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सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

पहले दिनों जैसा प्यार...

प्यार के शुरूआती दिनों को भरपूर जीओ दोस्त...
क्योंकि सिर्फ़ तब ही होता है,
रहता है पूरी तरह से,
ईमानदार प्यार...
सौ पैसा खांटी खुमार देता प्यार...
किसी बच्ची सा भोला और निश्छल प्यार...

जिसमें कौंधती है, प्यार करने वाले की आत्मा
और उसकी सच्चाई...
तुम्हारी फ़िक्र और परवाह वाकई सचमुच की होती है
तब, सचमुच जरा सी भी दूरी डरा देती है मन को
और बाँहों के घेरे का कसाव असली तड़प लिए होता है...
वह गर्मी भी खालिस होती है जो तपे हुए चेहरे,
सांसों और होठों से नुमांया होती है...
सारी प्रार्थनाएं सीधे कलेजे से निकलती हैं और
सबकुछ लुटाकर भी मजे में रहने वाली आस्था सच्ची होती है...

खेद है कि, फिर ऐसा रह नहीं जाता...
फिर तो सावन भी बरसता है, मगर उसकी आग महसूसती नहीं
साथ चलते हुए भी परछाइयाँ परस्पर लिपटती नहीं...
तुम्हें तड़प कर पुकारने वाली उस आवाज़ की आस में जिंदा रहते हो और
वही एक पुकार फिर आती नहीं...

फिर प्यार ना गाढ़ा, ना जुनूनी, ना विशुद्ध, ना गहरा,
ना किसी आवेग का रह जाता है !
मात्र एक खोखली उम्मीद की मानिंद...
जो एक-दूसरे से बमुश्किल निभ पाता है...!

प्यार को गुना-भाग, जोड़-घटाव...
किसी समीकरण में तौले जाने और
दुनियादार हो जाने से
पहले पूरी तरह से जी लो...
क्योंकि, फिर पलट कर नहीं आता है...
पहले दिनों जैसा प्यार...
फिर अपना-अपना कहते-कहते भी
अपना होने का भ्रम मात्र बनकर रह जाते हैं लोग...

फिर पूरी शिद्दत से
तुम उसी प्यार की कशिश को पाने के लिए
जुझने तो लगोगे...
मगर दोस्त... वह प्यार नहीं मिलेगा
ना फूलों और चाँद पर, ना भरी-पूरी रातों में, ना घर में, ना बगीचों में...
तलाशोगे अगर साथी की आँख में, चेहरे पर, उसकी बातों में...
और शारीरिक भाषा में... हताश होओगे यह पाकर कि
कोई गीली चीज दरम्यान से गायब है...
सिर्फ़ एक पथरीली सी हँसी है, जिसे तुम नहीं पहचानते और
बहुत सारा पानी सूख चुका है !

प्यार अक्सर दिन ढलते जाने पर
उपेक्षात्मक होता जाता है...
सैद्धांतिक रूप से तो...ठीक इसके उलट होना
और आदर्शवादी तौर पर...
ऐसा कतई नहीं होना... चाहिए...
मगर...
होता यही है...  

इस पर अफ़सोस करने की हालत में पहुँचने से पहले
खुलकर, डटकर... पूरी मौज के साथ
इस प्यार को जीयो मेरे दोस्त...!

5 टिप्‍पणियां:

  1. प्यार के शुरुवाती दिन सचमुच में प्यारे होते हैं...लेकिन प्यार तो तभी मुकम्मल होता है जो जिन्दगी भर साथ चले...जहान तक कविता के शिल्प का सवाल है तो मुझे इसे लेकर कुछ नहीं कहना...क्योंकि मुझे वप कविता हर शिल्प से परे नज़र आती है जो अपनी बात सीधे सीधे दिल में अतर कर कह दे....कविता अच्छी है...और रोज ब रोज आपकी कविता अपना रंग और गाढ़ा करती जा रही है...

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  2. गज़ब की रचना ज़िन्दगी की सच्चाई को बयाँ करती हुयी………………इस विषय पर काफ़ी कुछ कहा जा सकता है………………बहुत सुन्दर लिखा है दिल मे उतर गया।

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  3. प्रेम के गहरे भावों की निश्छल अभिवक्ति की ये कविता गहरे प्रभावित कर जाती है.प्रेम की इमानदार स्वीकारोक्ति और उसके पहले जैसा न रह पाने का दुःख स्वाभाविकतः एक टीस जगाता है. रेत का मुट्ठी से फिसलते जाने जैसा प्यार का एहसास पूरा बांध -समेट लेने की कवायद करती ये पंक्तियाँ जीवनानुभवों का सहज कहन हैं ,भाषाई सादगी देखते ही बनती है ,भाव -कथ्यानुरूप .बधाई शेखर भाई .एक उम्दा कविता .

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