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शनिवार, 5 जून 2010

मित्रो मरजानी - कृष्णा सोबती

समित्रावंती (मित्रो), आधुनिक स्त्री के उस दमित रूप की मुखर अभिव्यक्ति, जिसे पहले सिर्फ छिपाया गया. जब भी मित्रो जैसी औरत से इस समाज का बावस्ता हुआ होगा, खुद को या उसे ही छुपाता रहा होगा...
मित्रो पुरुषवादी अंह और संस्कारों के जड़ और कुंद मर्यादाओं के पाक दरवाजे पर बार-बार ठोकर मारती रहती है, ताकि ताजी बयार, मुक्ति की हवा भीतर आ सके... खुद के भीतर... और तब मित्रो भरपूर सांस भरेगी...
मित्रो की "मुक्ति" व्याभिचार की श्रेणी में रख दी जायेगी, लेकिन सवाल ये है कि मित्रों की अतृप्त कामनाओं की तुष्टि कौन करता है... उसे उसकी कामना की आग में झुलसने को किसने छोड़ दिया है? उसी मर्द ने ही ना... 
और फिर गलत क्या है, सही क्या है? कौन करेगा इसका निर्धारण? जो करेगा, क्या वो अपनी अंतरात्मा के साथ इंसाफ करते हुए कह सकता है कि उसने वो सब नहीं किया, करने को चाहा तक नहीं, जिसे वह "गलत" परिभाषित कर रहा है?
मित्रों की कामुकता नैसर्गिक है, वह जितना उसके साथ है, उतना ही मेरे और आपके साथ भी सत्य है... सिर्फ कोरी मर्यादा 
के भारी-भरकम आदर्श के नीचे हम, खासकर औरतें, उसे जीवन भर छुपाने-दबाने को मजबूर हैं... 
मित्रो नैतिकता, रूढ़ी की जर्द दीवारों को लांघने की कोशिश करती है, उसकी बोली-लहजा, कामनाएँ... अपना अधिकार पा लिया अंततः, लेकिन वह किसी अंतर्द्वंद से घिरी नहीं रहती कभी. वह स्पष्टवादी है... भाषा में, व्यव्हार में, अभिव्यक्ति में... 
मित्रो एक सच्चाई है, जीती-जागती, हाड़-मांस की बनी हुई सच्चाई... मर्यादा-पुरुषोत्तमों के वास्ते एक कड़वी सच्चाई भी...
मित्रो सदियों से घुटकर अपनी ही यौनिकता को जब्त करती, संयम के घूँघट और बुर्कों में दम तोड़ती मुक्तिकामी स्त्री-वर्ग की उद्दाम लालसा की प्रतीक है... ये लालसा अनर्गल हो ही नहीं सकती...

केवल एक ही बैठक में पूरी पढ़ लिए जाने लायक कृति है - "मित्रो मरजानी"... और फिर ढेर सारे सवाल प्रतिध्वनित होते रहते हैं आपके भीतर देर तक, लेकिन उनके उत्तर भी पीछे-पीछे आते हैं...

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