रिपोर्ट : आज घाटशिला स्थित आई सी सी मजदूर यूनियन के हाल में प्रलेस के राष्ट्रिय अध्यक्ष मंडल के सदस्य, झारखंड प्रलेस के संरक्षक, प्रख्यात आलोचक, कवि और सीपीआई के झारखण्ड राज्य कार्यकारिणी के सदस्य डॉ खगेन्द्र ठाकुर के लिए एक स्मृति सभा आयोजित की गयी. डॉ खगेन्द्र ठाकुर का निधन कल दिनांक 13 जनवरी, 2020 को पटना एम्स में हृदयाघात से हो गया था. इस सभा में लेखक, रंगकर्मी, कम्युनिष्ट पार्टी के युवा कार्यकर्ता और मजदूर (नेतृत्व के साथियों सहित) मौजूद थे. सबसे पहले छिता हांसदा ने संक्षेप में खगेन्द्र ठाकुर के जीवन और कृतित्व पर रौशनी डाली. इसके बाद शेखर मल्लिक ने अपने संस्मरणों को साझा करते हुए बताया कि सबसे पहली मुलाकात 'संगमन' के दौरान जमशेदपुर में हुई थी. वे युवा और वरिष्ठ लेखकों के बीच समान रूप से प्रिय थे. घाटशिला प्रलेस के लिए उनकी प्रेरणा ही थी, जब हजारीबाग में उन्होंने पूछने पर कि कैसे प्रलेस शुरू करें, कहा था - बस बैनर लगाओ, और शुरू हो जाओ. आज घाटशिला प्रलेस की इकाई सक्रिय है ! जमशेदपुर, हजारीबाग, बिलासपुर, पटना से लेकर जयपुर तक उनसे अनेक मुलाकातें हैं. उनका नाम, लगता था कि कितनी बड़ी शख्सियत हैं, लेकिन मिलो तो एकदम दोस्ताना महसूस होता था ! घाटशिला में अभी छ: सात महीने झारखंड प्रलेस के तृतीय राज्य सम्मेलन में किस प्रकार विनोदपूर्ण तरीके से उन्होंने अपना वक्तव्य शुरू किया था. प्रेमचन्द वाले सत्र में किस प्रकार उन्होंने उन पर लगाये गये लांछन और आरोपों का सिलसिलेवार खंडन किया था, वह अविस्मरणीय है. इसी सम्मेलन में आदिवासी कविता और विचार सत्र के दौरान तेज बारीश में जब पंडाल उड़ गया था और बारीश का पानी चूने लगा था, वे अपनी जगह पर बैठे भीगते हुए पूरा वक्तव्य सुनते रहे. उस समय अरुणांचल से आई कवियत्री जमुना बीनी का सम्बोधन चल रहा था. कॉमरेड ओम प्रकाश सिंह ने कहा कि वे मजदूर यूनियन के लिए यहाँ आते रहे थे. और पार्टी व निजी रिश्तों के बीच बड़ी समझदारी से और मानीखेज तरीके से पार्टी को चुनते थे. इस समय जैसा प्रतिकूल और चुनौती का दौर है, उनका जाना सचमुच अखरता है. शेखर मल्लिक ने कहा कि वे एक बरगद की तरह थे, जिसकी विस्तृत छाया में हम सब रहते आये थे. इसपर ओम प्रकाश जी ने सहमती जताई. ज्योति मल्लिक ने हालिया जयपुर में सम्पन्न प्रलेस के राष्ट्रिय सम्मेलन की बात याद करते हुए बताया कि खगेन्द्र जी ने झारखण्ड के डेलीगेटों के साथ फोटो लेने के लिए किस प्रकार मंच पर अन्य का इंतजार किया था और फोटो होने के बाद ही उतरे. भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के घाटशिला अनुमंडल सचिव कॉमरेड भुवनेश्वर तिवारी ने भी यादों को खंगालते हुए कहा कि खगेन्द्र ठाकुर यहाँ लगभग हर जगह आये. उनका जाना कम्युनिष्ट पार्टी के लिए क्षति है. वे जब किसी मुद्दे पर कुछ लिख देते थे तो वही पार्टी का स्टैंड हो जाता था, यानि हमें उस विषय पर निर्णय लेने में सहूलियत हो जाती थी. कॉमरेड खगेन्द्र ठाकुर की राय पार्टी के लिए मायने रखती थी. अंत में उनके लिए दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजली दी गयी. इस अवसर पर कॉम भुवनेश्वर तिवारी, कॉम ओम प्रकाश सिंह (महासचिव - आई सी सी मजदूर यूनियन, एटक), कॉम बी एन सिन्ह्देब (अध्यक्ष - आई सी सी मजदूर यूनियन, एटक), कॉम एन के राय, कॉम संतोष दास, देबाशीष बनर्जी, कॉम कानाई मुर्मू, गणेश मुर्मू (अध्यक्ष - इप्टा घाटशिला), ज्योति मल्लिक (सचिव - प्रलेस घाटशिला), छिता हांसदा, राजा सिंह्देब, रवि, लखीन्द्र प्रधान, शेखर मल्लिक (अध्यक्ष - प्रलेस घाटशिला) आदि मौजूद रहे. 14.01.2020
कुछ बातें जो रह जाती हैं कभी मन में, अनकही- अनसुनी... शब्दों के माध्यम से रखी जा सकती हैं,बरक्स... मेरे-तेरे मन की कई बातें... कई सारे अनुभव, कई सारे स्पंदन, कई सारे घाव और मरहम... व्यक्त होते हैं शब्दों के माध्यम से... मेरा मुझी से है साक्षात्कार, शब्दों के माध्यम से... तू भी मेरे मनमीत, है साकार... शब्दों के माध्यम से...
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मंगलवार, 14 जनवरी 2020
डॉ खगेन्द्र ठाकुर के निधन पर प्रलेस घाटशिला ने की स्मृति सभा
शुक्रवार, 29 नवंबर 2019
प्रतिलिपि कथा सम्मान 2019
https://hindi.pratilipi.com/blog/pratilipi-katha-samman-2019-xz1n9rv991n592i
इस वर्ष के लिये 'प्रतिलिपि कथा सम्मान - 2019' में संपादकीय पसंद सम्मान मिलना सुखद है। कहानी है- जल, जंगल और ज़मीन को बचाने के लिए उसी आदिम संघर्ष की जिसकी आज सबसे ज्यादा जरूरत है, उस लड़ाई को ठीक से समझने और उसमें शामिल होने की भी -"जंगल मोर दुलाड़िया"!https://hindi.pratilipi.com/story/xYnZeSwXv4eY?utm_source=android&utm_campaign=content_share
इस वर्ष के लिये 'प्रतिलिपि कथा सम्मान - 2019' में संपादकीय पसंद सम्मान मिलना सुखद है। कहानी है- जल, जंगल और ज़मीन को बचाने के लिए उसी आदिम संघर्ष की जिसकी आज सबसे ज्यादा जरूरत है, उस लड़ाई को ठीक से समझने और उसमें शामिल होने की भी -"जंगल मोर दुलाड़िया"!https://hindi.pratilipi.com/story/xYnZeSwXv4eY?utm_source=android&utm_campaign=content_share
रविवार, 27 अक्टूबर 2019
चीन: ग़रीबी मुक्त भविष्य का स्वप्न
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- हरनाम सिंह
24 अक्टूबर, 2019, इंदौर (मध्य प्रदेश)।
प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई द्वारा "चीन गरीबी मुक्त भविष्य का स्वप्न" विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया। आयोजन के प्रमुख वक्ता थे प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी जो विगत दिनों चीन में 7 देशों के राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए आयोजित दस दिवसीय कार्यशाला में शिरकत करके लौटे थे । उन्होंने श्रोताओं के सम्मुख अपने अनुभव साझा किए । विनीत ने बताया कि भारत से सीपीआई, सीपीआई (एम) और फॉरवर्ड ब्लॉक के 8 सदस्यों का प्रतिनिधि मंडल इस 10 दिवसीय कार्यशाला में शामिल हुआ था। भारत सहित पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, म्यानमार, पूर्वी तिमोर और मलेशिया के कुल 38 राजनीतिक प्रतिनिधि इस 10 दिवसीय कार्यशाला में सम्मिलित हुए थे।
विनीत ने कहा कि चीन ने योजनाबद्ध तरीके से अपने देश में गरीबी कम करने में सफलता प्राप्त की है । वर्ष 2012 में चीन में क़रीब 10 करोड़ नागरिक गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करते थे ।अपनी योजनाओं के माध्यम से वर्ष 2018 तक चीन ने गरीबी पर नियंत्रण पाने में सफलता प्राप्त की है। अब वहां गरीबों की संख्या घटकर 1 करोड़ 70 लाख ही रह गई है, इसे संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी स्वीकार किया है।
विनीत ने बताया कि वर्ष 2010 से चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रही है । वहां की कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस में वर्ष 2020 तक गरीबी कम करने के लक्ष्य को लेकर योजनाएं बनाई गई जिसके अंतर्गत ग्रामीण अंचलों और शहरों के मध्य सामंजस्य बिठाया गया । प्रत्येक गांव की आवश्यकता के अनुसार वहा अधिकारी और विशेषज्ञ भेजे गए। पर्यवेक्षण के लिए कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता गांव में जाकर वर्षों तक रहे । उन्होंने पार्टी और प्रशासन के मध्य एक तंत्र विकसित किया, दोनों एक दूसरे की कमियों को पहचान कर विकास योजनाओं को क्रियान्वित करते है।
चीन ने 2012 में अपने देश में 1लाख 28 हजार ऐसे गांव चिन्हित किए जो सरकार के मापदंड अनुसार गरीब थे। इन गांव में 5 लाख 40 हजार अधिकारियों, कर्मचारियों तथा 1लाख 88 हजार पार्टी कार्यकर्ताओं को भेजा गया । यह सभी लोग 3 से 4 वर्ष तक गांव में ही रहे । वर्ष 2018 तक अब मात्र 26 हजार गांव ही ऐसे बचे थे जिन्हें विकसित किया जाना है। भारत की तरह चीन में भी गांव की योजनाओं के लिए वहां की ग्राम सभाओं में ही पूछा जाता है। उन ग्राम सभाओं में 50% महिलाओं की उपस्थिति सुनिश्चित करने की कोशिश की जाती है।
चीन " वन बेल्ट वन रोड "नीति के अंतर्गत कई अफ्रीकी एशियाई देशों में अधोसंरचना निर्माण के लिए निवेश कर अपने व्यवसाय को विस्तारित कर रहा है ।जो काम अमेरिका अपनी दादागिरी से करता है वही काम चीन गरीब देशों में आर्थिक इंफ्रास्ट्रेक्चर को विकसित करके उन देशों में रोजगार बढ़ाकर उन्हें अपने खेमे में लाकर कर रहा है। भारत अपनी सामरिक एवं सीमा संबंधी समस्याओं के कारण चीन की इस योजना में शामिल नहीं है ।
अर्थशास्त्री जया मेहता ने चीन के समाजवादी मॉडल के आकलन की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि चीन जो उपाय अपना रहा है वह पूंजीवाद व्यवस्था के भीतर कल्याणकारी राज्य के उपाय हैं। माओ की विचारधारा से चीन अलग हो चुका है। गरीबी कम करने से बड़ा सवाल ये है कि समाजवादी व्यवस्था में गरीबी रहनी ही क्यों चाहिए। निजी सम्पत्ति को अभी तक कायम रखा गया है लेकिन पार्टी का सख्त अनुशासन वहाँ जारी है।
हरनाम सिंह ने विकासशील और गरीब देशों में तत्कालीन सोवियत संघ एवं वर्तमान चीन द्वारा दी जा रही मदद के स्वरूप पर सवाल उठाए । सत्यनारायण वर्मा ने चीन के भीतर धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति के बारे में सवाल किए, चुन्नीलाल वाधवानी ने चीन के वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट पर सवाल किए। राहुल बनर्जी ने चीन में हो रहे अत्यधिक उत्पादन और वहाँ के लेबर और वर्किंग कंडीशन के बारे में सवाल किए। संजय वर्मा, शैला शिंत्रे ने भी परिचर्चा में भागीदारी की।
सवालों के जवाब देते हुए विनीत ने कहा कि पूँजीवादी व्यवस्था में आए विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के दौर ने चीन को अपने विपुल मानव संसाधन की वजह से यह अवसर दिया है कि वह आज दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इस अवसर से हो रहे मुनाफे का इस्तेमाल चीन किस तरह करता है इससे ही भविष्य में तय होगा कि चीन के विकास का रास्ता पूंजीवाद की तरफ जाता है या समाजवाद की तरफ। आज रूस एक पूंजीवादी देश है लेकिन वैश्विक स्तर पर अमरीका उसे आँख नहीं दिखा सकता। वैसे ही चीन अमरीका के सामने एक बड़ी ताकत बनकर मौजूद है। बेशक चीन का समाजवाद शास्त्रीय अर्थों में समाजवाद नहीं कहा जा सकता लेकिन एक बहुध्रुवीय विश्व का होना एकध्रुवीय विश्व के होने से बेहतर है। दस दिन में एक गाइडेड टूर के तौर पर निष्कर्ष निकालना गलत होगा। ये जरूर कहा जा सकता है कि अपने देश के गरीबी खत्म करने के उसके गम्भीर प्रयासों को अगर कामयाबी मिली है तो उसके पीछे एक करोड़ की समर्पित कैडरों की कम्युनिस्ट पार्टी की बहुत बड़ी भूमिका है।
कार्यक्रम का संचालन समन्वयक केसरी सिंह चिराड ने किया। आभार माना प्रगतिशील लेखक संघ इकाई के अध्यक्ष एस के दुबे ने। परिचर्चा में अभय नेमा, अजय लागू, सुलभा लागू, सारिका श्रीवास्तव, सुरेश उपाध्याय, सोहनलाल शिंदे, प्रणय, सूरज एवं अन्य साथियों ने शिरकत की।
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गुरुवार, 12 सितंबर 2019
"काफिला तो चले..."
रिपोर्ट "काफिला तो चले..." प्रलेस झारखण्ड का तीसरा प्रांतीय सम्मेलन 27 - 28 जुलाई 2019, घाटशिला प्रगतिशील लेखक संघ का तीसरे झारखण्ड राज्य सम्मेलन घाटशिला के मऊभंडार स्थित आई.सी.सी. स्पोर्ट्स क्लब (विभूति भूषण बंद्योपाध्याय परिसर, डॉ. नामव र सिंह मंच, प्रेमचंद नगर) में आयोजित हुआ. इस सम्मेलन का उद्घाटन लखनऊ से आये प्रसिद्ध साहित्यकार और महात्मा गाँधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति विभूति नारायण राय ने किया. उद्घाटन सत्र में प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव राजेन्द्र राजन, बिहार प्रलेस के महासचिव रबिन्द्र नाथ राय, वरिष्ठ लेखक खगेन्द्र ठाकुर, झारखंड प्रलेस के अध्यक्ष जयनन्दन, राकेश मिश्र, घाटशिला प्रलेस के अध्यक्ष शेखर मल्लिक, कॉम. बस्ता सोरेन, एटक के महासचिव कॉम. ओमप्रकाश सिंह, प्रलेस के राष्ट्रीय सचिव मंडल के विनीत तिवारी, सुधीर सुमन (जसम), उपेन्द्र (इप्टा), अशोक शुभदर्शी (जलेस) प्रलेस और इप्टा, घाटशिला की संरक्षिका डॉ सुनीता देवदूत सोरेन आदि मंच पर मौजूद थे. इप्टा द्वारा जनगीतों से शुरुआत होने के पश्चात सबका स्वागत करते हुए आयोजक शेखर मल्लिक ने घाटशिला का इतिहास, भौगोलिक -सांस्कृतिक ख़ासियतों, जन संघर्षों और क्रांतिकारी व्यक्तित्वों और घाटशिला प्रलेस के सफर के बारे में बताया और कैफी आज़मी की नज़्म “नई सुबह" के कुछ पंक्तियों को उधृत कर बातें रखीं और आयोजन के एतिहासिक होने की उम्मीद की । उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता राजेन्द्र राजन, खगेन्द्र ठाकुर और जयनंदन ने की और प्रगतिशील लेखकों के समकालीन खतरों और कर्तव्यों के बारे में बताया । अन्य वक्ताओं ने भी इस पर चर्चा करते हुए प्रेमचंद से लेकर ब्रेख़्त तक को याद किया । जसम, जलेस, इप्टा एवं एटक के साथियों ने भी एकजुटता व्यक्त की। महासचिव और सत्र संचालक डॉ मिथिलेश ने सम्मेलन को चुप्पी के दौर में एक आवाज़ बताया । धन्यवाद ज्ञापन शशि कुमार ने फैज़ के प्रासंगिक शेर से किया : “माना कि ये सुनसान घड़ी सख़्त घड़ी है ,लेकिन मिरे दिल ये तो फ़क़त इक ही घड़ी है ,हिम्मत करो जीने को तो इक उम्र पड़ी है “ दूसरा सत्र (ख़ार औ ख़स तो उठे रास्ता तो चले) कैफ़ी आज़मी और रजिया सज्जाद जहीर पर केन्द्रित था, जिनका जन्मशती वर्ष मनाया जा रहा है. इस सत्र में अध्यक्षता की विभूति नारायण राय ने की और संचालन किया अर्पिता श्रीवास्तव ने. वक्ताओं सुधीर सुमन, अहमद बद्र, विनीत तिवारी, सारिका श्रीवास्तव और शशी कुमार ने दोनो महानुभावों के नायाब लेखन के साथ उनकी जिंदगियों और विचारों पर भी बात रखी । शशि कुमार जी ने बताया कि कैसे फिल्मी हस्ती कहे जाने पर ऐतराज जता कर कैफ़ी ने कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यता को अपने जिन्दगी का हासिल बताया था । साथ ही सारिका श्रीवास्तवजी ने बताया कि 1953 में प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ पर नाटक लिखने और खेलने के जुर्म में रजिया सज्जाद ज़हीर पर मुकदमा दर्ज़ हुआ जिसके बाद अदालत में फैसला आया कि कलाकारों, लेखकों को अभिव्यक्ति की आज़ादी होनी चाहिए । “अस्मिता के सवाल, संघर्ष और आदिवासी” विषय पर विमर्श सत्र और आदिवासी कविता पाठ का संचालन डॉ. सुनीता देवदूत सोरेन ने किया। युवा कवियत्री जसिंता केरकेट्टा ने बुलंद कविता – ‘राष्ट्रवाद’ से सत्र शुरु किया : जब मेरा पड़ोसी मेरे खून का प्यासा हो गया मैं समझ गया राष्ट्रवाद आ गया अनुज लुगुन, जमुना बीनी, नीतिशा खलको. चन्द्रमोहन किस्कू, श्याम चन्द्र टुडू और महादेव टोप्पो ने कवितायेँ सुनाईं. डॉ. सुनीता ने भी अपनी कविताओं का पाठ किया. इसके पश्चात हुए विमर्श में वक्ताओं ने काफी कड़े प्रश्न उठाए । जमुना बीनी ने उत्तर पूर्व के आदिवासियों के सांस्कृतिक अस्मिता और आस्तित्व पर हमलों की बात की. आदिवासी कविता को मूलतः अस्मिता की खोज बताते हुए ही अनुज लुगुन ने अस्मितावादी आंदोलन (अस्मिता का संघर्ष) और प्रगतिशीलों के आंदोलन(सर्वहारा वर्ग का संघर्ष) में एकजुटता महत्वपूर्ण होने की बात रखी । जसिंता केरकेट्टा के अनुसार, पहाड़, जंगल लोगों से वो जज्बा लेना चाहिए, वो सीखना चाहिए और ऐसी धरती जहाँ पे मनुष्य और मनुष्यता बची रहे... हमें उसी दिशा में बढ़ना चाहिए. नीतिशा खलको ने कहा आदिवासी अस्मिता के सवाल की जब हम बात कर रहे हैं, तो हमें इनके लोकगीतों के पास जाके बात करनी होगी, सम्वाद करना होगा. आदिवासी सभ्यता के अस्तित्व पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एवं सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को खतरा माना गया । महादेव टोप्पो जी ने प्रश्न उठाया कि ये धरतीखोर और आदमखोर विकास क्यों है ? उनकी अध्यक्षता में हुआ ये सत्र प्रलेस झारखण्ड के महासचिव मिथलेश जी के धन्यवाद ज्ञापन से समाप्त हुआ । शाम्भवी प्रियदर्शना ने अगला सत्र संचालित किया जिसमें झारखण्ड इप्टा की घाटशिला इकाई द्वारा जनगीतों की प्रस्तुति हुई। आदिवासी संघर्ष का गीत 'गाँव छोड़ब नहीं' भी काफी उत्साहपूर्वक नृत्य के साथ पेश किया गया । इस के पश्चात भागीरथी प्रधान के निर्देशन में जमशेदपुर इकाई ने वीरेन डंगवाल की कविता "हमारा समाज" का नाट्य रूपांतरण पेश किया । दूसरे दिन के कार्यक्रम की शुरुआत मऊभंडार आई सी सी कम्पनी गेट स्थित शहीद बिरसा मुंडा की प्रतिमा से डॉ.भीमराव आंबेडकर चौक तक लेखकों, कवियों, रंगकर्मियों, बुद्धिजीवियों, छात्र – छात्राओं का सद्भाव, एकजुटता और सांस्कृतिक बहुलता के लिए सांस्कृतिक मार्च निकाल कर हुई. मार्च की अगुवाई इप्टा के कलाकारों ने लोकनृत्यों और वादन से की. तुम्दा. मादल, धमसा. घंटी, झांझ के साथ झूमते उत्साही कलाकारों का समूह भी देशज नृत्य करते हुए साथ चला । दूसरे दिन के पहले सत्र “प्रेमचंद की विरासत: एक परिचर्चा” में प्रेमचंद की रचनाओं, विचारों और उनके साहित्य के आज के दौर में प्रासंगिकता पर गम्भीर चर्चा हुई। डॉ• के के लाल ने प्रेमचंद के विचारों को आगे ले जाने के लिए इंटरनेट और अन्य आधुनिक माध्यमों के उपयोग का सुझाव दिया । प्रेमचंद के साहित्यक के सौन्दर्य के साथ ही 1936 में दिए गए उनके अध्यक्षीय भाषण और उनके राजनीतिक व सामाजिक नज़रिए पर गंभीर विचार य विमर्श हुआ । कृपाशंकर जी द्वारा संचालित सत्र खगेन्द्र ठाकुर जी की अध्यक्षता में हुआ, जिन्होंने प्रगतिशीलता के विचारों और नए समाज की कल्पना को ही प्रेमचंद की विरासत बताया । इसके बाद "कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी " नाम से अतिथि कवियों द्वारा हिन्दी-ऊर्दू कविता पाठ का सत्र चला जिसका संचालन सत्यम श्रीवास्तव ने किया । विभिन्न राज्यों के कवियों ने अलग-अलग ढ़ंग से अलग-अलग विषयों पर , अलग रसों की यथार्थवादी कविताओं का पाठ किया । सत्र की अध्यक्षता कर रहे अहमद बद्र साहब ने "सबके मुंह में तलवारें हैं, तलवारों पर धार नहीं है.. मैं हूँ उनकी खोज में जिनके आँगन में दीवार नहीं है " जैसे शेर सुनाकर श्रोताओं को अविभूत किया। इसके बाद प्रलेस के राज्य कार्यकारिणी की सांगठनिक बैठक हई. प्रलेस के सभी पदाधिकारी इसमें मौजूद रहे. इसका संयोजन शशि कुमार ने किया. राज्य महासचिव मिथिलेश ने प्रतिवेदन प्रस्तुत किया और उसके बाद प्रलेस झारखण्ड की ओर से कुछ प्रस्ताव व्यक्त किये गये : • झारखण्ड सरकार से अविलंब भाषा एवं साहित्य अकादमी के गठन की मांग • एक हिंदी अकादमी और झारखंडी भाषाओँ के लिए एक अलग अकादमी की स्थापना की माँग • विश्विद्यालयों एवं शिक्षण संस्थानों में पाठ्यक्रमों के साथ की जा रही छेड़ छाड़ की निंदा करते हुए ऐसी प्रवृतियों पर रोक लगाने की मांग • उन्मादी हिंसा पर अविलंब रोक लगाने की मांग • समाज में बढ़ रही हिंसक प्रवृति के विरुद्ध प्रेमभाव के प्रति पक्षधरता की वकालत करते हुए, इसका अपने लेखन व कर्म के साथ ही भौतिक भागीदारी देकर सक्रिय विरोध का संकल्प • सोनभद्र में हुए आदिवासियों के नरसंहार समेत देशभर में हुए दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यों समेत जन संघर्षों में शहीदों के प्रति श्रद्धांजली अर्पण • ऐसे नरसंहारों की निंदा करते हुए सरकार से इन पर अंकुश लगाने की मांग • एक वेबसाइट शुरू करने का संकल्प सम्मेलन के बाद गठित झारखण्ड प्रलेस की नयी समिति इस प्रकार है : संरक्षक : डॉ. खगेन्द्र ठाकुर, शशि कुमार अध्यक्ष: जयनन्दन कार्यकारी अध्यक्ष :महादेव टोप्पो महासचिव : मिथिलेश सिंह उप महासचिव : शेखर मल्लिक उपाध्यक्ष : अहमद बद्र , राकेश मिश्र, रामनंदन सिंह, पंकज मित्र और डॉ. सुनीता देवदूत सोरेन सचिव मंडल : प्रवीण परिमल, अर्पिता श्रीवास्तव , नुदरत नवाज़, कृपाशंकर और के के लाल कोषाध्यक्ष :भारती कार्यकारिणी :पंकज श्रीवस्तव, मुकेश कुमार, सूरज श्रीवास्तव, विनय कुमार, नियाज़ अख्तर, विजय पियूष, विनय सौरभ, कमल, संतोष कुमार और शिवशंकर - रिपोर्ट : सत्यम
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प्रलेस झारखंड राज्य सम्मेलन
सोमवार, 27 मई 2019
इप्टा घाटशिला ने मनाया इप्टा का 76वां स्थापना दिवस जन संस्कृति दिवस
25 मई 2019
आज भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) की घाटशिला इकाई ने इप्टा के 76वें स्थापना दिवस को जन संस्कृति दिवस के तौर पर मनाया। कार्यक्रम की शुरुआत में विषय प्रवेश कराते हुए इप्टा घाटशिला के सचिव शेखर मल्लिक ने कहा कि, इप्टा की नायक जनता है और इसी स्परिट से इप्टा अपने स्थापना काल से प्रतिरोध का रंगमंच बनी हुई है। यह 1943 में इसके स्थापना से पूर्व से ही जो कल्चरल स्क़वाड देश के अनेक जगहों, खासकर भूख से बिलखते बंगाल में जनता को अपने नाटकों से जगा ही नहीं रही थी, बल्कि इंसानियत की मिसालें पैदा कर रही थीं। बंगाल की विभीषिका, अकाल, तो वहां से इसकी शुरुआत होती है।
25 मई, 1943 को इसका पहला सम्मेलन हुआ जहां प्रो. हीरेन मुखर्जी ने आह्वान किया यह, आप सब, जो कुछ भी हमारे भीतर सबसे अच्छा है, उसे अपनी जनता के लिए अर्पित कर दें. लेखक और कलाकार आओ, आओ अभिनेता और नाटककार, तुम सारे लोग, जो हाथ या दिमाग से काम करते हो, आगे आओ और अपने आपको आज़ादी और सामाजिक न्याय का एक नया वीरत्वपूर्ण समाज बनाने के लिए समर्पित कर दो।
इप्टा में सीपीआई के प्रथम महासचिव पूरन चन्द जोशी का योगदान महत्वपूर्ण था।
हम पर एक विरासत की जिम्मेदारी है। आज इप्टा क्यों, क्योंकि आज का जो समय है उसमें हमारे सामने जो 23 मई के बाद परिस्थितियां हैं। इप्टा प्रतिरोध का मंच रहा है। शोषितों और हाशिये के लोगों कब लिए जब आप पक्ष चुनेंगे तो आपको विरोध झेलना पड़ेगा। इंसानियत के लिये हम जब खुद महसूस करते हैं कि सही क्या और गलत क्या है, झूठ और सच क्या है। तो जब हमें सही रास्ते की पहचान हो जाती है तो उस रास्ते को पकड़ कर चलना चाहिए, छोड़ नहीं देना चाहिए।
इसलिये इप्टा के साथ हम यह प्रतिरोध खड़ा करना है। राजनीति से अछूता कुछ नहीं है।
इप्टा के साथ बलराज साहनी, उत्पल दत्त, एके हंगल,रहे तो, पंडित रविशंकर, शंकर शैलेन्द्र, प्रेमधवन जिन्होंने कई देशभक्ति के गीतों की रचना की, जिन्हें रफ़ी साहब ने आवाज़ दी, चित्तो प्रसाद जैसे चित्रकार जिन्होंने इप्टा का लोगो *कॉल ऑफ द ड्रम* बनाया। सुनील जाना जैसे फ़ोटोग्राफ़र रहे। बंगाल की प्राकृतिक नहीं, बनी बनाई आपदा, जैसे आज कई चीजें बनाई जा रही हैं, का जो चित्र इन्होंने पेश किया उससे हम आज उस त्रासदी को देख समझ सकते हैं। *सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा* की धुन रविशंकर ने बनाई थी। इप्टा अपने देश से प्रेम किया है। चूंकि वह आज़ादी के संघर्ष का दौर था, इप्टा ने भी इसमें योगदान दिया है। इसलिये आज जो हमें देशद्रोही कहते हैं, उन्हें देखना चाहिए। इप्टा ने 75 वर्ष पूरे कर लिए हैं। इतने वक़्त तक हाशिये के समाज, शोषितों और उत्पीड़ितों की आवाज़ इप्टा ही बना रहा है।
सबके लिए एक सुंदर दुनिया का ख़्वाब वो साझा ख्वाब है, जिसे हर इप्टकर्मी देखता और जिता है। इसके बाद राजा(भिंचे हुए जबड़े दर्द कर रहे हैं), सत्यम (तू़फ़ानों ने कभी मात नहीं खायी और यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश), लक्ष्मी(क्रूरता!), शेखर(शीशों का मसीहा कोई नहीं), शुभम (उजले दिन जरुर आयेंगे) और कॉम. सुनीता मुर्मू (राजनीति से परहेज करनेवाले बुद्धिजीवी) ने क्रमश: अनिल राकेशी (पार्टी फ़िल्म में प्रयुक्त कविता) पाश, नवारुण भट्टाचार्य, कुमार अम्बुज, फ़ैज़, वीरेन ढंगवाल, और आतो रीनी कास्तिलो(1934 -1967) (दक्षिण अमेरिका के देश गुआटेमाला के महत्वपूर्ण क्रांतिकारी और कवि) की रचनाओं का पाठ किया।
इसके बाद इप्टा के साथियों ने जनगीतों की प्रस्तुतियां दीं। प्रेमधवन के गीत ये वक़्त की आवाज़ है मिलके चलो, कविवर कन्हैया के प्रसिद्ध गीत फिर नए संघर्ष का न्यौता मिला है और कवि यश मालवीय की कविता दबे पैरों से उजाला आ रहा है जनगीतों ने उपस्थित लोगों में वैचारिक उद्विग्नता भर दी। गीतों की प्रस्तुति में शेखर मल्लिक, ज्योति मल्लिक, श्रद्धा कुमारी, मानसी कुमारी, मल्लिका प्रधान, गणेश मुर्मू, कार्तिक चौधरी, भूमि महाकुड़, राजा, अनुज, और ए आई एस एफ़ के साथी सुनीता मुर्मू, विक्रम कुमार आदि ने स्वर दिया।
इसके बाद कार्यक्रम के दूसरे हिस्से में संवाद सत्र का सिलसिला चला। इप्टा के इतिहास और वर्तमान में उसकी प्रासंगिकता व चुनौतियों पर, जिनकी चर्चा शेखर ने शुरू में कई थी, इप्टा क्यों? सत्र में परिचर्चा के अंतर्गत स्वस्थ व सारगर्भित चर्चा हुई।
युवा साथी सत्यम ने कहा कि फासीवाद के ख़िलाफ़ प्रतिरोध के जो तरीके हैं, उनमें हिंसा से ज्यादा श्रेष्ठ तरीका कला का माध्यम है।
इप्टा झारखंड के संरक्षक और वरिष्ठ रंगकर्मी शशि कुमार ने कहा, नाटक की सबसे बड़ी खूबी है कि बिना पढ़े लिखे, यानी वर्ण व्यवस्था में हाशिये के लोगों को जो ज्ञान प्राप्ति के माध्यमों से दूर रखा गया, वे भी नाटक के जरिये, जैसे सुनकर और संवाद बोलने से, ज्ञान हासिल कर सकते थे। इप्टा जीवंत संगठन है, यह जिंदा है क्योंकि इसके पीछे विचार है। नाटक करने वाला, गीत संगीत गाने वाला युवा कभी अपराधी नहीं हो सकता। यह नाटक की खूबी है। हो सकता है वह सफ़दर हाशमी या केन सरो वाइवा की तरह मारा जाय पर वह क्रिमिनल नहीं बन सकता! इप्टा कहती है कि हमारी नायक जनता है। इप्टा के साथ व्यक्तित्व का निर्माण और कैरियर का भी निर्माण भी होता है। कैफ़ी हों या संजीव कुमार, उन्होंने अपना जीवन यापन के लिए ढंग से कैरियर भी बनाया। लेकिन मूल्यों से समझौता किये बग़ैर। शशि जी ने वाकया सुनाया कि ए के हंगल साहब सेट पर राजकपूर से नाराज हो गए कि मैं कल से नहीं आऊँगा।आपके देर से आने से मेरा इप्टा का नाटक छूट गया। तो यह कमिटमेंट था।
कार्यक्रम में इप्टा घाटशिला के साथी ज्योति मल्लिक, कार्तिक चौधरी, तुहीन मंडल, बाल कलाकारों के अलावा प्रो नरेश कुमार, रवि सिंह, रंगकर्मी सुजन सरकार, सुभम, अंकित, रुपाली बारीक, लखिन्द्र प्रधान, संजीव घोष, संजय मुखी, लक्ष्मी कुदादा, साकरो मुर्मू, ए आई एस एफ़ की जमशेदपुर इकाई की उपाध्यक्ष कॉम सुनीता मुर्मू और कॉम विक्रम कुमार भी मौजूद थे।
संचालन कार्तिक चौधरी ने किया। कार्यक्रम बिल्कुल अनौपचारिक ढंग से आयोजित हुआ। बिछी हुई दरी पर घेरा बनाकर साथी बैठे और संवाद हुआ।
कार्यक्रम के उपरांत साथी सुभम के प्रश्नो और जिज्ञासाओं को संतुष्ट किया गया।
- रिपोर्ट: ज्योति मल्लिक, शेखर मल्लिक
आज भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) की घाटशिला इकाई ने इप्टा के 76वें स्थापना दिवस को जन संस्कृति दिवस के तौर पर मनाया। कार्यक्रम की शुरुआत में विषय प्रवेश कराते हुए इप्टा घाटशिला के सचिव शेखर मल्लिक ने कहा कि, इप्टा की नायक जनता है और इसी स्परिट से इप्टा अपने स्थापना काल से प्रतिरोध का रंगमंच बनी हुई है। यह 1943 में इसके स्थापना से पूर्व से ही जो कल्चरल स्क़वाड देश के अनेक जगहों, खासकर भूख से बिलखते बंगाल में जनता को अपने नाटकों से जगा ही नहीं रही थी, बल्कि इंसानियत की मिसालें पैदा कर रही थीं। बंगाल की विभीषिका, अकाल, तो वहां से इसकी शुरुआत होती है।
25 मई, 1943 को इसका पहला सम्मेलन हुआ जहां प्रो. हीरेन मुखर्जी ने आह्वान किया यह, आप सब, जो कुछ भी हमारे भीतर सबसे अच्छा है, उसे अपनी जनता के लिए अर्पित कर दें. लेखक और कलाकार आओ, आओ अभिनेता और नाटककार, तुम सारे लोग, जो हाथ या दिमाग से काम करते हो, आगे आओ और अपने आपको आज़ादी और सामाजिक न्याय का एक नया वीरत्वपूर्ण समाज बनाने के लिए समर्पित कर दो।
इप्टा में सीपीआई के प्रथम महासचिव पूरन चन्द जोशी का योगदान महत्वपूर्ण था।
हम पर एक विरासत की जिम्मेदारी है। आज इप्टा क्यों, क्योंकि आज का जो समय है उसमें हमारे सामने जो 23 मई के बाद परिस्थितियां हैं। इप्टा प्रतिरोध का मंच रहा है। शोषितों और हाशिये के लोगों कब लिए जब आप पक्ष चुनेंगे तो आपको विरोध झेलना पड़ेगा। इंसानियत के लिये हम जब खुद महसूस करते हैं कि सही क्या और गलत क्या है, झूठ और सच क्या है। तो जब हमें सही रास्ते की पहचान हो जाती है तो उस रास्ते को पकड़ कर चलना चाहिए, छोड़ नहीं देना चाहिए।
इसलिये इप्टा के साथ हम यह प्रतिरोध खड़ा करना है। राजनीति से अछूता कुछ नहीं है।
इप्टा के साथ बलराज साहनी, उत्पल दत्त, एके हंगल,रहे तो, पंडित रविशंकर, शंकर शैलेन्द्र, प्रेमधवन जिन्होंने कई देशभक्ति के गीतों की रचना की, जिन्हें रफ़ी साहब ने आवाज़ दी, चित्तो प्रसाद जैसे चित्रकार जिन्होंने इप्टा का लोगो *कॉल ऑफ द ड्रम* बनाया। सुनील जाना जैसे फ़ोटोग्राफ़र रहे। बंगाल की प्राकृतिक नहीं, बनी बनाई आपदा, जैसे आज कई चीजें बनाई जा रही हैं, का जो चित्र इन्होंने पेश किया उससे हम आज उस त्रासदी को देख समझ सकते हैं। *सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा* की धुन रविशंकर ने बनाई थी। इप्टा अपने देश से प्रेम किया है। चूंकि वह आज़ादी के संघर्ष का दौर था, इप्टा ने भी इसमें योगदान दिया है। इसलिये आज जो हमें देशद्रोही कहते हैं, उन्हें देखना चाहिए। इप्टा ने 75 वर्ष पूरे कर लिए हैं। इतने वक़्त तक हाशिये के समाज, शोषितों और उत्पीड़ितों की आवाज़ इप्टा ही बना रहा है।
सबके लिए एक सुंदर दुनिया का ख़्वाब वो साझा ख्वाब है, जिसे हर इप्टकर्मी देखता और जिता है। इसके बाद राजा(भिंचे हुए जबड़े दर्द कर रहे हैं), सत्यम (तू़फ़ानों ने कभी मात नहीं खायी और यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश), लक्ष्मी(क्रूरता!), शेखर(शीशों का मसीहा कोई नहीं), शुभम (उजले दिन जरुर आयेंगे) और कॉम. सुनीता मुर्मू (राजनीति से परहेज करनेवाले बुद्धिजीवी) ने क्रमश: अनिल राकेशी (पार्टी फ़िल्म में प्रयुक्त कविता) पाश, नवारुण भट्टाचार्य, कुमार अम्बुज, फ़ैज़, वीरेन ढंगवाल, और आतो रीनी कास्तिलो(1934 -1967) (दक्षिण अमेरिका के देश गुआटेमाला के महत्वपूर्ण क्रांतिकारी और कवि) की रचनाओं का पाठ किया।
इसके बाद इप्टा के साथियों ने जनगीतों की प्रस्तुतियां दीं। प्रेमधवन के गीत ये वक़्त की आवाज़ है मिलके चलो, कविवर कन्हैया के प्रसिद्ध गीत फिर नए संघर्ष का न्यौता मिला है और कवि यश मालवीय की कविता दबे पैरों से उजाला आ रहा है जनगीतों ने उपस्थित लोगों में वैचारिक उद्विग्नता भर दी। गीतों की प्रस्तुति में शेखर मल्लिक, ज्योति मल्लिक, श्रद्धा कुमारी, मानसी कुमारी, मल्लिका प्रधान, गणेश मुर्मू, कार्तिक चौधरी, भूमि महाकुड़, राजा, अनुज, और ए आई एस एफ़ के साथी सुनीता मुर्मू, विक्रम कुमार आदि ने स्वर दिया।
इसके बाद कार्यक्रम के दूसरे हिस्से में संवाद सत्र का सिलसिला चला। इप्टा के इतिहास और वर्तमान में उसकी प्रासंगिकता व चुनौतियों पर, जिनकी चर्चा शेखर ने शुरू में कई थी, इप्टा क्यों? सत्र में परिचर्चा के अंतर्गत स्वस्थ व सारगर्भित चर्चा हुई।
युवा साथी सत्यम ने कहा कि फासीवाद के ख़िलाफ़ प्रतिरोध के जो तरीके हैं, उनमें हिंसा से ज्यादा श्रेष्ठ तरीका कला का माध्यम है।
इप्टा झारखंड के संरक्षक और वरिष्ठ रंगकर्मी शशि कुमार ने कहा, नाटक की सबसे बड़ी खूबी है कि बिना पढ़े लिखे, यानी वर्ण व्यवस्था में हाशिये के लोगों को जो ज्ञान प्राप्ति के माध्यमों से दूर रखा गया, वे भी नाटक के जरिये, जैसे सुनकर और संवाद बोलने से, ज्ञान हासिल कर सकते थे। इप्टा जीवंत संगठन है, यह जिंदा है क्योंकि इसके पीछे विचार है। नाटक करने वाला, गीत संगीत गाने वाला युवा कभी अपराधी नहीं हो सकता। यह नाटक की खूबी है। हो सकता है वह सफ़दर हाशमी या केन सरो वाइवा की तरह मारा जाय पर वह क्रिमिनल नहीं बन सकता! इप्टा कहती है कि हमारी नायक जनता है। इप्टा के साथ व्यक्तित्व का निर्माण और कैरियर का भी निर्माण भी होता है। कैफ़ी हों या संजीव कुमार, उन्होंने अपना जीवन यापन के लिए ढंग से कैरियर भी बनाया। लेकिन मूल्यों से समझौता किये बग़ैर। शशि जी ने वाकया सुनाया कि ए के हंगल साहब सेट पर राजकपूर से नाराज हो गए कि मैं कल से नहीं आऊँगा।आपके देर से आने से मेरा इप्टा का नाटक छूट गया। तो यह कमिटमेंट था।
कार्यक्रम में इप्टा घाटशिला के साथी ज्योति मल्लिक, कार्तिक चौधरी, तुहीन मंडल, बाल कलाकारों के अलावा प्रो नरेश कुमार, रवि सिंह, रंगकर्मी सुजन सरकार, सुभम, अंकित, रुपाली बारीक, लखिन्द्र प्रधान, संजीव घोष, संजय मुखी, लक्ष्मी कुदादा, साकरो मुर्मू, ए आई एस एफ़ की जमशेदपुर इकाई की उपाध्यक्ष कॉम सुनीता मुर्मू और कॉम विक्रम कुमार भी मौजूद थे।
संचालन कार्तिक चौधरी ने किया। कार्यक्रम बिल्कुल अनौपचारिक ढंग से आयोजित हुआ। बिछी हुई दरी पर घेरा बनाकर साथी बैठे और संवाद हुआ।
कार्यक्रम के उपरांत साथी सुभम के प्रश्नो और जिज्ञासाओं को संतुष्ट किया गया।
- रिपोर्ट: ज्योति मल्लिक, शेखर मल्लिक
सोमवार, 4 मार्च 2019
कलाकार एकजुट में इप्टा के साथ प्रलेसं और भारतीय महिला फेडरेशन, घाटशिला ईकाई की भागीदारी
आज राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित #कलाकार एकजुट अभियान में इप्टा, प्रलेसं और भारतीय महिला फ़ेडरेशन की घाटशिला इकाई के सदस्यों ने घाटशिला अनुमंडल के कदमडीह, बड़ाघाट, दक्षिण सुरदा और ऊपरबांधा आदि गांवों में जनगीत, पोस्टर प्रदर्शनी और स्पॉट पोस्टर मेकिंग, कविता पाठ (दक्षिण सुरदा) और शाम को ऊपरबांधा में इप्टा की फ़िल्म *धरती के लाल* का प्रदर्शन किया।
कॉम गणेश मुर्मू, कार्तिक, ज्योति मल्लिक और शेखर मल्लिक जनता से संवाद करते रहे। कविताओं के अर्थ और उनके बीच आने का प्रयोजन गणेश मुर्मू उन्हीं की जनभाषा, संथाली में समझाते, कार्तिक और ज्योति बंगला में, जब शेखर हिंदी में बताते। इस तरह , खासकर महिलाओं के बीच दल के गीतों और मौजूदगी का प्रभाव पड़ता दिख रहा था। वे ही खासी उत्सुक दिखे। दिनभर चले इस मुहिम में किसानों, मज़दूरों के लियेे गीत और अदम गोंडवी, राजेश जोशी, पाश और गोरख पांडेय के गीत व कविताओं का पाठ भी हुआ। "गांव छोड़ब नहीं", "चले चलो, दिलों के घाव लेके भी चले चलो","हाल चलाकर खेतों को मैंने ही सजाया रे","समय का पहिया" गीतों की प्रस्तुति हुई। इप्टा के साथी चित्रकार, संगीतकार, कवि-गीतकार और नृतक कार्तिक ने मुक्तिबोध की कविता का पोस्टर तांबे के खदान के बेल्ट, दक्षिण सुरदा, सुदूरवर्ती गाँव के चौक पर मज़दूरों, महिलाओं, बच्चों के बीच ऑन स्पॉट बनाया। साथी संगीता मानकी ने पाश की, लतिका ने राजेश जोशी की, शेखर ने अदम गोंडवी और गोरख पांडेय की और रुपाली बारीक ने भी गोरख की कविताओं का पाठ किया। इंसानी मुहब्बत, सौहार्द, भाईचारे, अभिव्यक्ति और असहमति के अधिकार के लिए, नफ़रत के ख़िलाफ़ सभी कलाकारों की सामूहिकता और एकजुटता ने एक मिसाल कायम की। शाम को जब प्रॉजेक्टर तकनीकी गड़बड़ी से बड़े पर्दे पर फ़िल्म दिखाना न हो सका तो लैपटॉप पर ही फ़िल्म *धरती के लाल* का प्रदर्शन हुआ। हम गौर किया कि विशेषकर बच्चे अंत तक पूरी फ़िल्म देखने को जुटे रहे।
इप्टा, प्रलेसं और महिला फेडरेशन के हमारे दल को हर जगह आदर और सम्मान के साथ बहुत अच्छे दर्शक, श्रोता मिले। दल में शामिल युवा साथियों का जोश बहुत ऊँचा रहा।
कार्यक्रम में लतिका पात्र, संगीता मानकी, नेहा, कार्तिक चौधरी, भूमि, वसुधा, राजशेखर, रूपाली बारीक, अनुज, अभिजीत, मानसी, मनीष, मनोहर, दीपक, लखिन्दर प्रधान, सुजन सरकार, गणेश मुर्मू, सोनाली शर्मा, नवमी, स्नेहज, ज्योति और शेखर मल्लिक आदि ने सक्रिय भागीदारी की। कार्यक्रम की तस्वीरें संलग्न हैं।
रिपोर्ट: ज्योति मल्लिक
कॉम गणेश मुर्मू, कार्तिक, ज्योति मल्लिक और शेखर मल्लिक जनता से संवाद करते रहे। कविताओं के अर्थ और उनके बीच आने का प्रयोजन गणेश मुर्मू उन्हीं की जनभाषा, संथाली में समझाते, कार्तिक और ज्योति बंगला में, जब शेखर हिंदी में बताते। इस तरह , खासकर महिलाओं के बीच दल के गीतों और मौजूदगी का प्रभाव पड़ता दिख रहा था। वे ही खासी उत्सुक दिखे। दिनभर चले इस मुहिम में किसानों, मज़दूरों के लियेे गीत और अदम गोंडवी, राजेश जोशी, पाश और गोरख पांडेय के गीत व कविताओं का पाठ भी हुआ। "गांव छोड़ब नहीं", "चले चलो, दिलों के घाव लेके भी चले चलो","हाल चलाकर खेतों को मैंने ही सजाया रे","समय का पहिया" गीतों की प्रस्तुति हुई। इप्टा के साथी चित्रकार, संगीतकार, कवि-गीतकार और नृतक कार्तिक ने मुक्तिबोध की कविता का पोस्टर तांबे के खदान के बेल्ट, दक्षिण सुरदा, सुदूरवर्ती गाँव के चौक पर मज़दूरों, महिलाओं, बच्चों के बीच ऑन स्पॉट बनाया। साथी संगीता मानकी ने पाश की, लतिका ने राजेश जोशी की, शेखर ने अदम गोंडवी और गोरख पांडेय की और रुपाली बारीक ने भी गोरख की कविताओं का पाठ किया। इंसानी मुहब्बत, सौहार्द, भाईचारे, अभिव्यक्ति और असहमति के अधिकार के लिए, नफ़रत के ख़िलाफ़ सभी कलाकारों की सामूहिकता और एकजुटता ने एक मिसाल कायम की। शाम को जब प्रॉजेक्टर तकनीकी गड़बड़ी से बड़े पर्दे पर फ़िल्म दिखाना न हो सका तो लैपटॉप पर ही फ़िल्म *धरती के लाल* का प्रदर्शन हुआ। हम गौर किया कि विशेषकर बच्चे अंत तक पूरी फ़िल्म देखने को जुटे रहे।
इप्टा, प्रलेसं और महिला फेडरेशन के हमारे दल को हर जगह आदर और सम्मान के साथ बहुत अच्छे दर्शक, श्रोता मिले। दल में शामिल युवा साथियों का जोश बहुत ऊँचा रहा।
कार्यक्रम में लतिका पात्र, संगीता मानकी, नेहा, कार्तिक चौधरी, भूमि, वसुधा, राजशेखर, रूपाली बारीक, अनुज, अभिजीत, मानसी, मनीष, मनोहर, दीपक, लखिन्दर प्रधान, सुजन सरकार, गणेश मुर्मू, सोनाली शर्मा, नवमी, स्नेहज, ज्योति और शेखर मल्लिक आदि ने सक्रिय भागीदारी की। कार्यक्रम की तस्वीरें संलग्न हैं।
रिपोर्ट: ज्योति मल्लिक
मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019
युद्धोन्माद के ख़िलाफ़ अमन की संस्कृति बनाएगी इप्टा
इप्टा की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक की रिपोर्ट
भोपाल। 17 फरवरी, 2019.
भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) की राष्ट्रीय समिति की बैठक 16 और 17 फरवरी, 2019 को भोपाल में गाँधी भवन में सम्पन्न हुई। बैठक में पुलवामा में हुए आतंकी हमले की भर्त्सना करते हुए हमले में शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी गई। बैठक में शामिल सदस्यों ने दुःख की इस घड़ी में शहीदों एवं घायल सैनिकों के परिवारो के साथ एकजुटता व्यक्त की तथा घायल सैनिकों के शीघ्र स्वस्थ होने की शुभकामनाएँ दीं और देश में अमन का माहौल कायम करने के प्रयास का संकल्प लिया गया।
इस मौक़े पर 17 फरवरी को बैठक के अंत मे इप्टा के राष्ट्रीय सचिव और अर्थशास्त्री मनीष श्रीवास्तव (दिल्ली) और प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी (इंदौर) ने कश्मीर हिंसा और उसके बाद देश में बन रहे हालात पर प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिसका इप्टा की राष्ट्रीय कार्यसमिति और प्रगतिशील लेखक संघ के मौजूद सदस्यों ने पूर्ण समर्थन किया। प्रस्ताव के अनुसार इप्टा तथा प्रलेस का स्पष्ट मत है कि इस हमले की साजिश न सिर्फ़ राष्ट्रीय सुरक्षा,एकता और अखंडता को खतरे मे डालने के लिए थी बल्कि इससे देश के शान्ति और सद्भाव के ताने-बाने को भी चोट पहुँचाने का प्रयास किया गया है। प्रस्ताव में यह दुःख भी व्यक्त किया गया है कि संकट के इस समय कुछ देशविरोधी, फ़िरकापरस्त एवं युद्धोन्मादी तत्व देश के विभिन्न हिस्सों मे रह रहे कश्मीरियों को निशाना बना कर एक तरह से आतंकवादी मन्सूबों को मदद पहुँचा रहे हैं।
प्रस्ताव में कहा गया है कि दुःख और संकट के समय हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश के बहादुर सिपाही न केवल देश की सीमाओं की सुरक्षा में बल्कि देश में शान्ति और सद्भाव की रक्षा में भी अपनी जान की बाजी लगाते हैं। इस शान्ति और सद्भाव को कायम रख कर ही शहीदो का सच्चा सम्मान किया जा सकता है। प्रस्ताव में स्पष्ट संकेत किया गया है कि कश्मीर हमले के बाद देश और विदेश की कॉर्पोरेट आर्म्स लॉबी द्वारा युद्ध को भड़काने तथा संघ गिरोह द्वारा इसके राजनीतिक इस्तेमाल की कोशिशें की जा रही हैं। एक समुदाय विशेष को निशाना बनाया जा रहा है जो निन्दनीय एवं दुर्भाग्यपूर्ण है। यह नहीं भूलना चाहिए कि युध्द ने हमेशा मानवता का नुकसान ही किया है। युद्ध ने लाखों निर्दोष लोगों की जाने लीं हैं और लाखों को जीवन भर के लिए अपंग बना दिया। युध्द समस्या का समाधान नहीं है बल्कि युद्ध खुद एक समस्या है। केन्द्र व राज्य सरकारों का यह दायित्व है कि वे शान्ति और सद्भाव बिगाड़ने की हर साज़िश को नाकाम करें तथा अल्पसन्ख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। प्रस्ताव में भारत और पाकिस्तान, दोनों ही देशों के नागरिकों से अपील की गयी है कि हमें उन्माद से बचने का हर सम्भव प्रयास करना होगा।
इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश और प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी ने अपने सन्देश में कहा कि किश्वर नाहीद, फरीदा ख़ानम, मंटो, हबीब जालिब, कैफ़ी आज़मी, फैज़ अहमद फैज़, उस्ताद बिस्मिल्ला खान, मेहदी हसन, ग़ुलाम अली, बेगम अख़्तर, नूरजहाँ, मोहम्मद रफ़ी, नौशाद, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, खान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान और भी न जाने कितने कलाकार और विद्वान जितने भारत के हैं उतने ही पाकिस्तान के और जितने पाकिस्तान के हैं, उतने ही हिंदुस्तान के। हमें अपनी साझा संस्कृति को इंसानियत और अमन की संस्कृति बनाने के लिए इस्तेमाल करना चाहिए।
बैठक में इप्टा को विस्तार देने और मजबूती देने के लिए देश के चार हिस्सों में चार क्षेत्रीय सम्मलेन किए जाने का फैसला लिया गया। दक्षिणी राज्यों का सम्मेलन केरल में होगा, हिन्दी भाषी राज्यों का सम्मेलन छत्तीसगढ़ में किया जायेगा जिसमें महाराष्ट्र और गुजरात भी शामिल होंगे। पश्चिम बंगाल और उत्तर-पूर्वी राज्यों का सम्मेलन गोवाहाटी या कोलकाता में एवं चौथा सम्मेलन पंजाब, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और हरियाणा को जोड़कर जम्मू में होना प्रस्तावित है।देश में खेती के विकराल संकट और ग्रामीण भारत की समस्याओं को केंद्र में रखकर इप्टा की एक सप्ताह की राष्ट्रीय कार्यशाला दिल्ली में किया जाना तय हुआ। जिसका संयोजन जया मेहता, विनीत तिवारी, मनीष श्रीवास्तव और नूर जहीर करेंगे और जिसमें देश के हर राज्य से गीतकार, लेखक और नाटककार शरीक होंगे। बैठक में ये भी तय किया गया कि इप्टा के पूर्व अध्यक्ष रहे सुविख्यात शायर कैफ़ी आज़मी, उर्दू की प्रसिद्द कथाकार रज़िया सज़्ज़ाद ज़हीर, वरिष्ठ नाट्य आलोचक, रंगकर्मी और इप्टा के प्रारम्भिक दिनों के साथी नेमीचंद जैन तथा इप्टा से गहरे जुड़े रहे महत्त्वपूर्ण इतिहासकार प्रोफेसर रामशरण शर्मा के जन्मशताब्दी वर्ष को देश के विभिन्न प्रमुख केंद्रों में मनाया जाएगा। इसी क्रम में लखनऊ में एक राष्ट्रीय सम्मेलन साझी संस्कृति, साझी शहादत और साझी विरासत आयोजित किया जायेगा। "नफरत के खिलाफ एकजुट कलाकार" के जरिये 2 व 3 मार्च 2019 को कलाकारों के देशव्यापी प्रदर्शन में इप्टा भी अपनी भरसक भागीदारी दर्ज करवाएगी। बैठक में शामिल हुए इप्टा के प्रशंसक और शुभचिंतक तथा केरल से राजयसभा संसद बिनॉय विस्वम ने कहा कि देश में मौजूदा राजनीतिक - सामाजिक माहौल देखते हुए देश को सम्प्रदायवादी फासीवाद से बचाने की लड़ाई में इप्टा की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। नए नाटक, नई तकनीक के साथ जनता तक पहुँचने वाले कलारूपों को अपनाकर सही विचार को जनता के बीच ले जाने का काम इप्टा जो जल्द से जल्द करना होगा। टी वी बालन ने बताया कि केरल इप्टा के एक एकपात्रीय नाटक "शवयात्रा" के पिछले कुछ वर्ष में 1000 से अधिक मंचन हो चुके हैं।
बैठक में उपस्थित सभी सदस्यों ने इप्टा की राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य और प्रलेस के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी तथा दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर नंदिनी सुन्दर, जेएनयू की प्रोफ़ेसर अर्चना प्रसाद, माकपा छत्तीसगढ़ के सचिव संजय पराते, भारतीय महिला फेडरेशन की नेत्री और गुफड़ी गाँव की सरपंच मंजू कवासी और नामा गाँव के निवासी मंगलाराम कर्मा को हत्या तथा यूएपीए के झूठे आरोपों से मुक्त होने और एसआईटी की जांच में निर्दोष पाए जाने पर बधाई दी और वंचितों के की आवाज़ उठाने की खातिर जेलों में डाले गए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, कवी, लेखक, कलाकारों को क़ैद किये जाने के खिलाफ रोष प्रकट किया । इप्टा की 75वीं सालगिरह के समापन के पटना में आयोजित भव्य कार्यक्रम हेतु राष्ट्रीय कार्यसमिति ने बिहार इप्टा, श्री तनवीर अख्तर, फ़िरोज़ अशरफ खान, और उनके सभी साथियों की तारीफ की।
यह साल रज़िया सज्जाद ज़हीर का जन्म शताब्दी वर्ष है जिसे देश भर की इप्टा एवं प्रलेस की इकाईयों में मनाया जा रहा है। 16 फरवरी की शाम को इसी कड़ी में भोपाल की प्रलेस एवं इप्टा इकाई की सहभागिता में रज़िया सज़्ज़ाद ज़हीर की रचनाओं और संस्मरणों को याद करते हुए उनकी लिखी दो कहानियों "दोशाला" एवं "यस सर" का प्रभावी नाट्य मंचन किया गया, जिसका निर्देशन दिनेश नायर ने किया। तत्पश्चात राकेश ने 1953 में ईदगाह नाटक पर लगे मुकदमे का प्रसंग सुनाया जिसका नाट्य रूपांतरण रज़िया सज़्ज़ाद ज़हीर एवं निर्देशन अमृतलाल नागर ने किया और विनीत तिवारी ने रज़िया सज़्ज़ाद ज़हीर के लेखन को जीवन के मामूली किरदारों के भीतर छिपे गैर मामूली गुणों को उद्घाटित करने वाला ईमानदार और धड़कं भरा गद्य बताया। राकेश ने "नमक" और विनीत ने "सुतून" कहानी की चर्चा की। नूर ज़हीर ने उनके संस्मरणों पर लिखी किताब "स्याही की एक बूँद" से सज़्ज़ाद ज़हीर, मज़ाज़ लखनवी और अमृता प्रीतम से जुड़े ऐसे मार्मिक संस्मरण सुनाये कि लोगों की आँखें भीग गयीं।
17 फरवरी की शाम मुंबई इप्टा के सचिव और टी व्ही-फिल्म अभिनेता मसूद अख्तर ने एम एस सथ्यु के जीवन पर केंद्रित तथा इप्टा के विभिन्न आयाम और पहलुओं को उजागर करते एक घंटे की अवधि के अपने बनाये वृत्तचित्र "कहाँ-कहाँ से गुजरा" का प्रदर्शन किया। इस वृत्तचित्र में एम एस सथ्यू की बनाई हुई फिल्मों "गरम हवा", "कहाँ-कहाँ से गुजर गए", "सूखा" आदि के अंश तथा मृणाल सेन, श्याम बेनेगल, ए के हंगल, हबीब तनवीर आदि सथ्यू के समकालीनों के संस्मरण बहुत रोचक अंदाज में प्रस्तुत किये गए।
उक्त बैठक में वरिष्ठ रंगकर्मी और अभिनेता तथा इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री रनबीर सिंह (जयपुर), वरिष्ठ रंगकर्मी श्री तनवीर अख्तर, फ़िरोज़ अशरफ ख़ान (पटना), टी.वी. बालन (कालीकट), के एल लक्ष्मीनारायणा (तेलंगाना), एस के गनी, जैकब (आंध्र प्रदेश), संतोष डे (उत्तर प्रदेश), बालचंद्रन (अलप्पुड़ा), अमिताभ चक्रवर्ती (कोलकाता), मसूद अख्तर (मुंबई), वरिष्ठ कवि श्री राजेश जोशी (भोपाल), लेखिका - रंगकर्मी और इप्टा की राष्ट्रीय सचिव नूर ज़हीर (दिल्ली), वेदा राकेश (लखनऊ), हिमांशु राय, वसंत काशीकर (जबलपुर), वरिष्ठ कवि कुमार अम्बुज (भोपाल), वरिष्ठ रंगकर्मी निसार अली , उषा आठले, अजय आठले, राजेश श्रीवास्तव, मृणमय चक्रवर्ती, (छत्तीसगढ़), अनिल रंजन भौमिक (इलाहाबाद), संजय गुप्ता (जम्मू), वरिष्ठ रंगकर्मी, कवि और इप्टा मध्य प्रदेश के अध्यक्ष हरिओम राजोरिया एवं सीमा (अशोकनगर), शिवेंद्र शुक्ला (छतरपुर), सारिका श्रीवास्तव (इंदौर), योगेश दीवान (होशंगाबाद), राकेश दीवान (भोपाल), शैलेन्द्र शैली, दिनेश नायर, अनिल करमेले, ईश्वर सिंह दोस्त, आरती, रविंद्र स्वप्निल, सचिन श्रीवास्तव, सत्यम पाण्डे, संदीप कुमार, पूजा सिंह, दीपक विद्रोही, श्रद्धा श्रीवास्तव, प्रेम गुप्ता, अनुलेख त्रिवेदी, हर्ष अग्रवाल, विकास शर्मा, अम्बुज ठाकुर, पवित्र नसकर, अभिषेक ठाकुर (भोपाल) एवं अन्य अनेक कवि, कहानीकार, नाटकककार, रंगकर्मी मौजूद थे।
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संलग्न : बैठक, नाटक और रज़िया सज्जाद ज़हीर स्मरण के।
रिपोर्ट प्रस्तुति - विनीत तिवारी एवं सारिका श्रीवास्तव
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