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बुधवार, 2 मार्च 2011

जंग खत्म नहीं होता है साथी !


हमेशा होना तो यही होता है
ऐसा ही होता है
कि सभ्यता के दूसरे छोर पर जहाँ
एक सुदीर्घ सन्नाटे
की गवाही में तेरे-मेरे कांपते-लरजते
होंठों की धीमी सरगोशियों का ख़्वाब-गुलाब
खिलने को होता है कि
बारहा दीवारों से फोड कर निकल आती हैं
उनकी दुनियावी कड़ी हथेलियाँ
जिससे मसलकर उन गुलाबों को
घोंट दिया जाता है...

नृशंस परछाइयों का एक सर्वकालिक समूह
हमें बागी घोषित करता है और खुद को
अपनी लकीर का सबसे बड़ा सरंक्षक !
घेरेबंदी के बीच
मुस्कुराकर, सर उठाकर, सीना ताने
वध होती हुई हमारी आत्माएँ
पुकार सकती हैं सिर्फ़
एक आखरी बार
एक-दूसरे का नाम...
फिर हमारी सांसों को थामें रखने वाली तख्ती
पैरों के तले से खिसका दी जाती हैं...
एक कुएँ में झूलते हुए हम दम तोड़ते हैं, आहिस्ता-अहिस्ता...

और तस्वीर के दूसरे पहलू में,
हमारे सपने, हमारी ताकत, हमारा विरोध
बचा रहता है, सूरज की रौशनी में, चाँदनी में,
हवा में, पानी में... पत्थर में, दूब में...!
  
उफ़, कि यही एक तथ्य है जो
है वहीँ जहाँ, तब भी था, जब से
एक आदमी और एक औरत
एक दूसरे का हाथ ईमानदारी से पकड़ कर आगे आये !
उनके साझे क़दमों की हुलस से जमीन पर
फूल खिल आये...
वे शामिल हुए एक-दूसरे की देह-ओ-रूह में,
और पूरी दुनिया का एक बड़ा हिस्सा उनके दायरे से
बाहर हो गया !
तब उनके हथियारों की नोंक और तेज की जाने लगी
मुट्ठियों में पत्थर आ गये...

मगर विश्वास करो साथी
यह यूँ ही तुम्हें दर्द में बहलाने के लिए
नहीं कह रहा... कि
यह सब जो होता है, उसके बरक्स यह भी होता है कि,
हर बार उनकी साजिशें नाकाम की हैं हमने
हर बार घूरे पर गुलाब खिलाया है
यह यूँ ही नहीं हुआ कि लाल रंग-
उस गुलाब का-
ऐसा गहरा हुआ है !
जिसके मायने कई है !
हर बार मृत्यु को हताश किया है हमने
हर बार हम पलटे हैं,
आखिरी बार चूक जाने से ऐन पहले !
हर बार उन्होंने हद बनाये हैं, और हमने हद तोड़े हैं !

यह सच है कि जिंदगी की बुनियाद
जंग और मुहब्बत के गारे में सान कर रखी जाती है
यह तो होता है कि जंग में हम झोंक दिए जाते हैं
पर यह भी उस कदर सच है कि
जब तक खून का ईमान बाकि है
जंग खत्म नहीं होता है साथी !

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