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रविवार, 19 जुलाई 2020

स्वास्थ्य का मुद्दा अस्पतालों और डॉक्टरों का ही नहीं, राजनीति का मुद्दा है


कोविड 19 के सन्दर्भ में स्वास्थ्य सेवाओं के राष्ट्रीयकरण पर हुई वेबिनार 

           - राहुल भाईजी 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की मध्यप्रदेश इकाई द्वारा "भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के राष्ट्रीयकरण" विषय पर एक वेबिनार का आयोजन किया गया। वेबिनार का संयोजन जोशी अधिकारी इंस्टीट्यूट आफ सोशल स्टडीज द्वारा किया गया। वेबिनार में डॉ अभय शुक्ला (पुणे) राष्ट्रीय सहसंयोजक, जन स्वास्थ्य अभियान, ने अपनी बात रखते हुए कहा कि वर्ष 1986-87 में भारत की सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं निजी क्षेत्र की तुलना में ज्यादा थी, और 1000 मरीज में 400 मरीज ही  निजी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेते थे। तब से 2020 तक स्थितियां बिल्कुल विपरीत हो गई हैं।  अब बमुश्किल 40 फ़ीसदी  लोग सार्वजानिक स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाते हैं और शेष 60 फ़ीसदी को निजी क्षेत्र के अस्पतालों की शरण लेना पड़ती है। डॉ. अभय शुक्ल ने कहा कि  स्वास्थ्य पर खर्च के मामले में भारत दुनिया के कई मुल्कों के मुक़ाबले में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। भारत में प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर शासन द्वारा खर्च 19 अमेरिकी डॉलर  प्रति वर्ष किया जाता है जो फिलीपींस,  इंडोनेशिया और अफ्रीका जैसे देशों की तुलना में 3 से 4 गुना कम है, वहीं दूसरी ओर समाजवादी देश क्यूबा प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष  883 अमेरिकी डॉलर का खर्च अपने नागरिकों के स्वास्थ्य पर करके सबसे ऊंचे स्तर पर है। वर्ष 2019-20 में भारत में रूपये 1765 प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर औसतन खर्च किया जा रहा था, यानि मात्र रूपये 3.50 प्रति व्यक्ति प्रतिदिन का खर्च। उन्होंने कहा कि सरकार ने जैसे-जैसे सरकारी स्वास्थ्य खर्चों में कटौती करने के साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण को नीतिगत बढ़ावा दिया। देश के कुछ राज्य तो  सिर्फ निजी स्वास्थ्य सेवाओं के हवाले कर दिए गए हैं। जिसके चलते सामान्य स्वास्थ्य सेवाएं खुले बाजार की व्यवस्था में लूट का माध्यम बन गई हैं। स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ गए लोगों के निजी खर्च का नतीजा ये हुआ है कि देश में प्रतिवर्ष लगभग 5.5 करोड़ लोग गरीबी की खाई में गिरते जा रहे हैं।  वर्ष 2005 से 2015 के बीच निजी स्वास्थ्य सेवाओं का व्यापार औसतन तीन गुना बड़ गया। देश के शीर्ष 78 डॉक्टर्स ने एक सर्वे में बताया कि मुनाफाखोरी की चाहत ने निजी संस्थाओं को गैर तार्किक और अनुचित तरीके अपनाने की छूट भी ली जिससे निजी क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाएं बेहद मॅहगी हुई हैं। बहुराष्ट्रीय पूंजी भी इस क्षेत्र में अपनी भागीदारी बड़ाकर देश की जनता को लूटने तेजी से पांव पसार रही हैं। इस तरह सामान्य स्वास्थ्य सेवाएं सरकार द्वारा कारपोरेट घरानों को सौंप दी गईं और चुनी हुई लोकतान्त्रिक सरकारों ने ही देश की जनता को लुटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। निजी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को दवा, उपकरण और स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से देशवासियों को दोनों हाथों से लूटने की आजादी दे दी गई। हाल ही के कोविड महामारी के रोगियों से बड़ी निजी अस्पतालों द्वारा प्रतिदिन का  रुपये 1 लाख  से 4-5  लाख तक का खर्च वसूला जा रहा है। देश के लगभग सभी प्रदेशों में जिला और विकासखंड स्तर पर मौजूद अस्पताल संसाधन विहीन हैं, पर्याप्त स्टाफ, डॉक्टर्स नहीं हैं, जिससे कोरोना से मरने वालों की संख्या बढ़ रही है। सरकार को निजी क्षेत्रों के अस्पतालों में इलाज की कीमतों पर नियंत्रण के लिए सही तरीका इस्तेमाल करना चाहिए ताकि सभी को जीने के अधिकार से वंचित न किया जा सके। साथ ही सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को सुविधा  युक्त बनाने प्रति व्यक्ति का खर्च बढ़ाने चाहिए तो कोरोना महामारी से लड़ा जाना संभव होगा। ताकि उनकी रोजमर्रा की आम स्वास्थ्य से जुड़ी जरूरत पूरी हो सके। इसे मैं राष्ट्रीयकारन नहीं बल्कि सामाजिकीकरण कहना चाहूँगा। 

इंडियन डॉक्टर फॉर पीस एंड डेमोक्रेसी (आइडीपीडी) के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉक्टर अरुण मित्रा (लुधियाना) ने कहा कि स्वास्थ्य और शिक्षा हमारा संवैधानिक अधिकार है जिसे देश प्रत्येक देशवासी को सहजता से उपलब्ध होना चाहिए। देश की सरकार ने आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएं, जन स्वास्थ्य विभाग बनाने के बजाय मुनाफा कमाने वाली कंपनियों को खुली छूट दे रही हैं। सरकार को देश में विकेन्द्रित स्वास्थ्य सेवाएँ सहज रूप से उपलब्ध कराना चाहिए एवं साथ ही निजी क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं का राष्ट्रीयकरण बेहद आवश्यक हो गया है। जैसा कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था जो आज भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए जीवनदायिनी बनकर उभरे हैं, उतना ही महत्वपूर्ण देश के नागरिकों का स्वास्थ्य है। समय की आवश्यकता है कि सभी निजी स्वास्थ्य सेवाओं का राष्ट्रीयकरण हो। उन्होंने बताया कि किस तरह उनके संगठन द्वारा राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं का मुआयना करते हुए पाया गया कि सरकारी नीतियों की खामी के चलते निजी अस्पतालों में एक बहुत बड़े तबके के इलाज ना कर पाने से  उन्हें मौत का सामना करना पड़ता है। देश के राजनीतिक दलों द्वारा स्वास्थ्य एवं शिक्षा  पर कोई ध्यान ना देने से देश की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गई है। वेबीनार को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा आयोजित किये जाने पर उन्होंने खुशी जाहिर की और कहा कि यह बहुत अच्छी बात है कि किसी राजनीतिक दल ने स्वाथ्य सेवाओं को राजनीतिक मुद्दे की तरह देखा है।  स्वास्थ्य सेवाएँ कैसी हों, यह एक राजनीतिक सवाल है और जैसी राजनीती देश पर शासन करेगी, वैसा ही हाल स्वास्थ्य सेवाओं का होगा। उन्होंने यह भी कहा कि स्वास्थ्य का सवाल केवल अस्पतालों और डॉक्टरों से जुड़ा हुआ नहीं है. इसमें बड़ी भूमिका दवा कंपनियों की भी है।  आपको हैरत होगी कि उदारीकरण के दौर में सरकारी क्षेत्र की दवा निर्माण करने वाली कम्पनियाँ बंद कर दी गईं। स्वास्थ्य का सवाल बुनियादी रूप से साफ़ पानी मुहैया करने, उचित सीवेरज व्यवस्था उपलब्ध कराने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने से जुड़ा है।  हमें समाज ऐसा बनाना चाहिए जहाँ लोग ावाल तो बीमार पड़ें ही नहीं और अगर किसी वजह से कोई बीमार पड़े तो उसे ये फ़िक्र न हो कि पैसे कहाँ से आएंगे या डॉक्टर सही इलाज कर रहा है या लूट रहा है। इसके लिए हम सरकार से आइडीपीडी की ओर से राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग बनाने की मांग करते आ रहे हैं। 

डॉक्टर माया वालेचा गुजरात  के भरूच में एक सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता हैं और समाज के गिरते मानवीय मूल्यों और सामाजिक संबंधों को बेहतर बनाने के लिए काम कर रही है। वेबिनार में अपना वक्तव्य रखते हुए उन्होंने कहा कि आज देश की जो स्थिति है उसके पीछे एक वजह राजनीतिक दलों की राजनीतिक इच्छाशक्ति का बेहद कमजोर होना भी है। कोविड महामारी में देश की गरीब जनता, मेहनत करने वाले श्रमिक केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा उपेक्षित हुए हैं। प्रवासी मजदूरों को हजारों किलोमीटर पैदल चलना पड़ा, परंतु रास्ते में स्वास्थ्य केंद्रों के अभाव के चलते कईयों को अपनी जान गवाना पड़ी, जिनमें महिलाओं की दुर्गति किसी से छिपी नहीं है। नीति निर्माताओं ने ऐसे हालात में निजी स्वास्थ्य सेवाओं की कोई जवाबदारी तय नहीं की। देश की बहुमत आबादी को सरकार द्वारा प्रदत्त स्वास्थ्य सेवाओं का कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। कोरोना से बचाव कराने वाले स्वास्थ्य कर्मी, स्वयं की सुरक्षा सामग्री के अभाव में काम करने को मजबूर किए गए। सफाईकर्मियों को जान जोखिम में डालकर काम करने को मजबूर किया गया, स्वास्थ्य कर्मियों को समय पर उनकी तनख्वाह नहीं मिल पाई जिसके चलते कोरोना मरीज उपेक्षा का शिकार होते रहे, परंतु सरकार उनकी समस्याओं की अनदेखी करती रही है। वे कहती हैं कि देश में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भयावह है। जिसे एक चेतनशील राजनीति समाधान से बेहतर किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोविड-19 को अपने व्यापारिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने में बिल गेट्स और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन, जो दुनिया में वैक्सीन के क्षेत्र में काम करने वाला सबसे बड़ा कॉर्पोरेट है, कोविड की वैक्सीन बनाकर मुनाफे की होड़ में हैं। स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का राष्ट्रीयकरण किये बिना, या जिसे सामाजिकीकरण भी कहा जा सकता है, इन सेवाओं को उन्नत नहीं किया जा सकता लेकिन साथ ही राजनीतिक हल की भी बेहद आवश्यकता है। 

कार्यक्रम के संयोजक विनीत तिवारी ने कहा कि बेशक स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सवाल राजनीतिक सवाल हैं इसीलिए हम देख सकते हैं कि जहाँ भी सरकारें जनता के लिए फिक्रमंद हैं, वहाँ कोविड 19 का कहर कम टूटा है।  क्यूबा और वेनेज़ुएला जैसे देशों की स्वास्थ्य सुविधाएँ दुनिया में श्रेष्ठ मानी जाती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बिल गेट्स और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन जब अपने बनाये वैक्सीन का प्रयोग करेगी तब भी गरीब एशियाई और अफ़्रीकी देशों की जनता को ही उनके कहर का शिकार होना पड़ेगा। उन्होंने यह कहा कि  भारत और अमेरिका में एक स्वास्थ्य सम्बन्धी आपदा का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक स्थित्ति को मजबूत करने और आपदा का डर दिखाकर लोगों से विरोध और प्रतिरोध के सभी तरीकों को छीन ेने में किया जा रहा है।  वरवर राव के सन्दर्भ से उन्होंने कोविड 19 की आड़ में सर्कार द्वारा किये जा रहे राजनीतिक दमन को रेखांकित किया और कहा कि राजनीतिक दलों को अनेक मोरचीन पर लड़ना होगा।  सभी वक्ताओं का आभार मानते हुए कहा कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी शिक्षा एवं स्वास्थ्य के सवालों पर सही मायनों में एक ऐसा राजनीतिक दल है जो शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के खिलाफ शुरू से ही रहा है और अपना विरोध दर्ज कराया है। यही वजह है कि आज इस वेबिनार का आयोजन किया गया। मप्र इकाई के पार्टी राज्य सचिव कामरेड अरविंद श्रीवास्तव ने स्वास्थ्य सेवाओं का संज्ञान लेते हुए वक्ताओं के प्रभावशाली  वक्तव्य और प्रस्तुति के लिए धन्यवाद दिया और कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं के राष्ट्रीयकरण के मसले पर  प्रदेश के अन्य संगठनों से बात करने के बाद आंदोलनात्मक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे और स्वास्थ्यकर्मियों को संगठित करके प्रदेश ही नही बल्कि देश की जनता के सामने इस लड़ाई को मजबूत करने का आव्हान किया जाएगा।
वेबिनार हिंदी में था अतः मध्य प्रदेश के साथ ही दिल्ली, गुजरात, बंगाल, पंजाब एवं अन्य हिंदीभाषी राज्यों के उत्सुक और रुचिवान लोग शरीक हुए और सवाल जवाब का दौर भी हुआ। 
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गुरुवार, 16 जुलाई 2020

निर्देशक एमएस सथ्यू और उनकी ऑल टाइम ग्रेट फिल्म ‘गर्म हवा’

-जाहिद खान

हिन्दी सिनेमा में बहुत कम ऐसे निर्देशक रहे हैं, जिन्होंने अपनी
सिर्फ एक फिल्म से फिल्मी दुनिया में ऐसी गहरी छाप छोड़ी कि आज भी उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती। निर्देशक मैसूर श्रीनिवास सथ्यू यानी एमएस सथ्यू ऐसा ही एक नाम और साल 1973 में आई उनकी फिल्म ‘गर्म हवा’, ऐसी ही एक कभी न भूलने वाली फिल्म है। एमएस सथ्यू की इकलौती यही फिल्म, उनको भारतीय सिनेमा में बड़े फिल्मकारों की कतार में खड़ा करती है। ‘गर्म हवा’ को रिलीज हुए, आधी सदी होने को आई, मगर यह फिल्म आज भी अपने विषय और संवादों की वजह से हमारे मन को उद्वेलित, आंदोलित करती है। मुल्क के अंदर आजादी के शुरुआती सालों में हिंदोस्तानी मुसलमानों की जो मनःस्थिति थी, वह इस फिल्म में बखूबी उभरकर सामने आई है। फिल्म न सिर्फ मुसलमानों के मन के अंदर झांकती है, बल्कि बंटवारे से हिंदोस्तानी समाज के बुनियादी ढांचे में जो बदलाव आए, उसकी भी सम्यक पड़ताल करती है। निर्देशक एमएस सथ्यू ने बड़े ही हुनरमंदी और बारीकता से उस दौर के पूरे परिवेश को फिल्माया है। ‘गर्म हवा’, एमएस सथ्यू की पहली हिन्दी फिल्म थी। इससे पहले उन्होंने फिल्म निर्माता-निर्देशक चेतन आनंद के सहायक निर्देशक के तौर पर फिल्म हकीकत में काम किया था। इस फिल्म के वे कला निर्देशक भी थे। जिसके लिए साल 1964 में उन्हें ‘फिल्मफेयर’ पुरस्कार का तमगा मिला।
रंगमंच और सिनेमा में एनिमेशन आर्टिस्ट, असिस्टेंट डायरेक्टर (चेतन आनंद), निर्देशन (फिल्म और नाटक), मेकअप आर्टिस्ट, आर्ट डायरेक्टर, प्ले डिजाइनर, लाइट डिजाइनर, लिरिक्स एक्सपर्ट, इप्टा के प्रमुख संरक्षक, स्क्रिप्ट राइटर, निर्माता जैसी अनेक भूमिकाएं एक साथ निभाने वाले एमएस सथ्यू की पैदाइश देश के दक्षिणी प्रदेश कर्नाटक के मैसूर की है। एक कट्टरपंथी ब्राह्मण परिवार में 6 जुलाई, 1930 को जन्मे एमएस सथ्यू को उनके परिवार वाले वैज्ञानिक बनाना चाहते थे, लेकिन सथ्यू ने अपने पिता की मर्ज़ी के खिलाफ़ बीए की पढ़ाई पूरी की और उसके बाद बाद सिनेमा और थियेटर में अपने भविष्य की तलाश में मुंबई रवाना हो गए। मुंबई रवाना होने से पहले उन्होंने तीन साल कथकली डांस सीखा। कुछ जगह इसका परफॉर्म भी किया। मशहूर नृत्य निर्देशक उदय शंकर की फिल्म ’कल्पना’ में काम किया। जो मुल्क की पहली बैले फ़िल्म थी, लेकिन उन्हें आत्म संतुष्टि नहीं मिली। यही वजह थी कि वे सपनों की नगरी मुंबई पहुंचे। बहरहाल काम की तलाश में छह महीने तक इधर-उधर भटकते रहे। फिर उनकी मुलाकात ख्वाजा अहमद अब्बास और हबीब तनवीर से हुई। भारतीय जन नाट्य संघ यानी ‘इप्टा’ उस वक्त मुल्क में उरूज पर था, सथ्यू भी इससे जुड़ गए। हिंदी-उर्दू जबानों पर उनका अधिकार नहीं था, लिहाजा उन्होंने पर्दे के पीछे काम करने का रास्ता चुना। इप्टा के उस सुनहरे दौर में उन्होंने उसके लिए कई अच्छे नाटकों का निर्देशन किया। जिनमे ‘आखिरी शमा’, ‘रोशोमन’, ‘बकरी’, ‘गिरिजा के सपने’, ‘मोटेराम का सत्याग्रह’ और ‘सफ़ेद कुंडली’ के नाम शामिल हैं। ‘इप्टा’ से एमएस सथ्यू को ना सिर्फ एक वैचारिक चेतना मिली, बल्कि आगे चलकर उनकी जो अखिल भारतीय पहचान बनी, उसमें भी इप्टा का अहम योगदान है।
  इप्टा के अलावा एमएस सथ्यू ने हिंदुस्तानी थिएटर, नाट्य निर्देशक हबीब तनवीर के ओखला रंगमंच, कन्नड़ भारती और दिल्ली के अन्य समूहों की प्रस्तुतियों के लिए थिएटर में सेट डिजाइन करने समेत एक डिजाइनर और निर्देशक के तौर पर भी काम किया। हिंदी, उर्दू और कन्नड़ में 15 से अधिक वृत्तचित्र और 8 फीचर फिल्मों के अलावा उन्होंने कई विज्ञापन फिल्में भी कीं। गरम हवा, चिथेगू चिंथे, कन्नेश्वरा रामा, बाढ़, सूखा, ग़ालिब, कोट्टा, इज्जोडू एमएस सथ्यू द्वारा निर्देशित फीचर फिल्में हैं। लेकिन उन्हें पहचान ‘गर्म हवा’ से ही मिली। फिल्म बनने का किस्सा भी अजब है, जो उन्हीं की जबानी ‘‘मैं ’कहां कहां से गुज़र गया’ की स्क्रिप्ट लेकर फिल्म फाइनेंस कारपोरेशन से लोन लेने गया। मगर चेयरमैन बीके करंजिया ने कहा कि हीरो निगेटिव है। उसके बाद अफसानानिगार राजिंदर सिंह बेदी, इस्मत चुगताई आदि दोस्तों से बात हुई। नतीजा, ’गर्म हवा’ की स्क्रिप्ट बनी और करंजिया साहब ने उसे पसंद कर ली।’’ इस तरह फिल्म ‘गर्म हवा’ के बनने की शुरूआत हुई। मौजूदा पीढ़ी को यह सुनकर तआज्जुब होगा कि ‘फिल्म फाइनेंस कॉर्पोरेशन’ ने इस फिल्म को बनाने के लिए एमएस सथ्यू को सिर्फ ढाई लाख रुपए दिए थे। दोस्तों से कुछ और पैसों का इंतजाम कर, उन्होंने जैसे-तैसे फिल्म पूरी की। फिल्म की ज्यादातर शूटिंग रीयल लोकेशन यानी आगरा और फतेहपुर सीकरी में की गई। ताकि फिल्म बनाने में कम खर्च हो। फिल्म के ज्यादातर कलाकार रंगमंच से जुड़े हुए थे, लिहाजा फिल्म में रीटेक तो कम हुए ही, पूरी फिल्म में कम से कम सोलह ऐसे सीन हैं, जिनमें एक भी कट नहीं है। यह सुनकर भी लोग शायद ही यकीन करें कि फिल्म महज 42 दिन में बन कर तैयार हो गई थी।
फिल्म पूरी हो गई, तो सेंसर से लेकर रिलीज तक के लिए संकट आन खड़ा हुआ। सेंसर बोर्ड ने इसे पास करने से यह कहकर इंकार कर दिया कि फिल्म की रिलीज से मुल्क में सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है। ‘सेंसर बोर्ड’ से फिल्म पास नहीं हुई, तो एमएस सथ्यू ने उस वक्त की प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी से संपर्क किया। सथ्यू ने राजीव गांधी और संजय गांधी को ‘क्राफ्ट’ पढ़ाया था। लिहाजा उनसे उनके पारिवारिक संबंध थे। एक इंटरव्यू में खुद एमएस सथ्यू ने इस पूरे वाकये को कुछ इस अंदाज में बयां किया है, ‘‘उनकी सूचना पर इंदिराजी ने फिल्म देखने की इच्छा व्यक्त की। जिसे तमाम झंझटों के बावजूद उन्होंने दिल्ली ले जाकर दिखाया। इंदिराजी के अनुरोध पर सत्ता व विपक्ष के सांसदों को भी दिखाया और इस तरह सूचना-प्रसारण मंत्री इंद्र कुमार गुजराल के कहने पर सेंसर सर्टिफिकेट तो मिल गया, लेकिन बाल ठाकरे ने अड़ंगा खड़ा कर दिया। अतः प्रीमियर स्थल ‘रीगल थियेटर’ के सामने स्थित ‘पृथ्वी थियेटर’ में शिव सेना वालों को भी फिल्म शो दिखाया गया, जिससे वे सहमत हो सके।’’ बावजूद इसके फिल्म ‘गर्म हवा’ के लिए अभी और भी आजमाईशें बाकी थीं। अब छोटे बजट की इस फिल्म में, जिसमें कोई बड़ा सितारा मौजूद नहीं था, इसकी रिलीज के लिए कोई फिल्म वितरक तैयार नहीं हुआ। सथ्यू ने बेंगलुरु के एक फिल्म वितरक से संपर्क किया। जिसने इसे सबसे पहले बेंगलुरु में साल 1974 में रिलीज किया। फिल्म की तारीफ सुनकर, बाद में दूसरे हिंदी फिल्म वितरकों ने भी इसे अपने-अपने क्षेत्रों में रिलीज किया।
‘गर्म हवा’ ने बॉक्स ऑफिस पर तो कोई कमाल नहीं दिखाया, लेकिन फिल्म क्रिटिक द्वारा यह फिल्म खूब पसंद की गई। साल 1974 में फ्रांस के मशहूर ‘कांस फिल्म फेस्टिवल’ में गोल्डन पॉम के लिए इस फिल्म का नॉमिनेशन हुआ। भारत की ओर से यह फिल्म ‘ऑस्कर’ के लिए भी नामित हुई। राष्ट्रीय एकता-अखंडता के लिए इसे सर्वोत्तम फीचर फिल्म का ‘नरगिस दत्त राष्ट्रीय पुरस्कार’ मिला। यही नहीं फिल्म को तीन ‘फिल्म फेयर अवार्ड्स’ भी मिले। जिसमें बेस्ट डायलॉग कैफी आज़मी, बेस्ट स्क्रीन प्ले अवार्ड शमा ज़ैदी व कैफी आज़मी और बेस्ट स्टोरी अवार्ड इस्मत चुगताई की झोली में गए। इसी फिल्म के बाद एमएस सथ्यू को साल 1975 में भारत सरकार ने ‘पद्मश्री’ सम्मान से भी सम्मानित किया। साल 1994 में रंगमंच और कला के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘संगीत नाटक अकादमी अवार्ड’ से नवाजा गया। साल 2005 में ‘इंडिया टाईम्स मूवीज’ ने जब बॉलीवुड की सर्वकालिक बेहतरीन 25 फिल्में चुनी, तो उसमें उन्होंने ‘गर्म हवा’ को भी रखा। एक अकेली फिल्म से इतना सब कुछ हासिल हो जाना, कोई छोटी बात नहीं। वह भी जब यह निर्देशक की पहली ही फिल्म हो। एमएस सथ्यू ने ‘गर्म हवा’ के बाद और भी कई फिल्में बनाईं, लेकिन उन फिल्मों को वह शोहरत और चर्चा नहीं मिली, जो ‘गर्म हवा’ को हासिल हुई थी। सिर्फ साल 1984 में आई उनकी फिल्म ‘सूखा’ थोड़ा-बहुत चर्चा में रही। जिसे श्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार और बेस्ट फिल्म का ‘फिल्म फेयर क्रिटिक्स अवार्ड’ हासिल हुआ।
अब बात भारतीय सिनेमा की क्लासिक फिल्म ‘गर्म हवा’ की। फिल्म में ऐसा क्या है ?, जो इसे सर्वकालिक महान फिल्मों की श्रेणी में रखा जाता है। खुद एमएस सथ्यू की नजर में ‘‘फिल्म की सादगी और पटकथा ही उसकी खासियत है।’’ जिन लोगों ने यह फिल्म देखी है, वे जानते हैं कि उनकी यह बात सौ फीसद सही भी है। साल 1947 में हमें आजादी देश के बंटवारे के रूप में मिली। देश हिंदुस्तान और पाकिस्तान दो हिस्सों में बंट गया। बड़े पैमाने पर लोगों का एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में पलायन हुआ। हिंदोस्तानी मुसलमानों के सामने बंटवारे के बाद, जो सबसे बड़ा संकट पेश आया, वह उनकी पहचान को लेकर था। आजाद हिंदोस्तान में उनकी पहचान क्या होगी ? गोया कि यह वही सवाल था, जो आजादी से पहले भी उनके दिमाग को मथ रहा था। भारत के बंटवारे के बाद जिन मुसलमानों ने पाकिस्तान की बजाय हिंदोस्तान को अपना मुल्क चुना और यहीं रहने का फैसला किया, उन्हें ही इसकी सबसे ज्यादा कीमत चुकानी पड़ी। देखते ही देखते वे अपने मुल्क में पराए हो गए। मानो बंटवारे के कसूरवार, सिर्फ वे ही हों। आजादी को मिले सात दशक से ज्यादा गुजर गए, मगर हिंदोस्तानी मुसलमान आज भी कमोबेश उन्हीं सवालों से दो-चार है। पहचान का संकट और पराएपन का दंश आज भी उनके पूरे अस्तित्व को झिंझोड़ कर रख देता है। यही वजह है कि ‘गर्म हवा’ आज भी अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है। फिल्म जब रिलीज हुई, तब तो इसकी प्रासंगिकता थी ही, मौजूदा हालात में इसकी और भी ज्यादा प्रासंगिकता बढ़ गई है। फिल्म का शीर्षक ‘गर्म हवा’ एक रुपक है, साम्प्रदायिकता का रुपक ! यह साम्प्रदायिकता की गर्म हवा आज भी हमारे मुल्क पर फन फैलाए बैठी है। यह गर्म हवा जहां-जहां चलती है, वहां-वहां हरे-भरे पेड़ों को झुलसा कर रख देती है। फिल्म के एक सीन में सलीम मिर्जा और तांगेवाले के बीच का अर्थवान संवाद है,‘‘कैसे हरे भरे दरख्त कट जा रहे हैं, इस गर्म हवा में।’’
‘‘जो उखड़ा नहीं, वह सूख जाएगा।’’ एक तरफ ये गर्म हवा फिजा को जहरीला बनाए हुए है, तो दूसरी ओर सलीम मिर्जा जैसे लोग भी हैं, जो भले ही खड़े-खड़े सूख जाएं, मगर उखड़ने को तैयार नहीं। कट जाएंगे, मगर झुकने को तैयार नहीं।
फिल्म ‘गर्म हवा’ की शुरुआत रेलवे स्टेशन से होती है, जहां फिल्म का हीरो सलीम मिर्जा अपनी बड़ी आपा को छोड़ने आया है। एक-एक कर उसके सभी रिश्तेदार, हमेशा के लिए पाकिस्तान जा रहे हैं। सलीम मिर्जा के रिश्तेदारों को लगता है कि बंटवारे के बाद अब उनके हित हिंदोस्तान में सुरक्षित नहीं। बेहतर मुस्तकबिल की आस में वे अपनी सरजमीं से दूर जा रहे हैं। पर सलीम मिर्जा इन सब बातों से जरा सा भी इत्तेफाक नहीं रखते। वे अपनी जन्मभूमि और कर्मभूमि को ही अपना मुल्क मानते हैं। बदलते हालातों में भी उनका यकीन जरा सा भी नहीं डगमगाता। अपने इस यकीन पर वे जिंदा हैं, ‘‘गांधीजी की कुर्बानी रायगा नहीं जाएगी, चार दिन के अंदर सब ठीक हो जाएगा।’’ बहरहाल पहले उनकी बड़ी बहिन, फिर भाई और उसके बाद उनका जिगर का टुकड़ा बड़ा बेटा भी हिंदोस्तान छोड़, पाकिस्तान चला जाता है। पर वे तब भी हिम्मत नहीं हारते। हर हाल में वे खुश हैं। जबकि एक-एक कर, दुःखों का पहाड़ उन पर टूटता जा रहा है। अपने उनसे जुदा हुए तो हुए, साम्प्रदायिक दंगों की आग में उनके जूते का कारखाना जलकर तबाह हो जाता है। पुरखों की हवेली पर कस्टोडियन का कब्जा हो जाता है। और तो और खुफिया महकमा उन पर पाकिस्तानी जासूस होने का इल्जाम भी लगा देता है, जिसमें वे बाद में बाइज्जत बरी होते हैं। इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी सलीम मिर्जा को आस है कि एक दिन सब कुछ ठीक-ठाक हो जाएगा। जिंदगानी के संघर्ष में वे उस वक्त पूरी तरह टूट जाते हैं, जब उनकी जान से प्यारी बेटी आमना खुदकुशी कर लेती है।
बेटी आमना की खुदकुशी के बाद, वे फैसला कर लेते हैं कि अब हिंदोस्तान नहीं रुकेंगे। अपने परिवार को लेकर पाकिस्तान चले जाएंगे। अब आखिर, यहां बचा ही क्या है ! पर फिल्म यहां खत्म नहीं होती, बल्कि यहां से वह फिर एक नई करवट लेती है। फिल्म के आखिरी सीन में सलीम मिर्जा अपना मुल्क छोड़कर, उसी तांगे से स्टेशन जा रहे हैं, जिस तांगे से उन्होंने अपनों को पाकिस्तान के लिए स्टेशन छोड़ा था। तांगा रास्ते में अचानक एक जुलूस देखकर ठिठक जाता है। जुलूस मजदूर, कामगारों और बेरोजगार नौजवानों का है, जो ‘‘काम पाना हमारा मूल अधिकार !’’ की तख्तियां को लिए नारेबाजी करता हुआ आगे जा रहा है। सिंकदर अपने अब्बा से आंखों ही आंखों में कुछ पूछता है। सलीम मिर्जा, जो अब तक सिंकदर की तरक्कीपसंद बातों को हवा में उड़ा दिया करते थे, कहते हैं ‘‘जाओ बेटा, अब मैं तुम्हें नहीं रोकूंगा। इंसान कब तक अकेला जी सकता है ?’’ सिकंदर, जुलूस की भीड़ में शामिल हो जाता है। सलीम मिर्जा इस जुलूस को देखते-देखते यकायक खुद भी खड़े हो जाते हैं और अपनी बेगम से कहते हैं,‘‘मैं भी अकेली जिंदगी की घुटन से तंग आ चुका हूं। तांगा वापिस ले लो।’’ यह कहकर वे भी उस भीड़ में शामिल हो जाते हैं, जो अपने हकों के लिए संघर्ष कर रही है। बेहतर भविष्य का सपना और उसके लिए एकजुट संघर्ष का पैगाम देकर, यह फिल्म अपने अंजाम तक पहुंचती है।
एक लिहाज से देखें तो यह फिल्म का सकारात्मक अंत है। जो एक विचारवान निर्देशक के ही बूते की बात है। और यह सब इसलिए मुमकिन हुआ कि इस फिल्म से जो टीम जुड़ी हुई थी, उनमें से ज्यादातर लोग तरक्कीपसंद और वामपंथी आंदोलन से निकले थे। फिल्म उर्दू की मशहूर लेखिका इस्मत चुगताई की कहानी पर आधारित है। इस कहानी को और विस्तार दिया, शायर कैफी आजमी ने। एमएस सथ्यू की पत्नी रंगमंच की एक और मशहूर हस्ती शमा जैदी ने कैफी के साथ मिलकर इस फिल्म की पटकथा लिखी। संवाद जो इस फिल्म की पूरी जान हैं, उन्हें भी कैफी ने ही लिखा और उन्हें एक नई अर्थवत्ता प्रदान की। गर्म हवा के संवाद इतने चुटीले हैं कि फिल्म में कई जगह यह संवाद ही, अभिनय से बड़ा काम कर जाते हैं। मसलन‘‘अपने यहां एक चीज मजहब से भी बड़ी है, और वह है रिश्वत।’’
‘‘नई-नई आजादी मिली है, सब इसका अपने ढंग से मतलब निकाल रहे हैं।’’
फिल्म के मुख्य किरदार सलीम मिर्जा का रोल निभाया है, बलराज साहनी ने। उनके बिना इस फिल्म की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। बलराज साहनी की यह आखिरी फिल्म थी। ‘धरती के लाल’, ‘दो बीघा जमीन’, ‘काबुलीवाला’, ‘हकीकत’, ‘लाजवंती’ और ‘वक्त’ जैसी कई फिल्मों में बलराज साहनी का अभिनय देखने के काबिल है। ‘गर्म हवा’ में भी उन्होंने जो अभिनय किया, वह मील का पत्थर है। अपने चेहरे के हाव-भाव से ही, वे फिल्म में बहुत कुछ कह देते हैं। ‘गर्म हवा’ में उनके ऐसे कई सीन हैं, जो भुलाए नहीं भूलते। फिल्म में एक सीन है, जब सलीम मिर्जा की जवान बेटी आमना खुदकुशी कर लेती है। इस सीन में बलराज साहनी ने जो रियेक्ट किया, वह लाजवाब है। अपनी मृत बेटी को देखकर, वह बिल्कुल अवाक् रह जाते हैं। उनके मुंह से न तो एक शब्द निकलता है और न ही आंखों से आंसू। निर्देशक यहीं सीन खत्म कर देता है। बलराज साहनी ही नहीं फिल्म में और जितने भी कलाकार हैं, उन्होंने भी इसमें गजब का काम किया है। सलीम मिर्जा की बेगम के रोल में मशहूर रंगकर्मी शौकत आजमी, तो उनकी मां के रोल में बदर बेगम खूब जमी हैं। मशहूर चरित्र अभिनेता एके हंगल का जिक्र किए बिना इस फिल्म की बात पूरी नहीं हो सकती। एके हंगल ने फिल्म में कराची से भागे एक सिंधी व्यापारी अजमानी साहब की भूमिका निभाई है। अजमानी साहब भी पाकिस्तान से अपने सीने में वही जख्म लेकर आए हैं, जो सलीम मिर्जा को हिंदोस्तान में मिल रहे हैं। बावजूद इसके उनके मन में मुसलमानों के खिलाफ बिल्कुल भी बदले की भावना नहीं है। सलीम मिर्जा के दर्द को यदि कोई सबसे ज्यादा समझता है, तो वह अजमानी साहब हैं। अजमानी साहब के किरदार को एके हंगल ने बड़े ही संजीदगी और सादगी से निभाया है। सिकंदर मिर्जा के रोल में फारुख शेख, हलीम मिर्जा-दीनानाथ जुत्शी, शमशाद-जलाल आगा, बेदार मिर्जा-अबू शिवानी, आमना-गीता काक भी खूब जमे हैं।
फिल्म में निर्देशक एमएस सथ्यू ने कैफी आजमी की नज्म का बहुत बढ़िया इस्तेमाल किया है। कैफी की यह बेहतरीन नज्मों में से एक है। नज्म साम्प्रदायिकता पर है और फिल्म में बिल्कुल सटीक बैठती है। नज्म दो हिस्सों में है। नज्म का पहला हिस्सा फिल्म की शुरूआत में शीर्षक के दौरान पार्श्व में गूंजता है,‘‘तक्सीम हुआ मुल्क, तो दिल हुआ टुकड़े-टुकड़े/हर सीने में तूफां यहां भी था, वहां भी/हर घर में चिता जलती थी, लहराते थे शोले/हर घर में शमशान वहां भी था, यहां भी/गीता की न कोई सुनता, न कुरान की/हैरान इंसान यहां भी था और वहां भी।’’ नज्म का बाकी हिस्सा फिल्म के अंत में आता है, ‘‘जो दूर से करते हैं नजारा/उनके लिए तूफान वहां भी है, यहां भी/धारे में जो मिल जाओगे, बन जाओगे धारा/यह वक्त का एलान यहां भी है, वहां भी।’’ बंटवारे की त्रासदी और उसके बाद एक सकारात्मक संदेश, गोयाकि फिल्म का पूरा परिदृश्य नज्म में उभरकर सामने आ जाता है।
हिंदी सिनेमा इतिहास में ‘गर्म हवा’ ऐसी पहली फिल्म है, जो बंटवारे के बाद के भारतीय समाज की सूक्ष्मता से पड़ताल करती है। फिल्म का विषय जितना नाजुक है, निर्देशक एमएस सथ्यू और पटकथा लेखक कैफी आजमी ने उतना ही उसे कुशलता से हैंडल किया है। जरा सा भी लाउड हुए बिना, उन्होंने साम्प्रदायिकता की नब्ज पर अपनी अंगुली रखी है। ‘गर्म हवा’ में ऐसे कई सीन हैं, जो विवादित हो सकते थे, लेकिन एमएस सथ्यू की निर्देशकीय सूझ-बूझ का ही नतीजा है कि यह सीन जरा सा भी लाउड नहीं लगते। बड़े ही संवेदनशीलता और सावधानी से उन्होंने इन सीनों को फिल्माया है। फिल्म का कथानक और इससे भी बढ़कर सकारात्मक अंत, फिल्म को एक नई अर्थवत्ता प्रदान करता है। विभाजन से पैदा हुए सवाल और इन सबके बीच सांस लेता मुस्लिम समाज। विस्थापन का दर्द और कराहती मानवता। उस हंगामाखेज दौर का मानो एक जीवंत दस्तावेज है, ‘गर्म हवा’। भारतीय सिनेमा का जब-जब इतिहास लिखा जाएगा, उसमें फिल्म ‘गर्म हवा’ का नाम जरूर शामिल होगा। अपनी इस अकेली फिल्म से निर्देशक एम एस सथ्यू भारतीय सिनेमा में अमर रहेंगे। एमएस सथ्यू ने अपनी जिंदगानी के 90 साल पूरे कर लिए हैं। वे आज भी रंगमंच और इप्टा में उसी जोश-ओ खरोश के साथ सरगर्म हैं, जैसे कि शुरूआत में थे। इतनी उम्र के बाद भी न तो उनके जज्बे में कोई कमी आई है और न ही कमिटमेंट में। यही सब बातें हैं जो निर्देशक एमएस सथ्यू और उनकी फिल्म ‘गर्म हवा’ को ऑल टाइम ग्रेट बनाती हैं।

                                            (लेखक जानेमाने पत्रकार हैं और मध्य प्रदेश प्रलेस से जुड़े हैं)  
महल कॉलोनी, शिवपुरी मप्र
                                              मोबाईल  94254 89944

बुधवार, 13 मई 2020

श्रम कानूनों में बदलाव पर वेबिनार की रिपोर्ट: 10 मई 2020




रुकी अर्थव्यवस्था को मज़दूरों की क़ीमत पर चलाने की कोशिशें
कोरोना की आड़ में मज़दूरों के हक़ों पर सरकार का हमला
वेबिनार में श्रम कानूनों में बदलाव का हुआ तीखा विरोध

                  - विनीत तिवारी

इंदौर, मध्य प्रदेश।
सरकार कोरोना वायरस से निपटने की आड़ में देश के मज़दूरों को मारने पर आमादा है। अचानक लॉकडाउन घोषित करने के बाद मज़दूरों को लग रहा था कि अब सरकार उनकी सुध लेगी। क़रीब दो महीनों से अपने घरों से दूर ये मज़दूर काम-धंधे से बेकार, खाने-पीने के लिए सरकार और दानदाताओं पर मोहताज हो गए है। अब लॉकडाउन खोलकर रुकी हुई अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सरकार जिनके जीवन को दाँव पर लगाने जा रही है, उन्हीं मज़दूरों से उनके हक़ छीनने के लिए सरकार ने श्रम कानूनों में बदलाव कर दिए हैं। इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय समीकरण भी छिपे हुए हैं। मज़दूरों को नयी परिस्थिति में नयी तरह से अपने आपको संगठित करना, असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों को अपने साथ जोड़ना होगा और संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा।

उक्त बातें शहर के विभिन्न श्रम संगठनों द्वारा 10 मई 2020 को आयोजित एक वेबिनार में कही गईं। वेबिनार का विषय था - "कोरोना की आड़ में श्रम कानूनों में बदलाव।" वेबिनार की शुरुआत में संयोजक विनीत तिवारी (इंदौर) ने कहा कि कोविड-19 से निपटने के लिए सरकार ने तब लॉकडाउन कर दिया था जब भारत में कोविड-19 के केवल करीब 500 केसेस थे। सरकार के उस अदूरदर्शी निर्णय ने करोड़ों मज़दूरों को बेतहाशा मुश्किल में डाल दिया था। जब केरल और ओडिशा जैसे कुछ राज्यों को छोड़कर अन्य सभी प्रदेशों की सरकारें इन गरीबों की भोजन, राशन, दवाओं, या अपने घर से संपर्क की व्यवस्थाओं में नाकाम रहीं तो ये मज़दूर भूख से मरने के डर से उन जगहों को छोड़ कर वे निकल पड़े अपने गाँवों की तरफ। सूखी हड्डियों वाले महिला-पुरुष अपने बच्चों को गोद में लेकर सैकड़ों, और हज़ारों किलोमीटर लम्बे सफर पर, चप्पलें टूट गईं, चिलचिलाती गर्मी में कुछ ने दम भी तोड़ दिया। उन्हें भी कहीं भी रोक लिया जाता है और उनसे बदतमीजी की जाती है, बजाय इसके कि उन्हें लज्जा और ग्लानि के साथ, माफ़ी मांगकर शासन और प्रशासन अपने घर छुड़वाने की व्यवस्था करे। यह दृश्य हमारे दिलों को दहला ही रहे थे कि पता चला मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा अन्य कुछ और भी राज्यों की सरकारों ने श्रम कानूनों में बदलाव का फैसला कर लिया है।  ऐसे फैसले लेते हुए न तो विपक्षी दलों से पूछा गया और न ही श्रम संगठनों के साथ कोई मशविरा किया गया।  इंदौर एटक के महासचिव कॉमरेड रुद्रपाल यादव (इंदौर) ने कहा कि हमें प्रवासी मज़दूरों की समस्याओं पर सबसे पहले गौर करना चाहिए और सरकार ने जो बदलाव श्रम कानूनों में लाये हैं उनके खिलाफ इकट्ठे होकर लड़ाई लड़नी चाहिए। सीटू के मध्य प्रदेश के राज्य कमिटी सदस्य कॉमरेड कैलाश लिम्बोदिया (इंदौर) ने सरकार के इन क़दमों की कड़ी भर्त्सना की।  उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार ने कारखाना अधिनियम, 1948, ठेका श्रमिक अधिनियम, दुकान एवं स्थापना अधिनियम आदि कानून बदल डालने का असर पूरे श्रमिक वर्ग पर बहुत प्रतिकूल पड़ेगा।

इंटक के प्रदेश महामंत्री श्याम सुन्दर यादव (इंदौर) ने कहा कि सरकार ने श्रम संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ कोई सलाह मशविरा नहीं किया और कानूनों में बदलाव कर दिया। आज़ादी के बाद पहली बार मज़दूरों के साथ इस तरह का तानाशाहीपूर्ण रवैय्या अपनाया गया है. इसका पुरज़ोर विरोध किया जाएगा। एटक के प्रांतीय उप महासचिव एस. एस. मौर्या  (भोपाल) ने कहा कि प्रदेश की भाजपा सरकार पहले भी अपने शासन के दौरान मज़दूर विरोधी रुख दिखा चुकी है और अब इस महामारी के दौरान पिछले दरवाज़े से श्रम क़ानून बदलने की उसकी चाल साबित करती है कि उसके केंद्र में पूंजीपति ही हैं।  उन्होंने कहा कि चार इन्वेस्टर्स मीट करने के बाद 4 लाख हेक्टेयर ज़मीन सरकार ने पूँजीपतियों को दे दी है। ये कॉर्पोरेटी लूट है और इसके ख़िलाफ़ लड़ाई सभी मज़दूर संगठनों को साथ मिलकर लड़नी होगी। इंटक के राष्ट्रीय संगठन मंत्री बी. डी. गौतम (भोपाल) और इंटक के ही प्रांतीय महामंत्री कृपा शंकर वर्मा  (जबलपुर) ने कहा कि इन कानूनी बदलावों से मज़दूर पूरी तरह निहत्था और कमज़ोर हो जाएगा। अगर नियोक्ता उसे तनख्वाह भी न दे तब भी मज़दूर को अधिकार नहीं होगा कि वो इसके खिलाफ कोर्ट में जा सके।

एटक के प्रांतीय उपाध्यक्ष अधिवक्ता कॉमरेड अरविन्द श्रीवास्तव (जबलपुर) ने कहा कि ये तथाकथित सुधार दरअसल गैरकानूनी हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के ऐतिहासिक सम्मेलनों में यह बात कानूनी तौर पर मान्य है कि मज़दूरों से 8 घंटे से ज़्यादा काम नहीं लिया जा सकता,  फिर यह सरकार कैसे 12 घंटे के काम का नियम बना  सकती है? इसके अलावा भी संविधान में वर्णिंत अनेक अनुच्छेदों का उल्लंघन होगा अगर ये श्रम कानून अमल में लाये गए तो। इंटक नेता रतिराम यादव (ग्वालियर) ने भी चर्चा में भाग लेते हुए इन बदलावों को मज़दूर वर्ग के हितों पर कुठाराघात बताया। ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय  उपाध्यक्ष  अरविन्द पोरवाल ने कहा कि 1990 में ग्लोबलाइजेशन से ही मज़दूरों के खिलाफ नीतियाँ बनने का दौर शुरू हो गया था और सरकारें पूँजीवादी नीतियाँ लागू कर रही थीं, लेकिन अभी के दौर में तो यह मज़दूर विरोध अपने चरम पर है।  ऐसा लगता है जैसे केन्द्र और राज्य सरकार ने मज़दूरों को कोरोना से भी ज़्यादा बड़ा दुश्मन मान लिया हो।  रतलाम से इंटक के श्री अरविन्द सोनी ने भी अपनी बात रखी।

अर्थशास्त्री जया मेहता (इंदौर) ने कहा कि श्रम कानूनों में बदलाव से जिन मज़दूरों की ज़िंदगी पर असर पड़ेगा, वैसे मज़दूर कुल मज़दूरों का बहुत थोड़ा प्रतिशत हैं।  जो असंगठित मज़दूर सैकड़ों - हज़ारों किलोमीटर पैदल चलकर अपने गाँव वापस जा रहे हैं , जो रेल-सड़क हादसों और भूख का शिकार हो रहे हैं, उनकी तादाद कुल मज़दूरों की लगभग 93 प्रतिशत है।  इन्हें रोज़गार की, या बेहतर जीवन की या काम के घंटों की या किसी और तरह की कानूनी सुरक्षा कभी भी मिली ही नहीं,  लेकिन मज़दूरों के ये दोनों तबके आपस में जुड़े हुए हैं। कॉर्पोरेट जगत का तर्क यह है कि अगर नियम ढीले हो जाएँगे तो वे अधिक मज़दूरों को काम दे सकेंगे और तब सडकों -पटरियों पर चल रहे इन मज़दूरों को भी बेहतर रोज़गार हासिल होने की सम्भावना बनेगी। लेकिन यह एक साफ़ झूठ है।  इतिहास गवाह है कि कानूनों में ढील देने से रोज़गार नहीं बढ़ा बल्कि मज़दूरों का शोषण ही बढ़ा है। उन्होंने कहा कि  मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात सरकार ने श्रम कानूनों में जो बदलाव किये हैं, वे केवल देश और प्रदेशों की राजनीति तथा अर्थव्यवस्था से भर जुड़े हुए मामले नहीं है। यह एक अंतरराष्ट्रीय बिसात का हिस्सा है।  अमेरिका चाहता है कि कोरोना का बहाना लेकर चीन से निर्माण का आधार छीन लिया जाये ताकि चीन की अर्थव्यवस्था चरमरा जाये और अमेरिका की प्रतिस्पर्धा में न रहे।  इसके लिए जापान और योरप के अनेक देश भी तैयार हैं। भारत इस मौके का फायदा उठाकर विदेशी निवेश को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रहा है। भारत ने 1000 अमेरिकी कंपनियों को ये आश्वासन दिया है कि अगर वे चीन से अपना निर्माण आधार भारत शिफ्ट करना चाहें तो उनका भारत स्वागत करेगा। भारत में संगठित क्षेत्र में प्रति मज़दूर प्रति माह औसत खर्च 143 अमेरिकी डॉलर है जबकि चीन में यह दर 234 अमेरिकी डॉलर है। मतलब भारत में श्रम सस्ता है और उसे और भी सस्ता और असुरक्षित बनाकर अंतरराष्ट्रीय पूँजी के सामने थाली में हमारी सरकार पेश कर रही है। ज़ाहिर है हमारी सरकार के सामने मज़दूर तबके की इतनी ही अहमियत है कि उसके ज़रिये रुकी हुई अर्थव्यवस्था चल सके चाहे ऐसा उनकी ज़िंदगियों की कीमत पर भी क्यों न हो। बीएसएनएल के वरिष्ठ ट्रेड यूनियन नेता एस. के. दुबे ने भी अपने विचार साझा किये।

वेबिनार में इंदौर से वरिष्ठ ट्रेड यूनियन नेता वसंत शिंत्रे, अजय लागू, प्रलेस और इप्टा से केशरी सिंह चिड़ार, प्रमोद बागड़ी, रामआसरे पांडे, भारतीय महिला फेडरेशन की राज्य  सचिव सारिका श्रीवास्तव, विवेक मेहता, सुनील चंद्रन, डॉ. रत्नेश खरे, शरीफ़ खान. सुरेश उपाध्याय, प्रणय, महिमा, नेहा, गीतेश, शिवपुरी से मनीषा,  पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र के श्रमिक नेता यशवंत पैठणकर, धर्मपाल अधिकारी, राजेश सूर्यवंशी, किसान नेता अरुण चौहान, छत्तीसगढ़  इप्टा और प्रलेस से नथमल शर्मा, राजेश श्रीवास्तव, उषा आठले, अजय आठले, जीवेश चौबे, तस्लीम, पुणे से विजय दलाल, भोपाल से सत्यम, परशुराम तिवारी, सीमा, काशीराम अहिरवार, कोतमा से सुषमा कैथल, कोलंबिया (अमेरिका) से तुहिन चक्रबॉर्ती, गुना से मनोहर मिरोटे, अशोकनगर से मयंक जैन, होशंगाबाद से प्रियम सेन दिल्ली से विनोद कोष्टी, मनीष श्रीवास्तव, पंखुरी ज़हीर, राजीव कुमार, आदि अनेक लोग शामिल हुए।

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

विचार: कॉम. विनीत तिवारी

#DetoxifingSociety
#SaveHumanity

कोरोना वायरस के संक्रमण के इस कठिन वक्त में हमारे सभी बुजुर्गों, परिवारजनों और स्कूल के पुराने साथियों के लिये संदेश,

आप मेरे बड़े, सम्मानित और सम्बन्धी भी हैं. मैं आमतौर पर अपने बड़ों और रिश्तेदारों के विचारों में छेड़-छाड़ नहीं करता क्योंकि मेरे अपने कुछ खट्टे अनुभव रहे हैं. मैं उनका सम्मान जरूर करता हूँ पर अधिकतर मैं उनके साथ बहस में नहीं उलझता. मुझे वर्ण (जाति), स्त्री और धर्म को लेकर उनके विचार अवैज्ञानिक, अस्पष्ट, अहंकारी और आधारहीन लगते हैं. समाज में बेहतरी के विचार को लेकर भी मुझे उनके कई विचारों से विरोध है. उनके हिसाब से एक भौतिकवादी जीवन (बंगला, कार, कैरियर, बैंक बेलेंस, सम्पत्ति आदि) किसी जीवन की उपलब्धियों को मापने के पैमाने हैं. और वे ‘गीता’ और सन्यास तथा जीवन के ‘माया’ मात्र होने और जीवन की तुच्छता के बारे में बातें करते हैं. मैं ऐसे दोहरेपन से घृणा करता हूँ। इसलिए, मैं उनके साथ बहस में समय नष्ट नहीं करता. मैं समान्यत: सीमारेखा का उल्लंघन नहीं करता. उन्हें क्रोधित या दुखी करना मेरा उद्येश्य नहीं है. वे मेरे जीवन के चुनाव को नहीं समझ सकते।

मैं सोशल मीडिया में भी अपने रिश्तेदारों और बड़ों से बहस में नहीं उलझता क्योंकि वह एक सार्वजानिक मंच होता है. वहां वे लोग भी होंगे जो आपको फॉलो करते होंगे या आपको निजी तौर पर जानते होंगे और वे आपके गलत तर्कों में भी आपका पक्ष लेंगे, और ऐसे लोग भी होंगे जो मेरे तर्कों से इत्तिफ़ाक़ रखेंगे और कभी-कभी केवल मेरा पक्ष लेने के क्रम में आपसे अभद्र भाषा का व्यवहार कर सकते हैं, कठोर और अप्रिय शब्दों का इस्तेमाल आपके खिलाफ कर सकते हैं. जिसे मैं भी पसंद नहीं करूँगा. मैं ऐसी सावधानी अपने सम्मान को बचाए रखने के लिए भी करता हूँ. मैं दूसरों के वॉल पर नहीं जाता और उनके पोस्टों पर अपनी टिप्पणियों से उन्हें खिझाता नहीं हूँ.

कुछ सम्बन्धियों और दूसरे पुराने स्कूल/कॉलेज के दोस्तों ने यह गलती लगातार की और इसलिए कभी-कभी उन्हें कड़ी जुबान भी झेलनी पड़ी. मैं उनलोगों को समझाने की कोशिश करता हूँ जो अभी भी मेरे प्रति कुछ आदर रखते हैं और अपने जीवन के तथ्यों के प्रति कुछ विनम्रता रखते हैं.

दूसरे, मैं परिवारजनों और वरिष्ठों की विचारधारा और विचारों का अनुपालक सिर्फ इसलिए नहीं करता कि वे बड़े हैं और मेरे सम्बन्धी हैं. और मैं भी उन्हें यही अधिकार देता हूँ. मुझे मेरे वॉल पर अपने विचार प्रकट करने का पूरा अधिकार है, और अगर किसी को उससे असहमति हो तो वह अपनी वॉल पर इसका इज़हार कर सकता है. मैं निजता के क्षेत्र का सम्मान करता हूँ. यह सोशल मीडिया का पहला शिष्टाचार है. घुसपैठ न करें.

तीसरा, मैं विचारों में मतभेद का सम्मान करता हूँ. लेकिन मैं थोपे जाने की सराहना नहीं करता. कुछ पोस्टों में सगे-सम्बन्धी या स्कूल/कॉलेज के साथी मोदी का बचाव करने की या बिना किसी आधार या वज़ह के वामपंथ पर आक्रमण करने की कोशिश करते हैं. वे बस यह इच्छा रखते हैं कि हम हर उस बात पर विश्वास करें जो भी मोदी कहते हैं, क्योंकि वे प्रधानमन्त्री हैं. ये उनका सोचना हो सकता है. मैं तर्क या कारण समझे बिना किसी के साथ कभी सहमत नहीं हो सकता. मुझे उनके पूरे समर्पण के साथ मोदी या आर.एस.एस. के उत्साही और अंधानुयायी होने से कोई समस्या नहीं है, लेकिन वे मुझसे कैसे ये उम्मीद कर सकते हैं कि मैं सरकार /सत्ता पर कोई सवाल न उठाऊँ।   मैं किसी युवतर साथी के साथ भी ऐसा नहीं करता. मैं तथ्यों को सीधे सामने रखता हूँ और उन्हें वैज्ञानिक तर्कों और तथ्यों के आधार पर अपना मत रखने की स्वतंत्रता देता हूँ, न कि केवल विश्वास और अंधविश्वास के सहारे.
चौथा, मेरा इन अधिकांश सगे-सम्बन्धियों, बड़ों और पुराने दोस्तों के राजनीति, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, विज्ञान, मनोविज्ञान आदि के ज्ञान को लेकर बहुत आदरभाव नहीं है. मैं उन्हें इनमें से किसी भी विषय का भी ज्ञाता नहीं मानता. अत: मेरे लिए, उनकी टिप्पणियाँ उन लोगों जैसी है जो ‘बाबाओं’ और ‘साधुओं’ के चमत्कारों से अविभूत हो जाते हैं. पहले ऐसे दौर भी थे जब देश में बुद्धिजीवियों का सम्मान था. प्रोफेसर, शिक्षक, वैज्ञानिक, अभियंता और इस तरह के लोग राष्ट्र के वास्तुकार हुआ करते थे. ये लोग देश की आम मेधा का प्रतिनिधित्व करते थे. अब इस स्थिति में एक गुणात्मक पतन हुआ है. आजकल तो हर प्रगतिविरोधी, बाबा, मदारी, व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के विद्वान, गूगल स्नातक, अमर्त्य सेन, होमी भाभा, रोमिला थापर, विक्रम साराभाई, नोम चोम्स्की, पॉल स्वीजी, मार्टिन लूथर किंग जूनियर, नेल्सन मंडेला, गाँधी, नेहरू को पढ़ा सकते हैं.

तो मेरे सम्मानीय सगे-सम्बन्धियों और पुराने दिनों के प्यारे दोस्तों, कृपया मेरी वॉल पर अवश्य आयें, यदि आप मेरे लिए कुछ मूल्यवान साझा करना चाहते हैं या आपको सचमुच कोई जिज्ञासा या प्रश्न हो. तो मैं अवश्य इसका समाधान करने के लिए अपना कुछ वक्त देकर अपना सर्वश्रेठ जतन करूंगा, लेकिन अगर आप मेरी वॉल पर मुझपर सिर्फ ‘मोदी विरोधी’, ‘देश विरोधी’ का इल्ज़ाम लगाने के लिए आते हैं या चाहते हैं कि जो शासन प्रशासन कर रहा है मैं उसकी बिना तर्क किए तस्दीक या प्रशंसा करूँ तो मुझे माफ़ करें। मैं आपकी टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया नहीं दूँगा और मेरी पोस्ट पर से उन्हें Hide कर दूँगा, क्योंकि उससे विषयांतर होता है। मैंने ऐसा मेरे बहुत से करीबी रिश्तेदारों के साथ पहले भी किया है, भले दुखी होकर।

और अंतिम मगर जरूरी बात, जब दिल्ली के निजामुद्दीन में मरकज़ में तबलीगी जमात के लोग इक्कठे होने की और इंदौर में मुसलमानों द्वारा डॉक्टरों और अन्य मेडिकल स्टाफ़ पर पत्थरबाजी की लगातार दो घटनाएँ सामने आईं तो अचानक सारे मुसलमान खलनायक बताये जाने लगे। मेरी एक पोस्ट जो कोरोना वायरस की महामारी में साम्प्रदायिकीकरण की प्रवृति से संबंधित थी, उस पर प्रतिक्रिया देते हुए मेरे सम्माननीय सगे-सम्बन्धी ने यह लिखा :

"जब तुम ऐसे लोगों के कई आंदोलनों में इनकी तरफदारी करने दौड़ के पहुँचते हो,
जब तुम ऐसे लोगों के साथ अपनी तस्वीरें खिंचवाते हो,
तब यह तुम्हारी जिम्मेदारी है कि ऐसे लोगों को समझाओ।"
कहने का मतलब समझो
"ऐसे लोगों" के समर्थन में दौड़कर पहुंचते हो
पोस्टर लेके फ़ोटो खिंचवाते हो
तो समझाओ भी (मूल संदेश)

ये सज्जन शायद यह कभी समझ नहीं पाएँगे कि इन तीन-चार पंक्तियों में क्या गलत उन्होंने लिखा है. ये चार पंक्तियाँ उनके दिमाग में भरे साम्प्रदायिक कचरे को स्पष्ट दिखाती हैं। "ऐसे लोगों" से उनका क्या मतलब है? वे पूरे मुस्लिम समाज के प्रति अपनी घृणा छिपा नहीं सके. क्या उनका मतलब है कि हर वह मुसलमान जिसका मैंने पक्ष लिया था, डॉक्टरों पर थूक या पत्थर चला रहा था? मुझे एक इंसान दिखाओ जो उनके इस "ऐसे लोगों" की श्रेणी में आता हो.

ऐसे सगे-संबंधी और बचपन के सहपाठी उन कुछ आर एस एस वालों से भी गये गुजरे हैं, जो दिन-रात भूखों को बिना उनकी जाति या धर्म पूछे भोजन पहुँचा रहे हैं. मैंने इन कर्फ्यू के दिनों में बहुतों को बिना उनका धर्म या जाति पूछे मदद पहुंचाई है. मैंने शोषितों के लिए काम किया है, चाहे वे आदिवासी, धार्मिक अल्पसंख्यक, दलित या स्त्री या LGBTQ++  समुदाय के हों या सामान्य कहे जाने वाले लोग हों, और कभी-कभी पशु-पक्षियों के लिए भी, चाहे वह सूअर हो या गाय, या कबूतर हो या चिड़िया।
भविष्य में ऐसे वक्त भी होंगे जब मैं आदिवासियों, मुसलमानों या अन्य शोषित व संघर्षरत लोगों के साथ फ़ोटो खिंचवाने में गर्व महसूस करूँगा, लेकिन वो वक्त कभी नहीं होगा कि मुझे किसी ऐसे व्यक्ति के साथ फ़ोटो खिंचवाने में किसी गर्व का अहसास होगा जिसने बहुत पैसा या कैरियर बनाया लेकिन जातिवादी, साम्प्रदायिक या पितृसत्तावादी बना रहा.

मैं कभी इतनी कठोर प्रतिक्रिया नहीं देना चाहता था, लेकिन क्षमा करें, कुछ सम्माननीय रिश्तेदारों और स्कूल के पुराने साथियों ने मुझे यह लिखने को बाध्य कर दिया. मैंने बहुत दिनों तक प्रतीक्षा की कि वे हस्तक्षेप करना बंद कर देंगे लेकिन वे नहीं रुके. और मैं ये बात साफ़ और बुलंद आवाज़ में कहना चाहता हूँ कि यदि आप दूसरे समुदाय के प्रति नफ़रत से बाज़ नहीं आते हैं, यदि आप ‘श्रेष्ठता’ के मिथ्या अहं से खुद को मुक्त नहीं कर लेते हैं, यदि आप आँखें नहीं खोलते हैं और आसपास की वैज्ञानिक सच्चाईयों को स्वीकार नहीं करते हैं और यदि आप तर्क की विनम्रता और संवाद की मूलभूत तमीज नहीं सीखते हैं, कृपया मेरी वॉल से दूर रहें अन्यथा मुझे आपको ‘ब्लॉक’ करना पड़ेगा.

बहुत आदर और सम्मान के साथ,

#VineetTiwari
#विनीततिवारी

मूल अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद:
शेखर मल्लिक

सोमवार, 9 मार्च 2020

भारतीय महिला फेडरशन की घाटशिला इकाई ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर किया दोना-पत्तल उत्पादन केंद्र का उद्घाटन






आज अंतरराष्ट्रीय  महिला दिवस के अवसर पर भारतीय महिला फेडरेशन की घाटशिला इकाई ने घाटशिला प्रखंड के सरजामडीह गांव में आदिवासी महिलाओं के आर्थिक स्वावलम्बन हेतु दोना-पत्तल उत्पादन केंद्र का उद्घाटन किया. इस काम के लिए फेडरेशन की इकाई ने एक मशीन भी केंद्र को उपलब्ध कराया है. इस मौके पर इप्टा के साथियों नें भी पूरा सहयोग और भागीदारी की. आई सी सी मजदूर यूनियन के महासचिव कॉम ओम प्रकाश सिंह मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे. सबसे पहले केंद्र की सजावट रंगीन पताका लगाकर की गयी. मशीन पर साथी रुपाली ने विशेष अर्थ में 'लाल पताके' लगाकर सजाया. इप्टा और फ़ेडरेशन के साथियों ने "गाँव छोड़ब नाहीं" और "वो हमारे गीत क्यों रोकना चाहते हैं" जैसे जनगीत गाकर आगाज़ किया. इसे स्वर दिया अर्पिता श्रीवास्तव, सत्यम, दिलीप सरकार, ज्योति, शेखर, भूमि, मल्लिका, मुगली, रिया, राजा, रुपाली, साकरो, तारा देवी आदि ने. संचालन शेखर मल्लिक और सत्यम ने संयुक्त रूप से किया. गाँव की उत्साही महिलाएं आ जुटी थीं और माहौल बेहद उत्सवपूर्ण हो गया था. सत्यम ने संचालन करते हुए अपने विचार भी रखे और 'अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस' के इतिहास पर रौशनी डाली. इकाई की उप सचिव लतिका पात्र ने अपने विचार रखते हुए कहा कि यह हमारे लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है कि अपने पैरों पर खड़े होने के लिए इस तरह का कुटीर उद्योग हम महिलाओं के लिए शुरू कर रहे हैं. आप सभी इससे लाभान्वित होंगे और यह दिन हमारी महिला वर्ग के लिए ख़ुशी का दिन है.   अनेक जगहों पर इस दिन को मनाया जा रहा है. इकाई की अध्यक्षा कॉमरेड सुनीता मुर्मू ने स्थानीय संताली भाषा में ही सम्बोधित करते हुए महिला साथियों के मनोबल बढ़ाने वाली बातें कहीं.  गाँव के प्रधान सुखदेव टुडू ने भी इस मौके पर अपने विचार रखे और कहा कि यह बहुत ही हर्ष की बात है कि महिलाओं के स्वरोजगार के लिए यह एक केंद्र खुला है. उन्होंने महिला दिवस की सभी को बधाई और शुभकामनायें दीं. वरिष्ठ कॉमरेड भुवनेश्वर तिवारी ने कहा कि महिलायें प्रत्येक क्षेत्र में आज आगे बढ़कर हिस्सेदारी कर रही हैं. वे ऑटो भी चला रही हैं और हवाई जहाज तक. कौन कहता है कि वे कमजोर हैं ! इस तरह के केंद्र और खुलें और और भी महिलाएं जुड़ें.  महिलाओं के स्वरोजगार का यह अच्छा उपाय है. मुख्य अतिथि के रूप में कॉम ओम प्रकाश सिंह ने कहा कि यह बेहद महत्वपूर्ण प्रयास है. महिलाओं के स्वावलंबन के लिए फ़ेडरेशन की पहल सराहनीय है. सचिव ज्योति की उन्होंने सराहना की. उन्होंने आगे फेडरेशन के अभियानों में पूरा सहयोग करने की बात कही.
इसके बाद केंद्र की 'मरांग दाई' यानि 'बड़ी दीदी' (केंद्र की संचालिका को हमने यह नाम दिया है!) सरस्वती टुडू ने भी सम्बोधित करते हुए इसे एक बड़ा अवसर बताया और गाँव की महिलाओं को मन लगाकर काम में जुटने का आह्वान किया. इकाई की सचिव कॉम. ज्योति ने कहा कि यह शुरुआत है. हम और भी मशीनें लगायेंगे अगर आप सब इस काम को करने और फेडरेशन से जुड़ने को इच्छुक हों. यही नहीं फेडरेशन को आप अपनी कोई भी समस्या बताएं, चाहे वह बच्चों की पढ़ाई से सम्बन्धित हो, स्वास्थ्य की हो या कोई भी, हम उसमें सहयोग करेंगे. अर्पिता दीदी के सुझाव पर यह भी जोड़ा कि संगठन में रहने से एकजुटता की ताकत हासिल होती है. यह महत्वपूर्ण है. फ़ेडरेशन द्वारा स्थापित इस केंद्र में फिलहाल सात महिलाएं दोना-पत्तल उत्पादन के काम में जुडी हैं और आगे और अधिक महिलाओं के जुड़ने की संभावना और ख़ास उत्साह देखा जा रहा है.  
अंत में महिला दिवस पर सभी महिला साथियों के सम्मान और आभार के लिए गाँव के पुरुष कलाकारों ने धमसा और तुम्दा बजाया और उस पारम्परिक धुन पर सभी महिला साथियों (इप्टा, फेडरेशन की और ग्रामीण महिलाओं) ने पारम्परिक नृत्य भी किया. इसके बाद दिलीप सरकार ने अपनी रसोई (जिसमें केंद्र की साथिनें, रुपालीऔर ज्योति ने सहयोगी भूमिका निभाई) का सबके लिए लजीज खिचड़ी व सब्जी बना कर खिलाई और मौजूद सभी ने उनकी पाककला का लोहा माना! 
फ़ेडरेशन ने इस पहल के साथ अपनी सदस्यता बढ़ाने के लिए और संगठन का फैलाव करने की दिशा में एक मजबूत कदम उठाया है. इस मौके पर उपरोक्त उल्लिखित नामों के आलावा उपाध्यक्षा रूपा सरकार, भवानी, स्नेह्ज और गाँव केबच्चे और स्त्री -पुरुष भी उपस्थित थे.  
(गाँव से लौटने के पहले साथी सत्यम ने इस मौक पर मौजूद साथियों और ग्रामवासियों को नागरिकता संशोधन कानून, राष्ट्रिय नागरिकता पंजी और जनसंख्या रजिस्टर के बहाने सरकार की मंशा और आम नागरिक समाज पर मंडराते संकट और उससे लड़ने की बात कही. सत्यम ने बताया किआदिवासियों पर भी इन कानूनों से क्या खतरे हैं और कैसे वे उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और अन्यत्र विरोध कर रहे हैं. महिलाएं तो इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुईं. लगभग 65 प्रतिशत. असं में इस एन आर सी से 19 लाख नागरिकता खो बैठे और एक महिला के पास 15 तरह के दस्तावेज होने के बावजूद उसकी नागरिकता साबित करने को पर्याप्त नहीं माने गये.)
रिपोर्ट: ज्योति मल्लिक 

NFIW Ghatshila unit Celebrates International Women's Day with inaugurating Dona-Pattal (Leaf Plates) Production Center

Ghatshila, 8th March . Today the Ghatshila chapter of NFIW observed International Women's Day by inaugurating Dona-Pattal (Leaf Plates) Production Center for self economic dependency of rural women at Sarjamdih village in Ghatshila Sub divion of East Singbhum District (Jharkhand), the first may be of many in the pipeline. For this, the NFIW unit has provided a semi electric machine for operation to the rural women comrads of this Center. The IPTA prople from Ghatshila were also took very important and active part in the whole process and this event.  First of all the Center was decorated well with colorful flags (Jhandiyan). Com. Rupali decorated the Machine body with red flages with a meaningful objective! Comrads from IPTA and NFIW members sang mass songs like "Gaang Chhodab Naahin" (We will not leave our village) and "Wo hamare geet kyon rokna chahte hain" (Why they want to stop us from singing) to start off the event. Arpita, Satyam, Dilip Sarkar, Rupali, Jyoti, Shekhar, Muglee, Raja, Mallika, Riya, Bhumi, Sakaro, Tara Devi etc voiced these songs. The whole atmoshphere was enthusiastic and festive as women came together at the venue. The programe was hosted jointly by Shekhar and Satyam. Satyam also threw light on the histroy af International Women's Day. Joint Secretary Com. Latika Patra expressed her view as this is an important opportunity as this kind of cottage industry of sort is being started by us. You all would be benefited by this. This day is being celebrated everywhere with joy and truly its a day of joy for all of us. Unit presedent Comrade Sunita Murmu addressed the fellow members and gathering in native indeginious Santalli language that really went well. She said some incouraging words to them. The Village Headman Sukhdev Tudu was also presnt and he expressed his happiness on the opening of such good center for women's self earning. He offered greetings to all on this day. Senior CPI leader Com. Bhuvneshwar Tiwari also adressed the gathering and said that, today women are leading and exceling in every field. Being airoplane piolot to auto-driver. Who can say that they are 'weak'? He said that such centers are needed to be open in numbers and more women should be made attached to them.   This is a wonderful way of providing opporunitiy for earing to rural women.
ATUC leader and GS of ICC Worker's Union Com. Om Prakash Singh who was the Chief Guest, said that its is an important step. The initiative by the Federation of women's self dependency is highly appreciatable. He praised unit secretary Com. Jyoti for this. He offered his best help in NFIW unit's next ventures. 
The Center's leading lady, we have given her the title 'Maraang Dai' (Elder Sister/ Badi Didi) Com. Sarsawti also exprresed her views on this day and event. She admited that this is a big opportunity for us. She also urged the village women to come forward and join the Center, work whole heartedly. 
Unit Secretary Com. Jyoti Mallik then said that this is just a begining and more machines would be installed if you all wish to work and join the Fedration. Not just this, if you have any problem regarding children's education, health or any, fedration would love to offer support to you. On the suggestion of Arpita didi, it was also mentioned that, being in the Sangthan, the strength of unity is achived and that is important. 
At present seven women are working at this center which is surly to be increased in near future as the enthusiasm is clearly visible. 
Finally, as the token of respect to all women comrades, the village artist played traditional Dhamsa and Tumda and the women (IPTA, NFIW and locals) joined in the traditional dancing.
IPTA's Dilip Sarkar, who was aptly supported by Jytoi and Rupali with Center's comrades, cooked and offered very delicious Khichdi and Sabji to everybody and made averyone fan of his cooking ability. The fedration with this, have taken a large and strong step towards expension of the Sangthan and increment in the membership. Vice President of Unit Rupa Sarkar, Mrs. Bhavani and Snehaj along with many children, ladies and gents of village were present at the event.  
(Before leaving the village Com. Satyam spoke a litte about CAA-NRC-NPR and the intension of this Govt. to the present friends and villagers. He expressed the dangers looming large on the society and need to fight with it. Satyam told what are the danger particulary on the indeginious people of this country and how in Orissa, Chhatisgarh and elsewhere they are opposing. Womens are most and worst effected by this laws. Almost 65 percent of them. In Assam, 19 lakhs people lost thier citizenship and a women having 19 documents still cound find it enough to prove her citizenship.  

Report: Jyoti Mallik

मंगलवार, 14 जनवरी 2020

डॉ खगेन्द्र ठाकुर के निधन पर प्रलेस घाटशिला ने की स्मृति सभा

रिपोर्ट : 

आज घाटशिला स्थित आई सी सी मजदूर यूनियन के हाल में प्रलेस के राष्ट्रिय अध्यक्ष मंडल के सदस्य, झारखंड प्रलेस के संरक्षक, प्रख्यात आलोचक, कवि और सीपीआई के झारखण्ड राज्य कार्यकारिणी के सदस्य डॉ खगेन्द्र ठाकुर के लिए एक स्मृति सभा आयोजित की गयी. डॉ खगेन्द्र ठाकुर का निधन कल दिनांक 13 जनवरी, 2020 को पटना एम्स में हृदयाघात से हो गया था. 
इस सभा में लेखक, रंगकर्मी, कम्युनिष्ट पार्टी के युवा कार्यकर्ता और मजदूर (नेतृत्व के साथियों सहित) मौजूद थे.
सबसे पहले छिता हांसदा ने संक्षेप में खगेन्द्र ठाकुर के जीवन और कृतित्व पर रौशनी डाली. इसके बाद शेखर मल्लिक ने अपने संस्मरणों को साझा करते हुए बताया कि सबसे पहली मुलाकात 'संगमन' के दौरान जमशेदपुर में हुई थी. वे युवा और वरिष्ठ लेखकों के बीच समान रूप से प्रिय थे. घाटशिला प्रलेस के लिए उनकी प्रेरणा ही थी, जब हजारीबाग में उन्होंने पूछने पर कि कैसे प्रलेस शुरू करें, कहा था - बस बैनर लगाओ, और शुरू हो जाओ. आज घाटशिला प्रलेस की इकाई सक्रिय है ! जमशेदपुर, हजारीबाग, बिलासपुर, पटना से लेकर जयपुर तक उनसे अनेक मुलाकातें हैं. उनका नाम, लगता था कि कितनी बड़ी शख्सियत हैं, लेकिन मिलो तो एकदम दोस्ताना महसूस होता था ! घाटशिला में अभी छ: सात महीने झारखंड प्रलेस के तृतीय राज्य सम्मेलन में किस प्रकार विनोदपूर्ण तरीके से उन्होंने अपना वक्तव्य शुरू किया था. प्रेमचन्द वाले सत्र में किस प्रकार उन्होंने उन पर लगाये गये लांछन और आरोपों का सिलसिलेवार खंडन किया था, वह अविस्मरणीय है. इसी सम्मेलन में आदिवासी कविता और विचार सत्र के दौरान तेज बारीश में जब पंडाल उड़ गया था और बारीश का पानी चूने लगा था, वे अपनी जगह पर बैठे भीगते हुए पूरा वक्तव्य सुनते रहे. उस समय अरुणांचल से आई कवियत्री जमुना बीनी का सम्बोधन चल रहा था. 
कॉमरेड ओम प्रकाश सिंह ने कहा कि वे मजदूर यूनियन के लिए यहाँ आते रहे थे. और पार्टी व निजी रिश्तों के बीच बड़ी समझदारी से और मानीखेज तरीके से पार्टी को चुनते थे. इस समय जैसा प्रतिकूल और चुनौती का दौर है, उनका जाना सचमुच अखरता है.
शेखर मल्लिक ने कहा कि वे एक बरगद की तरह थे, जिसकी विस्तृत छाया में हम सब रहते आये थे. इसपर ओम प्रकाश जी ने सहमती जताई. 
ज्योति मल्लिक ने हालिया जयपुर में सम्पन्न प्रलेस के राष्ट्रिय सम्मेलन की बात याद करते हुए बताया कि खगेन्द्र जी ने झारखण्ड के डेलीगेटों के साथ फोटो लेने के लिए किस प्रकार मंच पर अन्य का इंतजार किया था और फोटो होने के बाद ही उतरे. 
भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के घाटशिला अनुमंडल सचिव कॉमरेड भुवनेश्वर तिवारी ने भी यादों को खंगालते हुए कहा कि खगेन्द्र ठाकुर यहाँ लगभग हर जगह आये. उनका जाना कम्युनिष्ट पार्टी के लिए क्षति है. वे जब किसी मुद्दे पर कुछ लिख देते थे तो वही पार्टी का स्टैंड हो जाता था, यानि हमें उस विषय पर निर्णय लेने में सहूलियत हो जाती थी. कॉमरेड खगेन्द्र ठाकुर की राय पार्टी के लिए मायने रखती थी. 
अंत में उनके लिए दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजली दी गयी. 
इस अवसर पर कॉम भुवनेश्वर तिवारी, कॉम ओम प्रकाश सिंह (महासचिव - आई सी सी मजदूर यूनियन, एटक), कॉम बी एन सिन्ह्देब (अध्यक्ष - आई सी सी मजदूर यूनियन, एटक), कॉम एन के राय, कॉम संतोष दास, देबाशीष बनर्जी, कॉम कानाई मुर्मू, गणेश मुर्मू (अध्यक्ष - इप्टा घाटशिला), ज्योति मल्लिक (सचिव - प्रलेस घाटशिला), छिता हांसदा, राजा सिंह्देब, रवि, लखीन्द्र प्रधान, शेखर मल्लिक (अध्यक्ष - प्रलेस घाटशिला) आदि मौजूद रहे. 
 
14.01.2020

शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

प्रतिलिपि कथा सम्मान 2019

https://hindi.pratilipi.com/blog/pratilipi-katha-samman-2019-xz1n9rv991n592i

इस वर्ष के लिये 'प्रतिलिपि कथा सम्मान - 2019' में संपादकीय पसंद सम्मान मिलना सुखद है। कहानी है- जल, जंगल और ज़मीन को बचाने के लिए उसी आदिम संघर्ष की जिसकी आज सबसे ज्यादा जरूरत है, उस लड़ाई को ठीक से समझने और उसमें शामिल होने की भी -"जंगल मोर दुलाड़िया"!https://hindi.pratilipi.com/story/xYnZeSwXv4eY?utm_source=android&utm_campaign=content_share
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