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बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

गुमनाम इश्तिहार सा मैं...!


जब भी ढूंढोगे मुझे
वक्त की किसी पिछवाड़े वाली,
काई लगी, चीकट... भरभराई सी दीवार पर एक
गुमनाम इश्तिहार सा
पीछे छूट गयी गयी किसी तारिख की मानिंद
मिलूँगा मैं...!
और तुम्हें चकित कर दूँगा...

कोई राह चलता, ऐन उसी वक्त गुजरेगा वहाँ से और
तुम्हारी उम्मीद के खिलाफ, तुमसे पूछेगा,
इस शख्स को जानते थे क्या ?
वह ताड़ चुका होगा, तुम्हारी कोशिश...
तुम्हारे लगातार झपकती पलकों की बेचैनी से !
तुम्हें ठिठका हुआ देखकर मेरे अक्स के सामने
बिलकुल काठ की तरह... कि तुम भी उस समय मेरे साथ
स्थिर अवस्था में होगे...
सिर्फ एक फर्क होगा कि तुम्हारे भीतर सांस उतरती होगी...
और तुम्हारा मांस कुछ गर्म होगा !

तुम सोचोगे, शायद...
यह आदमी ठीक अंदाज़ा लगा सकता है ! और जिरह कर सकता है !
यद्यपि मेरी स्मृतियाँ
तुम्हारे किसी समकालीन मकसद में नत्थी नहीं की जा सकेंगी
फिर भी यह तुम्हारा जाती मसला होगा कि
तुम उस दीवार के पास खड़े होकर मुझे याद करो...

और जब याद करते हुए टोके जाओ...
तो यह याद रहे -
तुम झटके से टाल सकने का अधिकार...
अपने पास सुरक्षित रखना !

मंगलवार, 4 अक्तूबर 2011

औरत की भाषा


औरत के पास यों तो कई भाषाएँ होती हैं...
उसकी पहली और पुख्ता भाषा - प्रेम - है...
मगर जो अपने आप में लगभग
बेज़ुबान होती है...!
इतनी खामोश कि जिसे सिर्फ सुना नहीं जा सकता...!
औरत कहती नहीं कि
उसकी भाषा के बाहर
कहीं भी
कोई भी
उससे अलग रह सकता है ! मगर यह सच है...

वह आदमी जिसे वह अपना समझती है
अपनी भाषा से उसे पहले पहल बांधती है,
जो नहीं बंधता, वह उसका नहीं होता...
इसमें कुछ भी अनर्गल नहीं होता क्योंकि,
आदमी की आँखें जहाँ काम करती हैं, छिछला सा...
उसी जगह औरत, भाषा गढती है, उसे करीने से रखती और
आँखों की मानने के बजाय सबसे पहले एक अंदरूनी भाषा ईजाद करती है...
जिससे वह थाह सके सामने वाले को, बेध सके या
बाँध सके उसे, जिसके सम्मोहन से वह खुद बंधना चाहती है...
औरत यह जादू जानती है...
इस जादू को जीवन भर मांजती है...
इस तरह वह पुरुष से अलग हो जाती है...

प्रेम को परखने का गुर उसके पास होता है,
जो उसके सामने भाषा की परखनली से छन कर आता है...

औरत अपनी भाषा का इस्तेमाल
बहुत सध कर करती है !
जबकि वह भी कभी-कभी सिर्फ औरत होती है, खालिस औरत तो,
अपनी भाषा के पैंतरों से खुद को सुरक्षित भी करती है...
और गैर-औरतों का भ्रम भी तोडती है...
भाषा उसकी ताकत है, जिसमें वह शत्रु का ध्वंस,
और अपने प्रिय को दुलार, एक ही प्रतिबद्धता से कर सकती है !.

'प्रेम' जैसी भाषा की सारी शब्दावली
और व्याकरण --
पूछना औरत से,
और हो सके तो सीखना
कि कैसे हो जाती है,
भाषा उसके पास
एक कला, एक कवच और एक कटार !

सोमवार, 3 अक्तूबर 2011

भरोसा और हंसी, जिंदगी



भरोसा और हंसी, जिंदगी

मुझे लगता है
(और ऐसा उन बहुतों को लग सकता है, लगता होगा) कि,
आदमी को तोड़ देने के लिए
सिर्फ उसका भरोसा तोडना काफी है...
भरोसा, जो उसकी हड्डियों में फास्फोरस की तरह शामिल होता है...
और इसी के दम पर उसकी रीढ़ लम्बवत खड़ी रहती है...
और उसके सांसों का चाप बना रहता है...!

वहीँ, एकदम वहीँ...
वे चोट करते हैं, और इसका समय कोई नियत नहीं होता !
कि बारहाबार एक ही जगह चोट करते रहना
वे कितनी शातिरता से सीख हुए लोग होते हैं और
आदमी की हर उम्मीद
को खारिज करने का लंबा षड्यंत्र
कामयाबी से चला कर
उसकी हंसी को नेस्तनाबूद कर डालते हैं...
यह उनके स्वार्थ का नया नाजीवाद है.

असल में, आदमी की असली मृत्यु उसी समय हो जाती है !

मैंने देखा है, कई दफे कि
आदमी तो हंसना और जीना चाहता है,
यह बस नैसर्गिक है,
मगर वह बस एक ही जगह खत्म हो जाता है,
जब एकाएक उसे पता चलता है कि
इसके बाद उसके लिए कुछ बचा नहीं...
न उसकी कोशिशे, न उन कोशिशों की कीमत
न उसके हँसने की वज़हें, न ही हँसने के मौके !
(और अब शौक से हँसने वाले मध्यवर्ग में पाए भी नहीं जाते !
मजबूरी में हंसें सो अलग बात ...)

सीधी सी बात है, जब आदमी हँसता नहीं, वह मृत्यु के कुछ और पास हो जाता है...

जीने के लिए संतोष वह मसाला है, जो बेहतर कल और कामयाबी
की उम्मीद के भरोसे की आंच पर पकता है... और,
जो जिंदगी के मकान की दीवारों में दाखिल गारे में शामिल होता है

संतुष्ट आदमी ही हंस सकता है, क्या इससे आप इंकार कर देंगे ?

तो...
जीने के लिए हमें उन हाथों और इरादों को तोडना होगा जो
हमारा भरोसा तोड़ने के लिए बढ़े हुए हैं, प्रशिक्षित हैं,
और इसके लिए वेतनभोगी भी हैं !
उनके तिलिस्म और चोट को अपने नकार के दायरे में लाकर
अपने भरोसे की ज़मीं पर अपनी हंसी बजाफ्ता उगानी होगी...

चीखो

एक ऐसे सपाट दुनिया के,
जिसे भूगोल की किताबों में अंडाकार बताया गया है...
तुम और मैं जैसे लोग हाशिए के भी बाहर कहीं गैर परिभाषित जगह पर हैं...
हममें अभी खिलाफत में चीखने की कूवत बाकि है...
सारे फैसले बेशर्मी की आला मिसाल हैं और
पानी के अनुपात की तर्ज पर जहाँ का एक तिहाई हिस्सा
नृशंशता की हद तक गैर-बराबरी का है,
यह उतना ही क्रूर और ठंडा है, जितना कसाई के छुरे का वार...
इसको समझना मुश्किल नहीं है...

चूँकि बताया जा रहा है कि प्रतिदिन ३२ रूपये खर्चने वाला
एक आर्थिक हैसियत या पैमाना बताने वाली उस अदृश्य रेखा के ऊपर है ! और...
इसलिए यह एक बेशर्म मजाक है ! इस पर हँसना कुछ इस तरह का आत्मपीडक काम है जैसे,
पुराने घाव के भीतर सलाखें भोंकना...
लगातार...
कुछ अनचीन्हे मुखौटों के पीछे छुपी हुई आवाजें
हौलनाक लतीफें सुनाती हैं कि
अमुक तारीख को
तुम्हारा वजूद बदल कर रख दिया जायेगा...
और तुम उस तारिख के तुरंत बाद खुद को पहचानने से इंकार कर दोगे...! 
पूछोगे किससे, क्या यह सच है ?

इस दुनिया के हाशिए से बाहर होने के बावजूद...
वे हमें डराने के लिए मजबूर हैं, कि उन्हें भी हमसे उतना ही डर है !
इसलिये यहाँ हत्यारों के चेहरे की मासूमियत तुम्हें दंग कर सकती है !
और यही बात उनके फायदे की है...!

 "इंसानियत", "इन्साफ" "ईमानदारी", "इंकार: और "इन्किलाब" जैसे
शब्दों में जरूर कोई बहनापा है,
इसलिए ये इनके शब्दकोष से सिरे से अपने अभिधेयार्थ सहित गायब हैं !!!

चीखो-चीखो-चीखो...!
क्योंकि २३ मार्च को फाँसी पर चढ़ने वाले उस तेईस साल के जाट नौजवान ने
कहा था, "ऊँचा सुनने वालों को धमाकों की जरूरत होती है !"
कॉम. विनीत तिवारी की किताब का विमोचन... indo

बुधवार, 28 सितंबर 2011

जनप्रतिबद्ध भावनाओं की विचारशील कविताएँ इंदौर। प्रगतिशील लेखक संघ व जनवादी लेखक संघ की इंदौर इकायों ने 25 सितंबर 2011 रविवार को देवी अहिल्या केन्द्रीय लायब्ररी के अध्ययन कक्ष में कवि श्री अनंत श्रोत्रिय के रचना पाठ का आयोजन किया। श्री अनंत श्रोत्रिय ट्रेड युनियन व कर्मचारी संगठनों से जुड़े रहे हैं। वे प्रगतिशील विचाराधारा के प्रतिबद्ध कवि हैं और फिलहाल प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई के अध्यक्ष हैं। हाल ही में साहित्यक पत्रिका राग भोपाली ने अनंत श्रोत्रिय के रचनाकर्म पर एकाग्र एक अंक निकाला है। श्री श्रोत्रिय ने "पूरब का सूरज" कविता सुनाकर कार्यक्रम की शुरुआत की। उठेंगे कदम, जूझेंगे हम साथ जूझता होगा जनजन हाथ उठा मुट्ठी तानी ताल मिली गरजा जनजन उन्नीस सौ बयालीस, आर.एन.आय. का रिवोल्ट उद्वेलित करते, गरजा जनजन हुंकार भरता नभ, बना प्रेरणा बढाओ कदम पूरब में सूरज बिखेरे लाली उड़ावे गुलाल यही तो सपना दिन विहँसा किरणें विकीर्ण जनजन में जागी खुशियां. उनके बाद प्रदीप मिश्र, विनीत तिवारी और प्रांजल श्रोत्रिय ने श्री अनंत श्रोत्रिय की चुनी हुई कविताओं का पाठ किया। पोस्टर, यह रास्ते, सर्वोदय, प्रामाणिक ज्ञान आदि कविताओं को काफी सराहना मिली। वरिष्ठ कथाकार श्री सनत कुमार ने श्री श्रोत्रिय के मालवी लेखन और गद्य लेखन पर अपना वक्तव्य केन्द्रित करते हुए कहा कि १९५० के दशक के शुरुआती वर्षों में श्री अनंत श्रोत्रिय का एक आलेख महाकवि निराला पर आया था और उसने मालवा के पाठकों को निराला से परिचित करवाया था. वह बहुत अच्छा आलेख था जिसमें साहित्य के वैज्ञानिक आधारों पर निराला की कविता का विवेचन किया गया था. उन्होंने ये भी कहा कि श्री श्रोत्रिय की कविता अवधारणात्मक वृत्ति की प्रकृतिमूलक कविता है. द्वंद्वात्मक भौतिकवाद जैसी जटिल अवधारणा को भी उनहोंने कविता में पिरोया है। हमारा अस्तित्व भी एक प्रश्न चिन्ह फिर क्यों कर यह सब वाद-विवाद, जब सब कुछ है असत्य, अस्तित्वहीन तो यह माथापच्ची क्यों कर? उन्होंने मालवी जीवन के सुख-दु:ख, आशा-निराशा को बिना लाउड हुए अभिव्यक्त किया है। उन्होंने मालवा के जनकवियों के मूल्यांकन का महत्त्वपूर्ण काम किया है। उनके साथ मालवा के प्रगतिशील कवियों की एक पूरी परंपरा है जिनमें मान सिंह राही, रंजन, प्राण गुप्त और मजनू इंदौरी के नाम प्रमुख हैं. उनकी विरासत का सही मूल्यांकन होना अभी बाकी है। यह यात्रा मालवा में 60 वर्ष से विकसित हो रही है। श्रोत्रियजी की कविताओं में प्रकृति के रम्य चित्र हैं। पानड़ा झर-झर झरी रिया आंगवात लाग्या मोर बागों फूल में की उठाया हिरदा में उठे हिलोर लीली लीली चादर तणी खेत में इतराती अरे (अलसी) अई-वई डोले उन्होंने कहा कि श्रोत्रियजी की कुछ कविताएं तो केदारनाथ अग्रवाल की याद दिलाती हैं। इस अवसर पर कवि ब्रजेश कानूनगो ने कहा कि श्रोत्रियजी की कविताओं में कला, शिल्प, और बौद्धिकता का इतना आग्रह नहीं है, जितना कि अभिव्यक्ति और सम्प्रेशनीयता का। वे अपनी कविताओं के जरिए एक प्रतिबद्ध कवि नज़र आते हैं। उनकी कविताएं रातनैतिक कविताएं हैं। कवि में वामपंथी एक्टिविस्ट साफ़ साफ़ दिखाई देता है। मनुष्यता व मनुष्य के पक्ष में अनंत जी की आकांक्षाएं अनंत हैं। वे 82 की उम्र में भी वामपंथी मूल्यों के प्रति सतत संघर्षरत हैं। उनका सकारात्मक कवि इस सफर को जारी रखना चाहता है। वे कहते हैं - सफर लंबा है मंजिल समीप नहीं इंसान ने फिर भी कितना तय कर लिया रास्ता लेखक, कवि एवं एक्टिविस्ट विनीत तिवारी ने कहा कि श्रोत्रिय जी की कवितायें उस दौर कि कवितायें हैं जब साधारण से साधारण कविता भी एक वैश्विक चेतना तक पहुँचने लगी थी. उस दौर में कपड़ा मिलों में काम करने वाले कवि भी सिर्फ अपनी तकलीफों या संघर्षों या घर परिवार के बारे में ही नहीं लिख रहे थे बल्कि वे एशिया के संघर्षरत अन्य देशों के बारे में या अंगोला या रूस, चीन की जनता के के बारे में भी लिख रहे थे और एक तरह का अंतरराष्ट्रीयतावाद उनमें विकसित हो रहा था. आज प्रतिष्ठित हो चुके कवियों के भीतर भी यह चेतना या तो नदारद है या बहुत कम मौजूद है. यह ज़रूर देखना चाहिए कि श्रोत्रियजी की कविताओं में शिल्प के प्रति असजगता है क्योंकि उन्होंने कवि कर्म को भी एक एक्टिविस्ट की ही तरह किया है. बहुत सारे दोहराव भी इन कविताओं में हैं लेकिन अपने समाज, राजनीति की जनपक्षधर समझ और वामपंथी सोच को इसमें साफ़ पारदर्शी तरह से देखा जा सकता है. उनकी कविता "पोस्टर" आम जन के भीतर विकसित होने वाली राजनीतिक समझ की प्रक्रिया की बानगी है- दीवार पर चिपका पोस्टर लाल नीले रंगों में छपा इसके अक्षर समेटे हैं बीज क्रांति के, संघर्ष के कार्यक्रम में कवि राजकुमार कुंभज ने श्रोत्रियजी की कविताओं और उनके जीवन को जनान्दोलनों का अभिन्न हिस्सा बताया और कहा कि श्रोत्रियजी की कविताओं में मुक्तिबोध के बिंब व प्रतीक याद आते हैं जो मनुष्य जीवन की जटिलताओं को व्यक्त करते हैं। उनके कवि कर्म में सारी चीजें जनसंघर्ष से निकल कर आई हैं। वे जुलूस को देखते हुए दर्शक नहीं बल्कि जूझते हुए संघर्षरत योद्धा की तरह नज़र आते हैं। इस घनीभूत पीड़ा में भाषा उनकी कविता के पीछे पीछे आ रही है। उनके तमाम प्रतीक कलावाद के निषेध में आते हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता इंदौर इप्टा के अध्यक्ष विजय दलाल ने की। इस अवसर पर चुन्नीलाल वाधवानी, विक्रम कुमार, अजय लागू , सुलभा लागू , विश्वनाथ कदम, केसरी सिंह चिढार , सारिका श्रीवास्तव आदि मौजूद थे। संचालन किया प्रलेस इंदौर के श्री एस. के. दुबे ने। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ इकाई-इंदौर

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

बेटी - तीन कवितायेँ

बेटी - १
----------------
बेटी -
अंतत: एक परछाई होती है तुम्हारी,
जो अँधेरे में भी
छायाभास की तरह साथ बनी रहती है...
एक भरोसे का शमियाना बनकर
तुम्हें ढांपती, धुप, धूल, बारिश से बचाती हुई
अपनी कोशिश के आखरी सिरे तक !
एकदम पास, एकदम सजग !
इस निष्कर्ष पर यह उम्र लायी है मुझे
कि इसके हर क्षण पर बेटी की अंतरंगता
नमक की तरह जिंदगी का स्वाद कायम करती रही है !

बेटी,
जिसकी अनुपस्थिति में
दीवार के पास वाली मेज का मेजपोश
बदरंग लगता है
या अपनी रसोई से
चाय की महक उठती भी है तो
अजनबी सी लगती है...
पता नहीं चलता कि
चेहरे की दाढ़ी बढ़ गई है इतनी ज्यादा,
और बगीचे में बेली के पौधों में
पानी डालना भी एक नियम हुआ करता है गर्मियों में !

ज़मीन हिल सकती है,
सारी दीवारें भरभरा सकती हैं
मगर बेटी वह ठोस स्तंभ है जिसके पास का कोना
सबसे सुरक्षित बना रहता है हमेशा
क्या तुम मुझसे असहमत हो सकते ?

सुनो, बेटी जाने क्यों
इतनी-इतनी ज्यादा जिम्मेदार हुआ करती हैं
कि बे-फ़िक्री से
जिंदगी का सारा बोसीदापन
सोख लेती है,
सिर्फ एक लाड भारी मुस्कान देकर
सिर्फ एक बार लाड से
तुम्हें पुकार कर - "बाप्पा !"
------------------------------

बेटी - २

उसके नन्हें कोमल से हाथ
जिसकी कनिष्ठ ऊँगली थामे मैं सैर को जाया करता था...
कब मुझे कंधे से सहारा देने वाले हो गए,
मैंने जाना नहीं...
नहीं गौर करता रह सका
उसकी बढती हुई उम्र से
ज्यादा नैसर्गिकतावश गढ़ती हुई उसकी परिपक्वता,
जो एक ठेठ वास्तविकता थी...!
मैंने अपनी तमाम व्यस्तताओं से अभिशप्त
नहीं था उसके पास तब उतनी देर, कि जितने में जान सकूँ
यह तथ्य कि,
तब वह ठीक अपनी माँ कि तरह,
किसी अँधेरे में रोने के लिए कोई वाजिब कोना
तलाशने के बजाय
अंधेरों से लड़ने के वास्ते
योजनायें बनाया करती थी...
और हर चोट पर मुस्कान का लेप
चढ़ाये रहती थी...
मैं कितना बेखबर था, किसी आश्वस्ति के मारे !
या मैं नहीं सुन सका भी,
उसकी हरेक हंसी के पीछे मेरी उदासियाँ माँजकर
मुझे खुशी से चमकता देखने का आग्रह...

बेटी, जो सबसे विलक्षण भेंट की तरह
मेरे सामने उपस्थित रही है...
मैं उसके 'होने' को फिर
ठीक-ठीक कैसे बयान करूँ ?

-------------------------------------------------
बेटी - ३

मुझसे कहने लगती है
"बाबा, आपके पास बैठती हूँ तो
एक ताकत, एक तसल्ली
किसी करिश्में की मानिंद
मेरे वजूद में पैवस्त हो जाती है
और मुझे लगता है
मैं जीत सकती हूँ
हर चुनौती, चाहे वह लैंगिक हो या व्यावहारिक !
कि मैं सुरक्षित हूँ अब...

मैं ज्यादा हँसने लगती हूँ
मैं बक-बक करती ही जाती हूँ...
मैं खिल-खिल हँसती हूँ और आप
हमेशा की तरह, माँ के जैसे नहीं टोकते
न बुआ की तरह आँखें तरेर कर धमकाते हैं कि -
बस बहुत हो गया,
जवान हो रही हो,
होश करो !!!

बाबा, मैं वापस बच्ची ही तो हो जाती हूँ
जो माँ की डांट से घबरा कर
आपकी गोद में आ बैठती थी
और बैठे-बैठे चुपके से सो जाया करती थी !
आज भी
कई दफा मन करता है कि
जब कोई मुझे कोई तकलीफ दे
(और जिसे मैं आपके सिवा किसी से साझा करती भी नहीं,
आप जानते हो न बाबा, आप ही मेरे 'बेस्ट-फ्रेंड' रहे हो !)
तो आपके सिरहाने आ बैठूं और
देर तक अपनी उलझनें और
दर्द की सलवटें
आपकी नर्म बातों और गर्म दुलार से
सीधी करती रहूँ...

बाबा, आप मुझे हमेशा मेरा बचपन देते हो...!
यह सबसे सुखद है..."

और जब बेटी इतना कह मेरे कंधे पर
बच्ची की तरह अपना गाल दिए बैठ जाती है
तो, मैं भी हँसते-हँसते कह जाता हूँ,
"हाँ बेटी, यह मेरे लिए भी तो उतना ही सुखद है...!"


बुधवार, 25 मई 2011

साहित्य का गैर राजनीतिक होना हमारे लिए चुनौती है: लक्ष्मीनारायण

इंदौर. ११ मई २०११
प्रगतिशील लेखक संघ की आन्ध्राप्रदेश इकाई के अध्यक्ष कामरेड लक्ष्मीनारायण ने प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई के साथियों को संबोधित करते हुए कहा कि साहित्य का गैर राजनीतिक होना हमारे लिए चुनौती है. उन्होंने कहा कि ऐसे दौर में जब लोग जनवाद और प्रगतिशीलता को पुरानी और ख़त्म हो चुकी चीज़ मानने लगे हैं और इसका प्रचार किया जा रहा है तो अपनी तरह से सोचने वाले साथियों के बीच आकर खुशी महसूस होती है. इंडियन कॉफ़ी हाउस में साथियों के साथ अनोपचारिक बातचीत करते हुए उन्होंने तेलगु साहित्य की प्रगतिशील धारा के बारे में जानकारी दी. १९१० में प्रगतिशील तेलगु साहित्य ने आकार लेना शुरू किया और १९३६ में जब लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ का पहला सम्मलेन हुआ तो उसमें तेलगु साहित्य के तीन प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. इस तरह प्रगतिशील तेलूगु ने आकार लेना शुरू किया. १९३० का दशक तेलगु साहित्य के लिए काफी महत्वपूर्ण था. इसी दौरान आज़ादी की लड़ाई के साथ ही कम्युनिस्ट आन्दोलन की भी शुरआत हुई थी.
श्री लक्ष्मीनारायण ने कहां कि वह समय राजनीतिक लेखन का था. प्रगतिशील लेखक संघ का सदस्य होना उस दौर में फेशन होता था. आप तब तक लेखक नहीं माने जाते थे जब तक आप प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य नहीं होते. उसी दौरान तेलुगु साहित्य में मजदूर व शोषित के हक़ में आवाज बुलंद की गयी. उससे पहले तक तेलुगु साहित्य की भाषा भी संस्कृत की तरह थी जो बाद में आम लोगों की भाषा बनी.
उन्होंने ऐसे तेलुगु साहित्यकारों के बारे में भी बताया जो अधिक प्रसिद्ध नहीं हैं लेकिन तेलुगु साहित्य में जिन्होंने अपनी उपस्थिति दर्शायी. इनमें प्रमुख हैं शारदा व् श्री श्री.
आज़ादी के बाद हुक्मरानों को इस प्रभावशाली मुहिम से खतरा महसूस होने लगा. उनहोंने दमनकारी नीति अपनानी शुरू कर दी. तेलंगाना मुहिम को कुचलने के साथ-साथ प्रगतिशील लेखक संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया. कई लेखक चेन्नई भाग गए. इसके बावजूद प्रगतिशील लेखक संघ का प्रभाव कम नहीं हुआ. प्रगतिशील लेखक संघ की तेलुगु इकाई ने विश्व साहित्य और हिन्दी व बांग्ला के उत्कृष्ट साहित्य का भी अनुवाद तेलुगु में किया. इसमें विशाल आंध्रा पब्लिकेशन का काफी सहयोग रहा है.
गुंटूर जिले के निवासी कामरेड लक्ष्मीनारायण खुद भी अच्छे लेखक हैं व जिला बार एसोसिशन के अध्यक्ष भी रह चुके हैं.
कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि कृष्णकांत निलोसे, इप्टा इंदौर इकाई के सचिव अशोक दुबे, वरिष्ट लेखक श्री एस के दुबे, सारिका श्रीवास्तव, युवा कवि रोशन नायर, अभय नेमा, विनोद बन्डावाला, मनीष पाण्डेय, सत्येन्द्र रघुवंशी आदि उपस्थित थे. प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य महासचिव विनीत तिवारी ने श्री लक्ष्मीनारायण का परिचय दिया और बताया कि श्री लक्ष्मीनारायण भोपाल में राष्ट्रीय महासचिव श्री कमलाप्रसाद के निधन के उपरान्त उनके परिजनों से भेंट कर अपनी और आँध्रप्रदेश के अन्य साथियो की और से शोक संवेदनाएं देने भी गए थे और लौटते हुए इंदौर में उनहोंने साथियों से मिलने की इच्छा प्रकट की तो तत्काल ही हम लोग इकट्ठे हो गए. श्री लक्ष्मीनारायण ने तेलुगु साहित्य की प्रगतिशील धारा के बारे में विस्तार से परिचय कराया और श्री श्री व शारदा जैसे महान कवियों की कवितायें भी सुनाईं.

विनोद बन्डावाला

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

कृष्णा सोबती के उपन्यासों में पुरुष पात्रों का चित्रण - गुंजेश

[गुंजेश उर्जावान युवा कथाकार हैं. फिलहाल महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्विद्यालय, वर्धा में जनसंचार की पढ़ाई कर रहे हैं. पिछले ३०-३१ मार्च २०११ को

जमशेदपुर में करीम सिटी कॉलेज में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रायोजित सेमीनार- "महिला लेखिकोण के उपन्यासों में पुरुष" विषय पर उनके द्वारा पढ़ा गया परचा हम यहाँ साभार दे रहे हैं.]

‘कृष्णा सोबती के उपन्यासों में पुरुष पात्रों का चित्रण’, यही वह विषय है जो मैंने चुना है। मैं समझता हूँ कि कृष्णा सोबती और उनके उपन्यासों में पुरुष पात्रों पर बात शुरू करने से पहले एक बार हमें उन परिस्थितियों और परिदृश्यों को देख-समझ लेना चाहिए। जिसमें यह बहस चल रही है। इस समय पूरे विश्व में और खास तौर से एशियाई देशों में ‘स्त्रीवाद’ को जिस नज़रिये से देखा जा रहा है। ‘स्त्रीवाद’ के जिस पक्ष को पापुलर मीडिया के जरिये बार-बार दिखाया जा रहा है। यह बिलकुल ठीक समय है जब, उन सब के बारे में पड़ताल कर ली जानी चाहिए। अपने मूल रूप में ‘स्त्रीवाद’ एक मुक्तिगामी समाज कि परिकल्पना है जहां लैंगिक आधार पर किसी तरह का शोषण नहीं होगा। ‘स्त्रीवाद’ पहले एक दर्शन है फिर राजनीति, यह हमें समझना होगा। इसका उदेश्य पितृसत्ता को सिर के बल खड़ा करना है न की पुरुषों को। हाल के वर्षों में स्त्रियों का जो लेखन चर्चित रहा है और जिन लेखिकाओं पर खूब बहस हुई है उसमें जिस तरह के समाज का चित्रण है वह एक विक्षिप्त समाज लगता है। जिसमें ‘पुरुष’ का सारा ध्यान स्त्री की ‘योनिकता’ पर केन्द्रित है। एडवर्ड सईद ने हमें संशयवाद का अच्छा हथियार दिया है। मैं समझता हूँ हमें इस पूरे परिदृश्य पर संशय करना चाहिए, शक करना चाहिए, सवाल करने चाहिए। और सवालों के जबाब तो हमें ढूँढने ही होंगे जो जबाब हमें मिल रहे हैं उनपर भी हमें सवाल करने होंगे। लोकप्रियता की भी अपनी रजीनीति होती है। ‘स्त्रीवाद’ का लोकप्रिय पक्ष क्या है? मुक्त सेक्स! पितृसत्तात्मक समाज ‘स्त्रीवाद’ की आलोचना और व्याख्या दोनों ही इसी आधार पर करता है और ‘स्त्रीवाद’ के इसी पक्ष को प्रचारित भी करता है। शायद इसलिए जब हम हाल के वर्षों के चर्चित महिला लेखिकाओं के उपन्यासों पर नज़र डालें तो हम देखेंगे कि इनके अंतर्वस्तु उन्हीं व्याख्याओं को पुष्ट करते हैं जो पितृसत्तात्मक समाज ‘स्त्रीवाद’ के परिपेक्ष में करता है। मेरे कहने का उद्देश्य यह है कि आज ‘स्त्रीवाद’ के सामने दोहरे संकट हैं जहां उसे ‘पितृसत्ता’ के खिलाफ समानता कि लड़ाई लड़नी है वहीं तात्कालिक संदर्भों में उसे पितृसत्ता के नए-नए अवतारों और मुखौटों को पहचानने की ज़रूरत है। आज ‘स्त्रीवाद’ को जहां यह साबित करना है कि वह इस भूमंडलीकृत दौर में उस तथाकथित आधुनिकता का औज़ार नहीं है जहां स्त्रीमुक्ति का अर्थ ‘फ्री सेक्स’ है। साथ ही उसे अलग अलग जगहों पर तालिबानियों, खाप पंचायतों और बहुतेरे जड़तावादी संस्थानों से लोहा लेना है। वहीं उसे आधुनिकता की परिभाषा भी गढ़नी है जहां स्त्री समानता का अर्थ बहुआयामी है। दरअसल दोष महिला लेखिकाओं का उतना नहीं है जितना आलोचना दृष्टि का है। आचार्य शुक्ल ने हिन्दी के प्रारंभिक आलोचना के संदर्भ मे कहा भी है कि “उसका स्वरूप प्रायः रूढ़िगत (कन्वेंशनल) रहा”1 आज भी हिन्दी आलोचना उससे बहुत बाहर नहीं आ पाई है। हिन्दी के पुरुषवादी आलोचकों ने ज़्यादातर महिला लेखन को ‘महज़ देह’ विमर्श तक समेट कर रख दिया है और जहां भी यह लेखन गहरे विमर्शों में गया है उसे ‘पश्चमी फेमिनिज़्म’ का ‘बौद्धिक विलाप’ कह कर उसका माखौल उड़ाया है।
इसलिए हमें लोकप्रियता के पैमानों को परखना होगा और ‘स्त्री’ लेखन को देखने समझने की नई दृष्टि अपनानी होगी। ‘नारीवादी’ लेखन को हमें नारीवादी आलोचना दृष्टि से देखना होगा। तभी हम समझ पाएंगे कि वहाँ ‘देह’ सिर्फ ‘देह’ नहीं है, वह एक प्रतीक है। और देह कि आज़ादी पितृसत्ता से आज़ादी है। हमें महिला लेखन को किसी तरह के आरक्षण देने कि ज़रूरत नहीं है पर यह तो हमें समझना ही होगा कि “पुरुष प्रधान समाजों में सदियों से महिलाओं का दमन और शोषण होता रहा है।....इसलिए तमाम महिला रचनाकारों ने इसी ‘एंग्जाइटी आफ आथरशिप’ के मानसिक फ्रेम में रचना कर्म को अंजाम दिया है”।2 हमें यह समझना होगा कि “स्त्री लेखिकाएं समाज में स्त्री के लिए स्वीकृत भूमिकाओं पर लिखकर अपने लिए ‘स्पेस’ निर्मित करने कि कोशिश करती है पर पुरुष जब उन्हीं विषयों पर लिखता है तो उससे स्त्री के लिए ‘स्पेस’ निर्मित नहीं होता बल्कि ‘स्पेस’ छिनता है”।3 हमें महिला लेखन को किसी सहनुभूति के नज़रिये से देखने कि ज़रूरत नहीं है, बल्कि इन्हें भी सहज जीवन की उस अभिव्यक्ति के रूप में पढ़ा जाना चाहिए जिसमें हम बाँकी लेखकों को पढ़ते हैं। कृष्णा सोबती का पूरा लेखन इसी का आग्रह करता है।
कृष्णा सोबती ‘स्पेस’ बनाने वालों में अग्रणी हैं। सोबती इसका दावा नहीं करतीं हैं उनका मानना है कि दावा करने का अधिकार सिर्फ दार्शनिकों के पास होता है।4 वह ‘नारीवाद’ को समग्रता में समझती हैं और उसे मानवतावाद के निकट लेजाकर अपने उपन्यासों में दर्ज़ करती हैं। सोबती ने उपन्यासों में पुरुष पात्रों का चित्रण उपन्यास के देश-काल के हिसाब से किया है। और वे पुरुष पात्र कहीं भी बहुत ‘लाउड’ नहीं हैं। वे पुरुष पात्र वर्षों से चली आ रही स्थापित पितृसत्ता के वारिस हैं। ‘डार से बिछुड़ी’5 कृष्णा सोबती की पहली रचना मानी जाती है। उपन्यास की कहानी वैसे तो नायिका पाशो के इर्दगिर्द ही बुनी-बसी है लेकिन कहानी की पूरी डोर पुरुष पात्र ही थामे हैं। पाशो एक ऐसी नायिका है जो सिर्फ ‘करने को’ मजबूर है, यह मजबूरी उपन्यास के पुरुष पात्र पैदा करते हैं। महिला लेखन में पुरुषों के चरित्र चित्रण को समझने के लिए हमें उपन्यास में महिला पात्रों के संवादों को समझना होगा। ‘डार से बिछुड़ी’ उपन्यास की कहानी फ्लैश बैक में आत्मकथात्मक शैली में चलती है।
“जिएँ ! जागें ! सब जिये जागें !
अच्छे, बुरे, अपने, पराये- जो भी मेरे कुछ लगते थे सब जीएँ !
घड़ी भर पहले चाहती थी कि कहूँ सब मर-खप जाएँ। न कोई जिए न जागे। मैं मरूँ तो सबको तो सबको ले मरूँ ! इस अभागी के ही जीने के लेख बिसर गए तो कोई और क्यों जिए? क्यों जागे? पर कौन होती थी मैं अपने दुर्भाग्य से हरी-भरी बेलों को जला देने वाली !”5
यह पाशो, जो उपन्यास कि नायिका है, के संवाद हैं। यह कृष्णा सोबती का ही नज़रिया है जो ‘मर-खप’ जाने को अंतिम विकल्प नहीं मानती है। पाशो एक युवती है। जिसकी विधवा माँ “शेखों के घर जा चढ़ी” है। जिसकी वजह से अपने ननिहाल में पाशो भी संदेहास्पद हो गई है। यह संदेह उस पितृसत्ता का है जिसके प्रतिनिधि के रूप में पहले पाशो के मामा हैं। फिर आगे चल कर शेख, पाशो के पति लखपत दिवान, बरकत दिवान, लाला और उनके तीनों बेटे, और फिर पाशो का नया भाई (वीर)। यदि इन सभी पात्रों का विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि ये सभी पात्र अलग-अलग समयों में पितृसत्ता के प्रतिनिधि के रूप में उभरे हैं। पाशो एक से बचती है तो दूसरे में फँसती है। जब वह ननिहाल छोड़ शेखों के यहाँ जाती है तो वहाँ पुरुषों का असल चरित्र सामने आता है। शेख पाशो को अपनी बेटी के रूप में स्वीकार तो करते हैं उसे खूब मान भी देते हैं लेकिन उनके पास यह साहस नहीं है कि वह खुल कर इसका इकरार कर सकें, पाशो तो फिर भी लड़की थी, शेखों कि ऐसी क्या मजबूरी रही होगी? यह वही मजबूरी है जिसे कृष्णा सोबती अपने उपन्यासों में बार-बार उठाती हैं। यह पितृसत्तात्मक समाज में रहने की मजबूरी है। जिसकी शिकार महिलाएं तो हैं ही लेकिन पुरुष भी जाने-अनजाने इसके शिकार हैं। इसलिए इस उपन्यास के पुरुष पात्र इकहरे नहीं हैं। उपन्यास में एक तरफ शेख, शेख का बेटा, दिवान लखपत हैं तो दूसरी तरफ पाशो के मामा, दिवान बरकत, लाला और उनके तीनों बेटे हैं। लाला जो पाशो की कीमत चुका कर उसे अपने घर लाते हैं वो खुद अपने घर में उपेक्षित हैं। कृष्णा सोबती अतिरेक में जाने से बचतीं हैं कम से कम कहानी कहने के सिलसिले में तो ज़रूर। इसलिए उनकी लिखी कहानी किसी और दुनिया की कहानी नहीं लगती।
कृष्णा सोबती के सबसे ज़्यादा चर्चित उपन्यासों में ‘मित्रो मरजानी’6 है। इस उपन्यास में चार प्रमुख पुरुष पात्र हैं। मित्रो (समित्रावन्ती) के ससुर गुरदास, मित्रो का पति सरदारी लाल, सरदारी लाल का बड़ा भाई बनवारी लाल और सरदारी का छोटा भाई गुलजारी लाल। इस उपन्यास को ज़्यादा तर आलोचकों ने मित्रो के ‘बोल्ड संवाद’ के लिए सराहा है। ज़रा याद कीजिये प्रेमचंद के ‘गबन’ को। “गबन की केन्द्रीय समस्या है स्त्री की पितृसत्ता और पूंजीवादी मूल्यों के खिलाफ संघर्ष। प्रेमचंद ने जालपा और अन्य स्त्री पात्रों के जरिये इसी ओर ध्यान खींचा है”।7 प्रेमचंद ने गहनों के माध्यम से गबन में स्त्री मानसिकता में आए परिवर्तन को दिखाया है। मध्यमवर्गीय स्त्रियों को गहनों से बड़ा लगाव होता है। ‘मित्रो मरजानी’ में भी कृष्णा सोबती ने गहनों और पैसों के माध्यम पितृसत्ता के दो रूप दिखाएँ हैं। एक तरफ जहां गुलजारी लाल अपने भाइयों के नाम पर कर्ज़ लेकर अपनी पत्नी के लिए गहने बनवाता है वहीं अपने पति कि नपुंसकता पर सवाल करने वाली (और अगर इसे प्रतिकार्थों में लें तो यह सवाल पूरी परिवार व्यवस्था पर है जहां पुरुषों की मांग पूर्ति ही सर्वोपरी है) मित्रो अपनी जमा पूंजी परिवार के मान को बचाने के लिए अपने पति सरदारी लाल को सौंप देती है। सवाल हो सकता है कि इसमें पुरुषों का चरित्र कहाँ दिखता है? मैंने पहले भी कहाँ है और उसे फिर दुहराना ज़रूरी समझता हूँ कि महिला लेखिकाओं के पुरुष पात्रों को समझने के लिए हमें महिला पात्रों के संवादों और पुरुष पात्रों के प्रति उनके रुख का विश्लेषण करना होगा। सिमोन द बोआ ने लिखा है- ‘वन इज़ नाट बार्न आ वुमेन, वन बिकम्स वन’, नारी जन्म से नारी नहीं होती वह बनाई जाती है। कृष्णा सोबती ने मित्रो के पति सरदारी लाल को नपुंसक पात्र के रूप में रख कर इस प्राकृतिक जैविक अंतर को कम कर, पितृसत्ता की उस ताकत को खत्म किया है। सरदारी लाल के पास वह ताकत नहीं है जिससे वह मित्रो की योनिकता पर कब्जा कर सके। मित्रो के ससुर गुरुदास के इस सवाल का हमे विश्लेषण करना चाहिए जो उन्होंने अपने बेटों से किया है – ‘आप ही उघाड़ोगे और आप ही कहोगे नंगे हो?’6 बेटों ने मित्रो की चरित्र पर शक किया है, घर में बड़े-जेठों के सामने अदालत लगी है और ‘गुरुदास ने मँझली बहू (मित्रो) की ओर ताका तो वह उन्हें छोटे से घूँघट वाली कोई छोटी गुड़िया दिखी!’ गुरुदास अपने बेटों को समझाते हैं –“ बरखुरदार, जवानी के जोश में बात का बतंगड़ ना बनाओ’।6 इस पूरे प्रसंग में कृष्णा सोबती ने पितृसत्ता के पूरे चरित्र को पितृसत्ता के अंतर्गत पुरुषों की वास्तविक स्थिति को स्पष्ट किया है और बेहतरीन तरीके से किया है। यह कोई एकांगी दृष्टि नहीं है। सोबती चीजों को समग्रता में देख रही हैं और उसे दर्ज़ कर रही हैं।
“ बात बिगड़ते देख, बनवारी लाल उठ बापू के पास आ झुका- दिल दिमाग कायम रखो बाबू, यह समय हेर-फेर करने का नहीं करने का नहीं। जिसे समझाना हो समझाओ, जिसे ताड़ना हो ताड़ो”।6
गुरुदास समझदार हैं वो स्पष्ट नज़रों से चीजों को देख रहे हैं। इसलिए यहाँ उनकी भी वही स्थिति हो गई जो मित्रो की है। मित्रो से सवाल है कि उसके पति ने जो उस पर शक किया है, वह सच है या झूठ? मित्रो टका सा जबाब देती है ‘सच भी है और झूठ भी’ आगे मित्रो कहती है-
‘सोने सी अपनी अपनी देह झूर-झुरकर जला लूँ या गुलजारी देवर कि घरवाली की न्याई सुई-सिलाई के पीछे जान खपा लूँ? सच तो यूं, जेठ जी कि दिन-दुनिया बिसरा मैं मनुक्ख कि जात से हँस- खेल लेती हूँ। झूठ यूं कि खसम का दिया राजपाट छोड़ मैं कोठे पर तो नहीं जा बैठी?’
मित्रो के जबाब को सुन –
‘गुरुदास लेटे-लेटे उठ बैठे। बहू कि जगह लड़कों को डांटकर कहा- बोधे जवान कहीं के! तिल का ताड़ करके तरीमत के मुंह लगते हो? कभी दम खम आजमाना हो तो गली गलियारे में जूत-पैजार कर लिया करो!’
तो ऐसे हैं मित्रो मरजानी के पुरुष पात्र सामाजिक यथार्थ के रंगों में रंगे रचे। सोबती समझती है एक आज़ादी का मतलब सिर्फ एक जगह भर से या विशेष स्थितियों से निकल जाना भर नहीं है इसलिए मित्रो अपनी माँ के उस प्रस्ताव को ठुकरा देती है जिसमें वह उसे अपने मायके में ही रहने को कहती है।
सोबती कम लिखने को ही अपना परिचय मानती हैं और कहती हैं कि एक जालिम सी तटस्थता दिल दिमाग पर कब्जा किए रहती है। कृष्णा सोबती के उपन्यासों में यह दिखता है वह किसी पूर्वाग्रह से नहीं लिखती इस लिए ‘दिलो-दानिश’7 के वकील कृपानारायाण को पढ़ते हुए वह हमें बहुत ‘चतुर बेचारा’ सा लगता है।
‘महरी है, महाराज है, बर्तन-भांडे को लड़का है। कपड़ों के लिए धोबन है घर चलाने में अब कौन सा कम बाँकी है जो हमें आपकी मदद के लिए करना चाहिए’।7 इन पंक्तियों को सुन कर क्या महसूस होता है फिक्र और फक्र दोनों ही न! ‘दिलो-दानिश’ में कृष्णा सोबती ने दिल्ली के समग्र ज़िंदगी के बीच से इंसानी रिश्तों के एक ऐसे पहलू को उठाया है जिसका गहरा ताल्लुक मध्ययुग की सामंती जीवन-पद्धति से है”।8 लेकिन इसमें वकील साहब का कोई दोष नहीं दिखता। यह जीवन पद्धति तो उन्हें विरासत में अपने पुरखों से मिली है, जिनके नक्शे कदम पर चलना वकील साहब की ज़िम्मेदारी है।
“ख़ुद अपना फैसला भी इश्क़ में काफी नहीं होता/ उसे भी कैसे कर गुज़रें/ जो दिल में ठान लेते हैं”9 फिराक साहब के इस शेर के साथ वकील साहब की यह स्वीकारोक्ति सुनिए ‘बानो, खुदा जनता है, हमारा बस चलता तो हम इस घर को हवेली में बदल देते पर बिरदरी की अपनी मर्यादा है’।7 वैसे वकील साहब को यह घमंड भी है कि ‘आखिर को हम मर्द हैं’ 7 साथ ही महकबानो के लिए, जिसे वकील साहब ने रख रखा है, यह अफसोस भी कि ‘इस औरत का कसूर सिर्फ इतना भर है कि यह हमारी बीवी ना थी’।7 पितृसत्तात्मक समाजों के अगर मुख्य गुण तलाशे जाएँ तो एक गुण यह निकलेगा कि ये समाज बहुत गणितीय प्रेम करते हैं। अगर कोई इस ढांचे को तोड़ने का प्रयास करता है तो खाप और तालिबान जैसी सस्थाएं जो करती है हम सब उसके गवाह हैं। ‘दिलो-दानिश’ में भी पितृसत्ता के इन्हीं गुणों को वकील कृपनरायाण के जरिये, कृष्णा सोबती खोलती हैं। ‘यह बात दीगर है कि मर्द ‘वही जीती’ कहकर अपनी हर स्वीकार भले ही कर ले, पर वह उसे अपनी तौहीन समझता है। जिसे न वह भूल पाता है न झेल पता है। यह उसकी नज़र में ऐसा गुनाह है जिसे माफ भी नहीं किया जा सकता’।8 आख़िर में महकबानों और चुन्ना का खुद को कृपानारायण की जायदाद से अलग करना ही कृष्णा सोबती के लेखन की खास पहचान है। जहां कोई गुस्सा नहीं, कोई श्राप नहीं है एक मौन प्रतिरोध है और प्रतिरोध का लहराता हुआ परचम है।
अंशु मालवीय की एक कविता का शीर्षक है ‘आश्वस्ति’10। उसकी कुछ पंक्तियाँ हैं
“कि दोस्त के बिना नास्तिक नहीं हुआ जा सकता
समाज में असुरक्षा है बहुत,
आदमी के डर ने बनाया है ईश्वर
और उसके साहस ने बनाई है दोस्ती”9
पितृसत्तात्मक समाज और परिवार रूपी संस्था लगातार ही ‘धर्म’ और ‘ईश्वर’ कि दुहाई देता नज़र आता है। यही वो शब्द हैं जिनसे वह अपने दमनात्मक कार्यों को वेलेडिटी दिलाता है। एक डरी हुई स्त्री तो इन धार्मिक भावनाओं के सहारे समाज के शोषणों को झेल जाती है पर वह स्त्री क्या करे जो मुक्ति कि चेतना से जीती है वह किसे अपना दोस्त बनाये? क्या दोस्त बनाने की इच्छा ही मुक्ति की ओर पहला कदम नहीं है? ऐसी इच्छा रखने वाली स्त्रियों के साथ पुरुष वर्ग (ध्यान दें पितृसत्ता का नहीं )का क्या रुख रहता है? इन्हीं बिन्दुओं पर केन्द्रित कृष्ण सोबती के दो और उपन्यास हैं- ‘समय सरगम’11 और ‘सूरजमुखी अंधेरे के’12। सोबती के हर उनयस में जीवन छलकता है और ‘समय सरगम’ में तो कई धुनों में बजता भी है। आरण्या और ईशान इस उपन्यास के दो मुख्य पात्र हैं और दोनों ही सम पर हैं। अलग-अलग कारणों से ही सही पर दोनों का परिवार आरण्या और ईशान से अलग हो चुका है। दोनों जीवन के सेवा निवृत हिस्से को जी रहे हैं। इस उपन्यास की खास बात यह है कि पहली बार सोबती के उपन्यासों में द्वंद, ‘डिबेट’ के रूप में सामने आया है। ईशान, किन्हीं ‘शून्यता’ के बहाने से यह स्वीकार करते हैं कि ‘... सम्पूर्ण पुरुष नहीं हो सकते अगर स्त्री की तरह प्यार करना न सीखो’। बदले में आरण्या का भी मौन उत्तर है ‘स्त्रियाँ तो चाहती ही हैं वह पुरुषों की तरह प्यार करना सीखें। उतना ही जितना करना ज़रूरी हो। अपने को उसकी आसक्ति में विलीन न कर दे’। गौर करने वाली बात यह है कि आरण्या के इस खामोश जबाब को ‘डिकोड’ ईशान कर रहे हैं। आगे का विवरण भी देखें ‘दोनों लंबे क्षण तक एक-दूसरे को तकते चले कि आरण्या हँसी। सृष्टि के दो मन, स्त्री पुरुष अलग-अलग दिशाओं से एक ही बिन्दु को देख रहे हैं। देख रहे हैं कि मानवीय होने के एक-से अधिकारों को पा सकें। जी सकें’। 1989 के ज़माने में, बारबारा एहनरिक न्यूयार्क टाइम्स जैसे अखबारों में लंबे लेख लिख रही थीं जिसके मसायल यही थे कि क्या पुरुष ‘स्त्रियायेन’ हो रहे है? ‘पुरुषों के स्त्रियायेन’ होने से एहनरिक का तात्पर्य पुरुषों में आए स्वभावगत बदलाव से था/है। कृष्णा सोबती स्वयं ‘समय सरगम’ के बारे में कहतीं हैं ‘1999 कि अंतिम और 2000 कि प्रथम कृति’। समय के साथ भारतीय मध्यम वर्ग में जो बदलाव आये हैं और सोबती ने जिन्हें रेखांकित किया है वह है पुरुषों में भी पितृसत्ता के खिलाफ एक अकुलाहट। इस अकुलाहट ने, रचनाकाल और रचना की पृष्ठभूमि के अनुसार, सोबती के हर उपन्यास में जगह पाई है। ‘समय सरगम’ में भी यह दिखता है बल्कि अकुलाहट से कहीं ज़्यादा बदला हुआ समाज दिखता है। ईशान का खाना बनाने में दिलचस्पी लेना और आरण्या का ‘अपने को उससे कुछ दूर ही’ रखना। फिर ईशान का कहना –‘मैं अपना सब काम हाथ से करना पसंद करता हूँ और संतोष पाता हूँ!’11 आरण्या जबाब देती है और यह एक व्यंग भी है पुराने पुरुषों पर ‘सचमुच में आधुनिक हैं। नहीं तो प्राचीन भारतीय गृहस्थों कि तरह- सब कुछ दूसरे करें। आपके एक काम में दस जुटे हों तो आपका रुतबा सुरक्षित है’।11
‘समय सरगम’ पर बात शुरू करने से पहले मैंने एक सवाल आप लोगों के सामने रखा था कि मुक्तिगामी चेतना में जीने वाली ‘स्त्री’ किसे अपना दोस्त माने’? प्रसंगवस उपन्यास में जबाब की ओर एक इशारा ज़रूर मिलता है जब ‘आरण्या मैत्री भाव से बोली- मैं अपने आप को उम्र में उतना बड़ा महसूस नहीं करती जितना आप मान रहे हैं। मेरे आसपास मेरा परिवार नहीं फैला हुआ कि मैं अपने में माँ, नानी, दादी, कि बूढ़ी छवि ही देखने लगूँ। ईशान, मुझे मेरा अपनापन निरंतरता का अहसास देता है’।
यहाँ जो ‘संवाद’ स्त्री-पुरुष के बीच ‘परिवार’ को लेकर है। यह संवाद ही कृष्णा सोबती की असल कला है। कृष्णा सोबती समझ रहीं हैं कि समाज बादल रहा है और कई मायनों में पुरुषों ने पितृसत्ता के वर्चस्व से खुद को स्वतंत्र किया है और जहां नहीं किया है वहाँ वह ‘मैं नहीं कहता सब कहते हैं’12, ‘मैं नहीं कहता दुनिया कहती है’12 ‘शास्त्रों में भी यही लिखा है’7 की डिफ़ेंडिंग स्थिति में है। और यथार्थ भी यही है। हम यानि पुरुष बदले हैं। यह सही है कि यह बदलाव मानसिक स्तर पर कम और भौतिक स्तर पर ज़्यादा हुआ है, पर बदलाव हुआ है और स्त्री मुक्ति के आंदोलन में यह एक बड़ी सफलता है। और कृष्णा सोबती इसी सफलता की इतिहासकार हैं।

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संदर्भ ग्रंथ
1. जैन निर्मला, हिन्दी आलोचना की बीसवीं सदी, 1992 राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली।

2. जैन निर्मला, कथा प्रसंग यथा प्रसंग, (वर्ष 2000) वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।

3. सिंह सुधा, ज्ञान का स्त्रीवादी पाठ, वर्ष 2008 ग्रंथ शिल्पी, नई दिल्ली।

4. सोबती कृष्णा, सोबती एक सोहबत, प्रथम संस्करण वर्ष 1989, राजकमल प्रकाशन,नई दिल्ली।

5. सोबती कृष्णा, डार से बिछुड़ी, प्रथम संस्करण 1958, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली।

6. सोबती कृष्णा, मित्रो मरजानी, प्रथम संस्करण1967, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली।

7. सोबती कृष्णा, दिलो-दानिश, प्रथम संस्करण 1993, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली।

8. जैन निर्मला, कथा प्रसंग यथा प्रसंग, (वर्ष 2000) वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।

9. गोरखपुरी फिराक, बज़्में ज़िंदगी: रंगे शायरी, वर्ष 2004 भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली।

10. मालवीय अंशु, दक्खिन टोला, प्रथम संस्करण 2002, इतिहास बोध प्रकाशन, इलाहाबाद।

11. सोबती कृष्णा, समय सरगम, प्रथम संस्करण 2000, राजकमल प्रकाशन।
12. सोबती कृष्णा ,सूरजमुखी अंधेरे के, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली।की

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

कामरेड कमला प्रसाद जी को हार्दिक श्रद्धांजलि !

प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. कमलाप्रसाद का निधन
मध्य प्रदेष प्रगतिशील लेखक संघ का शोक प्रस्ताव
इन्दौर, 25 मार्च 2011।

कमलाप्रसादजी ने पूरे देश के प्रगतिशील और जनपक्षधरता वाले रचनाकारों को उस वक्त देश में इकट्ठा करने का बीड़ा उठाया जब प्रतिक्रियावादी, अवसरवादी और दक्षिणपंथी ताकतें सत्ता, यश और पुरस्कारों का चारा डालकर लेखकों को बरगलाने का काम कर रहीं हैं। उनके इस काम को देश की विभिन्न भाषाओं और विभिन्न संगठनों के तरक्कीपसंद रचनाकारों का मुक्त सहयोग मिला और एक संगठन के तौर पर प्रगतिशील लेखक संघ देश में लेखकों का सबसे बड़ा संगठन बना। इसके पीछे दोस्तों, साथियो और वरिष्ठों द्वारा भी कमांडर कहे जाने वाले कमलाप्रसादजी के सांगठनिक प्रयास प्रमुख रहे। उन्होंने जम्मू-कश्मीर से लेकर, पंजाब, असम, मेघालय, प. बंगाल और केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में संगठन की इकाइयों का पुनर्गठन किया, नये लेखकों को उत्प्रेरित किया और पुराने लेखकों को पुनः सक्रिय किया। उनकी कोशिशें अनथक थीं और उनकी चिंताएँ भी यही कि सांस्कृतिक रूप से किस तरह साम्राज्यवाद, साम्प्रदायिकता और संकीर्णतावाद को चुनौती और शिकस्त दी जा सकती है और किस तरह एक समाजवादी समाज का स्वप्न साकार किया जा सकता है। ‘वसुधा’ के संपादन के जरिये उन्होंने रचनाकारों के बीच पुल बनाया और उसे लोकतांत्रिक सम्पादन की भी एक मिसाल बनाया।
कमलाप्रसादजी रीवा विश्वविद्यालय में हिन्दी के विभागाध्यक्षरहे, मध्य प्रदेश कला परिषद के सचिव रहे, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के अध्यक्ष रहे और तमाम अकादमिक-सांस्कृतिक समितियों के अनेक महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे, अनेक किताबें लिखीं, हिन्दी के प्रमुख आलोचकों में उनका स्थान है, लेकिन हर जगह उनकी सबसे पहली प्राथमिकता प्रगतिशील चेतना के निर्माण की रही। उनके न रहने से न केवल प्रगतिशील लेखक संघ को, बल्कि वंचितों के पक्ष में खड़े होने और सत्ता को चुनौती देने वाले लेखकों के पूरे आंदोलन को आघात पहुँचा है। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संगठन तो खासतौर पर उन जैसे शुरुआती कुछ साथियों की मेहनत का नतीजा है। उनके निधन से पूरे देश के लेखक, रचनाकार, पाठक, साहित्य व कलाओं का वृहद समुदाय स्तब्ध और शोक में है।
कमलाप्रसादजी ने जिन मूल्यों को जिया, जिन वामपंथी प्रतिबद्धताओं को निभाया और जो सांगठनिक ढाँचा देश में खड़ा किया, वो उनके दिखाये रास्ते पर आगे बढ़ने वाले लोग सामने लाएगा। और प्रेमचंद, सज्जाद जहीर, फैज, भीष्म साहनी, कैफी आजमी, परसाई जैसे लेखकों के जिन कामों को कमलाप्रसादजी ने आगे बढ़ाया था, उन्हें और आगे बढ़ाया जाएगा। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ की राज्य कार्यकारिणी उन्हें अपनी श्रृद्धांजलि अर्पित करती है।

पुन्नीसिंह विनीत तिवारी शैलेन्द्र शैली
(अध्यक्ष) (महासचिव) (कार्यकारी महासचिव)


सम्पर्कः विनीत तिवारी-9893192740, शैलेन्द्र शैली-9425023669

कॉमरेड कमला प्रसाद जी के निधन पर प्रेस नोट

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सोमवार, 21 मार्च 2011

मेरे सरोकार


सरोकार जो मेरे हैं,
तुम्हारे आदर्शों के खोखलेपन
और हिंसा के सभी तरीकों
के सीधे-सीधे खिलाफ़ हैं !

सारे झूठ और
गढ़ी हुई मर्यादाएं तुम्हारी पैदाईश हैं
लेकिन मेरी आस्था
सिर्फ धूप की पहली किरण
बारिश की पहली बौछार
और ठण्ड की पहली सिहरन में है
इसलिए खालिस हैं... प्रकृत हैं...

तुम मुझे
कमजोर, प्रकृतिवादी,
गल्पवादी, सिरफिरा, नपुंसक घोषित कर
हाशिए से बाहर फेंक सकते हो,
संतुष्ट हो सकते हो
अपनी जीत के भ्रम का
उत्सव मना सकते हो
या इस तरह एक
गोलबंदी में अपने किये पर वाह-वाही
लूट सकते हो...

लेकिन,
मैं जब कहता हूँ --
रौंदे जाने से पहले
घास में जीवन था
मैं मानता हूँ की
तुम समूचा रौंद कर भी
घास को
उगने से
रोक नहीं सकते--
तुम तिलमिला उठते हो...
तुम्हारे संस्कार में सच
को बर्दाश्त करना
कोई चीज ही नहीं है !
या उसे नकारना ही अपनी
बुजदिली को ढांपकर
बहादुर बन जाने की
एक युक्ति है !

तुम समझो कि
मुझे तकलीफ में डालना
तुम्हारे शातिर दिमाग की
सबसे बड़ी जीत हैं, मगर
तुम समझ नहीं सकते कि
तकलीफ में होना ही
असल में
चीजों को बदलने की
ज़मीन तैयार करता है !

मेरे सरोकार
तुमसे मिले चोटों
का हिसाब दर्ज करते हुए
उसके पाई-पाई
चुकता करने के हैं
यह तुम
जानते नहीं हो अभी
यही तुम्हारी ताकत की
सबसे बचकानी भूल है !

क्षणिकाएँ


१)
अब...
ढेर सारा खालीपन है
मेरे अंदर...

इस खोखलेपन
का भराव
वह ढाई अक्षर हो
सकते थे...

जिन्हें पूरी श्रद्धा के साथ
तुम्हें संकेतित करते
एक सर्वनाम सहित संबंधकारक
लगाकर
मैंने उच्चरित किया था --

"तुम्हारा प्यार !"

--------------------
२)
तुम
मैं
प्रेम
सुख
सपने
यथार्थ
लड़ाई
उम्मीद
हौसले

विरह
संताप
अवसाद
प्रश्न
आकुलता
शेष
प्रतीक्षा

बस यही किस्से हैं
सदियों पूर्व से
अब,
अगली सदियों तक...!

तन गई रीढ़..


(किन्हीं कारणों से यह पोस्ट तत्काल नहीं डाल सका, अब दे रहा हूँ. इस पोस्ट का उद्देश्य ना तो किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप करना है, ना ही किसी प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रस्त है, यह मैं पहले ही स्पष्ट कर देना चाहूँगा.)

पहली बार मैंने किसी साहित्यिक (!) कार्यक्रम का बायकाट किया... और ऐसा करने की तमाम ऐसी परिस्थतियां पैदा की गयीं कि, हमारे पास कोई चारा नहीं बचा था. बाबा नागार्जुन पर प्रलेसं - जमशेदपुर द्वारा आयोजित कार्यक्रम कई मायनों में एक कड़वा स्वाद या बे-स्वाद ही बनकर रह गया, और उस पर ये कि इस तमाशे में कोई ख़ास भीड़ भी नहीं जुटी थी !

इस आयोजन को लेकर शुरू से ही मन में एक अजीब सा भाव था, वह इसलिए कि, बाबा नागार्जुन का कार्यक्रम आयोजित इसलिए भी हो पा रहा था कि अमुक तथाकथित नए कवि महोदय, जो शिक्षा विभाग के एक प्रशासनिक अधिकारी हैं, और अपने पद और पहुँच का इस्तेमाल तमाम उन कामों में खर्चते हैं, जिनका विरोध जनकवि बाबा नागार्जुन के पूरे काव्य का प्रमुख सरोकार रहा है. इस आयोजन का खर्च वे चुका रहे थे, इसी बहाने नागार्जुन को ही याद कर शताब्दी वर्ष में प्रलेसं जमशेदपुर ने तय किया कि एक खानापूर्ति भर कर ली जाय ! 

हमें कभी ये कैसे गंवारा होता कि जिस मंच पर बाबा नागार्जुन को याद करें, उसी मंच से और वह भी पहले सत्र में, बाबा नागार्जुन पर दुसरे सत्र से कार्यक्रम थे..., कवि महाशय की सद्य प्रकाशित किताब का विमोचन हो, उनकी प्रशस्ति गाई जाय... एक मंच से बाबा के साथ साझा करें हम इन्हें ! कैसे...! यह कतई सह्य नहीं हो रहा था... 

खैर, हमने यह सोचा कि चलो किसी बहाने तो कम से कम कार्यक्रम हो रहा है, वरना प्रलेसं-जमशेदपुर आजकल अपनी असमर्थता, एकजुटता के अभाव और आयोजन के लिए स्थानीय सदस्यों में प्रतिबद्धता की कमी का रोना रोता रहा है ! और अब कोई कार्यक्रम गाहे-बगाहे भी शायद ही होता हो ! 
बाद में पता चला अब उन कवि महोदय ने कार्यक्रम से हाथ खीच लिए हैं, क्यों ? क्योंकि... दिल्ली से "बड़े लोग" नहीं आ रहे थे... जिनके हाथों लोकार्पण होना था. नामवर जी ने तबियत ठीक नहीं रहने के कारण आने में असमर्थता जताई. तो नवोदित कवि को खल गया... इसी खींचातानी में जो गतिरोध आया कि बाकि लोगों - 
डॉ. खगेन्द्र ठाकुर, शम्भू बादल... (अरुण कमल जी को भी कोई समस्या हो गयी थी... यद्यपि उन्होंने मना नहीं किया था.)  - को भी मना कर दिया गया... बहरहाल... उन्होंने कार्यक्रम में जो पैसे लगाये थे, सुनते हैं कि उनको वापस कर दिए गये अथवा कर दिए जायेंगे ! 
क्या प्रलेसं जैसे संगठन की कोई इकाई इतनी कमजोर हो सकती है कि उसे इस तरह के समझौते करने पड़ें, महज एक कार्यक्रम आयोजित करने के लिए ! 

खैर चूँकि कार्यक्रम के कार्ड बाँटे जा चुके थे, तय हो चुका था, सो हुआ. मगर कार्यक्रम में पहुँचते ही, देखा कि सभागार में नाम मात्र के लोग बैठे हैं ! (अगर कोई बाहर से आया वक्ता होता तो शायद स्थिति दूसरी होती !) और इसके बाद बाबा नागार्जुन पर पहले सत्र में उनकी कविताओं का वीडियो कोलाज और साहित्य अकादमी द्वारा उनपर बना वृतचित्र प्रदर्शित होना था, हुआ मगर... फिल्म को पुरा नहीं होने दिया गया ! आधे से भी कम अवधि 
तक चलने देकर बंद कर दिया गया कि यह लंबी है, और दूसरा तर्क यह कि इसी जगह पर बैनर भी लगाना था, जहाँ पर्दा था, सो हमने फिल्म उतनी देखी ! ऐसा शायद यहीं हो सकता है !

इसके बाद कार्यक्रम में बाबा नागार्जुन पर लोगों ने बात की... यह ठीक था, यहाँ तक तो गनीमत थी, इसके बाद कुछ ज्यादा ही असह्य स्थिति हो गई, जब स्थानीय कथाकारों ने इसके बाद वाले सत्र में "अपनी-अपनी" कहानियों का पाठ शुरू किया ! यह कार्यक्रम बाबा पर था, और जाहिर हैं, हम सब ने उम्मीद की थी कि बाबा की ही कहानियाँ और कवितायेँ सुनायीं जाएँगी. यही सहज परिपाटी है, तरीका है किसी की शताब्दी मनाने का यह कौन सा ढंग था, जो अब हमारे सामने था ! मालूम हुआ कि बाकि लोग भी अपनी-अपनी कवितायेँ पढेंगे, ना कि बाबा की ! बैनर प्रलेसं का था, मगर जलेस के लोग भी सभा और मंच पर रहे, कवितायेँ उन्हीं को पढनी थीं, क्योंकि प्रलेसं में कवि नहीं होते या होंगे, या होना ही चाहते हैं (ऐसी धारणा है इधर) !

इसी समय विजय दी, अर्पिता दी और मैं सभागार छोड़कर निकल गये... कुछेक और लोग भी गये, मगर उन्होंने बहिष्कार किया, यह नहीं कह सकते... मगर हम तीनों ने हाल अपना विरोध दर्ज करने के लिए हाल छोड़ा... 
यह जनकवि के जिन मूल्यों और उनकी कविता और साहित्य के जिन चिंताओं और सरोकारों की बात कर रहे थे, उसी मंच से उनका मखौल उड़ाते हुए और उसी संकट का सजीव उदाहरण बनकर प्रस्तुत हुए...! यानि क्या वे हमें मुर्ख समझते हैं ? कि हम यह भी स्वीकार कर आँख मुंद लें कि क्या हो रहा है, वह सही नहीं है.. और जिस मंच से वे बाबा के तथाकथित उन सभी छद्म प्रतिनिधियों की पहचान करने की बात कर रहे थे, उसी मंच से अपनी रचनाएँ बाबा की रचनाओं से ज्यादा जरूरी मानकर परोस रहे थे ! अपनी रचनाएँ सुनाने का तो यही अर्थ हुआ ! क्या हम यह नहीं देख सकते कि जिन आदर्शो की बात आप चीख कर कहते हैं, उन्हीं को आप तोड़ भी रहे है, और शायद हमसे यह उम्मीद कि हम अबोध हैं, या बने रहें ! यह सरासर गलत है, और हमने अपना विरोध कार्यक्रम को बीच में छोड़कर सभा से निकल जाकर दर्ज किया.

मैंने विजय दी से कहा भी कि यह जमशेदपुर प्रलेसं काफ़ी गलत उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है. और यह देखकर खेद होता है कि प्रलेसं की यह इकाई, सबसे कमजोर होती जा रही है. और इसकी सक्रियता अब रेत में तिल का एक दाना ढूँढने जैसा है.

और इस सबके बावजूद,  प्रगतिशील लेखक संघ या इस धारा में कोई खोट नहीं कि हम इसे त्याग दें... मोहभंग हो जाये. दरअसल कॉमरेड विनीत भाई कि एक बात मुझे हमेशा याद आती है, कि "हम पर अपनी विरासत को निभाने की बड़ी जिम्मेदारी है." जिस प्रलेसं से प्रेमचंद, सज्जाद जाहिर, फैज़, कैफ़ी आदि और जिस प्रगतिशील धारा से परसाई, भीष्म साहनी, नागार्जुन आदि जुड़े रहे और उसे एक मुकाम दिया, उसे छोड़ने का प्रश्न नहीं है, 
उससे मोहभंग नहीं होता है, बल्कि आज यह जरूरत ज्यादा कशिश से महसूस हो रही है, कि इस वाद या धारा या परम्परा को इस तरह की चापलूसी-मठाधीशी, आत्म-विज्ञापन और क्षुद्रताओं से बचाने की बहुत बड़ी जिम्मेदारी हमीं पर आन पड़ी है. तमाम संकटों के बीच यह भी एक संकट है. और इसकी पहचान हमें है. इन विचारों और विचारधारा पर हमारी आस्था है. 

इसलिए जब ऐसा होते देखा तो निसंदेह यह हुआ कि, जैसा बाबा की ही एक पंक्ति है - "तन गई रीढ़..." 
  

महिला दिवस बुनियादी तौर पर श्रम की गरिमा का प्रतीक है



भारतीय महिला फेडरेशन
जिला इकाई  इन्दौर


प्रेस विज्ञप्ति


महिला दिवस बुनियादी तौर पर श्रम की गरिमा का प्रतीक है


इन्दौर] 12 मार्च 2011-

बाजार की कोशिश है कि हर चीज अपना असल अर्थ खोकर ऐसे अर्थ पा ले जिससे वो बाजार के मुनाफे की हो जाए। आजकल महिला दिवस पर सौंदर्य प्रसाधन और तरह&तरह के वस्त्राभूषण बनाने वाली कंपनियाँ फैशन शो आयोजित करती हैं। मीडिया भी ऐसी चीजों की नुमाइश करता है। लेकिन ये सम-हजयना जरूरी है कि महिला दिवस सिर्फ औरतों के पहनने-ंउचयओ-सजय़ने या सिर्फ पिकनिक&पार्टी का ही दिन नहीं है। ये दिन उन कामकाजी महिलाओं की याद में मनाया जाता है जो अपने हक और श्रम के सम्मान की खातिर शहीद हुईं।
महिला दिवस के कार्यक्रमों की श्रृंखला में भारतीय महिला फेडरेशन और घरेलू कामकाजी महिला संगठन ने मिलकर 11 मार्च 2011 को कामकाजी महिलाओं के संघर्ष और उनकी ताकत विषय पर व्याख्यान] एक नाटक और महिलाओं की रैली का आयोजन किया गया। अर्थशास्त्री डॉ- जया मेहता ने अपरोक्त बातों के साथ ही बताया कि सरकार के वित्तमंत्री ने हाल का बजट पेश करते हुए कहा कि हमारे देश में अनाज का उत्पादन तो ठीक हुआ है लेकिन वो एक जगह से दूसरी जगह तक कुशलता से पहुँचाया नहीं जा सका इसलिए अनाज का परिवहन ठीक करने के लिए उसे रिलायंस जैसी कंपनियों को दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि एक तरफ सरकार खाद्य सुरक्षा कानून को लगातार टालती जा रही है और दूसरी तरफ अनाज को विशाल कंपनियों के चंगुल में फँसाना चाहती है जिनका मुख्य मकसद गरीब जनता का पेट भरना नहींे बल्कि मुनाफा कमाना है। अन्य पोषण सामग्री तो छोड़िए देश के लोगों की आधी आबादी को अनाज तक नसीब नहीं होता। इन सब लोगों में भी औरतों की हालत बद से बदतर है। देश की 45 प्रतिशत महिलाएँ रक्ताल्पता यानी एनीमिया से पीड़ित हैं। कमजोर माँएँ कमजोर बच्चों को जन्म देती हैं। नतीजा ये है कि हमारे देश में कुपोषित बच्चों की तादाद दुनिया में सबसे ज्यादा है। इन कमजोर बच्चों का मस्तिष्क भी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता। जिन्हे भरपेट खाना तक नहीं मिल पाता, वे भला खाते&पीते अमीर और मध्यम वर्ग के बच्चों के साथ किस तरह तरक्की की दौड़ में बराबरी से दौड़ सकते हैं।
उन्होंने ये भी कहा कि आज चाहे मजदूरों के संघर्ष हों या दलितों] आदिवासियों] किसानों के] हर संघर्ष की अगली कतार में बहुत बड़ी तादाद में महिलाएँ आयी हैं। उनके भीतर संघर्ष के लिए जरूरी ताजगी भरी उर्जा मौजूद है। संसद के सामने 23 फरवरी का प्रदर्शन हो या 24 फरवरी की आँगनवाड़ी व आशा कार्यकर्ताओं की रैली, दोनों में ही महिलाओं ने दिल्ली की सड़कों को जाम कर दिया। इस लड़ाई को और प्रभावी तौर पर लड़ा जाना जरूरी है वर्ना बाजार गरीब-ंउचयमेहनतकश महिलाओं व पुरुषों को जीने ही नहीं देगा।
शहीद भवन पर आयोजित इस सभा को संबोधित करते हुए घरेलू कामकाजी महिला संगठन की ओर से सिस्टर रोसेली ने कहा कि महिलाओं को भी ये सम-हजयना चाहिए कि उनकी समस्याओं का हल धार्मिक जुलूसों में शामिल होने से नहीं निकलेगा। उन्हें संगठित होकर अपनी लड़ाई लड़नी होगी। हमें उन्हें जोड़ने के और मजबूत उपाय करने चाहिए। आँगनवाड़ी यूनियन की अनीताजी ने कहा कि 21 बरस से लड़ते&लड़ते उन्होंने रु- 275 मासिक से 1500 और अब 3000 का वेतन हासिल हुआ है। ये लड़ाई जारी रखनी होगी नहीं तो सरकार कुछ नहीं देने वाली। सभा को निर्मला देवरे और मनीषा वोहल ने भी संबोधित करते हुए कहा कि हम मजदूर औरतों को एक&दूसरे की मदद के लिए साथ आना चाहिए तभी बाकी महिला मजदूर भी हमसे जुड़ेंगी और सुरक्षा की भी गारंटी होगी।
भारतीय महिला फेडरेशन की सचिव सारिका श्रीवास्तव ने गतिविधियों का ब्यौरा देते हुए पिछले वर्ष के दौरान दिवंगत हुए कॉमरेड अनंत लागू और कॉमरेड राजेन्द्र केशरी को सभा की ओर से श्रृद्धांजलि दी। सभा का  संचालन किया पंखुड़ी मिश्रा ने।  सभा के अंत में महिला मजदूरों के संघर्षों पर आधारित एक नाटक की प्रस्तुति हुई जिसमें गारमेंट फैक्टरी में काम करने वालीं, बीड़ी बनाने वालीं] भवन निर्माण मजदूरी करने वालीं और जमीन से बेदखली की परेशानियों से लड़ने वाली आम मेहनतकश महिलाओं के जीवट और जोश की कहानियाँ थीं। नाटक का शीर्षक था जब हम चिड़िया की बात करते हैं। नाटक में पंखुड़ी] रुचिता] सारिका] नेहा] शबाना] रवि और आशीष ने अभिनय किया।
सभा व नाटक के उपरांत महिलाओं ने शहीद भवन से मालवा मिल चौराहे तक नारे लगाते हुए जुलूस निकाला।
इससे पहले 8 मार्च को कल्पना मेहता ने स्वास्थ्य की राजनीति का शिकार बनतीं महिलाएँ विषय पर व्याख्यान दिया था और बताया था कि किस तरह अमेरिका व अन्य  विकसित देश तरह&तरह के गर्भ&निरोधक भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों की महिलाओं पर आजमाते हैं और अशिक्षित व जागरूकताहीन जनता की जिंदगी के साथ नेता] अफसर और कंपनियाँ गिरोह बनाकर खिलवाड़ करती हैं।

प्रति
सम्पादक महोदय]
प्रकाशनार्थ / प्रसारार्थ

संपर्कः

सारिका श्रीवास्तव
सचिव] भारतीय महिला फेडरेशन] इन्दौर इकाई- शहीद भवन] 65] राजकुमार मिल ओवरब्रिज के नीचे] न्यू देवास रोड] इन्दौर- मोबाइलः 9425096544

रविवार, 20 मार्च 2011

तुम मेरे पास रहो - फैज़


तुम मेरे पास रहो
मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो
 
जिस घड़ी रात चले
आसमानों का लहू पी के सियह रात चले
मर्हमे-मुश्क लिये नश्तरे-अल्मास लिये
बैन करती हुई, हँसती हुई, गाती निकले

दर्द की कासनी पाज़ेब बजाती निकले
जिस घड़ी सीनों में डूबते हुए दिल
आस्तीनों में निहाँ हाथों की रह तकने लगें
आस लिये
और बच्चों के बिलखने की तरह क़ुलक़ुले-मय
बहर-ए-नासूदगी मचले तो मनाये न मने
जब कोई बात बनाये न बने

जब न कोई बात चले
जिस घड़ी रात चले
जिस घड़ी मातमी, सुनसान, सियह रात चले
पास रहो
मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो

मंगलवार, 8 मार्च 2011

अपनी जमीन तलाशती बेचैन स्त्री - निर्मला पुतुल


यह कैसी विडम्बना है
कि हम सहज अभ्यस्त हैं
एक मानक पुरुष दृष्टि से देखने को
स्वयं की दुनिया
मैं स्वयं को स्वंय की दृष्टि से देखते
मुक्त होना चाहती हूँ अपणी जाति से
क्या है मात्र एक स्वप्न के
स्त्री के लिए --- घर, संतान और प्रेम ?
क्या है ?
एक स्त्री यथार्थ में
जितना अधिक घिरती जाती है इससे
उतना भी अमूर्त होता चला जाता है
सपने में वह सब कुछ
अपनी कल्पना में हर रोज
एक ही समय में स्वंय को
हर बेचैन स्त्री तलाशती है
घर, प्रेम और जाति से अलग
अपनी ऐसी जमीन
जो सिर्फ़ उसकी अपनी हो.
एक उन्मुक्त आकाश
जो शब्द से परे हो
एक हाथ
जो हाथ नहीं
उसके होने का आभास हो !

महिला दिवस ८ मार्च, २०११  पर दैनिक जागरण में प्रकाशित

सोमवार, 7 मार्च 2011

घिन तो नहीं आती है ? - नागार्जुन


पूरी स्पीड में है ट्राम
खाती है दचके पै दचके
सटता है बदन से बदन
पसीने से लथपथ ।
छूती है निगाहों को
कत्थई दांतों की मोटी मुस्कान
बेतरतीब मूँछों की थिरकन
सच सच बतलाओ
घिन तो नहीं आती है ?
जी तो नहीं कढता है ?

कुली मज़दूर हैं
बोझा ढोते हैं , खींचते हैं ठेला
धूल धुआँ भाप से पड़ता है साबका
थके मांदे जहाँ तहाँ हो जाते हैं ढेर
सपने में भी सुनते हैं धरती की धड़कन
आकर ट्राम के अन्दर पिछले डब्बे मैं
बैठ गए हैं इधर उधर तुमसे सट कर
आपस मैं उनकी बतकही
सच सच बतलाओ
जी तो नहीं कढ़ता है ?
घिन तो नहीं आती है ?

दूध-सा धुला सादा लिबास है तुम्हारा
निकले हो शायद चौरंगी की हवा खाने
बैठना है पंखे के नीचे , अगले डिब्बे मैं
ये तो बस इसी तरह
लगाएंगे ठहाके, सुरती फाँकेंगे
भरे मुँह बातें करेंगे अपने देस कोस की
सच सच बतलाओ
अखरती तो नहीं इनकी सोहबत ?
जी तो नहीं कुढता है ?
घिन तो नहीं आती है ?

बुधवार, 2 मार्च 2011

सवाल


हमेशा ऐसा ही होता है, कि
मासूम किलकारियों को पर लगने से पहले,
फुर्र से उड़ जाने से पहले
धारदार हथियारों से उनके पँख
चाक कर दिये जाते हैं,
कई बार, सिर्फ़ हत्याएँ करना उनका शिगूफा हो जाता है
वे हमारे इतिहास, हमारी स्मृतियों, अनुभव, चेतना और
अनुभूति और फैसले करने की जैविक क्षमता
की हत्या करने को पागल हो जाते हैं...
ऐसा होता है कि
अक्सर जब नज़र सामने की तरफ होती है
पीछे से वार होता है...
वे वही होते हैं, वही, जिन्हें हमने भाई कहा था
एक ही आसमान के नीचे !
अरसे तक एक थाली में बाँटकर
भात खाया था जिनके साथ...
जिनकी बहती हुई नाक पोंछी थी,
जिन्हें गिनतियाँ और पहाड़े सिखाए थे...
जिनको बोलना सिखाया था...वे अचानक...
जीभ काटने वाले हाथों में तब्दील हो जाते हैं
ताकि हम आज़ादी का स्वाद ना चख सकें !
सवाल यह नहीं कि ऐसा क्यों होता है...
सवाल तो यह है कि
क्या हम ऐसा होने को
खारिज नहीं कर सकते ?

जंग खत्म नहीं होता है साथी !


हमेशा होना तो यही होता है
ऐसा ही होता है
कि सभ्यता के दूसरे छोर पर जहाँ
एक सुदीर्घ सन्नाटे
की गवाही में तेरे-मेरे कांपते-लरजते
होंठों की धीमी सरगोशियों का ख़्वाब-गुलाब
खिलने को होता है कि
बारहा दीवारों से फोड कर निकल आती हैं
उनकी दुनियावी कड़ी हथेलियाँ
जिससे मसलकर उन गुलाबों को
घोंट दिया जाता है...

नृशंस परछाइयों का एक सर्वकालिक समूह
हमें बागी घोषित करता है और खुद को
अपनी लकीर का सबसे बड़ा सरंक्षक !
घेरेबंदी के बीच
मुस्कुराकर, सर उठाकर, सीना ताने
वध होती हुई हमारी आत्माएँ
पुकार सकती हैं सिर्फ़
एक आखरी बार
एक-दूसरे का नाम...
फिर हमारी सांसों को थामें रखने वाली तख्ती
पैरों के तले से खिसका दी जाती हैं...
एक कुएँ में झूलते हुए हम दम तोड़ते हैं, आहिस्ता-अहिस्ता...

और तस्वीर के दूसरे पहलू में,
हमारे सपने, हमारी ताकत, हमारा विरोध
बचा रहता है, सूरज की रौशनी में, चाँदनी में,
हवा में, पानी में... पत्थर में, दूब में...!
  
उफ़, कि यही एक तथ्य है जो
है वहीँ जहाँ, तब भी था, जब से
एक आदमी और एक औरत
एक दूसरे का हाथ ईमानदारी से पकड़ कर आगे आये !
उनके साझे क़दमों की हुलस से जमीन पर
फूल खिल आये...
वे शामिल हुए एक-दूसरे की देह-ओ-रूह में,
और पूरी दुनिया का एक बड़ा हिस्सा उनके दायरे से
बाहर हो गया !
तब उनके हथियारों की नोंक और तेज की जाने लगी
मुट्ठियों में पत्थर आ गये...

मगर विश्वास करो साथी
यह यूँ ही तुम्हें दर्द में बहलाने के लिए
नहीं कह रहा... कि
यह सब जो होता है, उसके बरक्स यह भी होता है कि,
हर बार उनकी साजिशें नाकाम की हैं हमने
हर बार घूरे पर गुलाब खिलाया है
यह यूँ ही नहीं हुआ कि लाल रंग-
उस गुलाब का-
ऐसा गहरा हुआ है !
जिसके मायने कई है !
हर बार मृत्यु को हताश किया है हमने
हर बार हम पलटे हैं,
आखिरी बार चूक जाने से ऐन पहले !
हर बार उन्होंने हद बनाये हैं, और हमने हद तोड़े हैं !

यह सच है कि जिंदगी की बुनियाद
जंग और मुहब्बत के गारे में सान कर रखी जाती है
यह तो होता है कि जंग में हम झोंक दिए जाते हैं
पर यह भी उस कदर सच है कि
जब तक खून का ईमान बाकि है
जंग खत्म नहीं होता है साथी !

बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

फैज़ अहमद फैज़ के कुछ अमर कलाम


चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़


चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
और कुछ देर सितम सह लें, तड़प लें, रो लें
अपने अजदाद की मीरास है माज़ूर हैं हम
जिस्म पर क़ैद है जज़्बात पे ज़ंजीरें है
फ़िक्र महबूस है गुफ़्तार पे ताज़ीरें हैं
अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जिये जाते हैं
ज़िन्दगी क्या किसी मुफ़्लिस की क़बा है जिसमें
हर घड़ी दर्द के पैबंद लगे जाते हैं
लेकिन अब ज़ुल्म की मीयाद के दिन थोड़े हैं
इक ज़रा सब्र कि फ़रियाद के दिन थोड़े हैं
अर्सा-ए-दहर की झुलसी हुई वीरानी में
हमको रहना है पर यूँ ही तो नहीं रहना है
अजनबी हाथों के बेनाम गराँबार सितम
आज सहना है हमेशा तो नहीं सहना है
ये तेरे हुस्न से लिपटी हुई आलाम की गर्द
अपनी दो रोज़ा जवानी की शिकस्तों का शुमार
चाँदनी रातों का बेकार दहकता हुआ दर्द
दिल की बेसूद तड़प जिस्म की मायूस पुकार
चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
-------------------------------------------
नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही 

नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही

न तन में ख़ून फ़राहम न अश्क आँखों में
नमाज़े-शौक़ तो वाजिब है बे-वज़ू ही सही
किसी तरह तो जमे बज़्म मैकदे वालो
नहीं जो बादा-ओ-साग़र तो हा-ओ-हू ही सही
गर इन्तज़ार कठिन है तो जब तलक ऐ दिल
किसी के वादा-ए-फ़र्दा की गुफ़्तगू ही सही
दयारे-ग़ैर में महरम अगर नहीं कोई
तो 'फ़ैज़' ज़िक्रे-वतन अपने रू-ब-रू ही सही
-------------------------------------------
शीशों का मसीहा1 कोई नहीं

मोती हो कि शीशा, जाम कि दुर2
जो टूट गया, सो टूट गया
कब अश्कों से जुड़ सकता है
जो टूट गया, सो छूट गया

तुम नाहक़ टुकड़े चुन चुन कर
दामन में छुपाए बैठे हो
शीशों का मसीहा कोई नहीं
क्या आस लगाए बैठे हो

शायद कि इन्हीं टुकड़ों में कहीं
वह साग़रे दिल है जिसमें कभी
सद नाज़ से उतरा करती थी
सहबाए-ग़मे-जानां3 की परी

फिर दुनिया वालों ने तुमसे
यह साग़र लेकर फोड़ दिया
जो मय 4 थी बहा दी मिट्टी में
मेहमान का शहपर5 तोड़ दिया

यह रंगीं रेज़े हैं शायद
उन शोख़ बिलोरी सपनों के
तुम मस्त जवानी में जिन से
ख़िलवत6 को सजाया करते थे

नादारी1, दफ़्तर भूख़ और ग़म
इन सपनों से टकराते रहे
बेरहम था चौमुख पथराओ
यह काँच के ढाँचे क्या करते

या शायद इन ज़र्रों में कहीं
मोती है तुम्हारी इज़्ज़त का
वह जिससे तुम्हारे इज़्ज़ पे भी
शमशाद क़दों2 ने रश्क3 किया

इस माल की धुन में फिरते थे
ताजिर4 भी बहुत, रहज़न5 भी कई
है चोर नगर, या मुफ़लिस की
गर जान बची तो आन गई

यह साग़र, शीशे, लाल-ओ-गुहर
सालिम6 हों तो क़ीमत पाते हैं
और टुकड़े टुकड़े हों तो फ़क़्त
चुभते हैं, लहू रूलवाते हैं

तुम नाहक़ शीशे चुन चुन कर
दामन में छुपाए बैठे हो
शीशों का मसीहा कोई नहीं
क्या आस लगाए बैठे हो

यादों के गिरेबानों के रफ़ू
पर दिल की गुज़र कब होती है
इक बख़िया उधेड़ा, एक सिया
यूँ उम्र बसर कब होती है

इस कारगहे हस्ती में जहाँ
यह साग़र, शीशे ढलते हैं
हर शय 1 का बदल मिल सकता है
सब दामन पुर हो सकते हैं

जो हाथ बूढ़े, यावर2 है यहाँ
जो आँख उठे, वह बख़्तावर3
यां धन दौलत का अन्त नहीं
हों घात में डाकू लाख मगर

कब लूट झपट से हस्ती की
दूकानें ख़ाली होती हैं
याँ परबत परबत हीरे हैं
याँ सागर सागर मोती हैं

कुछ लोग हैं जो इस दौलत पर
परदे लटकाए फिरते हैं
हर परबत को, हर सागर को
नीलाम चढ़ाए फिरते हैं
कुछ वह भी है जो लड़ भिड़ कर
यह पर्दे नोच गिराते हैं
हस्ती के उठाईगीरों की
चालें उलझाए जाते हैं

इन दोनों में रन1 पड़ता है
नित बस्ती बस्ती, नगर नगर
हर बस्ते घर के सीने में
हर चलती राह के माथे पर

यह कालिक भरते फिरते हैं
वह जोत जगाते रहते हैं
यह आग लगाते फिरते हैं
वह आग बुझाते फिरते हैं

सब साग़र,शीशे, लाल-ओ-गुहर2
इस बाज़ी में बह जाते हैं
उट्ठो, सब ख़ाली हाथों को
उस रन से बुलावे आते हैं

शब्दार्थ :-
1. इलाज करनेवाला, चिकित्सक। 2. मोती। 3. महबूब के ग़म की शराब। 4. शराब। 5. उड़ान के पर। 6. एकान्त। 1. मुफ़लिसी, ग़रीबी। 2. ऊँचेक़द वाले। 3. ईर्ष्या। 4. व्यापारी। 5. लुटेरा। 6. पूरा। 1. वस्तु। 2. मददगार। 3. क़िस्मतवाला। 1. युळ। 2. लाल और मोती

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

पहला कविता समय सम्मान

पहला कविता समय  सम्मान हिंदी के वरिष्ठतम कवियों में एक चंद्रकांत देवताले को और पहला कविता समय युवा सम्मानयुवा कवि कुमार अनुपम को दिया जायेगा. “दखल विचार मंच” और “प्रतिलिपि”  के सहयोग से हिंदी कविता के प्रसार, प्रकाशन और उस पर विचार विमर्श के लिए की गयी पहल  कविता समय के अंतर्गत दो वार्षिक कविता सम्मान स्थापित करने का निर्णय संयोजन समिति द्वारा लिया गया और समिति के चारों सदस्यों – बोधिसत्व, पवन करण, गिरिराज किराडू और अशोक कुमार पाण्डेय – ने सर्वसहमति से वर्ष २०११ के सम्मान चंद्रकांत देवताले और कुमार अनुपम को देने का फैसला लिया. कविता समय सम्मान के तहत एक प्रशस्ति पत्र और पाँच हजार रुपये की राशि तथा कविता समय युवा सम्मान के तहत एक प्रशस्ति पत्र और ढाई  हजार रुपये की राशि प्रदान की जाएगी.

कविता समय सम्मान हर वर्ष ६० वर्ष से अधिक आयु के एक वरिष्ठ कवि को दिया जायेगा जिसकी कविता ने निरंतर मुख्यधारा कविता और उसके कैनन को प्रतिरोध देते हुए अपने ढंग से, अपनी शर्तों पर एक भिन्न काव्य-संसार निर्मित किया हो और हमारे-जैसे कविता-विरोधी समय में निरन्तर सक्रिय रहते हुए अपनी कविता को विभिन्न शक्तियों द्वारा अनुकूलित नहीं होने दिया होकविता समय युवा सम्मान ४५ वर्ष से कम आयु के एक पूर्व में अपुरस्कृत ऐसे कवि को दिया जायेगा जिसकी कविता की ओर, उत्कृष्ट संभावनाओं के बावजूद,  अपेक्षित ध्यानाकर्षण न हुआ हो. इस वर्ष के  सम्मान ग्वालियर में २५-२६ फरवरी को  हो रहे  पहले कविता समय आयोजन में प्रदान किये जायेंगे.

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

पहरे पर हूँ निहत्था...


इस आधी रात में,
जो अपनी पिनक में बीत ही जायेगी आहिस्ता से
मैं इस शहर की सुनसान सड़कों पर
पीठ पर हाथ बाँधे
आवारगी में मुब्तिला हूँ...

सुनसान सड़क पर पतझड़ के टूटे
मुर्दा पत्ते
पड़ते हुए मेरे हर कदम के बाद
चीखें मारते हैं... और सन्नाटे में वह चीख
एक बोसीदा सा संगीत पैदा करती है... दूर जाती है...
यही वह समय है, जब बाहर से घूमती हुई
नज़र अंदर झाँकती हैं, और
दर्द की एक लूर पूरे वजूद में दौड़ जाती है...
अकेला होने के तमाम खतरों और अवसाद,
जो कि क्रमश: एक तकनिकी और मनोवैज्ञानिक शब्दावलियों के
बहुअर्थी शब्द हैं, दोनों बगलों में दबाए मैं
टहल रहा हूँ, सड़कों पर...
मगर यूँ नहीं... बेवज़ह तो कतई नहीं !

घरों की, दुमंजिलों-तिमंजिलों की
खिड़कियों पर पर्दे पड़ चुके हैं...
जिनके पीछे से एक नीम उजाला
अब भी झाँक रहा है, कहीं-कहीं...
लोग इत्मीनान से सो रहे है !
कोई वज़ह नहीं है, कि मेरी शिकायत पर वे गौर करें !
वे तो सालों से ऐसे ही सो रहे हैं...
कि जैसे कहीं कोई दुश्वारी नहीं है
कोई दुःख:दर्द, हारी-बीमारी नहीं है
जैसे आने वाला कल इतना महबूब, उम्दा
और खुशगवार होगा
कि उसकी कोई मिसाल कहीं नहीं है, फ़िक्र नहीं है !
क्या उन्हें लगता है कि
दुनिया ख्वावगाह से भी खूबसूरत हो चुकी है
गोया कहीं ना कोई मजलूम,
कहीं किसी की जागीरदारी नहीं है !
लोग तो यूँ बत्तियाँ गुल कर
सो रहे हैं,
कि आने वाली सुबह
बा-अमन और बा-हक़ उनके ही नाम होगी !
एक हम हैं कि, हम पर यह नशा तारी नहीं है !

मैं क्या करूँ कि मैं सो नहीं सकता
कि अंधेरों में भी एक सवालिया रौशनी मेरे
सुकून का क़त्ल कर मेरा पीछा किया करती है !
कि मैं इतना बद-गुमां नहीं हो सकता !
कि मैं जानता हूँ, यदि यह सच होता तो
एक सच्चा आदमी आज सरफरोश नहीं होता

वे हर रोज मेरी नस्ल को बधिया बनाने वाले
नुस्खों की ईजाद करते रहते हैं, और
तालियाँ पिटते हैं,
जश्न मनाएंगे वे... यदि,
मैं भी सो गया
यह तय है कि जिस दिन
मेरे जागने का माद्दा उनकी समझ में आएगा
जागना भी एक गुनाह करार दिया जायेगा...

यों मेरे जागने से वे अभी बा-खबर नहीं हैं...
लेकिन मेरे सो जाने से उनका हौसला बढ़ेगा !

शहर की सूनी सड़कें
सवाल पूछी जाने वाली तारीखों की गवाह होती हैं
जहाँ आम चहरे ख़ास मुखौटों को नोंचने के लिए
गैर-दहशत-दां जमीर के साथ आगे बढते हैं,
इन सड़कों के सदके...
(काहिरा के तहरीर चौक को सलाम करते हुए !)

जब शहर सोता है, एक अदद अदीब जगता है
इंसानियत की आबरू बचाए रखने के लिए
यह फ़र्ज़-ऐ-लाजिम होता है !.

शहर की ऐसी सूनी सड़कों पर
अपने खुद के साथ, बा-वजूद घूमता हुआ मैं
पहरे पर हूँ निहत्था...

काहिरा के तहरीर चौक को सलाम करते हुए !

शुक्रिया मेरे हमनदीफ,
मेरे यारों, शुक्रिया...
इस बज़ा यकीं को जिंदा रखने के लिए कि
लहू सुर्ख-ओ-खालिस है हमारे रग-ओ-रूह में अभी भी
जो अमन और इन्साफ की जुबान बोलता है.
अपना हक़ मांगता है,
गुलाम-परस्ती से इनकार का माद्दा रखता है.
कि ताकत अब भी मौजूँ है हमारी बाँहों में, फौलाद-ऐ जिगर में
दहशत-दां उन तानाशाहों की चूलें हिला देने के लिए
जो खुद को मुख्तार मान बैठे थे हमारी जिंद-ओ-जान के...
कि जिनको खुशफहमी थी कोई बेशर्म !
कि जिन्हें अंजाम-ऐ-खाक का इल्म नहीं था
उनको बा-इल्म-ऐ-असल कराने के लिए
शुक्रिया...

जीतता है वही, वही जीता है
जिस कौम के सिर पर होती है अहले-जुनूं-ओ-जज्बा-ऐ-आज़ादी
बस इसकी फ़िराक फकत, और इससे कम कुछ नहीं

कायल हूँ तुम्हारी जुस्तजू के जो,
माँगती है बा-अदब अपना हक़-ओ-इंसाफ़, और इस माँगने पर
अपनी वफ़ा निसार करती है !
काली दीवारों में छिपी हुई खुदगर्जी की,
बदनीयती की गज़ालत बेनक़ाब करती है.
फ़क्र है तेरे इन्कलाबी जूनून पर, मेरे यारों !

शुक्रिया दोस्तों,
तुमने खून नहीं माँगा, तुमने हथियार नहीं उठाये, आवाज़ ही फकत उठायी
ताकत का जिन्हें गुमां था, उनसे चोर रास्ते की आबरू बढवाई !
तुम्हारी हिम्मत-ओ-हौसले दाद के हक़दार हैं,
जो टैंकों के सामने तुम बिछ गये
तुम्हारी अमन-परस्ती से वे सर्द-खूँ वाले भी खौफ़ खा गये !
शुक्रिया यह फिर बताने के लिए कि,
जो नाजायज है, खलिश-ऐ-जाँ-ऐ-आदम है,
उसकी मुखाफलत का तरीका यही है, यही है...

जिसकी बुनियाद में आदम का खूँ लगा हो,
उस गलीज़ सत्ता की मीनारें गिराने का    
शुक्रिया...

सलाम तहरीर चौक, सलाम ऐ तहरीर चौक के सिपाहियों !

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

याद आया...


फिर किसी किताब में...
या कि अतीत के फांकों में
ढूँढूँगा अपना मिज़ाज-ऐ-आराम
फिर सांझ की पहली लालटेन
पश्चिमांत की खूँटी से
उतर कर ओसारे के एक खंभे
पर टिक गई है
कुछ देर जब हर पत्ता सोने लगेगा
फूल अपनी बोझिल गर्दन झुका लेंगे
मैं सोचूंगा
तुम इस वक्त भी मेरे साथ
क्यों नहीं हो ?
जब शामें ढला करती हैं
तब, तेरे नुपूर की झंझन
क्यों नहीं सुनाई देती...
जब झींगुर बोलते हैं और
रात क्वाँरी दुल्हन बन जाती है
अंतर्मन में एक हूक उठती है कि
दौड़ जाऊं पास तुम्हारे
दिलाऊँ याद कि जब हम साथ हँसते थे
मिलते थे और जीते थे...
तुम्हारे बहके हुए आँचर का कोना थाम लूँ
और मेरा पूरा दिन रजनीगन्धा सा
रात बेला सी
महकती रहे !
ऐसे ही तो, हम साथ थे कभी
अभी एक पुरानी डायरी में
तुम्हारे पंजों की सिन्दूरी छाप देखी
तो याद आया...

वसंत की इस दोपहर


ओ मितवा...
लो फिर देने लगा है समय
चिहुंक कर हांक...
आने लगा है वसंत हौले क़दमों से
सूखे पत्तों की खडखडाहट से
खुसफुसाते फूलों पर भौरों की लड़खड़ाहट से...

एक नीम उदासी सी तारी
होती हुई इस गर्माती अलसाती दोपहर में
जब मितवा तेरे छूए हुए
उस वसंत की याद आ रही है !
बीता था सारा वह मधुमास
तुम्हारे ही गोद में सिर लुकाये
और हँसती रहती थी तुम, उन सांसों की
हल्की भाप मेरे गालों पर, ललाट पर
भौंहों पर लगाती रहती थी अंजन...
ओ मितवा, बोलो ना क्यों हुआ
वह वसंत जो गया, बस गया...
उस वसंत के बाद सारे मौसम खो गये !

अब लो यह वसंत तो बौराया हुआ
फिर आ धमका है...
तेरे नुपूर बंधे पैरों की
धमक कहाँ रह गई ?
उस बादामी रंग की चमक कहाँ रह गई ?
रेत उडती है आँगन पर, पूछती है पलट कर
तेरे पैरों के छाप कब फिर आयेंगे उकर ?

मितवा, मुझे भूले तो नहीं होगे ना तुम ?
जब भी आओगे, एक वसंत साथ लिए
आना कि सोचूँगा, मैंने पा लिये
हमारे सारे वसंत...
जो रह गये हैं अनछुए
तेरे-मेरे मीठी-मीठी बतकहियों से
मन के मधुर नाच से
डूबकर जिए जीवन के पलों की पाँत से

मितवा, राह देख रहा हूँ तेरी कि
एक दस्तक हो सन्नाटे में अचानक
बाहर निकलूँ और
तुम खड़े मिलो नम चेहरा लिए,
मुस्काते और आँसू ढुलाते, एक साथ...!  

(वसंत पंचमी - २०११)

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

शब्दों के जाले


इस रात... 
बड़े श्रम से
आहत मन की सारी प्रतिबद्धताओं
के दम पर
शब्दों के जाले बुनने फिर बैठा हूँ...

या कि इनका कोई अर्थ
कलेजे में चीरा लगाकर...
सीने के ऐन बीचों-बीच...
कुछ फोड कर बाहर निकल आया है,
जिसे शब्दों की शक्ल में 
अपने ही माँस और रक्त से छाँट कर
पेश कर रहा हूँ...!

इन शब्दों की धार से खेलते हुए
कई बार मेरी उँगलियों की जगह 
गर्दन कटी है...
और इनके तात्पर्य ढूंढते हुए
सारे आदिम जंगल छान मारे हैं !
तब एक जगह पाया...
अपनी असलियत ढेले की तरह पड़ी थी, 
...उठाई है !

फिर भी मैं कोई पागल हूँ कि 
सुकरात का ज़हर खुद भी चखना चाहता हूँ...
सफदर की तरह आखरी दम पे  
अपनी ईमान पर निसार होना चाहता हूँ...
पाश की तरह "घास" बन जाना चाहता हूँ और,
बागियों में भगत या बिरसा होना चाहता हूँ... 

शब्दों की आंच पर तमाम कच्चे अर्थों के 
उपले-कंडे सेंकते हुए...
मैं देख रहा हूँ कि 
बाज़ार मेरी नाक तोड़ रहा है
सत्ता मुझे झाड़-जंगलों में शिकारी कुत्ते की तरह
खोज-खोज कर,
गोली मार रही है...
मेरी जमीन का पानी वे लोग 
अपनी शीतल-पेय पैदा करने वाली फैक्ट्री में खपा रहे हैं
मेरी मिट्टी पर...
मेरे घर की औरतों के बदन पर की तरह 
उनके पंजों और खुरों के बजाफ्ता निशान हैं...!
मेरे नाम पर बनी सारी योजनाओं को
मेरे बहुत सारे अवैध विधाता चर रहे हैं...

उफ्फ़, बहुत हो चुका ! कहते हुए,
उठकर बाहर भागा हूँ 
एकाएक,
कमरे में असंख्य 
चीत्कार-चीखें
एक मातमी धुन की तरह फ़ैल गई थीं...

इस समय जो मृत्युबोध
सन्नाटे का फायदा उठाकर
मेरे-तुम्हारे जीवन में
चोरी से पैवस्त हो गया है,
उसे दबोच लेना है, 
कि वह एक गलत बात है...

तो इस समय...
इतना मौन क्यों है मेरा संसार ?
पूछने का यह समय, 
बिल्कुल ठीक समय है !

एक सहज किलकारी की तरह 
पूर्व में सूर्योदय कल होगा ही,
यही सोचकर बैठने से अच्छा है, हम पूरब की दिशा में 
इस रात से ही चलना शुरू कर दें...

शब्दों के जाले,
इस वक्त के चेहरे पर लिपटे
फ़रेब के जाले काट देंगे... 
हाँ, शब्दों को सान पर चढ़ा रहा हूँ,
कमान पर चढ़ा रहा हूँ...

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

दिल दुखता है बहुत...


ना दिलाओ याद...
ना कोई जिरह करो
बाबस्ता फिर उसी अफसाना-ऐ-उल्फत की
कि दिल दुखता है बहुत...
चाक हुआ जाता है !

बेरहम हुए वो जो
रहनुमा होंगे, जाना था कभी
अश्क अपने ही बहे,
खुद ही खाई जब शिकश्त...

कोई अपना बनते-बनते रह गया, या
ये बस अपनी आँखों का भरमाना था !
सारी हसरतों का सिला
एक मलाल रह गया यही...
हासिल होता जो चाहा था,
बस एक फैसले का
सूत भर फासला रह गया कहीं !

आज हम वही, रहगुजरों के
साये वही... ना कोई सदा, ना उम्मीद
ना इस दिल-ऐ-बेनूर के वफ़ा
का कोई मुरीद !
इस जाँ को तन्हा होना था, हो गया...

कौन होता है अपने जानिब
कौन जीता है, तेरी रूह में !
हम खुद ही जिए,
खुद ही मरे...
खुद ही डुबोई किश्ती
खुद ही तिरे...
खुद से खुद ही रहे हम
कौन क्या दिया, क्या ले गया !
किसने क्या बनाया हमको,
कौन हमें बिगाड़ गया !

फिर भी एक इल्तिजा है
ना कभी मेरी माज़ी की पूछना
यह जो वस्ल और हिज़्र की
रवायतें है, इनमें एक किताब
है ये शिकश्ताज़दा जिंदगी...
हर पन्ने पर कतरा-ऐ-खूँ है,
हर हर्फ़ पर ज़ख्म-ओ-नासूर मौजूँ है !
किसी सिरे को पकड़ कोई सवाल ना करना...
कि फिर दिल दुखेगा
फिर चाक हो जायेगा...!
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