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गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

सत्ताओं का अंत होता है, विचारधारा का नहीं

भोपाल। आज के दौर में विचारधारा के सवाल ज्यादा जटिल हो गये हैं। विचारधारा लेखक की प्रापर्टी है, रचना की नहीं। रचनात्मक व्यवहार में विचारधारा विन्यस्त रहती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्ताओं का अंत होता है, विचारधारा का नहीं। यह बात वरिष्ठ कवि आलोचक राजेश जोशी ने रविवार को एनटीटीटीआरआरई के मणि स्मृति सभागार में प्रो. कमलाप्रसाद की याद में आयोजित कार्यक्रम के पहले सत्र ''आलोचना का लोकतंत्र" को संबोधित करते हुए कही।

प्रगतिशील वसुधा तथा प्रो. कमलाप्रसाद स्मृति सांस्कृतिक संस्थान, भोपाल द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम के पहले सत्र को संबोधित करते हुए वसुधा के संपादक स्वयंप्रकाश ने कहा कि प्रो. कमलाप्रसाद की संगठनात्मक और आलोचकीय प्रतिबद्धताओं का नये सिरे से मूल्यांकन किये जाने की बहुत जरूरत है। साथ ही साहित्य व आलोचना के अंतर्संबंधों को नई स्थितियों के साथ सोचना होगा।

आलोचक वीरेंद्र यादव ने कहा कि कोई भी साहित्यिक रचना महज रचनात्मक निर्माण नहीं होती, बल्कि सामाजिक व वैचारिक निर्माण भी होती है। आज जरूरत है कि आलोचना व रचना के बीच उपस्थित स्पेस को पाटा जाये। युवा आलोचक वेदप्रकाश ने कहा कि सत्ताओं के लोकतंत्र के इतर साहित्य का लोकतंत्र ही ऐसा है, जो प्रत्येक व्यक्ति के दुख के साथ खड़ा होता है और शिदृदत से अपने भीतर समाहित करता है। उन्होंने कहा कि प्रो. कमलाप्रसाद निजता के विरोधी नहीं थे, बल्कि इस बात पर जोर देते थे कि आधुनिकता की मूल अवधारणा शोषितों को मुक्ति दिलाने की है। मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव विनीत तिवारी ने कहा कि कमलाप्रसाद जी अपनी जिद व अनुभवों के साथ अगली पीढ़ी से आत्मीय रिश्ते रखते थे। साथ ही इस बात पर चिंता प्रकट करते थे कि मौजूदा लोकतांत्रिक अवकाश का उपयोग किस तरह किया जाये। ईश्वर सिंह दोस्त ने भी सत्र को संबोधित किया। इस अवसर पर प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से प्रकाशित अशोक भौमिक की चित्तोप्रसाद के चित्रों पर एकाग्र किताब ''ताकत आधी दुनिया की के साथ ''आधुनिक हिंदी का उदय और कविता, ''व्यंग्य की व्याप्ति, ''गहराई और ''वसुधा के ताजा अंक का लोकार्पण भी हुआ। सत्र का संचालन आशीष त्रिपाठी ने किया। स्वागत उदबोधन वसुधा के संपादक राजेंद्र शर्मा ने दिया।

कार्यक्रम के अंतिम चरण में ''रचना और आलोचना के संबंध विषय पर वरिष्ठ आलोचक कवि विजय कुमार ने कहा कि दुर्भाग्यश आलोचना कर्मकांड बन चुकी है। आलोचना एक संस्थान बन चुकी है। इसलिए आलोचना की विश्वसनीयता कटघरे में खड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि लेखन में क्षणिक सनसनी और वाहवाही के बजाय गंभीर विमर्श और विचार की दरकार होनी चाहिए। इस सत्र को नरेश सक्सेना, विजय बहादुर सिंह, सेवाराम त्रिपाठी तथा शशांक ने भी संबोधित किया। संचालन ओम भारती ने किया।


                                                                      (कॉम. विनीत तिवारी के फेसबुक पोस्ट से साभार) 

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

एक क्रांतिकारी का खत, दुसरे क्रांतिकारी के नाम

प्रिय ह्यूगो ,

मैं बहुत संतुष्ट हूँ कि आप अमेरिकी भूमि के उस खण्ड पर, जिसे आपने इतना प्यार किया, और आपको चाहने, समर्थन करने वाले उन भाइयों के बीच वापसी करने में सक्षम हुए हैं.

एक लंबी और सतत् प्रतीक्षा, साथ ही शारीरिक प्रतिरोध के लिये आश्चर्यजनक क्षमता और डाक्टरों की एक टीम का पूर्ण समर्पण, जैसा कि इस मामले में पिछले 10 वर्षों में रहा है, इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए आवश्यक थे.

यह पूरी तरह अनुचित होगा यदि आपके निकटतम परिवार के सदस्यों के दुर्गम समर्पण, क्रांतिकारी नेतृत्व में आपके सहयोगियों, बोलिवेरियन सशस्त्र बलों, जो आपके द्वारा फिर से सशस्त्र और सुसज्जित हुए, और दुनिया के ईमानदार लोग जिन्होंने अपना समर्थन दिखाया, का उल्लेख नहीं किया जाय.

वह जीवन जो वेनेजुएलाई लोगों ने आपको दिया, भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जिन्होंने अपने उत्साही और न झुकने वाले समर्थन एवं अपने दैनिक प्रदर्शनों के साथ आपको सलाम किया है. यही वह चीज है,  जिसके लिये आपकी शुभ वेनेजुएला वापसी  कर्जदार है.

ह्यूगो, आपने दुख और बलिदान के उन कठिन दिनों में जीवन के बारे में बहुत कुछ सीखा है. अब, हमें यद्यपि एक दैनिक आधार पर आप की खबर प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होगा, हम पुन: पत्राचार की विधि, जो हम कई वर्षों से इस्तेमाल करते रहे हैं, का उपयोग करेंगे.

हम हमेशा सचेतत: और विनम्रतापूर्वक मनुष्यों हेतु न्याय के वास्ते, बगैर साल, महीने, दिन या घंटे जो हमारे पास हमारी मानवता के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण युग में जीने के लिए बचे हैं, के डर के बिना लड़ेंगे.

हमारे लोगों को, जो आपके भी हैं, इस संदेश के माध्यम से वेनेजुएला के लिए आपकी वापसी का पता कल चल जाएगा. सब कुछ अधिक विवेक के साथ किया जाना था, ताकि फासीवादी समूहों को बोलिबेरियन क्रांतिकारी प्रक्रिया के खिलाफ उनकी निंदक कार्रवाई की कोई भी योजना बनाने का मौका न मिल सके.

जब समाजवादी शिविर ध्वस्त हो गया और सोवियत संघ विघटित हुआ और साम्राज्यवाद ने अपनी तेज चाकू के साथ क्यूबाई क्रांति को रक्त में डूबाने की कोशिश की, विभाजित अमेरिका में एक अपेक्षाकृत छोटा देश - वेनेजुएला, इसे (इस छूरे को) भोंथरा करने में सक्षम हुआ. समय की मजबूरी के कारण, मैंने एंटीलिज, मध्य और दक्षिण अमेरिका के कई देशों का उल्लेख नहीं किया है जिन्हें वेनेजुएला, अपनी महान आर्थिक और सामाजिक कार्यक्रमों के शीर्ष पर मदद की है. यही कारण है कि दुनिया के सभी ईमानदार लोगों की "चावेज़ के स्वास्थ्य और उनकी खबर" पर सूक्ष्मतापूर्वक नज़र रही है.

सदैव, जब तक विजय ना हो !

एक प्रगाढ़ आलिंगन !

फिदेल कास्त्रो रुज

संध्या ८.३५ बजे
१७ फ़रवरी, २०१३

(चित्र और मूल पाठ (अंग्रेजी में रेचल बूथरोय्ड का अनुवाद) के लिये कॉम. विनीत तिवारी के फेसबुक पोस्ट से साभार)
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