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बुधवार, 9 सितंबर 2020

अवतार सिंह संधू ‘पाश’ की 70 वीं जयंती पर विशेष

09 सितंबर, 2020

पाश : मेरे पिता - विंकल संधू

(मूल अंग्रेजी से अनुवाद - शेखर मल्लिक)

 

हम दोनों का साथ का सफ़र झटके से और क्रूरता से खत्म कर दिया गया. बुधवार, 23 मार्च, 1988 को, खालिस्तानियों के एक समूह ने मेरे पिता की हत्या कर दी. लेकिन, वे कभी पाश के अस्तित्व के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से: उनका विश्वास, विचारधारा और चेतना को छू भी नहीं सके. विंकल संधू (पाश की बेटी) 

विंकल संधू 


बत्तीस साल बाद
, मेरे पिता लोगों के दिलों में रहते हैं और उन्हें प्रेरित करते हैं, बहसों को सुलगाते हैं, विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में शामिल हैं और अक्सर अनुसंधानकर्ताओं की पीएचडी का विषय हैं । आज भी, उनकी कविता युवाओं के जीवन को बदलती है और लडकों और लडकियों को उनके नक्शेकदम पर चलने के लिए प्रेरित करती है । यह कहने की जरूरत नहीं, मुझे इस क्रांतिकारी, ताकतवर, प्रभावशाली, प्रगतिशील और साहसी कवि की बेटी होने का गर्व है ।

मेरा जन्म जनवरी 1981 में तलवंडी सलेम (जालंधर) के एक छोटे से गाँव में हुआ था । वह ऐसा समय था, जब लोग बेटी के जन्म पर आँसू बहाते थे । लेकिन एक मेरे पिता थे - मेरे इस दुनिया में आने का जश्न मनाते, हमारे गाँव में सब को मिठाई बांटते और स्पीकर पर ज़ोर से संगीत बजाते ! उनकी खुशी पर कई लोग हैरान थे, लेकिन सिर्फ वही एक बेटी के जन्म की खूबसूरती, निष्कपटता और मूल्य को और वह एक परिवार में क्या लाती है, इस बात को, समझते थे ।

मैं सात साल की थी, जब वह त्रासदी घटी थी । पहली कक्षा में पढ़ने वाली मैं, मुझे यह महसूस नहीं हुआ कि यह पंजाब के लिए कितना बड़ा नुकसान है । मुझे सिर्फ इतना पता था कि मैं कभी भी अपने पिता की बाहों में दौड़कर नहीं जा पाऊंगी, या उनकी आवाज सुन सकूंगी, हम आपस में अपनी उपलब्धियां साझा कर सकेंगे, या उनके द्वारा दुलारी जा सकूंगी । धीरे-धीरे, यादें फीकी पड़ती गईं । 

ज्यों-ज्यों मैं बड़ी होती गयीमेरे परिवार ने मुझे उन्हें समझने में मदद की । वे कौन थे, एक पिता के रूप में, ज्यादा तो एक लेखक के रूप में । मेरी चाची पम्मी और राजिंदरअजीत और सुच्चा चाचा लोगमेरी माँमेरी दादी और मेरे पिता के कुछ सबसे करीबी दोस्तों - सुरिंदर धनजलचमन लालसुखविंदर कंबोज और अमरजीत चंदनउनमें से कुछ हैं – ने मुझे बताया कि मेरे पिता कैसे थे और आज मैं महसूस करती हूँ कि भले ही वे हमारे साथ नहीं हैमैं उन्हें जानती हूँ । मैं अपने दादा मेजर सोहन सिंह संधू की हमेशा कर्ज़दार हूँजो मेरे पिता के बारे में बताने के लिए मेरे लिए सबसे अच्छे स्त्रोत थे । पापा की मृत्यु के बादवही मेरे लिए पिता की तरह थे ।

पिछले तीन दशकों में, दुनिया भर से मेरे पास लोग आए हैं, यह बताने कि वे मेरे पिता को कितना प्यार और आदर करते है । कहने की जरूरत नहीं कि, इससे मैं बहुत गर्व महसूस करती हूँ, कृतज्ञता से अवाक और उनके सभी उदगारों से स्तब्ध होती हूँ । जब भी मैं तलवंडी सलेम वापस जाती हूँ, तो मुझे हमारे घर में रहने, खेतों को देखने और महसूस करने, जिन खेतों से वे इतना प्यार करते थे, और साधारण ‘पिंडका (ग्राम्य) जीवन जीने, जिसके बारे में उन्होंने लिखा था, में बहुत खुशी मिलती है । मैं इन क्षणों को उनके पोते-पोतियों के साथ बाँटने के लिए उतावली हूँ।

दुनिया भर में जितने भी कविता उत्सवों में मैंने जब भी भाग लिया है, उनमें पाश के लिए एक समर्पित खंड रहता है, और हमेशा एक प्रशंसक, उनमें यकीन करने वाला या उत्साही आदमी मिलता है जो उनकी कविता से जुड़ना चाहता है और उसके नक्शेकदम पर चलना चाहता है । अंतर्राष्ट्रीय पाश मेमोरियल ट्रस्ट जैसे संगठनों और दुनिया भर के रेडियो और टीवी चैनलों ने पाश की कविता को जिंदा रखने में मदद की है।

पाश: नन्हीं विंकल के साथ 

जैसे-जैसे साल बीतते गये, मैंने अपने बच्चों, अरमान और अनायत को उनके दादा के बारे में बताते हुए अपने दादाजी की जगह ले ली, और सुनिश्चित करती हूँ कि वे जानें कि वे वास्तव में कौन थे, उनका महत्व, और वह दुनिया के पढ़ने और अनुभव करने के लिए कितनी ताकतवर कविता पीछे छोड़ गए हैं

यदि वे आज जीवित होते, तो मुझे लगता है कि मेरा परिवार बहुत अलग जीवन जी रहा होता, लेकिन मैं उनके शब्दों और विचारधारा के अनुसार जीने की पूरी कोशिश करती हूँ ।

मेरे पिता की कुछ कविताओं ने मुझे अपने जीवन के कुछ सबसे कठिन फैसलों में राह दिखाई है और मैं हमेशा उनकी कृतज्ञ रहूँगी । उन्होंने मुझे उस महिला के रूप में भी तराशा है, जो मैं आज हूँ । उन्होंने मुझे और मेरी माँ को अपने शब्दों के जरिए जीते जाने की शक्ति दी है ।

मेरे लिविंग रूम में उनका चित्र उनकी कविता “सब तों खतरनाक” के ठीक बगल में टंगा हुआ है । मुझे लगता है कि वह हमें रोज देखते हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि हम किसी को अपने ख्वाबों को नष्ट नहीं करने देंगे । जब हाल ही में एक दुर्गम लगती चुनौती का सामना करना पड़ा, तो इस कविता ने मुझे आगे बढ़ने को सहारा दिया, जैसे मेरे पंखों के तले की हवा बनकर.

उसके नन्हें हाथों को केक काटने में कठनाई हो रही थी. वह मोमबत्तियों को देख दंग रह गयी थी, पहले जलाई और फिर फूंक मारकर बुझा दिया. विंकल एक साल की हुई थी. अड़तीस सर्दियों पहले, पाश ने अपनी बेटी के पहले जन्मदिन पर डायरी में लिखा था. कुछ महीनों बाद, वे खुशी मना रहे थे जिस तरह वह अचानक नये शब्दों को पकड़ने लगी थी. पाश ने इसे उसका मानव भाषा पर पकड़ हासिल करना कहा था.

पाश की कविता राहत और ताकत देती है, आगे जाने की उम्मीद और उर्जा देती है और अगली पीढ़ी को अपना खुद का रास्ता तलाशने के लिए राह दिखाती है. ऐसी ताकतवर और तरक्कीपसंद कविता को स्वीकार  करना, उसका उत्सव मनाना और उसे जिया जाना चाहिए, और ऐसा हुआ है ।

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अवतार सिंह संधू ‘पाश’

जन्म: 9 सितंबर, 1950 । जन्म-स्थान: तलवंडी सलेम नामक गाँव, तहसील नकोदर, जिला जालंधर (पंजाब)। 20 वीं सदी के आठवें और नवें दशक में उभरे पंजाबी के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कवि । नक्सलवाड़ी आन्दोलन से प्रभावित पाश अपनी प्रतिरोध की कविता के लिए जाने जाते हैं. उनकी कविताओं के संग्रह हैं – “लौह कथा” (1970), “उड्डदे बाजाँ मगर” (1974), “साडे समियाँ विच” (1978), लड़ांगे साथी (1988), खिल्लरे होए वर्के. देश – विदेश की अनेक भाषाओँ में पाश की कविताओं का अनुवाद हुआ है. युवा वर्ग के चहेते क्रांतिकारी कवि हैं. 23 मार्च, 1988 को मात्र 38 साल की उम्र में खालिस्तानी अलगाववादियों द्वारा उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी. 

                                


सोमवार, 17 अगस्त 2020

सांस्कृतिक व राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में लोक शाहीर कॉमरेड अण्णाभाऊ साठे

16.08.2020
    अण्णाभाऊ साठे जन्मशती आयोजन 
  प्रलेस - इप्टा, घाटशिला 
(रिपोर्ट)

लोक शाहीर कॉमरेड अण्णाभाऊ साठे की जन्मशती के मौके पर इप्टा और प्रलेस की घाटशिला इकाई ने कॉमरेड अण्णाभाऊ साठे के अवदान और सांस्कृतिक व राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में उनको देखने समझने के लिए, विशेषकर युवा साथियों के बीच इस क्रांतिकारी लोक शाहीर के बारे में जानने, समझने और संघर्ष की लौ सम्भालने के लिए प्रेरित होने के लिए एक ऑनलाइन  विचार गोष्ठी आयोजित की. इस फेसबुक लाइव परिचर्चा में इप्टा की रायगढ़ इकाई के युवा साथी श्याम देवकर, रायपुर इप्टा के बहुत सक्रिय और नाचा-गम्मत लोक-नाट्य शैली की परम्परा को आगे बढ़ाने की मुहीम में निसार अली के साथ महत्वपूर्ण काम कर रहे शेखर नाग, प्रलेस के राष्ट्रीय सचिव कॉम. विनीत तिवारी ने अण्णाभाऊ साठे के इस देश के वंचितों और सर्वहारा वर्ग की राजनीतिक लडाई को सांस्कृतिक मोर्चे पर लड़ने को लेकर अपनी बात रखी. इप्टा की राष्ट्रीय सचिव उषा वैरागकर आठले इस परिचर्चा में अध्यक्षता की. 
(इस पूरी परिचर्चा को आप यूट्यूब पर या इस रिपोर्ट के बिलकुल अंत में दिए गये वीडियो में देख सकते हैं)

श्याम देवकर ने "युवा पीढ़ी के लिए अण्णाभाऊ साठे क्यों?" विषय पर अण्णाभाऊ साठे के जीवन और कला को केन्द्रित कर अपनी बात रखी. उन्होंने अन्ना भाऊ साथे के तीन प्रवास की बात की - मान्गवाड़ से मुम्बई, मुंबई से मास्को. आज की परिस्थिति में मेहनतकश वर्ग जो तकलीफें उठा रहा है, वैसे ही अण्णाभाऊ साठे को भी पेट भरने के लिए महानगर की तरफ जाना पड़ा था. अत: उन्होंने अपने जीवनानुभवों से बहुत कुछ लिखा. आज भी हालात नहीं बदले हैं. अण्णाभाऊ साठे ने कहा था कि 'ये पृथ्वी किसी शेषनाग के माथे पर नहीं है, ये पृथ्वी मेहनतकश, मजदूर, दलित के हाथों पर टिकी है, यानि उनके दम पर चलती है'. रूस यात्रा में वे कितने सरल व्यक्ति की तरह पहुंचे थे, जबकि उनकी ख्याति 'लेनिनग्राद का पोवाडा' के रुसी अनुवाद से वहां तक उनसे पहले पहुँच ही गयी थी.  आज के युवाओं के पास तो अण्णाभाऊ साठे के समय के मुकाबले ज्यादा संसाधन, पहुँच और अच्छे साथियों की संगत उपलब्ध है तो आज के युवाओं को समझ बूझ कर अपनी दिशा तय करनी चाहिए. 

इसके बाद शेखर नाग ने लोक कलाओं की ताकत पर केन्द्रित अण्णाभाऊ साठे के कलाकर्म पर बात की. उन्होंने विस्तार से बताया और 'हाना' लोकगीतों के माध्यम से छत्तीसगढ़ी 'नाचा' में प्रयुक्त लोक गीतों का गायन कर विचारों को सोदाहरण प्रस्तुत किया. उन्होंने कहा कि लोक कलाओं की ताकत बहुत होती है, बशर्ते वह दरबारी न हो, लोक से जुड़ा हुआ और समाज सापेक्ष हो. लोक कलाकर अक्सर कृषक और मजदूर होते हैं. रूस की सरकार ने मराठी रेडियो शुरुआत की थी और अण्णाभाऊ साठे को रशिया में ही रह जाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन अण्णाभाऊ साठे को महसूस करते थे कि भारत में किसानों, मजदूरों को उनकी जरूरत अधिक है, इसलिए वे भारत आ गये. 
शेखर नाग ने कहा कि, लोक कलाओं में प्रतिरोध की जबरदस्त शक्ति होती है और वह सत्ता की नाराजगी से नहीं डरता. वह व्यवस्थाओं को तिलमिला देती हैं. शेखर छत्तीसगढ़ के कई लोक कलाकारों, उड़ीसा के लोक कलाकारों आदि की जानकारी देते हुए आज के वक्त में भी लोक कलाओं के महत्व और प्रभाव पर बोल रहे थे. उन्होंने "पोगा पंडित" नाटक का विशेष उल्लेख किया, जिसके लिए हबीब तनवीर पर हमले भी हुए थे. 

विनीत तिवारी ने कहा कि हमें मराठी प्रान्त के लोक साहित्य और परम्परा को और जाने की जरूरत है. अण्णाभाऊ साठे के बारे में यह होता है कि कम्युनिष्ट उन्हें कम कम्युनिष्ट मानने लगे थे, क्योंकि वे बाद में आंबेडकर के विचारों की तरफ गये. जबकि, अम्बेडकरवादी उन्हें इसलिए अम्बेडकरवादी नहीं मानते कि वे मार्क्सवादी पृष्ठभूमि से आते थे ! यह एक बड़ा कारण है कि उनकी रचनाएँ जो विदेशी भाषा में आ चुकी थीं, लेकिन अंग्रेजी में अनूदित नही हुई थीं. (हिंदी में भी नहीं) तो ये भेदभाव हुआ. पार्टी के भीतर भी हुआ. विनीत तिवारी ने कहा कि अन्ना भाऊ आंबेडकरवाड़ी, दलित  आन्दोलन के साथ कभी भी उस रूप में नहीं थे, क्योंकि यह मानते थे कि दलित आन्दोलन के भीतर अगर हम 'वर्ग' के प्रश्न, 'क्लास-फेक्टर' को नहीं लायेंगे तो केवल 'कास्ट-मूवमेंट' कामयाब नहीं होगा.  ये वो जितना पढ़ा-लिखा था, सीख -समझा था, उसके आधार पर मानते थे.  प्रगतिशील लेखक संघ का यह दायित्व भी है कि अन्ना भाऊ साठे को हिंदी भाषी लोगों तक पहुँचाया जाय.   
उन्होंने कहा कि 'लाल वाबटा कला पथक' के बारे में इतिहास को थोडा सुधार लेना चाहिए. इसमें लोक शाहीर अमर शेख, लोक शाहीर गवाणकर (बुआ) के साथ अन्ना भाऊ साठे शामिल तो थे, लेकिन एक चौथा महत्वपूर्ण व्यक्तित्व भी इनमें शामिल था, जो इन तीनों के साथ जनमानस के बीच जाता था या नहीं, कहना मुश्किल है मगर वह चौथा व्यक्तित्व बलराज साहनी थे, जिन्होंने इन तीनों की खोज की थी.  बलराज साहनी ने मुंबई के परेल इलाके की मिल मजदूरों की चालों में इन लोक कलाकारों को ढूंढ निकला, जिनके अंदर आधुनिक चेतना थी, व्यवस्था के खिलाफ़ गुस्सा था. तो इन लोगों ने बलराज साहनी के साथ जुड़कर कम्युनिज्म और मार्क्सवाद को जाना. 
जबकि ठीक उसी समय आंबेडकर भी सक्रिय थे. तब यह सोचने वाली बात है कि ये सब पहले कम्युनिज्म से क्यों जुड़े, अम्बेडकरवाद से नहीं. ये सब 'मांग' समाज से आते थे. आंबेडकर थे 'महाड' समुदाय के, जो दलितों के भीतर सबसे प्रभावशाली समुदाय है. डॉ. आंबेडकर ने जोर देकर कहा था कि मैं केवल 'महाड' समाज का नेता नहीं हूँ, बल्कि सब दमित शोषित अस्तित्व वालों का लीडर हूँ, दूसरी तरफ 'मांग', 'मातंग' आदि समाजों के नेता आंबेडकर को मानने को तैयार नहीं थे. 
इसके ऐतिहासिक कारण हैं.  इसलिए 'महाड़' के अलावा दूसरी जातियों का समर्थन आंबेडकर को नहीं मिला. अन्ना भाऊ साठे ने देखा कि गाँवों में 'महाड़' और 'मांग' जातियों के बीच भेदभाव था और शहर में दलितों और गैर दलितों के बीच था. दोनों ही स्थितियों में उनके भीतर एक तरह का द्वैत बना रहा कि हमें शायद जाति के और वर्ग के सवाल को साथ लेकर चलना पड़ेगा. और वे इस द्वैत के साथ ईमानदारी से रहे. अण्णाभाऊ ने नैरेटिव की बायनरी को बदला. जाति के मसले के साथ उन्होंने स्त्री-पुरुषों के द्वन्द के नैरेटिव को भी खड़ा किया. और इस प्रक्रिया के भीतर अमीर और गरीब के नारैतिव को कभी छोड़ा ही नहीं. अण्णाभाऊ साठे को याद करते हुए हमें यह याद रखना चाहिए कि एक कलाकार द्वन्द के साथ में रहता है. और उसके सामने जो परिस्थितियां रहती हैं, उसके प्रति वह फैसलाकुन नहीं हो पाता. जैसे फ्रेंज काफ्का. तो वो भी एक कलाकार के लिए एक तरह की ताकत का काम करता है. आजकल जो 'लाल' और 'नीले' को एक साथ मिलाने  की नारेबाजियां हो रही हैं,  इसे अगर आगे ले जाना है, ठोस शक्ल देनी है,  मार्क्सवादी लोग दलितों को ग्राह्य कैसे हों? फिर से कैसे वह माहौल बने जिसमें गवाणकर बुआ, अमर शेख और अन्ना भाऊ साठे जैसे लोग कम्युनिष्ट विचारधारा को ये माने कि जब तक वर्ग की लड़ाई हम साथ में नहीं जोड़ेंगे, तब तक जाति की लडाई अकेले कामयाब नहीं होगी. अण्णाभाऊ साठे को याद करते हुए यह कहना है कि वर्ग की और जाति की समझ को लेकर के, दलितों के और शोषितों के, चाहे वे किसी भी तबके से आने वाले लोग हों, उस आन्दोलन को हमें आगे बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए. 
      

वरिष्ठ रंगकर्मी उषा वैरागकर आठले, जो अण्णाभाऊ साठे की कहानियों और नाटक का अनुवाद कर हिंदी भाषी पाठकों, कलाकारों तक पहुँचा रही हैं, ने कहा कि अण्णाभाऊ साठे का व्यक्तित्व और कृतित्व बहुआयामी था. अण्णाभाऊ साठे को 'मराठी का गोर्की' कहा जाता था. क्योंकि जिस तरह गोर्की ने अपने वर्ग के, अपने लोगों के, दलित-शोषित-पीड़ित लोगों के चरित्रों को रचा, वैसे ही अण्णाभाऊ साठे के साहित्य में भी उसी तरह के पात्र हैं.
इप्टा, प्रलेस और कम्युनिष्ट पार्टी के लिए उन्होंने अपने कई साथियों के साथ बेहद सक्रिय और मुखर भूमिका निभाई. जन चेतना का गाँव-गाँव में प्रसार किया. अण्णाभाऊ साठे ने अपने जीवन में कई तरह के कम किये और उनसे जो अनुभव उन्हें मिले, वो गरीबी, अपमान, दलित होने के, जिससे उनके भीतर इनसे मुक्त होने के लिए प्रतिकार की भावना आई.  माटुँगा लेबर कैम्प के आसपास लेबर रेस्टोरेंट में वे कई कम्युनिष्टों के संपर्क में आये. यह एक बहुकथित बात है कि जिस जगह अण्णाभाऊ साठे रहा करते थे, वह बहुत सीलन भरी, मच्छरों से भरी जगह थी, उन्होंने मच्छर पर  महाराष्ट्र की लोकशैली 'पोवाडा' में लिखा. लेबर रेस्टोरेंट में जब वे इस पोवाडे को सुना रहे थे तो कॉम. पगारे ने सुना और युवा अण्णाभाऊ की आवाज और कथन शैली से, विचार व्यक्त करने के साफ़ तरीके से प्रभावित हुए. उन्हें लगा कि कम्युनिष्ट पार्टी को ऐसे लोगों की सख्त आवश्यकता है, जो लोगों की बात लोगों के बीच जाकर कर सकें. वे अण्णाभाऊ को पार्टी ऑफिस ले आये. इस तरह, माना जाता है कि, अण्णाभाऊ साठे कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े. उनकी लिखी रचनाएँ कम्युनिष्ट पार्टी ने ही सबसे पहले प्रकाशित की थी. अण्णाभाऊ साठे ने सिर्फ पोवाडे, लावणी नहीं लिखे, कम्युनिष्ट पार्टी के लिए जगह जगह भाषण देने का काम ही नहीं किया, पैम्फलेट लिखने, बांटने का काम, प्रचार-प्रसार का काम, उसके लिए अख़बारों में रिपोर्टिंग करने का काम भी किया करते थे. तो कम्युनिष्ट पार्टी के लिए लगभग होल टाइमर जैसी ही स्थिति उन दिनों अण्णाभाऊ साठे की हुआ करती थी.  1944 में 'लाल बावटा कला पथक' में सक्रिय होने से पहले ही वे प्रलेस और इप्टा से जुड़ चुके थे. 1949 में उन्हें इप्टा का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी चुना गया. इप्टा के मंचों से अण्णाभाऊ साठे ने कई प्रसिद्ध नाटक, गीत दिए, जो उनके सामाजिक, राजनितिक और सांस्कृतिक चेतना से ओतप्रोत थे.  उनका एक पूर्णकालिक नाटक 'इनामदार' है, जो इप्टा द्वारा हिंदी में मंचित हुआ, और जिसमें ए.के. हंगल साहब ने अभिनय किया था, भले वह लिखा मराठी में गया था. 
उषा आठले ने विशेषकर 'जाल' कहानी का जिक्र किया, जिसका हिंदी में अनुवाद उन्होंने किया है, कि वर्ग और वर्ण संघर्ष में हमेशा उन्होंने ऐसे चरित्र रचे जो पूरे समाज के सामने उदहारण स्थापित कर सकें.  कहानी में वे दिखाते हैं कि सिर्फ जाति से ही मुक्त होना नहीं, आर्थिक रूप से मजबूत होना भी बेहद जरूरी है. तो इस प्रकार उनकी सांस्कृतिक चेतना के साथ उनकी राजनितिक चेतना का भी पता चलता है. इस राजनितिक चेतना के पीछे उनकी मार्क्सवादी समझ है
आज तमाम प्रगतिशील तबके को जरूरी है कि वे अन्ना भाऊ साठे, उनके व्यक्तित्व-कृतित्व के आयामों को देखते हुए, उनके विचारधारा को समझें कि किस प्रकार वे लोगों से जुड़े हुए थे. अपनी विचारधारा के लिए जमीनी आधार उन्होंने बनाया. उनसे ये सीखने की बहुत आवश्यकता है.
 
संचालन सत्यम ने किया. सत्यम ने कहा कि अण्णाभाऊ साठे और हबीब तनवीर की विरासत जो है, वो क्रांतिकारी भावों को लोगों तक लेकर जाने में हमारी मदद करेगी. इस परिचर्चा में हम अण्णाभाऊ साठे के व्यक्तित्व और रचनाकर्म के विविध आयामों से परिचित हुए.  आज हम समझ रहे हैं कि कैसे अण्णाभाऊ साठे जैसे क्रांतिकारी कलाकार आज के वक्त में पहले से ज्यादा प्रासंगिक हैं. अण्णाभाऊ साठे हों या परसाई, सत्ताधारी फासीवादी भी इनकी एप्रोप्रिएशन चाह रहे हैं. अण्णाभाऊ साठे वर्ग संघर्ष हो चाहे वर्ण संघर्ष हो या लिबरल पहचान की राजनीति हो, उसके खिलाफ एक पुकार हैं.   

रिपोर्ट : ज्योति मल्लिक/ शेखर मल्लिक



शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

विनीत तिवारी : भीष्म साहनी के जन्मशताब्दी वर्ष 2015 में घाटशिला में दिया वक्तव्य

प्रगति लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव मंडल के साथी, "प्रगतिशील वसुधा" के संपादक विनीत तिवारी का भीष्म साहनी के जन्मशताब्दी वर्ष 2015 में घाटशिला प्रलेस द्वारा आयोजित कार्यक्रम "हमारे समय में भीष्म साहनी" में 14 नवंबर, 2015 दिया गया वक्तव्य. नीचे ऑडियो प्लेयर पर आप इस वक्तव्य को सुन और डाउनलोड कर सकते हैं. 


शनिवार, 1 अगस्त 2020

"अंगारे" लिखने वाली रसीद जहां

ज़ाहिद खान

यह सन् 1932 की बात है. उन दिनों एक किताब छपकर आई. नाम था – ‘अंगारे’ और यह सज्जाद ज़हीर, अहमद अली, रशीद जहां और महमूदुज़्ज़फर की नौ कहानियां का संग्रह था, जिसमें एक एकांकी भी शामिल था. सिर्फ़ नाम ही नहीं, किताब की तासीर भी अंगारे की तरह ही साबित हुई. हंगामा खड़ा हो गया और इस क़दर बवंडर मचा कि रशीद जहां को ‘अंगारे वाली’ का ख़िताब देकर उनके ख़िलाफ़ फ़तवे जारी हुए. संयुक्त प्रांत की सरकार ने समाज और अमन के लिए ख़तरा मानकर किताब ज़ब्त कर ली.

हाजरा बेगम ने उस दौर की कैफ़ियत कुछ यूं बयान की है, ‘‘अंगारे शाया करते समय ख़ुद सज्जाद ज़हीर को अंदाज़ा नहीं था कि यह एक नई अदबी राह का संगेमील बन जाएगा. वह ख़ुद तो लन्दन चले गए, लेकिन यहां तहलका मच गया. पढ़ने वालों की मुखालफ़त इस क़दर बढ़ी कि मस्जिदों में रशीद जहां – अंगारे वाली के ख़िलाफ़ वाज होने लगे, फ़तवे दिए जाने लगे और ‘अंगारे’ ज़ब्त हो गई. उस वक्त तो वाकई ‘अंगारे’ ने आग सुलगा दी थी.’’ रशीद जहां के ख़िलाफ़ फ़तवे आए और उन्हें जान से मारने की धमकियां भी मिलीं.

‘अंगारे’ और उसके लेखकों की मुख़ालफ़त ज़रूर हो रही थी मगर उनके तरफ़दार भी थे. बाबा-ए-उर्दू मौलाना अब्दुल हक़, मुंशी दयानारायण निगम भी इन्हीं तरफ़दारों में थे. लोग रशीद जहां को ‘अंगारे’ वाली लेखिका के तौर पर पहचानते और सराहते.

मुंशी दयानारायण निगम ने अपने अख़बार ‘ज़माना’ में लिखा,‘‘चार नौजवान मुसन्निफ़ों ने, जिनमें एक लेडी डॉक्टर भी हैं, अंगारे नाम से अपने दस क़िस्सों को किताबी सूरत में शाए किया. इनमें मौजूदा ज़माने की रियाकारियों पर रौशनी डालने, मुरव्विजा रस्म व रिवाज़ की अन्दरूनी ख़राबियों को बेनक़ाब करने की कोशिश की गई थी. हमारे नाम-निहाद आला तबके की रोजमर्रा मआशत के नकायस का मजहका उड़ाया गया था. गो इस मज्मूए का तर्ज़े बयान अक्सर मकामात पर सूकयाना था, जो मजाके-सलीम को खटकता था. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि नौजवाने-आलम ने दुनिया में जो अलमे-बगावत बलन्द कर रखा है, उसी का एक अदना करिश्मा इस किताब की इशाअत है.’’

उर्दू अदब की धारा बदल देने वाली इस किताब का असर यह हुआ कि कल तक अफ़सानानिगार जिन मसलों पर क़लम नहीं चलाते थे, उन पर भी कहानियां लिखी जाने लगीं. कहानी वर्जित क्षेत्रों में भी दाख़िल हुई.

ये अंगारे वाली रशीद जहां डॉक्टर थीं, अफ़साने और नाटक भी लिखतीं, अख़बारनवीसी के साथ ही समाजी और सियासी कामों में भी मशक़्कत करतीं. और यह वही डॉ. रशीद जहां हैं, जिन्होंने मुल्क में तरक्कीपसंद तहरीक़ की बुनियाद रखने और उसे आगे बढ़ाने में हाथ बंटाया. अपनी 47 साल की ज़िंदगी में उन्होंने कितने ही बेमिसाल कारनामे अंजाम दिए. प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा की वह संस्थापक सदस्य थीं. इन दोनों संगठनों के विस्तार में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. हिन्दी और उर्दू ज़बान के अदीबों, संस्कृतिकर्मियों को इन संगठनों से जोड़ा. संगठन बनाने के सिलसिले में सज्जाद ज़हीर ने शुरूआत में जो यात्राएं कीं, रशीद जहां भी उनके साथ गईं. उन दिनों अदब के जितने बड़े मर्कज़ थे – लखनऊ, इलाहाबाद, पंजाब, लाहौर – सभी जगहों पर लोगों का संगठन की विचारधारा से तआरुफ़ कराया, और नामवर लेखकों को साथ लिया.

25 अगस्त, 1905 को अलीगढ़ में पैदा हुई डॉ. रशीद जहां को तरक्क़ीपसंदी, रौशनख़्याली और इंसानी की आज़ादी के हक़ूक की समझ विरसे में मिली थी. उनके वालिद शैख अब्दुल्ला औरतों की तालीम के बड़े हामी थे. मां वहीद जहां बेगम भी हर क़दम अपने खाविंद के साथ रहतीं. ऐसे माहौल में रशीद जहां की तर्बीयत हुई और इसका असर ताउम्र बना रहा. रशीद जहां ने इस बारे में लिखा है, ‘‘हमने तो जब से होश संभाला, हमारा तो तालीमे-निस्वां का ओढ़ना है और तालीमे-निस्वां का बिछौना.’’

तालीम के साथ-साथ चौदह साल की उम्र से ही मुल्क की आज़ादी के लिए चल रही तहरीकों में उन्होंने दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी थी. शुरूआत में वह महात्मा गांधी से मुतास्सिर हुईं और बाक़ायदा खादी भी पहनी, लेकिन बाद में इस नतीजे पर पहुंचीं कि मार्क्सवादी विचारधारा ही मुल्क के लिए मुफ़ीद है. कांग्रेस में भी एक ऐसा धड़ा था, जो समाजवाद में यक़ीन रखता था. जवाहरलाल नेहरू इस धड़े की नुमाइंदगी करते थे. ऐसी सियासी सरगर्मियों के बीच उनकी तालीम चलती रही. लखनऊ में ‘इज़बेला थाबर्न कॉलेज’ में पढ़ाई के दौरान साइंस की किताबों के साथ उन्होंने तमाम विषयों की किताबें पढ़ीं. ख़ास तौर से अदब उन्हें बहुत भाता. पढ़ते-पढ़ते वह लिखने भी लगीं.

1923 में अठारह साल की उम्र में उन्होंने अपनी पहली कहानी ‘सलमा’ लिखी. यह कहानी अंग्रेज़ी में थी, बाद में उर्दू में भी छपी. कहानी मुस्लिम औरतों के हालात पर सवाल उठाती है, परिवार और समाज में उसकी हालत का सच सामने लेकर आती है. कहानी सिर्फ़ औरत के हालात पर तज़किरा नहीं है, बल्कि वह अपने हालात से बग़ावत भी करती है. 1924 से 1929 तक दिल्ली के ‘लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज’ में रशीद जहां ने एम.बी.बी.एस. किया. इस दरमियान दीगर गतिविधियों से वह बिल्कुल कटी रहीं. लेकिन जैसे ही उनकी पढ़ाई पूरी हुई, फिर अदब और सियासत की ओर लौट आईं.

उनकी ज़िंदगी में नया बदलाव तब आया, जब उनकी मुलाक़ात सज्जाद ज़हीर, महमूदुज़्ज़फर और अहमद अली से हुई. सज्जाद ज़हीर उन दिनों लंदन में तालीम ले रहे थे. छुट्टियों में लखनऊ आए हुए थे. रशीद जहां भी उस वक़्त लखनऊ के एक अस्पताल में नौकरी कर रही थीं. पहली ही मुलाक़ात में सज्जाद जहीर के तरक्कीपसंद ख़्यालों से बेहद मुतास्सिर हुईं और उनके साथ जुड़ गईं. सज्जाद ज़हीर के दिल में महमूदुज़्ज़फर और रशीद जहां के लिए एक ख़ास जगह थी. वह उनके विचारों की बहुत क़द्र करते थे. प्रगतिशील लेखक संघ के गठन के दरमियान इन लोगों के बीच जो लंबे-लंबे बहस-मुवाहिसे हुए, उसने रशीद जहां को एक नया नज़रिया भी दिया. कहानी संग्रह ‘अंगारे’ का जब प्रारुप बना, तो रशीद जहां ने भी इस में अपनी एक कहानी ‘दिल्ली की सैर’ और एक एकांकी ‘पर्दे के पीछे’ शामिल करने की रज़ामंदी दे दी.

दिल्ली की सैर’ छोटी सी कहानी है. कहानी की मुख्य किरदार मलिका का अपने शौहर के साथ दिल्ली की सैर पर न जाने का एलान बग़ावत का छोटा सा इशारा है, हालांकि उस दौर के समाज में यह भी बड़ी बात थी. ‘पर्दे के पीछे’ में पितृसत्तात्मक सोच के ख़िलाफ़ वह और ज्यादा मुखर और आक्रामक हैं. दो महिला क़िरदारों ‘मोहम्मदी बेगम’ और ‘आफ़ताब बेगम’ के आपस के संवाद के जरिए उन्होंने जो कहा, वह उनकी हिम्मत साबित करने और अच्छे-अच्छों के होश उड़ा देने वाला था – ‘‘हर साल हमल, हर साल बच्चा, जोड़ों में दर्द, सूखी छाती, शरीर में थकावट और घर में दिन-रात बीमार बच्चों का कोहराम. लेकिन शौहर को उसका कच्चा गोश्त हर समय चाहिए. नहीं तो वह दूसरी शादी कर लेगा. बच्चा जनते-जनते जिस्म बाहर झुक गया है और डॉक्टरी कराई गई है कि मियां को नई बीबी का लुत्फ मिल सके.’’

कई आलोचक मानते हैं कि ‘अंगारे’ ही वह किताब थी, जिसने प्रगतिशील लेखक संघ का आधार तैयार किया. अंग्रेज़ी हुकूमत के किताब पर पाबंदी लगाने के बाद भी इसके चारों लेखक न तो झुके और न ही इसके लिए उन्होंने कोई माफ़ी मांगी. उलटे इन चारों लेखकों ने अपनी ओर से एक संयुक्त प्रेस वक्तव्य जारी किया, जो उस वक्त इलाहाबाद से निकलने वाले अंग्रेज़ी दैनिक ‘लीडर’ में छपा. वक्तव्य का मजमून इस तरह से था, ‘‘इस किताब के लेखक इस संबंध में किसी प्रकार की क्षमायाचना के इच्छुक नहीं हैं. वे इसे वक्त के सिपुर्द करते हैं. वे किताब के प्रकाशन के परिणामों से बिल्कुल भयभीत नहीं हैं और इसके प्रसार तथा इसी तरह की दूसरी कोशिशों के प्रसार का समर्थन करते हैं. वे कुल रूप में समूची मानवता और विशेष रूप से भारतीय अवाम के लिए महत्वपूर्ण उद्देश्यों के सिलसिले में, आलोचना की आज़ादी तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का खुला समर्थन करते हैं…किताब का या उसके लेखकों का जो भी हस्र हो, हमें यकीन है कि दूसरे लिखने वाले हिम्मत न हारेंगे. हमारा व्यावहारिक प्रस्ताव यह है कि फ़ौरी तौर पर ‘प्रोग्रेसिव राइटर्स लीग’ का गठन किया जाए. जो समय-समय पर इस तरह की रचनाएं अंग्रेज़ी व अन्य भाषाओं में प्रकाशित करे. हम उन तमाम लोगों से जो हमारे विचार से सहमत हों, अपील करते हैं कि वह हमसे राब्ता क़ायम करें और अहमद अली से ख़तो किताबत करें…’’

अपनी तमाम मसरूफियत के बाद भी वह लगातार लिखती रहीं. 1937 में उनका पहला कहानी संग्रह ‘औरत’ छपा. शुरूआती कहानियों कच्चापन ज़रूर नज़र आता है, कहीं-कहीं कोरी भावुकता और नारेबाजी दिखाई देती है, लेकिन जैसे-जैसे ज़िंदगी में नए तजुर्बे होते गए, विचारों में स्थायित्व आया और उनकी कहानी संवरने लगती हैं. बाद में उन्होंने ‘चोर’, ‘वह’, ‘आसिफजहां की बहू’, ‘इस्तखारा’, ‘छिद्दा की मां’, ‘इफ़तारी’, ‘मुजरिम कौन’, ‘मर्द-औरत’, ‘सिफ़र’, ‘ग़रीबों का भगवान’, ‘वह जल गई’, जैसी उम्दा कहानियां लिखीं. उनके अफ़सानों में एक भाव स्थायी है – वह है बग़ावत. बग़ावत – रूढ़ियों से, औरत-मर्द के बीच ग़ैर बराबरी से, सामंती मूल्यों से, अंग्रेज़ी हुकूमत के अत्याचार और शोषण से. रशीद जहां के अफ़साने हों या नाटक, दोनों के महिला क़िरदार काफी मुखर हैं. नाटक ‘औरत’ की नायिका अपने मौलवी शौहर से तेवर के साथ कहती है,‘‘ज़रा संभल कर मैं कहती हूं, बैठ जाओ, अगर अपनी इज़्ज़त की ख़ैर चाहते हो. अगर इस बार तुमने हाथ उठाया, तो मैं ज़िम्मेदार नहीं.’’

उर्दू के आलोचक क़मर रईस का रशीद जहां के अफ़सानों पर ख़्याल है,‘‘तरक्क़ीपसंद अदीबों में प्रेमचंद के बाद रशीद जहां तन्हा थीं, जिन्होंने उर्दू अफ़सानों में समाजी और इंक़लाबी हक़ीकत निगारी की रवायत को मुस्तहकम बनाने की सई की.’’ हाजरा बेग़म लिखती हैं, ‘‘रशीद जहां का कारनामा यह है कि उन्होंने अपनी चन्द कहानियों से अपने बाद लिखने वाली बीसियों लड़कियों और औरतों के दिमाग़ों को मुतास्सिर किया. इस्मत चुगताई, रजिया सज्जाद ज़हीर, सिद्दीका बेगम और न जाने कितनी मुसन्निफा थीं, जिन्होंने रशीद जहां के अफ़सानों, रशीद जहां की ज़िंन्दगी और मशहूरकुन शख़्सियत को मशाले-राह समझा और अपनी तहरीर से उर्दू अदब को नई बुलन्दियों पर पहुंचाया.’’

काग़ज़ी है पैरहन’ में इस्मत चुगताई लिखती हैं, ‘‘ग़ौर से अपनी कहानियों के बारे में सोचती हूं, तो मालूम होता है कि मैंने सिर्फ़ उनकी (रशीद जहां) बेबाक़ी और साफ़गोई को गिरफ़्त में लिया है. उनकी भरपूर समाजी शख़्सियत मेरे क़ाबू न आई. मुझे रोती-बिसूरती, हराम के बच्चे जनती, मातम करती हुई निस्वानियत से हमेशा नफ़रत थी. ख़ामख्वाह की वफ़ा और जुमला खूबियां जो मशरिकी औरतों का जेवर समझी जाती थीं, मुझे लानत महसूस होती है. जज्बातियत से मुझे हमेशा कोफ़्त रही है. इश्क में महबूब की जान को लागू हो जाना, ख़ुदकुशी करना और वावेला करना मेरे मजहब में जायज़ नहीं. यह सब मैंने रशीदा आपा से सीखा है. और मुझे यक़ीन है कि रशीदा आपा जैसी लड़कियां, सौ लड़कियों पर भारी पड़ सकती हैं.’’ चुगताई की यह बात सही भी है. रशीद जहां की बेमिसाल शख़्सियत का औरतों पर ही नहीं, बल्कि कई बड़े रचनाकारों पर भी गहऱा असर पड़ा. प्रेमचंद और यशपाल जैसे बड़े लेखक उनके मुरीद थे. आलोचकों का तो यहां तक मानना है कि प्रेमचंद के ‘गोदान’ में ‘मालती’ और यशपाल के ‘दादा कामरेड’ में ‘शैल’ का क़िरदार रशीद जहां की शख़्सियत से मेल खाता है.

उर्दू अदब में आज हमें जो स्त्री यथार्थ दिखलाई देता है, उसमें रशीद जहां का बड़ा योगदान शामिल है. डॉ. मुल्कराज आनंद से लेकर डॉ. क़मर रईस तक इसमें उनकी महत्वपूर्ण भूमिका मानते थे. प्रोफेसर नूरुल हसन ने रशीद जहां को पहली ऐसी मुस्लिम लेखिका कहा है,‘‘जिन्होंने पहली बार औरत और मजहब के सवाल पर बिना किसी झिझक के अपने ख़्याल बयां किए.’’ सच तो यह है कि रशीद जहां ने अपने अफ़सानों में सिर्फ़ औरत के हालात का ही तजकिरा नहीं किया, बल्कि सामंती और मजहबी बेड़ियों से आज़ादी की पुरज़ोर पैरवी की.

रशीद जहां ने कहानी, एकांकी और नाटक लिखने के अलावा पत्रकारिता भी की. प्रगतिशील लेखक संघ के अंग्रेजी मुख्य पत्र ‘द इंडियन लिट्रेचर’ और सियासी मासिक मैग्ज़ीन ‘चिंगारी’ के संपादन में उन्होंने न सिर्फ सहयोग किया, बल्कि इसमें रचनात्मक अवदान भी किया. किसानों, मजदूरों और कामगारों के अधिकारों के लिए सरकार से मुठभेड़ में वह पीछे नहीं रहतीं. 1948 में रेलवे यूनियन की एक ऐसी ही हड़ताल में शिरकत लेने की वजह से रशीद जहां गिरफ्तार हुईं. कैंसर की मरीज थीं, इसके बावजूद जेल में उन्होंने 16 दिन की लंबी भूख हड़ताल की. जहां कहीं भी नाइंसाफी या जुल्म होता, वह उसका विरोध करतीं. अपनी सेहत से बेपरवाह होकर उन्होंने लगातार काम किया. जिसका नतीजा यह निकला कि उनकी बीमारी और भी बढ़ गई. इस बार उन्हें इलाज के लिए सोवियत संघ भेजा गया. लेकिन 29 जुलाई, 1952 को बीमारी से जूझते हुए मास्को में उनका इंतिकाल हो गया.

तरक्क़ीपसंद तहरीक के लिए रशीद जहां और महमूदुज़्ज़फर का जिस तरह का समर्पण था, उसके बारे में ‘रौशनाई’ में सज्जाद ज़हीर लिखते हैं,‘‘उन दोनों ने अपनी ख़ुदी को भुलाकर इंसानियत को अपनी ज़िन्दगी का मकसद बना लिया था.’’ इस बात की गवाही यह है कि प्रगतिशील आंदोलन और सामाजिक कार्यों में अपनी मसरूफ़ियात के चलते बाद रशीद जहां ने न सिर्फ़ अपनी डॉक्टरी की नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया, बल्कि महमूदुज़्ज़फर के साथ शादी इस शर्त पर की कि वे बच्चे पैदा नहीं करेंगे, क्योंकि इससे उनके सामाजिक कामों में रुकावट आ सकती है.

(लेखक ख्यात स्वतंत्र पत्रकार हैं. प्रगतिशील आंदोलन और इसकी शख्सियतों पर उनकी किताबें शाया हो चुकी हैं. प्रलेस, म.प्र. से जुड़े प्रतिबद्ध साथी हैं.)  

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

यादों की बरात : जोश मलीहाबादी बा-कलम खुद

✍ ज़ाहिद खान

जोश मलीहाबादी का अदबी सरमाया जितना शानदार है, उतनी ही जानदार-ज़ोरदार उनकी ज़िंदगी थी. जोश साहब की ज़िंदगी में गर हमें दाखिल होना हो, तो सबसे बेहतर तरीका यही होगा कि हम उन्हीं की मार्फ़त उसे देखें-सुनें-जानें. जिस दिलचस्प अंदाज़ में उन्होंने ‘यादों की बरात’ में अपनी कहानी बयान की है, उस तरह का कहन देखने-सुनने को कम ही मिलता है. उर्दू में लिखी गई इस किताब का पहला एडिशन 1970 में आया था. तब से इसके कई एडिशन आ चुके हैं, लेकिन पाठकों की इसके जानिब मुहब्बत और बेताबी कम नहीं हुई है.

यादों की बरात’ की मक़बूलियत के मद्देनज़र, कई ज़बानों में इसके तजुर्मे हुए और हर ज़बान के पढ़ने वालों ने इसे पसंद किया. हिन्दी में भी सबसे पहले इसका अनुवाद हिन्दी-उर्दू ज़बान के मशहूर लेखक हंसराज रहबर ने किया. एक अरसे के बाद इसका एक और अनुवाद आया है. इस मर्तबा यह अनुवाद युवा लेखक-अनुवादक नाज़ ख़ान ने किया है. यों अनुवाद के बजाय इसे लिप्यंतरण कहें, तो ज्यादा बेहतर ! उर्दू ज़बान के लबो-लहज़े से ज़रा भी छेड़छाड़ न करते हुए उन्होंने ‘यादों की बरात’ का हिन्दी में जो तर्जुमा किया है, उसे पढ़कर उर्दू की लज़्ज़त आ जाती है. अच्छे अनुवाद की पहचान भी यही है कि मूल ज़बान का लहज़ा बरकरार रहे. वरना ‘मुताबिक’ को भी ‘अनुसार’ कर देने वाले अनुवादक पढ़ने वालों में खीझ ही पैदा करते हैं.

जोश मलीहाबादी ने यह किताब अपनी ज़िंदगी के आख़िरी वक़्त में लिखी थी. आज हम इस किताब के गद्य पर फ़िदा हैं, लेकिन शायर-ए-इंकलाब के लिए यह काम आसान नहीं था. ख़ुद किताब में उन्होंने यह बात तस्लीम की है कि अपने हालाते-ज़िंदगी क़लमबंद करने के सिलसिले में उन्हें छह बरस लगे और चौथे मसौदे में जाकर वे इसे मुकम्मल कर पाए. हांलाकि, चौथे मसौदे से भी वे पूरी तरह से मुतमईन नहीं थे. लेकिन जब किताब आई, तो उसने हंगामा कर दिया.

अपने बारे में इतनी ईमानदारी और साफ़गोई से शायद ही किसी ने इससे पहले लिखा हो. अपनी ज़िंदगी के बारे में वे पाठकों से कुछ छिपाते नहीं लगते. अपने इश्क के ब्योरे भी उन्होंने तफ़्सील से लिखे हैं. अलबत्ता ऐसे नामों का ख़ुलासा करने के वह ज़रूर बचते हैं, और तभी ये नाम उन्होंने ‘कोड वर्ड’ की तरह लिखे हैं – एस.एच., एन. जे., एम. बेगम, आर.कुमारी. 510 पन्नों की यह किताब पांच हिस्सों में बंटी हुई है. पहले हिस्से में जोश की ज़िंदगी के अहम वाक़ये शामिल हैं, तो दूसरे हिस्से में वे अपने ख़ानदान के बारे में बतलाते हैं.

किताब के सबसे दिलचस्प हिस्से वह हैं, जिनमें जोश अपने दोस्त, अपने दौर की अज़ीम हस्तियों और अपनी इश्कबाज़ियों का ख़ुलासा करते हैं. जिन दोस्तों, मसलन अबरार हसन खां ‘असर’ मलीहाबादी, मानी जायसी, ‘फ़ानी’ बदायूंनी, आग़ा शायर कजलबाश, वस्ल बिलगिरामी, कुंवर महेंन्द्र सिंह ‘बेदी’, जवाहरलाल नेहरू, सरोजिनी नायडू, सरदार दीवान सिंह ‘मफ्तूं’, ‘फिराक’ गोरखपुरी, ‘मजाज’ वगैरह का उन्होंने अपनी किताब में ज़िक्र किया है, ख़ुद की जात में वे मामूली हस्तियां नहीं हैं, लेकिन जिस अंदाज़ में जोश उन्हें याद करते हैं, वे कुछ और ख़ास हो जाते हैं. उनकी शख़्सियत और निखर जाती है. उन शख़्सियत को जानने-समझने के लिए दिल और भी तड़प उठता है.

किताब में सरोजनी नायडू का तआरुफ़ वह कुछ इस तरह से कराते हैं, ‘‘शायरी के ख़ुमार में मस्त, शायरों की हमदर्द, आज़ादी की दीवानी, लहज़े में मुहब्बत की शहनाई, बातों में अफ़सोस, मैदाने जंग में झांसी की रानी, अमन में आंख की ठंडक, आवाज़ में बला का जादू, गुफ़्तगू में मौसिक़ी, जैसे-मोतियों की बारिश, गोकुल के वन की मीठी बांसुरी और बुलबुले-हिन्दुस्तान, अगर यह दौर मर्दों में जवाहरलाल और औरतों में सरोजिनी की-सी हस्तियां न पैदा करता, तो पूरा हिन्दुस्तान बिना आंख का होकर रह जाता.’’ (पेज 367)

अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि जोश मलीहाबादी पाकिस्तान क्यों गए? और सिर्फ़ इस एक बिना पर कुछ अहमक उनकी वतनपरस्ती पर सवाल उठाने से भी बाज़ नहीं आते. वे पाकिस्तान क्यों गए? किताब के कुछ अध्याय ‘मुबारकबाद! कांटों का जंगल फिर’, ‘जाना, शाहजादा गुलफ़ाम का, चौथी तरफ और घिर जाना उसका आसेबों के घेरे में’, में जोश मलीहाबादी ने इस सवाल का तफ़्सील से जवाब दिया है. उनके क़रीबी दोस्त सैयद अबू तालिब साहब नकवी चाहते थे कि वे हिन्दुस्तान छोड़कर पाकिस्तान आ जाएं. जब भी जोश मुशायरा पढ़ने पाकिस्तान जाते, वे उनसे इस बात का इसरार करते. आख़िरकार उन्होंने जोश मलीहाबादी के दिल में यह बात बैठा ही दी कि हिन्दुस्तान में उनके बच्चों और उर्दू ज़बान का कोई मुस्तक़बिल नहीं है.

अपनी इस उलझन को लेकर वे मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के पास पहुंचे और इस बाबत उनसे राय मांगी. तो उनका जवाब था,‘‘नकवी ने यह सही कहा है कि नेहरू के बाद आपका यहां कोई पूछने वाला नहीं रहेगा. आप तो आप, ख़ुद मुझे कोई नहीं पूछेगा.’’ (पेज-196) फिर भी उन्होंने उनसे पंडित नेहरू से मिलकर अपना आख़िरी फ़ैसला लेने की बात की. नेहरू ने जब जोश की पूरी बात सुनी, तो वे बेहद दुःखी हुए और उन्होंने उनसे इस मसले पर सोचने के लिए दो दिन की मोहलत मांगी.

दो दिन के बाद जोश जब उनके पास पहुंचे, तो उन्होंने कहा,‘‘जोश साहब, मैंने आपके मामले का एक ऐसा अच्छा हल निकाल लिया है, जिसे आप भी पसंद करेंगे. क्यों साहब, यही बात है न कि आप अपने बच्चों की माली हालात व तहजीबी भविष्य को संवारने और उर्दू ज़बान की ख़िदमत करने के वास्ते पाकिस्तान जाना चाहते हैं?’’ मैंने कहा, ‘‘जी हां, इसके सिवा और कोई बात नहीं हैं.’’ उन्होंने कहा, ‘‘तो फिर आप ऐसा करें कि अपने बच्चों को पाकिस्तानी बना दें, लेकिन आप यहीं रहें और हर साल पूरे चार महीने आप पाकिस्तान में ठहर कर उर्दू की ख़िदमत कर आया करें. सरकारे-हिन्द आपको पूरी तनख़्वाह पर हर साल चार महीने की रुखसत दे दिया करेगी.’’ (पेज-196)

नेहरू का दिल बड़ा था, और वह अपने दोस्त और मुल्क के महबूब शायर को किसी क़ीमत पर खोना नहीं चाहते थे. लेकिन पाकिस्तान के हुक़्मरानों और वहां उनके चाहने वालों को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई और उन्होंने जोश से एक मुल्क चुनने को कहा. और इस तरह से 1955 में जोश मलीहाबादी मजबूरी में पाकिस्तानी हो गए. जोश मलीहाबादी पाकिस्तान जरूर चले गए, मगर इस बात का पछतावा उन्हें ताउम्र रहा. जिस सुनहरे मुस्तक़बिल के वास्ते उन्होंने हिन्दुस्तान छोड़ा था, वह ख़्वाब चंद दिनों में ही टूट गया. उन्होंने पाकिस्तान में जिस पर भी एतबार किया, उससे उन्हें धोखा मिला. और उर्दू की जो हालत पाकिस्तान में है, वह भी सबको मालूम है.

लेकिन पाकिस्तान जाने का फ़ैसला ख़ुद जोश मलीहाबादी का था, लिहाज़ा वह ख़ामोश रहे. वहां घुट-घुट के जिये. पाकिस्तान में रहकर भी हिन्दुस्तान की मुहब्बत में डूबे रहे. चाहकर भी अपने पैदाइशी मुल्क़ को वह कभी नहीं भुला पाए. उनकी बाक़ी ज़िंदगी पाकिस्तान में निराशा और गुमनामी के हाल में बीती. ‘मेरे दौर की चंद अजीब हस्तियां’ किताब में जोश मलीबादी ने उन लोगों पर अपनी क़लम चलाई है, जो अपनी अजीबो-ग़रीब हरकतों और न भुलाई जाने वाली बातों की वजह से उन्हें ताउम्र याद रहे और जब वह क़लम लेकर बैठे, तो उनको पूरी शिद्दत और मज़ेदार ढंग से याद किया. जोश ने किसी क़िस्सागो की तरह इन हस्तियों का ख़ाका इस तरह खींचा है कि तस्वीरें आंखों के सामने तैरने लगती हैं. जैसे विलक्षण क़िरदार, वैसा ही उनका वर्णन. कई क़िरदार तो ऐसे हैं कि पढ़ने के बाद भी यक़ीन नहीं होता कि हाड़-मांस के ऐसे भी इंसान थे, जो अपनी ज़िद और अना के लिए क्या-क्या हरकतें नहीं करते थे!

‘यादों की बरात’ की ताक़त इसकी ज़बान है, जो कहीं-कहीं इतनी शायराना हो जाती है कि शायरी और नज़्म का ही मज़ा देती है. मिसाल के तौर पर सर्दी के मौसम की अक्कासी वे कुछ इस तरह से करते हैं, ‘‘आया मेरा कंवार, जाड़े का द्वार. अहा ! जाड़ा-चंपई, शरबती, गुलाबी जाड़ा-कुंदन-सी दमकती अंगीठियों का गुलज़ार, लचके-पट्टे की रज़ाइयों में लिपटा हुआ दिलदार, दिल का सुरूर, आंखों का नूर, धुंधलके का राग, ढलती शाम का सुहाग, जुलेखा का ख़्वाब, युसुफ का शबाब, मुस्लिम का क़ुरान, हिन्दू की गीता और सुबह को सोने का जाल, रात को चांदनी का थाल.’’ (पेज -49)

यह तो एक बानगी भर है, वरना पूरी किताब इस तरह के लाजवाब जुमलों से भरी पड़ी है. किताब पढ़ते हुए कभी दिल मस्ती से झूम उठता है, तो कभी लबों पर आहिस्ता से मुस्कान आ जाती है. ‘यादों की बरात’ को पढ़ते हुए, यह एहसास होता है कि जैसे हम भी जोश मलीहाबादी के साथ इस बरात में शरीक हो गए हों. हिन्दोस्तान के उस गुज़रे दौर, जब मुल्क़ की आज़ादी की जद्दोजहद अपने चरम पर थी, तमाम हिन्दुस्तानी कद्रें जब अपने पूरे शबाब पर थीं, इन सब बातों को अच्छी तरह से जानने-समझने के लिए, इस किताब को पढ़ने से उम्दा कुछ नहीं हो सकता.

रविवार, 19 जुलाई 2020

स्वास्थ्य का मुद्दा अस्पतालों और डॉक्टरों का ही नहीं, राजनीति का मुद्दा है


कोविड 19 के सन्दर्भ में स्वास्थ्य सेवाओं के राष्ट्रीयकरण पर हुई वेबिनार 

           - राहुल भाईजी 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की मध्यप्रदेश इकाई द्वारा "भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के राष्ट्रीयकरण" विषय पर एक वेबिनार का आयोजन किया गया। वेबिनार का संयोजन जोशी अधिकारी इंस्टीट्यूट आफ सोशल स्टडीज द्वारा किया गया। वेबिनार में डॉ अभय शुक्ला (पुणे) राष्ट्रीय सहसंयोजक, जन स्वास्थ्य अभियान, ने अपनी बात रखते हुए कहा कि वर्ष 1986-87 में भारत की सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं निजी क्षेत्र की तुलना में ज्यादा थी, और 1000 मरीज में 400 मरीज ही  निजी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेते थे। तब से 2020 तक स्थितियां बिल्कुल विपरीत हो गई हैं।  अब बमुश्किल 40 फ़ीसदी  लोग सार्वजानिक स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाते हैं और शेष 60 फ़ीसदी को निजी क्षेत्र के अस्पतालों की शरण लेना पड़ती है। डॉ. अभय शुक्ल ने कहा कि  स्वास्थ्य पर खर्च के मामले में भारत दुनिया के कई मुल्कों के मुक़ाबले में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। भारत में प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर शासन द्वारा खर्च 19 अमेरिकी डॉलर  प्रति वर्ष किया जाता है जो फिलीपींस,  इंडोनेशिया और अफ्रीका जैसे देशों की तुलना में 3 से 4 गुना कम है, वहीं दूसरी ओर समाजवादी देश क्यूबा प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष  883 अमेरिकी डॉलर का खर्च अपने नागरिकों के स्वास्थ्य पर करके सबसे ऊंचे स्तर पर है। वर्ष 2019-20 में भारत में रूपये 1765 प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर औसतन खर्च किया जा रहा था, यानि मात्र रूपये 3.50 प्रति व्यक्ति प्रतिदिन का खर्च। उन्होंने कहा कि सरकार ने जैसे-जैसे सरकारी स्वास्थ्य खर्चों में कटौती करने के साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण को नीतिगत बढ़ावा दिया। देश के कुछ राज्य तो  सिर्फ निजी स्वास्थ्य सेवाओं के हवाले कर दिए गए हैं। जिसके चलते सामान्य स्वास्थ्य सेवाएं खुले बाजार की व्यवस्था में लूट का माध्यम बन गई हैं। स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ गए लोगों के निजी खर्च का नतीजा ये हुआ है कि देश में प्रतिवर्ष लगभग 5.5 करोड़ लोग गरीबी की खाई में गिरते जा रहे हैं।  वर्ष 2005 से 2015 के बीच निजी स्वास्थ्य सेवाओं का व्यापार औसतन तीन गुना बड़ गया। देश के शीर्ष 78 डॉक्टर्स ने एक सर्वे में बताया कि मुनाफाखोरी की चाहत ने निजी संस्थाओं को गैर तार्किक और अनुचित तरीके अपनाने की छूट भी ली जिससे निजी क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाएं बेहद मॅहगी हुई हैं। बहुराष्ट्रीय पूंजी भी इस क्षेत्र में अपनी भागीदारी बड़ाकर देश की जनता को लूटने तेजी से पांव पसार रही हैं। इस तरह सामान्य स्वास्थ्य सेवाएं सरकार द्वारा कारपोरेट घरानों को सौंप दी गईं और चुनी हुई लोकतान्त्रिक सरकारों ने ही देश की जनता को लुटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। निजी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को दवा, उपकरण और स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से देशवासियों को दोनों हाथों से लूटने की आजादी दे दी गई। हाल ही के कोविड महामारी के रोगियों से बड़ी निजी अस्पतालों द्वारा प्रतिदिन का  रुपये 1 लाख  से 4-5  लाख तक का खर्च वसूला जा रहा है। देश के लगभग सभी प्रदेशों में जिला और विकासखंड स्तर पर मौजूद अस्पताल संसाधन विहीन हैं, पर्याप्त स्टाफ, डॉक्टर्स नहीं हैं, जिससे कोरोना से मरने वालों की संख्या बढ़ रही है। सरकार को निजी क्षेत्रों के अस्पतालों में इलाज की कीमतों पर नियंत्रण के लिए सही तरीका इस्तेमाल करना चाहिए ताकि सभी को जीने के अधिकार से वंचित न किया जा सके। साथ ही सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को सुविधा  युक्त बनाने प्रति व्यक्ति का खर्च बढ़ाने चाहिए तो कोरोना महामारी से लड़ा जाना संभव होगा। ताकि उनकी रोजमर्रा की आम स्वास्थ्य से जुड़ी जरूरत पूरी हो सके। इसे मैं राष्ट्रीयकारन नहीं बल्कि सामाजिकीकरण कहना चाहूँगा। 

इंडियन डॉक्टर फॉर पीस एंड डेमोक्रेसी (आइडीपीडी) के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉक्टर अरुण मित्रा (लुधियाना) ने कहा कि स्वास्थ्य और शिक्षा हमारा संवैधानिक अधिकार है जिसे देश प्रत्येक देशवासी को सहजता से उपलब्ध होना चाहिए। देश की सरकार ने आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएं, जन स्वास्थ्य विभाग बनाने के बजाय मुनाफा कमाने वाली कंपनियों को खुली छूट दे रही हैं। सरकार को देश में विकेन्द्रित स्वास्थ्य सेवाएँ सहज रूप से उपलब्ध कराना चाहिए एवं साथ ही निजी क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं का राष्ट्रीयकरण बेहद आवश्यक हो गया है। जैसा कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था जो आज भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए जीवनदायिनी बनकर उभरे हैं, उतना ही महत्वपूर्ण देश के नागरिकों का स्वास्थ्य है। समय की आवश्यकता है कि सभी निजी स्वास्थ्य सेवाओं का राष्ट्रीयकरण हो। उन्होंने बताया कि किस तरह उनके संगठन द्वारा राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं का मुआयना करते हुए पाया गया कि सरकारी नीतियों की खामी के चलते निजी अस्पतालों में एक बहुत बड़े तबके के इलाज ना कर पाने से  उन्हें मौत का सामना करना पड़ता है। देश के राजनीतिक दलों द्वारा स्वास्थ्य एवं शिक्षा  पर कोई ध्यान ना देने से देश की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गई है। वेबीनार को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा आयोजित किये जाने पर उन्होंने खुशी जाहिर की और कहा कि यह बहुत अच्छी बात है कि किसी राजनीतिक दल ने स्वाथ्य सेवाओं को राजनीतिक मुद्दे की तरह देखा है।  स्वास्थ्य सेवाएँ कैसी हों, यह एक राजनीतिक सवाल है और जैसी राजनीती देश पर शासन करेगी, वैसा ही हाल स्वास्थ्य सेवाओं का होगा। उन्होंने यह भी कहा कि स्वास्थ्य का सवाल केवल अस्पतालों और डॉक्टरों से जुड़ा हुआ नहीं है. इसमें बड़ी भूमिका दवा कंपनियों की भी है।  आपको हैरत होगी कि उदारीकरण के दौर में सरकारी क्षेत्र की दवा निर्माण करने वाली कम्पनियाँ बंद कर दी गईं। स्वास्थ्य का सवाल बुनियादी रूप से साफ़ पानी मुहैया करने, उचित सीवेरज व्यवस्था उपलब्ध कराने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने से जुड़ा है।  हमें समाज ऐसा बनाना चाहिए जहाँ लोग ावाल तो बीमार पड़ें ही नहीं और अगर किसी वजह से कोई बीमार पड़े तो उसे ये फ़िक्र न हो कि पैसे कहाँ से आएंगे या डॉक्टर सही इलाज कर रहा है या लूट रहा है। इसके लिए हम सरकार से आइडीपीडी की ओर से राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग बनाने की मांग करते आ रहे हैं। 

डॉक्टर माया वालेचा गुजरात  के भरूच में एक सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता हैं और समाज के गिरते मानवीय मूल्यों और सामाजिक संबंधों को बेहतर बनाने के लिए काम कर रही है। वेबिनार में अपना वक्तव्य रखते हुए उन्होंने कहा कि आज देश की जो स्थिति है उसके पीछे एक वजह राजनीतिक दलों की राजनीतिक इच्छाशक्ति का बेहद कमजोर होना भी है। कोविड महामारी में देश की गरीब जनता, मेहनत करने वाले श्रमिक केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा उपेक्षित हुए हैं। प्रवासी मजदूरों को हजारों किलोमीटर पैदल चलना पड़ा, परंतु रास्ते में स्वास्थ्य केंद्रों के अभाव के चलते कईयों को अपनी जान गवाना पड़ी, जिनमें महिलाओं की दुर्गति किसी से छिपी नहीं है। नीति निर्माताओं ने ऐसे हालात में निजी स्वास्थ्य सेवाओं की कोई जवाबदारी तय नहीं की। देश की बहुमत आबादी को सरकार द्वारा प्रदत्त स्वास्थ्य सेवाओं का कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। कोरोना से बचाव कराने वाले स्वास्थ्य कर्मी, स्वयं की सुरक्षा सामग्री के अभाव में काम करने को मजबूर किए गए। सफाईकर्मियों को जान जोखिम में डालकर काम करने को मजबूर किया गया, स्वास्थ्य कर्मियों को समय पर उनकी तनख्वाह नहीं मिल पाई जिसके चलते कोरोना मरीज उपेक्षा का शिकार होते रहे, परंतु सरकार उनकी समस्याओं की अनदेखी करती रही है। वे कहती हैं कि देश में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भयावह है। जिसे एक चेतनशील राजनीति समाधान से बेहतर किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोविड-19 को अपने व्यापारिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने में बिल गेट्स और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन, जो दुनिया में वैक्सीन के क्षेत्र में काम करने वाला सबसे बड़ा कॉर्पोरेट है, कोविड की वैक्सीन बनाकर मुनाफे की होड़ में हैं। स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का राष्ट्रीयकरण किये बिना, या जिसे सामाजिकीकरण भी कहा जा सकता है, इन सेवाओं को उन्नत नहीं किया जा सकता लेकिन साथ ही राजनीतिक हल की भी बेहद आवश्यकता है। 

कार्यक्रम के संयोजक विनीत तिवारी ने कहा कि बेशक स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सवाल राजनीतिक सवाल हैं इसीलिए हम देख सकते हैं कि जहाँ भी सरकारें जनता के लिए फिक्रमंद हैं, वहाँ कोविड 19 का कहर कम टूटा है।  क्यूबा और वेनेज़ुएला जैसे देशों की स्वास्थ्य सुविधाएँ दुनिया में श्रेष्ठ मानी जाती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बिल गेट्स और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन जब अपने बनाये वैक्सीन का प्रयोग करेगी तब भी गरीब एशियाई और अफ़्रीकी देशों की जनता को ही उनके कहर का शिकार होना पड़ेगा। उन्होंने यह कहा कि  भारत और अमेरिका में एक स्वास्थ्य सम्बन्धी आपदा का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक स्थित्ति को मजबूत करने और आपदा का डर दिखाकर लोगों से विरोध और प्रतिरोध के सभी तरीकों को छीन ेने में किया जा रहा है।  वरवर राव के सन्दर्भ से उन्होंने कोविड 19 की आड़ में सर्कार द्वारा किये जा रहे राजनीतिक दमन को रेखांकित किया और कहा कि राजनीतिक दलों को अनेक मोरचीन पर लड़ना होगा।  सभी वक्ताओं का आभार मानते हुए कहा कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी शिक्षा एवं स्वास्थ्य के सवालों पर सही मायनों में एक ऐसा राजनीतिक दल है जो शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के खिलाफ शुरू से ही रहा है और अपना विरोध दर्ज कराया है। यही वजह है कि आज इस वेबिनार का आयोजन किया गया। मप्र इकाई के पार्टी राज्य सचिव कामरेड अरविंद श्रीवास्तव ने स्वास्थ्य सेवाओं का संज्ञान लेते हुए वक्ताओं के प्रभावशाली  वक्तव्य और प्रस्तुति के लिए धन्यवाद दिया और कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं के राष्ट्रीयकरण के मसले पर  प्रदेश के अन्य संगठनों से बात करने के बाद आंदोलनात्मक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे और स्वास्थ्यकर्मियों को संगठित करके प्रदेश ही नही बल्कि देश की जनता के सामने इस लड़ाई को मजबूत करने का आव्हान किया जाएगा।
वेबिनार हिंदी में था अतः मध्य प्रदेश के साथ ही दिल्ली, गुजरात, बंगाल, पंजाब एवं अन्य हिंदीभाषी राज्यों के उत्सुक और रुचिवान लोग शरीक हुए और सवाल जवाब का दौर भी हुआ। 
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