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शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

शब्दों के जाले


इस रात... 
बड़े श्रम से
आहत मन की सारी प्रतिबद्धताओं
के दम पर
शब्दों के जाले बुनने फिर बैठा हूँ...

या कि इनका कोई अर्थ
कलेजे में चीरा लगाकर...
सीने के ऐन बीचों-बीच...
कुछ फोड कर बाहर निकल आया है,
जिसे शब्दों की शक्ल में 
अपने ही माँस और रक्त से छाँट कर
पेश कर रहा हूँ...!

इन शब्दों की धार से खेलते हुए
कई बार मेरी उँगलियों की जगह 
गर्दन कटी है...
और इनके तात्पर्य ढूंढते हुए
सारे आदिम जंगल छान मारे हैं !
तब एक जगह पाया...
अपनी असलियत ढेले की तरह पड़ी थी, 
...उठाई है !

फिर भी मैं कोई पागल हूँ कि 
सुकरात का ज़हर खुद भी चखना चाहता हूँ...
सफदर की तरह आखरी दम पे  
अपनी ईमान पर निसार होना चाहता हूँ...
पाश की तरह "घास" बन जाना चाहता हूँ और,
बागियों में भगत या बिरसा होना चाहता हूँ... 

शब्दों की आंच पर तमाम कच्चे अर्थों के 
उपले-कंडे सेंकते हुए...
मैं देख रहा हूँ कि 
बाज़ार मेरी नाक तोड़ रहा है
सत्ता मुझे झाड़-जंगलों में शिकारी कुत्ते की तरह
खोज-खोज कर,
गोली मार रही है...
मेरी जमीन का पानी वे लोग 
अपनी शीतल-पेय पैदा करने वाली फैक्ट्री में खपा रहे हैं
मेरी मिट्टी पर...
मेरे घर की औरतों के बदन पर की तरह 
उनके पंजों और खुरों के बजाफ्ता निशान हैं...!
मेरे नाम पर बनी सारी योजनाओं को
मेरे बहुत सारे अवैध विधाता चर रहे हैं...

उफ्फ़, बहुत हो चुका ! कहते हुए,
उठकर बाहर भागा हूँ 
एकाएक,
कमरे में असंख्य 
चीत्कार-चीखें
एक मातमी धुन की तरह फ़ैल गई थीं...

इस समय जो मृत्युबोध
सन्नाटे का फायदा उठाकर
मेरे-तुम्हारे जीवन में
चोरी से पैवस्त हो गया है,
उसे दबोच लेना है, 
कि वह एक गलत बात है...

तो इस समय...
इतना मौन क्यों है मेरा संसार ?
पूछने का यह समय, 
बिल्कुल ठीक समय है !

एक सहज किलकारी की तरह 
पूर्व में सूर्योदय कल होगा ही,
यही सोचकर बैठने से अच्छा है, हम पूरब की दिशा में 
इस रात से ही चलना शुरू कर दें...

शब्दों के जाले,
इस वक्त के चेहरे पर लिपटे
फ़रेब के जाले काट देंगे... 
हाँ, शब्दों को सान पर चढ़ा रहा हूँ,
कमान पर चढ़ा रहा हूँ...

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

दिल दुखता है बहुत...


ना दिलाओ याद...
ना कोई जिरह करो
बाबस्ता फिर उसी अफसाना-ऐ-उल्फत की
कि दिल दुखता है बहुत...
चाक हुआ जाता है !

बेरहम हुए वो जो
रहनुमा होंगे, जाना था कभी
अश्क अपने ही बहे,
खुद ही खाई जब शिकश्त...

कोई अपना बनते-बनते रह गया, या
ये बस अपनी आँखों का भरमाना था !
सारी हसरतों का सिला
एक मलाल रह गया यही...
हासिल होता जो चाहा था,
बस एक फैसले का
सूत भर फासला रह गया कहीं !

आज हम वही, रहगुजरों के
साये वही... ना कोई सदा, ना उम्मीद
ना इस दिल-ऐ-बेनूर के वफ़ा
का कोई मुरीद !
इस जाँ को तन्हा होना था, हो गया...

कौन होता है अपने जानिब
कौन जीता है, तेरी रूह में !
हम खुद ही जिए,
खुद ही मरे...
खुद ही डुबोई किश्ती
खुद ही तिरे...
खुद से खुद ही रहे हम
कौन क्या दिया, क्या ले गया !
किसने क्या बनाया हमको,
कौन हमें बिगाड़ गया !

फिर भी एक इल्तिजा है
ना कभी मेरी माज़ी की पूछना
यह जो वस्ल और हिज़्र की
रवायतें है, इनमें एक किताब
है ये शिकश्ताज़दा जिंदगी...
हर पन्ने पर कतरा-ऐ-खूँ है,
हर हर्फ़ पर ज़ख्म-ओ-नासूर मौजूँ है !
किसी सिरे को पकड़ कोई सवाल ना करना...
कि फिर दिल दुखेगा
फिर चाक हो जायेगा...!

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

विभूति भूषण बंदोपाध्याय का "गौरीकुंज"

बंगला भाषा के सुविख्यात साहित्यकार विभूति भूषण बंदोपाध्याय के दाहिगोडा, घाटशिला, झारखण्ड स्थित निवास "गौरीकुंज" का जीर्णोद्धार के बाद काया-कल्प हो गया है. मेरे इस विडियो - "बंगला लेखक विभूति भूषण बंदोपाध्याय का घर"  में इसके केयर टेकर ८८ वर्षीय अपूर बाबा के साथ "गौरीकुंज" में भ्रमण के लिए आपका स्वागत है !

शनिवार, 15 जनवरी 2011

वह अठारह-उन्नीस की युवती माँ ! - (डायरी जैसी कविता)

बहुधा ऐसा होता रहा था कि
एकदम वही या उस जैसा ही कोई दृश्य
अक्सर कई अलग अलग तरह से, अलग अलग कोणों से...
अलग-अलग जगहों पर, अपने जेहन के कैनवास पर उतरता
और फिर आदतन या लापरवाही से कुछ ही मिनटों या
उसके एकाध दिन बाद
खुद-ब-खुद पोंछ डाला जाता था...
ऐसा होना इसलिए था, कि हम सबकी मशरूफियत
दुसरे किसी से ज्यादा, सिर्फ़ अपने लिए थी...
हम सभ्य होकर भी नकारे और बेहया थे...!

तो वही दृश्य एक बार फिर उस दोपहर
सामने था... वह अठारह-उन्नीस की युवती माँ !
गरीबी रेखा से नीचे बसर करती होगी वह...
और होगी अंदर से बेहद ताकतवर, पर चुप थी...
कुछ बोलती भी, तो क्यों और किसे !

छाती से चिपकाये हुए थी अपने नवजात से कुछ बड़े, शायद...
दो-तीन माह के शिशु को... जो लगा, शायद बच्ची रही होगी...

ट्रेन के चल पड़ने तक गेट के पास किसी तरह सहारा लिए खड़ा मैं
उसे ही देख रहा था, कि उसने एक नज़र में ही मेरा ध्यान खींच लिया था
और मैं अपने बुद्धिजीवी होने की गैरत के साथ, उसके बारे में
यह सब सोचना शुरू कर चुका था, जो अभी आपके सामने है !...

ठीक उसके पास खड़ा मैं... और वह गेट के पास निश्चिन्त बैठी हुई !

गोद का बच्चा जोर से रोया, तब वह बिल्कुल अकुंठ भाव से,
एकदम निर्द्वंद... बेपरवाह उस भीड़ और शोरगुल के बीच,
जिसके दायरे में वह बैठी थी... अपना स्तन
उस अबोध के मुँह में
ठूँस दी !
(बिना इस बात कि परवाह किये कि उसका अर्ध-विकसित
या कुपोषित स्तन सर्व-समक्ष हो रहा है!)

उसका वह बच्चा जितनी बार रोता,
वह अमूमन यही दोहराती !
बीच-बीच में उसे पुचकारती, चूमती...
और फिर, इधर-उधर की रेलमपेल देखने लगती...
वह मानों खुद उस दृश्य का हिस्सा नहीं थी...!

जब किसी स्टेशन पर ट्रेन रूकती
लोग उसे लगभग कुचलते हुए ही चढ़े आते ! कोई बोलता,
गेट के पास बैठी हो तो बर्दाश्त करना पड़ेगा...!
हाशिए के बाहर हो गए आदमी को भी
"बर्दाश्त" करना पड़ता है !... उसकी जगह कहीं नहीं होती...!

फिर मैं सोचता हूँ, वह क्या कुछ नहीं बर्दाश्त कर चुकी...
और करती होगी !
मेरा यह सब सोचना बहरहाल, सोचना ही है, इसके अलावा कुछ नहीं !

मामूली फटी और पुरानी सी साड़ी में सकुचाया-सिकुड़ा शरीर उसका,
एक बोसीदा सी गंध छोड़ता...
और रूखे-धूसरित बाल,
नाक के पास दाहिनी तरफ, थोड़ा माध्यम आकर का कला मस्सा,
निर्दोष लगती आँखें...
कुल जमा यही हुलिया बनता था उसका... इसमें नया या अलग कुछ नहीं था...

(हमारी आँखें क्या इसके लिए अभ्यस्त नहीं हो चुकी हैं !
और चूक गई है हमारी संवेदनाएं... क्योंकि हमारी हदें हमारी चौहद्दी हैं !
जिसके बाहर हम झांकते नहीं, और झाँक गए तो कुढते रहते हैं...)

और उसका शिशु एकाएक चुप होकर, भौंचक्का... इस दुनिया को ताकता...

किसी ने बिस्कुट के दो टुकड़े उसकी ओर बढ़ाये, वह मुस्कुराकर ले ली...
मैंने सोचा, होगा उसका ही संबंधी, मगर ऐसा नहीं था ! तो, क्या
उस आदमी की यह सहानुभूति सिर्फ़ बेदाग सहानुभूति थी, या...?
(होगी भी यदि स्वच्छ भावना, हमारे मध्यवर्गीय मानस पर तो उसके पीछे भी
प्रश्नवाचक ही लगाती है !)

ठीक इसी समय, जब कोई स्टेशन आने वाला था...
अठारह-उन्नीस साल की, उसी की लगभग हमउम्र...
दो-तीन लड़कियाँ गेट के पास आ खड़ी हुईं, उन्हें उतरना था

वह भी उठी, उतरना उसे भी यहीं था...

वह लड़कियाँ बतियातीं, मुस्कुरातीं,
कॉलेज जाने वाली या सम्भवत: किसी प्रशिक्षण केंद्र से लौटतीं
आधुनिक... और सभ्य समाज में संभ्रांत कही जाने वालीं
उस की तरफ बिल्कुल ध्यान नहीं दे रहीं थीं, जो बिल्कुल उन्हीं की तरह है !
समलिंगी, उतनी ही कद-काठी, वही उम्र...

और वह प्राय: उन लड़कियों के
ठीक पास खड़ी, मानो उन्हीं में से एक हो,
उनका चेहरा तकती और गोद में सिमटे शिशु को. जिसे...
एक कपडे से कसकर अच्छी तरह अपनी छाती से बांध लिया था,
पुचकार कर चूम रही थी... क्या वह कुछ जता रही थी उन्हें ?
पता नहीं, ये कैसे तय होता होगा, कि दृश्यों का शाब्दिक अर्थ कौन
लगा सकता होगा, ठीक-ठीक !

एक ही उम्र के दो चेहरे...दो नियतियाँ...दो अलग जिंदगियाँ...
और बीच में मौन ! और ट्रेन की धडधडाहट...

कौन किधर जाने वाला था... यह मैं कुछ देर सोचता रहा, फिर भूल गया...
जबकि वे सब और वह उसी स्टेशन पर उतर गयीं...

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

शमशेर बहादुर सिंह की रचनाएँ - ३ (चुका भी हूँ मैं नहीं !)



चुका भी हूँ मैं नहीं !
कहाँ किया मैंने प्रेम
अभी !
जब करूँगा प्रेम
पिघल उठेंगे
युगों के भूधर
उफान उठेंगे
सात सागर !
किन्तु मैं हूँ मौन आज
कहाँ सजे मैंने साज
अभी !
सरल से भी गूढ़-गूढ़तर
तत्व निकलेंगे
अमित विषमय
जब मथेगा प्रेम सागर
ह्रदय !
निकटतम सबकी
अपर शोर्यों की
तुमतब बनोगी एक
गहन मायामय
प्राप्त सुख
तुम बनोगी जब
प्राप्य जय !
(रचनाकाल - 1941)

बुधवार, 12 जनवरी 2011

शमशेर की रचनाएँ... - २

दिल, मेरी कायनात अकेली है - और मैं !
बस अब खुदा की जात अकेली है, और मैं !

तुम झूठ और सपने का रंगीन फर्क थे :
तुम क्या, ये एक बात अकेली है, और मैं !

सब पार उतर गए हैं, अकेला किनारा है :
लहरें अकेली रात अकेली है, और मैं !

तुम हो भी, और नहीं भी हो -- इतने हसीं ह:
यह कितनी प्यारी रात अकेली है, और मैं !

मेरी तमाम रात का सर्माया एक शमअ
खामोश, बेसबात, अकेली है, और मैं !

'शमशेर' किस को ढूँढ रहे हो हयात में
बेजान-सी इयात अकेली है, और मैं !

("आजकल" पत्रिका के जनवरी २०११ अंक के तीसरे आवरण पर)

शमशेर की रचनाएँ... - १

मेरे मन के राग नए नए,
तुझे गीत में जो बुला गए,
वो न जाने किसके गले लगे
वो न जाने किसको सुहा गए !

मुझे कितना कितना दुख गई,
मेरे दिल को छलनी बना गई -
वही टीस सी, वही आह सी
जिसे हम जरा सा दबा गए !

हमें 'शम्स' पर बड़ा नाज़ था,
उन्हें हम समझते थे पारसा,
मगर आखिर-आखिरे-इम्तहां
वही अपना रंग दिखा गए !

रविवार, 9 जनवरी 2011

असल में ऐसा था...

खिड़की से बाहर...
सायरन की तरह बजती घंटियों की तरह
टन-टन-टन... एक बार फिर,
किसी आपातकाल की घोषणा करते, बौखलाए हुए
अंधड़ की तरह कुछ घटित हो रहा था...

भूख, बीमारी, विश्वासघात से बिलबिलाया और
अपने जमीन-जंगल-पानी से खदेड़ा गया
आदमी
विरोध के नारे लिखी तख्तियाँ
हाथों में उठाये... जबरदस्त उछाह और
उसके पीछे उसी नस काटती तकलीफ को दबाए...
नारों को लहराते हुए अचानक...
मेरी ओर देखता बोलने लगा...

"सुनो दादा, आप भी लड़ाई में हो, साथ दो..."
(वरना कल तुम भी मारे जाओगे, यह वह नहीं कहता था
मगर उसकी आवाज़ की प्रतिध्वनि में मुझे यही सुनाई दे रहा था...)

और मैं पसीने से भीगा
अपनी मेज़ पर कागज-कलम लेकर बैठ जाता...समाधिस्थ !
विरोध करने का मेरा
यह अपना तरीका था,
ख़ामोशी से चिल्लाने का अचूक नुस्खा था !

मुझमें रक्तपात, धूप, लाठीचार्ज सहने
और आमना-सामना करते हुए बन्दीगृह जाने की कूबत नहीं थी !
मैं विरोध में सिर्फ़ 'चिन्तन' और 'शब्द-वमन' किया करता था...

मगर अपनी ज़मीन से उखड़ा...
बेइज्जत और भूखा... दिन-दहाड़े लोकतंत्र में, संविधान के आलोक में
लूटा गया आम आदमी, हार नहीं मान सकता था...
किसी भी मोर्चे पर,
वरना हार मान लेने पर वह शर्तिया समाप्त हो जाता
तमाम लाल-फीते से दम घोंटी गई फाइलों की तरह...

उसे मेरी विद्वता पर... मेरे पौरुष (!) पर
जबरदस्त भरोसा था...
कि मैं,
अब-अब-अब... उठूँगा, चीखूँगा...
मुट्ठियाँ बाँध कर भुजाएँ लहराऊँगा...
मानवता के साथ कामुक सत्ता जो बलात्कार कर रही है,
उसे रोकने के लिए 'टॉर्च' की रौशनी
अँधेरे में फेंकूँगा !...

मगर मैं संकोच और सुविधाओं से क्रमश:
पस्त था,
मस्त था...
और इसी तरह एक दिन
अस्त होने वाला था !

लोग सड़कों, चौराहों, गलियों में...
राजपथ पर... राजभवन के सामने...
जुलूस निकाल रहे थे
धरना दे रहे थे...
आँसू गैस-लाठी-गोली झेल रहे थे...मर रहे थे...
मैं उस समय समाचार पढ़ या देख रहा था...
कोई परिचित और 'पढ़ने-लिखने' वाला मिल जाये
तो उससे इन सब मसलों पर 'चर्चा' कर रहा था
और वापस घर आकर अपने दंतमंजन, अपनी थाली, अपनी रजाई...
आदि का बजाफ्ता इस्तेमाल कर रहा था !

और मैं पढ़ता ही जा रहा था,
गोर्की - "मदर", प्रेमचंद-'जुलूस'...
मार्क्सवाद... कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो...
मैं पढ़ता ही जा रहा था,
लेनिन...भगत सिंह...गाँधी...बुद्ध...
माओत्से-तुंग, दलाई लामा...
नक्सलबाड़ी...
पढ़ रहा था, "द्रुत झरो हे जगत के जीर्ण पत्र !"
...'बदल राग'...
और, "जली ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक
बाल न बाँका कर सकी शासन की बंदूक "
और, "शान्ति नहीं तब तक, जब तक
सुख-भाग न नर का सम हो"...

पढते-पढते मैं 'आग' से भर जाता और
अपने अध्ययन-कक्ष नुमा छ: बाई आठ के कमरे में
एक ज्वलनशील क्रांतिकारी में मेरा 'मेटामोर्फोसिस' हो जाता !

मगर मैं, खिड़की के बाहर, जून की दोपहर की
कडियल में धूप में,
प्यास से मरते उस पागल बूढ़े को
पुचकार कर पानी पिलाने नहीं जा रहा था...,
नहीं जा रहा था, पुलिस की लाठी से
पिटते हुए आदिवासियों की पीठ सहलाने...
मैं नहीं समझा रहा था लोगों को "चुनाव" का
समसामयिक मतलब और मकसद !
मैं घर से नहीं निकल रहा था, उन जमीनी मुद्दों पर
न्याय के हक़ में झंडा बुलंद करने... जिन मुद्दों पर,
शाम को अपने पड़ोसी से रात के खाने के पहले
या चौक पर किसी परिचित से चाय-पान निपटाते हुए
जोरदार बहस किया करता था...

मैं पढ़ रहा था, और अपनी कलम माँज रहा था,
कुछ ऐसे कि तलवार "भांज" रहा था...
मैं कुछ नहीं कर रहा था, कि
(जबकि 'सूचना का अधिकार' कानून लागू हो चुका था !)
नरेगा, मनरेगा, इंदिरा आवास योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सडक योजना... आदि-आदि के
ठेकेदारों और बिचौलियों की कमर उनके दर्जी के अनुसार
ढाई से तीन इंच फैल गई थी...
एक पूर्व मुख्यमंत्री जनता के करोड़ों-अरबों रूपये पेल कर
पाँच-सितारा नर्सिंग-होम में "अभियुक्त-जीवन" का मज़ा ले रहा था !
राष्ट्रीय-घोटालों के जनपदीय प्रतिनिधि शान से राजपथ पर
लंबे-लंबे डेग भरते संसद की ओर जा रहे होते थे...
और विरोध की तमाम सरगोशियों को
गले में ही चाँप दिया जा रहा था...यह एक खामोश प्रक्रिया थी...

मैं जान रहा था, पर निष्क्रिय था...
मैं सम्पादकीय-पृष्ठ पर लेख भेज कर तुष्ट था...
मुझे मालूम था कि मैं क्रांतिकारी था, बहादुर था...मैं घोर अध्ययनशील था...!
और इसी विद्वता से पैदा हुई
ठण्डी-निस्तेज-कागज़ी विप्लव के खेल में
अपने मुँह-मियां-शेर था !

आम आदमी सड़क पर
दफ्तर में...बाज़ार में... सभाओं में...
मेरे घर के सामने... जब भी मुझे पाता,
कई बार मेरी ओर से हतोत्साहित हो चुका रहने के बावजूद
बड़ी उम्मीद से
मुझे टोहता-टेरता रहता था,
मैं कुछ करूँगा...
कि में चीजें बदल दूँगा...
'एक पत्थर तबियत से उछालूँगा और आसमान में
सुराख़ कर दूँगा !"
एक झंडा, एक बैनर, एक पोस्टर लिए निकल
पडूँगा... "बेहतर के लिए बदलाव" जैसे स्लोगन के शीर्षक वाले
पैम्फलेट, हैण्डबिल, पर्चे गली-गली घूमकर, चौकों पर लोगों
में बाँटूँगा...!

आम आदमी को मुझसे कई सारी अपेक्षाएं थीं...
उसे मुझ पर आस्था यह थी कि
मैं ताकतवर हूँ...
क्योंकि मेरे पास किताबे थीं...
मेरी ऊपरी जेब में कलम खुँसी रहती थी...
और नाक पर एक अदद ऐनक !

लेकिन मैं अपने "खोल" में सुरक्षित होने का भ्रम लिए
उसको ठेंगा दिखा रहा था...

वह आम आदमी मुझे - "दादा"...कहता था,
और मैं बेशर्मी से उम्मीद किया करता था
कि वह मुझे 'कॉमरेड" कहे !

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

वह वेदना प्रकट में कहीं नहीं होती !

पूरा ब्यौरा इस तरह है...

समूचे आकाश पर
चमकीले सफ़ेद बादल
फैले थे... क्षितिज के ओर-छोर
साँसें तेज-तेज चल रही थीं और
दिन रोजाना की तरह पल-दर-पल
बीतता जा रहा था...
बहुत सारे घटितों को इतिहास में दर्ज़ करता हुआ

कोई संवाद
लगातार अपने ही अंतस की सुंरगों में
गूंजता जा रहा था... जिसका अर्थबोध
इसलिए नहीं हो पा रहा था
कि अभी इसकी भाषा नए सिरे से चिन्हित की जानी बाकि थी...
क्योंकि सारे शब्दकोशों से आम आदमी की
शब्दावलियाँ सेंसर कर दी गयीं थी,
इसे 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' से आसन्न खतरे
के मद्देनज़र किया गया था !

आदमी ना प्रेम को कह सकता था, ना पीड़ा को...!
तो विरोध किस प्रकार करता ?
मूक विरोध तो भोंथरे औजार के समान हुआ !
और इसलिए चोटिल आदमी को हाशिए पर डालने की प्रथा
कई दिनों से चालू थी...
व्यवस्था और सत्ता
के वास्ते
आदमी का मुखर होना बड़ा खतरनाक जो था !

वह एक परछाई सी थी, जिसमें मैं सिमटता जा रहा था...
मेरे होने को एक साथ स्वीकारता
और नकारता भी, यह समय...
तेजी से अतीत में ढलता जा रहा था
एक रौ में...
दहकते हुए सीने और
यहाँ से हजारों मील दूर समुद्र की लहरों में
एक ही लय थी !

मैंने पिछवाड़े, बाग़ की झाड़ी में से
उसे ढूँढ निकला था
जो कल की मुलाकात के बाद
फूल बनकर झड गया था...
और अक्सर ऐसा ही होता था...
और मैं अक्सर उस क्षण के बाद सोचता था इस पर... कि,
मेरे पाने और पाकर खोने का पूरा 'प्रमेय' यही है !

इन सब ब्यौरों में
कहीं उसका जिक्र साफ़-साफ़ नहीं है
ठीक इसी तरह कि,
मेरे होने के ठीक बीचों-बीच उसका होना भी
स्पष्ट नहीं है ! पर वास्तव में वो तो है ही...
मेरे ही भूगोल में छिपा हुआ...!

कई सारी सच्चाईयों के बीच
कोई बात नए तरीके से कहने के लिए
चेहरे पर तनाव का निशान बनना अपरिहार्य होता है !
बिल्कुल वैसे ही जैसे
मेरे और उसके संबंधों का
ब्यौरा लिखने के लिए
एक अव्यक्त वेदना की
मरणान्तक टीस सहनी होती है... बार-बार
और वह प्रकट में कहीं नहीं होती !

यहाँ "वह" का तात्पर्य -- प्रेम या पीड़ा या दोनों--
आप स्वयं लगा लें, इसकी छूट है !
और यह भी जानने की, समझने की, कोशिश करें
कि जो भी था, ऐसा क्यों था ?

मैंने बस अपना ब्यौरा समेट लिया है !

बुधवार, 5 जनवरी 2011

कवि १९७०

इस वक्त जबकि कान नहीं सुनते हैं कवितायें
कविता पेट से सुनी जा रही है आदमी
गज़ल नहीं गा रहा है गज़ल
आदमी को गा रही है

इस वक्त जबकि कविता माँगती है
समूचा आदमी अपनी खुराक के लिए
उसके मुँह से खून की बू
आ रही है

.........................

कविता में जाने से पहले
मैं आपसे ही पूछता हूँ
जब इससे न चोली बन सकती है
न चगा;
तब आपै कहो ---
इस ससुरी कविता को
जंगल से जनता तक
ढोने से क्या होगा ?

.........................

सुविधा की तहजीब से बाहर
जहाँ चौधरी अपना चमरौधा
उतार गये हैं
कविता में
वहीँ कहीं नफरत का
एक डरा हुआ बिन्दु है
आप उसे छुओ;
वह कुनमुनायेगा
आप उसे कोंचो
वह उठ खड़ा होगा

...............................

पत्नी का उदास और पीला चेहरा
मुझे आदत-सा आंकता है

उसकी फटी हुई साड़ी से झाँकती हुई पीठ पर
खिड़की से बाहर खड़े पेड़ की
वहशत चमक रही है

मैं झेंपता हूँ
और धूमिल होने से बचने लगता हूँ
--------------
आप मुस्कुराते हो ?

'बढ़िया उपमा है'
'अच्छा प्रतीक है'
'हें हें हें ! हें हें हें !!'
'लीक है - लीक है'

और मैं समझता हूँ कि आपके मुँह में
जितनी तारीफ है
उससे अधिक पीक है

फिर भी मैं अंत तक
आपको सहूँगा
------------------
लेकिन जब हारूँगा
आपके खिलाफ़ खुद अपने को तोडूंगा
भाषा को हीकते हुए अपने भीतर
थूकते हुए सारी घृणा के साथ

अंत में कहूँगा ---
सिर्फ़, इतना कहूँगा ---
'हाँ, हाँ, मैं कवि हूँ;
कवि -- याने भाषा में
भदेस हूँ;

इस कदर कायर हूँ
कि उत्तरप्रदेश हूँ !'

"संसद से सड़क तक " कविता संग्रह से
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