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गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

अभी मेरा हमसफ़र

अभी मेरा हमसफ़र
मेरे पहलू में मुँह छुपाये सो गया है...

(उसका यह भोला सा भरोसा मुझ पर
किस कदर आश्वस्त करता है -
कि जिंदगी नि:संदेह लाजवाब है !...
एक बार यकीन करके देखो !!!)

केशों के जाले से बिखरे उसके चेहरे पर
रौशनी पर परछाइयों के आड़े-तिरक्षे धारे बनाते हुए...
निर्मल सांसों की हरारत से रह-रह कांपते नथुने...
अधखुले रेशमी होंठ, छू लूँ तो दाग पड़ जायें !
...यह रात का वक्फ़ा... उफ़
लगता है, एक जमाने के लिए ठहर गया है !
उसकी मुंदी पलकों के नीचे
उजली-उजली दो वही आँखें हैं, जो हरदम मुझे
सुख के उजाले देती रहती हैं...बिन कहे...बिन माँगे...
(दुःख कहीं हुआ तो उन आँखों की ताब सह नहीं पाता...)

मेरा तमाम वजूद लंगर डाले उसके घाट पर
ऐसे टिक गया है...
जैसे बहुत भटकते हुए अचानक अपेक्षित पड़ाव
मिल गया हो...

अब इस सर्द रात की ख़ामोश ठण्डी
धुंध के दरम्यान
उसके पूरे जिस्म की खुशनुमाँ गर्माहट से
सिंकता हुआ मैं...
इस सफर-ए-हयात में
इस अजनबी चौराहे पर
एक पुराने लोहे के खम्भे पर
सर को टिकाये,
उसे अपनी बाजुओं में भरे हुए
अपने जिंदा होने का भरपूर उत्सव मना रहा हूँ...

5 टिप्‍पणियां:

  1. केश के अनसुलझे या सुलझे हउवे शंखों से लटके हउवे हमारे खवब और आपकी इस कविता का कोई जवाब नहीं ..........

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  2. आपका ख्वाब .....................काश सच होता । सुंदर रचना ।

    उत्तर देंहटाएं

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