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रविवार, 28 जून 2015

प्रलेसं घाटशिला की बैठक : रिपोर्ट

घाटशिला, 28 जून 2015 (रविवार). आज प्रगतिशील लेखक संघ की घाटशिला इकाई की एक बैठक युवा कथाकार शेखर मल्लिक के घर पर आयोजित हुई. बैठक में स्थानीय दोनों महाविद्यालयों की छात्राओं ने शिरकत की. सभी बच्चियों के लिये प्रलेसं से जुड़ने का यह पहला मौका था. इसलिए काफी अनौपचारिक ढंग से बातचीत हुई. प्रलेसं के इतिहास और विरासत की संक्षिप्त जानकारी देने के बाद कथाकार शेखर ने कॉम. विनीत तिवारी (सचिव, म०प्र० प्रलेसं) की "हंस" पत्रिका में अगस्त, 2006 में छपी एक कविता 'जब हम चिड़िया की बात करते हैं' का पाठ किया और इस पर चर्चा हुई. ज्योति मल्लिक ने कहा कि कविता में चिड़िया स्त्री का प्रतीक है. और इसमें स्त्री का संघर्ष व्यक्त हुआ है. सभी बच्चियों ने भी कविता में चिड़िया को स्त्री के प्रतीक के रूप में माना. शेखर मल्लिक ने कविता पर बोलते हुए कहा कि यहाँ हम स्त्री या आम, निरीह व्यक्ति को प्रतीक के रूप में ले सकते हैं. और कविता उसके हौसले और संघर्ष को कहती है. पर्यावरण के क्षय की चिंता भी इस कविता में ज़ाहिर है. शेखर ने कहा कि रचना को विश्लेषित करने की क्षमता अर्जित करने की जरूत है. और नए लोगों को यह करना होगा. कविता को अभिधा में नहीं लिया जा सकता. और इसलिए यह एक बड़ी कविता है. इसके बाद घाटशिला महाविद्यालय में एम.ए.-हिंदी की प्रथम वर्ष की छात्रा सुश्री राधा शाह ने अपनी स्त्री विषयक कविता सुनाई. और फिर सभी ने इस पर अपनी राय रखी. शेखर मल्लिक ने कविता की वर्तनी में त्रुटियों के अलावा कविता में स्त्री के याचना-स्वर को रेखांकित करते हुए कहा कि  स्त्री को याचक की तरह नहीं, बल्कि अपना सम्मान अधिकार भावना से लेना होगा.
युवा महिला साथियों के बीच प्रगतिशील चेतना को बढ़ावा देने और विस्तार करने के लिये स्त्री, समाज, प्रगतिशील मूल्यों और व्यवहारों आदि पर पुरी गोष्ठी केंद्रित रही.
बैठक में आगामी 31 जुलाई को प्रेमचंद जयंती मनाने के लिये योजनाओं पर भी बात हुई. सभी साथी उत्साहित थे और प्रेमचंद जयंती के मौके पर विभिन्न कार्यक्रमों - कहानी पाठ, (नुक्कड़) नाटक, वक्तव्य  के आयोजन और व्यवस्था पर चर्चा की गई. कार्यक्रम वर्कर्स यूनियन के दफ्तर में आयोजित करने की कोशिश रहेगी.
बैठक में राधा शाह, रुपाली शाह, लतिका पात्र, अमृता सिंह, ज्योति मल्लिक ( और नन्हें स्नेहज मल्लिक भी) मौजूद रहे. अगली बैठक की तारीख की घोषणा के साथ बैठक समाप्त की गई.

रिपोर्ट : शेखर मल्लिक
संयोजक - प्रलेसं, घाटशिला.

रविवार, 22 फ़रवरी 2015

प्रगतिशील विचार और सहिष्णुता पर हमला

साथी नरेंद्र दाभोलकर के बाद, कामरेड पानसरे जी की हत्या

प्रगतिशील विचार और सहिष्णुता पर हमला

समाज सावधान रहे और चुप ना बैठे, नहीं तो जारी रहेगा सिलसिला

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महाराष्ट्र सचिव, कॉ गोविंद पानसरे जी के निधन पर जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय (NAPM) को गहरा शोक है । कामरेड गोविन्द पानसरे जी की हत्या प्रगतिशील महराष्ट्र के लिए एक बड़ा हादसा है । साथी नरेंद्र दाभोलकर जी के हत्यारों की खोज और कार्यवाई ना होते हुए फिर इस कठोर सत्यवादी, मार्क्सवादी विचारवंत कार्यकर्ता पर इसी प्रकार से हमला होना बहुत कुछ सन्देश दे रहा है। दामोदर जी पर और कॉ पानसरे जी पर हुआ हमला एक ही पदत्ति से हुआ है, यह भी विशेष बात है।

इस हत्या के पीछे क्या कारण और कौन दोषी हैं? इसकी खोज नहीं होगी और जांच ठन्डे बस्ते में जायेगी तो यह सिलसिला जारी रहेगा और कई प्रगतिशील विचारधारा के स्पष्ट वक्ताओं को लक्ष्य बनाया जाएगा, यह महाराष्ट्र शासन भी जानती है। पिछले शासन ने भी जांच को मंजिल तक नहीं पहुँचाया । मोहसिन खान की हत्या, खैरलांजी, जावखेड़ा, अहमदनगर तक के हत्याकांडों में भी न्याय नहीं मिला। क्या कॉम पानसरे जी को मृत्योत्तर भी न्याय मिलेगा ? नहीं मिला तो क्या समाज चुप बैठेगा ?

कॉम पानसरे जी एक कट्टर मार्क्सवादी और हर वंचित तबके के साथ देने वाले थे। श्रमिकों, घरेलू कामगार तथा हॉकर्स या महिलाओं के, किसान - मजदूरों के अधिवक्ता थे, कोर्ट में भी और जनसंघर्षों में भी। स्पष्ट विश्लेषक तथा गहरे मुद्दों के साथ वे अपने वालो तथा दूसरों को भी मानते थे । कार्यकर्ताओं की परीक्षा लेते थे। उनके विचार और आचार एक से थे। ना कभी नेतागीरी, ना कभी गठजोड़, ना ही दिखावा, ऐसे ही राजनेता थे वे।

कॉम पानसरे जी का लेखन समता न्याय के पक्ष में, मार्क्स के साथ शाहू महाराज की विचारधारा को भी उजागर करनेवाला धर्मांध और जातिवादी शक्तियों के खिलाफ था। आजकी परिस्थियों में फिर उन्होंने गोडसे और गांधी हत्या की खिलाफत स्पस्ट शब्दों में की थी। पानसरे जी के कुछ ही दिन पहले की वक्तव्यों से कुछ मूलभूतवादी विचलित हुए होंगे, लेकिन वे धर्म के खिलाफ नहीं, अधर्म और धर्मभेद की खिलाफ थे। जैसे दामोदर जी, वैसे ही पानसरे जी भी अलग विचारधारा के थे लेकिन सर्वधर्मसम्भावी सर्व प्रथम थे। इनकी हत्या असहिष्णुवादी तत्वों ने की है लेकिन क्या पूरा समाज अब असहिष्णु हो गया है। क्य हम ऐसा हम मानते है ? नहीं ।

हर नागरिक, हर इंसान शांति और भाईचारा ही चाहता है, जुल्म नहीं, अमन चाहते हैं।

लेकिन मुट्ठी भर लोग जो जाति धर्म के नाम पर अस्मिता का मुद्दा बनाते है, वही दोषी हैं, विषमता, द्वेष और हिंसा फैलाने में लगे हैं। इनमे पूंजीपति और धर्मपति भी रहते आये हैं। दाभोलकर जी की हत्या का समर्थन, “अपने कर्मों से ही उन्हें मौत आ गयी” यह कहकर करनेवाले तथा "पानसरे जी भी दाभोलकर जी के ही मार्ग से जाएंगे" यह कहकर धमकाने वाले भी महारष्ट्र में हीं हैं। खुले या छुपे राजनैतिक समर्थन भी इन्हे प्राप्त होता है, किसी भी धर्म में असहिष्णुता मंजूर नहीं होते हुए, इस तरह की हरकत की होइ रहती है। दोषियों की खोज, जातिवादी अत्याचार मे न्याय, धार्मिक दंगों के बाद जांच अहवालों के बावजूद तार्किक अंततक पहुँचने ही न देने की बात साजिश जैसी चलती ही रह्ती है ।

इसलिए जरूरी है, पांसारे जी की हत्या के बाद और हत्याएं ना हो, प्रगतिशील विचारधारा ही हमला ना बन जाये, इसलिए समाज के विचारशील संवेदनशील, समतावादी लोग और समूह संगठन चुप ना बैठें। धर्म जातिववाद, कायरता, हिंसा, गैर बराबरी की खिलाफत तो करे ही किन्तु समजा के युवाओं का प्रबोधन भी करें। जरूरी है सब मिलकर अस्तित्व की मुद्दे पर बल दें, भ्रामक अस्मिता पर नहीं। ऐसा कार्य हो, तभी सही श्रद्धांजलि होगी फिर भी उनके जाने से पैदा हुई खाई नहीं ही भरी जा सकती। सादर नमन !

मेधा पाटकर, सुनीती सु.र., डॉ. सुहास कोल्हेकर, प्रसाद बागवे, उदय कुलकर्णी, डॉ. रवींद्र व्होरा, प्रा. श्याम पाटील, प्रा. विजय दिवाण, विलास भोंगाडे, व साथी

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

“ऐन एंदेर हूं मां नंजक़न” को पढ़ते हुए...



गुंजेश 

कई बार, कई कहानियों को पढ़ते हुए इस (कु) पाठक के मन में यह प्रश्न उठता रहा है कि जिस तरह से हर कथा में कई उपकथाएँ होतीं हैं क्या उसी तरह से कई उपकथाओं को जोड़ देने से कोई (सार्थक; अगर लेखक का उसपर यकीन हो तो) कहानी बन सकती है? यह प्रश्न एक बार फिर मेरे सामने आया जब मैं मिथिलेश प्रियदर्शी की कहानी “ऐन एंदेर हूं मां नंजक़न” का पाठ कर रहा था। मिथिलेश मेरे/हमारे समय के उन चुनिन्दा अफसाना निगारों में हैं जिनकी कहानियों में खुद को नोटिस कराने की अद्भुत क्षमता है। “ऐन एंदेर हूं मां नंजक़न” शीर्षक कुडुख बोली से लिया गया शब्द है जिसका मतलब है ; मैंने कुछ नहीं किया। इस कहानी की सबसे अहम पंक्ति शीर्षक और लेखक के नाम के बाद लिखी गई पंक्ति है जो इस कहानी के मेरे पाठ को प्रभावित करती है। वह पंक्ति है ; “उन तमाम संस्कृतिकर्मियों और लोगों को याद करते हुए जो फर्जी आरोपों में जेलों में क़ैद हैं”। मेरा यकीन है कि हिन्दी (समाज) में सामान्य तौर पर कहानी के टेक्स्ट के अलावा भी कहानी के साथ जुड़ी अन्य जानकारियाँ लेखक का नाम- पता भी कहानी के पाठ को प्रभावित करती है। और फिर इस कहानी के लेखक का यह दावा तो कहानी को एक खास राजनीतिक आयाम देता है। बतौर पाठक मैं पूरी कहानी में उस राजनीतिक आयाम को ढूँढने की कोशिश करता हूँ। क्या ही अच्छा होता अगर लेखक के बिना लिखे ही (गो की उसके लिखने और ना लिखने पर उसकी अपनी स्वतंत्रता है) हमें उन तमाम संस्कृतिकर्मियों और लोगों की याद आ जाती जो फर्जी आरोपों में जेल में कैद है। जब मैं यह लिख रहा हूँ तो यह उस सामान्य समझदारी से आने वाली याद नहीं है जो हम अखबारों में खबरों को पढ़ कर समझ लेते हैं। साहित्य रचना समाज की पीड़ाओं को उच्यतर आवेगों में दर्ज करना है। क्या मिथलेश की कहानी इस बार ऐसा करने में सफल हो पाई है? अव्वल तो हाँ या नहीं में इसका जवाब देते नहीं बनता, बल्कि बाज दफ़े इसका जवाब नहीं के करीब ही है। क्यों, कैसे इसके जवाब से पहले आइए देखते हैं कहानी की ज़मीन क्या है।

जैसा की लेखक ने खुद शीर्षक चुना है कुड़ुख बोली से। जो कहानी के अंत में कहानी का मुख्य पात्र बोलता है। कुड़ुख, झारखंड-बिहार और ओड़ीशा और बंगाल सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों की बोली है। कहानी का मुख्य पात्र एक ठेठ (अपनी एतिहासिक परंपरा से जुड़ा हुआ भी) आदिवासी लड़का है, एमैन्यूल। संक्षेप में कहानी यह है कि एमैन्यूल, गाँव में अपने पिता, भाई, मौसी यानि पूरे परिवार के साथ रहता है। वहीं लिसा नाम की एक लड़की भी थी, दोनों प्रेम में थे। एक फादर हैं जिन्होने एमैन्यूल और लिसा को पढ़ाया है। लिसा चर्च के किसी ब्रदर के साथ शहर चली गई है और अब एमैन्यूल उसे बेतरह याद करता है। फादर के कहने पर आगे कि पढ़ाई करने वह शहर जाता है। जहां वह अपने गाँव को शहर में रहने वाली लिसा को बड़ी शिद्दत (यह लेखक कि सफलता है कि “बड़ी शिद्दत” वाली बात पढ़ने से ही महसूस हो जाती है) से याद करता है। लेकिन फिर एक दिन किन्हीं संयोग से वह एक ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रम का दर्शक बन जाता है जिसमें सरकार और व्यवस्था विरोधी गीत गाए जा रहे थे। पुलिस वहाँ पहुँचती है और एमैन्यूल को पकड़ कर ले जाती है। एमैन्यूल “ऐन एंदेर हूं मां नंजक़न” चिल्लाता रहता है पर उसकी आवाज़ नहीं सुनी जाती। जाहीर है कभी सुनी भी नहीं गई है। कहानी यहीं खत्म हो जाती है।

कहानी का सबसे मजबूत पक्ष है इसकी भाषाई तरलता, हालांकि यह इतना निर्दोष भी नहीं है लेकिन फिर भी..., इसपर आगे चर्चा करेंगे। कहानी पढ़ कर जो दो सवाल मेरे मन में आए वो यह कि क्या यह 1.राजनीतिक और 2. भौगोलिक रूप से एक करेक्ट कहानी है। दूसरे सवाल को पहले देखते हैं ;

इस अरबों की आबादी वाली दुनिया में एक बड़ी संख्या उनकी है, जो थोड़ी खुशियों के बीच जन्म लेते हैं, चंद उम्मीदों के सहारे पाले जाते हैं, कुछ आशाओं के साथ बड़े होते हैं, और अंत में तयशुदा गुमनामी में एक जरूरी मौत मर जाते हैं। कल पैदा हुए, आज बड़े और कल मर गए। दुनिया की पैदाइशी फितरत कि वह केवल शक्तिशालियों की बात करती है और दुनियावी मुहावरे में इनका कुछ भी उल्लेखनीय नहीं होता, न जन्म, न जीवन, न मृत्यु, जीवन के खतरनाक मोड़ों से ये इतने सताये हुए होते हैं कि इनकी पूरी उम्र बच-बच के जीने में निकल जाती है।

एमैन्यूल इसी भीड़ का एक सदस्य था, जिसे उसके परिवार प्रेमी पिता फैलिक्स भेंगरा ने सिखाया था, जीवन सावधानी से जीने की चीज है, जैसे हम गोभी के पौधों को संभालते हैं, जैसे अपनी मुर्गियों को बड़ा करते हैं। जीवन कच्ची शराब की तरह पी जाने के लिए नहीं है। इसे सेम के लतरों की तरह अच्छे से ऊपर की ओर चढ़ाना पड़ता है। संवारना पड़ता है।

क्या आदिवासी इलाकों में इस तरह का डर, इस तरह की सावधानी पाई जाती है। या फिर यह एक कस्बाई डर है। आदिवासी प्रकृति की एक स्वतंत्र इकाई हैं जो समूह में ज़रूर रहते हैं लेकिन किसी भीड़ का हिस्सा नहीं है। समय के साथ उसके भूगोल में चर्च और मंदिरों ने प्रवेश ज़रूर कर लिया है लेकिन अभी उसका ईश्वर उसके आस-पास के पेड़ पौधों में ही रहता है। शहर को लेकर एक संकोच ज़रूर है, लेकिन जिस डर की क्राफ्टिंग मिथिलेश की कहानी में है वह आदिवासियों के मुक़ाबले हम जैसे छोटे-छोटे कस्बों से बड़े शहरों में आए उसी को नियति बना लेनेवाले लोगों में ज़्यादा है। जहां भी आदिवासियों को यह डर लगा है शहरी मगरमछ उसे लीलने को आ रहा है तब-तब आदिवासियों ने आंदोलन खड़े किए हैं। इतनी सहजता से हथियार डाल देना कस्बाई निम्न मध्यम और मध्यम वर्ग की पहचान तो हो सकती है आदिवासियों की कतई नहीं ; 

“फादर उसे बताते कि अब दूध लेकर अब्राहम उनके पास आता है और दिन भर स्कूल में बच्चों के साथ खेलता है। अब वह जंगल कम जाता है। पुलिस ने बकरी चराने गए गांव के तीन लड़कों को मार दिया है, यह कहकर कि वे उन पर हमला करने वाले थे। पर उसके पिता फैलिक्स ने जंगल जाना नहीं छोड़ा है। उन्हें जंगल में एक नया बीज मिला है, जिसके पौधों के आसमानी फूलों का चूरा बनाकर खाने से भूख खत्म होने का एहसास होता है। उनकी मौसी सिसिलिया ने एक मीठे पानी का झरना ढूंढ़ा है, पर वन विभाग के सिपाही उसे वहां तक नहीं जाने देते कि कहीं झरने का शीशे जैसा पानी गंदला न हो जाए, वे दुनिया के लोगों को घुमाने के लिए यहां लाना चाहते हैं”।

आइए अब कहानी की राजनीति पर बात करते हैं। मैं (देरीदा के) इस बात का मुरीद हूँ कि “हर लेखन में एक गुप्त राजनीति होती है”। साथ ही इसका भी कि “भाषा में स्थित अंतर्विरोधों को कोई लेखक अपने इरादों से पाट नहीं सकता है”। क्या बतौर समाज हम आदिवासियों को जिस तरह से देखते हैं या आदिवासी हमारी तरफ जिस तरह से देखते हैं, मुझे कहना चाहिए जितनी दूरी से देखते हैं हमारी भाषा उस दूरी को पाटने में हमारी मदद कर सकती है? यह बात सिर्फ मिथिलेश की ही कहानी पर नहीं बल्कि हाल के दिनों में आए एक ओवररेटेड उपन्यास ‘गायब होता देश’ (लेखक: रणेन्द्र) पर भी लागू होती है। एक ओर जहां एक लेखक अपने लेखन में ‘देश’ और ‘देस’ के फर्क  को नहीं समझ पता है। (जिसपर कभी विस्तार से लिखुंगा) तो दूसरी ओर मिथिलेश हैं जो प्रेम के टूटने के मध्यम वर्गीय कारणों को आदिवासी कमिटमेंट पर हवी होने देते हैं। इस पैरा की शुरुआत में जब मैं “भाषा में स्थित अंतर्विरोधों को कोई लेखक अपने इरादों से पाट नहीं सकता है” के समर्थन में खड़ा हूँ तो दरअसल मैं लेखकों से इस सावधानी की उम्मीद करता हूँ कि वह अपने टेक्स्ट में भाषा के अंतर्विरोधों को पाटने की ईमानदार कोशिश करता दिखे। यहाँ लेखक उसे पाटने की कोशिश तो दूर, कमोबेश उसे ग्लैमराइज़ करता नज़र आ रहा है।

यह सच है कि कोई पाठक या आलोचक यह हैसियत नहीं रखता कि वह कहानीकार को यह डिक्टेट करे उसे कहानी को कैसे बरतना चाहिए था। लेकिन पाठक का यह अधिकार बनता है और लेखक कि यह ज़िम्मेदारी बनती है कि, वह कहानी को इस तरह से गढ़े कि कहानी की केन्द्रीय समस्या, जिस ओर लेखक लक्ष्य कर रहा है, स्पष्ट रहे। खास तौर से ऐसे विषयों में जिसमें बांकी माध्यमों में स्पष्ट रूप से कुछ भी कह पाना नामुमकिन के करीब है। यहाँ एमैन्यूल जो कहानी का केंद्रीय आदिवासी पात्र है, लिसा से प्रेम करता है, लिसा उससे संबंध तोड़ कर किन्हीं ब्रदर के साथ नर्स बनने शहर चली जाती है, एमैन्यूल के दिमाग में आत्महत्या का ख्याल आता है लेकिन वह अपनी समाजिकता की वजह से अपने उस ख्याल को रहने देता है। क्या लिसा सिर्फ नर्स बनने की उम्मीद पर ब्रदर के साथ चली गई? एमैन्यूल के प्रेम की जगह इस उम्मीद को प्रतिस्थापित करने की प्रक्रिया यानि पलाश की जगह गुलदावदी बोने की प्रक्रिया क्या रही? इसकी तलाश न तो लेखक और न ही कहानी का केंद्रीय पात्र एमैन्यूल करता है। यहीं, एक फादर हैं जो गाँव में स्कूल चलाते हैं और एमैन्यूल को पढ़ना चाहते हैं। वह ऐसा क्यों करना चाहते हैं (आदिवासी क्षेत्रों में चर्च और मिशनरियों को ध्यान में रखते हुए ) इसके पीछे उनका क्या मोह है? कहानी में इसका भी जिक्र नहीं है। ध्यान से पढ़ा जाय तो कहानी का केंद्रीय पात्र एक डर है, लेकिन वह कौन सा डर है उसके फैक्ट्स क्या हैं। इसे अगर इस तरह से कहूँ कि कहानी रूपी ब्रेड पर डर का मख्खन ज़रूर पूता हुआ है और हर पंक्ति में उस डर का स्वाद मौजूद है लेकिन इतना भर हो जाने के बावजूद डाइट पूरा नहीं हो जाता। वह डर क्या है, इसे डिकोड न तो नरेटर कर पा रहा है और न ही एमैन्यूल। किसी जगह पर इस्मत चुगतई ने खुद के अफसाना लिखने के बारे में लिखा है जिसका आशय कुछ इस तरह का है कि वह कहानियाँ इसलिए लिखती हैं कि इस विधा में कड़वी से कड़वी बात भी आसानी से कही जा सकती है। जो लेखों या अन्य माध्यमों में कहना मुश्किल है। फिर ऐसी कौन सी बात है जिसकी तरफ लेखक सिर्फ इशारा कर के निकाल जाना चाहता है। इस किस्से में पुराने किस्सों का ‘भावनात्मक लिरिसिज़्म’ तो है, लेकिन नई परिस्थितियों में इस कहानी की जमीन पर उपजे द्वंद और उस द्वंद के कारणों की राजनीतिक, आर्थिक कारणों की पड़ताल नहीं की गई है। जो घट रहा है वह तो दर्ज़ किया गया है लेकिन वह क्यों घट रहा है, जिसके बारे में सिर्फ एक कलाकार, रचनाकार ही बता सकता है, उसके पीछे भागने जहमत लेखक ने नहीं उठाई है।  

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गुंजेश अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा  से जनसंचार में उपाधि प्राप्त हैं.  युवा पत्रकार हैं, आधुनिक रचनाओं को खूब पढ़ते हैं, कविता कहानी लिखते हैं. समीक्षाएं भी अच्छी लिखते हैं और इधर उन्होंने समकालीन कहानियों और कहानीकारों पर बहुत गंभीरता से लिखना शुरू किया है. सम्प्रति, वर्तमान में दैनिक भाष्कर, राँची में कार्यरत हैं.

"पहल-९८" पत्रिका में छपी कहानी का लिंक : http://pahalpatrika.com/frontcover/getdatabyid/144?front=24&categoryid=14

सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

कहानी और कविता शिविर - प्रलेसं (मध्य प्रदेश)



रिपोर्ट - दमोह में कहानी शिविर
गोरिल्ला लड़ाई की तरह है कहानी - रमाकान्त श्रीवास्तव 
- सुसंस्कृति परिहार
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दमोह। कहानीकारों ने अपना कार्य ईमानदारी से करते हुए अपने समय को कहानियों में जिन्दा रखा है। आज जब सामाजिक मूल्य नष्ट होने की कगार पर हैं तब कहानी का दायित्व और कहानी की आवश्यकता समाज में अधिक है। सामाजिक यथार्थ और सत्यान्वेषण कहानी की जरूरत है। आज की कहानी गोरिल्ला लड़ाई की तरह है जो अपने साथ विपक्ष को शामिल करती हुई उस पर प्रहार करती है उक्त उदगार ख्यात कथा लेखक रमाकान्त श्रीवास्तव ने प्रगतिशील लेखक संघ इकाई दमोह द्वारा आयोजित दो दिवसीय प्रदेश स्तरीय कहानी कार्यशाला में कहानी और समाज पर केन्द्रित विचार - विमर्श के तहत प्रदेश के नवरचनाकारों को सम्बोधित करते हुये अभिव्यक्त किए ।
                इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुये कहानीकार सुबोध श्रीवास्तव ने स्पष्ट किया कि दमोह में उनके कथा लेखन की जड़ है ।यहाँ कथा का अपना इतिहास है ।आज समाज हाशिये पर पहुँचने की स्थिति में है ऐसे हालात में कहानी कार का दायित्व बनता है कि वे अपनी कहानियों के जरिए विसंगतियों के साथ निराकरण को भी सामने लायें क्योंकि कहानी अपने समय का ऐतिहासिक दस्तावेज़ होती है ।
         इस विमर्श में कहानीकार दिनेश भट्ट (छिंदवाड़ा), अनिल अयान (सतना), संजीव माथुर (ग़ाज़ियाबाद) ,दीपा भट्ट (सागर),अनुपम दाहिया (सतना), अक्षय जैन, एवं अमर सिंह ने हस्तक्षेप करते हुए कई अहम् सवाल उठाकर अपनी व् शिविरार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया ।
                इस विमर्श से पूर्व स्वागत भाषण में अध्यक्ष सुसंस्कृति परिहार ने यथार्थवादी प्रथम कहानी "टोकरी भर मिट्टी" के लिये जाने वाले लेखक श्री माधव प्रसाद सप्रे की इस माटी में रचनाकारों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि पहले की कहानियाँ निद्रा में ले जातीं थीं आज वे जगाने का काम करती हैं। उद्घाटन भाषण देते हुए प्रलेसं दमोह संस्थापक अध्यक्ष सत्मोहन वर्मा ने कथा परम्परा पर अपने विचार रखते हुये कार्यशाला को जरूरी बताया ।
               दूसरे चरण में कहानी की विषय वस्तु और शिल्प पर व्याख्यान युवा कथाकार दिनेश भट्ट ने दिया । श्री भट्ट का मानना था कि कहानी की विषयवस्तु यदि आप जरा से भी संवेदनशील हैं तो वह कहीँ भी मिल सकती है। मूल बात उसके शिल्प की है। जिसका तानाबाना बुनने में आपका अध्ययन, और सूक्ष्म अन्वेषण महत्वपूर्ण होता  है। नन्द लाल सिंह ने परसाई की कहानी "चूहा और मैं" के माध्यम से शिल्प की ओर इशारा करते हुए कहा कि चूहे को आगे क्यों रखा गया, ये समझना कहानी लेखक के मंतव्य  समझने में मदद करता है।  अनिल अयान ने लघु कथा और कहानी के शिल्प पर, संजीव माथुर ने व्यक्तिगत अनुभव की कहानियों और सामाजिक सरोकार की कहानियों के फासले पर और महत्व पर विविध सवाल किये जिस पर रमाकांत जी ने टिप्पणियाँ कीं तथा स्पष्ट तौर पर कहा कि लघु कथाओं में कथ्य महत्वपूर्ण है जबकि कहानी में शिल्प और परिवेश की कसावट भी अत्यंत आवश्यक है। सामाजिक सरोकारों की कहानियाँ यकीनन दीर्घजीवी होती हैं ।
          दूसरे दिन कहानी पाठ का सिलसिला प्रारंभ हुआ कार्यशाला में लिखी गई कहानी "सपनों की उड़ान" से, जिसे सतना से आये नवरचनाकार अंकुर चौरसिया ने प्रस्तुत किया । उपस्थितों ने कार्यशाला की कहानी कहकर इसका स्वागत किया। इसी क्रम में दीपा भट्ट ने "आर्डर", अक्षय जैन ने "टाईपिस्ट मेडम", उमेश दास साहनी ने "पद्मा", अनुपम दाहिया ने "अपने-अपने श्मशान", अनिल अयान ने "एक अनुबंध", अरबाज खान ने "दीवानी", पुरूषोत्तम रजक ने "दया",  आभा भारती ने "वसंत" और ओजेन्द्र तिवारी ने "शिक्षा" कहानी का पाठ किया ।
      रचनाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए वरिष्ठ कथाकार त्रयी ने इन लेखकों को संभावनाशील बताया। रमाकान्तजी ने सुझाव दिया कि विषयवस्तु के चयन में जल्दबाजी नहीं करना चाहिए जब तक कथ्य पक न जाये। कहानी लिखने के बाद कहानी कई बार पाठ होना चाहिए इससे उसकी खामियां सामने आती हैं। कहानी का टुकड़ों में अवलोकन भी गलत है। कहानीकार को अपनी भाषा, अपने मुहावरे, अपनी शैली और विषय वस्तु से जुड़ाव होना जरूरी है। चमकदार शिल्प और नकली आधुनिकता कहानी को अपंग बना देती है। सुबोध श्रीवास्तव ने कहा कि नवरचनाकार ध्यान रखें कि वे कहानी लिखकर सामाजिक कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं ।
        समापन सत्र में मिस्र के लेखक युसुफ अल फजई की राजेन्द्र शर्मा द्वारा अनुवादित कहानी "कठपुतली का नाच"  रंगकर्मी राजीव अयाची ने, एवं भीष्म साहनी की कहानी "चीफ की दावत" का पाठ सुसंस्कृति परिहार ने किया। इन मानक कहानियों के पाठोपरांत सुबोध श्रीवास्तव ने "भले लोग", दिनेश भट्ट ने "अंतिम बूढ़े का लाफ्टर डे" एवं रमाकांत श्रीवास्तव ने "साहब, बीबी और बाबाजी" कहानियों का पाठ कर तमाम रचनाधर्मियों को इन कथाओं की खूबियों से अवगत कराया। ये कहानियां सभी की  मार्गदर्शक बनेगी, इसी अपेक्षा के साथ दो दिवसीय कहानी कार्यशाला का समापन हुआ। इस कार्यशाला का सफल संचालन गफूर तायर ने किया। आभार व्यक्त करते हुये सुसंस्कृति परिहार ने इसे दमोह इकाई लिए ही नहीं, बल्कि प्रदेश के लिए भी महत्वपूर्ण आयोजन कहा और तमाम सहयोगियों को धन्यवाद दिया ।
ज्ञातव्य हो, कार्यशाला के मध्यांतर में दक्षेस सिँह व सुसम्मति परिहार ने हरिप्रसाद चौरसिया के निर्देशन में जनगीत गाये। रमेश तिवारी ने बुन्देली गीतों की छटा बिखेरी, वहीं केशू तिवारी ने गजलों से समां बांधा । इँदौर से आये रंगकर्मी लेखक शिवम् कुन्देर ने बांसुरी वादन कर सबका मन मोह लिया ।
                 कार्यक्रम में आनंद श्रीवास्तव ,नरेन्द्र दुबे,  ठा नारायण सिंह, श्रीकांत चौधरी, डा रघुनंदन चिले ,नितिन अग्रवाल ,पीएस परिहार, पुष्पा चिले, भारत चौबे, अभय नेमा, कॄष्णा विश्वकर्मा, वीरेन्द्र दबे, शिखा उमाहिया के साथ महाविद्यालीन छात्र छात्राएं  मौजूद रहे ।



कविता कार्यशाला
 म. प्र. प्रगतिशील लेखक संघ की अशोकनगर इकाई ने दिनांक 5-6 अक्टूबर , 2014 को दो दिवसीय कविता कार्यशाला का आयोजन किया | इस कार्यशाला में नई पीढी के 20 से अधिक कवियों ने भागीदारी की , ये सब ऐसे कवि थे जिनकी कवितायें अभी किसी पत्रिका में प्रकाशित नहीं हुई हैं . पहले दिन कविता कार्यशाला में भोपाल से आये जाने-माने हिन्दी कवि कुमार अम्बुज ने कविता की ज़रुरत और कविता के सरोकार विषय पर अपना उदघाटन भाषण दिया | शुरूआत में स्थानीय साथी हरिओम राजोरिया ने शिविर की विस्तृत रूपरेखा पर प्रकाश डाला और पहले सत्र का संचालन भोपाल से आये कवि अनिल करमेले को सौंप दिया | सत्रों की परिकल्पना इस तरह से की गयी थी कि पहले आधार वक्तव्य होता था और उसके बाद नए कवि साथियों के साथ संबाद और बातचीत का सिलसिला शुरू होता था |
  पहले दिन के दूसरे सत्र में इंदौर से आये प्रलेसं के प्रदेश महासचिव विनीत तिवारी ने समकालीन कविता का परिदृष्य" विषय पर अपनी बात कही| इस बीच अनेक सवाल आये और नए कवियों ने बहस में हस्तक्षेप किया | भोजन के बाद तीसरा सत्र हुआ और इस सत्र में भिलाई से आये कवि नासिर अहमद सिकंदर  ने कविता का कथ्य (विषय , विचार , भाव और संवेदना , व्यक्ति चित्र) विषय पर विस्तार से कविताओं के अनेक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपना वक्तव्य दिया, इस सत्र का संचालन युवा कवि एवं आलोचक  बसंत त्रिपाठी (नागपुर) ने किया | 
पहले दिन शाम को अंतिम सत्र में अशोकनगर , गुना , इंदौर , दमोह और बीना से आये युवा साथियों में से खुशी श्रीवास्तव , अरबाज़ खान , समीक्षा दुबे , एकांत पाठक , शिल्पी जैन , महेश श्रीवास्तव , अभिषेक अंशु , उमेश विश्वकर्मा , पुरूषोत्तम रजक और निशांत गंगवानी ने अपनी  चुनी हुई कविताओं का पाठ किया | कविता पाठ के बाद कविताओं पर होने वाली बातचीत में कुमार अम्बुज, विनीत तिवारी, हरिओम राजोरिया, बसंत त्रिपाठी और नासिर अहमद सिकंदर आदि ने भाग लिया | पहले दिन होने वाले सभी सत्रों से पहले अशोकनगर इप्टा के किशोर कलाकारों ने जनगीतों की प्रभावी प्रस्तुति दी| गुना से आयी युवा कवयित्री समीक्षा दुबे ने भी इप्टा की परंपरा से जुड़े गीतों का गायन किया | युवा कवियों के कविता पाठ से पहले बीना से आये वरिष्ठ कवि महेश कटारे सुगम  ने अपनी बुन्देली बोली में लिखीं ग़ज़लों का पाठ किया |
दूसरे दिन के पहले और अंतिम  सत्र में कथ्य का निर्वाह काव्य भाषा, बिम्ब, प्रतीक, काव्य मुहावरा, विचार और विचारधारा  विषय पर बसंत त्रिपाठी ने आधार वक्तव्य दिया और बसंत त्रिपाठी की बात को नासिर अहमद सिकंदर , कुमार अम्बुज , बसंत सकरगाये , विनीत तिवारी और हरिओम राजोरिया ने आगे बढाया |
कविता कार्यशाला में महेश कटारे सुगम, सत्येन्द्र रघुबंशी, सुरेन्द्र रघुवंशी, मुकेश बिजौले, गिरीश जाटव, उमा, निवेदिता तथा अफरोज आदि की सक्रिय भागीदारी रही | इस कार्यशाला को संभव बनाने में प्रलेसं और अशोकनगर इप्टा के साथी पंकज दीक्षित, रामदुलारी शर्मा, विनोद शर्मा,  रतनलाल, सीमा, ब्रिजेन्द्र, श्याम बाबू, संजय माथुर, राकेश विश्वकर्मा, अभिषेक और अरबाज़ आदि साथियों की आधार भूमिका रही | पंकज दीक्षित के बनाये अनेक कविता पोस्टर कार्यक्रम स्थल पर लगाए गए थे |
 कविता कार्यशाला का समापन जनगीत से ही हुआ | पिछले तीन वर्षों में अशोकनगर प्रगतिशील लेखक संघ की यह चौथी कार्यशाला थी|

- हरिओम राजोरिया
hariom.rajoria@gmail.com

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