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रविवार, 11 जुलाई 2010

युवा वर्ग के कलमनवीशों से एक आग्रह...

रचनाकर्म एक गंभीर और शालीन कर्तव्य है, इसे आप सब भी जानते-मानते होंगे. ख़ामोशी से रचते जाना भी एक कला है... दोस्तों, साहित्य अकादमी से पुरस्कृत नीलाक्षी सिंह का उदाहरण सामने रखूंगा. लगातार, कम मगर, बेहतरीन लिखने के बाबजूद वह कभी किसी भी मंच पर मुखर होती नहीं दिखाई देतीं. वे भी युवा हैं, गजब की प्रतिभाशाली. अब तो आज के युवाओं से थोड़ी सीनियर ही कहूँगा.
अपने बैंक की नौकरी के सिलसिले में जब वह जमशेदपुर में थीं, तब भी किसी कार्यक्रम में नहीं आती थीं. ना तो हमारी प्रलेसं की कथा गोष्ठियों में, ना तो संगमन -१२ में ही आयीं. लगभग गुम... (उन्हें अंतर्मुखी या भीरु तो कतई नहीं कह सकते. पुरुषवादी व्यवस्था के विरुद्ध उनकी कहानियाँ इसका प्रमाण हैं) फिर कथादेश के नवलेखन अंक में (शायद) स्त्री-पुरुष सम्बन्ध पर एक अविस्मरणीय कहानी लेकर उपस्थित हुईं.
उनकी बड़ी बहन शीताक्षी सिंह भी बहुत काबिल लेखिका रहीं, मगर अब पता नहीं क्यों नहीं लिखतीं. मुझे सचमुछ खेद है कि, मैं नहीं जानता इनके बारे में.
तो कहने का मतलब ये हुआ की, बडबोलापन और हर जगह, चीखना-चिल्लाना, बहस या विवाद में बने रहना, लेखक और लेखन के लिए कतई गैर-जरूरी चीज है. युवा मित्रों, इसी संदर्भ में महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर से भी सीखिए...
आपकी कला बोलेगी, उसी को समर्थ करने के लिए श्रम करिये.

2 टिप्‍पणियां:

  1. यानि एक लेखक को हर तरफ़ से मुंह चुरा कर, बिना किसी सामाजिक सक्रियता के बस कलम घसीटनी चाहिये? प्रलेस का भी स्टैण्ड यही है क्या?

    जो इतना संवेदनशील हो वह समाज के भीतर की समस्याओं पर मुखर कैसे नहीं होगा? आप प्रलेसं से संबद्धता से अपना परिचय शुरु करते हैं और फिर वाद और धारा से मुक्ति की बात करते हैं! आप की पालिटिक्स क्या है पार्टनर?

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