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बुधवार, 10 मई 2017

मई दिवस 2017 को साथी ग्रुप की प्रस्तुति "गाँव छोडब नाहीं"

मई दिवस 2017 को हमारे "साथी" समूह ने बासुकी मंच, मजदूर यूनियन कार्यलय, मऊभंडार में "गाँव छोडब नाहीं" की प्रस्तुति दी.
इस नृत्य को ज्योति मल्लिक और अद्रिजा रॉय ने निर्देशित किया था. ग्रुप की मनीषा, अनीषा, खुशी, नीलिमा, विभूति, मुस्कान, शीतल, वृष्टि, ज्योति और शेखर मल्लिक ने इसे मंच पर पेश किया.
यू ट्यूब पर यह संकलित है -

सोमवार, 21 नवंबर 2016

मुक्तिबोध दुनियादार कवि हैं – डॉ. मिथिलेश कुमार सिंह



प्रलेस, घाटशिला का मुक्तिबोध जन्मशताब्दी आयोजन: “अँधेरे” समय “में” हम और मुक्तिबोध
(13 नवंबर, 2016, घाटशिला – रिपोर्ट)

प्रगतिशील लेखक संघ की घाटशिला इकाई ने 13 नवंबर, 2016 को गजानन माधव मुक्तिबोध की जन्म शताब्दी वर्ष के अंतर्गत  “अँधेरे” समय “में” हम और मुक्तिबोध का आयोजन किया. कार्यक्रम की शुरुआत ‘अँधेरे में’ कविता के अंश ‘ओ मेरे आदर्शवादी मन’ को गाकर हुई. जिसे मनीषा, सुमन, वृष्टि, खुशी, अनीषा, नीलिमा, अद्रिजा, संचयिता, प्रीती. ज्योति और शेखर मल्लिक ने स्वर दिया.
शेखर ने कार्यक्रम की भूमिका रखते हुए आरम्भ किया. इसके बाद अतिथियों का स्वागत फूल और स्मृति चिन्ह स्वरूप मुक्तिबोध की तस्वीर देकर युवा साथियों ने किया. तय कार्यक्रम में दो सत्र थे, किन्तु कुछ वक्ताओं के नहीं आ पाने के कारण कार्यक्रम को एक ही सत्र में चलाने का निर्णय लिया गया.
शुरुआत घाटशिला महाविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के प्रो. नरेश कुमार के सम्बोधन से हुई. उन्होंने मुक्तिबोध पर बतौर पाठक अपने विचार रखे.
इसके बाद दिल्ली से आये युवा साथी अजित कुमार तिवारी ने कहा कि मुक्तिबोध ने अपनी कविता में जो कहा है कि 'दुनिया थोड़ी बेहतर चाहिए/सफाई के लिए एक मेहतर चाहिए' यह कमोबेश सभी कवि साहित्यकार की और हम जैसे व्यक्ति की समस्या है. व्यवस्था के प्रति हमारे मन में जो आक्रोश रहता है उसे हम समारोह में बदल देते हैं.  मुक्तिबोध के अनुसार यदि हममें व्यवस्था को लेकर आलोचनात्मक भाव नहीं है, उसे बदलना नहीं चाहते तो इसका अर्थ यही है कि हम उससे उकता गए है, या हमने उसे स्वीकार कर लिया है, मुक्तिबोध की कविता हमें इसी बात की याद दिलाती है. यदि आपको बदलाव चाहिए, यदि आपको कुछ बेहतर चाहिए तो आपको उस व्यवस्था का अंग बनना पड़ेगा और उसी व्यवस्था के जरिये आपको उस व्यवस्था को परिवर्तित करना पड़ेगा. वरना इन चिंताओं का, इन समारोहों का कोई खास औचित्य नहीं रह जाता है. यदि हमें कुछ सीखना है मुक्तिबोध की कविताओं से तो यही सीखना है कि जो व्यवस्था आपको गलत लगे तो आप उसके खिलाफ आवाज़ उठाईये, चुप मत रहिये. वरना यदि आप साहित्यकार होकर चुप रह गए तो आपके होने का कोई अर्थ नहीं है. यही मैंने मुक्तिबोध से सीखा है. और मैं कोशिश करता हूँ कि अपने आक्रोश को समारोह में बदलने की किसी भी कवायद का इंकार कर सकूँ.
कोलकाता से आये कवि नीलकमल ने मुक्तिबोध की डायरी पर विस्तार से अपनी बात रखी. उन्होंने कहा, मुक्तिबोध हमारे बीच एक ऐसे कवि के रूप में आते हैं, जिनके यहाँ उनका साहित्यिक जीवन और व्यक्ति के रूप में उनका आचरण लगभग एकाकार हो जाते हैं. नीलकमल ने 'बेचैन चील' कविता का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस कवि के यहाँ ऐसा असाधारण बिम्ब है, उस कवि की बेचैनी को समझा जा सकता है.  
"एक साहित्यिक की डायरी" दिनवार, तारीखवार या पारम्परिक डायरी नहीं है. 1957 से 1960 के बीच में परसाईं के संपादन में जबलपुर से निकलने वाली 'वसुधा' पत्रिका में मुक्तिबोध इस शीर्षक से एक स्तम्भ लिखा करते थे, जिसके अंतर्गत वे साहित्य से जुड़े प्रश्नों को वे सम्बोधित करते थे. इसकी शैली एकालाप की है. कई जगह संवाद की शैली है. 1964 ये किताब आई. इसी वर्ष ही मुक्तिबोध का निधन हुआ.
इसे पढ़ते हुए दो चीजों ने एक रचनाकार और एक पाठक के रूप में मुझे प्रभावित किया कि यहाँ मुक्तिबोध ने अपनी रचना प्रकिया को साफ़ किया है.  'तीसरा क्षण' अध्याय में जिसमें वे कहते हैं कि किसी भी कलात्मक अभिव्यक्ति या चूँकि वे स्वयं कवि थे सो, कविता कैसे तैयार होती है, इसको डिकोड किया है. कविता के बनने के तीन चरण बताये हैं. पहला क्षण उनके अनुसार 'कोई उत्कट तीव्र आवेग के रूप में कोई भाव, कोई विचार कलाकार के पास आता है'. दूसरा क्षण, उसको (भाव या विचार को) फैंटेसी में बदलना. यानि जो भाव या विचार आया, वह अपने मूल स्त्रोत से अलग होकर फैंटेसी में बदलता है. आलोचकों ने मुक्तिबोध की इसी बात को पकड़ कर घोषणा / निश्चित कर लिया कि मुक्तिबोध की कविता फैंटेसी है. मुक्तिबोध खुद कहते है कि एक स्टेज है, कविता के बनने की एक अवस्था है फैंटेसी. आये हुए भाव को शब्दों में ढालने से पहले कल्पनाशीलता के माध्यम से उसको फैंटेसाइज़ करना. जो घटित नहीं हुआ है उसको घटित होते हुए देखना.
तीसरी अवस्था है, उसे कागज पर उतारना. मुक्तिबोध के अनुसार प्रत्येक भाव किसी ना किसी वस्तु से जुड़ा होता है. वह भाव और उसके साथ एक दृष्टि यानि जीवन दृष्टि दोनों के एक समन्वय की बात मुक्तिबोध करते हैं.  मुक्तिबोध की जो एक अन्य बात आकर्षित करती है, वह कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी के सवाल. मुक्तिबोध एक अकेले लेखक के रूप में मुझे मिले जिन्होंने बताया, कि कविता में फ़्राड कैसे होता है ! जाली कवितायेँ कौन सी हैं. वे कहते हैं कि हिंदी में कई कवितायेँ हैं जो पूरा का पूरा फ्राड हैं और वे फ्राड भी दो तरह का बताते हैं.  एक कि जो चीजें कवि ने व्यक्त किया, उसके पीछे उसकी अपनी कोई अंतर्दृष्टि नहीं है, वह आरोपित है. इसलिए वह फ्राड है. दूसरा फ्राड वे इस तरह से रेखांकित करते हैं, जो चीज अभिव्यक्त हो रही है, उसके पीछे जो भाव या विचार या उसका जो आधार है, वो कहते हैं, ज्ञानात्मक आधार से पुष्ट होना चाहिए भाव को. जो ज्ञानात्मक आधार है, हमारे भाव का वो ही गलत है. तो वह भी एक किस्म का फ्राड है. यह डायरी खास तौर से कविता के विद्यार्थियों के लिए और कविता लिखने वाले हमारे जैसे लोगों के लिए अनुशीलन की चीज है. डायरी में एक जगह वे कहते हैं कि मैंने एक लंबी कविता लिख डाली है जिसके कोई दो रूपये भी ना देगा, लेकिन अगर मैं इसे कहानी में बदल दूँ तो शयद दस-पंद्रह रूपये मिल जांय. इस प्रकार अपनी लंबी कविताओं को समझने की कुंजी देते हुए वे कहते हैं कि रूपक, एक शब्द वे इस्तेमाल करते हैं, 'एलिगरी'. रूपक के आधार पर वे एक गद्य-चित्र तैयार करते हैं. गद्य के टुकड़ों की एक श्रृंखला, जिसमें भीतर भीतर एक कथा चलती है, जिसके केन्द्र में ये रूपक है. तो, एक रूपक है, उसके पीछे एक कथा है, उसके बाद गद्य-चित्रों की एक श्रृंखला वो बनाते हैं. और सबसे महत्वपूर्ण काम वो करते हैं कि उन गद्य-चित्रों के अंदर वो छंद का समन्वय करते हैं. जिससे कि उसे कविता के होने का आभास होता है. इस तरह से एक लंबी कविता बनती है. जो कि अगर उल्टी प्रकिया में डाली जाय, तो वो कहानी में परिणत हो जायेगी. अत: “अँधेरे में” कविता में एक कहानी चलती है.
घाटशिला महाविद्यालय के राजनीतिशास्त्र विभाग के प्रो. इंदल पासवान ने कहा कि आज जो चर्चा चल रही है उसे जानकर लगता है कि आज से, जिस समय मुक्तिबोध थे, वो समय निश्चित रूप से मुक्तिबोध के लिए और उनके जैसे दूसरे संवेदनशील व्यक्तियों के लिए बहुत अँधेरा था वह. और आज भी बहुत सारी ऐसी परिस्थितियां हैं. जो शायद उस समय से ज्यादा अंधकार प्रस्तुत कर रही हैं. अँधेरा सदियों से रहा है, आज भी है, और आगे भी रहेगा. कई लोग प्रयास करते हैं. मुक्तिबोध ने भी एक प्रयास ही किया कि कैसे उस अँधेरे को दूर किया जाय. उन्होंने कुछ नुस्खे बताये. उनके जो छटपटाहट थी उसे व्यक्त किया. उन्होंने फ्राड कविता की बात की. मैं यह मानता हूँ कि आज हमलोग जिससे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, वो वही फ्राडीज्म है. हमारी अपनी लाइफ़ का फ्राडीज्म. सबको पता है कि ये समस्या है, सब जानते हैं कि ये किया जाय तो सोल्यूशन होगा. लेकिन हमेशा हमारी कथनी और हमारी करनी में अंतर आ जाता है. यही वो बड़ी समस्या है, जो हमारे सामने सदियों से उपस्थित समस्याओं को आज तक निजात नहीं दिला पाया. इतिहास भरा पड़ा है, कि जो व्यक्तित्व या समूह अगर अपनी सारी परिस्थितियों में ईमानदारी से एकाकार हो गया तो उसने चीजों को बदल दिया है.  हम ना तो व्यक्तिगत स्तर पर ना ही सामूहिक स्तर पर एकाकार हो पा रहे हैं. मुक्तिबोध ने वो रास्ते बताये हैं. और मैं विशेषज्ञों से सुनना चाहूँगा कि मुक्तिबोध ने इस अँधेरे को दूर करने का क्या उपाय बताया है और जो उन्होंने बताया है क्या हमलोग उस उपाय पर हमलोग अमल करने की स्थिति में हैं ? क्या समाज और परिवार में हम जिस भूमिका में हैं, उसी भूमिका में, क्या हमारी भूमिका बन सकती है इन अंधेरों को दूर करने में ? निश्चित रूप से मुक्तिबोध ने बताया भी होगा. और मैं अपने साथियों से वो सुनना चाहूँगा.
इसके बाद लतिका पात्र ने मुक्तिबोध की लंबी कविता ‘अँधेरे में’ के कुछ अंशों का पाठ किया.
प्रलेस और इप्टा के वरिष्ठ साथी कॉम. शशि कुमार ने प्रगतिशील आंदोलन और मुक्तिबोध पर अपना वक्तव्य केंद्रित करते हुए कहा कि, प्रगतिशील आंदोलन ने हुश्न का मेयार बदला. प्रगतिशील आंदोलन भक्ति आंदोलन के बाद अकेला संगठित सांस्कृतिक आंदोलन रहा है कि जिसने भारत को संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में नई दिशा दी है. मुक्तिबोध पर चर्चा करते हुए सिर्फ़ एक बात कहना चाहता हूँ कि माना कि आदमी के सामने पहले से ही मुक्ति की आकांक्षा है. जो सत्ताविहीन हैं, उनके अंदर सत्ता प्राप्ति की आकांक्षा है. आज़ादी की आकांक्षा है. सम्मान से जीने की आकांक्षा है. पहले भी लोग उन आकांक्षाओं के साथ जीते थे. लेकिन यकीन नहीं होता था कि दुनिया बदली जा सकती है और हमारी ये आकांक्षायें पूरी हो सकती हैं, मने मुक्ति की कामना पूरी हो सकती है. तब अक्टूबर इंकिलाब के बाद उस आकांक्षा को एक विश्वास मिला.
और उस विश्वास की परिणिति है साहित्य का यह दिशा. मुक्तिबोध भी कहते हैं, 'तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है पार्टनर ?' जो साहित्य लिखते हैं, वे सामाजिक समस्याओं से निरपेक्ष रहते हैं ! कहीं आग लगे, बलात्कार हो, तो हम क्या करें ? हम तो लेखक हैं ! लिख देंगे ! हम सबके भीतर भी राजनीति पलता है. जिसको अगर हम अभिव्यक्ति ना दे सकें यानि गर्भ के बच्चे को 'रिकोग्नाईज़' ना करें तो हम उसको क्या करें ? विचार के धरातल पर भी यही चीज है.
जब हम अँधेरे समय  की हम बात करें तो ये संकट है, पुरी दुनिया में और हमारे देश में भी देखने का दो नजरिया है. एक यह कि मानव जाति जबसे अवतरित हुई है... तब से वह नित अधम, पतित, घृणत गिरती हुई जाति है. सतयुग में तो झंझट ना था, फिर त्रेता, द्वापर में सतत गिरता रहा है, और अब कलिकाल में तो और भी गिर गया ! एक दूसरा दर्शन भी है. यह विचार करती है कि मानव जाति संघर्ष करके दुनिया को यहाँ तक लायी है. इसको बेहतर बनाया जा सकता है. आज हमारे और देश के सामने यह प्रश्न साफ है कि हम किसके पक्ष में हैं ? कि चीजों को हम कैसे देखते हैं. हम आस्था से चीजों को तय करेंगे या तर्क और विवेक से ! जब हम चीजों को आस्था से तय करते हैं तो आस्था विवेक का निषेध करती है. और जब तर्क और विवेक से तय करते हैं तो ये ज्ञान का विस्तार करती हैं. आज हमारे सामने यह संकट है. यह हमारी आस्था का सवाल है तो हम आपका तर्क नहीं सुनेगे ! हमारी आस्था का सवाल है, हम आपके घरों में आग लगाएँगे. यहीं मुक्तिबोध उपस्थित होते हैं. अशोक वाजपेयी जी अपने संस्मरण में लिखते हैं कि 'मैं और मुक्तिबोध ट्रेन में सफर कर रहे थे. स्टेशन पर जो पूड़ी-सब्जी मिलती है, वो मेरे हाथ में भी थी और मुक्तिबोध के हाथ में भी. मुझसे खाया नहीं जा रहा था और मुक्तिबोध चटकारे लेकर खा रहे थे !'
तो उनका जीवन संघर्ष कहाँ है, ये आप देखें. वह नागपुर, कलकत्ते का सफर है, त्रिलोचन शास्त्री के साथ का सफर है. बाद में राजनांदगांव का सफर है. इसलिए मुक्तिबोध ने अपनी कवितायेँ लिखीं. मुक्तिबोध को याद करना, उनके पूरे समय को याद करना है. आज छल है. आज सबकुछ विदेशी कंपनियों के हाथ में है. और आज कोई भारत माता की जय के नारे लगता है, और खुद को देशभक्त कहता है, आप अंदाजा लगाईये कि देशभक्ति का पैमाना ये है क्या ? इसलिए मुक्तिबोध को याद करना जरूरी है. भारत माँ कि जयकारे जितनी बार वे लगाते हैं, भारत माँ के गहने उतनी बार नोचते होंगे. इसलिए मुक्तिबोध की कविता ज्यादे प्रासंगिक है कि हमको इससे बेहतर दुनिया चाहिए, और इस सारा कचरा साफ़ करने के लिए मेहतर चाहिए. तो उस मेहतर की जरूरत है देश को.
मनुष्य को मनुष्य बनाये रखने के लिए साहित्य जरूरी है. और मनुष्यता के पक्ष में मुक्तिबोध जैसे लोग खड़े हैं, उनको याद करने की जरूरत है. मुक्तिबोध चाहते तो अपनी जिंदगी में बहुत सारी सहूलियतें इस्तेमाल कर लेते. जैसे धार्मिक ग्रंथ में सुदामा जी ने कर लिया ! ऋषि अगस्त की तरह आज भी हमारे बुद्धिजीवी सत्तापक्ष की तरफ चले जाते हैं, इसलिए साहित्य को, मुक्तिबोध को, अपने समय को, और अपने समाज को समझने की जरूरत है. जिंदगी की जो जटिलता है, उसको गहरे ढंग से जब हम समझेंगे तो मुक्तिबोध की भी जटिल कविताओं को भी समझेंगे. मैं समझता हूँ, कि ऐसा तमाम साहित्य बेकार है, जो मनुष्य की जिंदगी के सवालों को खड़ा नहीं कर सकता है. इसलिए जीवन के प्रश्नों को ठीक ढंग से समझना और खड़ा करना आज के साहित्य की मूल भूमिका है. शशि जी अपनी बात कैफ़ी आज़मी के शेर से समाप्त की, कोई तो ज़िम्मा ले/कोई तो सूद चुकाए/ उस इंकिलाब का/ जो आज तक उधार सा है 
इसके बाद इस्पातिका पत्रिका के संपादक डॉ. अविनाश कुमार ने कहा कि मुक्तिबोध का अधिकांश लेखन प्रतिधवन्यात्मक है. वो बार बार लिखते हैं और उस लिखे हुए पर अपने को परखते हैं. जितने वे आत्म सजग हैं, उतने ही वे विश्व सजग भी हैं ! मुक्तिबोध की जो कवितायेँ हैं, वो जितनी ब्रह्मराक्षसीय हैं, उतनी ही सौम्य हैं. जितनी उबड़-खाबड़ हैं, उतनी ही शालीन हैं. जितनी भयावह बिम्बों से भरी हुई हैं, उतनी ही मधुर, उतनी ही शांत, उतनी ही मौन और उतनी ही चित्तार्षक. ये विरुद्धों का सामंजस्य है. ये अंतर्विरोधी तत्वों का मेल मुक्तिबोध की रचनाएँ हैं. और ये संयोग की बात नहीं, हमारे जीवन का सत्य है, हमारा जीवन अंतर्विरोधों से भरा पड़ा है. एक शब्द ये जो चल रहा है, 'अँधेरा समय' है. मैं थोड़ा सा इसे बदलना चाहूँगा. मैं एक प्रस्ताव रखता हूँ, कि यह अँधेरा समय होने से ज्यादा अतिरिक्त रौशनी का समय है. प्रायोजित रौशनी का समय है. यह हैलोजन समय है. यह चकाचौंध का समय है. यह रौशनियों के अश्लील नृत्य का समय है. कलाबत्तू समय है. ये अँधेरा समय नहीं है. ये सब कुछ इसलिए है, क्योंकि ये बाज़ार का समय है. ये बाज़ार समय है जो रौशनियों के गुंजलक में हमारे विचारों को सुला देता है. हमारे विचारों को बाँध देता है.
आज का टेलीविजन में हम क्या देखते हैं ? क्या हमारी आँखों के सामने उसकी चकमक में दिखाई पड़ता है? हमारी संवेदनाएं नायिका के साथ दौड़ने लगती हैं. टीवी देखते हुए हुए हम समीकृत होते हैं, तदात्मीकृत हो जाते हैं. ये बाज़ार करता है रौशनियों के पीछे, क्यों ? क्योंकि उसकी जरूरत है. टीवी में दुःख से पीड़ित नायिकाएँ पर्याप्त सजी धजी दिखलाई पड़ती हैं ! क्यों ? क्योंकि, दुःख भी बाज़ार की वस्तु है !  बड़ी विचित्र विडम्बना होती है कि हमें दुःख भी बताना है, लेकिन बहुत सजा के बताना है. ये बाज़ार की चालाकी है, बाज़ार की शर्त है. आप दुःख को बेचिये. ये बाज़ार दर्शक की बेचैनी, उत्कंठा को भुना कर करता क्या है? वह सिर्फ़ हमारी संवेदनाओं के साथ खेलता है. तीस मिनट के एपिसोड में आप पन्द्रह मिनट का एपिसोड देखते हैं. हम जब संवेदनात्मक स्तर पर संघनित होते हैं, जब केन्द्रीभूत होते हैं, जब हम कुछ जानने को इन्वोल्वड् होने लगते हैं, ठीक उसी समय विज्ञापन हमारे सामने आता है. यह बहुत चालक समय है. यह बाज़ार बहुत चालक समय है. जो रंगीनी के माध्यम से, चकाचौंध के माध्यम से, रौशनियों के खेल के माध्यम से हमारी संवेदनाओं को कब्ज़े में ले लेता है. 
ये विचित्र है. ये बाज़ार, ये सत्ता, सब एक साथ शामिल हैं, और मुक्तिबोध इसे विचित्र प्रोसेशन कहते हैं. एक विचित्र जुलुस कहते हैं. उसमें सब शामिल हैं. उसमें नेता हैं, उसमें ब्यूरोक्रेट्स हैं, उसमें डोमा जी उस्ताद हैं, उसमें नगर कोतवाल है, उसमें शिक्षक हैं, लेखक हैं, सब शामिल हैं. सब एक मातम में, एक मौन जुलुस में जा रहे हैं.  कोई कुछ कर नहीं रहा है. किसी के चेहरे पर कुछ नहीं हो रहा है. "सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक्..... कि चढ़ गया उर पर कहीं कोई निर्दयी, नपुंसक श्रद्धा सड़क के नीचे की गटर में छिप गई, बड़े बड़े चेहरों पर स्याहियाँ पुत गयीं, कहीं आग लग गई, कहीं गोली चल गई". ये मुक्तिबोध हैं, जो समझ गए हैं कि इस जुलुस में, इस प्रायोजित जुलुस में सब शामिल हैं, और सब चुप हैं. सब सुविधाभोगी हैं. सब घोंघा बसंती चरित्र के हैं. जैसे घोंघा अपनी खोल से सिर्फ़ भूख और सेक्स के लिए निकलता है, ठीक उसी तरह से हम मध्यवर्गीय जीव जंतु जो हैं, वो इन्हीं दो उद्येश्यों के लिए बाहर निकलते हैं. हमारी सारी क्रांति सड़क के किनारे पड़ी हुई वो कुतिया है, जिसे कोई लतियाकर चला जाता है. ये बिडम्बना हमारी समय की है. और ये बिडम्बना सब समय की है. सब समय से ऐसा होता रहा. इसलिए मुक्तिबोध को ब्रह्मराक्षस बनना पड़ा. ये ब्रह्मराक्षस है क्या ? ये सकारात्मक शब्द है, या नकारात्मक पद है? ये है क्या? तो ये ब्रह्मराक्षस जो मैं समझता हूँ, जो सब समझते हैं, जिनको मैंने पढ़ा भी है, जिनसे मैंने सीखा भी है, ये ब्रह्मराक्षस बिलकुल मध्यवर्गीय व्यक्ति है. जो ज्ञान और कर्म के बीच संतुलन की तलाश में विक्षिप्त सा है. वो परेशान है, कि जो मैं करना चाहता हूँ. जो मैं बदलाव लाना चाहता हूँ. उसके लायक कुछ सजल उर शिष्य मिल जांय. और वो नहीं मिलता ! नहीं मिलता तो वह ज्ञान उसको मथता है. उसकी प्रतिध्वनि उसे मथती है. वो कहता भी है कि 'मेरी खोई हुई अभिव्यक्ति अनिवार आत्मसंभवा'... जो बार बार दिखाई देती है, फिर गायब हो जाती है. वो क्या है ? यह वही व्यक्ति है, वही मध्यवर्गीय व्यक्ति है, जो अपनी जड़ताओं से परे होकर सकर्मक हो सके, एक्टिव हो सके, एक्टिविस्ट बन सके. उसका साहित्य सिर्फ़ किताबों में ना रह जाय. उसकी संवेदना सिर्फ़ किताबों में ना रह जाय बल्कि जमीन पर उतरे, सड़क पर उतरे. इसलिए मुक्तिबोध कुछ और कवियों के साथ एक बहुत बड़े एक्टिविस्ट कवि हैं. मुक्तिबोध घोर राजनितिक कवि हैं. और ये दोनों चीजें होते हुए भी मैं दावे के साथ कहता हूँ, कि मुक्तिबोध पहले मुकम्मल कवि हैं. क्योंकि बकौल नामवर सिंह, 'अँधेरे में' जो कविता है, वह कविता के बारे में कविता है. कविता का जन्म, कविता क्यों लिखी जाय, क्यों कोई कवि बन जाता है? क्यों कोई कविता लिखता है? ये सब अगर समझना है तो 'अँधेरे में' को पढ़ना है. मुक्तिबोध सम्वेदनाओं के कवि हैं, भावनाओं के कवि नहीं. क्योंकि भावनाएं तात्कालिक होती हैं, संवेदनाएं बहुत छांट-पछाड के बाद, तौल-मौल के बाद, उथल-पुथल के बाद पक करके संवेदना बनती है, और संवेदनात्मकता का निर्वहन भी कविता का मूल धर्म होना चाहिए, मेरे ख्याल से. क्योंकि उसी संवेदना की तलाश में मुक्तिबोध फैंटेसी की ओर जाते हैं. ये जो दिख रहा है, वो जब संवेदनशील के ह्रदय में जायेगा. तो क्या शक्ल लेगा ? यह जो ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान का जो ये चक्कर है, वो यही है, अंदर से बाहर और बाहर से अंदर. बाह्य का अभ्यांत्रिकरण और अभ्यांत्रिकृत बाह्य का प्रकटीकरण. ये जो कठिन काम है, ये जो तनी हुई रस्सी पर चलना है, ये सब मुक्तिबोध अपनी कविता से कर पाते हैं. इसलिए मुक्तिबोध मुक्कमल कवि हैं. मुक्तिबोध जब कविता लिखते हैं, जब वो कवि होते हैं, तो पूरे के पूरे कवि होते हैं. और अगर नहीं होते, तो बड़े आराम से वे कहानीकार हो जाते हैं. और वहाँ भी बात नहीं बनती, तो डायरी लिखते दिखाई पड़ते हैं. हर वो विधा वह खुद नहीं चुनते. वो जो कहना चाहते हैं, वह अपने आप से इन विधाओं में संक्रमित हो जाती है. मुक्तिबोध जानबूझकर विधाएं नहीं चुनते, उनकी रचनात्मकता, उनका कथ्य विधाएं बदल लेता है. ये महत्वपूर्ण बात है, मुक्तिबोध के विषय में. और ये बड़ी जनधर्मी शैली है. मुक्तिबोध पढ़े लिखे होने के बावजूद भी, संस्कृत, मराठी, हिंदी और अंग्रेजी के जानकार होते हुए भी बड़े ही गंवारू कवि हैं, बड़े ही देहाती कवि हैं, बड़े ही देशज कवि हैं !
युवा कवि और शोधार्थी नीलाम्बुज सिंह ने अपना वक्तव्य शुरू करते हुए कहा, कि मुक्तिबोध से उनका पहला परिचय कक्षा आठवीं में पढ़ी इस कविता से हुआ, जबकि उस वक्त उन्हें इसके कवि का नाम नहीं मालूम था ! कविता थी, ‘तुम्हारी संवेदनाओं से मेरी संवेदना, तुम्हारी प्रेरणाओं से मेरी प्रेरणा इतनी भिन्न है. कि जो तुम्हारे लिए विष है, मेरे लिए अन्न है !’ मुक्तिबोध बड़े सरल कवि हैं, चाहे कोई कुछ भी कहे कि जटिल हैं. मुक्तिबोध सरल इसलिए हैं कि मुक्तिबोध की हम सिर्फ़ कविता पढ़ेंगे, तो शायद वो हमें जटिल लगेंगे. लेकिन अगर उनके गद्य पढ़ेंगे, उनकी कहानियाँ, उनकी आलोचना, उनकी डायरी, तो वे बिलकुल सरल लगते हैं. क्योंकि उन्होंने अपना दिल खोलकर रखा हुआ है.  मार्क्स ने कहा था एकबार कि विचारधारा भाषा से अलग नहीं होती, भाषा में ही छिपी रहती है. मुक्तिबोध भावना और संवेदना में अंतर करने वाले कवि, साहित्यकार हैं, जिन्होंने जीवन को जिया, जो कहा उसपर वे कायम रहे. उनकी पंक्तियाँ हैं, ‘... ये गंभीर अनुभव सब. ये विचार वैभव सब, भीतर की सरिता यह... मौलिक है, मौलिक है.’ क्यों मौलिक है ? क्योंकि, यह सब उस व्यक्ति को प्यारा है, जिसने मुक्तिबोध के संघर्ष को स्वीकार किया है. वह व्यक्ति कौन है, हम उसके बारे में सिर्फ़ कयास लगा सकते हैं लेकिन, कविता उनकी जो कहती है कि, ‘सहर्ष स्वीकारा है.’ वह मुक्तिबोध की जनता हो सकती है, उनकी पत्नी हो सकती हैं, वह स्वयं हो सकते हैं. लेकिन मुक्तिबोध एक ऐसे रचनाकार हैं, जो हर लाइन में जितनी उन्होंने लिखी हैं,  उन सबमें मुझे तो बार बार यही लगता है कि अपनी आलोचना कर रहे हैं, आत्मालोचना कर रहे हैं. आत्मालोचक कवि हैं. आत्मालोचक हैं, आत्मालोचक रचनाकार हैं.
मुक्तिबोध को अँधेरे से बड़ा प्यार है, और इसका कारण है कि अँधेरा सत्य है. उजाला सत्य नहीं है. ज्योति सत्य है लेकिन अँधेरा उससे बड़ा सत्य है. हम सब मुक्तिबोध से कुछ सीख सकते हैं, तो वह है आत्मालोचना. कि हम अपनी कसौटियों पर कितने खरे हैं ?
नीलाम्बुज ने पूर्व वक्ता अजित की बात के प्रसंग (समारोह प्रियता) में कहा कि मुक्तिबोध ने एक जगह लिखा है कि मुक्ति के रास्ते अकेले में नहीं मिलते. समारोह का अर्थ क्या है ? सम + आरोह : एक साथ उठाना, गिरना नहीं. उठाना एक साथ, समाजवादी विचारधारा यही है.
“तार-सप्तक” का ज़िक्र करते हुए नीलाम्बुज ने कहा कि मुक्तिबोध ने उसकी भूमिका में लिखा है कि मैं मार्क्सवादी हूँ. और उसके आठ साल बाद नेमीचन्द्र जैन को 1951 में लिखे एक पत्र में  वे लिखते हैं, ‘अब मैं मार्क्सवादी नहीं हूँ. और मुझे तो यह अगता है कि जब मैं कहता था तब भी नहीं था’. ये एक सच्चे व्यक्ति की आत्मस्वीकृति है. शायद उन्होंने जब मार्क्स का संघर्ष देखा होगा तो उन्हें अपना संघर्ष छोटा लगा होता, शायद इस आधार पर उन्होंने कहा कि मैं मार्क्सवादी नहीं हूँ ! और ये अच्छी बात है. व्यक्ति को किसी का भी भक्त नहीं होना चाहिए, किसी का भी. मुक्तिबोध ने लिखा है कि ‘मेरी माँ ने मुझे प्रेमचंद का भक्त बनाया’. लेकिन मैं ये नहीं मानता. भक्ति जहाँ आती है, वहाँ तर्क नहीं चलता. मुक्तिबोध ने प्रेमचंद की भी आलोचना कहीं ना कहीं की होगी. मेरी जानकारी में नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कोई अन्य इस बात को बताएगा. लेकिन मेरी जानकारी में प्रेमचंद पर प्रश्न ना भी किया हो मुक्तिबोध ने यह भी नहीं लिखा है. कहीं का कहीं हो सकता है लिखा हो.
देशभक्ति और देशप्रेम में नीलाम्बुज के अनुसार देशप्रेम ज्यादा बड़ा शब्द है. क्योंकि भक्ति और प्रेम दो अलग अलग धारणाएं हैं. कैलेंडर पर टंगा हुआ नक्शा देश नहीं होता, यही देश है यहाँ. जो बच्चे सुन रहे थे, ये जो भाई (लाइट –साउंड ऑपरेटर) बैठा हुआ है, यही हमारा देश है. कविता को लोक तक पहुँचाने की बात नीलाम्बुज ने कही.
झारखण्ड प्रलेस के महासचिव और कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. मिथिलेश कुमार सिंह ने अपने उद्बोधन में कहा कि, मुक्तिबोध पर बड़ा आरोप लगता है कि बड़े जटिल कवि हैं. कुछ तो अस्तित्ववादी बता देते हैं, कुछ अध्यात्मवादी, कुछ रहस्यवादी भी बता देते हैं. और इसलिए कहते हैं कि इनको समझना मुश्किल है. भवभूति की एक पंक्ति याद आती है कि ‘उपस्यते को अपि मम समान धर्मा/ तारोहियम निरवधि विपुला च् पृथ्वी’ कभी कोई हमारा समानधर्मा पैदा होगा. जो हमारी बातों को समझेगा. हमारे साहित्य को समझेगा. हमारे लिखे हुए को समझेगा. या कहें कि गुने हुए को समझेगा. और ऐसा इसलिए संभव है कि काल जो है, वह निरवधि है. इसका कहीं कोई अंत नहीं है. और पृथ्वी जो है, दुनिया जो है, वह विपुल है, बहुत बड़ी दुनिया है. और इस बड़ी दुनिया में हम मुक्तिबोध जैसे कवि पर इस छोटी सभा में विचार कर रहे होते हैं तो ये सभा दरअसल छोटी होती नहीं है. सर गिनकर के सभा का मूल्यांकन नहीं कर सकते और खासकर के साहित्यिक सभा का मूल्यांकन नहीं किया जाना चाहिए. और नहीं किया जा सकता है. पर यहाँ जो समपर्ण, बड़े बड़े शहरों में देखें, जमशेदपुर में भी देखें, राँची देखें और दिल्ली में जांय... तो वहाँ और स्थिति खराब मिलेगी. वहाँ अँधेरा जो है कहीं ज्यादा घना है. वहाँ तो दो बजे बुलाया है पाँच बजे जाना है, कहीं दूसरी सभा में तो जाने दो. यहाँ एक बजे बुलाया गया है, दो बजे ढाई बजे से शुरू हुआ है, सात बजे तक (लौट) जा पाएंगे कि नहीं पाएंगे कोई ठिकाना नहीं. लेकिन जायेंगे तो एक उम्मीद से भर कर जायेंगे.
उन्होंने कहा कि पहले वक्ता नरेश जी को उद्धृत करते हुए कहा कि उन्होंने (नरेश कुमार ने) कहा कि मुक्तिबोध अँधेरे के विरुद्ध प्रतिरोध के कवि हैं, और टी.एस. इलियट की भी चर्चा की (नरेश कुमार ने). टी.एस. इलियट और मुक्तिबोध का जो सम्बंध बनता है, खासकर के उनके निबंध को देखें यदि, परम्परा और वैयक्तिक प्रज्ञा में. परम्परा और वैयक्तिक प्रज्ञा में जिस तरह से टी.एस. इलियट कहते हैं कि परम्परा में कैसे कोई रचनाकार नया जोड़ता है. और जब वह नया जोड़ता है, तभी वह प्रासंगिक रह पाता है. मुक्तिबोध परम्परा को भी पूरी शिद्दत से ग्रहण करते हैं. और पूरे कौशल से अभिव्यक्त भी करते हैं. पर परम्परा उनके लिए वही नहीं है, जो कि परम्परा मोहन भागवत जी के लिए है, जो परम्परा आदरणीय मोदी जी के लिए है, या जो परम्परा तरुण विजय जी के लिए है ! मुक्तिबोध जब परम्परा को ग्रहण करते हैं, मुक्तिबोध वेदों में भी जाते हैं, मुक्तिबोध राम कथाओं में भी जाते हैं, मुक्तिबोध महाभारत की कथाओं में भी जाते हैं, और जब मुक्तिबोध ये कहते हैं, ‘अँधेरे में’ ही देखिये कि शुनःशेप और अजीर्गत का भी प्रसंग आता है. जहाँ एक पिता अपने बेटे को स्वर्ण मुद्राओं के लालच में लगातार हाथ पर हाथ बेचना चाहता है. उपनिषदों में इसकी कथा आती है. इससे पहले भक्तिकाल में तुलसी का भी कहना ‘बचत बेटा-बेटकी’. इतनी मज़बूरी हो गई है कि लोग बेटा बेटियों को बेचने के लिए तैयार हैं. हमलोग भी क्या कर रहे हैं ? जो मध्यवर्गीय विडम्बनाएँ हैं, उन विडम्बनाओं के लिहाज से यदि देखें, हम सब क्या कर रहे हैं. हम जैसे कैरियरिस्ट बने हैं, उसी तरह से अपने बच्चों को भी कैरियरिस्ट बनाना चाह रहे हैं. तो फिर हम कैसी दुनिया रच सकते हैं ! और इसी वज़ह से देखिये, तो मुक्तिबोध ये हैं. वो कहते हैं कि भई उसके लिए जरुरी है कि हमारा एक जीवन दर्शन हो. स्पष्ट जीवन दर्शन हो. और जब वो जीवन दर्शन की बात करते हैं, तभी शायद वो ये कहते हैं, कि ‘कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूँ, वर्तमान समाज में मैं चल नहीं सकता. पूँजी से जुड़ा हुआ ह्रदय बदल नहीं सकता’. और पूँजी से जुड़ा हुआ ह्रदय कैसे नहीं बदलेगा ? नहीं बदलेगा और बदल देगा. बदल क्या देगा, आप देखिये तात्कालिक घटनाओं पर. मुक्तिबोध का समय भी अँधेरे का ही दौर था एक तरह से. और ये अँधेरे का दौर जब से साम्राज्यवाद फैला है, तब से चल रहा है. साम्राज्यवाद अँधेरा ही फ़ैलाने का काम करता रहा है. और आज उसी भूमिका में नव-साम्राज्यवाद भी आ चुका है. और इस नव-साम्राज्यवाद को बढ़ाने में, जो इसको स्थापित करने में रीगल और थेचर की जोड़ी ने जो भूमिका निभाई थी, ब्रिटेन और अमेरिका में. आज देखिये कि फिर से एक संयोग घटित हुआ है, एक तरफ टेरेसा मे है, तो दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रम्प भी आगे हैं. जो कि भाई, बड़े नामी बिल्डर हैं. अपने यहाँ बिल्डर तो नहीं हैं भईया, बड़ा त्यागी हैं, लेकिन बिल्डरों के अनन्य मित्र हैं. किसी का भगना रिजर्व बैंक का गवर्नर है. और जब भगना कोई काम करेगा तो मामा जी को पता ना चले, ऐसी बात नहीं हो सकती है. (500-100 रूपये को समाप्त करने के समकालीन सरकारी फैसले का संदर्भ) और जब बात पता चलेगी, तो जो अपने पक्ष का पूंजीपति है, उसका हित-रक्षण होगा. और जो दूसरे पक्ष का पूंजीपति है, उसकी पूँजी को हम भट्ठा बैठा देंगे. और वो भट्ठा बैठाने का काम आप देख रहे हैं. तो समय कितने अँधेरे का है, और कितना अँधेरा घना होता जा रहा है. और भईया दिया जलना कब मना है !  हमारे भीतर के मन का जो उजाला है, मन का जो अँधेरा है, उस अँधेरे को दूर करने के लिए जिस उजाले की जरूरत है, वह उजाला मुक्तिबोध की जो आत्मालोचनात्मक रचनाएँ हैं, खास कर के कवितायें जो उनकी हैं, उन कविताओं को देखें, चाहे उनके लेखों को देखें, उनकी कहानियों को देखें, वो आलोचना, वो आत्मालोचना हमको मिलती है. काहे कि मुक्तिबोध के लिहाज़ से जो आलोचना भी है, वह जीवन की आलोचना है, काव्यालोचना सिर्फ़ काव्य की आलोचना, पाठ की आलोचना नहीं, वह जीवन की आलोचना है. और जब तक कोई भी रचना, कोई भी साहित्य जीवन की आलोचना यदि वह नहीं हो पाता है, तो उसकी प्रासंगिकता संदिग्ध रहेगी. कारण, कि साहित्य जो है, जिसकी बात हमलोग करते हैं, सबका हित. नहीं, कभी भी सबका हित कोई नहीं करता है ! ‘सुरसरी सम सबका हित होई’ ऐसा नहीं कि गंगा के पानी की तरह सब उसको पी लें ! और आज तो खैर उस गंगा पर भी कब्ज़ा होने लगा है. बूँद बूँद कई नदियाँ जो हैं, छत्तीसगढ़ में बिक चुकी हैं. कितने पहाड़ बिक चुके हैं. कितना कोयला खदान के लिए सबकुछ बेचा जा चुका है. और अचानक हमको पता चलता है कि यहाँ फलाना कम्पनी आएगी, और अब वो यहाँ से कोयला निकालेगी. यहाँ से तांबा निकलेगी, यहाँ से आयरन-ओर निकालेगी. यह हमको अचानक पता चलता है, हमको बताने की भी जरूरत महसूस नहीं होती है. राजनितिक रूप से भी आप यदि देखें, मुक्तिबोध राजनीति के कवि हैं. और मुक्तिबोध साहित्य और राजनीति को समानधर्मा भी मानते हैं. और जब समानधर्मा की बात है, तो समानधर्म निभाने की भी अपेक्षा वो हमसे करते हैं. साहित्यकारों से भी करते हैं और खुद उस धर्म को निभाते भी हैं.
बात अभी नीलाम्बुज भाई ने कही थी, कि बुद्ध जी ने कहा, ‘अप्प दीपो भव’. बुद्ध जी ने यह भी कहा था, ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ ये नहीं कहा था, ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’. क्योंकि वो जान रहे थे, सर्वजन की बात हम करेंगे तो जो अल्पजन हैं, हमेशा उनका वर्चस्व बना रहेगा. और ये वर्चस्व की संस्कृति तभी हट सकती है, जब बहुजन जो है, उसके हित सधेंगे. और बहुजन के हित जब सधेंगे, तो सुख की प्राप्ति उसको भी होगी. क्योंकि बुद्ध के दौर का अँधेरा, या बुद्ध के पहले के दौर का अँधेरा देखें, या बुद्ध के दौर के बाद का अँधेरा देखें, इन तमाम अंधेरों में एक समानता मिलेगी कि जहाँ भी जिनके पास पूँजी है, जो गाँव में कहते हैं कि ‘जेकर हाथ में हँडिया देव, तेकर पीछे सब कोई !’ यानि, जिसके पास भंडार की चाबी होती है, जिस घर में. सारे लोग उसी की ओर ताकते रहते हैं. और खासकर के ये (मुहावरा) उस दौर का है, जब होता था कि नाप के चावल मिलेगा और नाप के दाल मिलेगा, हल्दी भी इतना सब में दिया जायेगा, बाकि के इतने में खाना बनाना है और आपको पूरा देना है. बहू का कौशल उसी में माना जाता था कि कैसे सबको खिलाती है. और यही वज़ह देखिये, कि बहुएँ प्राय: भूखी रहती थीं और जल्दी बूढ़ी होती थीं. और स्त्रियों की औसत आयु सीमा जो हुआ करती थी, प्राय: कम हुआ करती थी. लेकिन अब क्या हुआ था कि चाबी दे दिए हैं आपको. खाना बना है आपको, लेकिन इतने बनाना है. स्त्रियों के संदर्भ में, स्त्री प्रश्नों को लेकर भी यदि देखें या और बाकि प्रश्नों को लेकर भी देखें, और खास कर के इस देश की राजनिति के जो प्रश्न हैं, उन प्रश्नों को भी यदि हम देखें तो सबके लिहाज़ से हमको ये सोचना पड़ेगा, कि मुक्तिबोध हमें किस रूप में, और कहाँ तक रास्ता दिखाते हैं. मुक्तिबोध दुरूह जरुर लगते हैं, लेकिन मुक्तिबोध की कविताओं को समझने के लिए एक प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है. मुक्तिबोध की पूरी रचनाओं को समझने के लिए, उनकी कहानियों को भी पढ़िए. तो कहानियों में भी जिस फैंटेसी वाली शब्दावली का इस्तेमाल कविताओं में भी हम देखते हैं, वही फैंटेसी उनकी कहानियों में भी एक हद तक विद्यमान मिलती है. और इसी वज़ह से मुक्तिबोध सबको दुरूह लगते हैं, काहे कि मुक्तिबोध को समझने के लिए जो पढ़ने की जरूरत है, वो हम नहीं पढते हैं, और उसके बगैर हम चाहते हैं समझ लेना. काहे कि मुक्तिबोध के साथ साथ यदि हम प्रगतिशील दौर के अन्य कवियों को देखें, केदारनाथ अग्रवाल को देखें, नागार्जुन को देखें... तो नागार्जुन ‘गिन लो जी गिन लो, मजदूर की छाती में कै ठो हाड़ है ? गिन लो जी गिन लो, मास्टर की छाती में कै ठो हाड़ है गिन लो.’ तो लगता है कि हाँ, साफ साफ़ ये बात कह रहे हैं. ‘जन कवि हूँ, क्यों हकलाऊं?’ ये नागार्जुन घोषणा करते हैं. मुक्तिबोध ऐसी कोई घोषणा नहीं करते हैं. मुक्तिबोध, जैसा कि हमारे पूर्व वक्ताओं ने कहा कि आत्मालोचना के कवि हैं. और मुक्तिबोध निरंतर आत्मालोचक की भूमिका में रहते हैं. और यही आत्मालोचना की जो भूमिका है, आत्मालोचक की जो उनकी भूमिका है, वह मुक्तिबोध को महान कवि बनाती है. और मुक्तिबोध यदि दूसरे कवियों से भारी पड़ते हैं, तो इस लिहाज से पड़ते हैं, कि मुक्तिबोध ने अभिव्यक्ति के लिए जो खतरे उठाये, वो खतरे सिर्फ़ अभिधा में नहीं थे, बल्कि मुक्तिबोध ने जो शिल्प ग्रहण किया, वह भी एक तरह का खतरा था और उसी खतरे की वज़ह से उस खतरे को बाकि लोग कम भाँप पाए. आलोचकों को वो बात कम समझ में आई. इसी वज़ह से मुक्तिबोध दुरूह हो जाते हैं. मुक्तिबोध रहस्यवादी हो जाते हैं, किसी को तो आध्यात्मवादी भी लगने लगते हैं, अस्तित्ववादी भी लगने लगते हैं ! लेकिन मुक्तिबोध पुरी तरह से दुनियादार कवि हैं. इस दुनियादारी में उनका पूरा यकीन है. और इस यकीन को वे अपनी कविताओं के माध्यम से और अपने गद्य के माध्यम से, हर तरह से वे पूरा करते हुए नज़र आते हैं.
मित्रों, मुक्तिबोध के लिए उनकी अंतर्रात्मा की भी बात आई. आंतरिक मन, अंतर्मन और बाह्य मन, इसका द्वन्द निरंतर चलता रहता है, उनके यहाँ. और वो जब चलता है, तो जिसके तीन स्तरों की जब बात की जाती है, इन तीनों क्षणों को जानना जरूरी होगा. मुक्तिबोध जब समीक्षा लिखते हैं, अपने समकालीनों की भी, अपने पूर्ववर्तियों की भी, खास करके छायावाद की समीक्षा जब वे लिखते हैं, तो छायावाद में पंत उनको बड़े कमजोर कवि नज़र आते हैं. इसलिए कि उनके जीवन में संघर्ष नहीं है. नामवर जी ने कभी यह भी कहा था, पंत का तीन चौथाई कूड़ा है ! और तब बड़ा हंगामा बरपा था.
लेकिन मुक्तिबोध कहते हैं कि प्रसाद का जीवन संघर्ष है, और प्रसाद से भी ज्यादा जो निराला का जीवन संघर्ष है, इसीलिए उनकी कवितायेँ ज्यादा विश्वसनीय प्रतीत होती हैं, बजाय कि पंत की. वहीं महादेवी को भी देखिये कि महादेवी के जो जीवन संघर्ष रहे, एक स्त्री के नाते. वो संघर्ष कैसे महादेवी के साहित्य में प्रकट होता है. कविताओं में भी देखें, और सबसे बड़ी बात ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ में भी देखें. कि वो जो कड़ियाँ हैं, वो कड़े नहीं हैं ! कड़ियाँ जो बन गई हैं, बंधन हैं, पाँव की बेडियाँ हैं और उन बेड़ियों को तोड़ने के लिए महादेवी सिर्फ़ कविता में बात नहीं करती हैं, वो गद्य में भी उतरती हैं. और जब गद्य में उतरती हैं, तो वो हिंदी में स्त्री-विमर्श का प्रस्थान बिंदु माना जाता है.
मुक्तिबोध की आलोचना के लिहाज़ा से भी देखें, या उनकी कविताओं के लिहाज़ से देखें, तो मुक्तिबोध बाकि अपने समकालीनों के मुकाबले, काहे कि वो नई कविता के आत्म-संघर्ष की जब बात करते हैं, उसके सबकुछ को एक सिमटे हुए दायरे में देखते हैं, तो उनको लगता है कि आपको अपने दायरे को बढ़ाना पड़ेगा. जिस अंत:करण के आयतन की बात वो करते हैं, उस आयतन को विस्तृत करना पड़ेगा. तभी जब आभ्यंतर हमारा विस्तृत होगा, तभी बाह्य जगत को हम विस्तृत कर सकते हैं. उसको विस्तार दे सकते हैं. और यदि ये विस्तार हम नहीं दे पाते हैं, तो फिर जो अँधेरा है, वो निरंतर घना होता चला जाता है. और अँधेरा का निरंतर घना होते जाना, कहीं न कहीं एक संकट का प्रतीक है. और संकट जब जितना ज्यादा आता है, तब उतने अधिक प्रयत्न की आवश्यकता होती है. और यदि हम अपने प्रयत्न को जारी रखेंगे, लगातार हम ये कोशिश करेंगे, कि इस अँधेरे के खिलाफ़ हमको दीया तो जलाना ही है. मुक्तिबोध ऐसे कवि हैं, जो हमको निरंतर दीया नहीं बल्कि, मशाल जलाने की प्रेरणा देते हैं. और वो मशाल सिर्फ़ जलाना नहीं है, बल्कि दूसरे के हाथ में सौंपना है. ये मशाल यदि हम किसी को जलाते हुए दूसरे के हाथ में सौंप सकते हैं, अपनी अगली पीढ़ी को दे सकते हैं, तो फिर मुक्तिबोध पर विचार करना हमारे लिए सार्थक होगा. अन्यथा मुक्तिबोध पर विचार करने की ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है ! मुक्तिबोध को हम दुरूह बताते रहें, मुक्तिबोध को हम जटिल कवि बताते रहें, मुक्तिबोध को अस्तित्ववादी बताते रहें, रहस्यवादी बताते रहें, हम अपनी खोल में सिमटे रहें, यही हमारी नियति होगी. यही हमारी विवशता होगी. इन विवशताओं से उबरने के लिए यह जरुरी है कि मुक्तिबोध को समझने के लिए मुक्तिबोध के स्तर पर हमको आना होगा, तभी शायद हम मुक्तिबोध के साथ सही न्याय कर सकेंगे. और अँधेरे समय में हम और मुक्तिबोध दोनों ही प्रासंगिक बने रहेंगे. 
घाटशिला में शरद की संध्या उतर आई थी. वैचारिक सत्र के बाद रंगमंचीय प्रस्तुतियों की बारी थी. इस बीच डॉ. अविनाश कुमार सिंह द्वारा सम्पादित पत्रिका “इस्पातिका” के दसवें अंक (भारतीय उपन्यास अंक) का विमोचन किया गया.
चाय और जलपान के संक्षिप्त से विराम के बाद पहली प्रस्तुति चक्रधरपुर से आये ख्यातिप्राप्त रंगकर्मी दिनकर शर्मा ने मुक्तिबोध की कहानी ‘पक्षी और दीमक’ की अपने एकल अभिनय सह कथा पाठ शैली में बहुत सुन्दर प्रस्तुति दी और कहानी को जीवंत कर दिया. उनके अभिनय के दौरान निकले सचमुच के आँसू इसके प्रमाण थे. सभी ने तालियाँ बजाकर उनके अभिनय के उठान को सराहा. विशेषकर उनके बाद अपनी प्रस्तुति देने वाला युवा दल उत्साह से भरकर तालियाँ बजाता दिखा.
इसके बाद प्रलेस घाटशिला के नाट्यदल के बच्चों ने मुक्तिबोध की कविता ‘भूल-गलती’ को प्रस्तुत किया. कविता की रंगमंचीय प्रस्तुति में इनका श्रम देखा जा सकता था. अपनी अनगढ़ सी प्रस्तुति के वावजूद दर्शकों को अपने आत्मविश्वास से प्रभावित करने में दल सफल रहा. प्रस्तुति में शामिल रहे सुमन (राजा – भूल गलती), विभूति मिश्रा (कैदी – ईमान), मनीषा और नीलिमा (मुख्य सूत्रधार – 1 और 2), खुशी, अनीषा, वृष्टि (दरबारी), शीतल प्रसाद (सूत्रधार – 3), संगीता मानकी (अंगरक्षक) और रुपाली शाह (सिपाही). नाट्य प्रस्तुति का नेपथ्य स्वर और संगीत शेखर मल्लिक का. संयोजन ज्योति मल्लिक का और निर्देशन संयुक्त रूप से ज्योति मल्लिक और शेखर मल्लिक का रहा. प्रयुक्त गीतों के धुन जसम – हिरावल, पटना और सर्कल थियेटर कंपनी, दिल्ली के नाटक ‘मुक्ति’ से साभार लिए गए थे. 
इसके अलावा प्रलेस के कलाकारों ने जनगीत ‘दबे पैरों से उजाला आ रहा है’ और ‘रुके ना जो झुके ना जो’ भी गाया. कार्यक्रम में स्थानीय विभिन्न विद्यालयों के बच्चों के बीच आयोजित चित्रांकन और स्लोगन प्रतियोगिताओं के पुरस्कार भी वितरित हुए, जिन्हें डॉ. मिथिलेश सिंह, कॉम. शशि कुमार और निलाम्बुज के हाथों दिया गया. मंच संचालन में संगीता मानकी और शेखर मल्लिक की साझेदारी रही. पहले खण्ड में संगीता ने और दूसरे खण्ड में शेखर ने संचालन किया. धन्यवाद ज्ञापन शेखर मल्लिक ने किया और इसी क्रम में कार्यक्रम के आयोजन की चुनौतियों के बाबत चर्चा भी की. कार्यक्रम में स्थानीय जनता की सन्तोषप्रद उपस्थिति रही. घाटशिला जैसे छोटे से कस्बे में स्तरीय गम्भीर साहित्यिक आयोजन और प्रलेसं के प्रयासों की लोगों ने सराहना की.
रिपोर्ट : ज्योति मल्लिक (सह संयोजक – प्रलेस, घाटशिला इकाई)







शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

रिपोर्ट



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