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रविवार, 12 अगस्त 2018

फासीवादी उभार और प्रतिरोध का अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य-नागासाकी दिवस पर हुई चर्चा


अरविंद पोरवाल
सारिका श्रीवास्तव

इंदौर, 12 अगस्त 2018।
इतिहास की सबसे भीषण और अमानवीय घटना हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए परमाणु हमले को याद करते हुए अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता  संगठन ने 9 अगस्त 2018 को नागासाकी दिवस पर एक बैठक का आयोजन किया। विश्वशांति के संदेश के साथ परिचर्चा का आयोजन किया गया। जिसमें वेनेजुएला, क्यूबा, फिलीस्तीन, पाकिस्तान और बांगलादेश के हालिया घटनाक्रम और उसके भारत पर असर को लेकर बात की गई। विनीत तिवारी ने वेनेजुएला के हालातों पर कहा वेनेजुएला में चुनावों को प्रभावित करने की अमेरिका ने कोशिश की, लेकिन वे कामयाब नहीं हुए। जिसमें राष्ट्रपति मदुरो के नेतृत्व में जनतांत्रिक सरकार जीतकर सत्ता में आ गई। सरकार को अस्थिर करने के लिए हाल ही में राष्ट्रपति की सभा में ड्रोन से विस्फोट करवाया गया। जबकि मीडिया द्वारा यह प्रचारित किया गया कि आसपास रखा कोई सिलेंडर फटा हो। जब वेनेजुएला ने वीडियो जारी किया तो सच्चाई सामने आई। कोलंबिया के ड्रग माफिया के जरिये अमेरिका ने इस कृत्य को अंजाम दिया था। इसको लेकर बैठक में वेनेजुएला के प्रति एकजुटता का संदेश और अमेरिका की साजिश के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया। फिलीस्तीन के बारे में डॉ. अर्चिष्मान राजू ने कहा फिलीस्तीन दुनिया में एक मात्र ऐसी जगह रह गई है जहां अभी तक अमेरिका की मदद से इजराइल ने उपनिवेश कायम कर रखा है। जबकि बाकी दुनिया में 20 वीं शताब्दी के अंत के साथ उपनिवेशवाद समाप्त हो गया है। नस्ल और मजहब के नाम पर फिलीस्तीन के लोगों को इजराइल ने अपनी ही जमीन पर बंधक बनाकर रखा है। नोम चोम्स्की सहित दुनिया के तमाम विद्वानों ने फिलीस्तीन के गाजा इलाके को खुली जेल का नाम दिया है। जहां लोग अपनी ही जमीन पर अपने ही घरों में आने जाने को स्वतंत्र नहीं है। नजदीकी भविष्य में फिलीस्तीनी लोगों के हालात सुधरने की उम्मीद कम है। वहां मानवाधिकारों को कुचला गया है। सारी दुनिया के विरोध के बावजूद इजराइल और अमेरिका अपने अमानवीय साजिशों के रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं। डॉ. राजू अमेरिका की कॉर्नेल युनिवर्सिटी में दक्षिण एशियाई विद्यार्थियों के द्वारा किए जा रहे विश्वशांति के आंदोलन के अध्ययन में सलंग्न है। सभा में उपस्थित लोगों ने संघर्ष के प्रतीक बन चुके फिलीस्तीनी लोगों के साथ एकजुटता जाहिर की और इस बात की भर्त्सना भी की कि इजराइल के साथ भारत सरकार अपने व्यापारिक और सैन्य रिश्ते बढ़ाकर उस विदेश नीति को उलट रही है जो आजादी के पहले से गांधी और नेहरू ने फिलीस्तीन के पक्ष में निर्धारित की थी। *डॉ. राजू ने अफ्रीका और फिलिस्तीन के राजनीतिक परिदृश्य की तुलना करते हुए बताया कि अफ्रीका में भी रंगभेद के मुद्दे पर संघर्ष हुए। लेकिन अफ्रीका और फिलिस्तीन के हालात में बहुत अंतर है। जैसे अफ्रीका की रँगभेद नीति और नेल्सन मंडेला विश्व परिदृश्य में उभर आए थे वैसा फिलिस्तीन के साथ नहीं हुआ और उसका कारण है कि फिलिस्तीन में यहूदी और अरब के बीच का संघर्ष है और अमरीका के कॉरपोरेट में यहूदी कम्पनियाँ पावरफुल हैं। जिनके चलते अमरीका इजराइल के पक्ष में है और रहेगा। फिलिस्तीन के हालात सुधरें ऐसा मुश्किल ही लगता है।
सारिका श्रीवास्तव ने कहा कि पिछले दो दशकों में दुनिया मे जो माहौल मुस्लिमों के खिलाफ बनाया गया है उससे फिलिस्तीन के लोगों के संघर्ष को भी इस्लामिक आतंकवाद के तौर पर प्रचारित किया जाता है न कि मानवाधिकारों या अपनी संप्रभुता व आज़ादी को बचाने के संघर्ष के तौर पर।

क्यूबा के बारे में बात करते हुए बताया गया क्यूबा में 2013 से शुरू हुई संविधान निर्माण की प्रक्रिया अंतिम चरण में है और उसका पहला प्रारूप क्यूबा की सरकार ने सुझावों के लिए जारी किया है। प्रारूप को जारी करते हुए संविधान सभा के अध्यक्ष राहुल कारूरूत्रों ने बताया कि नए संविधान का निर्माण करते हुए हमने 21वीं शताब्दी की नई परिस्थितयों को ध्यान में रखा है। चीन, वियतनाम, वेनेजुएला आदि देशों के संविधान का संदर्भ भी रखा गया। बांगलादेश के बारे में सौरभ बनर्जी ने कहा गए चार दिनों से बांगलादेश में इंटरनेट सहित सभी तरह के संचार माध्यम बंद हैं। जो पिछली 28 जुलाई को ट्रेफिक की वजह से दो स्टूडेंट्स की मौत हो जाने पर हुए आंदोलन के उग्र हो जाने पर बंद है। हाईस्कूल के लाखों विद्यार्थी सड़क पर उतर आए। उनकी मांग थी कि ट्रेफिक नियमों को सुधारा जाए। बनर्जी ने बताया कि भले ही ऊपरी तौर पर देखने पर समस्या ट्रेफिक की नजर आए लेकिन लोगों के इस गुस्से के पीछे वहां फैली बदहाली, बेरोजगारी और सरकार के प्रति नाराजगी वजह थी। यह बताया कि बांग्लादेश सरकार हो या भारत सरकार दोनों ही बांग्लादेशियों के बीच हिंदु-मुस्लिम का ध्रुवीकरण कर रही है। सरकार सिर्फ अपना फायदा चाहती है। इसलिए यहां मजदूरों के साथ मिलकर विश्व शांति आंदोलन करने की जरूरत है। पाकिस्तान पर अजीत बजाज ने कहा पाकिस्तान के हाल पूरी तरह अमेरिका के रहमोकरम पर हैं। जो भी राष्ट्रपति अमेरिका को न पसंद होने वाले निणर्य लेता है वो तुरंत बदल दिया जाता है। फिर चाहे परवेज मुशर्रफ हो या नवाज शरीफ। इमरान के सरकार में आने से किसी तरह के बदलाव की उम्मीद करना बेमानी है। जो इंसान पहले सेक्युलर सोच का हुआ करता था वो राजनीति में मुनाफा देखकर फिरकापरस्ती की ओर मुड़ गया है। भले ही बयान में भारत के साथ समझौता करने की बात कहे लेकिन उनकी सरकार की लोकप्रियता भी भारत के साथ तनावपूर्ण रिश्ते बनाकर ही कायम रखी जा सकती है। डॉ. जया मेहता ने कहा यदि हम अंतर्राष्ट्रीय मसलों पर अपनी राय कायम करते हैं तो अपनी ही देश की सरकार जो मानवाअधिकार के मामले में या लोगों के अधिकारों के हनन में शामिल हो उसे कैसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाया जा सकता है। यदि देश के लोग देश की सरकार से, उसके निर्णयों से इत्तेफाक नहीं रखते तो हमें देश के लोगों की आवाज उठाने के लिए एक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच को मजबूत करना चाहिए। पहले इस तरह का मंच विश्वशांति आंदोलन दिया करता था। आज के दौर में उस आंदोलन को नए सिरे से मजबूत करने की जरूरत है। बसंत शिंत्रे ने कहा कि नए लोगों तक अंतर्राष्ट्रीय मामलों की जानकारी पंहुचानी होगी। मुख्यधारा का मीडिया इन मसलों की सही जानकारी नहीं देता। इस मौके पर अजय लागू ने भी भागीदारी की। अरिवंद पोरवाल ने संचालन किया। शैला शिंत्रे, अशोक दुबे, श्याम सुंदर यादव, आदिल सईद, एस के दुबे, एस के पंडित, एच डी टोकरिया, एस के पांडे और शर्मिष्ठा बनर्जी सहित शहर के कई सजग नागरिक इस बैठक का हिस्सा बने।

शनिवार, 11 अगस्त 2018

विभाजन के वक्त देखा क्रूर साम्प्रदायिक यथार्थ, "तमस" और भीष्म साहनी* और *अपने वक्त की तमस रचने का समय...

सारिका श्रीवास्तव

10 अगस्त 2018। प्रगतिशील लेखक संघ, इंदौर इकाई द्वारा 8 अगस्त 2018, भीष्म साहनी के जन्मदिवस पर केनरिस कला वीथिका में बैठक आयोजित की गई।

प्रलेसं इंदौर इकाई के अध्यक्ष एस के दुबे ने भीष्म साहनी का परिचय देते हुए कहा कि भीष्म साहनी की रचनाओं में उस समय की विभीषिका, विभाजन के दंश और बढ़ती साम्प्रदायिकता की पीड़ा को इस बखूबी बयान किया है कि पाठक को लगने लगता है कि ये सब उसके आस-पास और अभी कुछ देर पहले ही घटित हुआ था।

जनअर्थशास्त्री जया मेहता ने भीष्म साहनी और उनकी पत्नी शीला साहनी के साथ शिमला में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज में बिताए गए वक्त को याद करते हुए कहा कि भले ही मेरा बहुत करीबी रिश्ता साहित्य से न रहा हो किन्तु मुझे उनके साथ लम्बा समय बिताने का अवसर मिला। वे बहुत संवेदनशील थे और साधारण प्रतिक्रियाओं पर भी बहुत गहराई से विचार किया करते थे। उनकी उपस्थिति इतनी शान्त, सहज और सौम्य रहती थी कि तमस पढ़ते हुए अनेक बार आश्चर्य होता है कि उसमें लिखे गए बहुत क्रूर यथार्थ के प्रसंग भीष्म जी जैसे शान्त व्यक्तित्व वाले व्यक्ति ने लिखे हैं। उन्होंने उनकी कम चर्चित कहानी "यादें" का वाचन किया। ये कहानी दो वृद्ध महिलाओं पर आधारित है जो बहुत अच्छी दोस्त रहीं और अरसे बाद मिल रही हैं। अपनी पुरानी स्मृतियों का स्मरण करतीं दोनों सखियाँ अपने बीते दिनों में डूबती-उतराती रहती हैं साथ ही पाठकों को भी अपने साथ भावनाओं से भिगोती रहती हैं। दो पुरानी पक्की दोस्त तथा वृद्ध महिलाओं का पुनर्मिलन इतने स्वभाविक और भावनात्मक तरीके से रचा है कि कहानी का पाठ करते हुए जया मेहता खुद भी रो पड़ीं।

कृष्णा सोबती के संस्मरण "हशमत की नजर में भीष्म साहनी" का पाठ किया सारिका श्रीवास्तव ने। जिसमें कृष्णा सोबती ने भीष्म के लेखनकर्म पर प्रकाश डालते हुए उनकी भावनाओं को उकेरा है। हशमत के जरिए कृष्णा सोबती लिखती हैं कि भीष्म का लेखन उनके भोगे गए अनुभवों का लेखन है। भीष्म मध्यवर्ग की खरोंचे, ज़ख्म, उसके दर्द और उसके ऊपरी खोल को छू-छूकर, अपने को उस भीड़ से अलग खड़ा कर लेते हैं और नए सिरे से अपनी पुरानी चिर-परिचित जमीन में उन्हें अंकित करने का निर्णय कर डालते हैं। सारिका ने कहा कि अंतर्मुखी स्वभाव के भीष्म साहनी की कलम बहिर्मुखी थी। उनकी रचनाओं से जो टीस उभरती है वो गहरे तक पैठ जाती है जिसकी चुभन जहन में बनी रहती है।

कार्यक्रम में "अमृतसर आ गया है" कहानी का पाठ भी किया गया। उस कहानी में रेल के डिब्बे में बैठे यात्रियों का उम्दा तरीके से चित्र खींचते हुए विभाजन की विभीषिका और उसका जनमानस पर पड़ता प्रभाव और उसके फलस्वरूप घटित होते घटनाक्रम को भीष्म साहनी ने इस तरह से रचा है कि पाठकों को उस डिब्बे में सवार एक यात्री की तरह ही महसूस होता है की वह उन परिस्थितियों से स्वयं ही गुजर रहा हो।

हिंदी की प्रोफेसर कामना शर्मा ने परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ये कहानी विभाजन के दौर को चित्रित और अंकित करती है। अनेक बार ऐसी परिस्तिथियाँ आती हैं जब जुल्म होते हैं और हम मूक दर्शक बने तटस्थ देखते रहते हैं, कोई हस्तक्षेप तक नहीं करते क्योंकि पूरे वातावरण में जिस तरह दहशत का वातावरण, भय और डर व्याप्त है उसने हमें स्वार्थी बना दिया है।

प्रलेसं के राष्ट्रीय सचिव मण्डल के सदस्य विनीत तिवारी ने भीष्म साहनी की आत्मकथा की कुछ अंश सुनाते हुए कहा कि भीष्म अपने बचपन के संस्मरण यूँ लिखते हैं जैसे किसी आम या साधारण से बच्चे की बात हो। वे कहीं भी अपने महत्त्वपूर्ण होने को नहीं जताते। संस्मरण के दूसरे दौर में बलराज साहनी की जीवन शैली और बीमार पड़े छोटे बच्चे(भीष्म साहनी) की असमर्थता, बड़े भाई से तुलना और बीमारी एवं छोटे होने के दंश को बड़ी सहजता से भीष्म साहनी ने स्वीकारते हुए लिखा है। जिसका पाठ करते हुए  विनीत ने कहा भीष्म साहनी के जीवन पर बलराज साहनी का बहुत असर रहा है। जिसे भीष्म ने अपने संस्मरण में बड़ी सहजता से स्वीकार भी किया है।
तमस का उल्लेख करते हुए विनीत ने कहा तमस 1972-74 के दौरान लिखा गया था। इसके पहले पाकिस्तान के साथ दो युद्ध हो चुके थे और विभाजन के समय की साम्प्रदायिक भावनाएं फिर से भारतीय जनमानस में उभार पर थीं। उस समय की परिस्तिथियों ने ही भीष्म साहनी को विभाजन के वक्त देखे गए क्रूर, साम्प्रदायिक यथार्थ की याद दिलाई और उन्होंने तमस लिखा। तमस इसलिए सबसे विश्वस्नीय दस्तावेजों में से एक है। बटे हुए भारतीय समाज को एकताबद्ध करने के लिए उस वक्त की कांग्रेस को भी तमस जैसी किसी कृति की जरूरत थी। आज के दौर की साम्प्रदायिकता पिछले 70 सालों में बहुत बदल चुकी है और वह फासीवाद की और भी भयानक शक्ल अख्तियार कर चुकी है हमें इसका सामना करने के लिए अपने समय की तमस को रचना होगा।
परिचर्चा में अजय लागू, सुलभा लागू, प्रोफेसर जाकिर हुसैन, संजय वर्मा, जावेद आलम, अर्चिष्मान राजू, आदिल सईद, राजेश पाटिल, सौरभ ने भी शिरकत की।

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

विचारधाराएँ भी सत्ता के चरित्र को परिभाषित करती हैं : सुधीर सुमन

15 अप्रैल, 2018 को मऊभंडार (घाटशिला) में आई.सी.सी. मजदूर यूनियन के हाल में प्रलेसं और भारतीय महिला फेडरेशन की घाटशिला इकाईयों ने संयुक्त रूप से बैठक सह गोष्ठी का आयोजन किया. गोष्टी का विषय था "धर्म और जातीय अंधवाद के दौर में लोकतंत्र की चुनौतियां (सन्दर्भ : संविधान, स्त्री और राष्ट्र)”. बेहद अनौपचारिक तरीके से विषय पर मुक्त रूप से बोलने और बातचीत के अंदाज गोष्ठी चलेगी, ऐसा फॉर्म अनायास ही बन गया था. कुर्सियां गोल घेरे में लगा ली गयीं और बातचीत का आगाज़ हुआ. शेखर मल्लिक ने सूत्रधार का दायित्व ले लिया और भूमिका देते हुए कहा कि आज हम डॉ. आंबेडकर को याद कर रहे हैं. कठुआ और उन्नाव की जघन्य घटनाएँ हमारे समय में घटित हो रही हैं. ये समय किस तरह मानवीयता के प्रतिकूलता का है ! दलितों और हाशिये के समाज और वर्गों की बात नहीं, हिन्दू और अन्य जातियों की बात नहीं... धीरे धीरे ये उन्माद सबको खा जायेगा. रविश कुमार ठीक कहते हैं कि हमारे बच्चे हत्यारे बन रहे हैं या हत्या(रों) के समर्थक ! स्त्रियों की कोई जगह ही नहीं है, वे वस्तुएं हैं. वे राजनीति के लिए इस्तमाल किये जाने वाली डिस्पोजल वस्तुएं हैं ! 
कॉमरेड शशि कुमार ने अपनी बात की शुरुआत इस तरह की कि दुनिया में दो तरह के दर्शन हैं - गिरने का दर्शन, जैसे नीच, अधम और पतित... मिथकों में जैसा जिक्र है कि द्वापर युग, त्रेता युग और कलयुग जिसमें उत्तरोत्तर आदमी और पतित हो जायेगा. दूसरा है वैज्ञानिक दृष्टि कि ज्ञान विज्ञान से प्रगति होगी और समाज को बेहतर बनाया जा सकता है. उनके अनुसार हिंदू धर्म निरंतर गिरते जाने का दर्शन है, जो विभिन्न युगों के माध्यम से यह बताता है कि मनुष्य का निरंतर पतन हो रहा है, जबकि ठीक इसके विपरीत वैज्ञानिक दर्शन है, जो यह बताता है कि मनुष्य ने ज्ञान-विज्ञान के बल पर प्रगति की है, जो यह यह विश्वास जगाता है कि समाज जिस रूप है उसे उससे बेहतर बनाया जा सकता है। अगर हमारे यहाँ राजतन्त्र भी रहा हो तो उसका एक कायदा कानून होना चाहिए. लेकिन हमने देखा है कि सांस्कृतिक रूप से स्त्रियों के साथ हमेशा भेदभाव वाला रवैया ही हमारे यहाँ रहा है. सांस्कृतिक मानसिकता से ही ऊँच नीच का पता चलता है जैसे हमारे यहाँ जो गालियां हैं, वे या तो जाति के नाम से या फिर स्त्री के अंगों से जोड़कर दी जाती हैं।  शूद्रों को (दलितों को) वेद पढ़ना-सुनना निषिद्ध कर दिया गया, सुन लिया तो कानों में पिघला शीशा डाल दो, कंठस्थ कर लिया तो उसकी जीभ चीर दो जैसे सज़ा के प्रावधान तय किए गए।  जब आपने उन्हें (शूद्रों को) अपना माना ही नहीं, तो फिर उस पर अधिकार क्यों जताते हैं ? शशि जी के मत में, ब्राह्मणों से नहीं ब्राह्मणवाद से लड़ना है. उन्होंने कहा कि सब बातों का एक अर्थशास्त्रीय पहलू है, वह विवेचना भी होना लाज़मी है. सचमुच आज विस्फोटक स्थिति है. बाबरी मस्ज़िद गिरी और उधर चुपके से उदारीकरण लागू हो गया. पोखरण में विस्फोट कर सीना चौड़ा करते रहे, उधर मल्टीनेशनल कम्पनियाँ पिछले दरवाजे से घुसा दी गयीं.  सांप्रदायिक, जातिवादी और लैंगिक उत्पीड़न के पीछे मौजूद आर्थिक कारकों की ओर ध्यान दिलाते हुए उन्होंने कहा कि 1991 के बाद देश को सांप्रदायिक आग में झोंककर नई आर्थिक नीति लाई गई, देश की पूरी संपदा पर कब्जा करने की होड़ लग गई। अब तो पूरी राज्यसत्ता भेड़ियों की संस्कृति में तब्दील हो गई है। वह तर्क और विवेक के बजाय अंधआस्था, उन्माद, नृशंसता और भेदभाव को बढ़ावा दे रही है। ऐसे में अलग-अलग उससे लड़ने के बजाए एकजुट होकर लड़ना होगा। दलितों-स्त्रियों-आदिवासियों सबको मनुवादी-ब्राह्मणवादी ताकतों और खुद अपने भीतर मौजूद उसके प्रभावों से लड़ना होगा। टुकड़ों में लड़ाई लड़ने के बजाए संपूर्णता में मानवमुक्ति की लड़ाई लड़नी होगी। जिस तरह के समाज का सपना संविधान निर्माता अंबेडकर ने देखा था, भाजपा तो उसकी विरोधी है ही, दूसरी पूंजीवादी पार्टियां और मायावती या रामविलास पासवान का भी उससे सरोकार नहीं है।
समकालीन जनमत के संपादक सुधीर सुमन ने कहा कि  अगर धर्म का मकसद समाज को बेहतर बनाना है तो वह अलग बात है लेकिन अगर घर्म की आड़ में मनुष्यता छीनी जा रही है, और लोकतंत्र में वह बाधक है तो जरुर उससे लड़ाई है. आज प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि अम्बेडकर न होते तो वे भी न होते. वे ऐसा भी कह सकते थे कि मैं आंबेडकर बनना चाहता था !! लेकिन विडम्बना देखिये कि अम्बेडकर यूँ ही मनुस्मृति के खिलाफ नहीं थे, संविधान बनने के बाद आरएसएस का जो मुखपत्र है ऑर्गेनाज़र, उसने ने लिखा, "स्पार्टा के लायकरगस और पर्शिया के सोलोन से भी पहले, मनु की विधि लिखी जा चुकी थी. आज भी मनुस्मृति में दिए गए उनके कानून पूरी दुनिया की प्रसंशा पाते हैं और लोग उनका पालन करने के लिए तत्पर रहते हैं." तो ये दुःख संविधान बनने के समय है ! आज मनुस्मृति को पढने की बात नहीं है. अपने संस्कारों की जांच करें और मनुस्मृति से मिलाएं. अगर वह मिलता है तो वह खतरनाक है. 
आज कोई कहता है (कठुआ के सन्दर्भ में) कि हादसे को राजनीतिक रंग मत दीजिये. अगर राजनीतिक रंग 'है' तो उस रंग को न दिखाना खतरनाक है. सुधीर सुमन ने कहा कि स्त्री मुक्ति को अंबेडकर जाति उन्मूलन के लिए अत्यंत जरूरी समझते हैं और जाति उन्मूलन को राष्ट्रवाद की बुनियादी शर्त मानते हैं। आजादी के आंदोलन के दौरान डॉ. अंबेडकर, भगतसिंह और प्रेमचंद ने जोर देकर यह सवाल उठाया कि जो नया राष्ट्र होगा, वह किसका राष्ट्र होगा, वह कैसा राष्ट्र होगा? आज जो लोग तिरंगा लेकर नृशंस बलात्कारियों के पक्ष में जुलूस निकाल रहे हैं, जो नफरत, भेदभाव और शोषण-उत्पीड़न पर आधारित सामाजिक व्यवस्था के निर्लज्ज पक्षधर बने हुए हैं, जो धर्म की आड़ लेकर इंसानियत पर कहर ढा रहे हैं और राष्ट्रीयता के नाम पर विभिन्न समुदायों और मेहनतकशों और आदिवासियों के लोकतांत्रिक आधिकारों को रौंद रहे हैं, दमनकारी कानूनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, वे भगत सिंह और अंबेडकर के सपनों की हत्या कर रहे हैं, वे राष्ट्रभक्त नहीं हो सकते।  अंबेडकर स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को लोकतंत्र की बुनियाद मानते थे, उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि 'अगर हिन्दू राज स्थापित होता है तो वह इस देश के लिए एक बहुत बड़ा संकट होगा। हिन्दू चाहे जो भी कहें परंतु यह एक तथ्य है कि हिन्दू धर्म, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिए खतरा है। वह प्रजातंत्र का दुश्मन है। हमें हिन्दू राज को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए।'
 सुधीर सुमन ने उदय प्रकाश की बहुचर्चित कहानी ‘और अंत में प्रार्थना’ के एक संदर्भ के हवाले से कहा कि विचारधाराएं भी सत्ता के चरित्र पर असर डालती हैं।  विचारधाराएँ भी सत्ता के चरित्र को परिभाषित करती हैं. आज भाजपा-आरएसएस के सत्ता पर काबिज होने के बाद अकारण ही दलितों-स्त्रियों-आदिवासियों-अल्पसंख्यकों पर हमले नहीं बढ़ गए हैं. अकारण अवैज्ञानिकता, अंधआस्था और उन्माद को बढ़ावा नहीं मिल रहा है। यह सबकुछ योजनाबद्ध तरीके से हो रहा है। देश की बच्चियां और स्त्रियां इतनी असुरक्षित कभी न थीं, आज किसान ही नहीं नौजवान भी बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं. श्रमिकों को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा हैं। इसके खिलाफ किसान, छात्र-नौजवान, दलित-आदिवासी-अल्पसंख्यक मजदूर सब संघर्ष कर रहे हैं। मौजूदा फासिस्ट निजाम चाहे जितना षड्यंत्र करे, जितना दमन ढाए, उसे एक रोज खत्म होना होगा। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और अंधराष्ट्रवाद की राजनीति के बल पर तानाशाही लंबे समय तक नहीं चलेगी। दुनिया में हिटलर और मुसोलिनी का क्या अंजाम हुआ था, उसे नहीं भूलना चाहिए। 
सुधीर सुमन ने कहा कि भगत सिंह, अंबेडकर, राहुल सांकृत्यायन सरीखे चिंतकों-विचारकों ने राजनैतिक-आर्थिक बदलाव के साथ-साथ भेदभाव पर आधारित सामाजिक ढांचे को बुनियादी रूप से बदलने की बात की थी। इंसान विरोधी धर्म और जाति के क्षय का आह्वान किया था। लेकिन आरएसएस है जो मनुस्मृति के प्रावधानों और वर्णव्यवस्था को कट्टरता से लागू करने की पक्षधर रही है। संविधान में मनुस्मृति के कानूनों को जगह नहीं देने पर उसका विरोध तो था ही, उसने स्त्रियों के लोकतांत्रिक अधिकारों से संबंधित हिंदू कोड बिल का तीव्र विरोध किया था।
ये कौन लोग हैं, एक पुराने समाज को बचाए रखना चाहते हैं ? अम्बेडकर ने 1948 में कानून मंत्री रहते हुए हिन्दू कोड बिल का संशोधित-परिवर्द्धित ड्राफ्ट सदन के सामने रखा, लेकिन लगभग पचास घंटे की बहस के बाद सरकार ने उसे एक साल के लिए ठंढे बस्ते में डाल दिया। बाद में नेहरू ने बीच का रास्ता निकालते हुए कहा कि विवाह और तलाक से संबन्धित 55 धाराओं को पारित करवा लिया जाए, बाकी क़ानूनों को प्रथम आम चुनाव के बाद गठित नई सरकार  द्वारा पारित करवाएगी।लेकिन आखिरकार 55 में से  3 धाराओं को पारित करने पर सहमति बनी, जिससे क्षुब्ध होकर  अंबेडकर ने इस्तीफा दे दिया। इस्तीफ़ा देते हुए उन्होंने कहा था, "वर्गों के बीच, लिंगों के बीच असमानता, जो हिन्दू समाज की आत्मा है, को ज्यों का त्यों अनछुआ छोड़ दिया जाय और आर्थिक समस्याओं से सम्बन्धित कानून दर कानून पास किये जांय, तो इसका मतलब होगा हमारे संविधान का प्रहसन बना देना और गोबर के ढेर पर महल बनाना."
सुधीर जी ने आगे बातचीत में कहा कि कोई भी समाज और कोई भी देश लंबे समय तक उन्माद की स्थिति में नहीं रह सकता. लेकिन बेहतर है कि बहुत ज्यादा गंवाने से पहले उसे होश आ जाए. उसकी तैयारी हमलोगों को करनी है, यही बड़ी चुनौती है. प्राकृतिक संसाधनों की जो भीषण लूट हो रही है, उसके खिलाफ लड़ना होगा। पर्यावरण की रक्षा करनी होगी।  इसकी वजहों को समझाना होगा कि नौजवान और किसान क्यों आत्महत्याएं कर रहे हैं ? क्यों कोई ईश्वर उन्हें नहीं बचा रहा है ? राहुल सांकृत्यायन के उद्धरण का जिक्र करते हुए उन्होने कहा कि  ये समस्याएं, अगर आप मानते हों ईश्वर ने पैदा किया है तो जान लीजिए किसी ईश्वर ने इन्हे नहीं पैदा किया। इन्हें मनुष्यों ने पैदा किया है और मानुषी ही इन्हें हल कर सकते हैं. उन्होंने युवा कवि विहाग वैभव की कविता को उद्धृत किया-
"यह सही समय है,
जगत की पुनर्रचना की
मुनादी पिटवा कर इसी दम
सृष्टि की सभी कार्यवाहियां स्थगित की जांय...
...यह सही समय है मनुष्यता की पुनर्रचना की." 

मतलब पुनर्रचना बहुत जरूरी है. भीषण यथास्थिति में रुका हुआ, दर्शक बना हुआ समाज है. जैसा कि कवि और टीवी प्रोड्यूसर कुबेर दत्त ने अपनी कविताओं में यह संकेत किया था कि टेलीविजन में मौजूद भेड़िये दर्शकों को भेड़ियों में तब्दील कर रहे हैं। 
उन्होंने कहा कि आग लगाने के चंद तीलियाँ भी काफी होती हैं, तो उस आग की जरूरत है इस समाज को, अगर इस समाज को बचना है तो।  क्योंकि बर्बरता या फिर समाजवाद- यही चुनाव है उसके सामने।  जाहिर है हमें बर्बरता के विरुद्ध समाजवाद के विकल्प के लिए संघर्ष करना है। 
 कवियत्री डॉ. सुनीता देवदूत सोरेन ने कहा कि स्त्री को अपनी ताकत पहचाननी होगी. ये सबसे पहली और जरूरी बात है. समाज में औरत को अपनी सोच को आज़ाद करना होगा. संकीर्णताओं से उबरना होगा. आज सत्ता का काम अम्बेडकर को हथियाना है, लेकिन उनकी विचारधारा से इन्हें कोई लेना देना नहीं है. हमारा संविधान एक सम्प्रभुतावादी, पंथ निरपेक्ष संविधान है और आज इसी पर चोट की जा रही है. संविधान की हम बात करें तो इसमें सबके लिए न्याय है, विचार आदि की आज़ादी है. मगर आज वास्तविकता ठीक इसके उलट है. आज हमें (आज की पीढ़ी को) संविधान को जानने की जरूरत है. जो इसे सच्चे अर्थों में जानेगा वह समानता और न्याय की बात करेगा. संकट इस बात का है कि वैधानिक प्रावधानों का महत्त्व और उसकी इफेक्टिव्नेस को समाप्त कर दिया गया है. डॉ. सुनीता ने कहा कि वर्तमान माहौल में संविधान की मूल आत्मा के साथ ही छेड़छाड़ किया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय में भी ऐसे लोग बैठे हैं, जो दलितों-आदिवासियों-अल्पसंख्यकों का दर्द नहीं समझते - जाके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई। संविधान ने हमें भले ही बराबरी का अधिकार दिया हो, पर वह अधिकार हमें हासिल कितना होता रहा है और अब तो स्थिति अधिक खराब होती जा रही थी। हाल के दिनों में दलित-स्त्री-आदिवासी का उत्पीड़न बढ़ा है। इनके लिए बनाए गए तमाम प्रावधानों को निष्प्रभावी बनाया जा रहा है। जहां तक स्त्रियों की बात है, तो अभी भी बराबरी और आजादी उनके लिए दूर की कौड़ी है। उन्हें आगे बढ़कर सोचना होगा कि उन्हें किस तरह के समाज की जरूरत है। वे सही प्रतिनिधि चुनकर भी लोकतंत्र पर मंडरा रहे खतरों से एक हद तक लड़ सकती हैं। 
आज स्त्रियों की बात करें तो वहां जो मर्दों की हिप्पोक्रेसी है, वह घातक है. चुनाव जो लोकतंत्र की आधार तंतु है, उसमें देख लें कि किस प्रकार का लैंगिक भेदभाव और दोहरापन है. असल में पुरुष डोमिनेंस है. वहां अगर महिला चुनाव लड़ रही है, जीत भी गयी है, तब भी निर्णयों पर उसका अधिकार नहीं. वे उसके घर के मर्द द्वारा तय किये जायेंगे ! मर्दों से ही उसका काम संचालित होगा, जैसा कि उसका जीवन. ये एक ‘टर्म’ इधर बहुत प्रचलित है - पी.एम्. यानि 'मुखिया पति'. वास्तविक और अंतिम फैसले यही मुखिया पद पर चुनी गयी स्त्री का पति लेगा, चूँकि स्त्री को तो वह क्षमता ही नहीं है ! स्त्री किसी भी स्तर पर स्वतंत्र नहीं है. यह भयानक बात है. जबकि स्त्रियों को अपनी 'इज्जत' से जोड़कर हिंसा पर उतारू समाज जो करता है, वह गलत है. दलितों और आदिवासियों के शोषण में भी इनकी स्त्रियों का उत्पीड़न बड़ा है और इस ओर देखना होगा.  हम यानि समाज भूल जाता है कि यह स्त्री और पुरुष दोनों से मिलकर बनता है. 
डॉ. सुनीता ने आव्हान स्वरूप दुष्यंत की पंक्तियाँ '... इसी हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए. मेरे दिल में न सही, तुम्हारे दिल में सही. हो कहीं भी आग मगर जलनी चाहिए.' सुनाईं. 
चूँकि यह गोष्ठी मुक्त सत्र की भांति चली अत: श्रोताओं से अपनी बात रखने के लिए आग्रह किया गया और गोष्ठी परस्पर संवाद में बदली तो डॉ. देवदूत सोरेन ने कहा कि ये जो कुछ भी हो रहा है वह भयानक तो है, मगर मैं चाहता हूँ कि इसकी इंतिहा हो जाय. तब लोग खुद जागेंगे और सब पलट जायेगा. इस पर शशि जी ने कहा कि हाँ ये तो ठीक है मगर डर है कि कहीं बहुत ज्यादा खोने के बाद न जगें ! 
सुधीर सुमन ने कहा कि राहुल सांकृत्यायन समाज की कूपमंडूकता के खिलाफ बेहद आक्रामक थे। भगतसिंह ने यथास्थिति के शिकंजे से मुक्ति के क्रांतिकारी भावना की जरूरत पर ज़ोर दिया था। आज लोकतंत्र वाकई खतरे में है, नौकरियां खतरे में हैं. हमारी बच्चियां और स्त्रियाँ खतरे में हैं. 
अंत में श्रोताओं के सवाल लिए गए. युवा छात्र शुभम के मन में कई प्रश्न घुमड़ रहे थे. उसने पूछा कि आज का युवा किधर जाये ? कौन सी विचारधारा और झंडे के नीचे रहे ? आज तो युवाओं के समक्ष निराशा में आत्महत्या जैसी स्थितियां हैं. शुभम को जबाव देते हुए सुधीर सुमन ने कहा कि पहले तो आप टीवी के कंज्यूमर न बनें ! टीवी बस आपको उपभोक्ता बना रहा है. वो देता है आप लेते हैं. अगर जेएनयू का सच जानना है तो जेएनयू में जाकर कुछ दिन रहिये. वो सारा सच सामने आ जाएगा. जेएनयू कैसे बेहतर है, यह समझ जाइएगा। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव से बताया कि एक दफे इलाहाबाद में वाम दलों ने सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ एक संयुक्त कार्यक्रम रखा था और जैसा कि आज हम देख रहे हैं कि वकीलों में भी साम्प्रदायिकता घर कर गयी है. उस सभा में उन्हीं में से किसी ने 'पाकिस्तान जिंदाबाद' कहा. और  वामपन्थियों को देशद्रोही बताते हुए हमला कर दिया. सच तो ये है कि वामपंथी ऐसा नारा लगाने की सोच भी नहीं सकते ! फासिस्ट व्यवस्था से आपको लड़ना पड़ेगा. आप गांधीवादी तरीके से लड़ेंगे तब भी वे हमले करेंगे। आपको दोस्त, खुद खोजना होगा. स्वयं परखो और अपनी राह तय करो। 
कॉमरेड शशि ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि आज नौजवानों को विचार से तय करना होगा. आज जो व्यवस्था है उसमें जो कारण हैं, कारणों में जायेंगे तो सही जगह पहुंचेंगे. समाज कैसा होना चाहिए ? क्या जैसा है वैसा ठीक है? तो फिर खाइये, पीजिये, मौज से रहिये और अगर लगता है कि इसे बेहतर होना चाहिए तो सोचिये कैसे, किस रास्ते से ? वर्तमान समाज को युवा समझें. 
सुधीर सुमन ने कहा कि गाँव में हमारे पड़ोसी मुस्लिम थे. उन्होने मेरा कभी अहित नहीं किया। नब्बे के दशक में मैं  हिन्दुओं से पूछता था कि दुनिया की छोड़ो, क्या तुम्हारे पड़ोसी मुसलमान ने  तुम्हारा कोई अहित किया है. तो वे बोलते थे- नहीं. फिर ? युवा रेशनल बनें. तर्क करें. उजाले और उजाले का छल पहचानें। हम अपने अनुभवों से, संघर्षों से यहाँ पहुंचे हैं. हम आपको कोई बना बनाया रास्ता नहीं दे सकते।  आपको खुद चुनना है.  प्रेमचंद को पढिए, भगत सिंह को पढ़िए. राहुल सांकृत्यायन को पढिए। "राग दरबारी'" ही पढ़िए, जो बहुत रोचक भी है,  तो आप शासकवर्ग के पाखंड और आज की स्थिति समझ जाएंगे।  शशि जी ने पकिस्तान की लेखिका फौजिया सईद के संस्मरण के हवाले से कहा कि उन्होंने लिखा है कि वे लाहौर के वेश्यालयों में गयी तो छेड़ी नहीं गयीं, बदतमीजी का शिकार नहीं हुईं, जबकि वे बेहद खूबसूरत थीं. लेकिन सभ्य शहर में उन्हें पुरुषों के घटियापन का सामना करना पड़ा. तो ये स्थिति है, जिसे समझना है.  

(रिपोर्ट: ज्योति मल्लिक / विशेष इनपुट : सुधीर सुमन)

मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

प्रलेसं के स्थापना दिवस पर प्रलेसं मध्यप्रदेश का आयोजन:रिपोर्ट

8 अप्रैल 2018। इंदौर (मध्य प्रदेश)। प्रगतिशील लेखक संघ के स्थापना दिवस की पूर्व संध्या पर शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर सिमरोल के सागरपैसा गाँव में किसानों, मेहनतकशों और मजदूरों के साथ उनकी समस्या पर परिचर्चा की।

प्रधानमंत्री सड़क योजना को पन्द्रह साल होने को आए हैं लेकिन अभी तक कोई भी सड़क सागरपैसा गाँव नहीं पहुँच सकी। गर्मी आते ही सिमरोल के जंगल सूखे पत्तों से भर जाते हैं। मुख्य सड़क को छोड़कर जब हम इन्हीं जंगलों से होते हुए तकरीबन दस किलोमीटर कच्ची, उबड़-खाबड़ सड़क पर चलते हैं तब जाकर आदिवासी बहुल गाँव सागरपैसा आता है। गाँव के कुछ बाशिंदे आस-पास के बड़े किसानों के यहाँ खेतिहर मजदूरी करते हैं तो कुछ पास के शहरों में मजदूरी।

तेज़ धूप, गर्म हवाएँ, कच्ची सड़क और मोटर साइकिल पर युवा तो तूफान(गाड़ी) में उम्रदराज साथियों का उत्साह। बीच की पीढ़ी नदारत थी लेकिन हम सब दोस्त बन गए थे।
कौन कहता है कि युवा और किशोर अपनी मस्ती में मग्न रहते हैं। हमारे साथ शामिल इन कमसिन उम्र के बाशिंदों को पता था कि वो कहाँ, किस उद्देश्य से और किन लोगों के बीच जा रहे हैं। और उंन्होने अपना किरदार बखूबी निभाया भी।

सफदर हाशमी द्वारा लिखे गीत पढ़ना-लिखना सीखो से जनविकास सोसायटी पालदा के किशोर साथियों ने कार्यक्रम का आगाज़ किया और नुक्कड़ नाटक के जरिए किसानों की समस्याओं पर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश और किसानों की माँगों को लोगों के सामने रखा। और अदम गोंडवी रचित जनगीत "दिल पर रखकर हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है" के बाद गुलरेज खान के निर्देशन में प्रेमचंद की कहानी कफ़न पर नुक्कड़ नाटक वर्चुअल वॉइस के युवाओं द्वारा खेल गया।

कॉ हरिनारायण टेलर, गाँव के मुखिया हँसराजजी और दिनेश के सहयोग से गाँव के विद्यालय के सामने ग्रामवासियों के साथ कॉ एस के दुबे, कॉ कैलाश गोठानिया, कॉ अरविंद पोरवाल, रामआसरे पांडे, केसरीसिंह चिडार, शोभना जोशी, सुलभा लागू, कामना शर्मा, सारिका श्रीवास्तव बातचीत करके उनकी परेशानियों, दिक्कतों से रूबरू हुए।

मंदसौर प्रलेसं से कॉ हरनाम सिंह विशेष रूप से इस परिचर्चा में शामिल होने मंदसौर से आए। उन्होंने मंदसौर किसान आंदोलन की जानकारी देते हुए लोगों को बताया की जब नगदी फसल को लगातार उचित मूल्य नहीं मिला और किसान घाटे में जाने लगे तब उसे सड़क पर आना पड़ा। जिससे राजनीतिक फायदा उठाने के लिए गलत स्वरूप दे दिया गया। जिसे राजनीतिक साजिश रचकर गलत स्वरूप दे दिया गया। जहाँ महाराष्ट्र में इतने सारे किसान संगठित और संयमित रहे वहीं मध्य प्रदेश के मंदसौर का किसान आंदोलन राजनीतिक साजिश का शिकार बना डित गया।

कॉ अरविंद पोरवाल ने किसानों को सम्बोधित कर कहा कि वर्तमान में किसान आंदोलन केवल बड़े किसानों का आंदोलन रह गया है। 85 फीसदी छोटा किसान जो अब किसान न होकर केवल मजदूर रह गया है वो तो केवल अपने खाने लायक अनाज उपजा पाता है। उसे किसान आंदोलन की मांगों से न तो कोई फायदा है और न ही कोई लेना-देना। सागरपैसा गाँव के किसानों की समस्याएँ अच्छी शिक्षा, अच्छी स्वास्थ्य व्यवस्था न होने औऱ बेरोजगारी की है। पानी की कमी से जूझ रहे लोग जो पानी की दिक्कत के कारण एक ही फसल ले पाते हैं उन्हें उचित समर्थन मूल्य के पहले पानी मिलना जरूरी है। जिससे निपटने के लिए एकजुट होकर अपना संघर्ष करना बहुत जरूरी है।

सारिका श्रीवास्तव ने संचालन करते हुए कहा कि हमारा फोकस जमीन पर हक़ के बजाए सहकारिता की खेती पर होना चाहिए। जो सबको बराबरी से काम करना भी सिखाती है। उंन्होने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश में दी गई किसानों की मांगों की जानकारी भी उपस्थित लोगों को दी।

गाँव के मुखिया हँसराज ने सबका स्वागत किया और कॉ हरिनारायण टेलर ने गाँव के इतिहास से अब तक कि जानकारी देते हुए बताया कि यह गाँव 70 के दशक में कम्युनिस्टों ने होलकर स्टेट की जमीन पर 130 आदिवासी परिवारों को बसाकर इस गाँव की नींव डाली थी।

परिचर्चा के बाद कामना शर्मा, सुलभा लागू और सारिका श्रीवास्तव ने महिलाओं से मिलकर लम्बी बातचीत की और उनकी समस्याओं को जाना।
कॉ कैलाश गोठानिया इस गाँव और लोगों से पहले से परिचित थे सो संघर्ष के पुराने दिनों की यादों को ताज़ा कर अपने अधिकारों के लिए पुनः संघर्ष करने को ग्राम वासियों को प्रेरित किया।

वहीं सर्व श्री एस के दुबे, केसरी सिंह चिडार, रामआसरे पांडे, हरनाम सिंह जी ने पुरुषों के साथ संवाद बनाया।

कार्यक्रम के अंत में आभार माना कॉ एस के दुबे और कार्यक्रम का संचालन सारिका ने किया।

सारिका श्रीवास्तव

शुक्रवार, 9 मार्च 2018

माँ के गर्भ से ही लड़की का संघर्ष शुरू हो जाता है – डॉ. सुनीता
भारतीय महिला फ़ेडरेशन, घाटशिला इकाई ने मनाया अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस


8 मार्च, 2018. घाटशिला. भारतीय महिला फ़ेडरेशन कि घाटशिला इकाई द्वारा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में महिलाओं के अधिकारों और उसकी सामाजिक अवस्था को रेखांकित करते हुए  उस ध्यान दिए जाने की बात कही गयी. आई.सी.सी. मजदूर यूनियन, मऊभंडार के कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम की शुरुआत समूह गीत "औरतें उठीं नहीं तो ज़ुल्म बढ़ता जायेगा” से हुई जिसे स्वर दिया छिता हांसदा, दीपाली, लतिका और रुपाली ने. सचिव ज्योति मल्लिक ने अपने वक्तव्य फ़ेडरेशन के उद्येश्यों की चर्चा करते हुए कहा कि भारतीय महिला फ़ेडरेशन महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक समता की पक्षधर है. लिंग आधारित भेदभाव, घरेलू और यौन हिंसा के विरुद्ध आवाज़ उठाने की जरूरत है जिसे हम एक जुट होकर उठा सकते हैं. शिक्षा, सामान वेतन और समय पर वेतन, मातृत्व अवकाश, सामाजिक सुरक्षा, महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण आदि कई मुद्दे हैं, जहाँ स्त्रियां भेदभाव की शिकार और वंचित हैं. हमें एक बराबरी का समाज बनाने के लिए महिलाओं को सम्मान और अधिकार देना होगा. जब तक एसा नहीं होता, हमारा संघर्ष समाज और व्यवस्था से रहेगा. लड़कियां
आगे बढ़ सकती हैं। वे अनथक बढ़ती हैं। उन्होंने खुद के उदहारण द्वारा बताया कि विवाह पूर्व वे भी अपने परिवार में सिमटी हुई थीं लेकिन विवाहोपरांत उन्हें उनका स्पेस दिया गया तो वे बढ़ी हैं. नौकरी कर रही हैं, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा ले रही हैं.
कार्यक्रम में स्त्री विषयक कविताओं का पाठ किया गया. सह सचिव लतिका पात्र ने रंजना जयसवाल की कविता "बागी" और निर्मला पुतुल की "क्या हूँ मैं तुम्हारे लिये" पढ़ी तो छिता हांसदा ने अपनी स्वरचित संथाली कविता "मिरु चेड़ें" सुनाई. श्वेता दुबे ने फ़िल्म लेखिका मधु जी की कविता 'बचा लेती है' पढ़ा. वहीँ स्कूल की बच्चियों ने भी कविता पाठ में सहभागिता करते हुए कुछ चुनिंदा कविताओं का पाठ किया. दीपाली साह ने कात्यायनी की कविता "इस स्त्री से डरो" और मधुरिमा मजुमदार ने तस्लीमा नसरीन की कविताएं "चरित्र" और "प्रेरित नारियां" सुनाई. शेखर मल्लिक ने मजाज़ की नज़्म "नौजवान ख़ातून से" और गौहर रज़ा की नज़्म "दुआ" सुनाई. और कहा कि कविता तेज मार करती है.
संवाद सत्र में इकाई की  सचिव ज्योति मल्लिक ने कहा कि हम स्त्रियों के सामने सदियों से चुनौतियां बनी हुई हैं. इधर कुछ दशकों से जरुर महिलाओं ने शिक्षा के सहारे अपनी स्थिति को बेहतर किया लेकिन आम स्त्री आज भी शोषित है, दोयम दर्जे की नागरिक है. हमें समझना और समझाना है कि स्त्री भी मनुष्य है. सामान अधिकारों को हासिल करने की चुनौती हमारे सामने है.
उपाध्यक्षा सुनैन हांसदा ने स्त्री अधिकारों की वास्तविक स्थिति पर अपने विचार रखे. कानून और कागज पर महिलाओं को दिए गए तमाम अधिकारों के बारे में स्त्री नहीं जानती या उसे जानने दिया जाता है. 33 प्रतिशत भी हमलोग ने काफी लड़ाई से हासिल किया. हमें पैतृक सम्पति पर भी आसानी से अधिकार नहीं मिल पाता. घर बाहर के कई तरह का शोषण और संघर्ष है. यह बिडम्वना है. निर्भया काण्ड के बाद स्त्रियों की सुरक्षा के बाबत कई कानून बने हैं लेकिन आज भी स्त्री यौन शोषण झेल रही है, उसकी हत्या हो रही है. भारत में बलात्कार का दर सबसे भयानक है और यौन हिंसा प्राय: हर लड़की और स्त्री झेलती ही है. घर और बाहर हम जिस माहौल में रहते हैं वह हमलोगों के लिए संघर्षशील है. अधिकारों को भेदभाव पूर्वक छिनना हमारे समाज में आम बात है और कोई उधर ध्यान नहीं देता. महिलाओं की सुरक्षा ही नहीं, रोजगार और स्वतन्त्रता के जो संवैधानिक अधिकार हैं, वे भी उसे नहीं दिए जाते. कुछ उच्च वर्ग की महिलाओं की समृद्धि आम भारतीय महिलाओं की वास्तविक स्थिति का द्योतक नहीं है.
शिक्षिका नीलिमा सरकार ने अपने माता पिता को अपने आज़ाद जीवन का श्रेय दिया. यदि उनके माता पिता उन्हें सपोर्ट नहीं करते, स्पेस नहीं देते तो वे आज इस सफलता तक नहीं पहुँचती. उन्हें याद करते हुए वे भावुक हो गईं.
संचालन कर रही छिता हांसदा ने अपने जीवन अनुभव बताते हुए कहा कि समाज में लोग किस प्रकार चीजें समझते नहीं और उन्हें सिखाने को मेहनत करना पड़ता है. उन्होंने संथाली में गीत "एहो आदिम एभेनो मे" भी सुनाया. स्थानीय महिला महाविद्यालय की पुस्तकालयाध्यक्षा राखी पूर्णिमा मजुमदार ने "कोमल है कमज़ोर नहीं तू" गीत प्रस्तुत किया.
समाज और स्त्री के सम्बन्धों और सच्चाई पर लतिका पात्र ने अपने विचार रखे. रोज रोज एक लड़की एक औरत किस प्रकार समाज से जूझती है. उन्होंने बताया कि इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए उसके गाँव से मनरेगा की मजदूरिनें आने वाली थीं लेकिन वापसी के लिए सवारी गाड़ी की उपलब्धता का संकट रहता है इसलिए वे आ नहीं सकीं. ऐसी और भी समस्याएं हैं.         
प्रोफ. पुष्पा गुप्ता ने कहा कि फेडरेशन के सामने चुनौतियाँ हैं. लेकिन ये युवा लोग करेंगे. उन्होंने अपने जीवन के अनुभव बताये । छात्रा रुपाली साह ने भी अपनी बात रखी.
अध्यक्ष डॉ सुनीता सोरेन ने कहा कि माँ के गर्भ से ही लड़की का संघर्ष शुरू हो जाता है. घर और बाहर दोनों जगह लड़कियां संघर्ष झेलती हैं। आज की स्त्री को समाज की दोहरी मानसिकता और दोहरे चरित्र का सामना करना पड़ता है, ऐसी मानसिकता से स्त्री को खुद को बचाना है. आज की नारी को जिम्मेदार माँ बनना होगा चूंकि वही बच्चे की गुरु होती है. एक सभ्य और समतामूलक समाज के गुण बच्चों में माँ दे सकती हैं. महिलाएं अपने सन्तानों में समता की भावना डालें, जिससे स्त्री के प्रति मर्द की सोच बदलना सम्भव हो सकेगा. हम आज एक दूसरे का साथ देंगे तो हर मायने में बराबरी का अधिकार मिलेगा. आप आज यहां आये आपकी सोच की जीत है, आप घर से बाहर काम कर रही है ये भी आपकी जीत है. शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका है. एक मर्द केवल अपने लिए शिक्षित होता है, लेकिन महिला एक समाज को शिक्षित कर सकती है. एक डॉ होने नाते कहूंगी कि आप अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें. हमें एक दूसरे का साथ देना होगा. उन्होंने अपनी कुछ पंक्तियाँ भी सुनायीं,
नारी तुम वरदान हो
नारी तुम प्रकाश हो
नारी तुम कविता हो
नारी तुम सरिता हो
तुम ही श्रष्टि हो
तुम सम्पूर्ण हो
कार्यक्रम में घाटशिला के गांवों की मनरेगा मजदूरिन, आई सी सी की महिला श्रमिक और कर्मचारी, बड़ी संख्या में आस पास मोहल्ले की स्त्रियाँ और युवतियां मौजूद थीं. नारीवादी कविता पोस्टर प्रदर्शनी भी की गयी. सीरिया में बमबारी से मारे गए निर्दोष बच्चों, महिलाओं के लिए इस बीच एक मिनट का मौन रखा गया. 
अंत  में सभी ने मिलकर  "हम होंगे कामयाब गाया" जो एकजुटता और विश्वास का संकेत देता है.
सचिव ज्योति मल्लिक ने धन्यवाद ज्ञापन दिया, कहा कि साथी साथ आयें और फेडरेशन को मजबूत करें. अब हम जो महिला साथी हम तक नहीं पहुँच पाए, उन तक जायेंगे. यही हमारी योजना है.
कार्यक्रम का संचालन छिता हांसदा ने किया.
भारतीय महिला फ़ेडरेशन की घाटशिला इकाई ने इस कार्यक्रम के साथ अपनी गतिविधियों का आगाज़ किया है.  (रिपोर्ट : शेखर मल्लिक)

ज़श्न ए फ़ैज़ : घाटशिला प्रलेसं का आयोजन

कब याद में तेरा साथ नहीं (रिपोर्ट)
इस बार
17 फरवरी, 2018

घाटशिला में 17 फरवरी को प्रलेस की ओर से होने वाले ‘जश्ने फ़ैज़' आयोजन की सूचना मिली, तो सोचा कि हर हाल में इस आयोजन में शामिल होना है। घाटशिला में साहित्यिक-सांस्कृतिक सक्रियता के पीछे कथाकार शेखर मल्लिक की अहम भूमिका रहती है। इस आयोजन की सूचना भी पहले उन्हीं के एसएमएस से मिली। इधर रविवार होने के बावजूूद मेरी दूूसरी व्यस्तताएं भी थीं, लेकिन जो ज़िम्मेवारी थी उसे निबटा कर प्राचार्या से इज़ाजत लेकर मैं निकल पड़ा। बीच राह में संतोष कुमार सिंह की गाड़ी में सवार होना था। संतोष ख़ुद को साहित्यकार नहीं मानते, पर हर तरह का साहित्य पढ़ते हैं और कई रचनाकारों से साहित्य की बेहतर समझ रखते हैं। फेसबुक पर उनकी धारदार टिप्पणियों के कारण मैं उनसे प्रभावित रहा हूं। ख़ैर, बस में लोकल पैसेंजर चढ़ाने-उतारने के कारण हो रही देरी से झल्लाता हुआ मिलने की तय जगह पर उतरा। कुछ ही देर बाद उनकी गाड़ी आई। उनके साथ मनोज सिंह भी थे। हम तीनों चल पड़े घाटशिला और नियत समय पर पहुंच गए। यूनियन आॅफ़िस के भीतर अहाते में कुर्सियां लगी हुई थीं। मंच भी बना हुआ था। ‘बोल की लब आज़ाद हैं तेरे’- फ़ैज़ की नज़्म की यह पंक्ति जो इस वक्त पिछले किसी भी वक़्त से ज्यादा मौजूं है, आयोजन की थीम थी।

‘लोकचेतना’ के संपादक रविरंजन भी आजकल घाटशिला में ही अध्यापन कार्य कर रहे हैं। उन्हीं से फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ पर वक्तव्य की शुरुआत हुई। उन्होंने फ़ैज़ को पूरी प्रगतिशील परंपरा का अगुआ कवि बताया और कहा कि भारतीय कविता पर उनका गहरा प्रभाव रहा है। उधर सूरज डूब रहा था इधर हम सबके महबूब शायर के ख्यालात चमक रहे थे। श्रोताओं की संख्या बहुत अधिक नहीं थी, पर जो लोग थे वे गंभीर श्रोता लग रहे थे। एक ओर मित्रेश्वर अग्निमित्र, प्रो. नरेश कुमार, प्रो. सुबोध कुमार जैसे वरिष्ठ अध्यापक और एक विद्यालय के प्राचार्य संजय मल्लिक थे, तो दूसरी ओर राजीव जैसे युवा अध्यापक। और वे नौजवान संस्कृतिकर्मी तो थे ही जिनका आकर्षण मुझे वहां खींच ले गया था। सोशल मीडिया पर इस आयोजन का जो आमंत्रण था, उसमें फ़ैज़ की ग़ज़लों और नज़्मों के गायन की सूचना भी थी। मुझे यह बहुत ज़रूरी लगता है कि जहां भी संभव हो, ऐसे शायरों और कवियों की रचनाओं को गाया जाए, पढ़ा जाए। कुछ ऐसा किया जाए कि वह ज़्यादा से ज़्यादा लोगों के जीवन में सहजता से रच-बस जाए।

कई बार सोचता हूं कि हर ग़ज़ल के बारे में कुछ बात हो और फिर उसे गाया जाए या पहले उसे गाया जाए, फिर उस पर बात हो। आयोजकों ने मुझे भी मंच पर बैठा दिया, तो मैं समझ गया कि मुझे बोलना भी होगा। तुरत फ़ैज़ की ग़ज़ल की पंक्ति याद आई- कब याद में तेरा साथ नहीं/ कब हाथ में तेरा हाथ नहीं। इस दौर के तरक़्क़ीपसंद और इंक़लाबी साथियों की तरह मेरे दिलो-दिमाग़ पर भी उनकी रचनाओं का गहरा असर रहा है। लेकिन मुझे हमेशा लगता है कि इतने से बात नहीं बनेगी, आज व्यापक जनसमुदाय तक फ़ैज़ को पहुंचाने की ज़रूरत है। अमीर खुसरो से लेकर फ़ैज़ और फ़राज़ तक शायरों की जो लंबी परंपरा है, उसे हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों को भी अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाना चाहिए। मैंने एक प्रसंग सुनाया कि कैसे मुझे एक नौजवान ने, जिसका साहित्य से कोई गहरा रिश्ता नहीं है, फ़ैज़ की पंक्तियां ह्वाट्स ऐप से भेजी- लंबी है ग़म की शाम, मगर शाम ही तो है। फिर मुझे साथी प्रणय कृष्ण के एक लेख की याद आई- फ़ैज़ को कैसे पढ़ें? खासकर, उस मशहूर नज़्म के संदर्भ में उनका विश्लेषण, जिसे इकबाल बानो ने जनरल जिया की तानाशाही के ख़िलाफ़ गाया था- लाज़िम है कि हम भी देखेंगे। कैसे सामान्य धार्मिक भावबोध के भीतर इंक़लाबी विचारों के लिए फ़ैज़ जगह बनाते हैं। ‘जब राज करेगी खल्के ख़ुदा’ के आगे वे कहते हैं- जो मैं भी हूं और तुम भी हो।

एक वाकया जो संभवतः कुलदीप नैयर की किताब में है, उसका भी मैंने ज़िक्र किया कि कैसे एक किशोर ने एक खिड़की से सांडर्स की हत्या के बाद क्रांतिकारियों को वहां से निकलते हुए देखा था। बाद में वही किशोर फ़ैज़ हुआ। फिर ‘आज बाज़ार में पा-ब-जौला चलो’ और 'सू-ए-दार' की चर्चा हुई। रविरंजन ने शमशेर को याद किया था। शमशेर ने जो फ़ैज़ पर लिखा है, मैंने भी उसे याद किया और याद किया शमशेर की उस मशहूर पंक्ति को- ’ हक़ीक़त को लाए तखैयुल से बाहर, मेरी मुश्किलों का जो हल कोई लाए/ कहीं सर्द ख़ूं में तड़पती है बिजली, ज़माने का रद्दोबदल कोई लाए।’ जाहिर है जो बेहतर समाज, मनुष्य और व्यवस्था की कल्पना है, उसे हक़ीक़त में बदलने की जद्दोजहद वाली शायरी फ़ैज़ की है, उनका जीवन भी इसी के लिए समर्पित रहा। नाउम्मीदी, अवसाद, मोहभंग, शिकस्त का अहसास- यह सब भी है फ़ैज़ की शायरी में, पर वह निष्क्रिय नहीं करता, बल्कि बेचैनी से भरता है। घाटशिला आया तो लगा कि कुछ तो रौशनी बाकी है, हरचंद के कम है। हालांकि इस बार जगह-जगह से जश्ने-फ़ैज़ के आयोजन की ख़बरें यह भी इशारा कर रही हैं कि रौशनी से रौशनी के मिलने का सिलसिला भी चल रहा है।

संतोष कुमार सिंह ‘सारे सुखन हमारे’ लेते आए थे। मैंने पांच-छह ग़ज़लों और नज़्मों की पृष्ठ संख्या नोट की थी, पर एक ही ग़ज़ल ‘ढाका से वापसी पर’ सुनाया। वही नायरा नूर वाले अंदाज़ में। ‘हम के ठहरे अजनबी इतनी मुलाक़ातों के बाद’- लिखी गई भले यह ढाका से वापसी पर हो, पर इसे गाते और सुनते हुए आज मुल्कों, समुदायों, भाषाओं के बीच जो अजनबीयत पैदा कर दी गई है, जिस क़िस्म के हिंसक उन्मादी टकराव हो रहे हैं, उन सबसे पैदा दर्द का मानो एक साथ इज़हार होता है और सवाल गूंजता रहता है- ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद!

संतोष कुमार सिंह ने मार्के की बात कही कि हर शख़्स जो इश्क़ करना चाहता है, जो बेड़ियों को तोड़न चाहता है, जो आज़ादी चाहता है, जो अम्नपसंद है, फ़ैज़ उसके प्रिय शायर हैं। उन्होंने फ़ैज़ की नज़्म ‘ख़्वाब बसेरा’ सुनाया।

वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता बास्ता सोरेन की बहू सुनीता जो पेशे से डाॅक्टर हैं, वे ख़ास तौर से फ़ैज़ के इस आयोजन में शामिल होने पहुंची। उन्होंने ‘बोल की लब आज़ाद हैं तेरे’ सुनाया।

मुख्य वक्ता का. शशि कुमार ने बताया कि जिन दिनों वे मज़दूरी करते थे, उन दिनों दो गीत उनकी जुबान पर रहते थे। एक तो मजाज़ का- बोल अरी ओ धरती बोल राजसिंहासन डांवाडोल और दूसरा फ़ैज़ का तराना- दरबारे वतन में जाने वाले... ऐ ख़ाक नशीनों उठ बैठो अब वक़्त क़रीब आ पहुंचा है...जो दरिया झूम के उट्ठे हैं, तिनकों से न टाले जाएंगे। उनका कहना था कि बहुत सारे कवि और शायर हैं, जिनको पढ़ने और पढ़ाने वाले लोग होते हैं, पर कुछ ऐसे शायर होते हैं, जिन्हें जीने वाले लोग भी होते हैं। फ़ैज़ वैसे ही शायर हैं। फ़ैज़ आम आदमी की ज़िंदगी के, उसकी मुक्ति के शायर हैं। वे धार्मिक बिंबों के भीतर भी इंक़लाब की बात करते हैं। अहले सफा मरदूदे हरम मसनद पर तो तभी बैठाए जाएंगे जब इंक़लाब होगा। वे आज के लेखकों के लिए आदर्श हैं। वे कहते हैं कि चश्मेनम जान-ए-शोरीदा काफ़ी नहीं/आज बाज़ार में पा-ब-जौला चलो। शशि कुमार ने फ़ैज़ को कालजयी लेखक बताते हुए उनकी पंक्तियों के जरिए उम्मीद बंधाई- ‘‘यूं ही हमेशा उलझती रही है जुल्म से ख़ल्क़/ न उनकी रस्म नई है, न अपनी रीत नई/ यूं ही हमेशा खिलाए हैं हमने आग में फूल/ न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई।’’

आयोजन के दूसरे सत्र में फ़ैज़ की ग़ज़लों और नज़्मों की संगीतमय पेशकश हुई। शेखर मल्लिक के गायक रूप से भी हम आशना हुए। उन्होंने ‘मुझसे पहली-सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग’ और ‘हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे’ को गाया। छीता हांसदा ने ‘गुलों की बात करों’ को बड़े ही सधे स्वर में गाया। ग़ज़ल गायिकी के लिहाज़ से उनकी आवाज़ काफ़ी संभावनापूर्ण लगी। शेखर मल्लिक साथ उन्होंने ‘कब याद में तेरा साथ नहीं’ भी गाया। ‘बोल के लब आज़ाद हैं तेरे’ को गिटार के संगीत पर साधने की कोशिश सोमनाथ ने की। प्रो. इंदल पासवान और शेखर ने ‘गुलों में रंग भरे’ को थोड़े नए अंदाज़ में पेश किया। तबले पर तुहिन मंडल और सिंथेसाइजर पर सोमनाथ ने साथ निभाया।

छोटे बच्चे-बच्चियों ने हमें इकबाल बानो के उस एलबम की आॅडियो सीडी (ए ट्रिब्यूट टू फ़ैज़) हमें भेंट में दी, जिसमें उनकी आवाज में फ़ैज़ की रचनाओं की एक घंटे से अधिक की रिर्काडिंग है।

अपने ठिकाने पर पहुंचते-पहुंचते घड़ी के सूइयां दस को पार कर चुकी थीं। शरीर थका था, पर मन ऊर्जा से भरा हुआ था।

आयोजन में अनुमंडल पदाधिकारी अरविंद लाल, कवि व विचारक प्रो. मित्रेश्वर ‘अग्निमित्र’ (भूतपूर्व विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग), प्रो. नरेश कुमार (अंग्रेजी विभाग), प्रो. सुबोध सिंह (बंगला विभाग) सभी घाटशिला महाविद्यालय. डॉ. राजीव कुमार (हिंदी विभाग, बहरागोड़ा कॉलेज), एस.एन.एस.वी.एम. विद्यालय के प्राचार्य श्री संजय मल्लिक, आई सी सी मज़दूर यूनियन के महासचिव कॉमरेड ओम प्रकाश सिंह, पत्रकार रवि प्रकाश सिंह, मादल नाट्य दल के रंगकर्मी गणेश मुर्मू, बलराम, भागवत दास, डाॅ. देवदूत सोरेन, युवा साथी लतिका पात्र, वादिनी चंद्रा, भवानी सिन्हा, स्नेहज, भारती, राजकमल और कई मज़दूर साथी भी मौजूद थे।
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रिपोर्ट: कॉम सुधीर सुमन (संपादक: जनमत)

बुधवार, 4 अक्तूबर 2017

मध्य प्रदेश प्रलेस का बारहवाँ राज्य सम्मेलन, 16-17 सितंबर, 2017, सतना

अभिव्यक्ति के ख़तरे उठा रहे लेखकों ने महसूस की भूखंड की तपन


(यह विस्तृत रिपोर्ट साथी हरनामसिंह चांदवानी, साथी संतोष खरे, सत्यम सत्येन्द्र पाण्डे, सत्येन्द्र रघुवंशी, शिवशंकर मिश्र सरस, भगवान सिंह निरंजन, सारिका श्रीवास्तव, नीरज जैन, आरती आदि की रिपोट्स और नोट्स की मदद से तैयार की गई। - विनीत तिवारी)

अगर सब ठीक चल रहा हो तो कविता-कहानी लिखने वालों की चर्चा के विषय लेखन में भावपक्ष कैसे हुआ, यथार्थ का परावर्तन कितना हुआ, लेखक की कल्पनाशीलता ने कहाँ तक उड़ान भरी, कौन से नये शिल्प को हासिल किया, शैली में क्या नयापन है, कहाँ तक परंपरा का असर लेखन पर है और कहाँ लेखक, परंपरा से मुठभेड़ कर नई ज़मीन तोड़ रहा है, आदि। लेकिन जब देश-दुनिया पर, इंसानियत पर संकट के बादल छाए हों तब कला की बारीकियों के सवालों में उलझे रहना और अपने यथार्थ को बदलने की कोशिश न करना बुरा नहीं, बहुत बुरा है। प्रेमचंद ने कहा था हमें यानी प्रगतिशील लेखक संघ को साहित्य का सौंदर्यशास्त्र (हुस्न का मेयार) बदलना है। हमारे लेखकों ने सिर्फ़ साहित्य के ही नहीं, जीवन के सौंदर्यशास्त्र को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई और जीवन-मूल्यों को भी बेहतर, अधिक मानवीय बनाने के प्रयास किये। सच कहना, लिखना, दिखाना कभी भी बिना खतरे उठाये नहीं हुआ। बेशक मध्यवर्गीय भीरुता ने भी चोर दरवाज़े से घुसपैठ की है लेकिन हमारे ऐसे लेखकों की तादाद भी कम नहीं रही जिन्होंने ख़तरे उठाये। यहाँ तक कि उनके लेखन के असर से डरकर कायरों और झूठों ने उनकी जान भी ले ली। 

गौरी लंकेश का क़त्ल हुए ज़्यादा समय नहीं बीता है। गौरी की हत्या ने पूरे देश में अमन और इंसाफ़पसंद लोगों को हिला दिया है। दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी की हत्याओं के बाद गौरी लंकेश की हत्या से इस तरह की वहशियाना हरक़त के प्रति पूरे समाज में रोष फैला है। इस बात से ग़ुस्सा और भी बढ़ जाता है जब सत्ता में बैठे लोग उन्हें संरक्षण देते हैं जो इन हत्याओं का मखौल बनाना चाहते हैं और अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए शहीद हुए लोगों पर मौत के बाद भी गालीगलौच का कीचड़ उछालते हैं। उस गु़स्से का तापमान प्रगतिशील लेखक संघ के मध्य प्रदेश राज्य सम्मेलन में भी महसूस किया गया। 

पहले से ही तय था कि यह सम्मेलन मुक्तिबोध की जन्मशती के उपलक्ष्य में उन्हें समर्पित किया जाएगा। मुक्तिबोध का नाम आते ही सबसे पहले ही जो पंक्तियाँ नारों की तरह दिमाग में कौंधती हैं, वो हैं- ‘पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?’ और ‘अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे, तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।’ इन दोनों पंक्तियों में से पहली पंक्ति तो अपने आप पर, अपने ही साथियों पर सवाल करती है ताकि अपनी पक्षधरता में स्पष्टता रहे, और दूसरी पंक्ति अपना संकल्प बताती है ख़तरों की आशंकाओं के यथार्थ को मूर्त करती हुई।

मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ का 11वाँ राज्य सम्मेलन 2012 में सागर में हुआ था। उसके पश्चात देश के बदले राजनीतिक परिदृष्य में तेजी से जनता के पक्ष में सोचने, लिखने, पढ़ने या कला के किसी और माध्यम में अपने आपको अभिव्यक्त करने वालों पर हमले हुए। उन्हें प्रताड़ित पहले भी किया जाता रहा था। लेकिन इस दफ़ा उन्हें जान से ही मार डाला गया। इसी बेचैनी के बीच विंध्य क्षेत्र के सतना में 12वें राज्य सम्मेलन (16-17 सितम्बर 17) में प्रदेश के 26 जिलों से एकत्र हुए प्रलेस के प्रतिनिधि कलमकारों ने और अन्य लेखकों ने एकताबद्ध होकर कहा कि ‘‘ज़ुल्म के खि़लाफ़ हम मिलकर लड़ेंगे साथी।’’

हाल ही में दिवंगत हुए प्रलेस संरक्षक मंडल के प्रमुख सदस्य श्री चन्द्रकांत देवताले के नाम पर बनाए गए सभागार में लगातार दो दिनों तक विभिन्न विषयों पर वरिष्ठ लेखकों, प्रलेस प्रतिनिधियों ने विचार विमर्श कर राष्ट्रीय, अंतराष्ट्रीय विषयों पर प्रस्ताव पारित कर अपनी मंशा जाहिर कर दी कि उभरते फासिज्म के खिलाफ लेखक, पत्रकार, स्वतंत्रचेता झुकने को तैयार नहीं हैं। मुक्तिबोध जन्म शताब्दी को समर्पित 12वाँ राज्य सम्मेलन चन्द्रकांत देवताले की लंबी कविता के शीर्षक ‘‘भूखण्ड तप रहा है’’ के सूत्र वाक्य पर आधारित था। इसी तपिश को सम्मेलन में भली भाँति महसूस किया गया। 

16 सितम्बर को अधिवेशन का शुभारंभ वरिष्ठ लेखक-आलोचक श्री विश्वनाथ त्रिपाठी (दिल्ली) ने किया। उन्होंने अधिवेशन स्थल पर प्रदेश के रचनाकारों, कलाकारों द्वारा प्रदर्शित कृतियों का अवलोकन किया। अधिवेशन सभागार की दीवारों पर टंगे कविता पोस्टर देश के वर्तमान हालात दर्शा रहे थे। बस्ती (उ. प्र.) से आये छायाकार शाहआलम ने छायाचित्रों के माध्यम से चंबल के बीहड़ों में निवासरत ग़रीबों किसानों की दशा-दिशा पर दर्शकों का ध्यान आकृष्ट किया। उज्जैन के चित्रकार मुकेश बिजौले, अशोकनगर के पंकज दीक्षित, इंदौर के अशोक दुबे, रीवा के के. सुधीर के कविता पोस्टरों और शिल्पज्ञ-चित्रकार प्रोफेसर प्रणय की शिल्पकला को भरपूर सराहना मिली। इन्हीं के साथ किताबों की प्रदर्शनी और विक्रय की स्टॉल पर भी सभी लेखक प्रतिनिधि दिलचस्पी लेकर साहित्य से लेकर लेनिन, क्लारा जेटकिन आदि वाम सिद्धांतकारों की पुस्तकें देखते, पढ़ते और खरीदते रहे। चंद्रकांत देवताले सभागृह में हर तरह से कला की सभी विधाओं से प्रगतिशील संस्कृति का शानदार माहौल बना लिया गया था। 
सम्मेलन की शुरुआत में अशोकनगर इप्टा ने जनगीत प्रस्तुत किए। स्वागत भाषण देते हुए प्रलेस सतना इकाई के अध्यक्ष श्री संतोष खरे ने आपातकाल के दौरान 41 वर्ष पूर्व 1976 में हुए प्रलेस के राष्ट्रीय सम्मेलन को याद करते हुए कहा कि तब घोषित आपातकाल था और आज अघोषित आपातकाल है। आज फिर लेखकों के सामने अभिव्यक्ति का संकट मुँह बाये खड़ा है। आपने सत्ता की आलोचना की नहीं कि आप देशद्रोही करार दिये जा सकते है। सरकार को ही देश मानने पर मजबूर किया जा रहा है। ऐसे में प्रलेस फिर दमन के खिलाफ मोर्चा लेगा।
 
उद्घाटन वक्तव्य देते हुए श्री विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि वर्ष 1976 में सतना में ही आपातकाल के दौरान प्रलेस का अधिवेशन हुआ था। उस आपातकाल को तो उठा लिया गया। वर्तमान में अघोषित अपातकाल को कौन हटाएगा? साम्प्रदायिकता अपने विकृत चेहरे को ढंककर संस्कृति की खाल ओढ़कर आती है। मनुष्य विरोधी हर काम के खिलाफ जो भी हैं, हम उनके साथ हैं। उन्होंने कहा कि जो इस भारत को को तोड़कर एक जैसा बनाना चाहते हैं, वे समझ लें कि यहाँ जीवन में इतना सदभाव घुला मिला है कि वे उसे हमेशा के लिए तोड़ नहीं सकते। जो ताक़तें भारत को सिर्फ़ हिंदुओं का देश बनाना चाहती हैं, वे समझ लें कि वे भी चैन से नहीं रह पाएँगी। उन्होंने ‘एकता’ और ‘एकजैसेपन’ यानी ‘यूनिटी’ और ‘यूनिफॉर्मिटी’ के फ़र्क़ को समझने पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध को याद करने का अर्थ ही यह है कि हम देश में संस्कृति का लबादा ओढ़े चले आ रहे फ़रेबियों और हत्यारों के ख़िलाफ़ लामबंद हों। वे लोग न केवल हत्या की संस्कृति फैला रहे हैं बल्कि जिस महिला को उसके विचारों की वजह से मारा गया, उस गौरी लंकेश को अपशब्द भी कहे जा रहे हैं। और उससे भी ज़्यादा शर्म की बात यह है कि ख़ुद प्रधानमंत्री उसके ट्विटर पर फॉलोअर हैं। जनता सब देख रही है। निश्चित है कि वो इसका जवाब देगी। 

श्रोताओं में प्रलेस के वरिष्ठ संरक्षक मंडल सदस्य जो बारहवें राज्य सम्मेलन के संरक्षक भी थे और जो विंध्य क्षेत्र के लोकप्रिय प्रगतिशील लेखक रहे हैं, श्री देवीशरण ग्रामीण भी अपनी अस्वस्थता और आयु के बाद भी नागौद से सतना आये थे और अगली कतार में ही बैठे थे। उनसे मंच पर चढ़ते न बना तो विश्वनाथ जी ख़ुद नीचे उतरकर उनसे गले मिलने चले गए। न केवल देवीशरण ग्रामीण जी की आँखें ख़ुशी से भीगी थीं बल्कि सभागृह में मौजूद सभी लोगों की आँखों में अपने दो बुजुर्ग लेखकों का परस्पर सम्मान, प्यार और संगठन के प्रति प्रतिबद्धता देखकर गीलापन था। ख़ुद विश्वनाथ जी 88 वर्ष की आयु में जबलपुर से सतना तक का सड़क से सफ़र करके आये थे और कह रहे थे कि प्रलेस के साथियों से मिलकर मेरा जीवन रस बढ़ जाता है, इसलिए मैं तो अपने स्वार्थ से आया हूँ। 
 
जनवादी लेखक संघ के प्रदेश महासचिव श्री मनोज कुलकर्णी ने लेखकों की एकजुटता पर जोर देते हुए कहा कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर फासिज़्म हमारे सामने है। ग़रीबों और अमीरों के बीच खाई बढ़ती जा रही है। देश के सभी आर्थिक संसाधनों पर एक प्रतिशत से भी कम औद्योगिक घरानों का कब्ज़ा हो गया है। जनता की समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए सत्ता द्वारा साम्प्रदायिक विद्वेष को बढ़ावा दिया जा रहा है। धार्मिक बहुसंख्यकवाद के नाम पर अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों को प्रताड़ित किया जा रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी और निजता का अधिकार छीना जा रहा है। जन संस्कृति मंच के महासचिव श्री प्रेम शंकर ने कहा- अब वही जीवित रह पाएगा जो सत्ता के झूठ को स्वीकारेगा। लेखक संगठन अपने अतीत के मतभेदों को स्थगित रखकर एकजुट हों। आज देश में विराट सांस्कृतिक मोर्चा बनाने की जरूरत है। प्रलेस के प्रांतीय अध्यक्ष श्री राजेन्द्र शर्मा ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य पुनः निशाने पर है। हिन्दी साहित्य संस्थान से गोदान को हटा दिया गया है। दक्षिणपंथी प्रेमचंद से डरते हैं। 

अंत में सागर सम्मेलन के बाद से प्रलेस, मध्य प्रदेश के दिवंगत हुए साथी लेखकों सर्वश्री श्यामसुंदर मिश्र (जबलपुर), श्री महेंद्र वाजपेयी (जबलपुर), सुश्री नुसरत बानो रूही (भोपाल), श्री गोविंदसिंह असिवाल (भोपाल), श्री प्रेमशंकर रघुवंशी (हरदा), श्री के. के. श्रीवास्तव (दमोह), श्री हशमत छतरपु (छतरपुर) गेंदालाल सिंघई (अशोकनगर), श्री गिरधर शर्मा (गुना) और श्री चंद्रकान्त देवताले (इंदौर) को श्रृद्धांजलि अर्पित करते हुए दो मिनट का मौन रखा गया।

उद्घाटन सत्र के बाद प्रलेस महासचिव श्री विनीत तिवारी ने अपने वक्तव्य में सागर सम्मेलन के बाद से अब तक के प्रमुख कार्यों की सूची प्रस्तुत की और मध्य प्रदेश प्रलेस द्वारा 11 लेखकों के प्रतिनिधिमंडल की शहीद लेखकों डॉ. नरेंद्र दाभोलकर, कॉमरेड गोविंद पानसरे और प्रोफ़ेसर एम. एम. कलबुर्गी के गृहनगरों की ओर इन लेखकों के परिजनों से मिलने और एकजुटता ज़ाहिर करने के मक़सद से की गई यात्रा के बारे में बताया। उन्होंने प्रदेश में लगाये गए प्रदेश स्तरीय कविता, कहानी और विचार शिविरों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने ये भी कहा कि आज बेशक हम पहले से ज़्यादा भी हैं और पहले से अधिक सक्रिय भी, लेकिन फ़ासीवाद की चुनौती का सामना करने के लिए हमें और अधिक सक्रियता की ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि यदि आज स्वतंत्र विचारों की रक्षा नहीं की गई तो देश में उदारवादी चेहरों का अकाल पड़ जाएगा। उन्होने प्रलेस सचिव मंडल सदस्य श्री बाबूलाल दाहिया द्वारा किसानों की हत्या के विरोध में प्रदेश सरकार के पुरस्कार को ठुकराकर प्रतिरोध की परंपरा को आगे बढ़ाने की सराहना की, साथ ही अपने सचिव मंडल, कार्यकारी दल और विशेष रूप से संगठन को आगे बढ़ाने में सुश्री सुसंस्कृति परिहार, सुश्री सारिका श्रीवास्तव और सुश्री आरती के प्रयासों को रेखांकित किया। श्री तिवारी ने कहा कि सत्ता के संरक्षण के कारण ही कलबुर्गी, दाभोलकर, पानसरे के हत्यारों को अब तक नहीं पकड़ा जा सका और अब गौरी लंकेश के क़त्ल को भी पारिवारिक मामला या नक्सलवादियों का नाम लेकर भरमाया जा रहा है। उन्होंने वर्ष 2015 में विश्व हिन्दी सम्मेलन में लेखकों की उपेक्षा और केन्द्रीय मंत्री की अपमानजनक टिप्पणी और व्यापम घोटाले का भी उल्लेख किया। अपने वक्तव्य में श्री विनीत तिवारी ने सरदार सरोवर बाँध के विस्थापितों के प्रति एकजुटता व्यक्त करते हुए उनके आंदोलन का समर्थन किया। इसका महत्त्व इसलिए भी था कि अगले ही दिन यानि 17 सितंबर को मोदी अपने जन्मदिन पर सरदार सरोवर बाँध का पूर्ण कहकर उद्घाटन करने वाले थे जबकि 40 हज़ार परिवारों के पुनर्वास और मुआवजे का निपटारा अभी तक बाक़ी है। लोगों को डुबोने, किसानों को आत्महत्याओं के लिए मजबूर करने और फिर जनता के सारे असंतोष की दिशा एक दूसरे पीड़ित समूहों की ओर मोड़ने और उन्हें आपस में लड़वाने का फ़ासीवाद का तरीक़ा नया नहीं है लेकिन लेखकों को इसे फिर से लोगों के सामने उजागर करना होगा। उन्होंने अपने वक्तव्य की समाप्ति में कहा कि ‘लंबी है ग़म की शाम, मगर शाम ही तो है।’
दोपहर बाद विचार सत्र में मुक्तिबोध के संदर्भ में ‘पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?’ विषय पर साहित्य एवं राजनीति के अंतर्संबंधों को टटोला गया। सत्र की शुरुआत में दमोह की साथी सुश्री सुसम्मति परिहार ने मुक्तिबोध की ‘अँधेरे में’ कविता का अंश ‘ओ मेरे आदर्शवादी मन, ओ मेरे सिद्धांतवादी मन’ गाकर प्रस्तुत किया। प्रमुख वक्ता प्रो. गार्गी चक्रवर्ती (दिल्ली) ने कहा कि आपातकाल में राज्य के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों पर कार्यवाही होती थी। अब आम जनता को निशाना बनाया जा रहा है। जब सावरकर ने हिंदू राष्ट्र की कल्पना की थी तो रबींन्द्रनाथ ठाकुर ने उसका विरोध किया था। सांप्रदायिकता के प्रवेश के कारण ही रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने 1905 के बंग-भंग आंदोलन से दूरी बना ली थी। उनका उपन्यास ‘गोरा’ एक तरह से इसी पृष्ठभूमि को स्पष्ट करता है। दक्षिणपंथी लोग आज भी रबीन्द्रनाथ ठाकुर को मौका मिलते ही पाठ्यक्रमों से बाहर करना चाहते हैं। जिन्होंने भारत की आज़ादी की लड़ाई से अपने आपको दूर रखा और अंग्रेजों की चाटुकारिता की, उन्होंने ही गाँधीजी को मारा, रबीन्द्रनाथ ठाकुर को बदनाम करने की कोशिश की और आज फिर हिंदू राष्ट्रवाद को हथियार बनाकर लोगों के हक़ की आवाज़ उठाने वालों या सच्चाई बताने वालों का क़त्लेआम कर रहे हैं। हम भारतीय राष्ट्रवादी हैं, हिन्दू राष्ट्रवादी नहीं। साम्प्रदायिक विचारधारा अब फ़ासीवाद की शक्ल लेती जा रही है। फ़ासीवाद के खिलाफ ही प्रगतिशील लेखक संघ का गठन हुआ था। उसके खिलाफ लड़ना आज भी ज़रूरी है। 

अलीगढ़ से आये वेदप्रकाश ने कहा कि मध्यवर्ग बदल रहा है। सत्ता का भय कायम है। लोग झुकने के लिए तैयार बैठे हैं। चारों ओर चापलूसी का माहौल है। आम आदमी के मन में राजनीति का गंदा चेहरा स्थापित कर दिया गया है। इस सबमें शिक्षण संस्थानों और मीडिया की भूमिका भी बहुत ही नकारात्मक है। हमें हमारी प्रगतिशील विरासत को आज के संदर्भों से जोड़कर लोगों के समक्ष ले जाने की ज़रूरत है। छत्तीसगढ़ से आये वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रभाकर चौबे ने कहा कि हर व्यक्ति की पक्षधरता होती है। मनुष्य विरोधी कार्यों के ख़िलाफ़ लड़ने वालों के साथ हम खड़े हैं। अध्यक्ष मंडल सदस्य वरिष्ठ कहानीकार-उपन्यासकार श्री रमाकांत श्रीवास्तव ने कहा कि सत्य पर कोड़े बरसाये जा रहे हैं और अधिकांश बुद्धिजीवी खामोश हैं, जबकि सच के साथ खड़ा होना लेखकों का दायित्व है। उन्होंने परसाई को उद्धृत करते हुए कहा कि जब एक व्यक्ति दूसरे को मार रहा हो तो आप दोनों के प्रति समान भाव नहीं रख सकते। आपको पक्ष लेना होता है। उसी चयन से हमारी पॉलिटिक्स तय होती है। अध्यक्ष मंडल सदस्य वरिष्ठ कहानीकार-उपन्यासकार श्री सुबोध श्रीवास्तव ने कहा कि हमारे राम-राम को बड़ी धूर्तता से षड्यंत्र करके आरएसएस-भाजपा ने जय श्रीराम में बदल दिया है। हमें लोंगों को यह समझाना ज़रूरी है कि हमारे राम गाँधी के राम थे, न कि जिनके नाम पर मंदिर-मस्ज़िद के फ़साद खड़े करके क़त्लेआम और नफ़रत फैलायी जा रही है। सामाजिक कार्यकर्ता एवं कटनी इकाई के अध्यक्ष श्री नंदलाल सिंह ने कहा कि संगठन के सभी सदस्यों को वैचारिक रूप से प्रखर बनाने की ज़रूरत है ताकि हम राजनीति के आगे चलने वाली मशाल की वो भूमिका निभा सकें जो प्रेमचंद ने हमारे लिए निर्धारित की थी। शहडोल के वरिष्ठ साथी श्री सुरेश शर्मा ने कहा कि ये जानते हुए भी कि हमारी लड़ाई लंबी है और हम इसे लड़ते जाएँगे, लड़ने के तरीकों में कुछ बदलाव लाने की दिशा में हमें सोचना चाहिए। इस सत्र का संचालन सचिव मंडल सदस्य श्री तरुण गुहा नियोगी ने किया। 

शाम को एक विशाल रैली निकाली गई जो अस्पताल चौक से प्रारंभ होकर नगर के प्रमुख मार्गों से होती हुई आयोजन स्थल तक पहुँची। रैली में लेखकों ने शहीद लेखकों, पत्रकारों के हत्यारों को गिरफ़्तार करने की माँग करते हुए जनगीत गाये और लेखकों, संस्कृतिकर्मियों की एकता, अमन, इंसाफ़, इंसानियत, मोहब्बत और इंक़लाब ज़िंदाबाद के नारे लगाये। हरिशंकर परसाई, बलराज साहनी, भीष्म साहनी, हबीब तनवीर, सज्जाद ज़हीर, प्रेमचंद, ख़्वाज़ा अहमद अब्बास, इस्मत चुगताई आदि लेखकों की तस्वीरों के साथ रैली में दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी और गौरी लंकेश के लिए इंसाफ़ माँगने वाले और अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा हेतु जनता से अपील करने वाले पोस्टर भी थे। 

सांस्कृतिक रैली के वापस आने के बाद फिर सत्र शुरू हुआ। शुरुआत में सीधी से आये इंद्रावती नाट्य समिति के कलाकारों ने बघेली के लोकगायन का प्रसिद्ध आशु कविता रूप टप्पा गायन प्रस्तुत किया। ट्रेन के 12 घंटे लेट हो जाने की वजह से विशिष्ट अतिथि, प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव श्री राजेन्द्र राजन (बेगुसराय) और प्रलेस के बिहार प्रांत के प्रांतीय महासचिव प्रो. रवीन्द्र नाथ राय (आरा) शाम होते-होते सतना पहुँच सके थे और सीधे ही सत्र में शामिल हो गए। श्री राजेन्द्र राजन ने मध्य प्रदेश प्रलेस के लेखक साथियों को अपना क्रांतिकारी अभिवादन पेश करते हुए मुक्तिबोध का स्मरण करते हुए संक्षेप में फ़ासीवाद के आसन्न संकट के दौर में लेखक संगठन की भूमिका पर अपनी बात रखी। उन्होंने 28-29 अक्टूबर को चंडीगढ़ में होने जा रहे लेखकों के फ़ासीवाद विरोधी राष्ट्रीय सम्मेलन की रूपरेखा भी रखी और मुक्तिबोध के अवदान को याद किया। प्रो. रवीन्द्रनाथ राय ने भी मध्य प्रदेश के सम्मेलन को अपनी शुभकामनाएँ देने के साथ ही नवउदारवाद के दौर में सांस्कृतिक आंदोलन की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। अध्यक्ष मंडल सदस्य और वरिष्ठ कवि श्री कुमार अंबुज (भोपाल) ने इस सत्र में कहा कि जिसे आज नवउदारवाद की संज्ञा दी जा रही है, वह दरअसल नवसंकीर्णतावाद है। हमारे लेखकों को आज प्रतिबद्धता के साथ अपने लेखन के मोर्चे पर तो जुटना ही चाहिए, साथ ही हमारी मौजूदगी के बारे में सहज सांगठनिक विवेक का भी इस्तेमाल करना चाहिए। अगर हम आज ढुलमुल नीति अपनाएँगे तो हमारा आंदोलन कमज़ोर होगा, ख़ुद हमारी पहचान विश्वसनीय नहीं रह जाएगी। 

रात में 9 बजे से कवि गोष्ठी का आयोजन हुआ जिसमें प्रदेश के कोने-कोने से आये अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। कवि गोष्ठी रात 1 बजे तक चली जिसका संचालन किया श्री टीकाराम त्रिपाठी (सागर) ने और अध्यक्षता की श्री महेश कटारे ‘सुगम’ (बीना) ने। सर्वश्री शैलेन्द्र शैली, महेंद्र सिंह, रामयश बागरी, बाबूलाल दाहिया, आज़ादवतन वर्मा, श्रीमती उर्मिला सिंह, वृंदावनराम ‘सरल’, गिरीश पटेल, पी. आर. मलैया, सुश्री मीना सिंह, मिथिलेश राम, दीपक अंबुद, केशरीसिंह चिड़ार, वीरेन्द्र प्रधान, हरिनारायण, प्रेमप्रकाश चौबे, यासीन ख़ान, आदि विभिन्न शहरों से आये 27 कवियों ने कविता पाठ किया। 

अधिवेशन के दूसरे दिन की शुरुआत ‘हाशिये का समाज और साहित्य की जिम्मेदारी’ विषय पर परिचर्चा से हुई। सत्र के पूर्व गुना-अशोकनगर से आईं प्रलेस और इप्टा की सदस्या लेखिका व संगीतकार सुश्री रामदुलारी शर्मा ने और अनूपपुर की रचनाकार साथी सुश्री मीना सिंह ने भी जनगीत गाये।

आधार वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ साहित्यकार व चिंतक श्री रामनारायण सिंह राना, सतना ने कहा कि सामाजिक न्याय से वंचित समाज के बारे में अभी भी बहुत लिखा जाना बाक़ी है। वर्तमान साहित्य के बिम्ब संपन्न समाज के हैं। साहित्य की मुख्यधारा में ऊँची जातियों के लेखकों का दबदबा है। प्रलेस राष्ट्रीय महासचिव श्री राजेंद्र राजन ने कहा कि शोषण के ख़िलाफ़ लिखने वाला ही सच्चा लेखक है। शोषण से मुक्ति टुकड़ों में नहीं मिलती। रचनाकार अपनी ज़िम्मेदारी से भाग नहीं सकते। देश में साम्प्रदायिकता, शोषण व ग़रीबी के ख़िलाफ़ उठ खड़े होने का समय है यह। लेखक के भीतर वैज्ञानिक चेतना हो तो बाकी विषय मायने नहीं रखते। चूँकि प्रलेस का जन्म ही फासीवाद से संघर्ष की पृष्ठभूमि में हुआ इसलिए अन्य सांस्कृतिक संगठनों की तुलना में फासिज़्म से लड़ने की हमारी ज़िम्मेदारी है। लड़ें या घुटने टेकें ?  हम घुटने टेकने के लिए तैयार नहीं हैं। भारत माता को राष्ट्र भक्ति का पैमाना बना दिया गया है। ताक़तवर बाज़ार विवेक को समाप्त कर रहा है। फासिज़्म अब पुराने तरीके से सामने नहीं आएगा। भारत में साम्प्रदायिक्ता के खोल में फ़ासीवाद का चेहरा सामने है। 
अध्यक्ष मंडल सदस्य श्री सेवाराम त्रिपाठी, रीवा ने कहा कि प्रेमचंद ने साहित्य में वंचित वर्ग को स्थान दिया है। हाशिये का समाज भी कई वर्गों में बँटा है। श्री महेंद्र सिंह ने कहा कि हाशिये का समाज सदैव ज्ञान से वंचित रहा है। यहाँ तक कि प्रगतिशील लेखकों के भीतर भी अनेक के भीतर जातीय, लैंगिक अथवा धार्मिक भेदभाव के लक्षण हैं। हम लेखकों को लेखन व आचरण में समानता लानी होगी। देश की एक प्रतिशत आबादी के पास 53 प्रतिशत पूँजी है। यह आर्थिक खाई सामाजिक असमानता भी लाती है। आर्थिक मुद्दों पर तो फिर भी कुछ न कुछ होता है लेकिन सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन अब देश में नहीं होते। इस दिशा में प्रलेस को कुछ ठोस करने की आवष्यकता है। सुश्री आरती, भोपाल ने कहा कि नवउदारवाद और पूँजीवाद ने हाशिये के नए समाज बनाए हैं। वंचित वर्ग भी नई अर्थनीतियों का शिकार है। सम्पत्ति पर उत्तराधिकार जैसी कई समस्याएँ आज भी बनी हुई हैं। सुश्री सुसंस्कृति परिहार, दमोह के अनुसार वंचित वर्ग के मार्गदर्शन के लिए प्रलेस का गठन हुआ। किसानों-आदिवासियों के बारे में न केवल लिखा जाना चाहिए अपितु उनके साथ उनके आंदोलनों का हिस्सा भी बनने की ज़रूरत है।

सचिव मंडल सदस्य श्री शैलेंद्र शैली, भोपाल ने कहा कि दलित चेतना का वर्गीय चेतना में रूपान्तरण जरूरी है। सुश्री सारिका श्रीवास्तव, इंदौर के अनुसार आज के दौर में लेखक सिर्फ़ लिखकर ही इतिश्री नहीं कर सकता। उसे अन्य मुद्दों पर भी समाज में अपनी सक्रियता बढ़ानी होगी। हाशिये के समाज के बारे में उन्होंने कहा कि मर्द और औरत के अलावा समाज में तीसरे लिंग की चर्चा नहीं होती जबकि वे भी मनुष्य ही हैं। उन्होंने महिला लेखिकाओं, लालदेई, डॉ. रशीद जहाँ, नुसरत बानो रूही आदि के लेखकीय अवदान को याद रखने की प्रलेस से अपेक्षा की। श्री फूलचंद बसोर, रीवा ने कहा कि यह भी एक विडंबना है कि हाशिये के बाहर समाज के बारे में गैर दलितों ने अधिक लिखा है और खुद हाशिये के समाज के लोग मौका मिलते ही मुख्यधारा का हिस्सा बन जाना चाहते हैं। श्री रामआसरे पाण्डे, इंदौर ने चुनाव प्रणाली में बदलाव की माँग को रेखांकित करते हुए कहा कि वामपंथ के पास भविष्य का स्वप्न तो है लेकिन उसे हासिल कैसे करना है, उसका कोई कार्यक्रम (प्रोग्राम) नहीं है। सचिव मंडल सदस्य श्री अभय नेमा, इंदौर ने सचेत किया कि हमें प्रायोजित नफ़रत से बचना चाहिए जो इस नये माध्यम सोशल मीडिया द्वारा फैलाई जा रही है। तोड़े-मरोड़े गए थोड़े से सच में भरपूर झूठ मिलाकर लोगों को भरमाया और एक दूसरे के ख़िलाफ़ भड़काया जा रहा है। प्रलेस इस बारे में भी कुछ करे तो अच्छा होगा। श्री सोमेश्वर सोम, सीधी ने कहा कि किसान हर जगह मर रहा है पर साहित्य में उसे स्थान नहीं मिल रहा है। लेखकों के बीच जाति की चर्चा उन्हें बाँटने की साजिश है। हमारा ऐतिहासिक दायित्व पूँजीवाद को ख़त्म करना है। वर्गीय चेतना ही हमारा अस्त्र है। 

पवित्र सलालपुरिया, गुना के अनुसार सोच जाति आधारित नही वर्ग आधारित होना चाहिये। अनिल कुमार सिंह ने कहा कि साहित्य दो अतिवादी विचारो के बीच जी रहा है। मंदसौर के साथी श्री हरनामसिंह ने पठनीयता के संकट पर ध्यान आकृष्ट करवाते हुए साहित्य के संप्रेषण में नई तकनीक के उपयोग पर जोर दिया। इस सत्र में आर. बी सिंह, गणेश कानड़े, खंडवा, नीरज जैन, दतिया, डॉ. विद्याप्रकाश, रीवा ने भी अपने विचार रखे। सत्र का समापन करते हुए महासचिव विनीत तिवारी ने कहा कि लेखक केवल वही नहीं है जो कविताएँ, कहानियाँ लिख रहे हैं। इतिहास, अर्थशास्त्र या अन्य किसी भी विषय में लेखन करने वाले, यहाँ तक कि पत्रकार, ब्लॉगर भी लेखकों की बिरादरी का हिस्सा हैं। हमें इस भावना से बाहर आना चाहिए कि कविता-कहानी लिखने वाला ही लेखक होता है। मारे गए चारों शहीद अपने लिखने-पढ़ने और अपने विचारों को निडरता से व्यक्त करने के लिए ही मारे गए। वे जो लिखते थे, मुक्तिबोध की पंक्ति ‘अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने ही होंगे, तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब’ को चरितार्थ करते थे। उनका लिखा शोषकों के चैन में खलल डालने में कामयाब रहा तो उन्हें बेशक बड़ा लेखक मानना ही चाहिए। दूसरी बात यह कि लेखन के खाने बनाना दलित लेखन, महिला लेखन वगैरह ग़लत है। न तो एक लेखक सिर्फ़ इतना लिखना चाहता है जो उसकी जाति या समूह से जुड़ा हुआ हो और न ही पाठक ये अपेक्षा करता है। प्रलेस के अध्यक्षीय भाषण में प्रेमचंद या प्रलेस के घोषणापत्र में वंचित और शोषित समुदायों के साथ जुड़ने, अपने लेखन के माध्यम से उनके जीवन के दुःखों और खुशियों को दर्ज करने की बात की गई है, चाहे वे दलित हों, अल्पसंख्यक हों या लैंगिक, भाषिक या क्षेत्रीय आधार पर हाशिये पर हों। सागर सम्मेलन में ही हमने महत्त्वपूर्ण आदिवासी लेखक श्री वाहरू सोनवणे को अपना मुख्य अतिथि बनाया था। किसी ने बात की थी वामपंथ के पास कार्यक्रम की कमी की। प्रलेस के पास कार्यक्रम है। और वो कार्यक्रम है एक शोषणमुक्त समाज की, समाजवादी समाज व्यवस्था की रचना करने में अपना भरसक योगदान देना। इसी लक्ष्य को पाने के लिए यह ज़रूरी है कि हम हाशिये के समुदायों के साथ अपने संबंधों को प्रगाढ़ करें, बिना यह भूले कि आख़िरकार जातीय, क्षेत्रीय, भाषायी, लैंगिक और सांप्रदायिक भेदभाव पैदा ही इसलिए किए जाते हैं कि मुट्ठीभर तबक़े का सारे संसाधनों पर क़ब्ज़ा रहे। इसलिए आर्थिक आधार पर वर्गीय संरचना को तो बदलना ही होगा लेकिन उतना काफ़ी भी नहीं और बदलने के लिए जो ताक़त चाहिए, वो भी हाशिये पर मौजूद संख्या में बहुत सारे लोगों के एकीकृत संघर्ष में जुड़ाव से ही हासिल होगी। 

दोनों दिन इन खुले सत्रों में अनेक स्थानीय और आसपास के रचनाकारों की भी भागीदारी रही। इस अवसर पर दोनों दिन अनेक लेखकों की पुस्तकों का विमोचन भी हुआ। इनमें श्री देवीशरण ग्रामीण की पुस्तक के साथ ही श्री शिवकुमार ‘अर्चन’ ,भोपाल की पुस्तक ‘ऐसा भी होता है’, श्री बाबूलाल दाहिया, सतना की बघेली पुस्तक ‘पसीना हमारे बद है’, श्री सरोज सिंह परिहार की ‘सूरज के गाँव में’, श्री संतोष खरे, सतना की किताब ‘पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है’, श्री कैलाश चन्द्र, रीवा की चार पुस्तकों ‘पतनगाथा’ (उपन्यास), ‘नाम में क्या रखा है’ (उपन्यास), ‘मोहनदास’(उदय प्रकाश) नाट्य रूपांतर और ‘चौराहे’ (नाटक), श्री जाहिद खान (शिवपुरी) की पुस्तक ‘फैसले जो नज़ीर बन गए’ और सुरेश शर्मा, शहडोल की पुस्तक ‘राजनीतिक संकट के विभिन्न आयाम’ का विमोचन सम्मेलन में आये अतिथियों एवं वरिष्ठ साहित्यकारों द्वारा किया गया। सभी प्रतिनिधियों को प्रातिनिधिक सामग्री में गार्गी चक्रवर्ती लिखित पी. सी. जोशी की जीवनी, सारिका द्वारा तैयार किये गए प्रगतिशील लेखकों के छोटे-छोटे पद्यांश या गद्यांश पर बुकमार्क जैसे पोस्टर्स एवं अन्य सामग्री भी दी गई। सारिका द्वारा तैयार किये गए पोस्टर्स का भी विमोचन किया गया। 

दूसरे दिन भोजनोपरांत सांगठनिक सत्र के पहले शिवकुमार ‘अर्चन’ ने तरन्नुम में उम्दा नज़्म सुनाई और इप्टा अशोकनगर के साथियों ने कबीर के पद और जनगीत सुनाये। सांगठनिक सत्र में सर्वसम्मति से नई कार्यकारिणी चुनी गई। श्री राजेन्द्र शर्मा को पुनः अध्यक्ष पद हेतु चुना गया जबकि महासचिव पद की ज़िम्मेदारी सचिव मंडल के वरिष्ठ सदस्य श्री शैलेन्द्र शैली को दी गई। अब विनीत तिवारी राष्ट्रीय सचिव मंडल के सदस्य हैं और उन्हें प्रांतीय अध्यक्ष मंडल में भी शामिल किया गया है। संरक्षक मंडल में 9 वरिष्ठ साहित्यकार रखे गए और अध्यक्ष मंडल में 15 साहित्यकारों को रखा गया। सचिव मंडल 14 साहित्यकारों को लेकर गठित किया गया। पहली बार मध्य प्रदेश के प्रांतीय सचिव मंडल में तीन महिला साहित्यकारों को लिया गया। कार्यकारिणी की विस्तृत सूची आगे है। 

सम्मेलन के अंत में निवृत्तमान पदाधिकारियों और नवनिर्वाचित पदाधिकारियों ने स्थानीय आयोजक समूह के सर्वश्री देवीशरण ग्रामीण, संतोष खरे, महेन्द्र सिंह, बाबूलाल दाहिया, रामयश बागरी, तेजभान, उदित तिवारी, आदि साथियों को कामयाब सम्मेलन के लिए बधाई और अच्छी व्यवस्थाओं के लिए धन्यवाद दिया। अपने तेवरों में विद्रोही और सत्ता के दमन के तीव्र विरोध की आभा लिए यह प्रांतीय सम्मेलन भी पूर्व में हुए शानदार और यादगार सम्मेलनों की कड़ी में दर्ज हुआ। सतना में ही नहीं, पूरे प्रदेश में और प्रदेश से बाहर भी इसकी अनुगूँज बनी रहेगी। 

प्रस्ताव जो पारित किये गये- 

1. बर्मा से आये रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार बंद हो। सभी तरह के शरणार्थियों को मानवता के आधार पर शरण, सुरक्षा और सहायता दी जाए।
2. सरदार सरोवर बाँध के विस्थापितों का पूर्ण पुनर्वास किया जाए, मेधा पाटकर एवं अन्य आन्दोलनकारियों पर थोपे गए झूठे मुकदमे वापस लिए जाएँ।
3. केन्द्रीय हिंदी संस्थान द्वारा प्रेमचंद के उपन्यास गोदान को पुनः पाठ्यक्रम में शामिल किया जाये। 
4. प्रदेश की सभी शासकीय, अशासकीय संस्थाओं में बढ़ते राजनीतिक दखल को रोका जाये।
5. प्रलेस के मध्य प्रदेश महासचिव विनीत तिवारी एवं उनके साथ जाँच दल में मौजूद रही प्रोफ़ेसर नंदिनी सुंदर, प्रोफ़ेसर अर्चना प्रसाद, महिला फ़ेडरेशन नेत्री मंजु कवासी, सीपीआई (एम) के छत्तीसगढ़ राज्य सचिव संजय पराते और स्थानीय आदिवासी मंगलू पर छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा थोपे गए झूठे मुकदमे वापस लिए जाएँ और ऐसे झूठे मामले बनाकर आम नागरिकों को फँसाने वाले शासन के अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाए।
6. बेंगलुरु की एक कंपनी द्वारा इंटरनेट पर सर्वे कर एक सूची जारी की गई है। ट्विटर पर आये संदेशों में लिखा गया है कि किन-किन कथित ‘देश द्रोहियों’ को ख़ामोश करने की ज़रूरत है, और आगे 66 लोगों की एक सूची है जिसमें सोनिया गाँधी, मणिशंकर अय्यर, दिग्विजय सिंह जैसे काँग्रेस के नेताओं के साथ ही केरल के मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन, एआईएसएफ नेता कन्हैया कुमार, सर्वोच्च न्यायालय की वकील वृंदा ग्रोवर एवं अन्यों के साथ प्रलेस के प्रांतीय महासचिव विनीत तिवारी का भी नाम है। न केवल नाम है बल्कि उनकी और वृंदा ग्रोवर की तस्वीरें भी डाली गई हैं। यह शुद्ध रूप से धमकी है और विवेकहीन लोगों को इन्हें नुकसान पहुँचाने के लिए प्रेरित करना है। सोशल मीडिया पर की जाने वाली इस तरह की ट्रोलिंग की हम निंदा करते हैं और माँग करते हैं कि पुलिस इसे साइबर अपराध के तहत दर्ज कर अपराधियों को पकड़े और ऐसे नफ़रत फैलाने वाले अपराधियों को कड़ी सज़ा दी जाए ताकि दाभोलकर, पानसरे, कलबुर्गी और गौरी लंकेश जैसी वारदात की पुनरावृत्ति न हो। हम ये भी माँग करते हैं कि उक्त चारों हत्याओं के ज़िम्मेदार अपराधियों को पकड़ने में बरती जा रही ढिलाई बंद की जाए और शीघ्रता से अपराधियों को पकड़ा जाए।
7. आसन्न फ़ासीवाद से निपटने के लिए समस्त लेखक, लेखक संगठन और अन्य जनपक्षीय व प्रगतिशील सांस्कृतिक संगठन सघन विचार-विमर्श से साझा रणनीति तैयार करें और जनता के बीच में इंसानियत, मोहब्बत, इंसाफ़ के जीवन मूल्यों को प्रतिष्ठित करने हेतु नये सांस्कृतिक आंदोलन का आगाज़ किया जाए।
8. वेनुजुएला, उत्तर कोरिया सहित समस्त राष्ट्रों की सम्प्रभुता का सम्मान किया जाए। अमेरिकी साम्राज्यवाद लगातार इन देशों के भीतर अस्थिरता पैदा करने और युद्ध भड़काने की कोशिशों में लगा हुआ है। हम इस सम्मेलन के माध्यम से इन राष्ट्रों के साथ एकजुटता प्रदर्शित करते हुए वैश्विक समुदाय से आह्वान करते हैं कि इन देशों को अस्थिर करने के लिए किए जा रहे अमेरिकी प्रयासों को बंद करने के लिए अमेरिका पर दबाव बनाएँ। 
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