प्यार के शुरूआती दिनों को भरपूर जीओ दोस्त...
क्योंकि सिर्फ़ तब ही होता है,
रहता है पूरी तरह से,
ईमानदार प्यार...
सौ पैसा खांटी खुमार देता प्यार...
किसी बच्ची सा भोला और निश्छल प्यार...
जिसमें कौंधती है, प्यार करने वाले की आत्मा
और उसकी सच्चाई...
तुम्हारी फ़िक्र और परवाह वाकई सचमुच की होती है
तब, सचमुच जरा सी भी दूरी डरा देती है मन को
और बाँहों के घेरे का कसाव असली तड़प लिए होता है...
वह गर्मी भी खालिस होती है जो तपे हुए चेहरे,
सांसों और होठों से नुमांया होती है...
सारी प्रार्थनाएं सीधे कलेजे से निकलती हैं और
सबकुछ लुटाकर भी मजे में रहने वाली आस्था सच्ची होती है...
खेद है कि, फिर ऐसा रह नहीं जाता...
फिर तो सावन भी बरसता है, मगर उसकी आग महसूसती नहीं
साथ चलते हुए भी परछाइयाँ परस्पर लिपटती नहीं...
तुम्हें तड़प कर पुकारने वाली उस आवाज़ की आस में जिंदा रहते हो और
वही एक पुकार फिर आती नहीं...
फिर प्यार ना गाढ़ा, ना जुनूनी, ना विशुद्ध, ना गहरा,
ना किसी आवेग का रह जाता है !
मात्र एक खोखली उम्मीद की मानिंद...
जो एक-दूसरे से बमुश्किल निभ पाता है...!
प्यार को गुना-भाग, जोड़-घटाव...
किसी समीकरण में तौले जाने और
दुनियादार हो जाने से
पहले पूरी तरह से जी लो...
क्योंकि, फिर पलट कर नहीं आता है...
पहले दिनों जैसा प्यार...
फिर अपना-अपना कहते-कहते भी
अपना होने का भ्रम मात्र बनकर रह जाते हैं लोग...
फिर पूरी शिद्दत से
तुम उसी प्यार की कशिश को पाने के लिए
जुझने तो लगोगे...
मगर दोस्त... वह प्यार नहीं मिलेगा
ना फूलों और चाँद पर, ना भरी-पूरी रातों में, ना घर में, ना बगीचों में...
तलाशोगे अगर साथी की आँख में, चेहरे पर, उसकी बातों में...
और शारीरिक भाषा में... हताश होओगे यह पाकर कि
कोई गीली चीज दरम्यान से गायब है...
सिर्फ़ एक पथरीली सी हँसी है, जिसे तुम नहीं पहचानते और
बहुत सारा पानी सूख चुका है !
प्यार अक्सर दिन ढलते जाने पर
उपेक्षात्मक होता जाता है...
सैद्धांतिक रूप से तो...ठीक इसके उलट होना
और आदर्शवादी तौर पर...
ऐसा कतई नहीं होना... चाहिए...
मगर...
होता यही है...
इस पर अफ़सोस करने की हालत में पहुँचने से पहले
खुलकर, डटकर... पूरी मौज के साथ
इस प्यार को जीयो मेरे दोस्त...!
कुछ बातें जो रह जाती हैं कभी मन में, अनकही- अनसुनी... शब्दों के माध्यम से रखी जा सकती हैं,बरक्स... मेरे-तेरे मन की कई बातें... कई सारे अनुभव, कई सारे स्पंदन, कई सारे घाव और मरहम... व्यक्त होते हैं शब्दों के माध्यम से... मेरा मुझी से है साक्षात्कार, शब्दों के माध्यम से... तू भी मेरे मनमीत, है साकार... शब्दों के माध्यम से...
गठरी...
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सोमवार, 25 अक्टूबर 2010
पहले दिनों जैसा प्यार...
लेबल:
कविता,
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रविवार, 24 अक्टूबर 2010
लड़ाई
बहुत साफ़ नहीं कहा था उसने
कि लड़ाई में (अब) तुम भी हो...
यह जो चल रहा है, बकायदा एक जंग है...
और इसमें तुम भी
शामिल हो दिन रात की तरह
जिस जगह अभी मैं हूँ, बहुत जल्द तुम भी वहीँ होगे...
अब तक बेखबर थे... चोट खाते थे...
चोट करने वाले हाथों को पहचानते थे, तो...
अभी अपने औजार - हथियार सब
इकठ्ठे करो... अभी, बिल्कुल इसी समय...
ढोर भी अपने बचाव के लिए सींग मारता है...
लड़ाकू बन जाओ
तुम्हारे सामने विकल्पों की कोई तालिका
नहीं है
और इतनी मोहलत भी नहीं कि
तुम इस युद्ध से
परे कुछ और संभावनाओं को तलाशो...
युद्ध तुम पर सीधे-सीधे थोपा गया है...
और तुमको अपनी आत्मरक्षा का पूरा हक़ है !
क्योंकि डार्विन का सिद्धांत
इसी फलसफे पर था...कि,
वही बचेगा जो
लड़ाई लड़ने, लड़कर जीतने की
सामर्थ्य रखता होगा...
तुम उस तरह के हो जिनके पास
भूख सुलगते हुए अंगार की तरह है
सपने राख की सफेदी हैं
उम्मीदें बर्फ के गट्टे हैं
हरियाली तुम्हारे पैरों के नीचे से खींची जा रही है
और उजाले तुम्हारे आकाश से पोंछ डाले जा रहे हैं...
तुम जितनी दूर देख सकते हो-
समर की जमीन ही देख रहे हो...
तुम्हें हक़ के लिए
प्रेम के लिए और आदमी की तरह जी सकने के लिए,
दुःख जैसा कड़वा काढ़ा
हलक से उतारने के लिए
अपनी भावी पीढ़ियों के वास्ते
बेहतर धरती के लिए... लड़ना ही होगा...
लड़ने के लिए सारी ताकत और सारे इरादे
पुख्ता कर लो...
लड़ो... लड़ो बेदम होने तक
या फिर जीतने तक...
इतना साफ़ नहीं कहा था उसने
यह सब !
सिर्फ़ उसे उस बंद कमरे की तरफ
घसीटे जाते हुए देखकर हमारी चेतना में
एकाएक बिगड़ी हुई मशीन के शोर की तरह
घटने लगा... .खतरे की घंटी सा बजने लगा... यह सब...
कमरा, जो ठीक हमारे सामने था,
की मोटी दीवारों और
मज़बूत लोहे के दरवाजे के पीछे
आध - एक घंटे पहले लाया गया
वह इक्कीस-बाईस साल का लड़का
बुरी तरह पीटा जा रहा था
हम महसूस कर सकते थे कि
उसकी कमर और तलुवों पर
बहुत जोरों से डंडे मारे जा रहे होंगे
इस वक्त उसकी नाक से खून निकल रहा होगा
और बार-बार उसका सिर बालों से पकड़ कर
सीली दीवारों पर मारा जा रहा होगा...
शायद उसकी सब कराहें
अंतिम रूप से पूरी तरह से बंद हो जाने तक
वह इसी तरह बर्बरतापूर्ण ढंग से
पीटा जाने वाला था...
और कड़वी बात यह थी
कि, हममें से हरेक जानता था
कि उसने ऐसा कोई दोष नहीं किया है
कि उसे मार डालने तक
उसके हाथ पीछे बांधकर
नंगा करके, तेल चुपड़ी मोटी लाठियों,
सरकारियो कमरबंदों और घूंसों...
से उसे इतना मारा जाय... उसके नाखून उखाड़े जायं...
यौनांगों को क्षत-विक्षत किया जाय या...
गुदा में पेट्रोल डाला जाय...!
उसने सिर्फ़ इतना कहा था
कि वह उन आदमीनुमा लोगों का
सरमाया है, जिन्हें आदमी मानने
का कोई अधिनियम जारी नहीं हुआ है
जिनकी ज़मीन और जंगल
बहुराष्ट्रीय कंपनियों की अघोषित मिल्कियतें
बना देने की साजिशें रफ़्तार में हैं
जिनकी मिट्टी और पानी छीन गया है...
वह उनके लिए लड़ता है...
और इससे पहले कि वह
अपने कहे हुए की और अधिक व्याख्या करता,
तमाम तथ्यों और आंकड़ों से उसे साबित भी करता...
वह पकड़ा गया था...!
उसने यह सबकुछ बहुत चीख कर भी नहीं कहा था
हम फिर भी सुन पाए थे
हम वहाँ भीड़ की घेरेबंदी की शक्ल में मौजूद थे...
फिर इसके बाद उसकी आवाज हमको लगातार
सुनाई देती रही...
उसकी कराहों और मार की दहला देने वाली
तमाम आवाजों के बरक्स उसकी आवाज
आती रही...
"लड़ाई में अब तुम भी हो..."
वह नौसिखिया सा दिखता लड़का,
जिसकी अभी मूंछें तक कड़ी नहीं हुईं थी
मगर रीढ़ बेशक हो गयी होगी...
हम सिर्फ़ इतना जानते थे कि
वह मर जाने से खौफ नहीं खा रहा था...
और साथियों, अब हम...
(जो अपने को आदमी मानते और समझते हैं...)
उसकी कराहों के पूरी तरह बंद होने से पहले
अपने कन्धों पर एक बोझ सा महसूस कर
तिलमिला उठे हैं...
लड़ाई पता नहीं अब शुरू होगी
या, बहुत पहले से जारी है
जिसमें हमें अब शामिल हो जाना है...
२२-२३-२४/१०/२०१०
कि लड़ाई में (अब) तुम भी हो...
यह जो चल रहा है, बकायदा एक जंग है...
और इसमें तुम भी
शामिल हो दिन रात की तरह
जिस जगह अभी मैं हूँ, बहुत जल्द तुम भी वहीँ होगे...
अब तक बेखबर थे... चोट खाते थे...
चोट करने वाले हाथों को पहचानते थे, तो...
अभी अपने औजार - हथियार सब
इकठ्ठे करो... अभी, बिल्कुल इसी समय...
ढोर भी अपने बचाव के लिए सींग मारता है...
लड़ाकू बन जाओ
तुम्हारे सामने विकल्पों की कोई तालिका
नहीं है
और इतनी मोहलत भी नहीं कि
तुम इस युद्ध से
परे कुछ और संभावनाओं को तलाशो...
युद्ध तुम पर सीधे-सीधे थोपा गया है...
और तुमको अपनी आत्मरक्षा का पूरा हक़ है !
क्योंकि डार्विन का सिद्धांत
इसी फलसफे पर था...कि,
वही बचेगा जो
लड़ाई लड़ने, लड़कर जीतने की
सामर्थ्य रखता होगा...
तुम उस तरह के हो जिनके पास
भूख सुलगते हुए अंगार की तरह है
सपने राख की सफेदी हैं
उम्मीदें बर्फ के गट्टे हैं
हरियाली तुम्हारे पैरों के नीचे से खींची जा रही है
और उजाले तुम्हारे आकाश से पोंछ डाले जा रहे हैं...
तुम जितनी दूर देख सकते हो-
समर की जमीन ही देख रहे हो...
तुम्हें हक़ के लिए
प्रेम के लिए और आदमी की तरह जी सकने के लिए,
दुःख जैसा कड़वा काढ़ा
हलक से उतारने के लिए
अपनी भावी पीढ़ियों के वास्ते
बेहतर धरती के लिए... लड़ना ही होगा...
लड़ने के लिए सारी ताकत और सारे इरादे
पुख्ता कर लो...
लड़ो... लड़ो बेदम होने तक
या फिर जीतने तक...
इतना साफ़ नहीं कहा था उसने
यह सब !
सिर्फ़ उसे उस बंद कमरे की तरफ
घसीटे जाते हुए देखकर हमारी चेतना में
एकाएक बिगड़ी हुई मशीन के शोर की तरह
घटने लगा... .खतरे की घंटी सा बजने लगा... यह सब...
कमरा, जो ठीक हमारे सामने था,
की मोटी दीवारों और
मज़बूत लोहे के दरवाजे के पीछे
आध - एक घंटे पहले लाया गया
वह इक्कीस-बाईस साल का लड़का
बुरी तरह पीटा जा रहा था
हम महसूस कर सकते थे कि
उसकी कमर और तलुवों पर
बहुत जोरों से डंडे मारे जा रहे होंगे
इस वक्त उसकी नाक से खून निकल रहा होगा
और बार-बार उसका सिर बालों से पकड़ कर
सीली दीवारों पर मारा जा रहा होगा...
शायद उसकी सब कराहें
अंतिम रूप से पूरी तरह से बंद हो जाने तक
वह इसी तरह बर्बरतापूर्ण ढंग से
पीटा जाने वाला था...
और कड़वी बात यह थी
कि, हममें से हरेक जानता था
कि उसने ऐसा कोई दोष नहीं किया है
कि उसे मार डालने तक
उसके हाथ पीछे बांधकर
नंगा करके, तेल चुपड़ी मोटी लाठियों,
सरकारियो कमरबंदों और घूंसों...
से उसे इतना मारा जाय... उसके नाखून उखाड़े जायं...
यौनांगों को क्षत-विक्षत किया जाय या...
गुदा में पेट्रोल डाला जाय...!
उसने सिर्फ़ इतना कहा था
कि वह उन आदमीनुमा लोगों का
सरमाया है, जिन्हें आदमी मानने
का कोई अधिनियम जारी नहीं हुआ है
जिनकी ज़मीन और जंगल
बहुराष्ट्रीय कंपनियों की अघोषित मिल्कियतें
बना देने की साजिशें रफ़्तार में हैं
जिनकी मिट्टी और पानी छीन गया है...
वह उनके लिए लड़ता है...
और इससे पहले कि वह
अपने कहे हुए की और अधिक व्याख्या करता,
तमाम तथ्यों और आंकड़ों से उसे साबित भी करता...
वह पकड़ा गया था...!
उसने यह सबकुछ बहुत चीख कर भी नहीं कहा था
हम फिर भी सुन पाए थे
हम वहाँ भीड़ की घेरेबंदी की शक्ल में मौजूद थे...
फिर इसके बाद उसकी आवाज हमको लगातार
सुनाई देती रही...
उसकी कराहों और मार की दहला देने वाली
तमाम आवाजों के बरक्स उसकी आवाज
आती रही...
"लड़ाई में अब तुम भी हो..."
वह नौसिखिया सा दिखता लड़का,
जिसकी अभी मूंछें तक कड़ी नहीं हुईं थी
मगर रीढ़ बेशक हो गयी होगी...
हम सिर्फ़ इतना जानते थे कि
वह मर जाने से खौफ नहीं खा रहा था...
और साथियों, अब हम...
(जो अपने को आदमी मानते और समझते हैं...)
उसकी कराहों के पूरी तरह बंद होने से पहले
अपने कन्धों पर एक बोझ सा महसूस कर
तिलमिला उठे हैं...
लड़ाई पता नहीं अब शुरू होगी
या, बहुत पहले से जारी है
जिसमें हमें अब शामिल हो जाना है...
२२-२३-२४/१०/२०१०
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युवा,
विद्रोह,
हिंदी,
हिंदी कविता,
हिंदी साहित्य
शनिवार, 23 अक्टूबर 2010
सपने हाथी दांत नहीं होते
सपने हाथी दांत नहीं होते,
जिनको बेशकीमती तो कहा जाय...
मगर उन पर
इल्जाम लगे कि महज दिखाने के लिए हैं...
यथार्थ का छद्म सौंदर्य !
जिनके लिए खून बहे तो
कीमतों में तौला जाय...
और बेशर्म खरीद-फरोख्त हो !
सपने
गाढ़े लहू से सींचे गए होते हैं... मेरी दोस्त
सपनों के लिए सजावटी कुर्बानियाँ नहीं दी जातीं
कि जिसे आने वाला वक्त
जज्बातों की प्रदर्शनियों में रखे और
नीलामी के वास्ते बोलियाँ
ऊँचें सुरों में
ज़माने भर की बेहयाइयों के साथ लगायी जायं
हर कदम पर
जितनी दुखी है
मेरी रूह,
जितना टूटा है मेरा बदन
जिस वक्त...
मेरी ईमानदारियों की रौशनी ने तुझे
रास्ता दिखाने की
पुरजोर कोशिश की है...
तकलीफ का पूरा अंधड़
मेरे भीतर से गुजरा है...
और आह मेरी तुम भी सुन नहीं पाई हो...!
हाँ, मेरे सपनों की महक
का नीम अहसास तुम्हें हुआ तो जरूर है !
प्रेम करना और सपने देखना
बहुत आसान है मेरी दोस्त...
सपनों में पकते हुए रिश्ते के लिए ईमानदार होना
उतना ही बड़ा इम्तिहान...
जिससे मैं भी गुजरा हूँ, तुम भी गुजरी हो...
मेरे सपने जिसमें तुम भी शामिल रही हो,
तुम्हारी तरफ वालों के
कायदों और नफा-नुकसान की तमीज से बेखबर
खालिस थे,
और महज़ जिंदा होने की बात किया करते थे...
सौदेबाज़ भी नहीं हुए...
तुमसे दगाबाज़ भी नहीं हुए...
आज उन सपनों को रिश्तों की मानिंद निभाता हूँ
बहुत है कि, सिर्फ़ इसी तरह तुमसे भी जुड़ता हूँ...
जिनको बेशकीमती तो कहा जाय...
मगर उन पर
इल्जाम लगे कि महज दिखाने के लिए हैं...
यथार्थ का छद्म सौंदर्य !
जिनके लिए खून बहे तो
कीमतों में तौला जाय...
और बेशर्म खरीद-फरोख्त हो !
सपने
गाढ़े लहू से सींचे गए होते हैं... मेरी दोस्त
सपनों के लिए सजावटी कुर्बानियाँ नहीं दी जातीं
कि जिसे आने वाला वक्त
जज्बातों की प्रदर्शनियों में रखे और
नीलामी के वास्ते बोलियाँ
ऊँचें सुरों में
ज़माने भर की बेहयाइयों के साथ लगायी जायं
हर कदम पर
जितनी दुखी है
मेरी रूह,
जितना टूटा है मेरा बदन
जिस वक्त...
मेरी ईमानदारियों की रौशनी ने तुझे
रास्ता दिखाने की
पुरजोर कोशिश की है...
तकलीफ का पूरा अंधड़
मेरे भीतर से गुजरा है...
और आह मेरी तुम भी सुन नहीं पाई हो...!
हाँ, मेरे सपनों की महक
का नीम अहसास तुम्हें हुआ तो जरूर है !
प्रेम करना और सपने देखना
बहुत आसान है मेरी दोस्त...
सपनों में पकते हुए रिश्ते के लिए ईमानदार होना
उतना ही बड़ा इम्तिहान...
जिससे मैं भी गुजरा हूँ, तुम भी गुजरी हो...
मेरे सपने जिसमें तुम भी शामिल रही हो,
तुम्हारी तरफ वालों के
कायदों और नफा-नुकसान की तमीज से बेखबर
खालिस थे,
और महज़ जिंदा होने की बात किया करते थे...
सौदेबाज़ भी नहीं हुए...
तुमसे दगाबाज़ भी नहीं हुए...
आज उन सपनों को रिश्तों की मानिंद निभाता हूँ
बहुत है कि, सिर्फ़ इसी तरह तुमसे भी जुड़ता हूँ...
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मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010
हाथी पहाड से जा रहे हैं
अभी कल के अखबार की खबर थी...
"हाथी पहाड से जा रहे हैं."
हाथी जा रहे हैं, अपने सदियों पुराने परम्परागत अरण्य
"दलमा" को छोड़कर...
विराट पहाड़ वाला अपना घर छोड़कर
जहाँ झूमते थे... सकुटुम्ब... मदमस्त, सदियों से...
कैसा लगता होगा हाथियों को अपना विस्थापन !
उजड़ जाना, उखड जाना...
जो कूच कर रहे हैं "दलमा" से
क्या फिर कभी लौटेंगे...
या लौट ही पाएंगे ?
कहते हैं हाथियों की याददाश्त बहुत मजबूत होती है...
उनको क्या याद रहेगा...इस तरह से अपना जाना...
कि जिसकी भूमिका कई सालों पूर्व से ही बनाने लगी थी...
कंक्रीट का जंगल, उनके प्राकृतिक अरण्य को
रौंद कर बढ़ता रहा... बढ़ता रहा... लील गया...
उनका शांतिपूर्ण प्राकृतिक आवास...
क्या याद करेंगे वे कि जब भी वो दोपायों की इस ज्यादातियों
से घबराकर गाँव-शहर की ओर भागे... वहाँ से भी
'आवारा हाथी' की गाली देकर उन्हें खदेड़ा गया...
'जंगली हाथी' के उत्पात के किस्से
बढ़-चढ़कर सुनाये गए और हमेशा उन्हीं को दोषी
बताया गया...
क्या याद रखते हुए, नहीं कल्पेंगे वे
"दलमा" मे अपना वह मुक्त विचरण
अब गूंजेगी शायद ही "दलमा पहाड़" में हाथियों की मुक्त चिंघाड...!
पत्रकार जब पूछता है,
"क्या हाथी लौटेंगे...?"
रादु मुंडा लाचारी से अपने गमछे से
मुँह का पसीना पोंछता हुआ अकबका कर
पहले उसका मुँह देखता है, फिर धीरे से कहता है
"बाबू, हाथी जा रहे हैं..."
सचमुच हाथी जा रहे हैं...
पहाड़ से हाथी जा रहे हैं.
"दलमा" से हाथी जा रहे हैं...
(झारखण्ड के पूर्वी सिंहभूम का प्रसिद्ध दलमा पहाड़ हाथियों का सदियों पुराना अभयारण्य रहा है. हाथियों के प्राकृतिक आवास के नाते ही यह प्रसिद्द है. अब हाथी यहाँ से बंगाल की ओर कूच कर रहे हैं... शहर अपनी पेंगे बढ़ाता हुआ, उनके इस निवास को हड़पता गया और आज वे जा रहे हैं, छोड़ कर दलमा को. किसे फर्क पड़ता है? हाथियों को या फिर रादु मुंडा जैसों को, मगर इनको फर्क पड़ने से भी किसी को क्या फर्क पड़ने वाला है!)
- शेखर मल्लिक
११-१०-२०१०
"हाथी पहाड से जा रहे हैं."
हाथी जा रहे हैं, अपने सदियों पुराने परम्परागत अरण्य
"दलमा" को छोड़कर...
विराट पहाड़ वाला अपना घर छोड़कर
जहाँ झूमते थे... सकुटुम्ब... मदमस्त, सदियों से...
कैसा लगता होगा हाथियों को अपना विस्थापन !
उजड़ जाना, उखड जाना...
जो कूच कर रहे हैं "दलमा" से
क्या फिर कभी लौटेंगे...
या लौट ही पाएंगे ?
कहते हैं हाथियों की याददाश्त बहुत मजबूत होती है...
उनको क्या याद रहेगा...इस तरह से अपना जाना...
कि जिसकी भूमिका कई सालों पूर्व से ही बनाने लगी थी...
कंक्रीट का जंगल, उनके प्राकृतिक अरण्य को
रौंद कर बढ़ता रहा... बढ़ता रहा... लील गया...
उनका शांतिपूर्ण प्राकृतिक आवास...
क्या याद करेंगे वे कि जब भी वो दोपायों की इस ज्यादातियों
से घबराकर गाँव-शहर की ओर भागे... वहाँ से भी
'आवारा हाथी' की गाली देकर उन्हें खदेड़ा गया...
'जंगली हाथी' के उत्पात के किस्से
बढ़-चढ़कर सुनाये गए और हमेशा उन्हीं को दोषी
बताया गया...
क्या याद रखते हुए, नहीं कल्पेंगे वे
"दलमा" मे अपना वह मुक्त विचरण
अब गूंजेगी शायद ही "दलमा पहाड़" में हाथियों की मुक्त चिंघाड...!
पत्रकार जब पूछता है,
"क्या हाथी लौटेंगे...?"
रादु मुंडा लाचारी से अपने गमछे से
मुँह का पसीना पोंछता हुआ अकबका कर
पहले उसका मुँह देखता है, फिर धीरे से कहता है
"बाबू, हाथी जा रहे हैं..."
सचमुच हाथी जा रहे हैं...
पहाड़ से हाथी जा रहे हैं.
"दलमा" से हाथी जा रहे हैं...
(झारखण्ड के पूर्वी सिंहभूम का प्रसिद्ध दलमा पहाड़ हाथियों का सदियों पुराना अभयारण्य रहा है. हाथियों के प्राकृतिक आवास के नाते ही यह प्रसिद्द है. अब हाथी यहाँ से बंगाल की ओर कूच कर रहे हैं... शहर अपनी पेंगे बढ़ाता हुआ, उनके इस निवास को हड़पता गया और आज वे जा रहे हैं, छोड़ कर दलमा को. किसे फर्क पड़ता है? हाथियों को या फिर रादु मुंडा जैसों को, मगर इनको फर्क पड़ने से भी किसी को क्या फर्क पड़ने वाला है!)
- शेखर मल्लिक
११-१०-२०१०
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गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010
अभी मेरा हमसफ़र
अभी मेरा हमसफ़र
मेरे पहलू में मुँह छुपाये सो गया है...
(उसका यह भोला सा भरोसा मुझ पर
किस कदर आश्वस्त करता है -
कि जिंदगी नि:संदेह लाजवाब है !...
एक बार यकीन करके देखो !!!)
केशों के जाले से बिखरे उसके चेहरे पर
रौशनी पर परछाइयों के आड़े-तिरक्षे धारे बनाते हुए...
निर्मल सांसों की हरारत से रह-रह कांपते नथुने...
अधखुले रेशमी होंठ, छू लूँ तो दाग पड़ जायें !
...यह रात का वक्फ़ा... उफ़
लगता है, एक जमाने के लिए ठहर गया है !
उसकी मुंदी पलकों के नीचे
उजली-उजली दो वही आँखें हैं, जो हरदम मुझे
सुख के उजाले देती रहती हैं...बिन कहे...बिन माँगे...
(दुःख कहीं हुआ तो उन आँखों की ताब सह नहीं पाता...)
मेरा तमाम वजूद लंगर डाले उसके घाट पर
ऐसे टिक गया है...
जैसे बहुत भटकते हुए अचानक अपेक्षित पड़ाव
मिल गया हो...
अब इस सर्द रात की ख़ामोश ठण्डी
धुंध के दरम्यान
उसके पूरे जिस्म की खुशनुमाँ गर्माहट से
सिंकता हुआ मैं...
इस सफर-ए-हयात में
इस अजनबी चौराहे पर
एक पुराने लोहे के खम्भे पर
सर को टिकाये,
उसे अपनी बाजुओं में भरे हुए
अपने जिंदा होने का भरपूर उत्सव मना रहा हूँ...
मेरे पहलू में मुँह छुपाये सो गया है...
(उसका यह भोला सा भरोसा मुझ पर
किस कदर आश्वस्त करता है -कि जिंदगी नि:संदेह लाजवाब है !...
एक बार यकीन करके देखो !!!)
केशों के जाले से बिखरे उसके चेहरे पर
रौशनी पर परछाइयों के आड़े-तिरक्षे धारे बनाते हुए...
निर्मल सांसों की हरारत से रह-रह कांपते नथुने...
अधखुले रेशमी होंठ, छू लूँ तो दाग पड़ जायें !
...यह रात का वक्फ़ा... उफ़
लगता है, एक जमाने के लिए ठहर गया है !
उसकी मुंदी पलकों के नीचे
उजली-उजली दो वही आँखें हैं, जो हरदम मुझे
सुख के उजाले देती रहती हैं...बिन कहे...बिन माँगे...
(दुःख कहीं हुआ तो उन आँखों की ताब सह नहीं पाता...)
मेरा तमाम वजूद लंगर डाले उसके घाट पर
ऐसे टिक गया है...
जैसे बहुत भटकते हुए अचानक अपेक्षित पड़ाव
मिल गया हो...
अब इस सर्द रात की ख़ामोश ठण्डी
धुंध के दरम्यान
उसके पूरे जिस्म की खुशनुमाँ गर्माहट से
सिंकता हुआ मैं...
इस सफर-ए-हयात में
इस अजनबी चौराहे पर
एक पुराने लोहे के खम्भे पर
सर को टिकाये,
उसे अपनी बाजुओं में भरे हुए
अपने जिंदा होने का भरपूर उत्सव मना रहा हूँ...
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सोमवार, 13 सितंबर 2010
एक खुबसूरत ख्वाबगाह है उसकी जिंदगी
एक खुबसूरत ख्वाबगाह है उसकी जिंदगी
हकीकतों से इरादतन बेपरवाह है जिसकी जिंदगी
मौत की दस्तक से पहले सफ़र की ख़ामोशी में
सुनाती मासूम सरगोशियाँ सरेराह है जिसकी जिंदगी
हँसाते हँसाते जाने कब रूला भी जाती है उसे यार
बाज वक्त मुस्कानों में भी कराह है जिसकी जिंदगी
घिर गया वह नफीस अंधेरों में पुरजोर इन्तजार के
लुत्फ़-ए-इश्क में ढली बनके आह है जिसकी जिंदगी
अब तो रब ना रकीब ही कोई यहाँ रह गया है उसका
हुई बदनाम सबकी दरम्यान-ए-निगाह है जिसकी जिंदगी
हकीकतों से इरादतन बेपरवाह है जिसकी जिंदगी
मौत की दस्तक से पहले सफ़र की ख़ामोशी में
सुनाती मासूम सरगोशियाँ सरेराह है जिसकी जिंदगी
हँसाते हँसाते जाने कब रूला भी जाती है उसे यार
बाज वक्त मुस्कानों में भी कराह है जिसकी जिंदगी
घिर गया वह नफीस अंधेरों में पुरजोर इन्तजार के
लुत्फ़-ए-इश्क में ढली बनके आह है जिसकी जिंदगी
अब तो रब ना रकीब ही कोई यहाँ रह गया है उसका
हुई बदनाम सबकी दरम्यान-ए-निगाह है जिसकी जिंदगी
शनिवार, 21 अगस्त 2010
एक नदी मुझमें रहती है...
एक नदी मुझमें रहती है...
बहती रहती है मेरे रगों में निरंतर...
छप्...छप्... कल...कल... गुडुप...गुडुप...गुडुप...!
वही नदी मेरे कस्बे की सरहद पर
घुँघरू बजाती हुई छोटी बच्ची की तरह
श्वेत फेनिल झागों को सरकाती हुई नन्हें पैरों से
निरंतर दौड़ती-भागती रहती है...धारावार...
बदली में, धूप में,
कई-कई रूप में !
हाय, वह अल्हड बच्ची...
नदी बतियाती है मुझसे... हौले से कान में...
मकर सक्रांति और छठ के मेले
कब-कब लगेंगे...?
मेरे भीतर हमेशा
एक कंपती हुई नमी बहती है...
स्नेहिल थपकियाँ दे कर ज्यों सुलाती हुई...
नदी, जो एक हमराज भी है...
जिसमें पाँव डाले
हर शाम देर तक बैठता हूँ देर तक...
ढेर सारी बातें किया करता हूँ...
दोनों थोड़े उदास और पास-पास
जब से थोड़ी उम्रदार हो गयी है मेरी ही
उम्र के साथ-साथ... यह नदी,
मुक्त हो कर
सभी वर्जनाओं से जब चाहे जी,
नदी को कसकर गले
लगाता हूँ...
सूरज परली तरफ खड़े पहाड़ों के
पीछे ओट ले लेता है,
भलमनसाहत है उसकी !...
नदी कानों में फुसफुसाकर कहती है...
घर जाओ, देर हो जायेगी
मैं भी उसी किस्म की फुसफुसाहट
से उत्तर देता हूँ, मेरा घर तुम हो...
नदी शरारत के मारे इठला जाती है...
रोज मेरे भीतर हल्की थपेड़ों की आवाजें,
आज़ाद लहरों की किलकारियाँ,
और पनीले जलकुम्भियों की अठखेलियाँ...
मुझमें नदी का विस्तार लिए शामिल हो जाती हैं.
ये नदी मुझसे इतिहास के दिन दोहराए जाती है
वसंत... सावन... शरद... मौसमों को कैसे जिया मैंने,
हुलस-हुलस कर पूछती जाती है,
तब यूँ भोली बनती है
जैसे कुछ जानती ना हो... और,
कभी गुमसुम, कभी खिलखिलाने लगती है.
मैं उदास होता हूँ,
नदी खामोश बह जाती है...
जब रोता हूँ...
नदी छलछला जाती है...
हँसता हूँ...
कहती है, तुम्हारी खुशी को नज़र ना कहीं
लग जाये मेरी !
नदी प्रौढ़ हो जाती है एकाएक...
मेरे साथ ही गूंजती, खिलखिलाती, हँसती है...
समव्यस्का की भांति
मैं कहता हूँ, भावातिरेक में
उत्तेजित हो कर
सुनो, तुम्हारी कोई तस्वीर बनाना चाहता हूँ
वह कहती है, जिस दिन पानी पर रेखाएं रच लेने का
गुर सीख लोगे, बना लेना...!
यह नदी "स्वर्णरेखा"
जिसकी तटों की सुबह और शामें...
लोकप्रिय हैं, सुदूर शहर से आने वाले सैलानियों में
या सरकारी पर्यटन के मानचित्र पर...
जिसकी रेत में से सोने के कण मिलने के मिथक
आज भी सच साबित होते हैं...
क्योंकि एक आदिम जाति के लोग
तलाश लेते हैं, काफ़ी मशक्कत से पोस्ता जैसे कण,
जिसके किनारे ताम्बे का पुराना कारखाना
चूँकि, जिस पर अर्थव्यवस्था
की प्रगति का दारोमदार है...
इसमें अवशिष्ट घोलकर भी निष्कलंक रहता है...,
और जिस पर बने नए चौड़े पुल के बगल में
प्रांतीय मंत्री की स्तुति करता शिलापट्ट लगा है...
लेकिन नदी का तो ये परिचय खांटी अखबारी है !
जबकि मैं कहता हूँ...
असल में, यह नदी मेरी बहुत सगी है...
जैसे, मेरे दुखों में दुख
सुखों में सुख महसूसती हुई...
मेरी अबसे अच्छी सहेली सी ये नदी...
यूं ही नहीं कहता कि,
बस... ये मुझमें रहती है...!
मैं इसमें,
और यह मेरे भीतर
बूढ़ी होती हुई...
१९-२०-२१,अगस्त २०१०
बहती रहती है मेरे रगों में निरंतर...
छप्...छप्... कल...कल... गुडुप...गुडुप...गुडुप...!
वही नदी मेरे कस्बे की सरहद पर
घुँघरू बजाती हुई छोटी बच्ची की तरह
श्वेत फेनिल झागों को सरकाती हुई नन्हें पैरों से
निरंतर दौड़ती-भागती रहती है...धारावार...
बदली में, धूप में,
कई-कई रूप में !
हाय, वह अल्हड बच्ची...
नदी बतियाती है मुझसे... हौले से कान में...
मकर सक्रांति और छठ के मेले
कब-कब लगेंगे...?
मेरे भीतर हमेशा
एक कंपती हुई नमी बहती है...
स्नेहिल थपकियाँ दे कर ज्यों सुलाती हुई...
नदी, जो एक हमराज भी है...
जिसमें पाँव डाले
हर शाम देर तक बैठता हूँ देर तक...
ढेर सारी बातें किया करता हूँ...
दोनों थोड़े उदास और पास-पास
जब से थोड़ी उम्रदार हो गयी है मेरी ही
उम्र के साथ-साथ... यह नदी,
मुक्त हो कर
सभी वर्जनाओं से जब चाहे जी,
नदी को कसकर गले
लगाता हूँ...
सूरज परली तरफ खड़े पहाड़ों के
पीछे ओट ले लेता है,
भलमनसाहत है उसकी !...
नदी कानों में फुसफुसाकर कहती है...
घर जाओ, देर हो जायेगी
मैं भी उसी किस्म की फुसफुसाहट
से उत्तर देता हूँ, मेरा घर तुम हो...
नदी शरारत के मारे इठला जाती है...
रोज मेरे भीतर हल्की थपेड़ों की आवाजें,
आज़ाद लहरों की किलकारियाँ,
और पनीले जलकुम्भियों की अठखेलियाँ...
मुझमें नदी का विस्तार लिए शामिल हो जाती हैं.
ये नदी मुझसे इतिहास के दिन दोहराए जाती है
वसंत... सावन... शरद... मौसमों को कैसे जिया मैंने,
हुलस-हुलस कर पूछती जाती है,
तब यूँ भोली बनती है
जैसे कुछ जानती ना हो... और,
कभी गुमसुम, कभी खिलखिलाने लगती है.
मैं उदास होता हूँ,
नदी खामोश बह जाती है...
जब रोता हूँ...
नदी छलछला जाती है...
हँसता हूँ...
कहती है, तुम्हारी खुशी को नज़र ना कहीं
लग जाये मेरी !
नदी प्रौढ़ हो जाती है एकाएक...
मेरे साथ ही गूंजती, खिलखिलाती, हँसती है...
समव्यस्का की भांति
मैं कहता हूँ, भावातिरेक में
उत्तेजित हो कर
सुनो, तुम्हारी कोई तस्वीर बनाना चाहता हूँ
वह कहती है, जिस दिन पानी पर रेखाएं रच लेने का
गुर सीख लोगे, बना लेना...!
यह नदी "स्वर्णरेखा"
जिसकी तटों की सुबह और शामें...
लोकप्रिय हैं, सुदूर शहर से आने वाले सैलानियों में
या सरकारी पर्यटन के मानचित्र पर...
जिसकी रेत में से सोने के कण मिलने के मिथक
आज भी सच साबित होते हैं...
क्योंकि एक आदिम जाति के लोग
तलाश लेते हैं, काफ़ी मशक्कत से पोस्ता जैसे कण,
जिसके किनारे ताम्बे का पुराना कारखाना
चूँकि, जिस पर अर्थव्यवस्था
की प्रगति का दारोमदार है...
इसमें अवशिष्ट घोलकर भी निष्कलंक रहता है...,
और जिस पर बने नए चौड़े पुल के बगल में
प्रांतीय मंत्री की स्तुति करता शिलापट्ट लगा है...
लेकिन नदी का तो ये परिचय खांटी अखबारी है !
जबकि मैं कहता हूँ...
असल में, यह नदी मेरी बहुत सगी है...
जैसे, मेरे दुखों में दुख
सुखों में सुख महसूसती हुई...
मेरी अबसे अच्छी सहेली सी ये नदी...
यूं ही नहीं कहता कि,
बस... ये मुझमें रहती है...!
मैं इसमें,
और यह मेरे भीतर
बूढ़ी होती हुई...
१९-२०-२१,अगस्त २०१०
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