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गुरुवार, 24 मई 2012

बूढ़े


बूढों को जाते देखता हूँ... अक्सर...
सड़क पर, धूप से मुठभेड़ करते चले जाते हुए...
झुकी या झुकने को हो आई कमर वाले वे
थके, हैरान और पस्त... सेवानिवृत बूढ़े...
जा रहे, या जाकर लौट रहे होते हैं
किसी पेंशन दफ्तर से
या बैंक में पेंशन-भुगतान वाली खिडकी से...

वे सब बूढ़े... जो जिंदा हैं...
कुदरत के तमाम करिश्मों में से एक की तरह
यह साबित करने को...
कि वे जिंदा हैं... बूढ़े जाते रहते हैं वहाँ,
एक तय अंतराल पर...
उन्हीं जाली मढ़ी हुई खिड़कियों पर,
उन्हीं थकाऊ, उपेक्षित, निर्मम कतारों में,
अपनी बारी की प्रतीक्षा में वक्त के साथ बीतने के लिये
उन्हीं पेशेवर लिपिकों की चिढ़ बढ़ाने के वास्ते...

क्योंकि बूढों की शारीरिक उपस्थिति एक अनिवार्य शर्त होती है
इसलिए बूढ़े जाते हैं...

एडियाँ पटकते
पसीना अपनी झुर्रियों में सोखते
सड़क की ट्रैफिक से जुझते
ऑटो वाले से झगड़ते
घर पर छुट गई कलह के वृतांतों को खुंदते हुए

जब वे अचानक सर उठाकर
ऊपर आसमान की ओर देखते हैं, उस समय
शायद...
जिंदगी के अवांछित विस्तार से ऊबकर मृत्यु की याचना करते हुए...
बूढ़े जा रहे होते हैं...

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