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मंगलवार, 20 जुलाई 2010

लघुतर लिंग वाली जिन्दगियाँ...

उन दिनों जब
उनके लिए
बाकी और दिनों की तरह ही
नींद के बाहर गुलाब थे
सपनों के भीतर नश्तर !
सलीके से कुछ भी नहीं था
सिवाए लड़ने की मनोदशा के...
लेकिन ऐसा कुछ सोचते ही विरोध की हवा
बदबू मारने लगती थी
बाहर वाले दरवाजों पर सांकलें चढ़ा दी जाती थीं
और किन्हीं पुरानी किताबों से निकले हुए नियम
संस्कारों के चाबुक पर लागू किये
जाते थे...
फिर भी ऐसा होना था कि
लघुतर लिंग बताई गयीं जिन्दगियाँ

जहाँ एक तरफ
स्वेटर बुन कर दोपहर बिताया करती थीं, या
बच्चों की सुडकती नाक पोंछ रही थीं, या
चहबच्चे मे पानी भर रहीं थीं... या ऐसे ही कई
सनातन घरेलू काम-काजों में उलझाकर
रखने की साजिश की शिकार थीं

लेकिन दूसरी तरफ...
वायुयान उड़ा रही थीं,
पहाड़ों पर चढ रही थीं,
पदक जीत रही थीं...
सड़कों पर नुक्कड़ नाटक खेल रहीं थीं
किताबें लिख रहीं थीं...
और-और-और... और भी बहुत जगह
बिल्कुल उसी एक ही समय के समांतर
वह, लघुतर लिंग बताई गयीं जिन्दगियाँ,
व्यवस्था के पायों में बंधी हुई भी थीं
और घोषित ताकतवर विपरीत लिंग वालों से
दो कदम आगे भी थीं...!

लड़ाकू बनाना और
उपलब्धियां गिनाना
एक जरूरत की मानिंद, वक्त और
तारीखों का काम होता है, वक्त जरूरत पैदा
करता रहेगा...
तारीखें गवाही देती रहती हैं, देती रहेंगी...
लघुतर लिंग बताई गयीं जिन्दगियाँ...
हरदम अब, दो कदम आगे रहने
के लिए कदम बढ़ाती रहेंगी...

क्योंकि, उनके लिए
नींद के बाहर हमेशा गुलाब रहेंगे
और सपनों में कांटे-खलिश-नश्तर...

१९-२०/०७/२०१०.

1 टिप्पणी:

  1. बहुत खूब शेखर भाई. गुलाब और कांटे का प्रतीक अपने आप में काफी कुछ कह देता है.

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