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सोमवार, 31 जुलाई 2017

शेखर मल्लिक के उपन्यास “कालचिती” का लोकार्पण: रिपोर्ट



शेखर मल्लिक के उपन्यास “कालचिती” का लोकार्पण
रिपोर्ट


18 जुलाई, 2017. बहरागोड़ा महाविद्यालय, पूर्वी सिंहभूम झारखण्ड में शेखर मल्लिक के आर्य प्रकाशन मंडल (किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली) से सद्य: प्रकाशित उपन्यास “कालचिती” का लोकार्पण समारोह आयोजित किया गया. कार्यक्रम की शुरुआत ‘साथी’ नाट्य दल, घाटशिला द्वारा जनगीत ‘गाँव छाडिबा नाहीं’ से हुयी. जिसे ज्योति, मनीषा, अनीषा, नीलिमा, खुशी और वृष्टि ने स्वर दिया. इसके बाद सभी अतिथियों का पौधा देकर सम्मान किया गया.   
बहरागोड़ा महाविद्यालय के प्र. प्राचार्य और उड़िया के ख्यात कथाकार सत्यप्रिय महालिक ने स्वागत उद्बोधन में लेखक को शुभकामनायें दीं.
राँची से आये आदिवासी साहित्यकार महादेव टोप्पो ने बहरागोड़ा जैसे कम परिचित क्षेत्र को साहित्य के नक्शे पर लाने के लिए शेखर मल्लिक को धन्यवाद दिया. उन्होंने उपन्यास में कुछ सीमाओं की ओर संकेत किया.
प्रो. नरेश कुमार ने उपन्यास के कथ्य की मीमांसा की. उन्होंने कहा कि इसमें घाटशिला का परिवेश है. इसमें गाँव की कथा है. ग्राम्य जीवन है. कोई  चीज है जो इसे बार बार, अक्सर छूती है और शेखर मल्लिक उसे अनछुआ नहीं रहने देते. इसलिए इतनी इंटेंसिटी के साथ वे सारी बातें दिखती हैं, जब आप इसे पढ़ रहे होते हैं. ये उपन्यास हमारे पास एक सवाल छोड़ता है, जो पूर्व से ही है कि क्या परम्परा और विकास एक साथ चल सकते हैं ? दोनों की गति समानांतर चल सकती है ? क्योंकि ये दोनों विरोधी हैं. जो सरकार द्वारा किया जाने वाला विकास है, वह आदिवासियों के लिए विनाश है. इस विकाश और विनाश के विरोधाभास को भी इस उपन्यास में देखा गया है. उपन्यास के ज्यादातर पात्र तो सामान्य ढंग के है लेकिन कम से कम दो पात्र ऐसे हैं जो गूढ़ हैं. जमुना सबसे महत्वपूर्ण पात्र है. लेखक का यह मार्क्सवादी दृष्टि से गाँव को खासकर आदिवासियों के  संघर्ष को देखने की कोशिश है. उपन्यास में नारी पात्र काफी सशक्त हैं.
वर्धा से आये युवा कहानीकार राकेश मिश्र ने कहा कि, इस उपन्यास में जिस तरह की समस्याएं उठायीं गई हैं, वह बिलकुल मौजूं हैं और उन पर बात होनी चाहिए. हम सभी मानते हैं कि आदिवासी ही हमारा पहला मनुष्य है, मूल वासी है लेकिन हमने उसे हाशिए पर धकेल दिया है ! हथियार उठा  लेना उनके लिए आत्मघात के आलावा कुछ नहीं है. कॉम. वास्ता सोरेन के हवाले से उन्होंने कहा कि यह जानते हुए भी कि सामने शत्रु के पास आधुनिकतम हथियार और संसाधन हैं, वे लड़ाई में कूदे. वे जानते थे कि मरेंगे, लेकिन वे फिर भी लड़े. वे मानते थे आदिवासी संघर्ष को ऐतिहासिक व्याख्याओं से नहीं, बल्कि उनके मनोविज्ञान को समझना होगा. वे लड़ाईयां एक प्रतीक थीं. जब ज़ुल्म हद से बढ़ जायेगा तो उसमें लड़ने और लड़कर मर जाने में कोई अंतर नहीं है. वे लड़ाईयां इसलिए शुरू हुई थीं कि वे मारे जाएँ, वे मारे गए. कोई भी आदिवासी विद्रोह इतिहास में ज्यादा दिन तक टिक नहीं पाया. क्योंकि उनके पास संसाधन नहीं थे, लड़ने के तरीके आदि नहीं होते थे. लेकिन जब जब भी आदिवासियों ने हथियार उठाया है, उसकी गूँज लंबे समय तक बाकि रही है.  इतिहास में बिरसा मुण्डा, तिलका मांझी की लड़ाईयों को आज भी हम अगर याद करते हैं तो इसलिए नहीं कि उन्होंने अंग्रेजों को धूल चटा दी थी, बल्कि इसलिए कि उन्होंने बताया था कि जीवन जीने का तरीका क्या है? जीने के लिए लड़ना होगा. हथियार उठाना होगा. जब एक लेखक अपने समाज में इस तरह की स्थितियों को देखता है, और महसूस करता है कि समाज में ज़ुल्म हद से आगे बढ़ता चला जा रहा है, तो जो इन्तिहाँ होती चली जाती है. इस उपन्यास में देखेंगे तो एक सामान्य से गाँव में सामान्य सा एक मास्टर है आभीर. एक सामान्य सा जीवन जीता प्रवीन, उसकी पत्नी बाहामुनी, जमुना और उसका पूरा परिवेश, किस तरह सादगी भरा परिवेश है. लेकिन क्या कारण है कि लोग उसकी सहजता और सरलता को उसके साथ नहीं रहने देना चाहते हैं ? अपनी जमीन बचाने के लिए प्रवीन जो करना चाहता है उसके बदले जो कहर, जो उपन्यास में एक पूरा अध्याय है, में कहर की ऐसी इन्तिहाँ है ! मुझे कभी कभी लगता है कि क्या एक लेखक को इस तरह टॉर्चर की उस पूरी प्रक्रिया को जिसे पढते हुए पाठक भी दोबारा वहीँ, वैसी प्रक्रिया में पहुँच जाता है हू-ब्-हू लिखना चाहिए या किसी और तरीके से कहना चाहिए? लेकिन जो उस पृष्ठभूमि से नहीं हैं, उनको ये समझाने के लिए कि ये टॉर्चर कितना बड़ा होता है, यह (बताना/लिखना) कभी कभी जरुरी भी हो जाता है. एक वाक्य में नहीं बताया जा सकता कि सरकार आदिवासियों के साथ बहुत हिंसा कर रही है. सरकार बहुत ज्यादा ज़ुल्म कर रही है. वो ज़ुल्म किस तरीके से कर रही है? और क्यों कर रही है ? विकास के नाम पर ? उसी की जमीन और उसकी सहजता को छिनने के लिए लोग इसमें विकास का नाम दे रहे हैं. मतलब उसी के विकास के लिए उसी को मार डालो ! उनकी सहजता को छीन कर लोग कह रहे कि हम तुमको विकसित कर रहे ! इस पूरे उपन्यास में जिस तरीके से शेखर ने पूरे तंत्र को बेनकाब करने की कोशिश की है, वह प्रशासन की बेइंतेहाई नहीं है, या प्रशासन का वर्णन नहीं है. प्रसाशन में जो लोग शामिल है, उनके मन में सदियों से चला आ रहा है, कि मारो.
आदिवासियों को सांस्कृतिक विमर्श पर देखने की जरूरत है.  यह अचानक नहीं है कि प्रशासन आदिवासियों के प्रति इतना हिंसक हो उठा है, एक लम्बे समय से चला आ रहा सांस्कृतिक विमर्श है उसके भीतर. जंगल को जंगल कहने के पीछे कितनी बड़ी राजनीति है, यह भी हमें सझना होगा. कि जंगल को हमेशा हमने सभ्यता का विकल्प, विलोम मानकर इसके साथ बर्ताव करना शुरू किया. जैसा कि हम कहते हैं, ‘जंगल का कानून’, ‘जंगली’, ‘बर्बर’... तो उसको हम सभ्य के बराबर खड़े कर देते हैं. और इस तरीके से जो पोलिटीसिज्म भरा जाता है, कि जो जंगली है, वह असभ्य है, बर्बर है. जबकि जंगल उसका घर है. जंगली होना उसकी पहचान है. वह जंगल का वाशिंदा है. लेकिन उस शब्द के मार्फ़त उसे, जिस तरह से ‘जंगली’ को रिड्यूस किया है, उसके जंगल के प्रति एक बर्बरता भरी है, वह स्वाभाविक है कि प्रशासन में इस तरह के लोग बैठे रहते हैं जो पूछते हैं कि ‘जंगल जाते हो ?’ वह कहता है ‘हाँ, जाता हूँ.’ उपन्यास में एक अच्छा प्रसंग है, और जैसे ही वह कहता है कि हाँ जाता हूँ. उसको लात घूंसों से मारा जाता है. कि साले किससे मिलने जाते, नक्सलियों को खाना पहुँचाने जाते हो? जबकि जंगल जाना उसके लिए वैसा ही सामान्य है जैसा हमसे कोई पूछे कि कॉलेज जाते हो या बाज़ार जाते हो ? आप कहेंगे कि हाँ जाता हूँ. लेकिन जैसे ही वह कहता है कि हाँ जंगल जाता हूँ, वो पूरी हिंसा, एक साभ्यातिक हिंसा जो वर्षों से उसके भीतर एकत्र हो जाती है, उपन्यास में बहुत गहरे तौर पर व्यक्त हुआ है. शेखर बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने इस उपन्यास के जरिये एक बहसतलब बात है आदिवासियों का मुद्दा. लेकिन लेखक ने जिस तरह से एक लोकेल बना कर के उस पूरे सांस्कृतिक विमर्श को पहचानने की कोशिश की है, यह गुस्सा सिर्फ़ उससे उसके संसाधन छीन लेने के, अड़ंगा डाल रहे हैं, के कारण नहीं, बल्कि वह जंगली है, वह असभ्य है, वह बर्बर है. और इस तरह से जो हमने एक डिस्कर्सिव लोशन पैदा किया है अपने भीतर, यह उसकी परिणति है.       
यह उपन्यास एक जरूरी किताब के तौर पर लिया जायेगा. और बहुत चर्चाएँ होनी चाहिए, होंगी भी. 
राँची विश्विद्यालय के हिंदी विभाग के डॉ. मिथिलेश कुमार सिंह के अनुसार सभ्यताओं का संघर्ष तो चल रहा है,  चाहे वह विकास के नाम पर हो. शेखर ने आदिवासी विषय पर यह उपन्यास लिखा है. कोई नई चीज नहीं की है, लेकिन पुराने को जिस नए अंदाज़ में रखा है, जिन नई साजिशों की तरफ इसमें संकेत है, अगर हम उनसे अनजान रहेंगे तो आने वाला भविष्य और अंधकारमय हो सकता है, ये नई बात है और ये जानने की बात है. कारण, कहा गया कि आदिवासी मिटते ही रहे हैं, हारते ही रहे हैं, लेकिन आदिवासी हारने के बावजूद लड़ते रहे हैं. ये सबसे बड़ी बात है. और ये लड़ना उनकी फिर से विवशता है. और ये भी देखिये कि भारतीय इतिहास को जब खड़ा करके देखिएगा, खासकर ब्रिटिशकालीन इतिहास को खड़ा करके देखिएगा, यही इलाका भी बंगाल की दीवानी के अंतर्गत आता था. अंग्रेजों के कब्जे में सबसे पहले यही इलाका आया था. और इसी इलाके में सबसे पहले विद्रोह भी उठा था. संथाल परगना में, राजमहल की पहाड़ियों में कड़िया गुदरा और उनके साथियों ने 1768 ई. में (1765 ई. में बंगाल की दीवानी में कब्ज़ा हुआ ईस्ट इण्डिया कम्पनी का और दो साल होते होते) अंग्रजों को विद्रोह का सामना करना पड़ा) और 1780 आते आते तो तिलका मांझी जैसा आदिविद्रोही पैदा हो गया. जिसने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए और भागलपुर के कमिश्नर को दिन दहाड़े मार दिया गया. तो व्यवस्था के प्रति विद्रोह का भाव आदिवासियों में हमेशा से रहा है और ये सिर्फ़ आज जो ज्ञात इतिहास है, उसी में नहीं, जो पौराणिक इतिहास है, उसको यदि देखें वहाँ भी हमको यही सारी चीजें मिलेगीं. चाहे वह सुर-असुर संग्राम के नाम पर हो या .... वह भी कहीं न कहीं आदिवासियों और जो बहिर्आगत आबादी है, उनके बीच का जो संघर्ष है, उसी संघर्ष का द्वन्द है और उस द्वन्द को चित्रित करने में हमारी पूर्व के साहित्यकारों ने कहीं न कहीं से डंडी मारी है.
यह नक्सलबाडी आन्दोलन का भी पचासवाँ साल है. आज सबसे आसान तरीका यह भी है कि किसी को भी नक्सल घोषित करके मारने का एक रास्ता, एक तर्क ढूँढ लिया जाता है.  और ये व्यवस्था के जो लोग है वो तर्क ही ढूँढ रहे हैं. क्योंकि अगर तर्क नहीं ढूँढ रहे होते तो संविधान की इतनी अवमानना नहीं हो रही होती. आज़ादी के सत्तर साल बाद भी संविधान की जितनी अवमानना अपने देश में की गई है, उतनी अवमानना दुनिया में किसी और देश में ढूँढना शायद नामुमकिन होगा. पूर्व की सरकार भी जब छतीसगढ़ में ऑपरेशन ग्रीन हंट चला रही थी, वेदांता से संबंधित था सब कुछ, और इधर सन दो हज़ार चौदह में जब सरकार बदली,  पर्यावरण के अंतर्गत एक समिति जो यह निर्णय देती है कि उद्योगपतियों को उद्योग लगाने के लिए, विकास करने के लिए एनओसी देती है कि यह पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल है, ये विकास की जो परियोजना है. उसमें इक्कीस में से अठारह सदस्य गैर सरकारी संगठनों/संस्थाओं के हुआ करते थे, अब उसका उल्टा कर दिया गया है ! कुछ परियोजनाओं को पहले रोका गया था कि पर्यावरण की दृष्टि से या जल जंगल जमीन की सुरक्षा की दृष्टि से अनुकूल नहीं हैं, यह हुआ था. आज की स्थिति देख लें कि जमुना के किनारे जो कार्यक्रम हुआ, पर्यावरण को दूषित करने के बाद ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ द्वारा दर्ज़ किए गए जुर्माने को ठेंगा दिखा दिया गया.
जो विकास की बात करते हैं. बिजली के लिए कोयला तो निकालना पड़ेगा. कोयला जरुर निकालिए, विकास कीजिये. लेकिन विकास किसकी शर्तों पर हो ? कुर्बानी दें तो आदिवासी और कमजोर जनता ही दे ? कल्पना कीजिये कोयला यदि लुटियन टीले की जमीन के नीचे से निकल जाय, कल्पना कीजिये राँची में राज भवन और मुख्यमंत्री आवास के नीचे कोयला निकल जाय, हीरा निकल जाय, रा  जभवन, आवास तोडा जाएगा कि लुटियन टीले को हटाईयेगा कि राष्ट्रपतिभवन को हटाईयेगा कि लोकसभा को हटाईयेगा कि राज्यभा को ? हटने के लिए कोई कालचिती का, कोई  बहरागोड़ा का, कोई चाकुलिया का आदिवासी ही क्यों चुना जायेगा ? संविधान कहता है कि पाँचवी और छठी अनुसूची में, जहाँ भी आप भूमि का अधिग्रण कीजियेगा, तो ग्राम सभा की सहमती से कीजियेगा.  ऐसा एक भी उदहारण नहीं है कि जहाँ ग्राम सभा की सहमति से एक भी जमीन ली गई हो. और लोगों ने शांतिपूर्वक विकास की परियोजनाओं का स्वागत किया हो.  
एक आदिवासी के लिए जितनी उसकी झोपड़ी उसकी अपनी होती है, वह सामने की जमीन जहाँ तक खाली दिखती है, वह भी उसकी आपनी होती है. जहाँ उसकी बकरी बंधी होती है, जहाँ उसके सूअर का आवास होता है, जहाँ उसकी गाय बंधी होती है, वह जमीन भी उसकी अपनी होती है. जल, जंगल और जमीन ये तीनों चीजें उसकी अस्मिता से जुडी हुई होती हैं. और जब उसकी अस्मिता पर प्रहार होता है, तो यदि वह आदिवासी नहीं खड़ा होगा तो कौन खड़ा होगा ? दूर से देखने वाले तो नहीं खड़े हो सकते हैं. लेकिन इस उपन्यास में ऐसे दो व्यक्ति आभीर और डॉ सिद्धार्थ आते हैं और उनके साथ लड़ाई में सहयोगी की भूमिका में हो जाते हैं. बल्कि कहें कि जमुना जैसे व्यक्ति की प्रेरणा से वो अग्रिम दस्ते की सदस्यता भी ग्रहण करते हैं. तो यहाँ से ये उपन्यास जो है, कई मायनों में ‘विकास बनाम विस्थापन’ इन चीजों को विमर्श में लाता है. और इस लिहाज़ से एक नयापन इस उपन्यास में अवश्य है. पाँच अध्यायों/खण्डों में यह उपन्यास पूरा होता है. और इसके शीर्षकों की सार्थकता भी है. उपसंहार और बाकि सारी चीजों में देख लें... कि ये अनैतिक समय में ये कैसा समय है तो कैसा... इस समय को हमें ध्यान देना पड़ेगा.  ‘इस अनैतिक समय में’ जहाँ हम सबकुछ गलत करते हुए भी खुद को सही ठहराते रहते हैं. और दूसरे को गलत ही बताते रहते हैं. ये दौर अभी चल रहा है और ऐसे दौर में यदि कहीं कोई सवाल आप उठाते हैं, तो उसके बाद आप नक्सली करार दिए जायेंगे, तब आप देशद्रोही करार दिए जायेंगे यह भी कहना मुश्किल है. ऐसे खतरे में आज नैतिकता के कोई मायने मतलब नहीं रह गए हैं, वैश्विक, व्यापारिक पूंजीवाद जो है, जिसने उपभोक्तावाद का जाल खड़ा किया है. उपभोक्तावाद के जाल में खाओ-पीओ और मस्त रहो का दर्शन है, वैसी दशा में एक आदिवासी का दर्द भी हमको यदि दिखाई भी पड़े, सुनाई भी पड़े तो कैसे सुनाई पड़े... हमारे चारों तरफ से मानसिक रूप से हमको अनुकूलित करने का जो औजार हर तरफ से जुटा दिया गया है, उस दशा में बहुत कुछ करना सम्भव नहीं है.
इस उपन्यास में बहुत सारी बातें आई हैं. लेकिन जो आभीर, जो स्वयं को लोकतंत्र प्रेमी भी कहता है, के द्वारा एक लम्बा सा पत्र लिखा गया है, लेकिन इस लोकतंत्र की विडम्बना देखिये कि चुनाव पैसे के बिना लड़ा और जीता नहीं जा सकता. वर्तमान में कितने धनाढ्य जन प्रतिनिधि हैं. एडीआर की साईट पर पता चलता है कि करोड़पति अरबपति सांसदों की संख्या कितनी है ! कितना गरीब का बेटा, कितने सही मायनों में संघर्ष करने वाला व्यक्ति लोकसभाओं और राज्यसभाओं की सदस्यता ग्रहण कर पा रहा है ! विधानसभाओं में जा पा रहा है. चुनाव दिनों दिन जितना महंगा होता गया है, वैसे समय में इस लोकतंत्र की सार्थकता जो है, वह कितनी रह जाती है आम आदमी के लिए. गरीब व्यक्ति के लिए जो एक समय खाता है और दूसरे  समय उसको सोचना पड़ता है. और ऐसे समय में भी आभीर यदि पत्र लिखते हुए किसी राष्ट्र के प्रधान को ये संबोधित करता है, कि आपको देखना है तो क्या देखना है ? यही कुछ सवाल हैं, जिन सवालों को लेखक छोड़ जाता है.
बाकी आध्यायाओं में देखें, सारी स्थितियाँ निराश करती हैं. और इस लिहाज़ से लेखक की शिकायत की जा सकती है कि आपने दृश्यों को काफी विडंबनापूर्ण बना दिया है. मार्क्सवादी लेखकों पर यह आरोप लगता है कि वे नारे लगवाते हुए झंडा थमा देते हैं और हिंसा की ओर प्रेरित कर देते हैं. शेखर हिंसा की ओर प्रेरित करते हुए कम नज़र आते हैं. और जो स्थितियों का विवरण दिया गया है, उसे पढते हुए माथे पर बल आ जाते हैं. और लगता है कि यदि ऐसी स्थिति आ गयी, तो बेहतर है चुपचाप मरने से, लड़कर मरना. तो लड़ना जो है, एक समाधान है. उस समाधान की ओर शेखर कहीं कहीं से एक संकेत देते हैं. और अंत में जो एक गीत पेश किया है, जिसमें उलगुलान की कामना जो शेखर मल्लिक ने व्यक्त की है, उसके लिए वे बधाई के पात्र हैं.
शेखर मल्लिक ने रचना प्रक्रिया बात करते हुए कहा, कि इसे पहले एक कहानी के रूप में ‘बिद्रोहबीज’ नाम से लिखा था, पर बाद में ‘दूसरी परम्परा’ पत्रिका के लिए उपन्यास के रूप में विस्तार किया. जो अंतत: किताबघर से छपा. लोकार्पण इस तरह आम जन के बीच करना सन्तोषदायक है. उपन्यास लिखते हुए जब शोध कर रहा था तो अत्यंत तकलीफ़देह यथार्थ से परिचय हुआ. इस विषय पर लिखा नहीं जा रहा इसलिए लिखा. फिर आलोचकों के यह शिकायत कि आदिवासी विषयक कथा रचनाओं में स्त्री नायक नहीं है, इसमें मैंने स्त्री को नायक बनाया. यह कथा मात्र इसी लोकेल की नहीं, जो उपन्यास में व्यक्त हुई है, वृहद स्तर पर देशीय, वैश्विक है.  
कार्यक्रम में स्थानीय कई साहित्यप्रेमी और हिंदी, बंगला, आदिवासी तथा उड़िया के कवि, साहित्यकार मौजूद रहे. जिसमें साहित्य अकादमी सलाहकार समिति के सदस्य श्री शोभा राम बेसरा प्रमुख थे. कार्यक्रम को उन्होंने भी संबोधित किया और कहा कि आप हमें हमारी व्यथा सुना रहे हैं, लेकिन हम ही सोये हुए हैं. उनके वक्तव्य में आदिवासी समुदाय की उपेक्षा की पीड़ा दिखाई दी. कार्यक्रम में आयरन लेडी/लेडी टार्जन के रूप में ख्यात महिला पर्यावरण सरंक्षिका जमुना टुडू भी मौजूद रहीं. किताब के प्रति गहरी उत्सुकता देखी गई. विनी षडंगी, प्रो. भुवनेश्वरी षडंगी,डॉ. पद्मनाभ बेरा, डॉ. बालकृष्ण, प्रो. धनंजय सिंह, डॉ. सरोज, प्रो. मुश्ताक अहमद, प्रो. संदीप चन्द्रा, डॉ. तपन मंडल, श्री अजित पात्र, प्रो. मंजीतधवरिया, लतिका पात्र, संगीता मानकी, भवानी सिन्हा, स्नेहज मल्लिक आदि भी मौजूद रहे.
‘पथ’, जमशेदपुर के नाट्य दल ने शेखर मल्लिक की कहानी ‘डायनमारी’ का मो. निजाम के निर्देशन में नाट्य रूपांतरण प्रस्तुत कर उपस्थित लोगों को सम्मोहित कर दिया. नाट्य दल में शामिल थे - गीता, प्रियंका, सौरव पात्र, रूपेश, ललित साव, खुर्शीद आलम, राजेश दास और आमिर अरशद. कहानी में व्यक्त आदिवासी स्त्री की पीड़ा और पुरुष शासित समाज की दबंगई को इन कलाकारों ने काफी प्रभावशाली और मर्मिक ढंग से पेश किया.  इस मौके पर कथाकार शेखर मल्लिक को शोभाराम बेसरा और जमुना टुडू के हाथों शाल ओढाकर समानित भी किया गया.
कार्यक्रम का संचालन बहरागोड़ा महाविद्यालय के प्रो. इंदल पासवान ने किया और धन्यवाद ज्ञापन ज्योति मल्लिक ने दिया.


रिपोर्ट : ज्योति मल्लिक
मोबाइल: 07352022925
ईमेल: jyoti.mallik.18@gmail.com

बुधवार, 10 मई 2017

मई दिवस 2017 को साथी ग्रुप की प्रस्तुति "गाँव छोडब नाहीं"

मई दिवस 2017 को हमारे "साथी" समूह ने बासुकी मंच, मजदूर यूनियन कार्यलय, मऊभंडार में "गाँव छोडब नाहीं" की प्रस्तुति दी.
इस नृत्य को ज्योति मल्लिक और अद्रिजा रॉय ने निर्देशित किया था. ग्रुप की मनीषा, अनीषा, खुशी, नीलिमा, विभूति, मुस्कान, शीतल, वृष्टि, ज्योति और शेखर मल्लिक ने इसे मंच पर पेश किया.
यू ट्यूब पर यह संकलित है -

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