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सोमवार, 3 अक्तूबर 2011

चीखो

एक ऐसे सपाट दुनिया के,
जिसे भूगोल की किताबों में अंडाकार बताया गया है...
तुम और मैं जैसे लोग हाशिए के भी बाहर कहीं गैर परिभाषित जगह पर हैं...
हममें अभी खिलाफत में चीखने की कूवत बाकि है...
सारे फैसले बेशर्मी की आला मिसाल हैं और
पानी के अनुपात की तर्ज पर जहाँ का एक तिहाई हिस्सा
नृशंशता की हद तक गैर-बराबरी का है,
यह उतना ही क्रूर और ठंडा है, जितना कसाई के छुरे का वार...
इसको समझना मुश्किल नहीं है...

चूँकि बताया जा रहा है कि प्रतिदिन ३२ रूपये खर्चने वाला
एक आर्थिक हैसियत या पैमाना बताने वाली उस अदृश्य रेखा के ऊपर है ! और...
इसलिए यह एक बेशर्म मजाक है ! इस पर हँसना कुछ इस तरह का आत्मपीडक काम है जैसे,
पुराने घाव के भीतर सलाखें भोंकना...
लगातार...
कुछ अनचीन्हे मुखौटों के पीछे छुपी हुई आवाजें
हौलनाक लतीफें सुनाती हैं कि
अमुक तारीख को
तुम्हारा वजूद बदल कर रख दिया जायेगा...
और तुम उस तारिख के तुरंत बाद खुद को पहचानने से इंकार कर दोगे...! 
पूछोगे किससे, क्या यह सच है ?

इस दुनिया के हाशिए से बाहर होने के बावजूद...
वे हमें डराने के लिए मजबूर हैं, कि उन्हें भी हमसे उतना ही डर है !
इसलिये यहाँ हत्यारों के चेहरे की मासूमियत तुम्हें दंग कर सकती है !
और यही बात उनके फायदे की है...!

 "इंसानियत", "इन्साफ" "ईमानदारी", "इंकार: और "इन्किलाब" जैसे
शब्दों में जरूर कोई बहनापा है,
इसलिए ये इनके शब्दकोष से सिरे से अपने अभिधेयार्थ सहित गायब हैं !!!

चीखो-चीखो-चीखो...!
क्योंकि २३ मार्च को फाँसी पर चढ़ने वाले उस तेईस साल के जाट नौजवान ने
कहा था, "ऊँचा सुनने वालों को धमाकों की जरूरत होती है !"

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