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रविवार, 8 अगस्त 2010

एक असंबद्ध कविता का ड्राफ्ट

रक्त की बूंदों से भी
ज्यादा शुद्ध संभावनाओं की
अवैध हत्या की जाती है...
हरदम ठीक उसी क्षण से ऐन पहले
जब उनके पनपने की तेज गुंजाइश हो
या तब, जब उनकी धार तेज हो जाने का खतरा
कनपट्टियों को सुर्ख करने लगे

फिर मातमपुर्सी के लिए
गाहे-बगाहे कुछ सभायें आयोजित कर ली जाती हैं
और संतोष की सारी प्रायोजित खबरें
आसपास बिखेर दी जाती हैं...

जब 'मैं', 'तुम' और 'हम'
जैसे पुरुषवाचक सर्वनाम
एक खराब मशीन के
कलपुर्जे बनकर रह गए हों
फिर भी नपुंसकता का पता ही नहीं चलता
क्योंकि ये
अवसरवाद के नए व्याकरण और परिभाषाओं में
संकरित हो गयी है.

ऐसे अवसरवादी कालखंड में
जब हर कोई अपने अवसर भुना रहा है
हथेलियों और तलवों की खुजली मिटा रहा है
कोई गा रहा है,
कोई रो रहा है
कोई धो रहा है,
तो कोई ढो रहा है!
मकसद सिर्फ़ लेने या पाने से है...
और पीढ़ी के ज्यादातर लोग
सिर्फ़ इसी फ़िराक में डटे हुए हैं...

शवों पर रोने के लिए कुछ बेचारगियाँ हैं
जिनकी शिनाख्त कोई बड़ा मुद्दा नहीं है...
लोकहित की घोषणाएँ सिर्फ़ खुशनुमां मुहावरे हैं...
जिनको दातून की तरह चबा कर थूका जाता है
ना कि गन्ने की मानिंद चूसा जा सकता है !

सीना तान कर चलने वाली आवारगियाँ
कम हुई हैं...
सारे हौसले बाजार खा गया है
शर्म आईने की तरह टंगा है दीवार पर
दाँत मांजने के बाद अपने चेहरे का धुला हुआ अक्स
देखने के लिए...
पश्चाताप मुँह पर से पानी पोंछने के बराबर है
शराफत असल में
गुसलखाने या पैखाने
के चारखानों तक ही सिमट गयी है...
क्योंकि पूरे बाहर,
सिर्फ़ जो नंगई है, उसकी तासीर गज़ब की है !
इसको पकड़ने वाली आँखों पर
संभाव्य अवसर की संभावना की टाट झूलती है...
अत: वह नजरंदाज कर दी जाती है.

सारी विभत्सता के बाद
गुलाब बाग़ का सरकारी संपोषित, संरक्षित
गुलाब खिलता महकता रहता है
निरपेक्ष सौंदर्य का नमूना पेश करता है...
वही, जिसका बाजार अनुमोदन करता है,
जिसका सत्ता अभिवादन करती है...

लाल रंग हमेशा पीछा करता है...! सलाम करता है...
खून में दिखता है...
जहाँ बहता है, अपना वक्तव्य भी देता है...
उसको पढ़ने वाली नजर पर भी
दरबारी "ब्राण्ड" की मलाई चढ़ी होती है !
यह अफसोसजनक होने से ज्यादा
घृणास्पद है...

धर्म, विचार और पवित्र जुनून
जैसी संकल्पनाएँ व्यावहारिक रूप से
बेवकूफ बनाने का
सबसे कारगर विज्ञापन हैं...
यह कहना क्षोभ पैदा करने के समान है कि
संकट का छायाभास
खड़ा करना बहुत जरूरी चीज हो गयी है.
ऐसा इसलिए कि
संकट के कई रूपों और व्यक्तिवाचक संज्ञाओं पर
माल बिकने की संभाव्यता बढ़ जाती है.

सवाल करना भी
विरोध करना है
और विरोधी हो जाना यथास्थिति की ढूह को ठोकर
मारना है
सारे अवसादों के बीच भी
यह उत्साह कई गुना बढ़ा देता है...
यथास्थिति को तोडना
दरअसल आदमी हो जाना है...

सवाल करना और संभावनाएं पैदा करना
बेहद जरूरी और जायज हैं...बेहद...

1 टिप्पणी:

  1. सबसे बड़ी समस्या यही है की इन्सान और कुछ भले हो जाए इन्सान नहीं बन सकता वों............फिर भी ये रचना सवाल करने और जवाब के लिए लड़ने को प्रेरित करती है,...........बेहतरीन रचना कुछ ही ऐसे लोग हैं जो यहं ब्लॉग की दुनिया में जिनकी कविता आदमी को झकझोरती है और ये कविता भी उनमें से एक है........

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