहीर, फैज, भीष्म साहनी, कैफी आजमी, परसाई जैसे लेखकों के जिन कामों को कमलाप्रसादजी ने आगे बढ़ाया था, उन्हें और आगे बढ़ाया जाएगा। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ की राज्य कार्यकारिणी उन्हें अपनी श्रृद्धांजलि अर्पित करती है।

पुन्नीसिंह विनीत तिवारी शैलेन्द्र शैली
(अध्यक्ष) (महासचिव) (कार्यकारी महासचिव)


सम्पर्कः विनीत तिवारी-9893192740, शैलेन्द्र शैली-9425023669

कॉमरेड कमला प्रसाद जी के निधन पर प्रेस नोट

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सोमवार, 21 मार्च 2011

मेरे सरोकार


सरोकार जो मेरे हैं,
तुम्हारे आदर्शों के खोखलेपन
और हिंसा के सभी तरीकों
के सीधे-सीधे खिलाफ़ हैं !

सारे झूठ और
गढ़ी हुई मर्यादाएं तुम्हारी पैदाईश हैं
लेकिन मेरी आस्था
सिर्फ धूप की पहली किरण
बारिश की पहली बौछार
और ठण्ड की पहली सिहरन में है
इसलिए खालिस हैं... प्रकृत हैं...

तुम मुझे
कमजोर, प्रकृतिवादी,
गल्पवादी, सिरफिरा, नपुंसक घोषित कर
हाशिए से बाहर फेंक सकते हो,
संतुष्ट हो सकते हो
अपनी जीत के भ्रम का
उत्सव मना सकते हो
या इस तरह एक
गोलबंदी में अपने किये पर वाह-वाही
लूट सकते हो...

लेकिन,
मैं जब कहता हूँ --
रौंदे जाने से पहले
घास में जीवन था
मैं मानता हूँ की
तुम समूचा रौंद कर भी
घास को
उगने से
रोक नहीं सकते--
तुम तिलमिला उठते हो...
तुम्हारे संस्कार में सच
को बर्दाश्त करना
कोई चीज ही नहीं है !
या उसे नकारना ही अपनी
बुजदिली को ढांपकर
बहादुर बन जाने की
एक युक्ति है !

तुम समझो कि
मुझे तकलीफ में डालना
तुम्हारे शातिर दिमाग की
सबसे बड़ी जीत हैं, मगर
तुम समझ नहीं सकते कि
तकलीफ में होना ही
असल में
चीजों को बदलने की
ज़मीन तैयार करता है !

मेरे सरोकार
तुमसे मिले चोटों
का हिसाब दर्ज करते हुए
उसके पाई-पाई
चुकता करने के हैं
यह तुम
जानते नहीं हो अभी
यही तुम्हारी ताकत की
सबसे बचकानी भूल है !

क्षणिकाएँ


१)
अब...
ढेर सारा खालीपन है
मेरे अंदर...

इस खोखलेपन
का भराव
वह ढाई अक्षर हो
सकते थे...

जिन्हें पूरी श्रद्धा के साथ
तुम्हें संकेतित करते
एक सर्वनाम सहित संबंधकारक
लगाकर
मैंने उच्चरित किया था --

"तुम्हारा प्यार !"

--------------------
२)
तुम
मैं
प्रेम
सुख
सपने
यथार्थ
लड़ाई
उम्मीद
हौसले

विरह
संताप
अवसाद
प्रश्न
आकुलता
शेष
प्रतीक्षा

बस यही किस्से हैं
सदियों पूर्व से
अब,
अगली सदियों तक...!

तन गई रीढ़..


(किन्हीं कारणों से यह पोस्ट तत्काल नहीं डाल सका, अब दे रहा हूँ. इस पोस्ट का उद्देश्य ना तो किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप करना है, ना ही किसी प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रस्त है, यह मैं पहले ही स्पष्ट कर देना चाहूँगा.)

पहली बार मैंने किसी साहित्यिक (!) कार्यक्रम का बायकाट किया... और ऐसा करने की तमाम ऐसी परिस्थतियां पैदा की गयीं कि, हमारे पास कोई चारा नहीं बचा था. बाबा नागार्जुन पर प्रलेसं - जमशेदपुर द्वारा आयोजित कार्यक्रम कई मायनों में एक कड़वा स्वाद या बे-स्वाद ही बनकर रह गया, और उस पर ये कि इस तमाशे में कोई ख़ास भीड़ भी नहीं जुटी थी !

इस आयोजन को लेकर शुरू से ही मन में एक अजीब सा भाव था, वह इसलिए कि, बाबा नागार्जुन का कार्यक्रम आयोजित इसलिए भी हो पा रहा था कि अमुक तथाकथित नए कवि महोदय, जो शिक्षा विभाग के एक प्रशासनिक अधिकारी हैं, और अपने पद और पहुँच का इस्तेमाल तमाम उन कामों में खर्चते हैं, जिनका विरोध जनकवि बाबा नागार्जुन के पूरे काव्य का प्रमुख सरोकार रहा है. इस आयोजन का खर्च वे चुका रहे थे, इसी बहाने नागार्जुन को ही याद कर शताब्दी वर्ष में प्रलेसं जमशेदपुर ने तय किया कि एक खानापूर्ति भर कर ली जाय ! 

हमें कभी ये कैसे गंवारा होता कि जिस मंच पर बाबा नागार्जुन को याद करें, उसी मंच से और वह भी पहले सत्र में, बाबा नागार्जुन पर दुसरे सत्र से कार्यक्रम थे..., कवि महाशय की सद्य प्रकाशित किताब का विमोचन हो, उनकी प्रशस्ति गाई जाय... एक मंच से बाबा के साथ साझा करें हम इन्हें ! कैसे...! यह कतई सह्य नहीं हो रहा था... 

खैर, हमने यह सोचा कि चलो किसी बहाने तो कम से कम कार्यक्रम हो रहा है, वरना प्रलेसं-जमशेदपुर आजकल अपनी असमर्थता, एकजुटता के अभाव और आयोजन के लिए स्थानीय सदस्यों में प्रतिबद्धता की कमी का रोना रोता रहा है ! और अब कोई कार्यक्रम गाहे-बगाहे भी शायद ही होता हो ! 
बाद में पता चला अब उन कवि महोदय ने कार्यक्रम से हाथ खीच लिए हैं, क्यों ? क्योंकि... दिल्ली से "बड़े लोग" नहीं आ रहे थे... जिनके हाथों लोकार्पण होना था. नामवर जी ने तबियत ठीक नहीं रहने के कारण आने में असमर्थता जताई. तो नवोदित कवि को खल गया... इसी खींचातानी में जो गतिरोध आया कि बाकि लोगों - 
डॉ. खगेन्द्र ठाकुर, शम्भू बादल... (अरुण कमल जी को भी कोई समस्या हो गयी थी... यद्यपि उन्होंने मना नहीं किया था.)  - को भी मना कर दिया गया... बहरहाल... उन्होंने कार्यक्रम में जो पैसे लगाये थे, सुनते हैं कि उनको वापस कर दिए गये अथवा कर दिए जायेंगे ! 
क्या प्रलेसं जैसे संगठन की कोई इकाई इतनी कमजोर हो सकती है कि उसे इस तरह के समझौते करने पड़ें, महज एक कार्यक्रम आयोजित करने के लिए ! 

खैर चूँकि कार्यक्रम के कार्ड बाँटे जा चुके थे, तय हो चुका था, सो हुआ. मगर कार्यक्रम में पहुँचते ही, देखा कि सभागार में नाम मात्र के लोग बैठे हैं ! (अगर कोई बाहर से आया वक्ता होता तो शायद स्थिति दूसरी होती !) और इसके बाद बाबा नागार्जुन पर पहले सत्र में उनकी कविताओं का वीडियो कोलाज और साहित्य अकादमी द्वारा उनपर बना वृतचित्र प्रदर्शित होना था, हुआ मगर... फिल्म को पुरा नहीं होने दिया गया ! आधे से भी कम अवधि 
तक चलने देकर बंद कर दिया गया कि यह लंबी है, और दूसरा तर्क यह कि इसी जगह पर बैनर भी लगाना था, जहाँ पर्दा था, सो हमने फिल्म उतनी देखी ! ऐसा शायद यहीं हो सकता है !

इसके बाद कार्यक्रम में बाबा नागार्जुन पर लोगों ने बात की... यह ठीक था, यहाँ तक तो गनीमत थी, इसके बाद कुछ ज्यादा ही असह्य स्थिति हो गई, जब स्थानीय कथाकारों ने इसके बाद वाले सत्र में "अपनी-अपनी" कहानियों का पाठ शुरू किया ! यह कार्यक्रम बाबा पर था, और जाहिर हैं, हम सब ने उम्मीद की थी कि बाबा की ही कहानियाँ और कवितायेँ सुनायीं जाएँगी. यही सहज परिपाटी है, तरीका है किसी की शताब्दी मनाने का यह कौन सा ढंग था, जो अब हमारे सामने था ! मालूम हुआ कि बाकि लोग भी अपनी-अपनी कवितायेँ पढेंगे, ना कि बाबा की ! बैनर प्रलेसं का था, मगर जलेस के लोग भी सभा और मंच पर रहे, कवितायेँ उन्हीं को पढनी थीं, क्योंकि प्रलेसं में कवि नहीं होते या होंगे, या होना ही चाहते हैं (ऐसी धारणा है इधर) !

इसी समय विजय दी, अर्पिता दी और मैं सभागार छोड़कर निकल गये... कुछेक और लोग भी गये, मगर उन्होंने बहिष्कार किया, यह नहीं कह सकते... मगर हम तीनों ने हाल अपना विरोध दर्ज करने के लिए हाल छोड़ा... 
यह जनकवि के जिन मूल्यों और उनकी कविता और साहित्य के जिन चिंताओं और सरोकारों की बात कर रहे थे, उसी मंच से उनका मखौल उड़ाते हुए और उसी संकट का सजीव उदाहरण बनकर प्रस्तुत हुए...! यानि क्या वे हमें मुर्ख समझते हैं ? कि हम यह भी स्वीकार कर आँख मुंद लें कि क्या हो रहा है, वह सही नहीं है.. और जिस मंच से वे बाबा के तथाकथित उन सभी छद्म प्रतिनिधियों की पहचान करने की बात कर रहे थे, उसी मंच से अपनी रचनाएँ बाबा की रचनाओं से ज्यादा जरूरी मानकर परोस रहे थे ! अपनी रचनाएँ सुनाने का तो यही अर्थ हुआ ! क्या हम यह नहीं देख सकते कि जिन आदर्शो की बात आप चीख कर कहते हैं, उन्हीं को आप तोड़ भी रहे है, और शायद हमसे यह उम्मीद कि हम अबोध हैं, या बने रहें ! यह सरासर गलत है, और हमने अपना विरोध कार्यक्रम को बीच में छोड़कर सभा से निकल जाकर दर्ज किया.

मैंने विजय दी से कहा भी कि यह जमशेदपुर प्रलेसं काफ़ी गलत उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है. और यह देखकर खेद होता है कि प्रलेसं की यह इकाई, सबसे कमजोर होती जा रही है. और इसकी सक्रियता अब रेत में तिल का एक दाना ढूँढने जैसा है.

और इस सबके बावजूद,  प्रगतिशील लेखक संघ या इस धारा में कोई खोट नहीं कि हम इसे त्याग दें... मोहभंग हो जाये. दरअसल कॉमरेड विनीत भाई कि एक बात मुझे हमेशा याद आती है, कि "हम पर अपनी विरासत को निभाने की बड़ी जिम्मेदारी है." जिस प्रलेसं से प्रेमचंद, सज्जाद जाहिर, फैज़, कैफ़ी आदि और जिस प्रगतिशील धारा से परसाई, भीष्म साहनी, नागार्जुन आदि जुड़े रहे और उसे एक मुकाम दिया, उसे छोड़ने का प्रश्न नहीं है, 
उससे मोहभंग नहीं होता है, बल्कि आज यह जरूरत ज्यादा कशिश से महसूस हो रही है, कि इस वाद या धारा या परम्परा को इस तरह की चापलूसी-मठाधीशी, आत्म-विज्ञापन और क्षुद्रताओं से बचाने की बहुत बड़ी जिम्मेदारी हमीं पर आन पड़ी है. तमाम संकटों के बीच यह भी एक संकट है. और इसकी पहचान हमें है. इन विचारों और विचारधारा पर हमारी आस्था है. 

इसलिए जब ऐसा होते देखा तो निसंदेह यह हुआ कि, जैसा बाबा की ही एक पंक्ति है - "तन गई रीढ़..." 
  

महिला दिवस बुनियादी तौर पर श्रम की गरिमा का प्रतीक है



भारतीय महिला फेडरेशन
जिला इकाई  इन्दौर


प्रेस विज्ञप्ति


महिला दिवस बुनियादी तौर पर श्रम की गरिमा का प्रतीक है


इन्दौर] 12 मार्च 2011-

बाजार की कोशिश है कि हर चीज अपना असल अर्थ खोकर ऐसे अर्थ पा ले जिससे वो बाजार के मुनाफे की हो जाए। आजकल महिला दिवस पर सौंदर्य प्रसाधन और तरह&तरह के वस्त्राभूषण बनाने वाली कंपनियाँ फैशन शो आयोजित करती हैं। मीडिया भी ऐसी चीजों की नुमाइश करता है। लेकिन ये सम-हजयना जरूरी है कि महिला दिवस सिर्फ औरतों के पहनने-ंउचयओ-सजय़ने या सिर्फ पिकनिक&पार्टी का ही दिन नहीं है। ये दिन उन कामकाजी महिलाओं की याद में मनाया जाता है जो अपने हक और श्रम के सम्मान की खातिर शहीद हुईं।
महिला दिवस के कार्यक्रमों की श्रृंखला में भारतीय महिला फेडरेशन और घरेलू कामकाजी महिला संगठन ने मिलकर 11 मार्च 2011 को कामकाजी महिलाओं के संघर्ष और उनकी ताकत विषय पर व्याख्यान] एक नाटक और महिलाओं की रैली का आयोजन किया गया। अर्थशास्त्री डॉ- जया मेहता ने अपरोक्त बातों के साथ ही बताया कि सरकार के वित्तमंत्री ने हाल का बजट पेश करते हुए कहा कि हमारे देश में अनाज का उत्पादन तो ठीक हुआ है लेकिन वो एक जगह से दूसरी जगह तक कुशलता से पहुँचाया नहीं जा सका इसलिए अनाज का परिवहन ठीक करने के लिए उसे रिलायंस जैसी कंपनियों को दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि एक तरफ सरकार खाद्य सुरक्षा कानून को लगातार टालती जा रही है और दूसरी तरफ अनाज को विशाल कंपनियों के चंगुल में फँसाना चाहती है जिनका मुख्य मकसद गरीब जनता का पेट भरना नहींे बल्कि मुनाफा कमाना है। अन्य पोषण सामग्री तो छोड़िए देश के लोगों की आधी आबादी को अनाज तक नसीब नहीं होता। इन सब लोगों में भी औरतों की हालत बद से बदतर है। देश की 45 प्रतिशत महिलाएँ रक्ताल्पता यानी एनीमिया से पीड़ित हैं। कमजोर माँएँ कमजोर बच्चों को जन्म देती हैं। नतीजा ये है कि हमारे देश में कुपोषित बच्चों की तादाद दुनिया में सबसे ज्यादा है। इन कमजोर बच्चों का मस्तिष्क भी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता। जिन्हे भरपेट खाना तक नहीं मिल पाता, वे भला खाते&पीते अमीर और मध्यम वर्ग के बच्चों के साथ किस तरह तरक्की की दौड़ में बराबरी से दौड़ सकते हैं।
उन्होंने ये भी कहा कि आज चाहे मजदूरों के संघर्ष हों या दलितों] आदिवासियों] किसानों के] हर संघर्ष की अगली कतार में बहुत बड़ी तादाद में महिलाएँ आयी हैं। उनके भीतर संघर्ष के लिए जरूरी ताजगी भरी उर्जा मौजूद है। संसद के सामने 23 फरवरी का प्रदर्शन हो या 24 फरवरी की आँगनवाड़ी व आशा कार्यकर्ताओं की रैली, दोनों में ही महिलाओं ने दिल्ली की सड़कों को जाम कर दिया। इस लड़ाई को और प्रभावी तौर पर लड़ा जाना जरूरी है वर्ना बाजार गरीब-ंउचयमेहनतकश महिलाओं व पुरुषों को जीने ही नहीं देगा।
शहीद भवन पर आयोजित इस सभा को संबोधित करते हुए घरेलू कामकाजी महिला संगठन की ओर से सिस्टर रोसेली ने कहा कि महिलाओं को भी ये सम-हजयना चाहिए कि उनकी समस्याओं का हल धार्मिक जुलूसों में शामिल होने से नहीं निकलेगा। उन्हें संगठित होकर अपनी लड़ाई लड़नी होगी। हमें उन्हें जोड़ने के और मजबूत उपाय करने चाहिए। आँगनवाड़ी यूनियन की अनीताजी ने कहा कि 21 बरस से लड़ते&लड़ते उन्होंने रु- 275 मासिक से 1500 और अब 3000 का वेतन हासिल हुआ है। ये लड़ाई जारी रखनी होगी नहीं तो सरकार कुछ नहीं देने वाली। सभा को निर्मला देवरे और मनीषा वोहल ने भी संबोधित करते हुए कहा कि हम मजदूर औरतों को एक&दूसरे की मदद के लिए साथ आना चाहिए तभी बाकी महिला मजदूर भी हमसे जुड़ेंगी और सुरक्षा की भी गारंटी होगी।
भारतीय महिला फेडरेशन की सचिव सारिका श्रीवास्तव ने गतिविधियों का ब्यौरा देते हुए पिछले वर्ष के दौरान दिवंगत हुए कॉमरेड अनंत लागू और कॉमरेड राजेन्द्र केशरी को सभा की ओर से श्रृद्धांजलि दी। सभा का  संचालन किया पंखुड़ी मिश्रा ने।  सभा के अंत में महिला मजदूरों के संघर्षों पर आधारित एक नाटक की प्रस्तुति हुई जिसमें गारमेंट फैक्टरी में काम करने वालीं, बीड़ी बनाने वालीं] भवन निर्माण मजदूरी करने वालीं और जमीन से बेदखली की परेशानियों से लड़ने वाली आम मेहनतकश महिलाओं के जीवट और जोश की कहानियाँ थीं। नाटक का शीर्षक था जब हम चिड़िया की बात करते हैं। नाटक में पंखुड़ी] रुचिता] सारिका] नेहा] शबाना] रवि और आशीष ने अभिनय किया।
सभा व नाटक के उपरांत महिलाओं ने शहीद भवन से मालवा मिल चौराहे तक नारे लगाते हुए जुलूस निकाला।
इससे पहले 8 मार्च को कल्पना मेहता ने स्वास्थ्य की राजनीति का शिकार बनतीं महिलाएँ विषय पर व्याख्यान दिया था और बताया था कि किस तरह अमेरिका व अन्य  विकसित देश तरह&तरह के गर्भ&निरोधक भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों की महिलाओं पर आजमाते हैं और अशिक्षित व जागरूकताहीन जनता की जिंदगी के साथ नेता] अफसर और कंपनियाँ गिरोह बनाकर खिलवाड़ करती हैं।

प्रति
सम्पादक महोदय]
प्रकाशनार्थ / प्रसारार्थ

संपर्कः

सारिका श्रीवास्तव
सचिव] भारतीय महिला फेडरेशन] इन्दौर इकाई- शहीद भवन] 65] राजकुमार मिल ओवरब्रिज के नीचे] न्यू देवास रोड] इन्दौर- मोबाइलः 9425096544

रविवार, 20 मार्च 2011

तुम मेरे पास रहो - फैज़


तुम मेरे पास रहो
मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो
 
जिस घड़ी रात चले
आसमानों का लहू पी के सियह रात चले
मर्हमे-मुश्क लिये नश्तरे-अल्मास लिये
बैन करती हुई, हँसती हुई, गाती निकले

दर्द की कासनी पाज़ेब बजाती निकले
जिस घड़ी सीनों में डूबते हुए दिल
आस्तीनों में निहाँ हाथों की रह तकने लगें
आस लिये
और बच्चों के बिलखने की तरह क़ुलक़ुले-मय
बहर-ए-नासूदगी मचले तो मनाये न मने
जब कोई बात बनाये न बने

जब न कोई बात चले
जिस घड़ी रात चले
जिस घड़ी मातमी, सुनसान, सियह रात चले
पास रहो
मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो

मंगलवार, 8 मार्च 2011

अपनी जमीन तलाशती बेचैन स्त्री - निर्मला पुतुल


यह कैसी विडम्बना है
कि हम सहज अभ्यस्त हैं
एक मानक पुरुष दृष्टि से देखने को
स्वयं की दुनिया
मैं स्वयं को स्वंय की दृष्टि से देखते
मुक्त होना चाहती हूँ अपणी जाति से
क्या है मात्र एक स्वप्न के
स्त्री के लिए --- घर, संतान और प्रेम ?
क्या है ?
एक स्त्री यथार्थ में
जितना अधिक घिरती जाती है इससे
उतना भी अमूर्त होता चला जाता है
सपने में वह सब कुछ
अपनी कल्पना में हर रोज
एक ही समय में स्वंय को
हर बेचैन स्त्री तलाशती है
घर, प्रेम और जाति से अलग
अपनी ऐसी जमीन
जो सिर्फ़ उसकी अपनी हो.
एक उन्मुक्त आकाश
जो शब्द से परे हो
एक हाथ
जो हाथ नहीं
उसके होने का आभास हो !

महिला दिवस ८ मार्च, २०११  पर दैनिक जागरण में प्रकाशित

सोमवार, 7 मार्च 2011

घिन तो नहीं आती है ? - नागार्जुन


पूरी स्पीड में है ट्राम
खाती है दचके पै दचके
सटता है बदन से बदन
पसीने से लथपथ ।
छूती है निगाहों को
कत्थई दांतों की मोटी मुस्कान
बेतरतीब मूँछों की थिरकन
सच सच बतलाओ
घिन तो नहीं आती है ?
जी तो नहीं कढता है ?

कुली मज़दूर हैं
बोझा ढोते हैं , खींचते हैं ठेला
धूल धुआँ भाप से पड़ता है साबका
थके मांदे जहाँ तहाँ हो जाते हैं ढेर
सपने में भी सुनते हैं धरती की धड़कन
आकर ट्राम के अन्दर पिछले डब्बे मैं
बैठ गए हैं इधर उधर तुमसे सट कर
आपस मैं उनकी बतकही
सच सच बतलाओ
जी तो नहीं कढ़ता है ?
घिन तो नहीं आती है ?

दूध-सा धुला सादा लिबास है तुम्हारा
निकले हो शायद चौरंगी की हवा खाने
बैठना है पंखे के नीचे , अगले डिब्बे मैं
ये तो बस इसी तरह
लगाएंगे ठहाके, सुरती फाँकेंगे
भरे मुँह बातें करेंगे अपने देस कोस की
सच सच बतलाओ
अखरती तो नहीं इनकी सोहबत ?
जी तो नहीं कुढता है ?
घिन तो नहीं आती है ?

बुधवार, 2 मार्च 2011

सवाल


हमेशा ऐसा ही होता है, कि
मासूम किलकारियों को पर लगने से पहले,
फुर्र से उड़ जाने से पहले
धारदार हथियारों से उनके पँख
चाक कर दिये जाते हैं,
कई बार, सिर्फ़ हत्याएँ करना उनका शिगूफा हो जाता है
वे हमारे इतिहास, हमारी स्मृतियों, अनुभव, चेतना और
अनुभूति और फैसले करने की जैविक क्षमता
की हत्या करने को पागल हो जाते हैं...
ऐसा होता है कि
अक्सर जब नज़र सामने की तरफ होती है
पीछे से वार होता है...
वे वही होते हैं, वही, जिन्हें हमने भाई कहा था
एक ही आसमान के नीचे !
अरसे तक एक थाली में बाँटकर
भात खाया था जिनके साथ...
जिनकी बहती हुई नाक पोंछी थी,
जिन्हें गिनतियाँ और पहाड़े सिखाए थे...
जिनको बोलना सिखाया था...वे अचानक...
जीभ काटने वाले हाथों में तब्दील हो जाते हैं
ताकि हम आज़ादी का स्वाद ना चख सकें !
सवाल यह नहीं कि ऐसा क्यों होता है...
सवाल तो यह है कि
क्या हम ऐसा होने को
खारिज नहीं कर सकते ?

जंग खत्म नहीं होता है साथी !


हमेशा होना तो यही होता है
ऐसा ही होता है
कि सभ्यता के दूसरे छोर पर जहाँ
एक सुदीर्घ सन्नाटे
की गवाही में तेरे-मेरे कांपते-लरजते
होंठों की धीमी सरगोशियों का ख़्वाब-गुलाब
खिलने को होता है कि
बारहा दीवारों से फोड कर निकल आती हैं
उनकी दुनियावी कड़ी हथेलियाँ
जिससे मसलकर उन गुलाबों को
घोंट दिया जाता है...

नृशंस परछाइयों का एक सर्वकालिक समूह
हमें बागी घोषित करता है और खुद को
अपनी लकीर का सबसे बड़ा सरंक्षक !
घेरेबंदी के बीच
मुस्कुराकर, सर उठाकर, सीना ताने
वध होती हुई हमारी आत्माएँ
पुकार सकती हैं सिर्फ़
एक आखरी बार
एक-दूसरे का नाम...
फिर हमारी सांसों को थामें रखने वाली तख्ती
पैरों के तले से खिसका दी जाती हैं...
एक कुएँ में झूलते हुए हम दम तोड़ते हैं, आहिस्ता-अहिस्ता...

और तस्वीर के दूसरे पहलू में,
हमारे सपने, हमारी ताकत, हमारा विरोध
बचा रहता है, सूरज की रौशनी में, चाँदनी में,
हवा में, पानी में... पत्थर में, दूब में...!
  
उफ़, कि यही एक तथ्य है जो
है वहीँ जहाँ, तब भी था, जब से
एक आदमी और एक औरत
एक दूसरे का हाथ ईमानदारी से पकड़ कर आगे आये !
उनके साझे क़दमों की हुलस से जमीन पर
फूल खिल आये...
वे शामिल हुए एक-दूसरे की देह-ओ-रूह में,
और पूरी दुनिया का एक बड़ा हिस्सा उनके दायरे से
बाहर हो गया !
तब उनके हथियारों की नोंक और तेज की जाने लगी
मुट्ठियों में पत्थर आ गये...

मगर विश्वास करो साथी
यह यूँ ही तुम्हें दर्द में बहलाने के लिए
नहीं कह रहा... कि
यह सब जो होता है, उसके बरक्स यह भी होता है कि,
हर बार उनकी साजिशें नाकाम की हैं हमने
हर बार घूरे पर गुलाब खिलाया है
यह यूँ ही नहीं हुआ कि लाल रंग-
उस गुलाब का-
ऐसा गहरा हुआ है !
जिसके मायने कई है !
हर बार मृत्यु को हताश किया है हमने
हर बार हम पलटे हैं,
आखिरी बार चूक जाने से ऐन पहले !
हर बार उन्होंने हद बनाये हैं, और हमने हद तोड़े हैं !

यह सच है कि जिंदगी की बुनियाद
जंग और मुहब्बत के गारे में सान कर रखी जाती है
यह तो होता है कि जंग में हम झोंक दिए जाते हैं
पर यह भी उस कदर सच है कि
जब तक खून का ईमान बाकि है
जंग खत्म नहीं होता है साथी !

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