गठरी...

३१ जुलाई (1) अभिव्यक्ति की आज़ादी (2) अरुंधती रॉय (1) अरुण कुमार असफल (1) आदिवासी (1) आदिवासी संघर्ष (1) आधुनिक कविता (3) आलोचना (1) इंदौर (1) इंदौर प्रलेसं (7) इप्टा (2) इप्टा - इंदौर (1) कविता (40) कश्मीर (1) कहानी (7) कामरेड पानसरे (1) किताब (1) किसान (1) कॉम. विनीत तिवारी (4) क्यूबा (1) क्रांति (2) गज़ल (5) गुंजेश (1) गुंजेश कुमार मिश्रा (1) गौहर रज़ा (1) घाटशिला (2) जमशेदपुर (1) जल-जंगल-जमीन की लड़ाई (1) ज्योति मल्लिक (1) डॉ. कमला प्रसाद (3) तहरीर चौक (1) ताजी कहानी (4) दलित (2) धूमिल (1) नज़्म (8) नागार्जुन (1) नागार्जुन शताब्दी वर्ष (1) नारी (3) निर्मला पुतुल (1) नूर जहीर (1) परिकथा (1) पहल (1) पहला कविता समय सम्मान (1) पूंजीवाद (1) पेरिस कम्यून (1) प्रकृति (3) प्रगतिशील मूल्य (2) प्रगतिशील लेखक संघ (4) प्रगतिशील साहित्य (3) प्रलेस (1) प्रलेस घाटशिला इकाई (1) प्रलेसं (12) प्रलेसं-घाटशिला (2) प्रेम (17) प्रेमचंद (1) प्रेमचन्द जयंती (1) प्रोफ. चमनलाल (1) फिदेल कास्त्रो (1) फैज़ अहमद फैज़ (2) बंगला (1) बंगाली साहित्यकार (1) बेटी (1) बोल्शेविक क्रांति (1) भगत सिंह (1) भारत (1) भारतीय नारी संघर्ष (1) भाषा (3) भीष्म साहनी (2) मई दिवस (1) महादेव खेतान (1) महिला दिवस (1) महेश कटारे (1) मार्क्सवाद (1) मिथिलेश प्रियदर्शी (1) मिस्र (1) मुक्तिबोध (1) मुक्तिबोध जन्मशती (1) युवा (17) युवा और राजनीति (1) रचना (6) रूसी क्रांति (1) रोहित वेमुला (1) लघु कथा (1) लेख (3) लैटिन अमेरिका (1) वर्षा (1) वसंत (1) वामपंथी आंदोलन (1) वामपंथी विचारधारा (1) विद्रोह (16) विनीत तिवारी (1) विभूति भूषण बंदोपाध्याय (1) व्यंग्य (1) शमशेर बहादुर सिंह (3) शेखर (11) शेखर मल्लिक (2) समकालीन तीसरी दुनिया (1) समयांतर पत्रिका (1) समसामयिक (8) समाजवाद (2) सांप्रदायिकता (1) साम्प्रदायिकता (1) सावन (1) साहित्य (6) साहित्यिक वृतचित्र (1) स्त्री (18) स्त्री विमर्श (1) हरिशंकर परसाई (2) हिंदी (42) हिंदी कविता (41) हिंदी साहित्य (78) हिंदी साहित्य में स्त्री-पुरुष (3) ह्यूगो (1)

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

वसंत में तुम

इतनी गहरी छाई है उदासी दुपहरी की पीली-पीली धूप सी और नीम के पेड़ तले नीम-नीम तन्द्रा में तुम्हारी स्मृतियों से हूँ गलबहियाँ डाले साथी मेरे सांसों की देखो तो क्या वसंत का कहीं बौर टपका है ? या अमिया की डाली पर अटका है... मदमस्त-अल्हड़ नवयौवना सी चपल और श्वाशों की भरी ऊष्मा सी नर्म और प्रखरता में भी कोमल चलती है हवा मंद और डोलता है कहीं तेरा आँचल जैसे उच्चपथ के किनारे किसी गाँव के एकमात्र तालाब का लहराता है जल हर दिशा अलसाई सी मगर नशे में भीगकर कसमसाई सी आओ मेरे प्राणों की साथी, कोयल की तप्त पुकार पर बन्ध कर चली आओ फुहार बनकर... छंट जाए सब उदासी तन-मन में जागे हंसी जाता नहीं सहा कब तक गाऊं गीत विरहा तन्हा सदा तो ये मेरा एकांकी जीवन रहा दीन और श्री हीन हुआ मैं तो जैसे समिधा बन विलीन हुआ आओ साथी खिलखिलाकर, मुझे चूम लज्जाकर प्रेम की मीठी आंच में तपाकर समाओ तुम मेरे अंकों में साँसों की तान पर तनकर... कर दो इस बार मेरा वसंत सार्थक करते रहें भर उमरिया स्नेह परस्पर अथक-अथक-अथक... काल के पार तक

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...