गठरी...

25 मई (1) ३१ जुलाई (1) अण्णाभाऊ साठे जन्मशती वर्ष (1) अभिव्यक्ति की आज़ादी (3) अरुंधती रॉय (1) अरुण कुमार असफल (1) आदिवासी (2) आदिवासी महिला केंद्रित (1) आदिवासी संघर्ष (1) आधुनिक कविता (3) आलोचना (1) इंदौर (1) इंदौर प्रलेसं (9) इप्टा (4) इप्टा - इंदौर (1) इप्टा स्थापना दिवस (1) उपन्यास साहित्य (1) उर्दू में तरक्कीपसंद लेखन (1) उर्दू शायरी (1) ए. बी. बर्धन (1) एटक शताब्दी वर्ष (1) एम् एस सथ्यू (1) कम्युनिज़्म (1) कविता (40) कश्मीर (1) कहानी (7) कामरेड पानसरे (1) कार्ल मार्क्स (1) कार्ल मार्क्स की 200वीं जयंती (1) कालचिती (1) किताब (2) किसान (1) कॉम. विनीत तिवारी (6) कोरोना वायरस (1) क्यूबा (1) क्रांति (3) खगेन्द्र ठाकुर (1) गज़ल (5) गरम हवा (1) गुंजेश (1) गुंजेश कुमार मिश्रा (1) गौहर रज़ा (1) घाटशिला (3) घाटशिला इप्टा (2) चीन (1) जमशेदपुर (1) जल-जंगल-जमीन की लड़ाई (1) जान संस्कृति दिवस (1) जाहिद खान (2) जोश मलीहाबादी (1) जोशी-अधिकारी इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज (1) ज्योति मल्लिक (1) डॉ. कमला प्रसाद (3) डॉ. रसीद जहाँ (1) तरक्कीपसंद शायर (1) तहरीर चौक (1) ताजी कहानी (4) दलित (2) धूमिल (1) नज़्म (8) नागार्जुन (1) नागार्जुन शताब्दी वर्ष (1) नारी (3) निर्मला पुतुल (1) नूर जहीर (1) परिकथा (1) पहल (1) पहला कविता समय सम्मान (1) पाश (1) पूंजीवाद (1) पेरिस कम्यून (1) प्रकृति (3) प्रगतिशील मूल्य (2) प्रगतिशील लेखक संघ (4) प्रगतिशील साहित्य (3) प्रगतिशील सिनेमा (1) प्रलेस (2) प्रलेस घाटशिला इकाई (5) प्रलेस झारखंड राज्य सम्मेलन (1) प्रलेसं (12) प्रलेसं-घाटशिला (3) प्रेम (17) प्रेमचंद (1) प्रेमचन्द जयंती (1) प्रो. चमन लाल (1) प्रोफ. चमनलाल (1) फिदेल कास्त्रो (1) फेसबुक (1) फैज़ अहमद फैज़ (2) बंगला (1) बंगाली साहित्यकार (1) बेटी (1) बोल्शेविक क्रांति (1) भगत सिंह (1) भारत (1) भारतीय नारी संघर्ष (1) भाषा (3) भीष्म साहनी (3) मई दिवस (1) महादेव खेतान (1) महिला दिवस (1) महेश कटारे (1) मानवता (1) मार्क्सवाद (1) मिथिलेश प्रियदर्शी (1) मिस्र (1) मुक्तिबोध (1) मुक्तिबोध जन्मशती (1) युवा (17) युवा और राजनीति (1) रचना (6) रूसी क्रांति (1) रोहित वेमुला (1) लघु कथा (1) लेख (3) लैटिन अमेरिका (1) वर्षा (1) वसंत (1) वामपंथी आंदोलन (1) वामपंथी विचारधारा (1) विद्रोह (16) विनीत तिवारी (2) विभाजन पर फ़िल्में (1) विभूति भूषण बंदोपाध्याय (1) व्यंग्य (1) शमशेर बहादुर सिंह (3) शेखर (11) शेखर मल्लिक (3) समकालीन तीसरी दुनिया (1) समयांतर पत्रिका (1) समसामयिक (8) समाजवाद (2) सांप्रदायिकता (1) साम्प्रदायिकता (1) सावन (1) साहित्य (6) साहित्यिक वृतचित्र (1) सीपीआई (1) सोशल मीडिया (1) स्त्री (18) स्त्री विमर्श (1) स्मृति सभा (1) स्वास्थ्य सेवाओं का राष्ट्रीयकरण (1) हरिशंकर परसाई (2) हिंदी (42) हिंदी कविता (41) हिंदी साहित्य (78) हिंदी साहित्य में स्त्री-पुरुष (3) ह्यूगो (1)

सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

कहानी और कविता शिविर - प्रलेसं (मध्य प्रदेश)



रिपोर्ट - दमोह में कहानी शिविर
गोरिल्ला लड़ाई की तरह है कहानी - रमाकान्त श्रीवास्तव 
- सुसंस्कृति परिहार
---------------------------------------------------------------
दमोह। कहानीकारों ने अपना कार्य ईमानदारी से करते हुए अपने समय को कहानियों में जिन्दा रखा है। आज जब सामाजिक मूल्य नष्ट होने की कगार पर हैं तब कहानी का दायित्व और कहानी की आवश्यकता समाज में अधिक है। सामाजिक यथार्थ और सत्यान्वेषण कहानी की जरूरत है। आज की कहानी गोरिल्ला लड़ाई की तरह है जो अपने साथ विपक्ष को शामिल करती हुई उस पर प्रहार करती है उक्त उदगार ख्यात कथा लेखक रमाकान्त श्रीवास्तव ने प्रगतिशील लेखक संघ इकाई दमोह द्वारा आयोजित दो दिवसीय प्रदेश स्तरीय कहानी कार्यशाला में कहानी और समाज पर केन्द्रित विचार - विमर्श के तहत प्रदेश के नवरचनाकारों को सम्बोधित करते हुये अभिव्यक्त किए ।
                इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुये कहानीकार सुबोध श्रीवास्तव ने स्पष्ट किया कि दमोह में उनके कथा लेखन की जड़ है ।यहाँ कथा का अपना इतिहास है ।आज समाज हाशिये पर पहुँचने की स्थिति में है ऐसे हालात में कहानी कार का दायित्व बनता है कि वे अपनी कहानियों के जरिए विसंगतियों के साथ निराकरण को भी सामने लायें क्योंकि कहानी अपने समय का ऐतिहासिक दस्तावेज़ होती है ।
         इस विमर्श में कहानीकार दिनेश भट्ट (छिंदवाड़ा), अनिल अयान (सतना), संजीव माथुर (ग़ाज़ियाबाद) ,दीपा भट्ट (सागर),अनुपम दाहिया (सतना), अक्षय जैन, एवं अमर सिंह ने हस्तक्षेप करते हुए कई अहम् सवाल उठाकर अपनी व् शिविरार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया ।
                इस विमर्श से पूर्व स्वागत भाषण में अध्यक्ष सुसंस्कृति परिहार ने यथार्थवादी प्रथम कहानी "टोकरी भर मिट्टी" के लिये जाने वाले लेखक श्री माधव प्रसाद सप्रे की इस माटी में रचनाकारों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि पहले की कहानियाँ निद्रा में ले जातीं थीं आज वे जगाने का काम करती हैं। उद्घाटन भाषण देते हुए प्रलेसं दमोह संस्थापक अध्यक्ष सत्मोहन वर्मा ने कथा परम्परा पर अपने विचार रखते हुये कार्यशाला को जरूरी बताया ।
               दूसरे चरण में कहानी की विषय वस्तु और शिल्प पर व्याख्यान युवा कथाकार दिनेश भट्ट ने दिया । श्री भट्ट का मानना था कि कहानी की विषयवस्तु यदि आप जरा से भी संवेदनशील हैं तो वह कहीँ भी मिल सकती है। मूल बात उसके शिल्प की है। जिसका तानाबाना बुनने में आपका अध्ययन, और सूक्ष्म अन्वेषण महत्वपूर्ण होता  है। नन्द लाल सिंह ने परसाई की कहानी "चूहा और मैं" के माध्यम से शिल्प की ओर इशारा करते हुए कहा कि चूहे को आगे क्यों रखा गया, ये समझना कहानी लेखक के मंतव्य  समझने में मदद करता है।  अनिल अयान ने लघु कथा और कहानी के शिल्प पर, संजीव माथुर ने व्यक्तिगत अनुभव की कहानियों और सामाजिक सरोकार की कहानियों के फासले पर और महत्व पर विविध सवाल किये जिस पर रमाकांत जी ने टिप्पणियाँ कीं तथा स्पष्ट तौर पर कहा कि लघु कथाओं में कथ्य महत्वपूर्ण है जबकि कहानी में शिल्प और परिवेश की कसावट भी अत्यंत आवश्यक है। सामाजिक सरोकारों की कहानियाँ यकीनन दीर्घजीवी होती हैं ।
          दूसरे दिन कहानी पाठ का सिलसिला प्रारंभ हुआ कार्यशाला में लिखी गई कहानी "सपनों की उड़ान" से, जिसे सतना से आये नवरचनाकार अंकुर चौरसिया ने प्रस्तुत किया । उपस्थितों ने कार्यशाला की कहानी कहकर इसका स्वागत किया। इसी क्रम में दीपा भट्ट ने "आर्डर", अक्षय जैन ने "टाईपिस्ट मेडम", उमेश दास साहनी ने "पद्मा", अनुपम दाहिया ने "अपने-अपने श्मशान", अनिल अयान ने "एक अनुबंध", अरबाज खान ने "दीवानी", पुरूषोत्तम रजक ने "दया",  आभा भारती ने "वसंत" और ओजेन्द्र तिवारी ने "शिक्षा" कहानी का पाठ किया ।
      रचनाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए वरिष्ठ कथाकार त्रयी ने इन लेखकों को संभावनाशील बताया। रमाकान्तजी ने सुझाव दिया कि विषयवस्तु के चयन में जल्दबाजी नहीं करना चाहिए जब तक कथ्य पक न जाये। कहानी लिखने के बाद कहानी कई बार पाठ होना चाहिए इससे उसकी खामियां सामने आती हैं। कहानी का टुकड़ों में अवलोकन भी गलत है। कहानीकार को अपनी भाषा, अपने मुहावरे, अपनी शैली और विषय वस्तु से जुड़ाव होना जरूरी है। चमकदार शिल्प और नकली आधुनिकता कहानी को अपंग बना देती है। सुबोध श्रीवास्तव ने कहा कि नवरचनाकार ध्यान रखें कि वे कहानी लिखकर सामाजिक कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं ।
        समापन सत्र में मिस्र के लेखक युसुफ अल फजई की राजेन्द्र शर्मा द्वारा अनुवादित कहानी "कठपुतली का नाच"  रंगकर्मी राजीव अयाची ने, एवं भीष्म साहनी की कहानी "चीफ की दावत" का पाठ सुसंस्कृति परिहार ने किया। इन मानक कहानियों के पाठोपरांत सुबोध श्रीवास्तव ने "भले लोग", दिनेश भट्ट ने "अंतिम बूढ़े का लाफ्टर डे" एवं रमाकांत श्रीवास्तव ने "साहब, बीबी और बाबाजी" कहानियों का पाठ कर तमाम रचनाधर्मियों को इन कथाओं की खूबियों से अवगत कराया। ये कहानियां सभी की  मार्गदर्शक बनेगी, इसी अपेक्षा के साथ दो दिवसीय कहानी कार्यशाला का समापन हुआ। इस कार्यशाला का सफल संचालन गफूर तायर ने किया। आभार व्यक्त करते हुये सुसंस्कृति परिहार ने इसे दमोह इकाई लिए ही नहीं, बल्कि प्रदेश के लिए भी महत्वपूर्ण आयोजन कहा और तमाम सहयोगियों को धन्यवाद दिया ।
ज्ञातव्य हो, कार्यशाला के मध्यांतर में दक्षेस सिँह व सुसम्मति परिहार ने हरिप्रसाद चौरसिया के निर्देशन में जनगीत गाये। रमेश तिवारी ने बुन्देली गीतों की छटा बिखेरी, वहीं केशू तिवारी ने गजलों से समां बांधा । इँदौर से आये रंगकर्मी लेखक शिवम् कुन्देर ने बांसुरी वादन कर सबका मन मोह लिया ।
                 कार्यक्रम में आनंद श्रीवास्तव ,नरेन्द्र दुबे,  ठा नारायण सिंह, श्रीकांत चौधरी, डा रघुनंदन चिले ,नितिन अग्रवाल ,पीएस परिहार, पुष्पा चिले, भारत चौबे, अभय नेमा, कॄष्णा विश्वकर्मा, वीरेन्द्र दबे, शिखा उमाहिया के साथ महाविद्यालीन छात्र छात्राएं  मौजूद रहे ।



कविता कार्यशाला
 म. प्र. प्रगतिशील लेखक संघ की अशोकनगर इकाई ने दिनांक 5-6 अक्टूबर , 2014 को दो दिवसीय कविता कार्यशाला का आयोजन किया | इस कार्यशाला में नई पीढी के 20 से अधिक कवियों ने भागीदारी की , ये सब ऐसे कवि थे जिनकी कवितायें अभी किसी पत्रिका में प्रकाशित नहीं हुई हैं . पहले दिन कविता कार्यशाला में भोपाल से आये जाने-माने हिन्दी कवि कुमार अम्बुज ने कविता की ज़रुरत और कविता के सरोकार विषय पर अपना उदघाटन भाषण दिया | शुरूआत में स्थानीय साथी हरिओम राजोरिया ने शिविर की विस्तृत रूपरेखा पर प्रकाश डाला और पहले सत्र का संचालन भोपाल से आये कवि अनिल करमेले को सौंप दिया | सत्रों की परिकल्पना इस तरह से की गयी थी कि पहले आधार वक्तव्य होता था और उसके बाद नए कवि साथियों के साथ संबाद और बातचीत का सिलसिला शुरू होता था |
  पहले दिन के दूसरे सत्र में इंदौर से आये प्रलेसं के प्रदेश महासचिव विनीत तिवारी ने समकालीन कविता का परिदृष्य" विषय पर अपनी बात कही| इस बीच अनेक सवाल आये और नए कवियों ने बहस में हस्तक्षेप किया | भोजन के बाद तीसरा सत्र हुआ और इस सत्र में भिलाई से आये कवि नासिर अहमद सिकंदर  ने कविता का कथ्य (विषय , विचार , भाव और संवेदना , व्यक्ति चित्र) विषय पर विस्तार से कविताओं के अनेक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपना वक्तव्य दिया, इस सत्र का संचालन युवा कवि एवं आलोचक  बसंत त्रिपाठी (नागपुर) ने किया | 
पहले दिन शाम को अंतिम सत्र में अशोकनगर , गुना , इंदौर , दमोह और बीना से आये युवा साथियों में से खुशी श्रीवास्तव , अरबाज़ खान , समीक्षा दुबे , एकांत पाठक , शिल्पी जैन , महेश श्रीवास्तव , अभिषेक अंशु , उमेश विश्वकर्मा , पुरूषोत्तम रजक और निशांत गंगवानी ने अपनी  चुनी हुई कविताओं का पाठ किया | कविता पाठ के बाद कविताओं पर होने वाली बातचीत में कुमार अम्बुज, विनीत तिवारी, हरिओम राजोरिया, बसंत त्रिपाठी और नासिर अहमद सिकंदर आदि ने भाग लिया | पहले दिन होने वाले सभी सत्रों से पहले अशोकनगर इप्टा के किशोर कलाकारों ने जनगीतों की प्रभावी प्रस्तुति दी| गुना से आयी युवा कवयित्री समीक्षा दुबे ने भी इप्टा की परंपरा से जुड़े गीतों का गायन किया | युवा कवियों के कविता पाठ से पहले बीना से आये वरिष्ठ कवि महेश कटारे सुगम  ने अपनी बुन्देली बोली में लिखीं ग़ज़लों का पाठ किया |
दूसरे दिन के पहले और अंतिम  सत्र में कथ्य का निर्वाह काव्य भाषा, बिम्ब, प्रतीक, काव्य मुहावरा, विचार और विचारधारा  विषय पर बसंत त्रिपाठी ने आधार वक्तव्य दिया और बसंत त्रिपाठी की बात को नासिर अहमद सिकंदर , कुमार अम्बुज , बसंत सकरगाये , विनीत तिवारी और हरिओम राजोरिया ने आगे बढाया |
कविता कार्यशाला में महेश कटारे सुगम, सत्येन्द्र रघुबंशी, सुरेन्द्र रघुवंशी, मुकेश बिजौले, गिरीश जाटव, उमा, निवेदिता तथा अफरोज आदि की सक्रिय भागीदारी रही | इस कार्यशाला को संभव बनाने में प्रलेसं और अशोकनगर इप्टा के साथी पंकज दीक्षित, रामदुलारी शर्मा, विनोद शर्मा,  रतनलाल, सीमा, ब्रिजेन्द्र, श्याम बाबू, संजय माथुर, राकेश विश्वकर्मा, अभिषेक और अरबाज़ आदि साथियों की आधार भूमिका रही | पंकज दीक्षित के बनाये अनेक कविता पोस्टर कार्यक्रम स्थल पर लगाए गए थे |
 कविता कार्यशाला का समापन जनगीत से ही हुआ | पिछले तीन वर्षों में अशोकनगर प्रगतिशील लेखक संघ की यह चौथी कार्यशाला थी|

- हरिओम राजोरिया
hariom.rajoria@gmail.com

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

सिर्फ़ हँसना या मज़ाक करना व्यंग्य नहीं

प्रगतिशील लेखक संघ, इंदौर ईकाई
प्रलेस ने याद किया हरिशंकर परसाई को
- केसरी सिंह चिडार

इंदौर, 22 अगस्त। प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर ईकाई और आईबीएसएस विद्या निकेतन की ओर से शुक्रवार को हिंदी के महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के जन्म दिवस पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरूआत में छात्राओं कुमारी मीनल वर्मा, कशिश हार्डिया और प्राची मौर्या ने परसाई के सृजन एवं साहित्य पर अपने-अपने विचार रखे। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव विनीत तिवारी ने कहा कि परसाई के व्यंग्य महज हंसाते नहीं थे, बल्कि वे सोचने और हालात को बदलने के लिए प्रेरित भी करते थे। उन्होंने कहा कि असल में व्यंग्य का मुख्य काम भी बदलाव के लिए लोगों को प्रेरित करना है। आईबीएसएस के संचालक मंडल की ओर से श्री एस. के. दुबे ने हरिशंकर परसाई के लेखन के महत्व पर चर्चा की और बताया कि किस तरह उनके लेखन से समाज और शासन अपनी गलतियों पर शर्मिंदा होता था। आईबीएसएस की प्राचार्या सुश्री गीता सोनवणे ने प्रगतिशील  लेखक संघ के अतिथियों का स्वागत करते हुए स्कूल की गतिविधियों की जानकारी दी।

इस अवसर पर प्रलेसं के सचिव अभय नेमा ने परसाई की व्यंग्य रचनाओं ‘रोटी’ और ‘खेती’ का पाठ किया। विनीत तिवारी ने परसाई की रचना ‘एकलव्य ने गुरु को अंगूठा दिखाया’ का पाठ किया। इस व्यंग्य में परसाईजी ने इतिहास के माध्यम से वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में मौजूद खामियों और भ्रष्टाचार पर रोचक अंदाज़ में प्रहार किया है।  बच्चों को परसाई के व्यंग्य बहुत पसंद आये। विनीत तिवारी ने बताया कि किस तरह परसाईजी ने प्रेमचंद की समाजोन्मुख साहित्य की परंपरा को आगे बढ़ाया। प्रलेस की इंदौर ईकाई के केसरी सिंह चिडार ने स्वरचित बच्चों की कविताएं ‘चूहा राम का फोन’ एवं ‘कद्दू काका का ब्याह’ सुनाई। विद्या निकेतन की शिक्षिका सुचित्रा कापसे ने परसाई जी की व्यंग्य रचना ‘अच्छा बेवकूफ’ का पाठ किया। कार्यक्रम का संचालन विशी वर्मा एवं कुणाल ने किया। धन्यवाद प्राचार्या सुश्री गीता सोनवणे ने दिया।

इस मौके पर प्रलेसं इंदौर के अध्यक्ष श्री एस. के. दुबे और वरिष्ठ साहित्यकार राम आसरे पांडे के अलावा आईबीएसएस विद्यालय के सभी शिक्षकगण मौजूद थे।

शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

प्रेमचंद का साहित्य समता, न्याय और सामाजिक परिवर्तन का घोषणापत्र है

प्रेमचंद जयंती पर प्रलेस इंदौर ने किया कहानी पाठ और चर्चा का कार्यक्रम
इंदौर। प्रेमचंद जयंती के मौके पर केंद्रीय अहिल्या ग्रंथालय के अध्ययन कक्ष में  3 जुलाई को प्रेमचंद की कहानी घासवाली के पाठ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुकेश पाटीदार ने आधार वक्तव्य रखा। सौरव दास ने प्रेमचंद के कृतित्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में शामिल साथियों ने घासवाली कहानी के विभिन्न पहलुओं पर अपना नजरिया जाहिर किया।

मुकेश पाटीदार ने आधार वक्तव्य में कहा कि प्रेमचंद ने तत्कालीन समाज में व्याप्त, छुआछूत, सांप्रदायिकता, हिंदू-मुस्लिम एकता, दलितों के प्रति सामाजिक समरसता जैसे मुद्दों पर अपनी कलम से समाज को दिशा देने का महत्वपूर्ण कार्य किया। प्रेमचंद का पूरा साहित्य ही दलित, स्त्री, किसान और मजदूरों की लडा़ई का साहित्य है। इसमें समता, न्याय और सामाजिक परिवर्तन की घोषणा है। उनकी रचनाओं के पात्र आज भी हमे आसपास दिखाई देते हैं। प्रेमचंद ने उपन्यास निर्मला में दहेज प्रथा व बेमेल विवाह की समस्या पर प्रकाश डालकर समाज में महिलाओं की स्थिति का उल्लेख किया। वे सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, जमींदारी, कर्जखोरी के खिलाफ और गरीबी तथा नारी समस्याओं पर आजन्म लिखते रहे।

युवा साथी सौरव दास ने कहा कि प्रेमचंद ने अय्यारी, कल्पना लोक, राजा-रानी से इतर यथार्थवादी कहानियों की परंपरा विकसित की। उन्होंने किसानों, मजदूरों के जीवन और उनकी त्रासदियों का मेलोड्रामा रचा। उनके उपन्यासों पर हिन्दी में ही नहीं, उड़िया, कन्नड़ व् बांग्ला में भी फ़िल्में बनीं।

प्रलेस मध्यप्रदेश के महासचिव विनीत तिवारी ने प्रेमचंद की कहानी घासवाली का पाठ किया। यह कहानी प्रो. शोभना जोशी ने उपलब्ध कराई थी।

इस कहानी पर चर्चा का आरंभ करते हुए श्री कृष्णकांत श्रीवास्तव ने कहा कि कहानी में भाषा की सहजता, सरलता है। समाज में प्रतिरोध व सुधार को चिन्हित करने और उभारने की प्रेमचंद की कला अदभुत है। इंदौर इकाई के अध्यक्ष श्री एसके दुबे ने कहा कि कहानी में प्रेमचंद का पात्र चैनसिंह एकाएक कैसे परिवर्तित हो जाता है, परिवर्तन की प्रक्रिया बहुत तेज हुई है। श्री गणेश रायबोले ने कहा कि इस कहानी में जमींदारी प्रथा के अंतर्गत दलित वर्ग की पीड़ित शोषित महिला की मुक्ति की चाह मिलती है। बात को आगे बढ़ाते हुए श्री रामआसरे पांडे ने कहा कि कहानी गांधीवादी आदर्शवाद से प्रेरित है। कहानी के पात्र चैनसिंह का ह्रदयपरिवर्तन एक अपवाद है और अपवादों का सामान्यीकरण नहीं हो सकता। ह्रदयपरिवर्तन से समाज की समस्याओं का हल नहीं होता।



श्री सुरेश उपाध्याय ने कहा कि प्रेमचंद की पहली कहानी मेरे अनमोल रत्न थी और उनका आखिरी लेख महाजनी सभ्यता माना जाता है। इस आखिरी लेख में प्रेमचंद की अतंरराष्ट्रीय दृष्टि परिलक्षित होती है। प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के अध्यक्षीय उद्बबोधन में कहा था कि साहित्य राजनीति और समाज के आगे चलने वाली मशाल है। प्रेमचंद का साहित्य गति संघर्ष और बेचैनी देता है हमें सुलाता नहीं, चैतन्य करता है। इसमें संघर्ष और स्वाभिमान का सार है। घासवाली कहानी में भी यही बात दिखाई पड़ती है।इंदौर इकाई के सचिव श्री अभय नेमा ने कहा कि कहानी में कई तत्व हैं। यह तकनीक में बदलाव और इक्के वालों की आजीविका पर इसके असर के बारे में बताती है। मजदूर और दलित वर्ग की घास लाने वाली स्त्री के प्रतिरोध को बताती है। एक ठाकुर के ह्दय परिवर्तन के जरिए यह कहानी नए समाज के निर्माण की प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण बिंदु पर भी प्रकाश डालती है। इसके साथ ही जातिवाद का विद्रूप भी इस कहानी में जाहिर होता है। यह कहानी एक नए मनुष्य के निर्माण में मदद करती है। एनएफडब्ल्यूआई की सुश्री सचिव सारिका श्रीवास्तव ने कहा कि एक नारी के प्रति ठाकुर का व्यक्तित्व अचानक बदलना आसान नहीं है। कहानी में एक नारी का चरित्र अपनी पूर्णता के साथ आता है। श्री देवीलाल गुर्जर ने कहा कि प्रेमचंद की कहानियां आम आदमी की कहानियां है।


विनीत तिवारी ने कहा कि कहानी का कालखंड ज्ञात नहीं है फिर भी यह प्रेमचंद की आरंभिक कहानी लगती है। बेशक कहानी में शोषण करने वाले ज़मींदार का हृदय परिवर्तन गया है वैसा असल ज़िंदगी में नहीं होता। प्रेमचंद इस कहानी को लिखते समय तक मनुष्य के व्यक्तिगत और अंतःकरण की पवित्रता पर विश्वास करते होंगे  उन्होंने ऐसा लिखा। असल ज़िंदगी में दलितों और शोषितों को अपनी मुक्ति के लिए लड़ना पड़ता है। फिर भी यह कहानी भाषा के प्रवाह, अपने सुगठन और परिवेश के निर्माण की वजह से यादगार कहानी बन जाती है। उनकी महिला पात्र इतनी आत्मविश्वासी और मजबूत इरादों वाली होती थीं कि सहज ही औरतों के प्रति सम्मान जागृत हो जाता है। बीसवीं सदी के प्रारंभ में जातिवाद और नारी के बारे में प्रेमचंद की प्रगतिशील सोच उन्हें अपने समय से आगे देखने वाला कथाकार बनाती है। कहानी एक अमूर्तन में समाप्त होती है जो अनेक संभावनाएं सवाल छोड़ जाती है।


कार्यक्रम में ग्रंथालय के प्रमुख डॉ. जी. डी. अग्रवाल एवं प्रलेस के साथियों ने प्रेमचंद के पोस्टर का विमोचन किया। इस पोस्टर को इंदौर इकाई ने तैयार किया और इसे स्कूल, कालेजों में वितरित किया। प्रेमचंद जयंती के दिन 31 जुलाई को माहेश्वरी विद्यालय में असेंबली के दौरान सौरभ दास ने प्रेमचंद के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। इस कार्यक्रम में स्कूल के प्राचार्य, मैडम देशपांडे, श्रीमती पाठक, समेत कई अध्यापक मौजूद थे। श्रीमती पाठक ने प्रेमचंद के आवदान पर सारगर्भित वक्तव्य पेश किया। इस पोस्टर को बनाने में साथी अशोक दुबे का योगदान रहा। आभार प्रकट किया संयुक्त सचिव केसरीसिंह चिड़ार ने।

शनिवार, 26 अप्रैल 2014

खानाबदोश कामगार : अपने वर्ग की प्रतिनिधि कहानी ((रिपोर्ट: दिनेश बैस, झाँसी से))

झाँसी, रविवार, ६ अप्रैल, २०१४. 'अभियान', प्रगतिशील लेखक संघ', 'इप्टा' की मासिक कहानी गोष्ठी, "कथा चर्चा" 'राजकीय संग्रहालय' के उद्यान में शाम ३ बजे से आयोजित हुई, जिस में शेखर मल्लिक की 'खानाबदोश कामगार' पर चर्चा हुई. 'खानाबदोश कामगार' त्रैमासिक पत्रिका "दूसरी परम्परा" के फरवरी - १४, अंक - २ में प्रकाशित हुई है.
विमर्श में भाग लेते हुए फिल्म रायटर्स एसोसियेशन के सदस्य मुहम्मद शाहीद ने कहा कि काम की तलाश में घर-द्वार छोड़ने वाले मजदूरों की त्रासदी को उकेरती कहानी, 'खानाबदोश कामगार' इतनी जीवंत प्रस्तुति है कि इसका फिल्मांकन आवश्यक लगता है.
स्थापित कथाकार बृजमोहन का कहना था कि कहानी जिस वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है, वह विकल्पहीन है. शोषण उसकी न्जियती बन चुकी है. सिर्फ़ जीने की शर्त पर वह शोषण, उत्पीड़न, अपमान, कुंठा, हताशा, ज़लालत झेल रहा है.
'इप्टा' के अध्यक्ष डॉ. (प्रो.) मोहम्मद इकबाल का कहना था कि रूरल मायग्रेशन पर यह बेहद सशक्त कहानी है. यह महात्मा गाँधी की ग्राम समाज की परिकल्पना को नेपथ्य में धकेलती प्रतीत होती है.
कवि - चित्रकार कुंती हरिराम का मानना था कि 'खानाबदोश कामगार' इतने यथार्थ रूप में सामने आती है कि झकझोर कर राख देती है. ऐसा लगता है कि, शेखर मल्लिक प्रस्तुत समाज के स्वयं द्रष्टा और भोक्ता हैं.
सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव डॉ. (प्रो) नईम मुहम्मद का कहना था कि कहानी दृश्य दर दृश्य ज़ेहन में उतरती चली जाती है. वह संवेदनाओं के स्तर पर पाठकों को सामान धरातल पर ला खड़ा करती है.

शेखर मल्लिक की कहानी 'खानाबदोश कामगार' पर विस्तृत व्याख्या में कहा गया कि कहानी समाज के उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है जिसकी जगह हाशिये पर भी तय नहीं हो पाई है. जिनके लिये समाज कल्याण की किसी योजना का कोई अर्थ नहीं है. वह शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, सामाजिक सुरक्षा/न्याय किसी से भी संबंधित क्यों न हो. क्योंकि भूख की भयावहता के चलते जब गाँव-ज्वार के घरों में ताले लटक गए हों, उनमें रहने वाले दिल्ली, पंजाब, यू.पी.,चेन्नई, कोलकाता के फुटपाथों पर फिंक दिए गए हों कभी न लौटने के लिये, ईंट भट्टों में बंधुआ मजदूर बने सिर्फ़ रोटी के मूल्य पर मरखप रहे हों, स्त्रियाँ एक मालिक से दूसरे मालिक के हाथों बिक रही हों, दिन भर काम और रात में देह सुख प्रदान करने के लिये, लड़कियाँ दिल्ली के अभिजात्य बंगलों की निर्मम और नकचढ़ी मालकिनों की लताड़ खा रही हों, 'घर' फोन पर बात करने या एक पोस्टकार्ड लिखवाने के लिये तरस रही हों तो काहे की योजना और कैसा उनसे लाभ !    
'खानाबदोश कामगार' उस मिथ को भी तोड़ती है जो निहित राजनैतिक महत्वाकांक्षा पुरी करने के लिये लोगों को समझाता है कि उसकी दुर्दशा का अंत छोटे छोटे राज्यों के निर्माण में है. एक बार राज्य बन जाय तो उस क्षेत्र की जनता दूधों नहाने, पूतों फलने लगेगी. 'खानाबदोश कामगार'  में एक जगह शेखर मल्लिक कहते हैं - 'जब यह नया प्रदेश बना तो सुना कि सरकार 'अपने लोगों' के वास्ते बहुत कुछ करेगी... मगर सूबा बने दस सालों में पाँच मुख्यमंत्री बने...' नहीं बदले तो वहाँ के लोगों के हालात. वे उन दस सालों में भी जल-जंगल-ज़मीन से वंचित होते रहे. जैसे पिछले पचास सालों और उससे पहले से होते आ रहे थे.उनके लिये अंग्रजों की गुलामी से मुक्ति का कोई अर्थ नहीं था.  ठीक वैसे ही पहली दूसरी आज़ादी या सम्पूर्ण क्रांति जैसे जोशीले नारों का भी कोई मतलब नहीं था --  मालिक बदल जाने से गुलाम की स्थिति पर क्या अंतर पड़ता है --
बिहार/झारखण्ड के वंचित समाज की त्रासदी बयां कर रहे हैं शेखर मल्लिक. लेकिन यह कहानी छत्तीसगढ़, उड़ीसा, बंगाल, बुंदेलखंड कहीं की भी हो सकती है. केवल पत्रों के नाम और स्थान बदलने होंगे. इसलिए 'खानाबदोश कामगार' अपने वर्ग की प्रतिनिधि कहानी होने की हैसियत रखती है. कहानी की यह सबसे बड़ी सफलता है.
लेकिन शेखर मल्लिक सिर्फ़ कहानी कह रहे हैं.  कोई ज़मीन तोड़ते दिखाई नहीं दे रहे हैं. यथास्थिति के विरुद्ध कोई प्रतिरोध पैदा नहीं कर रहे हैं उनके पात्र. जबकि अनेक स्थानों पर वंचित समाज ठहरे हुए जल में हलचल भी पैदा कर रहा है. जल-जंगल-ज़मीन के अधिकार के लिये लड़ भी रहा है. ऐसे भयानक शोषण के बावजूद यथास्थिति को स्वीकारते चले जाना असहज करता है.
कहानी बहुत कसी हुई है. एक भी शब्द अनावशयक नहीं लगता है. कहानी की बुनावट कभी-कभी रिपोतार्ज होने का भ्रम उत्पन्न करती है. यथास्थिति लोकभाषा का प्रयोग, स्थानीय लोकगीतों की प्रस्तुति पाठक को शिद्दत से बांधती है. अनूठे और मौलिक मुहावरे रोमांचक ढंग से चौंकते हैं. जैसे 'मृत्यु की पुचकार' सी आग..... सीधे जा गिरा था भट्टी के मुँह में और 'जिंदा लकड़ी' की तरह जलकर राख हो गया.
कथा चर्चा की अध्यक्षता अजय दूबे ने की. संगोष्ठी का संचालन दिनेश बैस ने किया. 

                                                                                                                        (दिनेश बैस द्वारा प्रस्तुत) 

बुधवार, 13 नवंबर 2013

वो दस दिन जब दुनिया हिल उठी

बोल्शेविक क्रांति की याद में समाजवाद पर एक दिवसीय कार्यशाला और फ़िल्म प्रदर्शन

-    विभोर मिश्रा



 इंदौर, 7 नवम्बर 2013 .

“वो मौसम रूस के लिये सदी का सबसे सर्द मौसम था। जर्मनी से हर मोर्चे पर लगातार मिल रही हार, बिना बिजली, खाने और बग़ैर छत के लोग सिर्फ मरने के लिये जी रहे थे, और अंत में मर रहे थे। लाखों गरीब किसानों की मौत के साथ वो साल बीता।”

1916 इतिहास के पन्नों में कुछ इसी तरह दर्ज़ है. यही हालात ज़मीन बने 1917 के रूसी इंक़लाब की। मौका था अक्टूबर क्रांति की 96वीं वर्षगांठ का और जगह थी इंदौर में एमपीबीओए का दफ्तर।

7 नवम्बर को मनाये जाने वाले रूसी क्रांति दिवस को अक्टूबर क्रांति दिवस कहने पर अनेक लोगों को अचरज लगता है।  दरअसल 1917 में रूस में जूलियन कैलेंडर प्रचलित था जिसके मुताबिक रूसी क्रांति 25 अक्टूबर को हुई थी। सारी दुनिया में प्रचलित मौजूदा ग्रेगोरियन कैलेंडर, जिसे हम लोग भी इस्तेमाल करते हैं, के मुताबिक उस दिन 7 नवम्बर की तारीख़ थी। इस दिन को दुनिया भर में सर्वहारा की ऐतिहासिक जीत के रूप में मनाया जाता है।

पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में पूँजीवाद के बढ़ते प्रभाव के कारण नयी पीढ़ी के लोगों को सर्वहारा की इस महान क्रांति के इतिहास से वंचित रखा जा रहा है। यह कोई हज़ारों साल पहले की नहीं बल्कि सिर्फ़ 96 वर्ष पहले की ही घटना है जब आम लोगों ने पहले रूस को और फिर सारी दुनिया को हिलाकर रख दिया था। सन 1917 में हुई वह बोल्शेविक क्रांति दुनिया के अनेक देशों के इंकलाबियों के लिए प्रेरणा बनी। सन्दर्भ केन्द्र ने इंदौर में इस बार 7 नवम्बर 2013 को रूसी क्रांति की सालगिरह पर उस क्रांति के गौरवशाली इतिहास को सही परिप्रेक्ष्य में जानने-समझने को उत्सुक युवाओं के साथ पूरे दिन की एक कार्यशाला की, और रूस में  हुई क्रांति के बारे में, क्रांति के बाद बने सोवियत संघ के बारे में, वहाँ हुए परिवर्तनों के बारे में विस्तार से जानने - समझने की कोशिश की। कार्यशाला में क्रांति को एक विज्ञान के रूप में समझने की कोशिश के साथ ही उन महान मज़दूरों, किसानों और इंकलाबियों को याद किया गया जिन्होंने दुनियाभर  में इस यक़ीन को हमेशा के लिए पुख्ता किया कि यह दुनिया आम लोगों द्वारा बदली जा सकती है और पूंजीवाद कितना भी ताकतवर हो, वह भीतर से न केवल खुद खोखला होता है बल्कि मुनाफ़े की हवस में दुनिया को भी खोखला करता जाता है।

समाजवाद और पूँजीवाद क्या हैं? इस बुनियादी प्रश्न पर कॉमरेड जया मेहता के परिचयात्मक संक्षिप्त वक्तव्य के बाद रूसी क्रांति के पूर्व की परिस्थितियों का विवेचन किया गया जो 1917 की क्रांति का आधार बनीं। उन्होंने बाकुनिन के अराजकतावाद से लेकर पोपुलिस्ट नरोदनिकों के बारे में बताया जो ज़ार के शासन को राजनीतिक हत्याओं द्वारा ख़त्म करना चाहते थे लेकिन उसके बाद के समाज को लेकर स्पष्ट नहीं थे।

सन 1861 में रूस में ग़ुलाम किसानों को कथित आज़ादी देने वाले कानून से लेकर 1870 में पेरिस कम्यून से होते हुए लेनिन के भाई की नरोदनिक गुट के साथ ज़ार को बम से उड़ाने की साज़िश, गिरफ्तारी और हत्या के वाकये से होते हुए उन्नीसवीं सदी के अंत में नए मार्क्सवादी समूह के उभार के बारे में जानकारी दी। उन्होंने  बताया कि 1900  के पहले तक लेनिन भी विभिन्न राजनीतिक विचारों वाले गुटों के हिस्सा थे। सन 1902 में उनके पर्चे "हमें क्या करना चाहिए" से खड़ी हुई बहस ने उनकी पार्टी के भीतर विभाजन कर दिया। लेनिन की पार्टी को ज़यादा वोट मिलने के कारण वह कहलायी बोल्शेविक और जिनके मत कम थे, वे कहलाये मेन्शेविक। सन 1903 से 1905 की असफल क्रांति से होते हुए पहले विश्वयुद्ध और फिर फरवरी 1917 की क्रांति और अक्टूबर में हुई समाजवादी क्रांति तक के इतिहास, उस समय के रूसी समाज और आर्थिक परिवर्तनों के बारे में विस्तार से बात हुई। चर्चा को संचालित करते हुए कॉमरेड विनीत तिवारी ने भागीदारों को उस वक़्त के मतभेदों और ट्राटस्की, प्लेखानोव, वेरा जासुलिश आदि क्रांतिकारियों और उनकी बहसों के मुद्दों को भी बताया।

पृष्ठभूमि स्पष्ट करने के बाद रूसी क्रांति के आंखोंदेखे गवाह रहे अमेरिकी पत्रकार जॉन रीड की किताब पर बनी फ़िल्म "वो दस दिन जब दुनिया हिल उठी" का प्रदर्शन किया गया। यह फ़िल्म विश्व के महान फ़िल्मकार आईजेन्स्टाइन के सहयोगी रहे ग्रिगोरी अलेक्सांद्रोव ने बनायी थी और इसमें  पहले विश्व युद्ध और 1917 के दौर के कुछ ऑरिजिनल फुटेज का इस्तेमाल किया गया है।  हिंदी में यह फ़िल्म सन्दर्भ केन्द्र द्वारा डब की गई है और अब तक इसके देश-विदेश में सैकड़ों प्रदर्शन हो चुके हैं। फ़िल्म में बताया गया कि सन 1861 में रूस से मज़दूर प्रथा खत्म होने के बाद लाखों किसान खेत छोडकर शहरों की ओर पलायन करने लगे, बद से बदतरी की ओर। चौड़ी सडकों और आलीशान इमारतों के चकाचौध भरे शहर के पीछे बसी बस्तियों में मज़दूरों की ज़िन्दगी किसी लिहाज़ से ग़ुलाम किसानों से बेहतर नहीं थी। ज़ार के खिलाफ आवाज़ उठना शुरु हो रही थी। और साथ ही क्रूर सशस्त्र दमन भी। इसी दौरान सन 1887 में एक युवा छात्र नेता को ज़ार के खिलाफ़ षड्यंत्र के आरोप में फांसी दे दी गयी. उसका नाम था अलेक्ज़ेंडर उल्यानोव. वह तब सत्रह के हुए व्लादिमिर उल्यानोविच ‘लेनिन’ का बड़ा भाई था।  लेनिन ने बाद में मार्क्स को पढना शुरु किया और जाना कि ज़र को मरने से ज़यादा ज़रूरी इस व्यवस्था को बदलना है जो ज़र को असीमित शक्तियों का मालिक बनती है। ज़ारशाही के खिलाफ संघर्षरत लेनिन को पहली बार 1895 में गिरफ्तार किया गया. 1904 में जापान से मिली हार और सैंट पीटर्सबर्ग की भयानक सर्दियों के अगले साल पहली बडी हडताल हुई जिसमें 30 लाख से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया. जिसे ज़ार द्वारा कुछ रियायत देने के वादे के साथ दबा दिया गया. बिगडते माहौल के बीच दूसरी हडताल साईबेरिया की सोना खदानों के मज़दूरों ने 1912 में और 1917 तक आते-आते ज़ारशाही के अंत के साथ ही क्रांति की कवायद तेज़ हो गयी. अक्टूबर 1917 में बोल्शेविक पार्टी ने लगभग बिना खून-खराबे के सत्ता हासिल की.

फ़िल्म के उपरांत हुई चर्चा में भागीदारों के सवालों का जवाब देते हुए कॉमरेड जया मेहता, कॉमरेड विनीत तिवारी और कॉमरेड अभय नेमा ने रूसी क्रांति के बाद बनी रूस के भीतर की गृहयुद्ध की परिस्थियों, एक पिछड़े और सामंती देश में समाजवादी क्रांति करने की मुश्किलों, लेनिन द्वारा अपनाई गयी नयी आर्थिक नीति (नेप), कृषि से सरप्लस का उद्योगों के भीतर स्थानांतरण, संपत्ति के सामाजिकीकरण, एक नए मनुष्य के निर्माण की कोशिश, वैश्विक आर्थिक मंदी, फ़ासीवाद के उभार और दूसरे विश्वयुद्ध की परिस्थितियों  से लेकर सोवियत संघ के विघटन के कारणों व् मौजूदा हालात पर भी बात की। सवाल-जवाब के दौरान हिंसा से समाजवाद का सम्बन्ध जोड़ने वाले पूंजीवादी मीडिया की साज़िशों और सर्वहारा की तानाशाही का अर्थ भी स्पष्ट किया गया और रूसी क्रांति का दुनिया के बाकी देशों के लिए महत्त्व भी रेखांकित किया गया।

कॉमरेड जया मेहता ने पूर्व समाजवादी देशों की योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था और उससे सामाजिक सम्बन्धों में होने वाले बदलावों के बारे में विस्तार से बताया।  समाजवादी जर्मनी और बर्लिन की दीवार टूटने के बाद एकीकरण से पूंजीवादी चंगुल में आये जर्मनी - दोनों के फर्क को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि समाजवाद में उपभोक्ता वस्तुएं ज़यादा नहीं थीं लेकिन ज़रूरी चीज़ें सभी के लिए थीं। नब्बे फीसदी से ज़यादा औरतें रोज़गार में थीं। उन्हें सम्मान, सुरक्षा और रोज़गार देना ही नहीं , बल्कि उनके बच्चों को पौष्टिक खाना, अच्छी शिक्षा, खेल के अवसर देना, बुज़ुर्गों की देखभाल करना भी राज्य की ज़िम्मेदारी थी। यह स्थिति पूंजीवाद कभी नहीं कर सकता क्योंकि उसका निज़ाम ही शोषण के आधार पर चलता है। लेकिन जो समर्थ हैं, उन्हें लगता है कि हम पूंजीवादी व्यवस्था में ज़यादा कमाएंगे और ज़यादा सुख से रहेंगे क्योंकि हमारे पास अधिक योग्यता है, तो वे पूंजीवाद के प्रति आकृष्ट होते हैं। इस आकर्षण को ज़बरदस्ती नहीं रोका जा सकता।  इसीलिये लेनिन ने अंतरराष्ट्रीयतावाद की बात की थी ताकि पूरी दुनिया के लोगों में समाजवादी मानसिकता का निर्माण हो सके।

कॉमरेड अभय नेमा ने अपनी पुस्तक लेनिन का अंश सुनाते हुए सोवियत संघ की उपलब्धियों की चर्चा की और बताया कि वहाँ शोषितों के पक्ष में 1917 की क्रांति के तुरंत बाद इतनी चीज़ें हुई थीं जिनके लिए हम आज भी लड़ रहे हैं और किसी पूंजीवादी देश में ऐसे प्रगतिशील कार्यक्रमों को लागू करने का माद्दा नहीं है।

अंत में क्यूबा, वेनेज़ुएला, निकारागुआ, बोलीविया, इक्वेडोर, नेपाल आदि देशों से होते हुए बात हिंदुस्तान तक आयी। सवाल उठा कि क्या हिंदुस्तान जैसे देश में रूस जैसी क्रांति हो सकती है? वक्ताओं ने जवाब में कहा कि हिंदुस्तान में हिंदुस्तान के किस्म की ही क्रांति होगी, न रूस जैसी और न चीन या क्यूबा जैसी। लेकिन क्रांति ज़रूर हो सकती है। जब रूस कि जनता ने रूस के भीतर क्रांति की तो कौन सोचता था कि रूस जैसे पिछड़े, अनपढ़ और गरीब लोगों के देश में क्रांति हो सकती है।  हो सकती है तो कितने दिन टिक सकती है। लेकिन क्रांति रूस के लोगों ने मुमकिन की और उसे आगे भी बढ़ाया। रूस की क्रांति यही सिखाती है कि जब तक दुनिया के किसी भी हिस्से में पूँजीवाद, शोषण और गैर बराबरी है तब तक वहाँ क्रांति ज़रूर हो सकती है, और उसे मुमकिन करना क्रांतिकारी शक्तियों की ज़िम्मेदारी है।

इस कार्यशाला में भागीदारी की पंखुडी मिश्रा, सारिका श्रीवास्तव, जया मेहता, आस्था तिवारी, समीक्षा दुबे, रुचिता श्रीवास्तव, अभय नेमा, विभोर मिश्रा, हेमंत चौहान, केसरी सिह, तौफीक़ होमी, राज लोगरे, सुरेश डूडवे, सुरेश सोनी और विनीत तिवारी ने। रूसी क्रांति की याद से उपजी ऊर्जा और वैचारिक ऊष्मा से भरे प्रतिभागियों ने चाहा कि वे दुनिया के बाकी देशों में हुई  क्रांतियों के बारे में भी जानने-समझने और सोचने के लिए जल्द फिर मिलेंगे।



सम्पर्क- 09755555293
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...