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बुधवार, 6 फ़रवरी 2019

जिनसे मिलकर मजबूत होता है विश्वास

गैर हिंदी प्रदेश में एक हिंदी के लेखक से परिचय 
                                                                        - विनीत तिवारी 

प्रगतिशील लेखक संघ  की आंध्र प्रदेश इकाई के 18वे राज्य सम्मलेन में 8 और 9 दिसंबर, 2018 को मुझे मुख्य अतिथि के यौर पर आमंत्रित किया गया था। मैं तेलुगु साहित्य का कोई छोटा - मोटा भी अध्येता नहीं लेकिन श्री श्री, चेराबंडा राजू, मखदूम मोइउद्दीन, राजबहादुर गौड़, और बाद के दिनों में वरवरा राव की क्रन्तिकारी उर्दू, हिंदी और तेलुगु कविताओं के अनुवाद भी पढ़कर एक दिलचस्पी तो रही ही है जानने में। और जब  हैदराबाद आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बीच एक ही राजधानी था, तब मखदूम के बेटे नुसरत मोइउद्दीन और उनके क़रीबी दोस्त और हिंदी के कवि स्वाधीन ने चारमीनार और हैदराबाद की मीठी जुबां के अलावा भी हैदराबाद से खासी मोहब्बत पैदा कर दी थी। 

हालाँकि ये सब पहचानें आज ज़्यादा तेलंगाना के हिस्से की हैं लेकिन कौन इस तरह जुडी हुई पहचानों को जुदा कर सकता है और कौन होगा जो तेलंगाना के हैदराबाद और से मोहब्बत करके श्रीकाकुलम और  ऐतिहासिक शहरों विजयवाड़ा और गुंटूर तथा कृष्णा  के अपने आकर्षण हैं।  

सबसे पहले मुझे आंध्र प्रदेश की प्रगतिशील लेखक संघ की इकाई की सक्रियता के बारे में गुंटूर के लेखक साथी और प्रलेस के राष्ट्रीय सचिव पेनुगोंडा लक्ष्मीनारायण के मार्फ़त ही जानकारी मिली थी। और चकित करने के लिए वो जानकारी भी पर्याप्त थी। 

प्रकाशन के क्षेत्र में आंध्र प्रदेश की प्रलेस इकाई देश की बाकी सभी इकाइयों से कहीं आगे है और इससे बाकी इकाइयों को सीखने की ज़रुरत है। उन्होंने 1973  से अभी तक 150 से अधिक पुस्तकें प्रकशित की हैं जिनमे आंध्र प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के इतिहास से लेकर पिछले सौ वर्षों में तेलुगू में प्रकाशित सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ, सर्वश्रेष्ठ कविताएँ, सर्वश्रेष्ठ नाटक, अनेक युवा और वरिष्ठ लेखकों के संग्रह और देश-विदेश के स्तर पर चल रहीं साहित्यिक बहसों एवं विचार- विमर्शों   प्रकाशित किया है। अकेले गुंटूर ज़िले की इकाई ने ही 60 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित की हैं। विशाखापत्तनम ज़िले ने क़रीब 25 पुस्तकें, कड़पा ज़िले की इकाई ने 5, कुर्नूल इकाई ने 2, कृष्णा ज़िले की इकाई ने 4  और इसी तरह अन्य ज़िला इकाइयों ने भी कुछ - कुछ प्रकाशन किये हैं। अनेक पुस्तकें राज्य की केन्द्र इकाई से  की गईं हैं। निश्चित ही इस बड़े काम के पीछे बहुत से साथियों का सहयोग रहा होगा लेकिन मेरी अपनी सीमाओं की वजह से मैं इस कार्य के पीछे पेनुगोंडा लक्ष्मीनारायण, तेलुगु के प्रमुख कहानीकार-उपन्यासकार वल्लूरु शिवप्रसाद, वरिष्ठ आलोचक राच्छपालम चंद्रशेखर रेड्डी और कुछ ही लोगों को जानता हूँ। मेरे ख्याल से वल्लुरु शिवप्रसाद और  राच्छपालम चंद्रशेखर रेड्डी  तेलुगु साहित्य अकादमी के सम्मान से भी सम्मानित हैं। 

इस पुस्तक प्रकाशन अभियान में केवल  पुस्तकें ही प्रकाशित नहीं की जातीं, बल्कि उन्हें सस्ते दामों पर पाठकों को उपलब्ध कराया जाता है और प्रलेस की ओर से अनेक ज़िलों में एक सप्ताह से लेकर १ माह तक के पुस्तक मेले पूरे राज्य में आयोजित किये जाते हैं जिनसे किताबें छापने से लेकर लोगों तक  पहुँचाने का वृत्त पूरा होता है।

इसलिए जब मैं गुंटूर जा रहा था तो इन साहित्यिक आंदोलनकारियों  को सलाम करने भी जा रहा था। लेकिन वहाँ पहुंचकर मुझे और भी कुछ ऐसा मिला जिसने मेरी  जानकारी और तेलुगु आरसम  के प्रति सम्मान और बढ़ गया। 

वहाँ मुझे मिले एक बुजुर्गवार जिनका नाम था तक्कोलु माचि रेड्डी। उन्होंने हिंदी में मुझसे बात की और बताया कि उन्होंने दशकों पहले बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पीएच. डी. की थी और उसके बाद उन्होंने अनेक पुस्तकों  और लेखों का हिंदी अनुवाद किया जिसका प्रकाशन साहित्य अकादमी ने किया। तेलुगु के महाकवि कहे जाने वाले श्री श्री के सर्वाधिक चर्चित कविता संग्रह "महाप्रस्थानम" का हिंदी अनुवाद किया।  निराला और मुक्तिबोध के अनेक निबंधों का हिंदी अनुवाद किया जिसका संकलन केंद्रीय साहित्य अकादमी ने प्रकाशित किया। उन्होंने लम्बे समय आकाशवाणी के केन्द्र निदेशक के रूप में काम किया और 2004 में वे सेवानिवृत्त हुए। 

उन्होंने मुझे अपनी दो किताबें भी भेंट कीं।  उनमें से एक किताब प्रगतिशील लेखक संघ, कड़पा इकाई, आंध्र प्रदेश द्वारा प्रकाशित की गयी थी और उसका प्रकाशन 1984 में हुआ था में। किताब का शीर्षक आकर्षक है "हिंदी और तेलुगु की कविता में बिंब-विधान"। और दूसरी किताब थी साहित्य अकादमी से ही प्रकाशित राचमल्ल रामचंद्र रेड्डी जिन्हें "रारा" के  जाता है, उनके रचनाकर्म पर केंद्रित पुस्तक "भारतीय साहित्य के निर्माता - रारा" जिसका लेखन और अनुवाद दोनों ही माचि रेड्डी ने किया है। रारा ने बाल साहित्य का सृजन करने से लेकर आलोचना, अनुवाद, पत्रकारिता, कहानियाँ, नाटक अदि लिखे हैं।  श्री श्री उन्हें 'क्रूर आलोचक' कहा करते थे। उन्हें 1988 का साहित्य अकादमी सम्मान दिया गया था। 

बात चली तो उन्होंने ये दर्द भी व्यक्त किया कि अब लोग पढ़ते कम हैं।  पहले, उनके ज़माने में एक एक किताब पढ़ने के लिए लोग कितना भटका करते थे। उन्होंने मुझसे ये भी कहा कि उनके पास "हिंदी और तेलुगु की कविता में बिंब-विधान" की क़रीब 50 प्रतियाँ उपलब्ध हैं जिसकी क़ीमत मात्र रुपये 35.00 है और वे चाहते हैं कि वो हिंदी के ऐसे पाठकों तक पहुँच सके जो उसे वाक़ई पढ़ना चाहते हैं। वे उसे डाक से या कुरियर से भेजने का कष्ट भी उठाने को तैयार हैं बशर्ते लोग उसे पढ़ना चाहें। 

मैं यह वाकया लिखकर हिंदी साहित्य के अपने दोस्त पाठकों, लेखकों तक ये जानकारी तो पहुँचाना ही चाहता हूँ कि ऐसी किताब माचि रेड्डी के पास उपलब्ध है और साहित्य अकादमी में रारा की किताब भी उपलब्ध है।  साथ ही मैं ये अपील भी दोस्तों से करना चाहता हूँ कि हम माचि रेड्डी जी को इस ख़ुशी का एहसास करवाएं कि उनके इस श्रम साध्य शोधपूर्ण काम में हमारी भी दिलचस्पी है। न केवल दिलचस्पी है बल्कि एक गैर हिंदी भाषी प्रदेश में हिंदी और तेलुगु के बीच साहित्य के पल का काम करने के लिए हमारे दिलों में उनकी इज़्ज़त भी है। 

यहाँ मैं माचि रेड्डी जी का डाक का पता और फ़ोन नंबर दे रहा हूँ। जो उनसे संपर्क करेंगे, ख़त लिखेंगे, फ़ोन करेंगे, पुस्तक बुलाएँगे और पैसे भेजेंगे, उनके लिए तो ढेर सारा आभार।  लेकिन जिन्होंने मेरी ये पोस्ट पढ़ी और इस तरह माचि रेड्डी को, श्री श्री को, रारा को, पेनुगोंडा लक्ष्मीनारायण को, गुंटूर और आंध्र प्रदेश के प्रगतिशील लेखक संघ (आरसम) की गतिविधियों को जाना, उनका भी धन्यवाद। 
डॉ. तक्कोलु माचि रेड्डी 
40/39-2, मुत्थुरासु पल्ली,
जिला - कड़पा (आंध्र प्रदेश). पिन - 516002 
मोबाइल - 96666 26546  
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(खत लिखें तो पता अंग्रेजी में लिखने से मिलने की उम्मीद ज़्यादा रहेगी। )
Dr. Takkolu Machi Reddy
40/39-2, Mutturasu Palli, 
Kadapa District (Andhra Pradesh)
Pin 516002
Mobile: 96666 26546
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मप्र प्रगतिशील लेखक संघ की राज्य कार्यकारिणी की बैठक की रिपोर्ट

इकाई स्तर पर सक्रियता और जन संस्कृति के प्रसार के संकल्प के साथ आयोजित प्रलेस की राज्य कार्यकारिणी बैठक एवं कवि गोष्ठी सम्पन्न*

देवास, 4 फरवरी, 2019

साहित्य, संस्कृति और कला के प्रश्नों पर निरंतर सक्रिय मप्र प्रगतिशील लेखक संघ की राज्य कार्यकारिणी की बैठक देवास के चामुण्डा कॉम्प्लेक्स में स्थित ईटी कोचिंग के सभागृह में 3 फरवरी को आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता संगठन के अध्यक्ष श्री राजेन्द्र शर्मा ने की। बैठक में संगठन की इकाई से लेकर राज्य तक निरंतर सक्रियता बढ़ाने, राज्य के साथ सम्बन्ध, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के राज्य द्वारा उत्पीड़न, अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों आदि पर गहन विचार किया गया तथा महत्वपूर्ण प्रस्ताव भी पारित किए गए। बैठक के आरंभ में विगत दिनों दिवंगत हुए महत्वपूर्ण लेखकों यथा कृष्णा सोबती, देवीशरण ग्रामीण, इक़बाल मजीद, कमल जैन और फिल्मकार मृणाल सेन को संगठन की ओर से आत्मीय श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

*रज़िया, कैफ़ी, नेमिचंद जैन और राहुल सांकृत्यायन पर कार्यक्रम*
बैठक में निर्णय लिया गया कि संगठन द्वारा महत्वपूर्ण साहित्यकारों राहुल सांकृत्यायन, रजिया सज्जाद जहीर, कैफ़ी आज़मी और रंगकर्मी नेमीचंद जैन के जन्मशती वर्ष के अवसर पर इस साल पूरे प्रदेश में इकाई स्तर पर इनके साहित्यिक अवदान को याद करने हेतु परिचर्चाएं आयोजित की जाएंगी तथा प्रमुख शहरों में बड़े कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे।

*वसुधा*
एक महत्त्वपूर्ण निर्णय संगठन की मुखपत्रिका और महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका प्रगतिशील वसुधा के संबंध में भी लेते हुए यह तय किया गया कि अब विनीत तिवारी इसके संपादन और प्रकाशन की जिम्मेदारी देखेंगे। इसी वर्ष सितम्बर में जयपुर में प्रस्तावित संगठन के राष्ट्रीय सम्मेलन के पूर्व सभी इकाइयों को जीवंत और सक्रिय बनाया जाएगा और संभागीय सम्मेलन आयोजित किये जायेंगे। इस प्रक्रिया को गति प्रदान करने के उद्देश्य से राज्य सचिवमंडल के साथियों के मध्य इकाइयों की जिम्मेदारियों का विभाजन भी किया गया।

*प्रस्ताव*
प्रलेस बैठक में कुछ महत्वपूर्ण प्रस्ताव भी पारित किए गए। एक प्रस्ताव में हाल के दिनों में देश मे अलग-अलग बहानों से मानव अधिकार कार्यकर्ताओं और सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले बुद्धिजीवियों, संस्कृतिकर्मियों की प्रताड़ना और गिरफ्तारी आदि की तीव्र भर्त्सना की गई। सरकार से अपील की गई कि वह देश के संविधान में वर्णित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करे और लेखकों, संस्कृति कर्मियों, पत्रकारों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित करना बंद करे। दूसरे प्रस्ताव में दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला में जनता द्वारा निर्वाचित राष्ट्रपति और प्रशासन को अस्थिर करने के लिये तथा उस देश के विशाल तेल भंडार पर कब्ज़ा करने हेतु अमरीकी सरकार द्वारा किये जा रहे षड्यंत्रों की निंदा की गई और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपेक्षा की गई कि वे वेनेजुएला की संप्रभुता और जनादेश की रक्षा हेतु आवश्यक क़दम उठायें।

*कवि गोष्ठी*
कार्यकारिणी बैठक के पश्चात शाम को 4 बजे से एक कविता पाठ का आयोजन भी किया गया जिसमें प्रदेश के कई जिलों से आये कवियों ने अपनी कविताएं सुनाईं।

कवि गोष्ठी की अध्यक्षता मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष, प्रगतिशील वसुधा के पूर्व संपादक एवं वरिष्ठ कवि राजेन्द्र शर्मा ने की। उन्होंने कवियों का संक्षिप्त परिचय देने के साथ ही गोष्ठी के अंत में कवि एवं सामाजिक कार्यकर्ता विनीत तिवारी को सर्वसम्मति से प्रगतिशील वसुधा के संपादक बनाये जाने की घोषणा की। राजेन्द्र शर्मा ने कहा कि हरिशंकर परसाई, कमला प्रसाद और मेरे बाद प्रगतिशील वसुधा 101 वें अंक से विनीत तिवारी के सम्पादन में इंदौर से निकलेगी। विनीत अपनी संपादकीय टीम का गठन करेंगे। हम आशा करते हैं कि वसुधा में कुछ नया जुड़ने के साथ साथ यह अपनी विशिष्टता में वृद्धि भी करेगी।

कवि गोष्ठी में सतना से आये वरिष्ठ कवि बाबूलाल दाहिया के साथ शिवशंकर मिश्र सरस (सीधी), अरुण नामदेव (नागौद), विनीत तिवारी, अभय नेमा, सारिका श्रीवास्तव (इंदौर) शैलेन्द्र शैली, प्रज्ञा रावत, आरती, सत्यम (भोपाल), शशिभूषण (उज्जैन) आदि ने काव्य पाठ किये।

लोक कवि बाबूलाल दाहिया ने कृषि के अंतर्गत किसानी के साथ सामाजिक जीवन में आने वाले, शामिल शब्दों की कविता में जगह, उनकी अहमियत को रेखांकित करते हुए मेहनत, हक़ और मिल जुलकर संघर्ष करने की चेतना से भरी कविताएं सुनाईं। 'पसीना हमरे बद है' और उनकी अन्य मार्मिक कविताओं में श्रमिकों, किसानों के प्रति अटूट लगाव एवं कवि सरोकारों के लिए प्रतिबद्धता दिखी जिसे सुनने वालों ने खूब पसंद किया एवं प्रेरित हुए।

शिवशंकर मिश्र 'सरस' की कविताओं में धार्मिक पाखंड के उद्घाटन के साथ ग्रामीण आदिवासी श्रमिकों की पीड़ा एवं शोषण के प्रति प्रतिकार दिखे। अभय नेमा की कविताओं में कवि की पक्षधरता एवं सरोकारों की गूंज थी। सारिका की कविताओं में स्त्री चेतना के स्वर के साथ इंसानों के लिए संवेदना थी। प्रज्ञा रावत ने पिता भगवत रावत को याद करते हुए कविताएं सुनाईं और श्रोताओं का ध्यान आकर्षित किया। आरती ने छोटी छोटी सहज प्रेम कविताओं के साथ प्रतीकात्मकता से लबरेज़ स्मरणीय कविता का पाठ किया।

शैलेन्द्र शैली की कविताओं में परिवर्तनकामी चेतना, धार्मिक- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अतिचारों के ख़िलाफ़ एकजुटता और संघर्षशीलता का स्वर मुख्य रहा। सत्यम की कविताओं में आसिफा के लिए न्याय को आवाज़ देती कविता ने सबका ध्यान खींचा। शशिभूषण ने 'अरुणाचल' एवं 'रहना मां से दूर' आदि कविताओं का पाठ किया जिन्हें श्रोताओं ने काफ़ी पसंद किया। विनीत तिवारी ने प्रसिद्ध चित्रकार पंकज दीक्षित को समर्पित एक यादगार कविता के साथ रवींद्रनाथ ठाकुर की स्मृति में लिखी कविता और 'जो सिर्फ़ ख़ुशी खोजते हैं उन्हें ख़ुशी कभी नहीं मिलती' कविता का पाठ किया। प्रतिबद्धता, संवेदना, भाषा शिल्प की सादगी के साथ मार्मिकता विनीत की कविताओं की खासियत है। उन्हें बड़ी पसंदगी के साथ सुना गया।

गोष्ठी के अंत में राजेंद्र शर्मा ने 'उठ बहना' को मिलाकर अपनी दो मार्मिक कविताएं सुनायीं। बौद्धिकता से आक्रांत समकालीन कविताओं के दौर में राजेंद्र शर्मा की कविताओं ने पीछे छूटती जा रही मार्मिक कविताई का एहसास कराया।

इस अवसर पर राजेन्द्र शर्मा, अध्यक्ष ने प्रलेसं मध्यप्रदेश की ओर से सभी का आभार जताया एवं इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिए देवास इकाई को धन्यवाद दिया। इस एकदिवसीय कार्यकारिणी की बैठक एवं कवि गोष्ठी का संयोजन मेहरबान सिंह, अर्चना मित्तल, इक़बाल मोदी ने किया। गोष्ठी का संचालन किया अर्चना मित्तल ने। उपस्थित साहित्यकारों-कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों में प्रकाश कान्त, राजनारायण बोहरे, मुकेश बिजोले, सचिन श्रीवास्तव, एस के दुबे, अशोक दुबे, विक्रम सिंह गोहिल, ओम वर्मा, प्रताप राव कदम, विक्रम सिंह, चिराग, संदीप नाइक, बहादुर पटेल, ज्योति देशमुख, अमेय कांत, दिनेश पटेल, मनीष आदि रहे। बैठक एवं कवि गोष्ठी को सफल बनाने में श्री मेहरबान सिंह सहित देवास इकाई के साथियों ने अथक परिश्रम किया।

*रिपोर्ट: शशिभूषण और सत्यम*

सोमवार, 20 अगस्त 2018

महिलाओं के मुद्दे पर निकलेगी राष्ट्रव्यापी यात्रा

भोपाल में महिला संगठनों की संयुक्त बैठक सम्पन्न

19 अगस्त 2018, रविवार। भो
भोपाल में मध्य प्रदेश भारतीय महिला फेडरेशन के तत्वाधान में 22 सितंबर से 12 अक्टूबर तक निकलने वाले यात्रा जत्था *"बातें अमन की"* की देशव्यापी यात्रा की तैयारी के लिए प्रारंभिक बैठक आयोजित की गई।
देश के प्रमुख महिला संगठनों के तत्वाधान में *बातें अमन की* यात्रा प्रस्तावित है। इस अभियान का उद्देश्य महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों की उपलब्धता, महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा,महिलाओं का विधायी प्रतिनिधित्व एवं अन्य संबंधित मुद्दों पर देशव्यापी पहल को और उत्साहित करना एवं देश में अमन स्थापित करना है।
*"बातें अमन की"* , जिसका स्वरूप 5 यात्राओं का एक "चलत अभियान" है, 22 सितम्बर से शुरू होने वाला है। पांचो यात्राओं का संगम दिल्ली में 13 अक्टूबर को होगा। यह यात्रा 200 जगहों पर जायेगी।
इस बैठक में एन एफ आई डब्ल्यू के अलावा जनवादी महिला समिति, घरेलू कामकाजी संगठन, महिला अधिकार सन्दर्भ केन्द्र, एटक, सीटू, ए आई एस एफ, ए आई वाई एफ, एस एफ आई, प्रलेसं, जलसं, इप्टा इत्यादि संगठन ने मिलकर इस यात्रा का प्रारूप तय किया। यात्रा मध्यप्रदेश में 4 अक्टूबर को सिंगरौली से आरंभ होकर 9 अक्टूबर को इंदौर होते हुए गुजरात जाएगी। भोपाल में मुख्य कार्यक्रम 8 अक्टूबर को गाँधी भवन में सम्पन्न होगा।

*सारिका श्रीवास्तव*
राज्य सचिव
मध्य प्रदेश भारतीय महिला फेडरेशन(NFIW)
9589862420

रविवार, 12 अगस्त 2018

फासीवादी उभार और प्रतिरोध का अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य-नागासाकी दिवस पर हुई चर्चा


अरविंद पोरवाल
सारिका श्रीवास्तव

इंदौर, 12 अगस्त 2018।
इतिहास की सबसे भीषण और अमानवीय घटना हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए परमाणु हमले को याद करते हुए अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता  संगठन ने 9 अगस्त 2018 को नागासाकी दिवस पर एक बैठक का आयोजन किया। विश्वशांति के संदेश के साथ परिचर्चा का आयोजन किया गया। जिसमें वेनेजुएला, क्यूबा, फिलीस्तीन, पाकिस्तान और बांगलादेश के हालिया घटनाक्रम और उसके भारत पर असर को लेकर बात की गई। विनीत तिवारी ने वेनेजुएला के हालातों पर कहा वेनेजुएला में चुनावों को प्रभावित करने की अमेरिका ने कोशिश की, लेकिन वे कामयाब नहीं हुए। जिसमें राष्ट्रपति मदुरो के नेतृत्व में जनतांत्रिक सरकार जीतकर सत्ता में आ गई। सरकार को अस्थिर करने के लिए हाल ही में राष्ट्रपति की सभा में ड्रोन से विस्फोट करवाया गया। जबकि मीडिया द्वारा यह प्रचारित किया गया कि आसपास रखा कोई सिलेंडर फटा हो। जब वेनेजुएला ने वीडियो जारी किया तो सच्चाई सामने आई। कोलंबिया के ड्रग माफिया के जरिये अमेरिका ने इस कृत्य को अंजाम दिया था। इसको लेकर बैठक में वेनेजुएला के प्रति एकजुटता का संदेश और अमेरिका की साजिश के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया। फिलीस्तीन के बारे में डॉ. अर्चिष्मान राजू ने कहा फिलीस्तीन दुनिया में एक मात्र ऐसी जगह रह गई है जहां अभी तक अमेरिका की मदद से इजराइल ने उपनिवेश कायम कर रखा है। जबकि बाकी दुनिया में 20 वीं शताब्दी के अंत के साथ उपनिवेशवाद समाप्त हो गया है। नस्ल और मजहब के नाम पर फिलीस्तीन के लोगों को इजराइल ने अपनी ही जमीन पर बंधक बनाकर रखा है। नोम चोम्स्की सहित दुनिया के तमाम विद्वानों ने फिलीस्तीन के गाजा इलाके को खुली जेल का नाम दिया है। जहां लोग अपनी ही जमीन पर अपने ही घरों में आने जाने को स्वतंत्र नहीं है। नजदीकी भविष्य में फिलीस्तीनी लोगों के हालात सुधरने की उम्मीद कम है। वहां मानवाधिकारों को कुचला गया है। सारी दुनिया के विरोध के बावजूद इजराइल और अमेरिका अपने अमानवीय साजिशों के रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं। डॉ. राजू अमेरिका की कॉर्नेल युनिवर्सिटी में दक्षिण एशियाई विद्यार्थियों के द्वारा किए जा रहे विश्वशांति के आंदोलन के अध्ययन में सलंग्न है। सभा में उपस्थित लोगों ने संघर्ष के प्रतीक बन चुके फिलीस्तीनी लोगों के साथ एकजुटता जाहिर की और इस बात की भर्त्सना भी की कि इजराइल के साथ भारत सरकार अपने व्यापारिक और सैन्य रिश्ते बढ़ाकर उस विदेश नीति को उलट रही है जो आजादी के पहले से गांधी और नेहरू ने फिलीस्तीन के पक्ष में निर्धारित की थी। *डॉ. राजू ने अफ्रीका और फिलिस्तीन के राजनीतिक परिदृश्य की तुलना करते हुए बताया कि अफ्रीका में भी रंगभेद के मुद्दे पर संघर्ष हुए। लेकिन अफ्रीका और फिलिस्तीन के हालात में बहुत अंतर है। जैसे अफ्रीका की रँगभेद नीति और नेल्सन मंडेला विश्व परिदृश्य में उभर आए थे वैसा फिलिस्तीन के साथ नहीं हुआ और उसका कारण है कि फिलिस्तीन में यहूदी और अरब के बीच का संघर्ष है और अमरीका के कॉरपोरेट में यहूदी कम्पनियाँ पावरफुल हैं। जिनके चलते अमरीका इजराइल के पक्ष में है और रहेगा। फिलिस्तीन के हालात सुधरें ऐसा मुश्किल ही लगता है।
सारिका श्रीवास्तव ने कहा कि पिछले दो दशकों में दुनिया मे जो माहौल मुस्लिमों के खिलाफ बनाया गया है उससे फिलिस्तीन के लोगों के संघर्ष को भी इस्लामिक आतंकवाद के तौर पर प्रचारित किया जाता है न कि मानवाधिकारों या अपनी संप्रभुता व आज़ादी को बचाने के संघर्ष के तौर पर।

क्यूबा के बारे में बात करते हुए बताया गया क्यूबा में 2013 से शुरू हुई संविधान निर्माण की प्रक्रिया अंतिम चरण में है और उसका पहला प्रारूप क्यूबा की सरकार ने सुझावों के लिए जारी किया है। प्रारूप को जारी करते हुए संविधान सभा के अध्यक्ष राहुल कारूरूत्रों ने बताया कि नए संविधान का निर्माण करते हुए हमने 21वीं शताब्दी की नई परिस्थितयों को ध्यान में रखा है। चीन, वियतनाम, वेनेजुएला आदि देशों के संविधान का संदर्भ भी रखा गया। बांगलादेश के बारे में सौरभ बनर्जी ने कहा गए चार दिनों से बांगलादेश में इंटरनेट सहित सभी तरह के संचार माध्यम बंद हैं। जो पिछली 28 जुलाई को ट्रेफिक की वजह से दो स्टूडेंट्स की मौत हो जाने पर हुए आंदोलन के उग्र हो जाने पर बंद है। हाईस्कूल के लाखों विद्यार्थी सड़क पर उतर आए। उनकी मांग थी कि ट्रेफिक नियमों को सुधारा जाए। बनर्जी ने बताया कि भले ही ऊपरी तौर पर देखने पर समस्या ट्रेफिक की नजर आए लेकिन लोगों के इस गुस्से के पीछे वहां फैली बदहाली, बेरोजगारी और सरकार के प्रति नाराजगी वजह थी। यह बताया कि बांग्लादेश सरकार हो या भारत सरकार दोनों ही बांग्लादेशियों के बीच हिंदु-मुस्लिम का ध्रुवीकरण कर रही है। सरकार सिर्फ अपना फायदा चाहती है। इसलिए यहां मजदूरों के साथ मिलकर विश्व शांति आंदोलन करने की जरूरत है। पाकिस्तान पर अजीत बजाज ने कहा पाकिस्तान के हाल पूरी तरह अमेरिका के रहमोकरम पर हैं। जो भी राष्ट्रपति अमेरिका को न पसंद होने वाले निणर्य लेता है वो तुरंत बदल दिया जाता है। फिर चाहे परवेज मुशर्रफ हो या नवाज शरीफ। इमरान के सरकार में आने से किसी तरह के बदलाव की उम्मीद करना बेमानी है। जो इंसान पहले सेक्युलर सोच का हुआ करता था वो राजनीति में मुनाफा देखकर फिरकापरस्ती की ओर मुड़ गया है। भले ही बयान में भारत के साथ समझौता करने की बात कहे लेकिन उनकी सरकार की लोकप्रियता भी भारत के साथ तनावपूर्ण रिश्ते बनाकर ही कायम रखी जा सकती है। डॉ. जया मेहता ने कहा यदि हम अंतर्राष्ट्रीय मसलों पर अपनी राय कायम करते हैं तो अपनी ही देश की सरकार जो मानवाअधिकार के मामले में या लोगों के अधिकारों के हनन में शामिल हो उसे कैसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाया जा सकता है। यदि देश के लोग देश की सरकार से, उसके निर्णयों से इत्तेफाक नहीं रखते तो हमें देश के लोगों की आवाज उठाने के लिए एक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच को मजबूत करना चाहिए। पहले इस तरह का मंच विश्वशांति आंदोलन दिया करता था। आज के दौर में उस आंदोलन को नए सिरे से मजबूत करने की जरूरत है। बसंत शिंत्रे ने कहा कि नए लोगों तक अंतर्राष्ट्रीय मामलों की जानकारी पंहुचानी होगी। मुख्यधारा का मीडिया इन मसलों की सही जानकारी नहीं देता। इस मौके पर अजय लागू ने भी भागीदारी की। अरिवंद पोरवाल ने संचालन किया। शैला शिंत्रे, अशोक दुबे, श्याम सुंदर यादव, आदिल सईद, एस के दुबे, एस के पंडित, एच डी टोकरिया, एस के पांडे और शर्मिष्ठा बनर्जी सहित शहर के कई सजग नागरिक इस बैठक का हिस्सा बने।

शनिवार, 11 अगस्त 2018

विभाजन के वक्त देखा क्रूर साम्प्रदायिक यथार्थ, "तमस" और भीष्म साहनी* और *अपने वक्त की तमस रचने का समय...

सारिका श्रीवास्तव

10 अगस्त 2018। प्रगतिशील लेखक संघ, इंदौर इकाई द्वारा 8 अगस्त 2018, भीष्म साहनी के जन्मदिवस पर केनरिस कला वीथिका में बैठक आयोजित की गई।

प्रलेसं इंदौर इकाई के अध्यक्ष एस के दुबे ने भीष्म साहनी का परिचय देते हुए कहा कि भीष्म साहनी की रचनाओं में उस समय की विभीषिका, विभाजन के दंश और बढ़ती साम्प्रदायिकता की पीड़ा को इस बखूबी बयान किया है कि पाठक को लगने लगता है कि ये सब उसके आस-पास और अभी कुछ देर पहले ही घटित हुआ था।

जनअर्थशास्त्री जया मेहता ने भीष्म साहनी और उनकी पत्नी शीला साहनी के साथ शिमला में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज में बिताए गए वक्त को याद करते हुए कहा कि भले ही मेरा बहुत करीबी रिश्ता साहित्य से न रहा हो किन्तु मुझे उनके साथ लम्बा समय बिताने का अवसर मिला। वे बहुत संवेदनशील थे और साधारण प्रतिक्रियाओं पर भी बहुत गहराई से विचार किया करते थे। उनकी उपस्थिति इतनी शान्त, सहज और सौम्य रहती थी कि तमस पढ़ते हुए अनेक बार आश्चर्य होता है कि उसमें लिखे गए बहुत क्रूर यथार्थ के प्रसंग भीष्म जी जैसे शान्त व्यक्तित्व वाले व्यक्ति ने लिखे हैं। उन्होंने उनकी कम चर्चित कहानी "यादें" का वाचन किया। ये कहानी दो वृद्ध महिलाओं पर आधारित है जो बहुत अच्छी दोस्त रहीं और अरसे बाद मिल रही हैं। अपनी पुरानी स्मृतियों का स्मरण करतीं दोनों सखियाँ अपने बीते दिनों में डूबती-उतराती रहती हैं साथ ही पाठकों को भी अपने साथ भावनाओं से भिगोती रहती हैं। दो पुरानी पक्की दोस्त तथा वृद्ध महिलाओं का पुनर्मिलन इतने स्वभाविक और भावनात्मक तरीके से रचा है कि कहानी का पाठ करते हुए जया मेहता खुद भी रो पड़ीं।

कृष्णा सोबती के संस्मरण "हशमत की नजर में भीष्म साहनी" का पाठ किया सारिका श्रीवास्तव ने। जिसमें कृष्णा सोबती ने भीष्म के लेखनकर्म पर प्रकाश डालते हुए उनकी भावनाओं को उकेरा है। हशमत के जरिए कृष्णा सोबती लिखती हैं कि भीष्म का लेखन उनके भोगे गए अनुभवों का लेखन है। भीष्म मध्यवर्ग की खरोंचे, ज़ख्म, उसके दर्द और उसके ऊपरी खोल को छू-छूकर, अपने को उस भीड़ से अलग खड़ा कर लेते हैं और नए सिरे से अपनी पुरानी चिर-परिचित जमीन में उन्हें अंकित करने का निर्णय कर डालते हैं। सारिका ने कहा कि अंतर्मुखी स्वभाव के भीष्म साहनी की कलम बहिर्मुखी थी। उनकी रचनाओं से जो टीस उभरती है वो गहरे तक पैठ जाती है जिसकी चुभन जहन में बनी रहती है।

कार्यक्रम में "अमृतसर आ गया है" कहानी का पाठ भी किया गया। उस कहानी में रेल के डिब्बे में बैठे यात्रियों का उम्दा तरीके से चित्र खींचते हुए विभाजन की विभीषिका और उसका जनमानस पर पड़ता प्रभाव और उसके फलस्वरूप घटित होते घटनाक्रम को भीष्म साहनी ने इस तरह से रचा है कि पाठकों को उस डिब्बे में सवार एक यात्री की तरह ही महसूस होता है की वह उन परिस्थितियों से स्वयं ही गुजर रहा हो।

हिंदी की प्रोफेसर कामना शर्मा ने परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ये कहानी विभाजन के दौर को चित्रित और अंकित करती है। अनेक बार ऐसी परिस्तिथियाँ आती हैं जब जुल्म होते हैं और हम मूक दर्शक बने तटस्थ देखते रहते हैं, कोई हस्तक्षेप तक नहीं करते क्योंकि पूरे वातावरण में जिस तरह दहशत का वातावरण, भय और डर व्याप्त है उसने हमें स्वार्थी बना दिया है।

प्रलेसं के राष्ट्रीय सचिव मण्डल के सदस्य विनीत तिवारी ने भीष्म साहनी की आत्मकथा की कुछ अंश सुनाते हुए कहा कि भीष्म अपने बचपन के संस्मरण यूँ लिखते हैं जैसे किसी आम या साधारण से बच्चे की बात हो। वे कहीं भी अपने महत्त्वपूर्ण होने को नहीं जताते। संस्मरण के दूसरे दौर में बलराज साहनी की जीवन शैली और बीमार पड़े छोटे बच्चे(भीष्म साहनी) की असमर्थता, बड़े भाई से तुलना और बीमारी एवं छोटे होने के दंश को बड़ी सहजता से भीष्म साहनी ने स्वीकारते हुए लिखा है। जिसका पाठ करते हुए  विनीत ने कहा भीष्म साहनी के जीवन पर बलराज साहनी का बहुत असर रहा है। जिसे भीष्म ने अपने संस्मरण में बड़ी सहजता से स्वीकार भी किया है।
तमस का उल्लेख करते हुए विनीत ने कहा तमस 1972-74 के दौरान लिखा गया था। इसके पहले पाकिस्तान के साथ दो युद्ध हो चुके थे और विभाजन के समय की साम्प्रदायिक भावनाएं फिर से भारतीय जनमानस में उभार पर थीं। उस समय की परिस्तिथियों ने ही भीष्म साहनी को विभाजन के वक्त देखे गए क्रूर, साम्प्रदायिक यथार्थ की याद दिलाई और उन्होंने तमस लिखा। तमस इसलिए सबसे विश्वस्नीय दस्तावेजों में से एक है। बटे हुए भारतीय समाज को एकताबद्ध करने के लिए उस वक्त की कांग्रेस को भी तमस जैसी किसी कृति की जरूरत थी। आज के दौर की साम्प्रदायिकता पिछले 70 सालों में बहुत बदल चुकी है और वह फासीवाद की और भी भयानक शक्ल अख्तियार कर चुकी है हमें इसका सामना करने के लिए अपने समय की तमस को रचना होगा।
परिचर्चा में अजय लागू, सुलभा लागू, प्रोफेसर जाकिर हुसैन, संजय वर्मा, जावेद आलम, अर्चिष्मान राजू, आदिल सईद, राजेश पाटिल, सौरभ ने भी शिरकत की।

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

विचारधाराएँ भी सत्ता के चरित्र को परिभाषित करती हैं : सुधीर सुमन

15 अप्रैल, 2018 को मऊभंडार (घाटशिला) में आई.सी.सी. मजदूर यूनियन के हाल में प्रलेसं और भारतीय महिला फेडरेशन की घाटशिला इकाईयों ने संयुक्त रूप से बैठक सह गोष्ठी का आयोजन किया. गोष्टी का विषय था "धर्म और जातीय अंधवाद के दौर में लोकतंत्र की चुनौतियां (सन्दर्भ : संविधान, स्त्री और राष्ट्र)”. बेहद अनौपचारिक तरीके से विषय पर मुक्त रूप से बोलने और बातचीत के अंदाज गोष्ठी चलेगी, ऐसा फॉर्म अनायास ही बन गया था. कुर्सियां गोल घेरे में लगा ली गयीं और बातचीत का आगाज़ हुआ. शेखर मल्लिक ने सूत्रधार का दायित्व ले लिया और भूमिका देते हुए कहा कि आज हम डॉ. आंबेडकर को याद कर रहे हैं. कठुआ और उन्नाव की जघन्य घटनाएँ हमारे समय में घटित हो रही हैं. ये समय किस तरह मानवीयता के प्रतिकूलता का है ! दलितों और हाशिये के समाज और वर्गों की बात नहीं, हिन्दू और अन्य जातियों की बात नहीं... धीरे धीरे ये उन्माद सबको खा जायेगा. रविश कुमार ठीक कहते हैं कि हमारे बच्चे हत्यारे बन रहे हैं या हत्या(रों) के समर्थक ! स्त्रियों की कोई जगह ही नहीं है, वे वस्तुएं हैं. वे राजनीति के लिए इस्तमाल किये जाने वाली डिस्पोजल वस्तुएं हैं ! 
कॉमरेड शशि कुमार ने अपनी बात की शुरुआत इस तरह की कि दुनिया में दो तरह के दर्शन हैं - गिरने का दर्शन, जैसे नीच, अधम और पतित... मिथकों में जैसा जिक्र है कि द्वापर युग, त्रेता युग और कलयुग जिसमें उत्तरोत्तर आदमी और पतित हो जायेगा. दूसरा है वैज्ञानिक दृष्टि कि ज्ञान विज्ञान से प्रगति होगी और समाज को बेहतर बनाया जा सकता है. उनके अनुसार हिंदू धर्म निरंतर गिरते जाने का दर्शन है, जो विभिन्न युगों के माध्यम से यह बताता है कि मनुष्य का निरंतर पतन हो रहा है, जबकि ठीक इसके विपरीत वैज्ञानिक दर्शन है, जो यह बताता है कि मनुष्य ने ज्ञान-विज्ञान के बल पर प्रगति की है, जो यह यह विश्वास जगाता है कि समाज जिस रूप है उसे उससे बेहतर बनाया जा सकता है। अगर हमारे यहाँ राजतन्त्र भी रहा हो तो उसका एक कायदा कानून होना चाहिए. लेकिन हमने देखा है कि सांस्कृतिक रूप से स्त्रियों के साथ हमेशा भेदभाव वाला रवैया ही हमारे यहाँ रहा है. सांस्कृतिक मानसिकता से ही ऊँच नीच का पता चलता है जैसे हमारे यहाँ जो गालियां हैं, वे या तो जाति के नाम से या फिर स्त्री के अंगों से जोड़कर दी जाती हैं।  शूद्रों को (दलितों को) वेद पढ़ना-सुनना निषिद्ध कर दिया गया, सुन लिया तो कानों में पिघला शीशा डाल दो, कंठस्थ कर लिया तो उसकी जीभ चीर दो जैसे सज़ा के प्रावधान तय किए गए।  जब आपने उन्हें (शूद्रों को) अपना माना ही नहीं, तो फिर उस पर अधिकार क्यों जताते हैं ? शशि जी के मत में, ब्राह्मणों से नहीं ब्राह्मणवाद से लड़ना है. उन्होंने कहा कि सब बातों का एक अर्थशास्त्रीय पहलू है, वह विवेचना भी होना लाज़मी है. सचमुच आज विस्फोटक स्थिति है. बाबरी मस्ज़िद गिरी और उधर चुपके से उदारीकरण लागू हो गया. पोखरण में विस्फोट कर सीना चौड़ा करते रहे, उधर मल्टीनेशनल कम्पनियाँ पिछले दरवाजे से घुसा दी गयीं.  सांप्रदायिक, जातिवादी और लैंगिक उत्पीड़न के पीछे मौजूद आर्थिक कारकों की ओर ध्यान दिलाते हुए उन्होंने कहा कि 1991 के बाद देश को सांप्रदायिक आग में झोंककर नई आर्थिक नीति लाई गई, देश की पूरी संपदा पर कब्जा करने की होड़ लग गई। अब तो पूरी राज्यसत्ता भेड़ियों की संस्कृति में तब्दील हो गई है। वह तर्क और विवेक के बजाय अंधआस्था, उन्माद, नृशंसता और भेदभाव को बढ़ावा दे रही है। ऐसे में अलग-अलग उससे लड़ने के बजाए एकजुट होकर लड़ना होगा। दलितों-स्त्रियों-आदिवासियों सबको मनुवादी-ब्राह्मणवादी ताकतों और खुद अपने भीतर मौजूद उसके प्रभावों से लड़ना होगा। टुकड़ों में लड़ाई लड़ने के बजाए संपूर्णता में मानवमुक्ति की लड़ाई लड़नी होगी। जिस तरह के समाज का सपना संविधान निर्माता अंबेडकर ने देखा था, भाजपा तो उसकी विरोधी है ही, दूसरी पूंजीवादी पार्टियां और मायावती या रामविलास पासवान का भी उससे सरोकार नहीं है।
समकालीन जनमत के संपादक सुधीर सुमन ने कहा कि  अगर धर्म का मकसद समाज को बेहतर बनाना है तो वह अलग बात है लेकिन अगर घर्म की आड़ में मनुष्यता छीनी जा रही है, और लोकतंत्र में वह बाधक है तो जरुर उससे लड़ाई है. आज प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि अम्बेडकर न होते तो वे भी न होते. वे ऐसा भी कह सकते थे कि मैं आंबेडकर बनना चाहता था !! लेकिन विडम्बना देखिये कि अम्बेडकर यूँ ही मनुस्मृति के खिलाफ नहीं थे, संविधान बनने के बाद आरएसएस का जो मुखपत्र है ऑर्गेनाज़र, उसने ने लिखा, "स्पार्टा के लायकरगस और पर्शिया के सोलोन से भी पहले, मनु की विधि लिखी जा चुकी थी. आज भी मनुस्मृति में दिए गए उनके कानून पूरी दुनिया की प्रसंशा पाते हैं और लोग उनका पालन करने के लिए तत्पर रहते हैं." तो ये दुःख संविधान बनने के समय है ! आज मनुस्मृति को पढने की बात नहीं है. अपने संस्कारों की जांच करें और मनुस्मृति से मिलाएं. अगर वह मिलता है तो वह खतरनाक है. 
आज कोई कहता है (कठुआ के सन्दर्भ में) कि हादसे को राजनीतिक रंग मत दीजिये. अगर राजनीतिक रंग 'है' तो उस रंग को न दिखाना खतरनाक है. सुधीर सुमन ने कहा कि स्त्री मुक्ति को अंबेडकर जाति उन्मूलन के लिए अत्यंत जरूरी समझते हैं और जाति उन्मूलन को राष्ट्रवाद की बुनियादी शर्त मानते हैं। आजादी के आंदोलन के दौरान डॉ. अंबेडकर, भगतसिंह और प्रेमचंद ने जोर देकर यह सवाल उठाया कि जो नया राष्ट्र होगा, वह किसका राष्ट्र होगा, वह कैसा राष्ट्र होगा? आज जो लोग तिरंगा लेकर नृशंस बलात्कारियों के पक्ष में जुलूस निकाल रहे हैं, जो नफरत, भेदभाव और शोषण-उत्पीड़न पर आधारित सामाजिक व्यवस्था के निर्लज्ज पक्षधर बने हुए हैं, जो धर्म की आड़ लेकर इंसानियत पर कहर ढा रहे हैं और राष्ट्रीयता के नाम पर विभिन्न समुदायों और मेहनतकशों और आदिवासियों के लोकतांत्रिक आधिकारों को रौंद रहे हैं, दमनकारी कानूनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, वे भगत सिंह और अंबेडकर के सपनों की हत्या कर रहे हैं, वे राष्ट्रभक्त नहीं हो सकते।  अंबेडकर स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को लोकतंत्र की बुनियाद मानते थे, उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि 'अगर हिन्दू राज स्थापित होता है तो वह इस देश के लिए एक बहुत बड़ा संकट होगा। हिन्दू चाहे जो भी कहें परंतु यह एक तथ्य है कि हिन्दू धर्म, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिए खतरा है। वह प्रजातंत्र का दुश्मन है। हमें हिन्दू राज को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए।'
 सुधीर सुमन ने उदय प्रकाश की बहुचर्चित कहानी ‘और अंत में प्रार्थना’ के एक संदर्भ के हवाले से कहा कि विचारधाराएं भी सत्ता के चरित्र पर असर डालती हैं।  विचारधाराएँ भी सत्ता के चरित्र को परिभाषित करती हैं. आज भाजपा-आरएसएस के सत्ता पर काबिज होने के बाद अकारण ही दलितों-स्त्रियों-आदिवासियों-अल्पसंख्यकों पर हमले नहीं बढ़ गए हैं. अकारण अवैज्ञानिकता, अंधआस्था और उन्माद को बढ़ावा नहीं मिल रहा है। यह सबकुछ योजनाबद्ध तरीके से हो रहा है। देश की बच्चियां और स्त्रियां इतनी असुरक्षित कभी न थीं, आज किसान ही नहीं नौजवान भी बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं. श्रमिकों को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा हैं। इसके खिलाफ किसान, छात्र-नौजवान, दलित-आदिवासी-अल्पसंख्यक मजदूर सब संघर्ष कर रहे हैं। मौजूदा फासिस्ट निजाम चाहे जितना षड्यंत्र करे, जितना दमन ढाए, उसे एक रोज खत्म होना होगा। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और अंधराष्ट्रवाद की राजनीति के बल पर तानाशाही लंबे समय तक नहीं चलेगी। दुनिया में हिटलर और मुसोलिनी का क्या अंजाम हुआ था, उसे नहीं भूलना चाहिए। 
सुधीर सुमन ने कहा कि भगत सिंह, अंबेडकर, राहुल सांकृत्यायन सरीखे चिंतकों-विचारकों ने राजनैतिक-आर्थिक बदलाव के साथ-साथ भेदभाव पर आधारित सामाजिक ढांचे को बुनियादी रूप से बदलने की बात की थी। इंसान विरोधी धर्म और जाति के क्षय का आह्वान किया था। लेकिन आरएसएस है जो मनुस्मृति के प्रावधानों और वर्णव्यवस्था को कट्टरता से लागू करने की पक्षधर रही है। संविधान में मनुस्मृति के कानूनों को जगह नहीं देने पर उसका विरोध तो था ही, उसने स्त्रियों के लोकतांत्रिक अधिकारों से संबंधित हिंदू कोड बिल का तीव्र विरोध किया था।
ये कौन लोग हैं, एक पुराने समाज को बचाए रखना चाहते हैं ? अम्बेडकर ने 1948 में कानून मंत्री रहते हुए हिन्दू कोड बिल का संशोधित-परिवर्द्धित ड्राफ्ट सदन के सामने रखा, लेकिन लगभग पचास घंटे की बहस के बाद सरकार ने उसे एक साल के लिए ठंढे बस्ते में डाल दिया। बाद में नेहरू ने बीच का रास्ता निकालते हुए कहा कि विवाह और तलाक से संबन्धित 55 धाराओं को पारित करवा लिया जाए, बाकी क़ानूनों को प्रथम आम चुनाव के बाद गठित नई सरकार  द्वारा पारित करवाएगी।लेकिन आखिरकार 55 में से  3 धाराओं को पारित करने पर सहमति बनी, जिससे क्षुब्ध होकर  अंबेडकर ने इस्तीफा दे दिया। इस्तीफ़ा देते हुए उन्होंने कहा था, "वर्गों के बीच, लिंगों के बीच असमानता, जो हिन्दू समाज की आत्मा है, को ज्यों का त्यों अनछुआ छोड़ दिया जाय और आर्थिक समस्याओं से सम्बन्धित कानून दर कानून पास किये जांय, तो इसका मतलब होगा हमारे संविधान का प्रहसन बना देना और गोबर के ढेर पर महल बनाना."
सुधीर जी ने आगे बातचीत में कहा कि कोई भी समाज और कोई भी देश लंबे समय तक उन्माद की स्थिति में नहीं रह सकता. लेकिन बेहतर है कि बहुत ज्यादा गंवाने से पहले उसे होश आ जाए. उसकी तैयारी हमलोगों को करनी है, यही बड़ी चुनौती है. प्राकृतिक संसाधनों की जो भीषण लूट हो रही है, उसके खिलाफ लड़ना होगा। पर्यावरण की रक्षा करनी होगी।  इसकी वजहों को समझाना होगा कि नौजवान और किसान क्यों आत्महत्याएं कर रहे हैं ? क्यों कोई ईश्वर उन्हें नहीं बचा रहा है ? राहुल सांकृत्यायन के उद्धरण का जिक्र करते हुए उन्होने कहा कि  ये समस्याएं, अगर आप मानते हों ईश्वर ने पैदा किया है तो जान लीजिए किसी ईश्वर ने इन्हे नहीं पैदा किया। इन्हें मनुष्यों ने पैदा किया है और मानुषी ही इन्हें हल कर सकते हैं. उन्होंने युवा कवि विहाग वैभव की कविता को उद्धृत किया-
"यह सही समय है,
जगत की पुनर्रचना की
मुनादी पिटवा कर इसी दम
सृष्टि की सभी कार्यवाहियां स्थगित की जांय...
...यह सही समय है मनुष्यता की पुनर्रचना की." 

मतलब पुनर्रचना बहुत जरूरी है. भीषण यथास्थिति में रुका हुआ, दर्शक बना हुआ समाज है. जैसा कि कवि और टीवी प्रोड्यूसर कुबेर दत्त ने अपनी कविताओं में यह संकेत किया था कि टेलीविजन में मौजूद भेड़िये दर्शकों को भेड़ियों में तब्दील कर रहे हैं। 
उन्होंने कहा कि आग लगाने के चंद तीलियाँ भी काफी होती हैं, तो उस आग की जरूरत है इस समाज को, अगर इस समाज को बचना है तो।  क्योंकि बर्बरता या फिर समाजवाद- यही चुनाव है उसके सामने।  जाहिर है हमें बर्बरता के विरुद्ध समाजवाद के विकल्प के लिए संघर्ष करना है। 
 कवियत्री डॉ. सुनीता देवदूत सोरेन ने कहा कि स्त्री को अपनी ताकत पहचाननी होगी. ये सबसे पहली और जरूरी बात है. समाज में औरत को अपनी सोच को आज़ाद करना होगा. संकीर्णताओं से उबरना होगा. आज सत्ता का काम अम्बेडकर को हथियाना है, लेकिन उनकी विचारधारा से इन्हें कोई लेना देना नहीं है. हमारा संविधान एक सम्प्रभुतावादी, पंथ निरपेक्ष संविधान है और आज इसी पर चोट की जा रही है. संविधान की हम बात करें तो इसमें सबके लिए न्याय है, विचार आदि की आज़ादी है. मगर आज वास्तविकता ठीक इसके उलट है. आज हमें (आज की पीढ़ी को) संविधान को जानने की जरूरत है. जो इसे सच्चे अर्थों में जानेगा वह समानता और न्याय की बात करेगा. संकट इस बात का है कि वैधानिक प्रावधानों का महत्त्व और उसकी इफेक्टिव्नेस को समाप्त कर दिया गया है. डॉ. सुनीता ने कहा कि वर्तमान माहौल में संविधान की मूल आत्मा के साथ ही छेड़छाड़ किया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय में भी ऐसे लोग बैठे हैं, जो दलितों-आदिवासियों-अल्पसंख्यकों का दर्द नहीं समझते - जाके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई। संविधान ने हमें भले ही बराबरी का अधिकार दिया हो, पर वह अधिकार हमें हासिल कितना होता रहा है और अब तो स्थिति अधिक खराब होती जा रही थी। हाल के दिनों में दलित-स्त्री-आदिवासी का उत्पीड़न बढ़ा है। इनके लिए बनाए गए तमाम प्रावधानों को निष्प्रभावी बनाया जा रहा है। जहां तक स्त्रियों की बात है, तो अभी भी बराबरी और आजादी उनके लिए दूर की कौड़ी है। उन्हें आगे बढ़कर सोचना होगा कि उन्हें किस तरह के समाज की जरूरत है। वे सही प्रतिनिधि चुनकर भी लोकतंत्र पर मंडरा रहे खतरों से एक हद तक लड़ सकती हैं। 
आज स्त्रियों की बात करें तो वहां जो मर्दों की हिप्पोक्रेसी है, वह घातक है. चुनाव जो लोकतंत्र की आधार तंतु है, उसमें देख लें कि किस प्रकार का लैंगिक भेदभाव और दोहरापन है. असल में पुरुष डोमिनेंस है. वहां अगर महिला चुनाव लड़ रही है, जीत भी गयी है, तब भी निर्णयों पर उसका अधिकार नहीं. वे उसके घर के मर्द द्वारा तय किये जायेंगे ! मर्दों से ही उसका काम संचालित होगा, जैसा कि उसका जीवन. ये एक ‘टर्म’ इधर बहुत प्रचलित है - पी.एम्. यानि 'मुखिया पति'. वास्तविक और अंतिम फैसले यही मुखिया पद पर चुनी गयी स्त्री का पति लेगा, चूँकि स्त्री को तो वह क्षमता ही नहीं है ! स्त्री किसी भी स्तर पर स्वतंत्र नहीं है. यह भयानक बात है. जबकि स्त्रियों को अपनी 'इज्जत' से जोड़कर हिंसा पर उतारू समाज जो करता है, वह गलत है. दलितों और आदिवासियों के शोषण में भी इनकी स्त्रियों का उत्पीड़न बड़ा है और इस ओर देखना होगा.  हम यानि समाज भूल जाता है कि यह स्त्री और पुरुष दोनों से मिलकर बनता है. 
डॉ. सुनीता ने आव्हान स्वरूप दुष्यंत की पंक्तियाँ '... इसी हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए. मेरे दिल में न सही, तुम्हारे दिल में सही. हो कहीं भी आग मगर जलनी चाहिए.' सुनाईं. 
चूँकि यह गोष्ठी मुक्त सत्र की भांति चली अत: श्रोताओं से अपनी बात रखने के लिए आग्रह किया गया और गोष्ठी परस्पर संवाद में बदली तो डॉ. देवदूत सोरेन ने कहा कि ये जो कुछ भी हो रहा है वह भयानक तो है, मगर मैं चाहता हूँ कि इसकी इंतिहा हो जाय. तब लोग खुद जागेंगे और सब पलट जायेगा. इस पर शशि जी ने कहा कि हाँ ये तो ठीक है मगर डर है कि कहीं बहुत ज्यादा खोने के बाद न जगें ! 
सुधीर सुमन ने कहा कि राहुल सांकृत्यायन समाज की कूपमंडूकता के खिलाफ बेहद आक्रामक थे। भगतसिंह ने यथास्थिति के शिकंजे से मुक्ति के क्रांतिकारी भावना की जरूरत पर ज़ोर दिया था। आज लोकतंत्र वाकई खतरे में है, नौकरियां खतरे में हैं. हमारी बच्चियां और स्त्रियाँ खतरे में हैं. 
अंत में श्रोताओं के सवाल लिए गए. युवा छात्र शुभम के मन में कई प्रश्न घुमड़ रहे थे. उसने पूछा कि आज का युवा किधर जाये ? कौन सी विचारधारा और झंडे के नीचे रहे ? आज तो युवाओं के समक्ष निराशा में आत्महत्या जैसी स्थितियां हैं. शुभम को जबाव देते हुए सुधीर सुमन ने कहा कि पहले तो आप टीवी के कंज्यूमर न बनें ! टीवी बस आपको उपभोक्ता बना रहा है. वो देता है आप लेते हैं. अगर जेएनयू का सच जानना है तो जेएनयू में जाकर कुछ दिन रहिये. वो सारा सच सामने आ जाएगा. जेएनयू कैसे बेहतर है, यह समझ जाइएगा। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव से बताया कि एक दफे इलाहाबाद में वाम दलों ने सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ एक संयुक्त कार्यक्रम रखा था और जैसा कि आज हम देख रहे हैं कि वकीलों में भी साम्प्रदायिकता घर कर गयी है. उस सभा में उन्हीं में से किसी ने 'पाकिस्तान जिंदाबाद' कहा. और  वामपन्थियों को देशद्रोही बताते हुए हमला कर दिया. सच तो ये है कि वामपंथी ऐसा नारा लगाने की सोच भी नहीं सकते ! फासिस्ट व्यवस्था से आपको लड़ना पड़ेगा. आप गांधीवादी तरीके से लड़ेंगे तब भी वे हमले करेंगे। आपको दोस्त, खुद खोजना होगा. स्वयं परखो और अपनी राह तय करो। 
कॉमरेड शशि ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि आज नौजवानों को विचार से तय करना होगा. आज जो व्यवस्था है उसमें जो कारण हैं, कारणों में जायेंगे तो सही जगह पहुंचेंगे. समाज कैसा होना चाहिए ? क्या जैसा है वैसा ठीक है? तो फिर खाइये, पीजिये, मौज से रहिये और अगर लगता है कि इसे बेहतर होना चाहिए तो सोचिये कैसे, किस रास्ते से ? वर्तमान समाज को युवा समझें. 
सुधीर सुमन ने कहा कि गाँव में हमारे पड़ोसी मुस्लिम थे. उन्होने मेरा कभी अहित नहीं किया। नब्बे के दशक में मैं  हिन्दुओं से पूछता था कि दुनिया की छोड़ो, क्या तुम्हारे पड़ोसी मुसलमान ने  तुम्हारा कोई अहित किया है. तो वे बोलते थे- नहीं. फिर ? युवा रेशनल बनें. तर्क करें. उजाले और उजाले का छल पहचानें। हम अपने अनुभवों से, संघर्षों से यहाँ पहुंचे हैं. हम आपको कोई बना बनाया रास्ता नहीं दे सकते।  आपको खुद चुनना है.  प्रेमचंद को पढिए, भगत सिंह को पढ़िए. राहुल सांकृत्यायन को पढिए। "राग दरबारी'" ही पढ़िए, जो बहुत रोचक भी है,  तो आप शासकवर्ग के पाखंड और आज की स्थिति समझ जाएंगे।  शशि जी ने पकिस्तान की लेखिका फौजिया सईद के संस्मरण के हवाले से कहा कि उन्होंने लिखा है कि वे लाहौर के वेश्यालयों में गयी तो छेड़ी नहीं गयीं, बदतमीजी का शिकार नहीं हुईं, जबकि वे बेहद खूबसूरत थीं. लेकिन सभ्य शहर में उन्हें पुरुषों के घटियापन का सामना करना पड़ा. तो ये स्थिति है, जिसे समझना है.  

(रिपोर्ट: ज्योति मल्लिक / विशेष इनपुट : सुधीर सुमन)

मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

प्रलेसं के स्थापना दिवस पर प्रलेसं मध्यप्रदेश का आयोजन:रिपोर्ट

8 अप्रैल 2018। इंदौर (मध्य प्रदेश)। प्रगतिशील लेखक संघ के स्थापना दिवस की पूर्व संध्या पर शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर सिमरोल के सागरपैसा गाँव में किसानों, मेहनतकशों और मजदूरों के साथ उनकी समस्या पर परिचर्चा की।

प्रधानमंत्री सड़क योजना को पन्द्रह साल होने को आए हैं लेकिन अभी तक कोई भी सड़क सागरपैसा गाँव नहीं पहुँच सकी। गर्मी आते ही सिमरोल के जंगल सूखे पत्तों से भर जाते हैं। मुख्य सड़क को छोड़कर जब हम इन्हीं जंगलों से होते हुए तकरीबन दस किलोमीटर कच्ची, उबड़-खाबड़ सड़क पर चलते हैं तब जाकर आदिवासी बहुल गाँव सागरपैसा आता है। गाँव के कुछ बाशिंदे आस-पास के बड़े किसानों के यहाँ खेतिहर मजदूरी करते हैं तो कुछ पास के शहरों में मजदूरी।

तेज़ धूप, गर्म हवाएँ, कच्ची सड़क और मोटर साइकिल पर युवा तो तूफान(गाड़ी) में उम्रदराज साथियों का उत्साह। बीच की पीढ़ी नदारत थी लेकिन हम सब दोस्त बन गए थे।
कौन कहता है कि युवा और किशोर अपनी मस्ती में मग्न रहते हैं। हमारे साथ शामिल इन कमसिन उम्र के बाशिंदों को पता था कि वो कहाँ, किस उद्देश्य से और किन लोगों के बीच जा रहे हैं। और उंन्होने अपना किरदार बखूबी निभाया भी।

सफदर हाशमी द्वारा लिखे गीत पढ़ना-लिखना सीखो से जनविकास सोसायटी पालदा के किशोर साथियों ने कार्यक्रम का आगाज़ किया और नुक्कड़ नाटक के जरिए किसानों की समस्याओं पर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश और किसानों की माँगों को लोगों के सामने रखा। और अदम गोंडवी रचित जनगीत "दिल पर रखकर हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है" के बाद गुलरेज खान के निर्देशन में प्रेमचंद की कहानी कफ़न पर नुक्कड़ नाटक वर्चुअल वॉइस के युवाओं द्वारा खेल गया।

कॉ हरिनारायण टेलर, गाँव के मुखिया हँसराजजी और दिनेश के सहयोग से गाँव के विद्यालय के सामने ग्रामवासियों के साथ कॉ एस के दुबे, कॉ कैलाश गोठानिया, कॉ अरविंद पोरवाल, रामआसरे पांडे, केसरीसिंह चिडार, शोभना जोशी, सुलभा लागू, कामना शर्मा, सारिका श्रीवास्तव बातचीत करके उनकी परेशानियों, दिक्कतों से रूबरू हुए।

मंदसौर प्रलेसं से कॉ हरनाम सिंह विशेष रूप से इस परिचर्चा में शामिल होने मंदसौर से आए। उन्होंने मंदसौर किसान आंदोलन की जानकारी देते हुए लोगों को बताया की जब नगदी फसल को लगातार उचित मूल्य नहीं मिला और किसान घाटे में जाने लगे तब उसे सड़क पर आना पड़ा। जिससे राजनीतिक फायदा उठाने के लिए गलत स्वरूप दे दिया गया। जिसे राजनीतिक साजिश रचकर गलत स्वरूप दे दिया गया। जहाँ महाराष्ट्र में इतने सारे किसान संगठित और संयमित रहे वहीं मध्य प्रदेश के मंदसौर का किसान आंदोलन राजनीतिक साजिश का शिकार बना डित गया।

कॉ अरविंद पोरवाल ने किसानों को सम्बोधित कर कहा कि वर्तमान में किसान आंदोलन केवल बड़े किसानों का आंदोलन रह गया है। 85 फीसदी छोटा किसान जो अब किसान न होकर केवल मजदूर रह गया है वो तो केवल अपने खाने लायक अनाज उपजा पाता है। उसे किसान आंदोलन की मांगों से न तो कोई फायदा है और न ही कोई लेना-देना। सागरपैसा गाँव के किसानों की समस्याएँ अच्छी शिक्षा, अच्छी स्वास्थ्य व्यवस्था न होने औऱ बेरोजगारी की है। पानी की कमी से जूझ रहे लोग जो पानी की दिक्कत के कारण एक ही फसल ले पाते हैं उन्हें उचित समर्थन मूल्य के पहले पानी मिलना जरूरी है। जिससे निपटने के लिए एकजुट होकर अपना संघर्ष करना बहुत जरूरी है।

सारिका श्रीवास्तव ने संचालन करते हुए कहा कि हमारा फोकस जमीन पर हक़ के बजाए सहकारिता की खेती पर होना चाहिए। जो सबको बराबरी से काम करना भी सिखाती है। उंन्होने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश में दी गई किसानों की मांगों की जानकारी भी उपस्थित लोगों को दी।

गाँव के मुखिया हँसराज ने सबका स्वागत किया और कॉ हरिनारायण टेलर ने गाँव के इतिहास से अब तक कि जानकारी देते हुए बताया कि यह गाँव 70 के दशक में कम्युनिस्टों ने होलकर स्टेट की जमीन पर 130 आदिवासी परिवारों को बसाकर इस गाँव की नींव डाली थी।

परिचर्चा के बाद कामना शर्मा, सुलभा लागू और सारिका श्रीवास्तव ने महिलाओं से मिलकर लम्बी बातचीत की और उनकी समस्याओं को जाना।
कॉ कैलाश गोठानिया इस गाँव और लोगों से पहले से परिचित थे सो संघर्ष के पुराने दिनों की यादों को ताज़ा कर अपने अधिकारों के लिए पुनः संघर्ष करने को ग्राम वासियों को प्रेरित किया।

वहीं सर्व श्री एस के दुबे, केसरी सिंह चिडार, रामआसरे पांडे, हरनाम सिंह जी ने पुरुषों के साथ संवाद बनाया।

कार्यक्रम के अंत में आभार माना कॉ एस के दुबे और कार्यक्रम का संचालन सारिका ने किया।

सारिका श्रीवास्तव
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